लोकसखा पर पढ़ें सटीक जाति इतिहास, पौराणिक कथाएं, मंदिर दर्शन और डॉ. आलोक द्वारा मुक्तिधाम व गौशालों को दान किए गए बेंच व नकद सहयोग की पूरी जानकारी। आध्यात्म,जाति इतिहास,जनरल नॉलेज

16.8.26

हम सूत कातने वाले नहीं, तलवार चलाने वाले क्षत्रिय हैं - कतिया जाति का गौरवशाली इतिहास

                             



क्या आप जानते हैं, जिस जाति को आज हम कतिया कहते हैं, उसने सिकंदर महान को भी युद्ध के मैदान में रोक दिया था? 17,000 वीरों ने बलिदान दिया था? और इसी जाति के नाम पर गुजरात के पूरे क्षेत्र का नाम काठियावाड़ पड़ा?
मैं बात कर रहा हूँ उस जाति की, जो वैदिक काल में वेदों की रक्षक थी, जिसके नाम पर कठोपनिषद लिखा गया, जिसे कर्नल टॉड ने राजपूतों के 36 कुलों में से एक माना। वो है काठिया क्षत्रिय, आज की कतिया जाति।
नमस्कार साथियों।
आज हम बात करेंगे एक ऐसी जाति की, जिसका इतिहास हजारों साल पुराना है, लेकिन आज बहुत कम लोग उसके बारे में जानते हैं। जाति है कतिया।
वर्तमान में कतिया जाति मुख्य रूप से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, दिल्ली, ओडिशा, तेलंगाना, गुजरात, राजस्थान, उत्तरप्रदेश में पाई जाती है।
पर सवाल ये है, कतिया कौन हैं? इनकी उत्पत्ति कहाँ से हुई?
इतिहास में इसके तीन बड़े सिद्धांत मिलते हैं।
पहला सिद्धांत कहता है, उत्पत्ति कत्ती से हुई। कत्ती मतलब तलवार। भगवान महादेव भोलेनाथ के अभिन्न अस्त्र कत्ती से इस जाति की उत्पत्ति मानी जाती है।
दूसरा सिद्धांत कहता है, उत्पत्ति सूत कातने से हुई। कताई धागा, कपास से सूत कातना इनका पारंपरिक काम धंधा रहा है।
और तीसरा सिद्धांत कहता है, ये काठी, काठिया से बने हैं।
तो सच क्या है? सच को समझने के लिए हमें हजारों साल पीछे जाना होगा।
चलते हैं वैदिक काल में।
समाज को आह्वान नामक पुस्तक में और कई प्राचीन ग्रंथों में काठिया क्षत्रिय जाति की उत्पत्ति का पहला उल्लेख वैदिक साहित्य में मिलता है। कठ, काठिया, वैशम्पायन के उदीच्य शिष्य थे।
डॉ बुद्धप्रकाश ने अपनी किताब ऐशियेंट पंजाब में लिखा है, पाणिनि ने भी अपनी अष्टाध्यायी में कठ क्षत्रिय जाति का उल्लेख किया है। कठ लोग बड़ी प्राचीन आर्य जाति के थे।
इनके नाम पर एक पूरा उपनिषद है, कठोपनिषद। ये कितनी बड़ी बात है। वैदिक साहित्य के संरक्षक और व्याख्याकार के रूप में इनकी ख्याति दूर दूर तक फैली हुई थी।
ये सिर्फ ज्ञानी नहीं, महायोद्धा भी थे।
अब आते हैं इतिहास के सबसे रोमांचक अध्याय पर, कठ गणराज्य और सिकंदर का युद्ध।
ईसा पूर्व 326 में, जब सिकंदर भारत आया, रावी नदी को पार करने के बाद उसकी मुठभेड़ कठों से हुई।
इनकी राजधानी थी सांगल, आज के गुरदासपुर के आसपास।
यूनानी इतिहासकार स्ट्रैबो लिखता है, कठों में सौंदर्य का साका चलता था, सबसे सुंदर पुरुष को वे अपना राजा चुनते थे।
कठों ने अपनी राजधानी के चारों ओर रथों के तीन चक्कर लगाकर शकटव्यूह का निर्माण किया। सिकंदर की अश्वारोही सेना वहाँ निष्फल होने लगी।
इतना घमासान युद्ध हुआ कि अंत में पोरस को अपनी सेना लेकर सिकंदर की मदद के लिए आना पड़ा।
रात में कठों ने एक झील के द्वारा भागने का प्रयत्न किया, पर सिकंदर ने नगर को ध्वस्त कर दिया। इस युद्ध में कठों के 17,000 वीर काम आये और 70,000 बंदी बना लिए गए।
यूनानी लेखक खुद लिखते हैं, इस युद्ध में असामान्य रूप से यूनानी घायल हुए। ये विजय सिकंदर को बहुत महंगी पड़ी।
सोचिए, वो जाति जिसने दुनिया जीतने वाले सिकंदर को इतना नुकसान पहुँचाया।
इस हार के बाद कठ जाति का बिखराव शुरू हुआ। पंजाब के मैदानों से ये उत्तरप्रदेश तथा काठियावाड़ क्षेत्रों की ओर चले गए।
और यहीं से दूसरा इतिहास शुरू होता है, काठियावाड़ का इतिहास।
कर्नल जेम्स टॉड ने अपने ग्रंथ पश्चिमी भारत की यात्रा में काठियों को मध्य एशिया से आए हुए माना है। उन्होंने काठी जाति को राजपूतों का एक अंग माना है जो अपने गौरवपूर्ण ऊँचे कद और वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। ये लोग अपनी तलवार की भांति हल की भी पूजा करते थे।
टॉड ने राजस्थान के इतिहास में काठी या काठिया जाति को राजपूतों के छत्तीस कुलों में से एक माना है। उन्होंने इस जाति के चार भेद किए हैं, गढ़वाल, मंडलीवाल, पठारिया और दुलभुहा।
आज भी कतिया समाज में गढ़वाल, पठारिया जैसे गोत्र और उपनाम प्रचलित हैं। इससे स्पष्ट प्रमाणित होता है कि काठी या काठिया का ही अपभ्रंश कतिया है।
आइन-ए-अकबरी में अबुल फजल ने काठी को अहीर मूल का बताया है। और गुजरात के प्रायद्वीपीय क्षेत्र में पाई जाने वाली ये जाति, जिसे काठी दरबार भी कहा जाता है, उसी के कारण सौराष्ट्र का नाम काठियावाड़ पड़ा।
यानी पूरे एक प्रांत का नाम इस जाति के नाम पर पड़ा।
अब सवाल है, काठियावाड़ से मध्यप्रदेश कैसे आए?
इतिहास कहता है, संभवतः ई सन के आरम्भिक चरण में ये मालवों के साथ होते हुए राजस्थान से दक्षिणवर्ती राज्य सौराष्ट्र में आ बसे। राजपुताने के भट्ट ग्रंथों से पता चलता है कि इन्होंने यादवों से बड़ा युद्ध किया था। महाराजा पृथ्वीराज चौहान तथा जयचंद्र की सेनाओं में भी ये वीर जाति सेनानी का कार्य करती थी।
काठियावाड़ से ही इनका विस्तार मध्यप्रदेश की ओर बढ़ा। नर्मदा तटवर्ती प्रदेशों में पश्चिम से पूर्व की ओर ये बढ़ते गए।
नर्मदांचल में इनकी एक शाखा में गोत्रनाम नाग, नागवंशी, नागोत्रा मिलते हैं तथा इनके इष्टदेव शिव हैं।
यहाँ एक बहुत दिलचस्प कड़ी जुड़ती है नागवंश से।
होशंगाबाद जिले की सोहागपुर तहसील में भटगांव नामक स्थल 13वीं, 14वीं शताब्दी में नागराजाओं की राजधानी था। और मध्यप्रदेश में होशंगाबाद काठियों का भी केंद्र स्थल रहा है। संभवतः यहीं से इस जाति का फैलाव मध्यप्रदेश के शेष हिस्सों में हुआ।
गुप्त साम्राज्य से पहले उत्तर और मध्य भारत में नागवंश के बड़े राज्य थे। विदिशा में गणपतिनाग का राज्य, पद्मपवाया में नागसेन का राज्य। इतिहास साक्षी है कि आर्यों का नागों के साथ सांस्कृतिक समन्वय होता आया था। कुन्ती का नाग कन्या होकर भी पांडव की रानी बनना, उलूपी नागकन्या का अर्जुन की पत्नी बनना, इसके ठोस प्रमाण हैं।
इसी सांस्कृतिक समन्वय से कतिया समाज में शिव भक्ति और नाग गोत्र आए।
अब आते हैं नाम के अपभ्रंश पर।
कई इतिहासकार मानते हैं, ये जाति पहले कठ थी, फिर काठी, फिर काठिया, और फिर कतिया बनी।
मिस्टर क्रुक का मत है कि इनके पुरखे कभी शासन का विरोध करने पर कैद कर लिए गए थे और इस शर्त पर छोड़े गए कि उनकी औरतें सूत कातने का धंधा करेंगी। इसी कारण कहीं कहीं इन्हें रहटा राजपूत भी कहा जाता है। मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में कतिया समाज के लोगों को रेहटा राजपूत कहा जाता है।
और सूत कातने के कारण ही कठिया से अपभ्रंशित होकर कतिया नाम पड़ गया।
पर ये ध्यान रखिए, ये सिर्फ एक व्यवसायिक पहचान थी। लेखक खुद सवाल करता है, क्या सभ्यता के उत्कर्ष काल से लगातार यह जाति सिर्फ सूत कातती आई है? भारत की समस्त मानवता का भरण पोषण कृषि कर्म पर आधारित है।
वास्तव में इनका मुख्य काम किसानी, कृषि तथा मजदूरी रहा है।
अब सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण बात।
कतिया जाति आदिकाल से काठियावाड़ क्षत्रिय जाति से है, जिसे काठियावाड़ी काठी, काठिया कहा जाता रहा है, जोकि समाज की आधुनिक परिस्थितियों के कारण और समाज की मांग को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जाति में रखा गया है।
लेकिन इतिहास देखा जाए तो कतिया जाति भारत की मूलनिवासी जनजाति के अंतर्गत है और मध्यप्रदेश राज्य के आदिवासी समुदाय के भगत माने जाते हैं।
भगत का मतलब क्या है? कतिया जाति के लोग भगत के रूप में आदिवासियों के यहाँ उनके कुलदेवता की पूजन अर्चना भी कराते हैं। ये इनका सम्मानित स्थान था।
पर आर्थिक और शारीरिक प्रबलता कमजोर होने के कारण, युद्धों में परास्त होने के कारण, इन्हें अपना क्षत्रिय जनेऊ तक बेरी के पेड़ पर फेंकना पड़ा। आज भी शादी विवाह में मातृका पूजन के दिन पितरों को बुलाकर पूजन करके क्षत्रिय जनेऊ जरिया के पेड़ पर डाला जाता है।
ये कहानी है गौरव से संघर्ष तक की।
संस्कृति की बात करें तो कतिया जाति के लोग हिंदी बोलते हैं, अपनी कतियाई बोली भी बोलते हैं जो गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र से मेल खाती है।
हिंदू धर्म इनका मुख्य धर्म है। राष्ट्रीय स्तर पर देवता, देवों के देव महादेव भगवान भोलेनाथ तथा महान शिव भक्त संत शिरोमणि भूरा भगत जी की पूजा अर्चना की जाती है।
महाशिवरात्रि बड़े धूमधाम से मनाते हैं। संत शिरोमणि भूरा भगत जी का प्राकट्य जन्म उत्सव वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाते हैं।
कुलदेवता के रूप में महादेव शिवशंकर, काला बाबा, नारायण देव, दूल्हादेव, पांचो पंड्या छठे नारायण, कुलदेवी के रूप में माता हिंगलाज, काली, दुर्गा, गौरा पार्वती आदि की पूजा होती है।
आदिकाल से हिंगलाज देवी को पूजने के प्रमाण मिलते हैं। हिंगलाज देवी डोडिया राजपूत की प्रथम कुलदेवी पूजनीय है। चूंकि कतिया समाज भी क्षत्रिय समाज से है इसलिए यहाँ हिंगलाज माता का वर्णन किया गया है।
आज आवश्यकता है उसके अन्वेषण की, उसके अध्ययन और अध्यापन की, जन जन में उसके प्रचार प्रसार की। क्योंकि सभ्यता के प्रथम चरण में यह जाति वैदिक साहित्य के संरक्षक और व्याख्याकार के रूप में तथा तलवार धारक वीर रक्षक के रूप में दिखाई पड़ती है।
तो साथियों, ये था कतिया जाति का इतिहास। वैदिक काल के कठ, सिकंदर से युद्ध करने वाले योद्धा, काठियावाड़ को नाम देने वाले काठी दरबार, नर्मदा घाटी के नागवंशी क्षत्रिय, और आज के परिश्रमी किसान, मजदूर, भगत।
एक ही जाति, कितने रूप।
आप इस इतिहास के बारे में क्या सोचते हैं? कमेंट में जरूर बताइए।
कतिया जाति का असली इतिहास क्या है? क्या कतिया क्षत्रिय हैं? कतिया जाति की उत्पत्ति कत्ती तलवार से हुई या सूत कातने से?
इस वीडियो में हमने कतिया / काठिया क्षत्रिय समाज के 3000 साल पुराने इतिहास को उजागर किया है - वैदिक काल के कठ गणराज्य से लेकर सिकंदर के साथ युद्ध, काठियावाड़ नामकरण, कर्नल जेम्स टॉड द्वारा 36 राजपूत कुलों में शामिल करना, नर्मदा अंचल में प्रवास, नागवंश से संबंध, और SC में शामिल होने तक की पूरी कहानी।
स्रोत: रसेल और हीरालाल, कर्नल जेम्स टॉड, समाज को आह्वान पुस्तक, विकिपीडिया।
-------------

13.8.26

भोई जाति की ऐतिहासिक यात्रा – अतीत से वर्तमान तक

                                        

                                        



भोई समाज भारतीय सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी उत्पत्ति, विकास और वर्तमान स्थिति को समझना हमें न केवल इतिहास से जोड़ता है बल्कि यह भी बताता है कि समाज किस प्रकार समय के साथ बदलता और विकसित होता है।
जाति इतिहासकर डॉ. दयाराम आलोक के मतानुसार — क्या आपने कभी सोचा है कि भोई समाज की जड़ें कहाँ से आईं? कैसे एक समुदाय ने सदियों की यात्रा तय की और आज भी अपनी पहचान बनाए रखी है? आइए, हम साथ मिलकर चलते हैं इस ऐतिहासिक यात्रा पर – अतीत से वर्तमान तक।
भोई जाति की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न मान्यताएँ हैं। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह समुदाय प्राचीन काल में मछली पकड़ने और जल संसाधनों से जुड़े कार्यों में संलग्न था। "भोई" शब्द का संबंध "भोग" और "भोजन" से भी जोड़ा जाता है, जो उनके जीवनयापन के साधनों को दर्शाता है।
मध्यकालीन भारत में भोई समाज ने स्थानीय प्रशासन और कृषि कार्यों में योगदान दिया। कई जगहों पर यह समुदाय जल संसाधनों के प्रबंधन और समाज की सेवा में अग्रणी रहा। लोककथाओं और भजन-गीतों में भोई समाज की मेहनत और ईमानदारी का उल्लेख मिलता है।
भोई समाज की अपनी विशिष्ट परंपराएँ हैं – विवाह संस्कार, लोकगीत, नृत्य और धार्मिक आस्थाएँ। यह समुदाय देवी-देवताओं की पूजा में विशेष महत्व देता है। उनके उत्सवों में सामूहिकता और सहयोग की भावना झलकती है।
समय के साथ भोई समाज ने शिक्षा, व्यापार और राजनीति में भी अपनी जगह बनाई। आज यह समुदाय न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में बल्कि शहरी जीवन में भी सक्रिय है। सामाजिक सुधार आंदोलनों और शिक्षा के प्रसार ने इनके जीवन को नई दिशा दी।
भोई समाज ने कई चुनौतियों का सामना किया – सामाजिक भेदभाव, आर्थिक कठिनाइयाँ और शिक्षा की कमी। लेकिन आज यह समुदाय अपनी मेहनत और लगन से इन चुनौतियों को पार कर रहा है।
आज भोई समाज भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक संरचना का सक्रिय हिस्सा है। यह समुदाय अपनी परंपराओं को संजोते हुए आधुनिकता को भी अपनाता जा रहा है। भविष्य में शिक्षा और तकनीक के माध्यम से यह और भी सशक्त होगा।
भोई समाज की यात्रा हमें यह सिखाती है कि कोई भी समुदाय अपनी मेहनत, सहयोग और संस्कृति के बल पर इतिहास रच सकता है।
यदि आपको यह वीडियो पसंद आया हो तो इसे लाइक करें, अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें, और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। कमेंट में हमें बताइए कि आप भोई समाज के किस पहलू के बारे में और जानना चाहते हैं। आपकी राय हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है।


पिता की खुशी के लिए पुत्र का महात्याग: भीष्म पितामह की कथा




जिस बेटे ने पिता के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दियाक्या आपने कभी सोचा है कि एक पिता के एक क्षण के प्रेम के लिए एक पुत्र अपना पूरा जीवन, अपना सिंहासन, अपने बच्चे, अपना भविष्य सब कुछ कैसे त्याग सकता है। ऐसी कौन सी प्रतिज्ञा थी जिसे सुनकर स्वर्ग के देवता भी कांप गए और धरती पर फूल बरसाने लगे। आज हम बात कर रहे हैं गंगा पुत्र भीष्म की उस भीषण प्रतिज्ञा की जिसने देवलोक को हिला दिया था।
कहानी शुरू होती है हस्तिनापुर के महान सम्राट शांतनु से। शांतनु चंद्रवंशी राजा थे, धर्मात्मा और प्रजापालक। एक दिन वो गंगा किनारे शिकार पर गए और वहां उन्हें एक अत्यंत सुंदर स्त्री दिखाई दी। वो कोई और नहीं स्वयं मां गंगा थीं जो एक मानव रूप में आई थीं। शांतनु उन्हें देखते ही मोहित हो गए और विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा ने एक शर्त रखी कि वो जो भी करेंगी शांतनु उनसे कभी प्रश्न नहीं करेंगे, कभी रोकेंगे नहीं। प्रेम में अंधे शांतनु ने शर्त मान ली। विवाह हुआ।
समय बीता। गंगा को एक पुत्र हुआ। लेकिन जन्म लेते ही गंगा उस पुत्र को ले जाकर गंगा में बहा देती हैं। शांतनु देखते हैं, हृदय टूट जाता है पर वचनबद्ध होने के कारण कुछ कह नहीं पाते। ऐसे ही सात पुत्रों के साथ हुआ। सात बार एक पिता ने अपनी आंखों के सामने अपने पुत्रों को जल में बहते देखा और चुप रहा। ये सातों पुत्र वास्तव में आठ वसु थे जिन्हें वशिष्ठ ऋषि ने श्राप दिया था कि उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ेगा। जब आठवें पुत्र का जन्म हुआ तो शांतनु से रहा नहीं गया। उन्होंने गंगा को रोक दिया और कहा तुम इतनी निर्दयी कैसे हो सकती हो। वचन टूट गया।
तब गंगा ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और बताया कि ये सात वसु श्राप मुक्त हो गए हैं और यह आठवां पुत्र स्वयं प्रभास नामक वसु है जो लंबे समय तक धरती पर रहेगा। इसका नाम देवव्रत होगा। गंगा उस बालक को अपने साथ ले गईं और कहा कि जब यह बालक शस्त्र और शास्त्र में निपुण हो जाएगा तब मैं इसे आपको लौटा दूंगी।
अब सोचिए एक पिता का एकाकीपन। महल में सब कुछ है पर अपना कोई नहीं है। कई वर्ष बीत गए। देवव्रत गंगा के पास और देवताओं के बीच पल रहे थे। स्वयं देवगुरु बृहस्पति ने उन्हें वेद वेदांग पढ़ाए। परशुराम जैसे महान योद्धा ने उन्हें अस्त्र शस्त्र सिखाए। शुक्राचार्य और वशिष्ठ ने उन्हें राजनीति और धर्म का ज्ञान दिया। वो ऐसा बालक बना जो रूप में कामदेव जैसा, बल में इंद्र जैसा और बुद्धि में बृहस्पति जैसा था।
एक दिन शांतनु यमुना के किनारे घूम रहे थे तो उन्हें एक अद्भुत सुगंध आई। वो सुगंध इतनी दिव्य थी कि पूरे वन में फैल रही थी। वो सुगंध एक युवती से आ रही थी जिसका नाम था सत्यवती। सत्यवती एक निषाद राज की पुत्री थी जिसे मत्स्यगंधा भी कहा जाता था क्योंकि उसके शरीर से मछली की गंध आती थी पर ऋषि पराशर के वरदान से वो सुगंध में बदल गई थी। शांतनु सत्यवती को देखते ही अपना सब कुछ भूल गए। उम्र ढल चुकी थी पर हृदय में फिर से प्रेम जाग उठा। उन्होंने सत्यवती के पिता निषादराज के पास जाकर विवाह का प्रस्ताव रखा।
यहां कहानी में एक मोड़ आता है। निषादराज ने कहा राजन मैं अपनी पुत्री का विवाह आपसे अवश्य करूंगा पर मेरी एक शर्त है। मेरी पुत्री से उत्पन्न पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा। यह सुनते ही शांतनु सन्न रह गए। क्योंकि हस्तिनापुर का युवराज तो देवव्रत है। वो अपने जीवित पुत्र के होते हुए उसके अधिकार को कैसे छीन सकते थे। वो धर्म संकट में पड़ गए और बिना कुछ कहे वापस हस्तिनापुर लौट आए।
महल में लौटकर शांतनु उदास रहने लगे। भोजन में मन नहीं, दरबार में मन नहीं। उनका मुख मुरझा गया। उस समय देवव्रत अपनी शिक्षा पूरी करके गंगा द्वारा हस्तिनापुर लौटाए गए थे। पिता को उदास देखकर देवव्रत ने उनके सारथी से सच्चाई पता की। उन्हें पता चला कि पिता किसी के प्रेम में हैं और एक वचन के कारण दुखी हैं। देवव्रत तुरंत अपने पिता के दुख को दूर करने के लिए निषादराज के पास गए।
निषादराज के दरबार में देवव्रत ने कहा कि मैं हस्तिनापुर के सिंहासन का त्याग करता हूं। आज से मेरे पिता और सत्यवती से उत्पन्न पुत्र ही राजा बनेगा। मुझे राज्य नहीं चाहिए। यह सुनकर सब लोग धन्य धन्य कहने लगे पर निषादराज चतुर था। उसने कहा हे राजकुमार आप तो महान हैं आपने त्याग कर दिया पर आपका पुत्र तो इस वचन से बंधा नहीं होगा। वो तो आकर मेरे पौत्र से युद्ध करेगा। तब क्या होगा।
यहां रुककर जरा सोचिए। एक राजकुमार जो अभी युवा है, जिसके सामने पूरा साम्राज्य है, सुंदर जीवन है, उससे कहा जा रहा है कि तुम ही नहीं तुम्हारे आने वाले बच्चे भी कभी राजा बनने का सपना न देखें। कितना कठिन क्षण रहा होगा। पूरे दरबार में सन्नाटा था। देवता आकाश से देख रहे थे। उस क्षण देवव्रत ने आकाश की ओर देखा, धरती की ओर देखा और दोनों हाथ उठाकर ऐसी प्रतिज्ञा ली जिसे आज तक संसार याद रखता है।
देवव्रत ने कहा हे समस्त देवताओ सुनो, हे पितरो सुनो, मैं चंद्रवंशी शांतनु का पुत्र देवव्रत आज प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूंगा। मैं कभी विवाह नहीं करूंगा, कभी संतान उत्पन्न नहीं करूंगा, कभी राजसिंहासन पर नहीं बैठूंगा। मेरा जीवन हस्तिनापुर की सेवा और अपने पिता की प्रसन्नता के लिए होगा। मेरे जीवन में कभी कोई स्त्री नहीं आएगी। यह मेरा अटल व्रत है।
कहते हैं जैसे ही उन्होंने यह वचन कहे वैसे ही आकाश में बिजली कड़कने लगी। देवलोक हिल गया। इतना कठोर व्रत आज तक किसी ने नहीं लिया था। स्वयं भगवान जैसी प्रतिज्ञा। देवताओं ने ऊपर से फूल बरसाए और कहा यह भीषण प्रतिज्ञा है। जो कार्य कोई नहीं कर सकता वो इस बालक ने कर दिया। इसलिए आज से इसका नाम भीष्म होगा। भीषण प्रतिज्ञा करने वाला भीष्म। उसी क्षण से देवव्रत का नाम मिट गया और वो भीष्म पितामह बन गए।
अब आप समझिए इस प्रतिज्ञा का मूल्य क्या था। एक पुरुष के लिए सबसे बड़ी लालसा होती है अपनी वंश बेल को आगे बढ़ाना। भीष्म ने अपने वंश को वहीं समाप्त कर दिया। उन्होंने अपने पिता को सत्यवती दिला दी। शांतनु और सत्यवती का विवाह हुआ। सत्यवती से दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य। पर विधि का विधान देखिए, चित्रांगद बहुत कम उम्र में एक गंधर्व के साथ युद्ध में मारा गया। विचित्रवीर्य भी क्षय रोग से ग्रस्त होकर बिना संतान के मृत्यु को प्राप्त हो गया। अब हस्तिनापुर का सिंहासन खाली था। कोई वारिस नहीं था।
भीष्म चाहते तो अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर सिंहासन ले सकते थे। कोई उन्हें रोक नहीं सकता था। पर उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी। उन्होंने अपनी माता सत्यवती की आज्ञा से काशी नरेश की तीन पुत्रियों अंबा अंबिका और अंबालिका का हरण किया ताकि विचित्रवीर्य से उनका विवाह हो सके। पर वहां भी एक त्रासदी हुई। अंबा ने कहा मैं तो राजा शाल्व से प्रेम करती हूं। भीष्म ने धर्म का पालन करते हुए उसे सम्मान के साथ शाल्व के पास भेज दिया पर शाल्व ने उसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि उसका हरण हो चुका था। अंबा ने भीष्म से कहा आप मुझसे विवाह कर लो। भीष्म ने कहा मैं अपनी प्रतिज्ञा से बंधा हूं। मैं विवाह नहीं कर सकता। तब अंबा ने भीष्म को ही अपनी दुर्दशा का कारण मानकर प्रतिशोध की अग्नि पाल ली और अगले जन्म में शिखंडी बनकर भीष्म की मृत्यु का कारण बनी।
देखिए एक प्रतिज्ञा ने कितने जीवन उलझा दिए। अगर भीष्म विवाह कर लेते तो कौरव और पांडवों का युद्ध ही न होता। हस्तिनापुर को वारिस मिल जाता। पर भीष्म ने अपने वचन को अपने जीवन से बड़ा माना।
इसी प्रतिज्ञा के कारण उन्हें जीवन भर बहुत दुख सहना पड़ा। अपने ही भतीजे के बच्चों को आपस में लड़ते देखना पड़ा। द्रौपदी का चीर हरण उन्होंने अपनी आंखों से देखा। वो चाहते तो रोक सकते थे पर सिंहासन के प्रति अपनी निष्ठा के कारण चुप रहे। वो जानते थे कि दुर्योधन अधर्म के मार्ग पर है पर वो हस्तिनापुर के सेवक थे, सिंहासन के सेवक थे। उनकी प्रतिज्ञा ने उन्हें बांध रखा था।
जब महाभारत का युद्ध हुआ तो भीष्म ने कौरवों की ओर से युद्ध किया क्योंकि वो हस्तिनापुर के प्रति वचनबद्ध थे। दस दिनों तक उन्होंने ऐसी युद्ध किया कि स्वयं श्रीकृष्ण को भी अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर चक्र उठाना पड़ा। अंत में अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके उनके शरीर को बाणों से छलनी कर दिया। वो बाणों की शय्या पर लेट गए। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था इसलिए उन्होंने अपना प्राण तब तक नहीं छोड़ा जब तक सूर्य उत्तरायण नहीं हो गया। बाणों की शय्या पर लेटे लेटे उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म, मोक्ष धर्म और विष्णु सहस्रनाम का उपदेश दिया।
तो इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है। पहली सीख है कि पुत्र धर्म कितना बड़ा होता है। एक पुत्र अपने पिता की खुशी के लिए अपना सर्वस्व त्याग देता है। दूसरी सीख है कि वचन का पालन कितना कठिन होता है। भीष्म ने जो कहा वो जीवन भर निभाया, चाहे उसके लिए उन्हें कितना भी कष्ट सहना पड़ा। और तीसरी सीख है कि कभी कभी एक अच्छा कार्य भी भविष्य में बड़ी समस्या बन जाता है। भीष्म की प्रतिज्ञा धर्म से प्रेरित थी पर उसी के कारण हस्तिनापुर में उत्तराधिकार का संकट पैदा हुआ और महाभारत जैसा युद्ध हुआ।
अब अगर आप इस कथा को सुन रहे हैं और आपको लगता है कि हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसे ही अनसुने त्याग और बलिदान की कहानियां छुपी हैं तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर कीजिएगा। क्योंकि आपका एक लाइक हमें ऐसी ही और पौराणिक कथाओं को आप तक लाने की शक्ति देता है।
और हां अगर आप पहली बार हमारे चैनल पर आए हैं या अभी तक आपने सब्सक्राइब नहीं किया है तो अभी सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन दबा दीजिए ताकि जब भी हम महाभारत और रामायण की कोई नई कथा लेकर आएं तो सबसे पहले आप तक पहुंचे। कमेंट में जय श्री कृष्ण और भीष्म पितामह की जय लिखना मत भूलिएगा। हम आपके हर कमेंट को पढ़ते हैं।
---

अंत में मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। क्या आपको लगता है कि भीष्म पितामह को अपने पिता के लिए इतनी बड़ी प्रतिज्ञा लेनी चाहिए थी या उन्हें भविष्य के बारे में सोचना चाहिए था। आपका क्या विचार है कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा। क्योंकि आपकी सोच ही इस चर्चा को आगे बढ़ाएगी। फिर मिलते हैं अगली कथा में एक और महान चरित्र के साथ। तब तक के लिए जय श्री कृष्ण।

10.8.26

साहित्य मनीषी डॉ. दयाराम आलोक की जीवन यात्रा

                           




साहित्य मनीषी डॉ. दयाराम आलोक की जीवन यात्रा
 जन्म
आर्य समाज की निर्मल धारा, पूरालाल राठौर कुल पावन।
ग्यारह अगस्त सन् चालीस में, जन्मे  आलोक नाम मनभावन।।
 परिवार
छह भाई तीन बहिन संग, परिवार विशाल था भारी।
पिता का रेडीमेड वस्त्रों का, कारोबार पर दशा थी खस्ता सारी।
निर्धनता में पले-बढ़े पर, संस्कारों में कमी न आई।
 सेवा धर्म
शासकीय शिक्षक बनकर तुमने, शिक्षा-दीप जलाया।
अक्षर-अक्षर ज्ञान बाँटकर, भावी पीढ़ी को चमकाया।।
 शिक्षा
एम.ए. की उपाधि संग, आयुर्वेद रत्न सम्मान।
डी.आई.होम लंदन तक अर्जित, किया ज्ञान का गौरव गान।।
 काव्य साधना
डेढ़ सौ से अधिक कविताएँ, पत्र-पत्रिका में छाई।
कलम के साहित्य मनीषी ने, भावों की गंगा बहाई।।

दयाराम आलोक जी, काव्य सुधा के धाम।
भाव रचें जब छंद में, जग में गूँजे नाम

 समाज सेवा का शंखनाद
डग के दर्जी मंदिर में, सन् छियासठ बना  मिसाल 
मूर्ति प्रतिष्ठा का विराट उत्सव, रच डाला इतिहास विशाल।।

 सामूहिक विवाह
सामूहिक विवाह की नींव धरी, रामपुर में प्रथम आयोजन।
इक्यासी में किया साकार, फिर बोलिया में स्ववित्त पोषण।
कितने घर बसाए तुमने, बिना लिए कुछ दान।।
निष्काम दान
मंदिर, मुक्तिधाम, गौशाला, विद्यालयों के द्वार।
सात सौ से अधिक सीमेंट बेंचें, बाँटा मुक्त हस्त से प्यार।
नकद दान से संस्थाओं को, दिया नव-विकास आधार।।
 वंशावली और इतिहास लेखन
पन्द्रह हजार नामों की वंशावली, दर्जी समाज की लिख डाली।
अंतरजाल पर सुलभ कराई, धरोहर अनुपम निराली।
जाति इतिहास के शोध लेखक, यूट्यूब पर ज्ञान की लड़ी।
सैंकड़ों जातियों का इतिहास, तुमने खोज-खोज कर गढ़ी।।
आयुर्वेद और जनसेवा
पचास वर्षों का अनुभव भर, आयुर्वेद लेख सैंकड़ों बनाए।
वेबसाइट पर सुलभ कराए, जन-जन को रोग-मुक्त कराए।
सेवा-निवृत्ति बाद भी रुके नहीं, भाजपा बोलिया नगर अध्यक्ष कहलाए।
जिला अध्यापक प्रकोष्ठ के महामंत्री बन, संगठन धर्म निभाए।।
 वर्तमान और अतृप्त अभिलाषा
आज भी चार-पाँच घंटे, सोशल मीडिया पर सेवा जारी।
तन अशक्त है किंतु मन में, लोकहित की लगन है भारी।।
 श्लोक
 देहदान संकल्प
मरणोपरान्तम् देहदानं, मम अन्तिमं अभिलाषितम्।
परार्थाय शरीरमस्तु, इति मे निश्चयं कृतम्।।
 अशक्त तन, अटल मन
शरीरं क्षीणं अशक्तं च, तथापि मनः सशक्तकम्।
समाजकार्ये उपस्थितिः, उत्कटेच्छा गरीयसी।।
  पुत्र  पर विश्वास
पुत्रो मे अनिलः सुयोग्यः, दामोदरालय संचालकः।
ममातृप्ताभिलाषाणां, पूरकः स भविष्यति।।
 प्रभु कृपा
षडशीति वर्षाणि पूर्णानि, परमात्म कृपा-प्रसादतः।
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं, लब्ध्वा जीवनम् उत्तमम्।।
 जीवन संध्या
अधुना जीवनं समेटुं, उत्कण्ठा प्रबला मम।
ईश्वरेच्छा बलीयसी, तस्यै नित्यं नमो नमः।।





9.8.26

कंधे पर माता-पिता को तीर्थ कराने वाला श्रवण कुमार | दशरथ को क्यों लगा श्राप?


                                         


सोच कर देखिए... आज के समय में बेटा अपने माता पिता के लिए एक गिलास पानी लाने में भी कभी-कभी झिझक जाता है।
पर आज से हजारों साल पहले एक ऐसा बेटा हुआ था, जिसने अपने अंधे माता-पिता को अपने कंधे पर बिठाया, और पैदल ही पूरे भारत के तीर्थ करा दिए। न सड़क थी, न गाड़ी, न पैसा... था तो बस कंधे पर दो टोकरियां और दिल में अटूट सेवा भाव।
और उसी बेटे की मौत... अयोध्या के राजा दशरथ के हाथों हुई। एक ऐसी मौत जिसने दशरथ को ऐसा श्राप दिलवाया, जिसके कारण बाद में स्वयं भगवान राम को वन जाना पड़ा।
तो आखिर श्रवण कुमार कौन था? उसने ऐसा क्या किया कि आज भी पितृभक्ति का नाम आते ही सबसे पहले उसी का नाम आता है? और दशरथ को कौन सा श्राप लगा था?
इस कहानी को अंत तक सुनिएगा, क्योंकि इसके आखिरी 2 मिनट में एक ऐसी सीख है जो आपके परिवार को हमेशा जोड़े रखेगी।
नमस्कार, आप देख रहे हैं  gyanoday चैनल और मैं आपका अपना  डॉ . आलोक । आज की हमारी पौराणिक कथा है - पितृभक्ति के प्रतीक श्रवण कुमार की।
अगर आप पहली बार आये हैं और ऐसी ही सच्ची, भावुक पौराणिक कथाएं सुनना पसंद करते हैं, तो अभी चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन दबा दीजिए, ताकि हर कथा सबसे पहले आप तक पहुंचे।
और कमेंट में दिल से लिख दीजिए - मातृ पितृ देवो भव।
बात त्रेता युग की है। अयोध्या के पास एक छोटे से आश्रम में एक ऋषि दंपत्ति रहते थे। कुछ ग्रंथों में उनका नाम
शांतनु ऋषि और ज्ञानवती बताया गया है। दोनों ही नेत्रहीन थे। आंखों से नहीं देख सकते थे, पर तपस्वी बहुत बड़े थे।
उनकी कोई संतान नहीं थी। वर्षों तक उन्होंने भगवान की तपस्या की। तब जाकर उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ। उस पुत्र का नाम रखा गया - श्रवण। श्रवण का अर्थ होता है - सुनना। कहते हैं वह बहुत आज्ञाकारी था, जो सुनता था वही करता था, इसलिए उसका नाम श्रवण पड़ा।
श्रवण बचपन से ही दूसरों से अलग था। जहाँ दूसरे बच्चे खेलने में लगे रहते, श्रवण अपने अंधे माता-पिता की सेवा में लगा रहता। उनके लिए पानी लाना, फल लाना, उनके पैर दबाना, उन्हें कथा सुनाना। यही उसकी दिनचर्या थी।
धीरे-धीरे श्रवण बड़ा हुआ। उसके माता-पिता बूढ़े होते गए। एक दिन उसकी माता ने कहा, बेटा, आंखें न होने से हम कभी तीर्थ नहीं कर पाए। मन में बड़ी इच्छा है कि मरने से पहले एक बार चारों धाम की यात्रा कर लें।
पिता ने भी कहा, बेटा हम तो जा नहीं सकते, पर इच्छा बहुत है।
यह बात श्रवण के दिल में घर कर गई।
अब यहाँ श्रवण के सामने दो रास्ते थे। या तो वह माता-पिता को समझा देता कि अंधे होने से तीर्थ यात्रा असंभव है, या फिर वह कुछ ऐसा करता जो आज तक किसी ने नहीं किया था।
श्रवण ने जो दूसरा रास्ता चुना, उसी ने उसे अमर बना दिया।
अब यहाँ श्रवण के सामने दो रास्ते थे। या तो वह माता-पिता को समझा देता कि अंधे होने से तीर्थ यात्रा असंभव है, या फिर वह कुछ ऐसा करता जो आज तक किसी ने नहीं किया था।
श्रवण ने जो दूसरा रास्ता चुना, उसी ने उसे अमर बना दिया।
उस जमाने में आज जैसी सुविधा नहीं थी। श्रवण के पास न रथ था, न घोड़ा, न धन। तो उसने अपने हाथों से एक कांवड़ बनाई। एक मजबूत लकड़ी के डंडे के दोनों किनारों पर दो बड़ी टोकरियां बांधी।
उसने अपने माता-पिता से कहा, पिताजी, माताजी, आप इसी टोकरी में बैठ जाइए। आपका बेटा आपको तीर्थ कराएगा।
सोचिए उस दृश्य को। एक जवान बेटा, कंधे पर लकड़ी का कांवड़, एक तरफ अंधी माँ, दूसरी तरफ अंधे पिता। और वह नंगे पैर पैदल चल रहा है।
काशी, प्रयाग, गया, हरिद्वार... एक-एक करके वह अपने माता-पिता को सभी तीर्थों के दर्शन कराने लगा। जहाँ भी जाता, पहले माता-पिता को स्नान कराता, फिर खुद करता।
रास्ते में लोग देखते तो प्रणाम करते। कहते, धन्य है यह पुत्र।
चलते-चलते कई महीने बीत गए। घूमते-घूमते वह अयोध्या के पास वाले जंगल में पहुँच गया। गर्मी का मौसम था। उसके माता-पिता को बहुत प्यास लगी
यह वही जंगल था जहाँ अयोध्या के युवा राजा दशरथ शिकार करने आये हुए थे। राजा दशरथ को एक विशेष विद्या आती थी - शब्दभेदी बाण। मतलब आवाज सुनकर निशाना लगाना, बिना देखे भी।
उसी दोपहर श्रवण के माता-पिता ने कहा, बेटा बहुत प्यास लगी है।
श्रवण ने कहा, आप यहीं बैठिए, पास में ही सरयू नदी बह रही है, मैं अभी जल लेकर आता हूँ।
वह एक मिट्टी की गगरी लेकर सरयू नदी की ओर चला गया।
इधर दशरथ नदी किनारे घात लगाए बैठे थे। उन्हें लगा कोई हिरण पानी पीने आया है।
उधर श्रवण नदी में गगरी डुबो रहा था। गगरी में से गड़-गड़ की आवाज आ रही थी - बुड़-बुड़।
दशरथ ने वही आवाज सुनी। उन्हें लगा कोई जानवर पानी पी रहा है। उन्होंने बिना सोचे-समझे, आवाज की दिशा में अपना शब्दभेदी बाण छोड़ दिया।
आगे क्या हुआ, वो सुनकर आपकी आंखें भर आएंगी। पर उससे पहले, अगर आपको लगता है कि आज के समय में भी माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है, तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर कीजिए। आपका एक लाइक इस पितृभक्ति की कहानी को और हजारों लोगों तक पहुंचाएगा।
बाण सीधा जाकर श्रवण कुमार की छाती में लगा।
श्रवण के मुंह से चीख निकली - हाय माँ...
वह वहीं नदी किनारे गिर पड़ा। गगरी हाथ से छूट गई।
दशरथ दौड़े-दौड़े आये। देखा तो एक जवान तपस्वी लड़का खून से लथपथ पड़ा है। दशरथ का दिल कांप उठा। उन्होंने कहा, तुम कौन हो, मैंने यह क्या कर दिया?
श्रवण ने बड़ी मुश्किल से कहा, राजन, मैं किसी का अपराधी नहीं। मैं तो एक अंधे माता-पिता का पुत्र हूँ। वे प्यासे हैं, वह सामने पेड़ के नीचे बैठे हैं। मुझे छोड़िए, पहले उन्हें जल पिला दीजिए। और उनसे कहना कि उनका श्रवण अब नहीं आएगा।
इतना कहकर श्रवण ने प्राण त्याग दिए।
दशरथ कांपते हाथों से जल लेकर उस पेड़ के पास पहुंचे जहाँ दो अंधे वृद्ध बैठे थे।
वृद्ध माँ बोली, बेटा श्रवण, इतनी देर लगा दी? जल लाए?
दशरथ कुछ बोल नहीं पाए। उन्होंने जल का पात्र आगे किया।
पिता ने जल पिया और कहा, तुम श्रवण नहीं हो। तुम्हारे हाथ कांप रहे हैं। बताओ मेरा पुत्र कहाँ है?
तब दशरथ को सारी सच्चाई बतानी पड़ी। उन्होंने रोते हुए कहा कि मुझसे भूल हुई, मेरे बाण से आपके पुत्र की मृत्यु हो गई।
यह सुनते ही दोनों वृद्ध जैसे पत्थर बन गए। फिर माँ फूट-फूट कर रोने लगी। पिता ने दशरथ से कहा, हमें वहाँ ले चलो जहाँ हमारा पुत्र पड़ा है।
दशरथ उन्हें नदी किनारे लाए। दोनों ने अपने मृत बेटे के शव को टटोला, उसे गोद में लिया।
और तब उस अंधे पिता ने रोते हुए दशरथ को श्राप दिया।
कहा, हे राजन, जिस प्रकार हम दोनों पुत्र के वियोग में अपने प्राण त्याग रहे हैं, उसी प्रकार तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग में ही होगी।
यह कहकर दोनों ने भी वहीं अपने प्राण छोड़ दिए।
यही श्राप था जिसने दशरथ के जीवन की दिशा बदल दी।
यही कारण था कि वर्षों बाद जब राजा दशरथ के चार पुत्र हुए - राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न - और जब राम को वनवास हुआ, तो दशरथ उस पुत्र वियोग को सह नहीं पाए।
राम के अयोध्या छोड़ते ही दशरथ ने कहा था, राम... राम... और पुत्र वियोग में ही उनके प्राण चले गए। अंधे माता-पिता का दिया हुआ श्राप सत्य हो गया।
तो देखा आपने, कैसे एक पुत्र की भक्ति और एक राजा की एक भूल, दोनों ने मिलकर रामायण की सबसे बड़ी घटना की नींव रख दी।
इस कहानी से हमें दो सीख मिलती हैं।
पहली - माता-पिता की सेवा से बड़ा कोई तीर्थ नहीं, कोई धर्म नहीं। श्रवण कुमार ने हमें सिखाया कि भगवान को ढूंढने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं, अपने माता-पिता में ही भगवान देख लो।
दूसरी - बिना सोचे समझे कोई काम नहीं करना चाहिए। दशरथ जैसे धर्मात्मा राजा से भी एक भूल हुई और उसका परिणम उन्हें जीवन भर भुगतना पड़ा। इसलिए कोई भी तीर, कोई भी शब्द, सोच समझ कर ही छोड़ना चाहिए।
अगर यह कथा आपके दिल को छू गई हो, तो इसे अपने माता-पिता के साथ जरूर साझा कीजिए।
कमेंट में जरूर बताइए, आपको इस कहानी का कौन सा हिस्सा सबसे ज्यादा भावुक लगा?
और ऐसी ही अनसुनी पौराणिक कथाओं के लिए चैनल को सब्सक्राइब करना मत भूलिए।
फिर मिलेंगे एक और दिव्य कथा के साथ। तब तक अपना और अपने माता-पिता का ख्याल रखिए।
जय श्री राम, मातृ पितृ देवो भव।

4.8.26

घटोत्कच : महाभारत का मायावी योद्धा



घटोत्कच की कथा महाभारत में एक अद्भुत अध्याय है, जो वीरता, बलिदान और रणनीति का अनोखा संगम प्रस्तुत करती है। यह कथा न केवल युद्धभूमि की गाथा है बल्कि भावनाओं, रिश्तों और धर्म के गहरे प्रश्नों को भी उजागर करती है।
महाभारत के युद्ध में जब पांडव और कौरव आमने-सामने खड़े हुए, तब घटोत्कच का प्रवेश युद्धभूमि में हुआ। घटोत्कच भीम का पुत्र था, जिसकी माता हिडिंबा राक्षसी थी। इस कारण उसमें असाधारण शक्ति और मायावी सामर्थ्य थी। उसका शरीर विशालकाय था, और उसकी गर्जना से ही शत्रु भयभीत हो जाते थे।
कौरवों के विरुद्ध जब युद्ध का संतुलन बिगड़ने लगा, तब घटोत्कच को बुलाया गया। उसकी मायावी शक्ति ने कौरव सेना को हिला दिया। वह आकाश में उड़कर शत्रुओं पर प्रहार करता, कभी विशाल पर्वत जैसा रूप धारण करता, तो कभी अग्नि की ज्वाला बनकर शत्रुओं को जलाता। उसकी शक्ति से दुर्योधन और उसकी सेना भयभीत हो उठी।
घटोत्कच का युद्ध केवल शारीरिक बल का नहीं था, बल्कि उसकी मायावी शक्ति ने कौरवों को असहाय कर दिया। दुर्योधन ने जब देखा कि उसकी सेना टूट रही है, तब उसने कर्ण को पुकारा। कर्ण के पास इंद्र द्वारा दिया गया दिव्य अस्त्र "वज्र" था, जिसे वह केवल एक बार प्रयोग कर सकता था। यह अस्त्र उसने अर्जुन के लिए सुरक्षित रखा था। लेकिन घटोत्कच की प्रचंडता ने दुर्योधन को विवश कर दिया कि वह कर्ण से उस अस्त्र का प्रयोग घटोत्कच पर करवाए।
कर्ण ने दिव्य अस्त्र का प्रयोग किया और घटोत्कच युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुआ। किंतु उसकी मृत्यु भी पांडवों के लिए वरदान सिद्ध हुई। क्योंकि वह अस्त्र, जो अर्जुन के लिए सुरक्षित था, घटोत्कच पर खर्च हो गया। इस प्रकार घटोत्कच ने अपने बलिदान से अर्जुन का जीवन बचाया और पांडवों की विजय का मार्ग प्रशस्त किया।
घटोत्कच की कथा हमें यह सिखाती है कि वीरता केवल युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि धर्म और कर्तव्य के लिए बलिदान देने में भी है। उसका बलिदान महाभारत की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।