डॉ. दयाराम आलोक: दर्जी समाज के प्रणेता, साहित्य मनीषी और समर्पित समाजसेवी
**करुणा के दीप जलाए, आलोकित जीवन पथ, शिक्षा से सेवा तक, दान का अनमोल रथ। मंदिरों में बेंच सजाए, मुक्ति धाम में छाया, श्रद्धा और संस्कार से, मानवता को पाया।
पेंशन का अर्पण किया, समाज हेतु समर्पण, धर्म और विज्ञान संग, जीवन बना वंदन। दयाराम आलोक का नाम, करुणा का प्रतीक, दान, शिक्षा, सेवा से, जीवन हुआ अद्वितीय।**
जन्म एवं शिक्षा साहित्य मनीषी तथा प्रसिद्ध समाजसेवी डॉ. दयाराम आलोक का जन्म 11 अगस्त 1940 को मध्य प्रदेश के शामगढ़ में एक सम्मानित दर्जी परिवार में हुआ। पिता पूरालाल जी राठौर और माता गंगा बाई के घर में छह भाइयों और तीन बहनों में उनका स्थान था। पारिवारिक व्यवसाय रेडीमेड वस्त्र निर्माण एवं विक्रय था।
हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने 1961 में अध्यापक के रूप में शासकीय सेवा प्रारंभ की। 1969 में राजनीति शास्त्र से एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। इसके साथ ही उन्होंने आयुर्वेद रत्न तथा लंदन से होम्योपैथिक उपाधि D.I.Hom भी अर्जित की।
परिवार डॉ. दयाराम आलोक की पत्नी शांति देवी राजस्थान के झालरापाटन के सिपाही प्यारेलाल जी पंवार की पुत्री थीं। दंपति को एक पुत्र और चार पुत्रियाँ हैं। पुत्र डॉ. अनिल कुमार दामोदर हॉस्पिटल एवं रिसर्च सेंटर, शामगढ़ के संचालक हैं।
बड़ी पुत्री छाया सुरेश जी पंवार (डग), दूसरी अल्पना विनोद कुमार चौहान (झाबुआ), तीसरी बेला सतोष कुमार परमार (रानापुर) तथा छोटी पुत्री साधना का विवाह हेमेन्द्र कुमार परमार (झाबुआ) से हुआ।
सामाजिक योगदान एवं संस्थापना डॉ. दयाराम आलोक का सबसे महत्वपूर्ण योगदान अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ की स्थापना है। 14 जून 1965 को शामगढ़ में पूरालाल जी राठौर के आवास पर आयोजित प्रथम अधिवेशन में उन्होंने इस संगठन की नींव रखी। बाद में यह संगठन पूरे भारत में दर्जी समाज की प्रमुख सामाजिक संस्था के रूप में विकसित हुआ। वर्तमान में इसका प्रधान कार्यालय 14, जवाहर मार्ग, आलोक सदन, शामगढ़ में है।
मुख्य उपलब्धियाँ
- 1966 में डग दर्जी सत्यनारायण मंदिर की मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठा: मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्होंने पूरे दर्जी समाज को एकजुट कर 1 माह 8 दिनों में चंदा एकत्र किया और 23 जून 1966 को भव्य प्राण-प्रतिष्ठा समारोह संपन्न किया। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धि मानी जाती है।
- सामूहिक विवाह सम्मेलन की परंपरा: 1981 में रामपुरा (मंदसौर) में मध्य प्रदेश में दर्जी समाज का प्रथम सामूहिक विवाह सम्मेलन आयोजित किया। उन्होंने स्वयं अपनी पुत्री छाया और पुत्र अनिल का विवाह इसी मंच पर किया। बाद में 2010 में बोलिया में पूर्णतः निशुल्क सामूहिक विवाह सम्मेलन का आयोजन कर नई मिसाल कायम की।
- वंशावली एवं दस्तावेजीकरण: 1965 से ही परिवारिक जानकारी संग्रहण का कार्य शुरू किया। आज पूरे दामोदर वंशी नया गुजराती दर्जी समाज की लगभग 15,000 व्यक्तियों की वंशावलियाँ दर्जी समाज संदेश वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।
- धार्मिक एवं परोपकारी कार्य: मध्य प्रदेश और राजस्थान के 100 से अधिक मंदिरों एवं मुक्ति धामों में नकद दान तथा सैकड़ों सीमेंट बेंचें भेंट कीं।
साहित्यिक योगदान डॉ. दयाराम आलोक एक संवेदनशील कवि भी हैं। उनकी पहली कविता “तुमने मेरी चिर साधों को झंकृत और साकार किया है” बिकानेर से प्रकाशित पत्रिका स्वास्थ्य सरिता में छपी। अब तक उनकी 150 से अधिक कविताएँ विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं (कादंबिनी सहित) में प्रकाशित हो चुकी हैं।
उनकी कविताओं में भावुकता, सामाजिक चेतना, राष्ट्रप्रेम और आध्यात्मिकता का सुंदर समन्वय दिखता है। प्रमुख कविताएँ: उन्हें मनाने दो दिवाली, आओ आज करें अभिनंदन, सरहदें बुला रहीं, गाँधी के अमृत वचन आदि।
राजनीतिक योगदान 1996 में प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्ति के बाद वे भारतीय जनता पार्टी से जुड़े। उन्होंने नगर भाजपा बोलिया के अध्यक्ष, जिला अध्यापक प्रकोष्ठ महामंत्री तथा जिला चिकित्सा प्रकोष्ठ सह-संयोजक जैसे पदों पर सेवा की।
डॉ. दयाराम आलोक का जीवन समाज सेवा, शिक्षा और करुणा की धारा से आलोकित है। उन्होंने अपने जीवन को धर्म, दान और संस्कारों के लिए समर्पित किया। मंदिरों, मुक्ति धाम और शिक्षा संस्थानों में उनका योगदान आज भी समाज को प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष डॉ. दयाराम आलोक 85 वर्ष की आयु में भी अथक ऊर्जा और समर्पण के साथ समाजसेवा में लगे हुए हैं। एक साधारण दर्जी परिवार से निकलकर उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा, साहित्य, संगठन और परोपकार के क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ हासिल की हैं, वे अनुकरणीय हैं।
उनका जीवन सिद्ध करता है कि सच्ची इच्छाशक्ति, ईमानदारी और सामूहिक प्रयास से कोई भी समाज को नई दिशा दी जा सकती है। वे वाकई दर्जी समाज के प्रेरणास्रोत और हिंदी साहित्य के सच्चे सेवक हैं।
नीलकण्ठेश्वरं देवं, भक्तानां हितकारकम्। दयारामस्य दानेन, धर्ममार्गप्रवर्तकम्॥
गुरुकुलं दीप्यमानं, संस्कारस्य प्रसारकम्। आलोकस्य जीवनं, करुणायाः प्रचारकम्॥
डॉ. दयाराम आलोक का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची महानता दान, शिक्षा और सेवा में निहित है। उनका नाम समाज में करुणा और संस्कार का प्रतीक बन चुका है। उनके कार्य आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देते रहेंगे।
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