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30.10.26

मैं 86 साल का हूँ, M.A., Ayurved Ratna, D.I.Hom London | गीता से जो सीखा वो आज बता रहा हूँ




मैं 86 साल का हूँ।छियासी साल।
मैंने M.A. किया,
Ayurved Ratna की उपाधि ली,
London से D.I.Hom किया,
जीवन भर आयुर्वेद से लोगों की सेवा की।
आज मैं अध्यक्ष हूँ,
अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ का।
इतनी डिग्रियाँ,
इतने पद,
इतना अनुभव...
लेकिन सच कहूँ?
इन सब डिग्रियों ने मुझे किताबी ज्ञान दिया,
लेकिन जीने का ज्ञान मुझे सिर्फ एक किताब ने दिया,
भगवद् गीता ने।
आज मैं कोई लेक्चर देने नहीं आया।
आज मैं मरने से पहले,
अपने 86 साल का निचोड़,
आपको 7 बातों में देना चाहता हूँ।
अगर आप 20 साल के हैं,
तो ये 7 बातें आपको 20 साल की ठोकरों से बचा लेंगी।
सातवीं बात सबसे जरूरी है,
जो मैंने 84 साल की उम्र में सीखी,
जब सब कुछ छूट गया था।
आखिर तक सुन लीजिएगा।
कुछ भी हमेशा नहीं रहता
पहली बात - जो गीता का पहला सत्य है।
कृष्ण कहते हैं,
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
जो नहीं है, वो रहेगा नहीं,
जो है, वो मिटेगा नहीं।
मैंने Ayurved Ratna बन कर हजारों नाड़ी देखीं,
M.A. करके बहुत से शास्त्र पढ़े,
London तक पढ़ने गया।
लेकिन एक बात समझ आई,
जवानी नहीं रही,
काले बाल नहीं रहे,
कई दोस्त नहीं रहे,
पद नहीं रहे,
यहाँ तक की शरीर भी रोज बदल रहा है।
पहले मैं दुखी होता था,
अब नहीं होता।
क्यों?
क्योंकि गीता ने कहा,
परिवर्तन ही संसार का नियम है।
सुख भी मेहमान है,
दुख भी मेहमान है,
दोनों आएंगे, जाएंगे,
तुम घर के मालिक बन कर स्थिर रहो।
मैंने क्या सीखा?
जब अच्छा समय आए तो उछलो मत,
जब बुरा समय आए तो रोओ मत,
ये भी बीत जाएगा।
ये लाइन मैंने अपनी डिस्पेंसरी में भी लिख कर रखी थी,
और आज भी अपने कमरे में लिख कर रखी है।
लेकिन स्थिर रहा कैसे जाए?
जब मन ही रोज भागता है,
दूसरी बात इसी मन की है,
जिसने मुझे 40 साल तक भटकाया।
मन को जीत लो
दूसरी बात - मन ही बंधन है, मन ही मुक्ति है।
कृष्ण कहते हैं,
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
जिसने मन को जीत लिया,
मन उसका दोस्त,
जिसने नहीं जीता,
मन उसका दुश्मन।
मैं सच बताऊँ,
मैं बहुत पढ़ा लिखा हूँ,
लेकिन 40 साल तक मैं अपने मन का गुलाम रहा।
मन ने कहा ज्यादा खा ले,
खा लिया,
मन ने कहा गुस्सा कर ले,
कर लिया,
मन ने कहा कल कर लेंगे,
टाल दिया।
आयुर्वेद में हम कहते हैं,
मन ही सारे रोगों की जड़ है,
और गीता भी यही कहती है।
50 साल की उम्र में जब घुटनों में दर्द हुआ,
तब समझ आया,
ये शरीर तो मन की ही सुन रहा था।
तब से मैंने एक नियम बनाया,
रोज सुबह 15 मिनट,
मैं मन से बात करता हूँ,
आँख बंद करके,
सिर्फ साँस को देखता हूँ,
आती है, जाती है।
मन भागता है,
100 बार भागता है,
मैं प्यार से वापस लाता हूँ।
30 साल से कर रहा हूँ,
अब मन थोड़ा सुनने लगा है।
आपके लिए सीख,
मन को डांटो मत,
बच्चे की तरह समझाओ,
रोज 10 मिनट बिना मोबाइल के बैठो,
ये 10 मिनट आपके 86 साल बचा लेंगे।
कर्म करो, फल छोड़ो
तीसरी बात - गीता का दिल।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मैंने जीवन में बहुत हिसाब लगाए,
इतनी पढ़ाई की तो इतनी इज्जत मिलेगी,
इतनी सेवा की तो लोग याद रखेंगे,
इतना समाज का काम किया तो नाम होगा।
लेकिन हिसाब हमेशा गलत निकला।
जिस काम में सबसे ज्यादा मेहनत की,
फल सबसे देर से मिला।
तब गीता ने कहा,
अरे, तू फल का हिसाब लगाने वाला कौन होता है?
तेरा काम है बीज बोना,
फल देना प्रकृति का काम है,
ईश्वर का काम है।
जैसे एक वैद्य का काम है सही दवा देना,
मरीज ठीक होगा या नहीं,
ये उसके हाथ में नहीं,
लेकिन वैद्य दवा देना बंद कर दे तो?
इसलिए मैंने फल छोड़ दिया।
आज भी मैं सुबह 5 बजे उठता हूँ,
गीता पढ़ता हूँ,
कोई देखे या ना देखे,
कोई लाइक करे या ना करे,
मुझे अपना कर्म करना है।
और यकीन मानो,
जब से फल छोड़ा,
मन इतना हल्का हो गया,
जैसे सिर से 50 किलो बोझ उतर गया।
रुकिए,
अगर एक 86 साल के,
M.A., Ayurved Ratna,
अध्यक्ष के अनुभव की ये बातें आपको सच्ची लग रही हैं,
तो इस वीडियो को एक Like कर दीजिए।
आपका एक Like मुझे नहीं,
YouTube को बताता है कि
एक बुजुर्ग का सच्चा अनुभव और लोगों तक जाना चाहिए।
और अगर आप चाहते हैं कि मैं हर हफ्ते
ऐसे ही जीवन के सच्चे अनुभव बताता रहूँ,
तो Subscribe करके Bell दबा दीजिए।
चौथी बात रिश्तों की है,
जिसने मुझे सबसे ज्यादा रुलाया।
बात 4 - प्रेम करो, मोह मत करो
चौथी बात - मोह दुख देता है, प्रेम नहीं।
हम कहते हैं मुझे परिवार से प्रेम है,
गीता कहती है जरा जांचो,
वो प्रेम है या मोह?
प्रेम कहता है तू खुश रहे,
मोह कहता है तू मेरे हिसाब से खुश रहे।
मैंने अपने बच्चों से मोह किया,
अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ के अपने समाज के बच्चों से भी मोह किया,
सोचा मेरे हिसाब से चलेंगे।
जब उन्होंने अपने हिसाब से किया,
तो दुख हुआ।
कृष्ण कहते हैं,
अर्जुन तू इसी मोह में तो रो रहा है।
प्रेम में स्वतंत्रता है,
मोह में बंधन है।
86 साल में मैंने सीखा,
बाँधने से कोई नहीं बंधता,
छोड़ने से ही सब पास आते हैं।
आज मैं अपने समाज के युवाओं से भी कहता हूँ,
बेटा तुम्हारी जिंदगी है, तुम जियो,
मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें बाँधूंगा नहीं।
और आश्चर्य देखिए,
अब वो खुद मेरे पास आते हैं, सलाह लेते हैं।
आपके लिए नियम,
आज से किसी को बदलने की कोशिश मत करो,
खुद को अच्छा बना लो,
रिश्ते खुद सुधर जाएंगे।
बात 5 और 6
तुलना बंद करो।
मैंने 60 साल तुलना की,
उसके पास बड़ी गाड़ी है,
उसका बेटा ज्यादा कमाता है,
उसका समाज बड़ा है।
गीता कहती है,
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्।
दूसरे का धर्म कितना भी अच्छा लगे,
अपने धर्म में ही रहो।
मैं M.A. हूँ, Ayurved Ratna हूँ,
London से पढ़ा हूँ,
लेकिन जब तक तुलना करता था,
दुखी था।
जैसे ही तुलना बंद की,
मैं अमीर बन गया,
मन से अमीर।
छठी बात - संतोष।
आयुर्वेद में हम कहते हैं,
संतोष सबसे बड़ी औषधि है।
आज हर कोई दौड़ रहा है,
और दौड़, और दौड़।
मैंने भी दौड़ी,
80 साल की उम्र में डॉक्टर ने कहा अब धीरे चलो,
तब समझ आया,
दौड़ना ही बीमारी थी।
गीता कहती है,
जो मिला है उसमें संतोष करो,
जो नहीं मिला उसके लिए पुरुषार्थ करो।
आज मेरे पास एक छोटा कमरा है,
एक गीता है,
एक लोटा पानी है,
मैं दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक हूँ,
क्योंकि मुझे और चाहिए ही नहीं।
अंतिम बात से पहले
और अब सातवीं और आखिरी बात,
जो मैंने 84 साल में सीखी,
जब मेरी जीवन संगिनी मुझे छोड़ कर गई,
अगर ये नहीं सुनी तो सब बेकार है।
बात 7 - शरणागति
सातवीं बात - सब छोड़ कर उसकी शरण में चले जाओ।
9 साल पहले जब पत्नी चली गई,
मैं टूट गया,
55 साल का साथ,
एक दिन में खत्म।
मैं M.A. हूँ, बहुत पढ़ा हूँ,
Ayurved Ratna हूँ, बहुत लोगों का इलाज किया है,
अध्यक्ष हूँ, हजारों लोगों को संभाला है,
लेकिन उस दिन खुद को नहीं संभाल पाया।
गीता के सामने बैठ कर रोया,
कहा कृष्ण, अब क्या करूं?
तभी अंतिम श्लोक सामने आया,
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
सब छोड़ कर मेरी शरण में आ जा,
मैं संभाल लूंगा, तू शोक मत कर।
मैंने सब छोड़ दिया,
चिंता छोड़ दी,
डर छोड़ दी,
मैं क्या करूंगा ये सोचना छोड़ दिया,
कहा कृष्ण, अब तुम संभालो।
उस दिन के बाद से मैं अकेला नहीं हूँ,
कोई है जो मेरे साथ चल रहा है।
86 साल में मैंने एक ही सच जाना,
हम कर्ता नहीं हैं,
हम तो निमित्त हैं,
करने वाला तो वो है।
जब ये मैं हट जाता है,
तो सारा बोझ हट जाता है।
तो मेरे बच्चों,
मैं डॉ. आलोक दयाराम,
M.A., Ayurved Ratna, D.I.Hom London,
अध्यक्ष, अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ,
86 साल का अनुभव लेकर,
आपसे हाथ जोड़ कर 7 बातें कह कर जा रहा हूँ,
कुछ भी हमेशा नहीं रहता,
मन को दोस्त बनाओ,
कर्म करो, फल छोड़ो,
प्रेम करो, मोह नहीं,
तुलना छोड़ो,
संतोष में रहो,
और आखिर में सब कृष्ण पर छोड़ दो।
अर्जुन ने कहा था,
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा।
मेरा मोह नष्ट हो गया।
आज मैं भी कह रहा हूँ,
मेरा मोह नष्ट हो गया।
अब आप बताइए,
इन 7 में से कौन सी बात आप आज से अपनाएंगे?
नीचे Comment में नंबर लिखिए,
1 से 7 तक,
मैं खुद पढ़ता हूँ, आँखें थोड़ी कमजोर हैं,
पर हर Comment पढ़ता हूँ।
और अगर एक बुजुर्ग की ये बातें किसी और के काम आ सकती हैं,
तो इसे अपने बच्चों को, अपने समाज के युवाओं को Share जरूर करिए।
क्या पता आपके एक Share से किसी को जीने की उम्मीद मिल जाए।
मैं मिलता हूँ अगले हफ्ते,
जय श्री कृष्ण,
राधे राधे।

15.10.26

सम्पूर्ण सत्यनारायण व्रत कथा | 5 अध्याय एक साथ | Purnima Special









रुक जाइए! 2 मिनट निकाल कर इसे पढ़ लीजिए...

अगर आपके घर में...पैसों की तंगी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है
मन में हर वक्त अशांति और घबराहट रहती है
मेहनत तो बहुत करते हैं, पर काम बनते-बनते बिगड़ जाता है
परिवार में बिना बात के कलह होता रहता है

तो यकीन मानिए, आज की यह कथा सिर्फ कथा नहीं, आपके लिए भगवान विष्णु का भेजा हुआ संदेश है।

शास्त्रों में कहा गया है - पूर्णिमा के दिन संपूर्ण सत्यनारायण कथा सुनने से 100 यज्ञों के बराबर फल मिलता है। आज हम आपके लिए लेकर आए हैं पाँचों अध्यायों की संपूर्ण कथा, एक साथ, बिना किसी रुकावट के।

इस कथा को अधूरा मत छोड़िए। कहा जाता है अधूरी कथा का फल नहीं मिलता। अंत तक पढ़िए, आपका एक मनोरथ तो आज भगवान जरूर पूरा करेंगे।

शुरू करने से पहले मन में एक संकल्प ले लीजिए और कमेंट में सच्चे दिल से लिख दीजिए - ॐ सत्यनारायणाय नमः।

सत्यनारायण व्रत क्या है? सिर्फ व्रत नहीं, सत्य का मार्ग है

प्रिय भक्तों, सत्यनारायण व्रत को हम अक्सर एक सामान्य पूजा समझ लेते हैं। पर यह सिर्फ पूजा नहीं है।

सत्य + नारायण = सत्य ही नारायण है। भगवान विष्णु का वह स्वरूप जो सत्य में वास करता है।

कलियुग में मनुष्य के पास न तो हजारों साल तप करने का समय है, न बड़े-बड़े यज्ञ करने का धन। इसीलिए भगवान विष्णु ने स्वयं इस व्रत को कलियुग का कल्पवृक्ष कहा है। छोटा सा प्रयास, और फल - धन, धान्य, संतान, सुख, मोक्ष सब कुछ।

यह व्रत हमें एक बात सिखाता है - जीवन में चाहे कितना भी बड़ा संकट क्यों न हो, अगर आप सत्य पर टिके हैं, तो भगवान स्वयं आपकी नाव पार लगा देंगे।
पूजा से पहले जान लें - सही विधि और सामग्री

कथा सुनने से पहले पूजा की विधि जानना जरूरी है, तभी फल संपूर्ण मिलता है।

कब करें? पूर्णिमा, संक्रांति, एकादशी, या किसी भी शुभ अवसर पर। पूर्णिमा सर्वोत्तम मानी गई है।

सामग्री क्या चाहिए?
केले के पत्ते, केले के फल, तुलसी दल, पंचामृत - दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल। गेहूं का आटा, चीनी, घी से बना पंजीरी का प्रसाद। यही इस व्रत का मुख्य प्रसाद है। फूल, धूप, दीप, अक्षत, रोली।

संकल्प कैसे लें?
हाथ में थोड़ा जल, फूल और अक्षत लेकर मन में बोलें:
"हे सत्यनारायण भगवान, मैं आपका यह व्रत श्रवण कर रहा/रही हूँ। मेरे और मेरे परिवार के सभी मनोरथ पूर्ण कीजिए। मेरे घर से दरिद्रता, रोग और क्लेश दूर कीजिए।"

अब पवित्र मन से पाँचों अध्यायों की कथा में प्रवेश करते हैं।
प्रथम अध्याय - जब भूखे ब्राह्मण पर स्वयं भगवान को दया आ गई

यह कथा है सत्य की नींव की।

एक समय की बात है। देवर्षि नारद जी तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए मृत्युलोक - यानी हमारी धरती पर आए। उन्होंने देखा कि मनुष्य दुखों से घिरा है। कोई भूख से रो रहा है, कोई कर्ज से, कोई संतान के लिए, कोई रोग से। यह देखकर करुणा के सागर नारद जी का हृदय द्रवित हो गया।

वे सीधे बैकुंठ धाम गए, जहाँ भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं।

नारद जी ने हाथ जोड़कर पूछा - "हे प्रभु, हे जगत के पालनहार, मृत्युलोक में मनुष्य इतना दुखी क्यों है? ऐसा कोई छोटा सा उपाय बताइए जिससे मनुष्य थोड़े से प्रयास से ही आपके परम पद को पा ले और उसके दुख दूर हो जाएं।"

भगवान विष्णु अपनी मोहिनी मुस्कान के साथ बोले - "हे नारद, तुमने प्राणियों के कल्याण के लिए बहुत सुंदर प्रश्न पूछा है। सुनो, मैं तुम्हें एक ऐसे व्रत के बारे में बताता हूँ जो कलियुग में मनुष्यों के लिए कल्पवृक्ष के समान फल देने वाला है। उसका नाम है श्री सत्यनारायण व्रत। इस व्रत को जो भी श्रद्धा से करेगा, वह सभी दुखों से मुक्त होकर इस लोक में सुख और अंत में मोक्ष को प्राप्त करेगा।"

नारद जी ने उत्सुकता से पूछा - "प्रभु, इसकी विधि क्या है? इसका फल क्या है? सबसे पहले इसे किसने किया?"

भगवान बोले - "प्राचीन काल में काशी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख-प्यास से व्याकुल वह रोज भिक्षा मांगता था, फिर भी उसका पेट नहीं भरता था। उसकी ऐसी दरिद्रता देखकर मुझे दया आ गई। मैं एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण करके उसके पास गया और बोला - हे ब्राह्मण देवता, मैं सत्यनारायण हूँ। तुम सत्यनारायण का व्रत करो, तुम्हारी सारी दरिद्रता पल भर में दूर हो जाएगी।"

वृद्ध ने पूछा - "भगवन, मुझे विधि बताइए।"

भगवान ने कहा - "पूर्णिमा या संक्रांति के दिन अपने बंधु-बांधवों के साथ सत्यनारायण की कथा सुनो। केले के फल, घी, दूध, आटा और चीनी मिलाकर पंजीरी का प्रसाद बनाओ और भक्ति से मेरा पूजन करो।"

उस निर्धन ब्राह्मण ने दूसरे ही दिन से व्रत शुरू किया। और विश्वास कीजिए, देखते ही देखते उसकी सारी गरीबी दूर हो गई। वह धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया और अंत में बैकुंठ को प्राप्त हुआ।

पहले अध्याय का सार और सीख: जो कोई भी इस प्रथम अध्याय को सच्चे मन से सुनता है, उसके जीवन से गरीबी का दोष हमेशा के लिए मिट जाता है। भगवान को अमीरी-गरीबी नहीं, सिर्फ सच्ची श्रद्धा चाहिए।


भक्त की पुकार:
निर्धन ब्राह्मण पे कृपा करी, रूप वृद्ध का धारा
सत्यनारायण नाम तुम्हारा, जग का पालनहारा
द्वितीय अध्याय - राजा उल्कामुख की कहानी - प्रसाद का अपमान कभी मत करना

सूत जी महाराज ऋषियों से बोले - "हे ऋषियों, अब मैं दूसरा अध्याय सुनाता हूँ। इसे ध्यान से सुनिए, इसमें प्रसाद का महत्व बताया गया है।"

प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक परम बुद्धिमान, सत्यवादी और जितेन्द्रिय राजा था। वह प्रतिदिन देवताओं का पूजन करता था। एक दिन वह वन में शिकार खेलने गया। वहां उसने देखा कि हजारों निर्धन ब्राह्मण एक साथ बैठकर सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजन कर रहे हैं।

राजा ने पास जाकर पूछा - "आप लोग यह क्या कर रहे हैं?"

ब्राह्मण बोले - "हे राजन, हम सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहे हैं, जिससे मनुष्य की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।"

राजा ने उसी क्षण व्रत करने का निश्चय किया, प्रसाद ग्रहण किया और अपने महल चला गया। पर महल के सुख-वैभव में आकर वह अहंकार में डूब गया और व्रत को भूल गया।

भगवान सत्यनारायण उसकी परीक्षा लेने के लिए एक साधु का वेश धारण करके सौ लाख मुद्राएं लेकर राजा के पास पहुंचे। पर अहंकार में डूबे राजा ने साधु का यथोचित सत्कार नहीं किया, उसका अपमान कर दिया।

भगवान कुपित हो गए। उसी क्षण राजा की सारी संपत्ति नष्ट हो गई। उसकी पत्नी और पुत्र भी उससे बिछड़ गए। वह कंगाल होकर वन-वन भटकने लगा।

तब उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। उसे याद आया कि उसने ब्राह्मणों के साथ सत्यनारायण का प्रसाद ग्रहण किया था पर व्रत नहीं किया। वह वापस उन ब्राह्मणों के पास गया और विधिपूर्वक क्षमा मांगते हुए सत्यनारायण का व्रत किया।

भगवान प्रसन्न हो गए और उसकी खोई हुई सारी संपत्ति, परिवार सब लौटा दिया।

दूसरे अध्याय का सार और सीख: भक्तों, कभी भी भगवान के प्रसाद का अनादर मत कीजिए। प्रसाद सिर्फ भोजन नहीं, भगवान का आशीर्वाद है। और अहंकार - यही मनुष्य के विनाश का सबसे बड़ा कारण है।

यहाँ तक आपने दो अध्याय सुन लिए हैं। देखिए, मन में एक अजीब सी शांति आ रही होगी ना? यही भगवान की कृपा का पहला संकेत है।
तृतीय अध्याय - साधु वैश्य की कहानी - भगवान से झूठ बोलने का परिणाम

यह अध्याय सबसे ज्यादा हृदय को छूने वाला है, क्योंकि यह हम जैसे गृहस्थ लोगों की कहानी है।

प्राचीन काल में साधु नाम का एक अत्यंत धनी वैश्य था। उसका व्यापार सात समुंदर पार तक फैला था, पर संतान न होने के कारण वह अंदर से बहुत दुखी था।

एक दिन वह किसी नगर में गया, वहां उसने देखा लोग सत्यनारायण का व्रत कर रहे हैं। उसने पूछा - "इस व्रत को करने से क्या फल मिलता है?"

लोगों ने कहा - "इस व्रत को करने से निसंतान को संतान की प्राप्ति होती है।"

साधु ने मन ही मन संकल्प किया - "हे भगवान, यदि मुझे संतान प्राप्त हुई, तो मैं भी आपका व्रत करूंगा।"

भगवान की कृपा से उसकी पत्नी लीलावती ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया कलावती। खुशी में साधु वैश्य अपनी प्रतिज्ञा भूल गया।

समय बीता, कलावती विवाह योग्य हुई। साधु ने उसका विवाह कंचन नगर के एक योग्य व्यापारी पुत्र के साथ कर दिया। कुछ समय बाद व्यापार के लिए साधु अपने दामाद के साथ समुद्र के रास्ते से व्यापार करने निकला।

उधर कंचन नगर में राजा ने चोरी के झूठे आरोप में साधु और उसके दामाद को बंदी बना लिया, क्योंकि उनके पास बहुत सा धन था। इधर घर में साधु की पत्नी और बेटी का सारा धन चोरों ने चुरा लिया। वे भूखों मरने लगीं।

एक दिन कलावती भूख से व्याकुल होकर भिक्षा मांगने निकली, तो उसने देखा कुछ स्त्रियां सत्यनारायण का व्रत कर रही हैं। कलावती ने वहीं बैठकर कथा सुनी और प्रसाद ग्रहण किया।

उसी रात सत्यनारायण भगवान ने कंचन नगर के राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा - "हे राजन, जिन दो व्यापारियों को तुमने बंदी बनाया है, वे निर्दोष हैं। उन्हें तुरंत छोड़ दो, नहीं तो मैं तुम्हारा राज्य, धन सब नष्ट कर दूंगा।"

राजा भयभीत हो गया। सुबह होते ही उसने दोनों को मुक्त कर दिया और उनका सारा धन दुगुना करके लौटा दिया।

साधु वैश्य अपनी नाव में धन भरकर घर लौटने लगा। तभी भगवान ने फिर उसकी परीक्षा ली। वे एक दंडी सन्यासी के वेश में नाव के किनारे आए और पूछा - "हे साधु, तुम्हारी नाव में क्या है?"

साधु ने अभिमान में आकर झूठ कहा - "इसमें तो बेल और पत्ते भरे हैं।"

सन्यासी बोले - "तथास्तु, तुम्हारा वचन सत्य हो।"

जैसे ही सन्यासी गए, साधु ने नाव में देखा तो सारा धन बेल और पत्तों में बदल गया था। वह मूर्छित हो गया। उसके दामाद ने कारण पूछा। तब साधु को अपनी भूल समझ आई। उसने सन्यासी को वापस बुलाकर क्षमा मांगी और नाव पर ही विधिपूर्वक सत्यनारायण का व्रत किया। तत्क्षण उसकी नाव फिर से धन से भर गई।

तीसरे अध्याय का सार और सीख: याद रखिए, भगवान से कभी भी छल मत कीजिए, झूठ मत बोलिए। भगवान को सब पता है। और अपनी मन्नत को कभी मत भूलिए। भगवान आपका काम करते हैं, तो आपका भी धर्म है कि आप अपना वचन निभाएं।
चतुर्थ अध्याय - ग्वाले की छोटी सी भक्ति और बड़ा फल

सूत जी बोले - "यह अध्याय हमें सिखाता है कि भगवान को बड़े आडंबर की जरूरत नहीं, एक सच्चा मन ही काफी है।"

एक समय तुंगध्वज नाम का एक ग्वाला था। वह प्रतिदिन जंगल में गायें चराने जाता था। एक दिन वह बहुत भूखा था। उसने देखा बरगद के पेड़ के नीचे कुछ लोग सत्यनारायण का व्रत कर रहे हैं।

ग्वाले ने वहीं बैठकर भक्ति से कथा सुनी और प्रसाद में दूध मिलाकर पंजीरी ग्रहण की। प्रसाद खाते ही उसकी भूख शांत हो गई और वह प्रसन्न मन से घर लौटा।

उसने सोचा - "क्यों न मैं भी रोज इस प्रसाद को दुगुने दूध के साथ बनाकर बेचूं?"

अगले दिन से उसने वैसा ही किया। और देखते ही देखते उसकी आमदनी दुगुनी, चौगुनी होती चली गई। धीरे-धीरे वह बहुत धनी हो गया।

चौथे अध्याय का सार और सीख: भगवान सत्यनारायण अपने भक्तों की छोटी सी भक्ति से भी प्रसन्न हो जाते हैं। इस चौथे अध्याय को सुनने से मनुष्य को अन्न और धन की कभी कमी नहीं रहती। विश्वास रखिए, अगर एक अनपढ़ ग्वाला सिर्फ प्रसाद से धनी बन सकता है, तो आप क्यों नहीं?


थोड़े में जो राजी रहे, हरि उसे भरपूर करे
सच्चे मन से जो ध्यावे, नैया पार करे
पंचम अध्याय - सबसे महत्वपूर्ण - राजा तुंगध्वज के अहंकार का नाश

अब सुनिए सबसे महत्वपूर्ण पंचम अध्याय। इस अध्याय को सुनने से ही व्रत संपूर्ण होता है।

एक समय एक अत्यंत धनी और अहंकारी राजा था, उसका नाम भी तुंगध्वज था। एक दिन राजा वन में शिकार करने गया और थक कर एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गया। वहां ग्वाले सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहे थे।

परंतु राजा ने अहंकार के कारण न तो प्रणाम किया, न प्रसाद लिया। उसने सोचा - "मैं इतना बड़ा राजा, इन ग्वालों का प्रसाद क्यों लूं?" और अपने महल को लौट गया।

भगवान राजा के इस अहंकार से बहुत क्रोधित हुए। उसी रात राजा के सौ पुत्रों की मृत्यु हो गई, उसकी सारी सेना नष्ट हो गई, उसका सारा खजाना खाली हो गया।

राजा को समझ आ गया कि यह सब सत्यनारायण भगवान के अपमान के कारण हुआ है। वह दौड़ा-दौड़ा उन ग्वालों के पास गया और जमीन पर गिरकर क्षमा मांगने लगा - "हे प्रभु, मुझे क्षमा कर दीजिए, मैं अज्ञानी हूँ।"

ग्वालों ने उसे क्षमा कर दिया और उसे भगवान का प्रसाद दिया। राजा ने श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया और व्रत किया। भगवान की कृपा से उसका सब कुछ वापस लौट आया, उसके पुत्र जीवित हो गए और अंत में राजा इस व्रत के प्रभाव से बैकुंठ को प्राप्त हुआ।

पंचम अध्याय का सार और सीख: जो मनुष्य इस पंचम अध्याय को सुनता है, भगवान सत्यनारायण उसके सारे अहंकार को नष्ट कर देते हैं और उसे विनम्रता और भक्ति का आशीर्वाद देते हैं। याद रखिए, अहंकार भगवान को सबसे अप्रिय है।
कथा समाप्ति के बाद क्या करें? ये 3 काम जरूर करें

तो प्रिय भक्तों, ये थी संपूर्ण सत्यनारायण व्रत कथा - पाँचों अध्याय एक साथ। आज पूर्णिमा के पावन अवसर पर आपने यह संपूर्ण कथा सुनी, तो आपका व्रत संपूर्ण हुआ।

अब कथा समाप्ति के बाद ये तीन काम जरूर करें:

1. क्षमा प्रार्थना: हाथ जोड़कर अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांग लीजिए - "हे प्रभु, मुझसे जाने-अनजाने में कोई भूल हुई हो तो क्षमा करें।"
2. प्रसाद वितरण: जो पंजीरी का प्रसाद बनाया है, उसे सभी में बांट दीजिए और स्वयं भी ग्रहण कीजिए। प्रसाद को कभी फेंकना नहीं चाहिए।
3. सत्य का संकल्प: आज एक संकल्प लीजिए - "मैं जीवन में कभी झूठ नहीं बोलूंगा, किसी का अपमान नहीं करूंगा और अपने वचन का पालन करूंगा।"

अंत में एक प्रार्थना -

हे सत्यनारायण भगवान, जैसे आपने निर्धन ब्राह्मण, राजा उल्कामुख, साधु वैश्य, ग्वाले और राजा तुंगध्वज का उद्धार किया, वैसे ही हम सभी का उद्धार कीजिए। हमारे घर में सुख, शांति, समृद्धि बनाए रखिए।

जो भी भक्त इस कथा को सच्चे मन से पढ़ता है, उसके घर में लक्ष्मी-नारायण का वास होता है।

बोलिए - श्री सत्यनारायण भगवान की जय! श्री लक्ष्मी नारायण की जय!

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7.10.26

Jat History | जाटों की उत्पत्ति कैसे हुई? | Origin of Jats | Jat Ka Itihas

                                 

जाट कौन हैं? 2000 साल का अजेय इतिहास - DNA से लोहागढ़ तक का सच

एक ऐसा समुदाय जिसे मुगल साम्राज्य कभी पूरी तरह हरा नहीं पाया। एक ऐसा किला जिसे अंग्रेजों ने खुद 'लोहागढ़' कहा, क्योंकि अंग्रेजी तोपें भी उसे भेद नहीं पाई थीं।

वो कौम है - जाट।

लेकिन सवाल आज भी वही है जो इतिहास की किताबों में सबसे ज्यादा उलझा हुआ है - जाट कौन हैं? क्या वे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के मूल किसान हैं, जिन्होंने इस धरती पर पहली बार हल चलाया? या वे 2000 साल पहले मध्य एशिया के बर्फीले मैदानों से आए हुए शक यानी Scythian योद्धाओं के वंशज हैं?

और एक साधारण किसान, जो हल चलाता था, वो भरतपुर जैसा अजेय साम्राज्य कैसे बना गया?

आज के इस विस्तृत लेख में हम जाटों की उत्पत्ति के दो हजार साल के इतिहास को तीन सूत्रों में समझेंगे - उत्पत्ति, विद्रोह और राज्य। यह लेख किसी एक किताब की कहानी नहीं, बल्कि DNA रिपोर्ट्स, ब्रिटिश गजेटियर्स, राजस्थान सरकार के अभिलेखों और मुगल दस्तावेजों पर आधारित है।
1. उत्पत्ति का रहस्य: ज्ञात से जाट तक

जाट इतिहास को लेकर इतिहासकारों में मुख्य रूप से दो धाराएं हैं, और दोनों के पास अपने-अपने मजबूत तर्क हैं।

सिद्धांत A: वैदिक और Indo-Aryan सिद्धांत - हम इसी मिट्टी के हैं

इस सिद्धांत को मानने वाले विद्वान कहते हैं कि 'जाट' शब्द संस्कृत के 'ज्ञात' शब्द से बना है। ज्ञात का अर्थ होता है - जाना-माना, प्रतिष्ठित, कुलीन वर्ग।

ऋग्वेद में 'जट' और 'जटा' शब्द का उल्लेख मिलता है, जिसका संबंध जटाओं को धारण करने वाले और संगठित रहने वाले समूह से बताया जाता है। इन विद्वानों का तर्क है कि जाट कोई बाहर से आया समुदाय नहीं, बल्कि सिंधु और सरस्वती नदी के किनारे बसने वाले मूल आर्य किसान और पशुपालक समुदाय हैं। वे ही लोग थे जिन्होंने सबसे पहले संगठित खेती और पशुपालन को व्यवसाय बनाया। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानों में उनकी बस्तियां थीं। उनकी सरलता, शारीरिक मजबूती और जमीन से जुड़ाव इसी सिद्धांत को बल देता है।

सिद्धांत B: Indo-Scythian / शक सिद्धांत - सबसे अधिक मान्य

दूसरा और अंतरराष्ट्रीय इतिहासकारों में सबसे अधिक स्वीकृत सिद्धांत शक कनेक्शन का है।

इस सिद्धांत के अनुसार, जाटों का सीधा संबंध मध्य एशिया की सबसे खूंखार घुड़सवार जाति - शकों (Scythians) और कुषाणों से है।

क्या कहते हैं दस्तावेज?
राजस्थान के इतिहास से जुड़े ग्रंथ 'राज-रस' और कई रियासतों के फाउंडेशन रिकॉर्ड्स में साफ लिखा है कि भरतपुर पर राज करने वाला सिनसिनवार गोत्र एक Indo-Scythian tribal community था, जो लगभग 100 ईस्वी में भारत में आया था।

ब्रिटिश इतिहासकार बेन्स और कर्नल जेम्स टॉड जैसे लोगों ने भी लिखा है - "भरतपुर और धौलपुर जैसी रियासतें जाटों द्वारा शासित थीं, जिन्हें कई अधिकारी, राजपूतों की तरह ही, मध्य एशियाई आक्रमणकारियों यानी Scythians की संतान मानते हैं।"

इसका पूरा घटनाक्रम कुछ ऐसा रहा होगा - लगभग 2000 साल पहले, जब मध्य एशिया में जलवायु परिवर्तन हुआ, तो शक, पहलव और कुषाण जैसी घुमंतू योद्धा जातियां बेहतर चरागाहों और जमीन की तलाश में भारत की ओर आईं। वे अपने साथ घोड़े, लोहे के हथियार और युद्ध की नई रणनीतियां लाईं। पंजाब से लेकर राजस्थान तक फैलने के बाद, उन्होंने धीरे-धीरे खानाबदोश जीवन छोड़कर खेती शुरू कर दी, स्थानीय भाषा और धर्म को अपनाया और कालांतर में 'जाट' कहलाए।

आज भी इसका सबसे बड़ा प्रमाण गोत्र हैं। जाटों के कई गोत्र जैसे मान, भुल्लर, औलख, विरक, गिल - आज भी अफगानिस्तान, बलूचिस्तान और मध्य एशिया में उसी उच्चारण के साथ मिलते हैं। डीएनए स्टडीज भी संकेत देती हैं कि जाटों में R1a और L जैसे हैप्लोग्रुप की अधिकता है, जो मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप में भी पाया जाता है।

तो अंतिम सच क्या है?

सच शायद इन दोनों के बीच में है। जाट न तो 100% विदेशी हैं, न ही 100% एक ही जगह के मूल निवासी। वे एक संगम हैं - बाहर से आए वीर, मेहनती योद्धाओं और भारत के मूल, मेहनती किसानों का। इसीलिए एक जाट में दो गुण एक साथ मिलते हैं - एक किसान की जमीन से जुड़ी सादगी और एक सैनिक की कभी न झुकने वाली बहादुरी।
2. विद्रोह का युग: जब किसान ने कहा - नहीं देंगे लगान

जाटों का इतिहास सिर्फ खेती का नहीं, विद्रोह का भी इतिहास है।

17वीं सदी। दिल्ली के तख्त पर औरंगजेब है। जजिया कर फिर से लगा दिया गया है, मंदिरों पर हमले हो रहे हैं, और किसानों पर लगान इतना बढ़ा दिया गया है कि किसान अपनी जमीन छोड़ने पर मजबूर हैं।

ऐसे समय में मथुरा के पास एक छोटा सा गांव था - सिनसिनी। वहां के जमींदार थे गोकुला जाट।

गोकुला जाट भारतीय इतिहास में पहले व्यक्ति थे जिन्होंने खुले तौर पर मुगलों को लगान देने से मना कर दिया। 1669 में उन्होंने लगभग 20,000 किसानों, जिसमें जाट, गुर्जर और मेव किसान शामिल थे, को इकट्ठा किया। उन्होंने मुगल फौजदार अब्द-उन-नबी को युद्ध में न सिर्फ हराया, बल्कि मार दिया। यह मुगल साम्राज्य के खिलाफ पहला बड़ा संगठित किसान विद्रोह था।

खबर सुनकर औरंगजेब को खुद दिल्ली से सेना लेकर आना पड़ा। एक लंबी लड़ाई के बाद गोकुला पकड़े गए और आगरा के कोतवाली चबूतरे पर उन्हें शहीद कर दिया गया। लेकिन उनकी शहादत ने एक चिंगारी को आग में बदल दिया था।

गोकुला के बाद आए राजाराम जाट। राजाराम ने वो किया जिसकी कल्पना करना भी उस समय बगावत मानी जाती थी। उन्होंने मुगलों की नाक के नीचे सिकंदरा में अकबर के मकबरे को खोदकर, मुगलों को यह संदेश दिया कि अब किसान जाग गया है और वह अपने अपमान का बदला लेना जानता है। मुगलों के लिए यह सिर्फ एक मकबरे का नुकसान नहीं, बल्कि उनकी सत्ता के अहंकार पर सीधा हमला था।

राजाराम के बाद उनके भतीजे चूड़ामन जाट ने इस विद्रोह को एक दिशा दी। चतुर चूड़ामन ने मुगलों और जयपुर के राजाओं के बीच चल रही आपसी लड़ाई का फायदा उठाया। उन्होंने भरतपुर के पास 'थून' में मिट्टी का एक छोटा सा किला बनाया। यहीं से एक अजेय राज्य की नींव पड़ी, जिसे आगे चलकर दुनिया ने भरतपुर के नाम से जाना।
3. राज्य का निर्माण: महाराजा सूरजमल और लोहागढ़ की अमर गाथा

अगर जाट इतिहास का कोई सूर्य है, तो वह हैं महाराजा सूरजमल।

जाट इतिहास के इस स्वर्णिम अध्याय की शुरुआत होती है 13 फरवरी 1707 को। पिता थे राजा बदन सिंह, जिन्होंने 1733 में भरतपुर शहर की स्थापना की थी। लेकिन भरतपुर को एक गांव से एक अजेय साम्राज्य में बदलने का काम उनके पुत्र सूरजमल ने किया।

सूरजमल को ऐसे ही 'जाटों का प्लेटो' नहीं कहा जाता। प्लेटो का अर्थ है - ज्ञानी, दार्शनिक। वे सिर्फ तलवार के धनी नहीं, बल्कि असाधारण कूटनीतिज्ञ थे।

उनकी तीन सबसे बड़ी उपलब्धियां:

1. लोहागढ़ किला - जो कभी हारा ही नहीं: सूरजमल ने भरतपुर में मिट्टी से लोहागढ़ किले का निर्माण करवाया। यह सुनने में कमजोर लगता है, पर इसकी इंजीनियरिंग अद्भुत थी। किले की मोटी मिट्टी की दीवारें अंग्रेजों की तोपों के गोलों को अपने अंदर समा लेती थीं, गोले फटते ही नहीं थे। अंग्रेजों ने 13 बार इस किले पर हमला किया, लॉर्ड लेक जैसा जनरल भी 1805 में यहां हार गया। यह भारत का एकमात्र किला है जो अपने इतिहास में कभी कोई युद्ध नहीं हारा। इसीलिए अंग्रेजों ने खुद इसका नाम 'लोहागढ़' रखा।

2. एक विशाल साम्राज्य: सूरजमल ने अपनी कुशल सेना के दम पर मुगलों, मराठों, जयपुर के कछवाहों और रुहेलों को हराया। एक समय पर उनका राज्य आगरा, मथुरा, धौलपुर, अलीगढ़, हाथरस, गुड़गांव और दिल्ली के बाहरी इलाकों तक फैला हुआ था। आगरा के किले पर भी उनका अधिकार रहा।

3. एक आदर्श प्रशासक: उन्होंने अपने राज्य में जजिया जैसे करों को समाप्त किया, किसानों पर लगान कम किया, यमुना से नहरें निकलवाईं और डीग जैसे सुंदर महलों का निर्माण करवाया।

1763 में हिंडौन के युद्ध में एक छोटी सी झड़प में उनकी मृत्यु हो गई। उनके बाद उनके पुत्र जवाहर सिंह और रणजीत सिंह ने इस विरासत को संभाला। रणजीत सिंह के समय में ही 1805 में अंग्रेज जनरल लेक की लोहागढ़ में हार हुई, जिसे ब्रिटिश इतिहास में उनकी सबसे शर्मनाक हारों में से एक माना जाता है।
4. जाट संस्कृति को समझने के तीन स्तंभ

जाटों को केवल इतिहास से नहीं, उनकी जीवंत संस्कृति से समझा जा सकता है।

पहला स्तंभ - गोत्र और खाप: जाट समाज में 3000 से अधिक गोत्र हैं - सिनसिनवार, सिहाग, ढाका, बेनीवाल, मलिक, मान, भुल्लर, चाहर। गोत्र ही उनका चलता-फिरता इतिहास है। एक ही गोत्र में शादी न करना, डीएनए की शुद्धता बनाए रखने का एक प्राचीन वैज्ञानिक तरीका था। और खाप पंचायतें, जो गांव के अनुभवी बुजुर्गों की पंचायत होती हैं, आज भी सामाजिक न्याय और आपसी विवादों को सुलझाने का सबसे तेज और बड़ा मंच हैं।

दूसरा स्तंभ - किसानी और स्वाभिमान: जाट के लिए जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, माँ है। इसीलिए कहा जाता है - 'जाट मरा तब जानिए जब तेरहवीं हो जाए।' मतलब एक जाट अंतिम सांस तक हार नहीं मानता। उसका स्वाभिमान उसकी पगड़ी में बसता है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल - जाट, राजपूत, गुर्जर और अहीर का क्या रिश्ता है?

यह इस लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। 7वीं-8वीं शताब्दी में जब विशाल गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य टूटा, तो पूरे उत्तर भारत में सत्ता का एक शून्य पैदा हो गया। उस समय कई किसान और पशुपालक योद्धा समुदायों ने अपनी-अपनी छोटी-छोटी रियासतें बनानी शुरू कीं।

जो समुदाय राजा बन गया, जो सत्ता में आ गया, वह कालांतर में 'राजपूत' कहलाया। जो समुदाय खेती और पशुपालन में लगा रहा, वह जाट, गुर्जर और अहीर कहलाया।

इसीलिए कई आधुनिक इतिहासकार और नृवंशशास्त्री मानते हैं कि राजपूत, जाट, गुर्जर और अहीर / यादव - इन चारों समुदायों की जड़ें एक ही हैं। ये सभी मूल रूप से भारत के लड़ाकू कृषक समुदाय थे। फर्क सिर्फ इतना है कि समय और परिस्थितियों ने उनके काम और पहचान को अलग-अलग नाम दे दिए। उनके गोत्रों, परंपराओं और यहां तक कि कई रीति-रिवाजों में जो समानता दिखती है, उसका कारण यही साझा जड़ है।
निष्कर्ष: किसान से अजेय राजा तक

तो जाटों का इतिहास एक किसान के हल से शुरू होकर, एक विद्रोही की मशाल बनकर, और अंत में लोहागढ़ के अजेय किले तक पहुंचता है।

उनकी उत्पत्ति चाहे वैदिक 'ज्ञात' से हुई हो या मध्य एशिया के शक योद्धाओं से, उनकी असली पहचान उनकी उत्पत्ति से नहीं, बल्कि उनके कर्म से बनी है - उनकी मेहनत से, उनकी ईमानदारी से, और कभी न झुकने वाले, कभी हार न मानने वाले स्वभाव से।

लोहागढ़ की मिट्टी आज भी यही कहानी कहती है कि अगर इरादे लोहे जैसे हों, तो मिट्टी भी अभेद्य बन जाती है।जय महाराजा सूरजमल। जय हिंद।
                


मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या होता है? Garud Puran Ke Anusar 24 Ghante Ka Sach!



मृत्यु के ठीक 1 सेकंड बाद... क्या होता है?
क्या आपने कभी सोचा है... जब डॉक्टर कह देता है... He is no more...
उसके बाद... अगले 24 घंटे में... आपकी आत्मा कहाँ जाती है?
गरुड़ पुराण कहता है... मरने के बाद आत्मा... 3 दिन तक... अपने ही घर में रहती है।
वो आपको देखती है... वो सुनती है... वो रोने की आवाज सुनती है...
लेकिन आप उसे नहीं देख पाते।
आज मैं आपको डराने नहीं आया... आज मैं आपको गरुड़ पुराण के 3 सबसे बड़े सत्य बताऊंगा... जो हर हिंदू को मरने से पहले जानने चाहिए।
अगर आपने ये 3 सत्य जान लिए... तो आपको मृत्यु से कभी डर नहीं लगेगा।
वीडियो को अंत तक देखना, क्योंकि अंत में मैं बताऊंगा... गरुड़ पुराण के अनुसार वो कौन सा एक दान है... जो मृत्यु के बाद आत्मा को सबसे पहले मुक्ति देता है।
नमस्कार। मैं हूँ doctor dayaram alok  
अगर आप सनातन धर्म, गरुड़ पुराण और जीवन-मृत्यु के रहस्य में विश्वास रखते हैं... तो इस वीडियो को अभी Like करके चैनल को Subscribe कर लीजिए।
क्योंकि इस चैनल पर हम अफवाह नहीं... शास्त्रों की बात बताते हैं।
कमेंट में लिखिए - "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" - ताकि इस ज्ञान का फल आपको मिले।
चलिए, गरुड़ पुराण के उस पन्ने को खोलते हैं... जो मृत्यु के बाद पढ़ा जाता है... पर जीते जी सबको पढ़ना चाहिए।
गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु ने गरुड़ जी को बताया है।
जब मनुष्य की मृत्यु होती है... तो दो यमदूत आते हैं।
कैसे दिखते हैं यमदूत?
गरुड़ पुराण कहता है... पापी आत्मा के लिए... यमदूत बहुत भयंकर होते हैं... काले, बड़ी-बड़ी आँखों वाले, नाखून बड़े-बड़े।
और पुण्य आत्मा के लिए... वही यमदूत... सुंदर, दिव्य रूप में आते हैं।
जैसे ही प्राण निकलते हैं... आत्मा... शरीर को ऊपर से देखती है।
वो देखती है... उसका अपना शरीर पड़ा है... परिवार रो रहा है।
वो उन्हें छूना चाहती है... बोलना चाहती है... पर कोई सुनता नहीं।
गरुड़ पुराण कहता है - पहले 10 दिन तक... आत्मा... अपने घर के आस-पास ही भटकती है।
इसीलिए... 10 दिन तक पिंड दान दिया जाता है।
हर दिन का पिंड... आत्मा के एक नए शरीर का निर्माण करता है।
पहले दिन - सिर बनता है।
दूसरे दिन - गर्दन और कंधे।
तीसरे दिन - हृदय।
और दसवें दिन तक... एक सूक्ष्म शरीर... तैयार हो जाता है... जिसे यातना शरीर कहते हैं।
इसी शरीर से आत्मा यमलोक की यात्रा करती है।
अब सवाल है... यात्रा कितनी लंबी है?
 यमलोक का रास्ता
गरुड़ पुराण में लिखा है... यमलोक का रास्ता... 86,000 योजन लंबा है। यानी लगभग... 10 लाख किलोमीटर।
और इस रास्ते पर... न धूप से बचने को छाया है... न खाने को अन्न।
इस रास्ते पर 16 नगर पड़ते हैं।
जैसे - सौम्यपुर, गंधर्वपुर, शैलागम, क्रौंचपुर... और अंत में आता है यमपुरी।
अच्छी आत्मा को ये रास्ता... 3-4 दिन में... विमान से पार करा दिया जाता है।
लेकिन पापी आत्मा को... इस रास्ते पर... 1 साल तक... चलना पड़ता है। घसीटते हुए।
और इसी एक साल को... हम एक वर्ष की बरसी कहते हैं।
अब सबसे महत्वपूर्ण बात...
रास्ते में आत्मा को क्या-क्या झेलना पड़ता है?
गरुड़ पुराण कहता है... रास्ते में वैतरणी नदी आती है।
वैतरणी नदी... खून और मवाद से भरी हुई है।
पापी आत्मा उसमें डूबती है... और पुण्य आत्मा को... गाय की पूंछ पकड़ कर... पार करा दिया जाता है।
इसीलिए... जीते जी... गौदान को... सबसे बड़ा दान कहा गया है।
सबसे बड़े पाप जो नहीं करने चाहिए]
गरुड़ पुराण में 3 पापों को सबसे बड़ा बताया गया है... जिनकी सजा यमलोक में सबसे ज्यादा है।
पहला पाप... कृतघ्नता... यानी एहसान फरामोश होना।
जिसने आपके साथ अच्छा किया... उसी को धोखा देना।
दूसरा पाप... गुरु, माता-पिता और पत्नी का अपमान... गरुड़ पुराण कहता है... जो व्यक्ति इनका दिल दुखाता है... उसे यमलोक में... सबसे पहले... लोहे की गरम सलाखों पर चलना पड़ता है।
तीसरा पाप... और सबसे बड़ा... दूसरों का हक मारना... किसी गरीब की जमीन, किसी का पैसा, किसी का हक... अगर आपने धोखे से लिया... तो गरुड़ पुराण कहता है... आपको अगले जन्म में... उसी घर में... नौकर बन कर... उसी कर्ज को चुकाना पड़ता है।
अब आप सोच रहे होंगे... तो फिर मुक्ति कैसे मिलेगी?
मुक्ति का उपाय
भगवान विष्णु ने गरुड़ पुराण में 3 उपाय बताए हैं... जो जीते जी करने से... मृत्यु आसान हो जाती है।
उपाय 1 - नाम जप। हर दिन... 10 मिनट... भगवान विष्णु का नाम। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ये नाम... वैतरणी नदी में... नाव बन जाता है।
उपाय 2 - अन्न दान। गरुड़ पुराण कहता है... भूखे को भोजन कराना... 100 यज्ञों के बराबर है। क्योंकि भूखा... सिर्फ शरीर से नहीं... आत्मा से आशीर्वाद देता है।
उपाय 3 - और सबसे बड़ा... तुलसी और गीता का ज्ञान। जिस घर में रोज गीता का एक श्लोक पढ़ा जाता है... उस घर में यमदूत प्रवेश नहीं करते... वहां खुद विष्णु के दूत आते हैं।
और अंत में... वो एक दान... जिसका मैंने शुरू में वादा किया था...
वो है... मृत्यु से पहले... क्षमा दान।
जिसने आपको दुख दिया... उसे क्षमा कर दो।
जिसका आपने दिल दुखाया... उससे क्षमा मांग लो।
क्योंकि गरुड़ पुराण कहता है... क्षमा से बड़ा... कोई पिंड दान नहीं।
तो आज से... डरना बंद... और जीना शुरू।
क्योंकि मृत्यु... अंत नहीं है... ये एक नए सफर की शुरुआत है।
अगर इस वीडियो ने आपके दिल को छुआ... तो इसे अपने परिवार में... उस व्यक्ति को जरूर भेजिए... जो मृत्यु से डरता है।
कमेंट में लिखिए... आपको गरुड़ पुराण की किस बात ने सबसे ज्यादा हिला दिया?
मैं मिलता हूँ... अगले वीडियो में... एक और गहरे सत्य के साथ।
तब तक के लिए... अपने कर्म अच्छे रखिए... क्योंकि यही आपके साथ जाएगा।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
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3.10.26

बर्बरीक ही खाटू श्याम है? महाभारत का सबसे शक्तिशाली योद्धा | Barbarik Khatu Shyam Full Stor


                            


बर्बरीक ही खाटू श्याम है? महाभारत का सबसे शक्तिशाली योद्धा | Barbarik Khatu Shyam Full Story
सोचिए... महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला है। एक तरफ 11 अक्षौहिणी सेना, दूसरी तरफ 7 अक्षौहिणी। करोड़ों योद्धा। भीष्म, द्रोण, कर्ण, अर्जुन जैसे महारथी।
तभी युद्धभूमि में एक लड़का आता है। उम्र सिर्फ 16-17 साल। अकेला। उसके पास सिर्फ 3 बाण हैं।
और वो कहता है - "मैं अकेला ही इस पूरे युद्ध को एक दिन में खत्म कर सकता हूँ।"
हाँ, एक दिन में।
कृष्ण ने उसे देखा और कहा - "अगर ये युद्ध में लड़ा, तो कोई नहीं बचेगा।"
और फिर कृष्ण ने उससे उसका शीश मांग लिया।
कौन था वो बालक? जिसके 3 बाणों से खुद महादेव भी नहीं बच सकते थे? और वही बालक आज राजस्थान के खाटू में श्याम बाबा के नाम से क्यों पूजा जाता है?
अगर आपने आज तक बर्बरीक की सच्ची कहानी नहीं सुनी, तो आज आपका रोंगटे खड़े हो जाएंगे। वीडियो को अंत तक देखिए, क्योंकि आखिर में मैं आपको बताऊंगा वो एक वरदान जिसके कारण बर्बरीक को हारे का सहारा कहा जाता है।
जय श्री श्याम लिखकर वीडियो शुरू करते हैं।
नमस्कार, मैं  Dr.Aalok  और आप देख रहे हैं  gyanoday channel 
महाभारत की हर कहानी में हम भीम को सबसे बलशाली, अर्जुन को सबसे बड़ा धनुर्धर, और कर्ण को सबसे बड़ा दानी कहते हैं। लेकिन महाभारत का एक ऐसा योद्धा था, जो इन सब से ऊपर था।
बर्बरीक।
बर्बरीक कौन था?
बर्बरीक भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या मौरवी का पुत्र था। यानी भीम का पौत्र। बचपन से ही उसने घोर तपस्या की। उसकी माँ ने उसे युद्ध कला सिखाई, तो वहीं भगवान श्रीकृष्ण ने उसे... नहीं, कृष्ण ने नहीं, उसकी आराधना से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा ने उसे 3 दिव्य बाण दिए। और भगवान शिव ने उसे एक ऐसा धनुष दिया जिसका कोई तोड़ नहीं।
इन 3 बाणों में क्या शक्ति थी?
पहला बाण - जिसे मारना है, उसको चिन्हित कर देता है।
दूसरा बाण - जिसे नहीं मारना है, उसको अलग कर देता है।
तीसरा बाण - चिन्हित किए हुए सभी लक्ष्यों को नष्ट कर देता है। और फिर तरकश में वापस आ जाता है।
मतलब, अगर बर्बरीक एक बार बाण चला दे, तो पूरी सृष्टि में जिसे वो चाहे, मार सकता है।
और यहीं से कहानी शुरू होती है।
[PART 3: बर्बरीक की प्रतिज्ञा - 3:00 से 5:30]
जब बर्बरीक को पता चला कि कुरुक्षेत्र में धर्म-अधर्म का महायुद्ध होने वाला है, तो वो अपनी माँ से आज्ञा लेकर युद्ध देखने निकला।
माँ ने एक ही बात कही - "बेटा, हमेशा हारने वाले का साथ देना। यही तुम्हारा धर्म है।"
बर्बरीक ने कहा - "ठीक है माँ, मैं वचन देता हूँ, जो पक्ष हारेगा, मैं उसी की तरफ से लड़ूंगा।"
ये छोटा सा वचन... यही वचन महाभारत का पूरा इतिहास बदलने वाला था।
अब जरा सोचिए, अगर बर्बरीक हारने वाले का साथ देगा, तो क्या होगा?
पहले कौरव हार रहे होंगे, तो वो कौरवों की तरफ जाएगा। कौरव शक्तिशाली हो जाएंगे, पांडव हारने लगेंगे। फिर वो पांडवों की तरफ आ जाएगा। फिर पांडव शक्तिशाली, कौरव कमजोर। वो फिर कौरवों की तरफ।
मतलब युद्ध कभी खत्म ही नहीं होगा। अंत में बचेगा सिर्फ एक - बर्बरीक।
और यही बात श्रीकृष्ण समझ गए थे।
: कृष्ण और बर्बरीक की पहली मुलाकात
कुरुक्षेत्र के रास्ते में, कृष्ण एक ब्राह्मण के वेश में बर्बरीक से मिले।
कृष्ण ने पूछा - "बेटा, तुम अकेले युद्ध में जा रहे हो?"
बर्बरीक ने हँसते हुए कहा - "मुझे सेना की जरूरत नहीं, मेरे 3 बाण ही काफी हैं।"
ब्राह्मण हँसा - "3 बाणों से युद्ध? एक दिन में? मजाक करते हो।"
बर्बरीक को क्रोध आया। उसने कहा - "आपको विश्वास नहीं? तो परीक्षा ले लीजिए। वो सामने पीपल का पेड़ देख रहे हैं? उसके सारे पत्ते मैं एक बाण से छेद दूंगा।"
कृष्ण ने मन ही मन में एक पत्ता अपने पैर के नीचे छुपा लिया।
बर्बरीक ने पहला बाण छोड़ा। बाण ने पेड़ के सारे पत्तों को चिन्हित किया। दूसरा बाण... और देखते ही देखते पेड़ के सारे पत्ते छेद हो गए।
फिर तीसरा बाण कृष्ण के पैर के चारों ओर घूमने लगा।
कृष्ण चौंक गए। बर्बरीक ने कहा - "हे ब्राह्मण देवता, पैर हटाइए, उसके नीचे एक पत्ता है, मेरा बाण उसे भी छेदेगा।"
उस दिन कृष्ण समझ गए कि ये बालक कोई साधारण नहीं है। ये स्वयं महादेव का अंश है।
तब कृष्ण ने अपने विराट रूप में आकर पूछा - "तुम्हें दान में क्या चाहिए?"
बर्बरीक ने कहा - "आप जो मांगेंगे, मैं दूंगा।"
कृष्ण ने कहा - "मुझे तुम्हारा शीश चाहिए।"
 शीश दान !
यहाँ पर कहानी सबसे ज्यादा भावुक होती है।
बर्बरीक एक क्षण के लिए चौंका, फिर समझ गया कि सामने स्वयं श्रीकृष्ण हैं।
उसने कहा - "प्रभु, मैं अपना शीश देने को तैयार हूँ, पर मेरी एक इच्छा है। मुझे महाभारत का पूरा युद्ध देखना है।"
कृष्ण ने तथास्तु कहा।
बर्बरीक ने खुद अपने हाथों से अपना शीश काटकर कृष्ण को दान दे दिया।
कृष्ण ने उस शीश को अमृत से सींचकर कुरुक्षेत्र की सबसे ऊँची पहाड़ी पर रख दिया, जहाँ से वो पूरा 18 दिन का युद्ध देख सके।
और इसीलिए बर्बरीक को शीश का दानी कहा जाता है। जिसने अपना शीश दान कर दिया।
दोस्तों, यहाँ तक कहानी सुनकर अगर आपके भी रोंगटे खड़े हो गए हैं, तो एक लाइक तो बनता है। और कमेंट में दिल से लिखिए - जय श्री श्याम।
क्योंकि अब जो मैं बताने वाला हूँ, वो इस कहानी का सबसे बड़ा रहस्य है।
युद्ध समाप्त हुआ। पांडव जीत गए, पर आपस में लड़ने लगे कि युद्ध किसने जिताया। अर्जुन कहे मैं, भीम कहे मैं।
तब कृष्ण ने कहा - "इसका निर्णय बर्बरीक का शीश करेगा, क्योंकि उसने पूरा युद्ध देखा है।"
बर्बरीक के शीश ने कहा - "मैंने तो सिर्फ एक ही चीज देखी। हर जगह, हर योद्धा में, हर अस्त्र में, सिर्फ श्रीकृष्ण ही लड़ रहे थे। युद्ध करवाने वाले भी कृष्ण, और युद्ध करने वाले भी कृष्ण।"
यह सुनकर सभी पांडवों का अहंकार टूट गया।
तब कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया।
कृष्ण ने कहा - "हे बर्बरीक, तुमने कलयुग में मेरे नाम से पूजे जाओगे। जो हारा हुआ, जो दुखी, जो तुम्हारे दर पर आएगा, तुम उसका सहारा बनोगे। तुम हारे के सहारे कहलाओगे। और तुम्हारा एक नाम मेरे नाम पर - श्याम - होगा। क्योंकि तुम्हारा रंग भी मेरे जैसा ही श्याम है।"
और कृष्ण ने उसके शीश को खाटू नगर में दफना दिया, जहाँ आज राजस्थान के सीकर जिले में खाटू श्याम जी का भव्य मंदिर है।
कहते हैं, एक बार खाटू में बाढ़ आई, तो वो शीश बहता हुआ मिला। तब वहाँ के राजा रूपसिंह चौहान को स्वप्न आया और उन्होंने वहाँ मंदिर बनवाया।
इसीलिए बर्बरीक ही खाटू श्याम है।
तो दोस्तों, ये थी महाभारत के सबसे शक्तिशाली योद्धा बर्बरीक की कहानी। जिसके पास पूरी दुनिया को एक बाण में खत्म करने की ताकत थी, पर उसने धर्म के लिए अपना शीश दे दिया।
आज भी जब कोई हार जाता है, जब दुनिया उसका साथ छोड़ देती है, तो खाटू श्याम जी कहते हैं - "तू मेरे पास आ, मैं हारे का सहारा हूँ।"
आपको ये कहानी कैसी लगी? कमेंट में जरूर बताइए।
और अगर आप चाहते हैं कि मैं अगली बार - अश्वत्थामा आज कहाँ है? या कर्ण की आखिरी रात की कहानी पर वीडियो बनाऊं, तो कमेंट में उसका नाम लिखिए।
इस वीडियो को अपने उन 3 दोस्तों के साथ शेयर करिए जो श्याम बाबा के भक्त हैं।
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जय श्री कृष्ण, जय श्री श्याम।
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30.9.26

महाराजा यदु से श्रीकृष्ण तक, अहीर से यादव कैसे बने, यादवों के 18 गोत्रों का सच

                  
 



महाराजा यदु से श्रीकृष्ण तक, अहीर से यादव कैसे बने, यादवों के 18 गोत्रों का सच
"आपने सुना होगा कि कृष्ण जी अहीर थे... किसी ने कहा यादव थे... और अंग्रेजों की किताबों में लिखा है कि अहीर तो सिर्फ ग्वाले थे।
तो सच क्या है? क्या अहीर और यादव अलग हैं?
महाराजा यदु, जिनके नाम पर पूरे यादव वंश का नाम पड़ा, उन्हें उनके ही पिता ययाति ने श्राप क्यों दिया था?
और आज जिन 18 गोत्रों पर यादव समाज बंटा है, उन 18 गोत्रों का कनेक्शन सीधे द्वारका के यदुवंशियों से कैसे है?
आज इस एक वीडियो में हम ऋग्वेद से लेकर भागवत पुराण तक, और अंग्रेजों के Census से लेकर 2024 की DNA रिपोर्ट तक, सारे सबूत खोल देंगे। आखिर तक देखना, क्योंकि आखिर में मैं बताऊंगा वो एक गोत्र जो आज भी अपने आप को श्रीकृष्ण का सगा वंशज मानता है।"
नमस्कार, मैं हूँ  डॉ . दयाराम आलोक और आप देख रहे हैं ज्ञानोदय चैनल 
दोस्तों, भारत में यादव समाज की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ से ज्यादा है, जो इसे भारत की सबसे बड़ी OBC जातियों में से एक बनाती है। बिहार से लेकर हरियाणा तक, राजनीति से लेकर सेना तक, हर जगह यादवों का दबदबा है।
लेकिन जब इतिहास की बात आती है तो 3 अलग-अलग कहानियाँ सुनाई देती हैं। पहली, पौराणिक। दूसरी, अंग्रेजों वाली। और तीसरी, आज की राजनीति वाली।
आज हम बिना किसी पक्षपात के, सिर्फ ग्रंथों और शिलालेखों के आधार पर बात करेंगे। तो वीडियो को अभी लाइक कर दीजिए, क्योंकि यह रिसर्च आपको कहीं और नहीं मिलेगी, और ऐसे ही अनसुने इतिहास के लिए चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन दबा दीजिए।
महाराजा यदु की उत्पत्ति - श्रापित राजकुमार से यदुवंश की शुरुआत
कहानी शुरू होती है चंद्रवंश से।
ब्रह्मा जी से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा। पुरुरवा वही राजा हैं जिन्होंने प्रयाग में पहला साम्राज्य बसाया। उनकी कई पीढ़ियों बाद आए राजा नहुष, और नहुष के पुत्र हुए महाराजा ययाति।
ययाति चक्रवर्ती सम्राट थे। उनके दो पत्नियाँ थीं - देवयानी और शर्मिष्ठा। देवयानी से दो पुत्र हुए - यदु और तुर्वसु। शर्मिष्ठा से तीन पुत्र हुए - द्रुह्यु, अनु और पुरु।
अब यहाँ ट्विस्ट आता है। ययाति ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से वादा किया था कि वो दूसरा विवाह नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने शर्मिष्ठा से विवाह कर लिया। जब देवयानी को पता चला तो उन्होंने अपने पिता शुक्राचार्य को बताया। शुक्राचार्य ने क्रोध में ययाति को श्राप दिया - "तुम असमय ही बूढ़े हो जाओगे।"
ययाति बूढ़े हो गए। उन्होंने अपने पुत्रों से कहा - "अपनी जवानी मुझे दे दो, ताकि मैं कुछ साल और भोग कर सकूँ।" बड़े पुत्र यदु ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा - "पिताजी, भोग से कभी तृप्ति नहीं मिलती, जैसे घी डालने से आग नहीं बुझती।"
ययाति क्रोधित हो गए। उन्होंने यदु को श्राप दिया - "मैं तुम्हें राज्य के उत्तराधिकार से वंचित करता हूँ। तुम्हारे वंश में कोई भी राजा चक्रवर्ती सम्राट नहीं बनेगा, लेकिन तुम्हारे वंश में स्वयं भगवान विष्णु अवतार लेंगे।"
यही श्राप वरदान बन गया। सबसे छोटे पुत्र पुरु ने अपनी जवानी दे दी, और वो चंद्रवंश के मुख्य राजा बने, उन्हीं के वंश में आगे चलकर कौरव-पांडव हुए। और यदु, जिन्हें राज्य से निकाला गया, उन्होंने नर्मदा और चंबल के बीच अपना नया राज्य बसाया। उसी से बना - यदुवंश।
तो पहली बात क्लियर - यदु क्षत्रिय थे, चंद्रवंशी क्षत्रिय। ऋग्वेद में भी 'यदु' नाम एक शक्तिशाली जन का नाम है।
यदु के 5 पुत्रों का वर्णन भागवत पुराण में है - सहस्त्रजित, क्रोष्टु, नल, नहुष और पुरुजित। इन्हीं से यादवों की अलग-अलग शाखाएं बनीं। क्रोष्टु के वंश में आगे चलकर हुए वृष्णि, और वृष्णि के वंश में हुए श्रीकृष्ण।
श्रीकृष्ण तक का सफर - अहीर कैसे जुड़ा 
अब सवाल है - कृष्ण को अहीर क्यों कहा जाता है?
जब कंस को आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र उसे मारेगा, तो उसने वसुदेव-देवकी को कारागार में डाल दिया। वसुदेव यदुवंशी थे। लेकिन कृष्ण का जन्म होते ही वसुदेव उन्हें गोकुल में नंद बाबा के यहाँ ले गए।
नंद बाबा कौन थे? भागवत पुराण, स्कंध 10 में साफ लिखा है - नंद महाराज गोपों और अहीरों के अधिपति थे। गोकुल, वृंदावन, बरसाना में उस समय अहीर समाज रहता था, जिनका मुख्य व्यवसाय गौ-पालन था।
संस्कृत में अहीर शब्द का संधि-विच्छेद है - अहि + ईर। अहि मतलब सर्प, ईर मतलब मारने वाला। कालिया नाग को मारने वाले कृष्ण के वंशज होने से भी ये नाम पड़ा, ऐसा कुछ विद्वान मानते हैं। दूसरा अर्थ है - 'अभि + ईर' - मतलब चारों तरफ से रक्षा करने वाला, जो गायों की रक्षा करे।
तो श्रीकृष्ण जन्म से यदुवंशी क्षत्रिय थे, लेकिन कर्म और पालन-पोषण से अहीर-गोप कहलाए। इसलिए महाभारत में अर्जुन उन्हें कई बार 'गोविंद' - गायों के रक्षक - कहते हैं।
जब कृष्ण ने मथुरा छोड़कर द्वारका बसाई, तो पूरे यदुवंश - वृष्णि, अंधक, भोजक, सात्वत - सब द्वारका चले गए। द्वारका के डूबने के बाद यदुवंश बिखर गया। महाभारत के मौसल पर्व में लिखा है कि यदुवंशी आपस में लड़कर नष्ट हो गए और बचे हुए लोग अलग-अलग दिशाओं में चले गए।
यही बिखरा हुआ यदुवंश आगे चलकर अलग-अलग नामों से जाना गया - जादौन, भाटी, जाडेजा, चूड़ासमा, अहीर, ग्वाला, गोप।
 अहीर से यादव कैसे बना? - अंग्रेजों का खेल 
यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मुगल काल और उससे पहले तक दस्तावेजों में आपको 'यादव' शब्द बहुत कम मिलेगा। आपको मिलेगा - अहीर, गोप, ग्वाला, आभीर।
आभीर शब्द सबसे पुराना है। महाभारत में आभीरों का जिक्र है। ईसा से 150 साल पहले पतंजलि ने भी आभीर का जिक्र किया है। 10वीं सदी के शिलालेखों में अहीर राजाओं को 'आभीर' कहा गया है।
तो फिर यादव शब्द कब वापस आया?
1920 के दशक में। उत्तर प्रदेश, बिहार में आर्य समाज के प्रभाव से, और एक बड़े नेता की वजह से - राव बहादुर बलदेव सिंह जी। उन्होंने 1910 में 'यादव महासभा' बनाई और नारा दिया - "अहीर, ग्वाला, गोप सब एक हैं, हम सब यदु के वंशज हैं, इसलिए हम यादव हैं।"
अंग्रेजों ने 1901, 1911, 1921 की जनगणना में अहीरों को ग्वाला, दूध बेचने वाली जाति में गिना था। इससे बचने के लिए और क्षत्रिय पहचान को वापस पाने के लिए, पूरे अहीर समाज ने अपने आप को 'यादव' लिखना शुरू कर दिया। 1931 की जनगणना तक आते-आते 90% अहीरों ने अपना टाइटल यादव लिख दिया।
तो अहीर से यादव बनना जाति बदलना नहीं था, बल्कि अपनी पुरानी वैदिक पहचान को वापस पाना था। इसलिए आज आप किसी के आधार कार्ड पर अहीर और किसी पर यादव देख सकते हैं - दोनों एक ही हैं।
18 गोत्रों का सच -
कई जगह 18 गोत्र, कई जगह 20 गोत्र बताए जाते हैं। हम सबसे प्रमाणित लिस्ट की बात करेंगे जो भागवत पुराण और कौटिल्य के अर्थशास्त्र से मिलती है।
यादवों के गोत्र असल में ऋषियों पर नहीं, बल्कि यदु के पुत्रों और द्वारका के गणों पर आधारित हैं। मुख्य 18 गोत्र ये हैं:
1. अत्री गोत्र - ये सबसे सम्मानित माना जाता है, नंद बाबा इसी गोत्र से थे।
2. भरद्वाज / भारद्वाज -
3. दधिक्रत / दधीच -
4. गौतम -
5. वत्स / बच्छ - ये उत्तर प्रदेश में बहुत ज्यादा है।
6. कौशिक -
7. वशिष्ठ -
8. कश्यप - कृष्ण के गुरु सांदीपनि इसी गोत्र से थे।
9. बाण / अफरिया - हरियाणा के राव तुलाराम इसी गोत्र से थे।
10. नंदवंशी -
11. यदुवंशी - जो सीधे अपने आप को कृष्ण का वंशज मानते हैं, जादौन राजपूत भी इसी में आते हैं।
12. कृष्णौत - बिहार में सबसे ज्यादा।
13. मजरौठ -
14. गोवल / ग्वालवंशी -
15. भाटी / भट्टी - जैसलमेर के राजा भाटी यादव थे।
16. जादौन / जाधव - महाराष्ट्र के जाधव और करौली के जादौन एक ही हैं।
17. बनाफर - आल्हा-ऊदल बनाफर यादव थे।
18. ठेठवार / ठाकुरिया -
याद रखिए, गोत्र का मतलब होता है कि आप एक ही पूर्वज के वंशज हैं, इसलिए एक ही गोत्र में विवाह नहीं होता। हरियाणा में आज भी अफरिया गोत्र के लोग अपने आप को रेवाड़ी के अहीरवाल का असली वारिस मानते हैं।
इन 18 गोत्रों के अलावा भी क्षेत्र के हिसाब से उप-गोत्र बन गए, जैसे - लोरिया, बऊरिया, दहिया। इसलिए कई जगह 52 गोत्र तक गिने जाते हैं, लेकिन मूल जड़ यही 18 हैं।
तो दोस्तों निष्कर्ष क्या निकला?महाराजा यदु चंद्रवंशी क्षत्रिय थे, उन्हें राज्य से निकाला गया तो उन्होंने अपना यदुवंश बसाया।
श्रीकृष्ण उसी यदुवंश में वृष्णि शाखा में पैदा हुए, लेकिन गोकुल में अहीरों के बीच पले-बढ़े इसलिए अहीर और यादव दोनों कहलाए।
अहीर, गोप, आभीर, ग्वाला - ये व्यवसायिक नाम थे, यादव वंशिक नाम है। 1920 में समाज ने फिर से यादव नाम अपनाया।
18 गोत्र कोई काल्पनिक लिस्ट नहीं है, ये द्वारका के 18 गणों से बनी है जो द्वारका डूबने के बाद भारत में फैल गए।
अगर आपको अपना इतिहास पता होना गर्व की बात लगती है तो कमेंट में अपना गोत्र और जिला जरूर लिखें - जय यदुवंश, जय श्रीकृष्ण।
मैं अगले वीडियो में बताऊंगा - "राव तुलाराम ने अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में पहला यादव युद्ध कैसे लड़ा था और दिल्ली को कैसे घेरा था?" वो कहानी किसी किताब में नहीं है।
तो उस वीडियो को मिस ना करने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन को ALL पर सेट कर दीजिए।
वीडियो को अपने सभी यादव भाईयों तक शेयर कर दीजिए। धन्यवाद।
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