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25.3.25

"सत्ता से सन्यास तक: विश्वामित्र–वशिष्ठ संघर्ष और नंदिनी गाय का रहस्य"



                              

ऋषि विश्वामित्र के बारे में तो ज्यादातर लोग जानते ही हैं, क्या आपको यह पता है कि असल में वह एक ऋषि नहीं बल्कि एक राजा हुआ करते थे, लेकिन सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक राजा अपना राजपाट छोड़कर एक साधु ऋषि बन गया. आइए जानते हैं.
महर्षि विश्वामित्र की कहानी एक प्रतापी राजा के ब्रह्मर्षि (उच्चतम कोटि के ऋषि) बनने के अद्भुत संकल्प और संघर्ष की गाथा है।
1. राजा कौशिक से ऋषि विश्वामित्र की यात्रा
विश्वामित्र का मूल नाम कौशिक था और वे कान्यकुब्ज (कन्नौज) के राजा गाधि के पुत्र थे।
वशिष्ठ से संघर्ष: एक बार राजा कौशिक अपनी सेना के साथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे। वशिष्ठ ने अपनी कामधेनु गाय, नंदिनी की सहायता से पूरी सेना का शाही सत्कार किया।
अहंकार की हार: कौशिक ने वह गाय माँगी, लेकिन वशिष्ठ के मना करने पर उन्होंने बल प्रयोग किया। वशिष्ठ की आध्यात्मिक शक्ति (ब्रह्मबल) के सामने कौशिक की विशाल सेना और शस्त्र हार गए।
संकल्प: इस हार से व्यथित होकर कौशिक ने समझा कि "क्षत्रिय बल से श्रेष्ठ तपस्या का बल है।" उन्होंने राजपाट त्याग दिया और कठोर तपस्या शुरू कर दी।
2. तपस्या में आए मुख्य विघ्न
 मेनका और विश्वामित्र: उनकी बढ़ती शक्ति से भयभीत होकर इंद्र ने अप्सरा मेनका को भेजा। मेनका के मोह में पड़कर उनकी तपस्या भंग हुई, जिससे उनकी पुत्री शकुंतला का जन्म हुआ।
क्रोध पर विजय: बाद में उन्होंने दोबारा तपस्या शुरू की, लेकिन क्रोध के कारण उनकी शक्ति फिर नष्ट हुई। अंततः वर्षों की साधना के बाद उन्होंने काम, क्रोध और लोभ पर विजय प्राप्त की।
3. त्रिशंकु का स्वर्ग और नया निर्माण
इक्ष्वाकु वंश के राजा त्रिशंकु सदेह स्वर्ग जाना चाहते थे। जब वशिष्ठ ने मना कर दिया, तब विश्वामित्र ने अपने तपोबल से उन्हें स्वर्ग भेज दिया। देवताओं द्वारा रोके जाने पर विश्वामित्र ने बीच आकाश में ही त्रिशंकु को रोककर उनके लिए एक नया स्वर्ग (त्रिशंकु स्वर्ग) बनाना शुरू कर दिया, जिससे उनकी असीम शक्ति का परिचय मिला।
4. भगवान राम के गुरु
त्रेतायुग में विश्वामित्र ही वे गुरु थे जिन्होंने भगवान राम और लक्ष्मण को राक्षसों (ताड़का, सुबाहु) का वध करने के लिए शस्त्र विद्या प्रदान की। वे ही उन्हें राजा जनक के दरबार में ले गए, जहाँ राम ने शिव धनुष तोड़कर सीता से विवाह किया।
प्रमुख उपलब्धियाँ:
गायत्री मंत्र: 
माना जाता है कि ऋग्वेद के प्रसिद्ध गायत्री मंत्र के दृष्टा महर्षि विश्वामित्र ही हैं।
ब्रह्मर्षि की उपाधि: अंत में उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं वशिष्ठ ने उन्हें 'ब्रह्मर्षि' के रूप में स्वीकार किया। ऋषि विश्वामित्र वै
दिक काल के एक महान तथा विख्यात ऋषि माने जाते हैं साथ ही ऋषि विश्वामित्र और मेनका की कहानी भी आपको पता होगी, लेकिन आज हम बताने वाले हैं कि आखिर एक महान पराक्रमी राजा ने साधु जीवन क्यों अपनाया. वैसे तो आमतौर पर यह माना जाता है कि किसी वस्तु का लालच लोगों में बदलाव ले आता है. देखा जाए तो एक राजा के पास किसी भी वस्तु की कमी नहीं होती, लेकिन ऐसे कौन से लोभ के चलते राजा विश्वामित्र, ऋषि विश्वामित्र बन गए?
जाने कौन थे राजा विश्वामित्र
राजा कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे और विश्वामित्र जी उन्हीं गाधि के पुत्र थे. विश्वामित्र शब्द विश्व और मित्र से बना है जिसका अर्थ सबके साथ मित्रता तथा प्रेम रखने वाला होता है. विश्वामित्र के पिता गाधि ने उनका राजतिलक कर गद्दी पर बैठा दिया और खुद वानप्रस्थ जाने का फैसला ले लिया. उसके बाद राजा विश्वामित्र ने बहुत अच्छे से राज-काज को संभाला और प्रजा भी उनसे बहुत खुश थी.
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार राजा विश्वामित्र अपनी सेना को लेकर जंगल की ओर निकले, रास्ते में ऋषि वशिष्ठ का आश्रम था. राजा विश्वामित्र, ऋषि वशिष्ठ से मिलने के लिए अपनी सेना के साथ वहीं ठहर गए. ऋषि वशिष्ठ और उनके शिष्यों ने राजा और उनकी सेना की खूब आवभगत की साथ ही स्वादिष्ट भोजन खिलाया. यह सब देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुए और पूछा की एक ऋषि होते हुए भी आपने हमारा इतना सत्कार कैसे किया? ऋषि वशिष्ठ ने उत्तर देते हुए कहा कि मेरे पास एक नंदिनी नाम की गाय है जो स्वर्ग में रहने वाली कामधेनु गाय की पुत्री है. मुझे यह गाय स्वयं इंद्रदेव ने भेंट की है, यह चमत्कारी गाय एक साथ लाखों लोगों के भोजन का प्रबंध करके दे सकती है.
विश्वामित्र ने किया ऋषि वशिष्ठ पर आक्रमण
नंदनी गाय के चमत्कारों को सुनकर राजा के मन में लोभ उत्पन्न हो गया जिसके फलस्वरुप राजा ने अपनी सेना सहित ऋषि वशिष्ठ और उनके शिष्यों पर आक्रमण कर दिया. यह देखकर नंदनी गाय ने राजा विश्वामित्र ने पूरी सेना को हरा दिया और राजा को बंदी बनाकर ऋषि वशिष्ठ के सामने ले गई. ऋषि वशिष्ठ ने राजा के सिर्फ एक पुत्र को छोड़कर सभी को मृत्यु का श्राप दे दिया. सभी पुत्रों की मृत्यु होने के बाद राजा ने बचे हुए एक पुत्र राजपाट सौंप दिया और सालों भगवान शिव की तपस्या की. राजा विश्वामित्र की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा तो उन्होंने कई दिव्य अस्त्र मांगे और भगवान शिव उन्हें दिव्यास्त्र दे दिए.
भगवान शिव से दिव्यास्त्र का वरदान लेकर राजा विश्वामित्र दोबारा ऋषि वशिष्ठ के पास पहुंचे और उनपर आक्रमण कर दिया. महर्षि वशिष्ठ के पास भी कई दिव्य शक्तियां थी जिससे उन्होंने राजा विश्वामित्र के दिव्यास्त्रों को नष्ट कर दिया. फिर ऋषि ने क्रोध में आकर ब्रह्माण्ड अस्त्र छोड़ दिया. जिससे पूरे संसार में हलचल मच गई. सब ऋषि-मुनि उनसे प्रार्थना करने लगे कि आपने विश्वामित्र को परास्त कर दिया है. अब आप ब्रह्माण्ड अस्त्र से उत्पन्न हुई ज्वाला को शांत करें. इस प्रार्थना से द्रवित होकर उन्होंने ब्रह्माण्ड अस्त्र को वापस बुलाया और उसे शांत किया.
पश्चाताप ने बनाया महान ऋषि
राजा को यह एहसास हुआ कि उसके पास दिव्यास्त्र होने के बावजूद वह ऋषि वशिष्ठ से जीत नहीं सकें, साथ ही यह भी पता चला कि चाहे वह कितनी भी शक्ति हासिल कर लें, लेकिन ऋषि वशिष्ठ से नहीं जीत सकते. राजा वापस जंगल की ओर चले और तपस्या करने लगे. उनकी तपस्या से इंद्र देव प्रसन्न हुए और प्रकट होकर राजा विश्वामित्र को ब्रह्मत्व प्रदान किया और राजा विश्वामित्र ब्रह्मर्षि बन गए, लेकिन इसके बावजूद भी राजा विश्वामित्र के मन में महर्षि बनने की इच्छा थी जिसके लिए उन्होंने फिर से तपस्या शुरू की और काम, क्रोध पर विजय पाकर महर्षि का पद प्राप्त किया.
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