16.5.26

हनुमान मंदिर ग्राम पिंछला :जहां होती है मुरादें पूरी वहाँ डॉ. आलोक का दिव्य योगदान :भक्तों को सुविधा सम्मान :Pinchala Hanuman Mandir

 मंदसौर जिले के अंतर्गत गाँव पिंछला 

पहाड़ी पर हनुमान जी का सुन्दर मंदिर 

संकट मोचक हनुमान मंदिर 

डॉ. आलोकजी की तरफ से बैठक व्यवस्था के लिए सिमेन्ट बेंचें और 1500/- नकद दान 

पिंछला गाँव की पावन पहाड़ी, हनुमान मंदिर की शोभा न्यारी। संकटमोचक का दिव्य धाम, भक्तों के मन में जगाता विश्वास तमाम।

डॉ. आलोक का दान अनोखा, बेंचों से मिला विश्राम सदा। १५०० नकद संग तीन बेंचें, श्रद्धा का दीप जला निरंतर।

शिलालेख में अंकित नाम, सेवा का अद्भुत यह आयाम। मंदसौर से फैली पुण्य धारा, समाजसेवा का उज्ज्वल नजारा।

श्लोक-

दानं धर्मस्य मूलं हि, सेवा लोकहिताय च। पिंछला हनुमद् धामे, आलोकस्य कृपा सदा॥


हनुमान  मन्दिर पिंछ्ला (शामगढ़)

११५५१/- का दान (३ बेंच +१५००/- नकद)
शिलालेख लगाया गया 



मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के

मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु

समाजसेवी

डॉ.दयाराम जी आलोक





शामगढ़ का

आध्यात्मिक दान पथ

डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।

व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।

सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।

स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।

निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।

पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।



मंदिर के शुभचिंतक 

बगदीराम जी शर्मा 96694-27426 मन्दिर के मुख्य पुजारी हैं 

शंकर लाल जी  90091-71616 

घनश्याम जी  परमार 97537-24369 

15.5.26

मुक्तिधाम पिडावा :जहाँ रूह को मिले शांति, वहीं डॉ. आलोक ने दिया सम्मान; एक प्रेरणादायी बदलाव:Muktidham Pidawa

  झालावाड़  जिले का पिडावा  कस्बा 

मुक्तिधाम मे बेंच  व्यवस्था 

डॉ . आलोक का पावन दान 


पेंशन का पुण्य पथ, आलोक जी ने साधा,  

दान से जग में फैला, सेवा का इरादा।  


मुक्तिधाम में बेंचें, श्रद्धा से सजाईं,  

थके हुए जनों को, विश्राम की छाँव दिलाईं।  


झालावाड़ से मंदसौर तक, सेवा का विस्तार,  

गौशालाएँ, मंदिर, धाम—सबमें आलोक अपार।  


शामगढ़ का दान-पथ, प्रेरणा का दीप बने,  

समाजसेवा की गाथा, युगों तक जीवित रहे।  

श्लोक -

दानं धर्मस्य साधनं, लोकहिताय शुभं सदा।  
आलोकस्य कृपायुक्तं, पुण्यं तिष्ठतु सर्वदा॥  

मुक्तिधामे बेंचदानं, जनसेवा महोदयम्।  
श्रद्धया यः करोत्येव, स पुण्यफलमश्नुते॥  


मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के

मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु

समाजसेवी

डॉ.दयाराम जी आलोक



शामगढ़ का

आध्यात्मिक दान पथ

डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।

व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।

सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।

स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।

निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।

पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।


पिडावा के मुक्तिधाम हेतु 
 5  सिमेन्ट  बेंच भेंट 

मुक्तिधाम के पिलर पर नेम प्लेट लगी /19/8/2022 




pidawa muktidham video बेंच लगीं 25/9/2022
पीडावा मुक्तिधाम मे बेंच लगीं 25/9/2022



सुनील जी शर्मा अध्यापक 97851-39832  पिड़वा की पहल 

पिंकेशजी भावसार 99293-95221 पीड़ावा मुक्तिधाम अध्यक्ष हैं 

डॉ.अनिल कुमार दामोदर s/o डॉ.दयाराम जी आलोक 99265-24852 ,दामोदर पथरी अस्पताल 98267-95656 शामगढ़ द्वारा पिडावा के मुक्तिधाम हेतु  दान सम्पन्न 

मुक्तिधाम सीतामऊ :जहां थमती हैं साँसे वहाँ आलोकजी का दिव्य दान :दागियों को सुविधा विश्राम सम्मान :Muktidham Sitamau

 

 मंदसौर जिले का सबसे विस्तृत मुक्तिधाम 

महाकाल मुक्तिधाम सीतामऊ 

डॉ . दयाराम जी आलोक द्वारा 

बैठक व्यवस्था हेतु 10 बेंच दान 


दान-पथ आलोक का, उज्ज्वल दीपक समान,  
सीतामऊ मुक्तिधाम में, बेंचों का हुआ दान।  

वृद्ध जन पाए विश्राम, यात्रियों को मिले छाँव,  
समर्पण की गाथा यह, समाज में जगाए भाव।  

सेवानिवृत्ति के पश्चात, सेवा का लिया संकल्प,  
पेंशन को समर्पित कर, किया जन-कल्याण का विकल्प।  

मंदसौर से नीमच तक, आगर से झालावाड़,  
मुक्तिधाम और मंदिरों में, आलोक का अपार प्रसाद।  

गौशालाओं में करुणा, मंदिरों में श्रद्धा का संग,  
दान की बेंचें बन गईं, सेवा का अमर रंग।  

151 से अधिक स्थलों पर, बैठने की सुविधा दी,  
समर्पण और प्रेरणा से, समाज में नई राह बनी।  

शिलालेख पर अंकित हुआ, दान का उज्ज्वल नाम,  
आलोक जी की सेवा से, बढ़ा जन-कल्याण का धाम।  

श्लोक-

दानं धर्मस्य मूलं हि, सेवा लोकहिताय च।  
आलोकस्य समर्पणं, मुक्तिधामे सुखाय च॥१॥  

पेंशनरूपेण लब्धं धनं, जनसेवाय समर्पितम्।  
मन्दसौरादि प्रदेशेषु, धर्मकार्ये विनियोजितम्॥२॥  

मन्दिरेषु च गौशालासु, मुक्तिधामेषु च सदा।  
सीमेंट-बेञ्चदानं तु, जनसुखाय निरन्तरम्॥३॥  

शिलालेखैः प्रकाशितं, दानस्य गौरवं महत्।  
प्रेरयन्ति च अन्यान्, लोकहिताय सत्कृतम्॥४॥  




मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के

मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु

समाजसेवी

डॉ.दयाराम जी आलोक






शामगढ़ का

आध्यात्मिक दान पथ

डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।

व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।

सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।

स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।

निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।

पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।



  सीतामऊ मुक्ति धाम को 
 
10 सिमेन्ट बेंच दान  

 सीतामऊ मुक्तिधाम को डॉ.दयाराम आलोक शामगढ़ ने 10 बेंच डोनेट की 4/6/2022



Sitamau Muktidham Samiti 

श्री सुरेश जी दसेडा संरक्षक ,हेमंत जी जैन ,अध्यक्ष मुकेश जी चौरडिया, सचिव संजय चौहान ,कोषाध्यक्ष मनोज जी माली ,उपाध्यक्ष राधेश्याम जी ग्वाला ,व्यवस्थापक सागर जी राठौर ,श्री सत्य प्रकाश जी आंजना


                      सीतामऊ मुक्तिधाम के विडियो मे  देखें  बेंच व्यवस्था का नजारा 


                          सीतामऊ मुक्तिधाम के कार्यालय पर शिलालेख लगाया गया 


                                                   आभार- पत्र


         
                                                                             
मुक्तिधाम का कायाकल्प करने का संकल्प 

सुरेशजी दसेड़ा  -98930-83931

प्रदीपजी चौरडिया 

मुकेशजी चोरडिया -9893893620 मुक्तिधाम समिति के अध्यक्ष हैं .

डॉ.अनिल कुमार दामोदर 98267-95656  s/o डॉ.दयाराम जी आलोक 99265-24852 शामगढ़, दामोदर पथरी अस्पताल 98267-95656 शामगढ़ द्वारा  सीतमऊ  मुक्तिधाम  हेतु दान सम्पन्न 5/6/2022 


13.5.26

मुक्तिधाम मिश्रोली :जहां थमती हैं साँसे वहाँ डॉ .आलोक का बेंच दान :दागियों को सुविधा ,विश्राम:Muktidham Mishroli :

 

मिश्रोली ग्राम का मुक्तिधाम, जहाँ टाइलों से सुसज्जित प्रांगण, हरित वृक्षों की छाया में शीतलता का वरदान

बरसात से बचाव हेतु विशाल बरामदा, श्रद्धांजलि का पावन स्थल, ग्राम पंचायत के संरक्षण में, सजता है यह पुण्य धाम।

समाजसेवी डॉ. दयाराम आलोक का अनुपम दान, सात सीमेंट बेंचों से सुसज्जित हुआ स्थान। दान पट्टिका अंकित कर सरपंच जगमाल सिंह जी ने, स्मृति को अमर बना दिया, और समाज को प्रेरणा का दीप जला दिया।

श्लोक-

दानं महत्तमं पुण्यं लोकहिताय समर्पितम्। आलोकस्य कृपाशीलं बेंचदानं शुभाय वै॥

लोकहित के लिए किया गया दान महान पुण्य है। डॉ. आलोक का करुणाशील बेंच‑दान समाज के कल्याण और शुभ के लिए है

राजस्थान के झालावाड़ जिले का एक गाँव मिश्रोली 

यहाँ के मुक्तिधाम  के परिसर मे टाइल्स लगी हुई हैं और आगंतुकों  के लिए गर्मी मे शीतलता  प्रदान करने के लिए पेड़ पौधे शोभित हैं। बरसात से बचाव और मृत आत्मा को श्रद्धांजलि  के लिए बडा  बरामदा  निर्मित है। 

मुक्तिधाम का रख रखाव  ग्राम पंचायत  के अधीन है। 

यहाँ के सरपंच जगमाल सिंग जी हैं। 

दागियों के लिए बैठक सुविधा सृजन करने के लिए समाजसेवी  डॉ . दयाराम जी आलोक ने इस मुक्तिधाम को 7 सिमेन्ट की बेंचें भेंट की हैं। 

सरपंच साहब ने इस दान को यादगार बनाने के लिए दान दाता की  दान पट्टिका  बरामदे  के पिलर पर स्थापित कर दी है ताकि लोगों को दान की प्रेरणा मिलती रहेगी। 

दान के लिए आभार व्यक्त किया गया । 


मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के

मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु

समाजसेवी

डॉ.दयारा
म आलोक




शामगढ़ का

आध्यात्मिक दान पथ

डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।

व्यापक सेवा का दायरा:
उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।

सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।

स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।

निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।

पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।





मिश्रोली के मुक्ति धाम को

21 हजार रु. की 7 बेंच भेंट .


मुक्तिधाम मे बेंच लगाई गईं.



 
 
मिश्रोली के सरपंच साहेब जगमाल सिंग जी की अनुमति से दान सम्पन्न । 

डॉ.अनिल कुमार दामोदर 98267-95656  s/o डॉ.दयाराम जी आलोक 99265-24852 शामगढ़ द्वारा दान सम्पन्न 

10.5.26

"कुम्हार जाति का इतिहास और वैदिक उत्पत्ति":Prajapati kumhar itihas

 


मिट्टी से जीवन गढ़ने वाले,  
कला के प्रथम शिल्पकार कहलाए।  
प्रजापति के वंशज, सृजन के साथी,  
सभ्यता की नींव में नाम लिखाए।  

घड़े, कलश और मूर्तियों में,  
संस्कृति की आत्मा बसती है।  
कुम्हार का इतिहास बताता है,  
सृजन ही सबसे बड़ी शक्ति है।  


कुम्हार भारत, पाकिस्तान और नेपाल में पाया जाने वाला एक जाति या समुदाय है. इनका इतिहास अति प्राचीन और गौरवशाली है. मानव सभ्यता के विकास में कुम्हारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. कहा जाता है कि कला का जन्म कुम्हार के घर में ही हुआ है. इन्हें उच्च कोटि का शिल्पकार वर्ग माना गया है. सभ्यता के आरंभ में दैनिक उपयोग के सभी वस्तुओं का निर्माण कुम्हारों द्वारा ही किया जाता रहा है. पारंपरिक रूप से यह मिट्टी के बर्तन, खिलौना, सजावट के सामान और मूर्ति बनाने की कला से जुड़े रहे हैं. यह खुद को वैदिक ‌भगवान प्रजापति का वंशज मानते हैं, इसीलिए ये प्रजापति के नाम से भी जाने जाते हैं. इन्हें प्रजापत, कुंभकार, कुंभार, कुमार, कुभार, भांडे आदि नामों से भी जाना जाता है. भांडे का प्रयोग पश्चिमी उड़ीसा और पूर्वी मध्य प्रदेश के कुम्हारों के कुछ उपजातियों लिए किया जाता है. कश्मीर घाटी में इन्हें कराल के नाम से जाना जाता है. अमृतसर में पाए जाने वाले कुछ कुम्हारों को कुलाल या कलाल कहा जाता है. कहा जाता है कि यह रावलपिंडी पाकिस्तान से आकर यहां बस गए. कुलाल शब्द का उल्लेख यजुर्वेद (16.27, 30.7) मे मिलता है,

कुम्हार किस कैटेगरी में आते हैं?

आरक्षण की व्यवस्था के अंतर्गत कुम्हार जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, उड़ीसा, बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात में इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है.मध्य प्रदेश के छतरपुर, दतिया, पन्ना, सतना, टीकमगढ़, सीधी और शहडोल जिलों में इन्हें अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है; लेकिन राज्य के अन्य जिलों में इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में सूचीबद्ध किया गया है. अलग-अलग राज्योंं में कुमार के अलग-अलग सरनेम है.

कुम्हार कहां पाए जाते हैं?

यह जाति भारत के सभी प्रांतों में पाई जाती है. हिंदू प्रजापति जाति मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में पाई जाती है. महाराष्ट्र में यह मुख्य रूप से पुणे, सातारा, सोलापुर, सांगली और कोल्हापुर जिलों में पाए जाते हैं.

कुम्हार शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

कुम्हार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द “कुंभ”+”कार” से हुई है. “कुंभ” का अर्थ होता है घड़ा या कलश. “कार’ का अर्थ होता है निर्माण करने वाला बनाने वाला या कारीगर. इस तरह से कुम्हार का अर्थ है- “मिट्टी से बर्तन बनाने वाला”.

वैदिक मान्यताओं के अनुसार, कुम्हार की उत्पत्ति त्रिदेव यानी कि सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा, पालनहार भगवान विष्णु और संहार के अधिपति भगवान शिव से हुई है. सृष्टि के आरंभ में त्रिदेव को यज्ञ करने की इच्छा हुई. यज्ञ के लिए उन्हें मंगल कलश की आवश्यकता थी. तब प्रजापति ब्रह्मा ने एक मूर्तिकार कुम्हार को उत्पन्न किया और उसे मिट्टी का घड़ा यानी कलश बनाने का आदेश दिया. कुम्हार ने ब्रह्मा जी से कलश निर्माण के लिए सामग्री और उपकरण उपलब्ध कराने की प्रार्थना की. जब भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र चाक के रूप में उपयोग करने के लिए दिया. शिव जी ने धुरी के रूप में प्रयोग करने के लिए अपना पिंडी दिया. ब्रह्मा जी ने धागा (जनेऊ), पानी के लिए कमंडल और चक्रेतिया दिया. इन सभी सामग्री और उपकरण की मदद से फिर कुम्हार ने मंगल कलश का निर्माण किया जिससे यज्ञ संपन्न हुआ.

हिंदू कुम्हार सृष्टि के रचयिता वैदिक प्रजापति (भगवान ब्रह्मा) के नाम पर खुद को सम्मानपूर्वक प्रजापति कहते हैं.
  • कुम्हारों को उच्च कोटि का शिल्पकार माना जाता है. 
  • सभ्यता के आरंभ में कुम्हार ही दैनिक उपयोग की सभी वस्तुएं बनाते थे. 
  • कुम्हारों ने मिट्टी के बर्तन, खिलौने, सजावट के सामान, और मूर्तियां बनाई हैं. 
  • कुम्हारों को वैदिक देवता प्रजापति का वंशज माना जाता है. 
  • कुम्हारों को सृजनकर्ता और वंश वर्धक देवता माना जाता है. 
  • विवाह में गणपति की स्थापना से पहले कुम्हारों के घर जाकर चाक की पूजा की जाती है. 
  • भारत की सभी जातियों के लिए शादी में चाक-पूजन एक अहम रस्म है. 
कुम्हारों की उत्पत्ति से जुड़ी एक दंतकथा: 
  • एक बार ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों के बीच गन्ना बांटा था.
  • सभी पुत्रों ने अपना हिस्सा खा लिया, लेकिन कुम्हार भूल गया.
  • कुम्हार ने गन्ने को मिट्टी के ढेर के पास रख दिया था.
  • कुछ दिन बाद ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों से गन्ने मांगे, तो कोई भी पुत्र गन्ना नहीं ला सका.
  • कुम्हार ने ब्रह्मा जी को पूरा गन्ने का पौधा भेंट कर दिया.
कुमावत शब्‍द
राजस्‍थान में कुछ कुमारों/कुम्‍भारों ने कुमरावत  सरनेम  का प्रयोग किया जो बाद में कुमावत में तब्‍दील हो गया।
इसको समझने के लिये भाषा विज्ञान पर नजर डाले-
कुमावत शब्‍द की स‍न्धि विच्‍छेद करने पर पता चलता है ये शब्‍द कुमा + वत से बना है। यहां वत शब्‍द वत्‍स से बना है । वत्‍स का अर्थ होता है पुत्र या पुत्रवत शिष्‍य अर्थात अनुयायी। इसके लिये हम अन्‍य शब्‍दों पर विचार करते है-
निम्‍बावत अर्थात निम्‍बार्काचार्य के शिष्‍य
रामावत अर्थात रामानन्‍दाचार्य के शिष्‍य
शेखावत अर्थात शेखा जी के वंशज
लखावत अर्थात लाखा जी के वंशज
रांकावत अर्थात रांका जी के शिष्‍य या अनुयायी
इसी प्रकार कुमरावत/कुमावत का भी अर्थ होता है कुम्‍हार के वत्‍स या अनुयायी।
कुम्‍हार शब्‍द था फिर कुमावत शब्‍द का प्रयोग क्‍यों शुरू हुआ?

उसके पीछे मूल कारण यही है कि सामान्‍यतया पूरा समाज पिछड़ा रहा है और जब समाज का एक वर्ग तरक्‍की कर आगे बढा तो उसने स्‍वयं को अलग दर्शाने के लिये इस शब्‍द का प्रयोग शुरू किया। और अब यह व्‍यापक पैमाने में प्रयोग होता है। वैसे इतिहास में कुमावत शब्‍द का प्रयोग जयपुर के स्‍थापना (1728 ई) के समय से मिलता है। जयपुर शहर राजस्‍थान के समस्‍त शहरों में अपेक्षाकृत नया है।
सवाल यह भी किया जाता कि इतिहास में कुमावतों का युद्ध में भाग लेने का उल्‍लेख है। हाँ ,युद्ध में सभी जातियों की थोड़ी बहुत भागीदारी अवश्‍य होती थी और वे आवश्‍यकता होने पर अपना पराक्रम दिखा भी देते थे। युद्ध में कोई सैनिकों की सहायता करने वाले होते थे तो कोई दुन्दुभी बजाते कोई गीत गाते कोई हथियार पैने करते तो कोई भोजन बनाते। महाराणा प्रताप ने तो अपनी सेना में भीलों की भी भर्ती की थी। ये भी संभव है कि इस प्रकार युद्ध में भाग लेने वाले समाज बन्‍धु ने कुमावत शब्‍द का प्रयोग शुरू किया।
   इतिहास में कुम्हारों की पुरानी जागीरों का वर्णन है तो  सवाल यह है  कि क्या कुम्हार  राजपूत के वंशज है या क्षत्रिय है। इसका उत्तर ये हो सकता है की जागीर देना राजा की मर्जी पर था मेहरापर नगढ के रहता था|दुर्ग के निर्माण के समय दुर्ग ढह जाता तो ये उपाय बताया गया कि किसी जीवित व्‍यक्ति द्वारा नींव मे समाधि लिये जाने पर ये अभिशाप दूर होगा। तब पूरे राज्‍य में उद्घोषणा करवाई गई कि जो व्‍यक्ति अपनी जीवित समाधि देगा उसके वंशजों को जागीर दी जाएगी। तब केवल एक गरीब व्‍यक्ति आगे आया उसका नाम राजाराम मेघवाल था। तब महाराजा ने उसके परिवार जनों को एक जागीर दी तथा उसके नाम से एक समाधि स्‍थान (थान) किले में आज भी मौजूद है। चारणों को भी उनकी काव्‍य गीतों की रचनाओं से प्रसन्‍न हो खूब जागीरे दी गयी। अत: इसका उत्तर ये है कि जागीर होना  इस बात का प्रमाण नहीं है कि वे राजपूत के वंशज थे। और क्षत्रिय वर्ण बहुत व्यापक  है राजपूत तो उनके अंग मात्र है। कुम्‍हार  जाती ने युद्ध  में भाग लिया  इसलिए  क्षत्रिय तो  कहला सकता है पर राजपूत नहीं। राजपूत तो व्‍यक्ति तभी कहलाता है जब वह किसी राजा की संतति हो। क्षत्रिय होने के लिए राजा का वंशज होना जरूरी नहीं होता।कर्म से व्‍यक्ति क्षत्रिय वैश्‍य या शुद्र होता है। कुम्‍हार/कुमार शिल्‍प कार्य करने के कारण वैश्‍य वर्ण में आता है। कुछ क्षत्रिय कर्म करते थे तो स्‍वयं को क्षत्रिय भी कहते है।
भाट और रावाें ने अपनी बहियों में अलग अलग कहानीयों के माध्‍यम से लगभग सभी जातियों को राजपूतों से जोडा है ताकि उन्‍हे परम दानी राजा के वंशज बता अधिक से अधिक दान दक्षिणा ले सके।
लेकिन कुमावत और कुम्‍हारों को इस बात पर ध्‍यान देना चाहिए कि राजपूतो में ऐसी गोत्र नहीं होती जैसी उनकी है और जिस प्रकार कुमावत का रिश्‍ता कुमावत में होता है वैसे किसी राजपूत वंश में नहीं होता। अत: उनको भाट और रावों की झूठी बातों पर ध्‍यान नहीं देना चाहिए। राजपूतों मे कुम्‍भा नाम से कई राजा हुए है अत: हो सकता है उनके वंशज भी कुमावत लगाते रहे हो। पर अब कुम्‍हारों को कुमावत लगाते देख वे अपना मूल वंश जैसे सिसोदिया या राठौड़ या पंवार लगाना शुरू कर दिया होगा और वे रिश्‍ते भी अपने वंश के ही कुमावत से ना कर कच्‍छवाहो परिहारो से करते होंगे।
कुछ विचारक ये भी तर्क देते है कि हम बर्तन मटके नहीं बनाते और इनको बनाने वालों से उनका कोई संबंध कभी नहीं रहा। उन लोगों को समझना होगा कि आपके पुराने खेत और मकान जायदाद मे तो कुम्‍हार कुमार कुम्‍भार लिखा है तो वे तर्क देते है कि वे अज्ञानतावश खुद को कुम्‍हार कहते थे। यहां ये लोग भूल जाते है कि हमारे पूर्वज राव और भाट के हमारी तुलना में ज्‍यादा प्रत्‍यक्ष सम्‍पर्क में रहते थे। अगर भाट कहते कि आप कुमावत हो तो वे कुमावत लगाते। और कुमावत शब्‍द का कुम्‍हारों द्वारा प्रयो्ग ज्‍यादा पुराना नहीं है। वर्तमान जयपुर की स्‍थापना के समय से ही प्रचलन में आया है और धीरे धीरे पूरे राजस्‍थान में कुम्‍हारों के मध्‍य लोकप्रिय हो रहा है। और रही बात मटके बनाने की तो हजार में से एक व्‍यक्ति ही मटका बनाता है। क्‍योंकि अगर सभी बनाते तो इतने बर्तन की खपत ही कहाँ होती। मिटटी के बर्कतनों की कम मांग के कारण कुम्‍हार जाति के लोग अब अन्‍य रोजगार अपना रहे हैं| । कुछ खेती करते कुछ भवन निर्माण करते कुछ पशुचराते कुछ बनजारो की तरह व्‍यापार करते तो कुछ बर्तन और मिट्टी की वस्‍तुए बनातें। खेतीकर, चेजारा और जटिया कुमार क्रमश: खेती करने वाले, भवन निर्माण और पशु चराने और उन का कार्य करने वाले कुम्‍हार को कहा जाता था।
कुछ कहते है की मारू कुमार मतलब राजपूत। मारू मतलब राजपूत और कुमार मतलब राजकुमार।
– उनके लिये यह कहना है कि राजस्‍थान की संस्‍कृति पर कुछ पढे बिना पढे ऐसी बाते ही मन मे उठेगी। मारू मतलब मरू प्रदेश वासी। मारेचा मारू शब्‍द का ही परिवर्तित रूप है जो मरूप्रदेश के सिंध से जुड़े क्षेत्र के लोगो के लिये प्रयुक्‍त होता है। और कुमार मतलब हिन्‍दी में राजकुमार होता है पर जिस भाषा और संस्‍कृति पर ध्‍यान दोगे तो वास्‍तविकता समझ आयेगी। यहां की भाष्‍ाा में उच्‍चारण अलग अलग है। यहां हर बारह कोस बाद बोली बदलती है। राजस्‍थान मे ‘कुम्‍हार’ शब्‍द का उच्‍चारण कुम्‍हार कहीं नही होता। कुछ क्षेत्र में कुम्‍मार बोलते है और कुछ क्षेत्र में कुंभार अधिकतर कुमार ही बोलते है। दक्षिण्‍ा भारत में कुम्‍मारी, कुलाल शब्‍द कुम्‍हार जाति के लिये प्रयुक्‍त होता है।
प्रजापत और प्रजापति शब्‍द के अर्थ में कोई भेद नहीं। राजस्‍थानी भाषा में पति का उच्‍चारण पत के रूप में करते है। जैसे लखपति का लखपत, लक्ष्‍मीपति सिंघानिया का लक्ष्‍मीपत सिंघानिया। प्रजापति को राजस्‍थानी में प्रजापत कहते है। यह उपमा उसकी सृजनात्‍मक क्षमता देख कर दी गयी है। जिस प्रकार ब्रहृमा नश्‍वर सृष्‍टी की रचना करता है प्राणी का शरीर रज से बना है और वापस मिट्टि में विलीन हो जाता है वैसे है कुम्‍भकार मिट्टि के कणों से भिन्‍न भिन्‍न रचनाओं का सृजन करता है।
कुछ कहते है कि रहन सहन अलग अलग। और कुम्‍हार स्त्रियां नाक में आभूषण नही पहनती। तो इसके पीछे भी अलग अलग क्षेत्र के लोगो मे रहन सहन के स्‍तर में अन्‍तर होना ही मूल कारण है। 

राजस्‍थान में कुम्‍हार जाति इस प्रकार उपजातियों में विभाजित है-
मारू – अर्थात मरू प्रदेश के कुम्हार 
खेतीकर  कुम्हार – अर्थात ये साथ में अंश कालिक खेती करते थे। चेजारा भी इनमें से ही है जो अंशकालिक व्‍यवसाय के तौर पर भवन निर्माण करते थे। बारिस के मौसम में सभी जातियां खेती करती थी क्‍योंकि उस समय प्रति हेक्‍टेयर उत्‍पादन आज जितना नही होता था अत: लगभग सभी जातियां खेती करती थी। सर्दियों में मिट्टि की वस्‍तुए बनती थी।
बांडा कुम्हार _ ये केवल बर्तन और मटके बनाने का व्‍यवसाय ही करते थे। ये मूलत: पश्चिमी राजस्‍थान के नहीं होकर गुजरात और वनवासी क्षेत्र से आये हुए कुम्‍हार थे। इनका रहन सहन भी मारू कुम्‍हार से अलग था। ये दारू मांस का सेवन भी करते थे।
पुरबिये  कुम्हार– ये पूरब दिशा से आने वाले कुम्‍हारों को कहा जाता है  जैसे हाड़ौती क्षेत्र के कुम्‍हार पश्चिमी क्षेत्र में आते तो इनको पुरबिया कहते। ये भी दारू मांस का सेवन करते थे।
जटिया कुम्हार - ये अंशकालिक व्‍यवसाय के तौर पर पशुपालन करते थे। ये पानी की अत्‍यंत कमी वाले क्षेत्र में रहते है वहां पानी और घास की कमी के कारण गाय और भैंस की जगह बकरी और भेड़ पालते है। और बकरी और भेड़ के बालों की वस्‍तुए बनाते थे। इनका रहन सहन भी पशुपालन व्‍यवसाय करने के कारण थोड़ा अलग हो गया था हालांकि ये भी मारू ही थे। इनका पहनावा राइका की तरह होता था।
बाड़मेर और जैसलमेर में पानी और घास की कमी के कारण वंहा गावं में राजपूत भी भेड़ बकरी के बड़े बड़े झुण्‍ड रखते है।
रहन सहन अलग होने के कारण और दारू मांस का सेवन करने के कारण मारू अर्थात स्‍थानीय कुम्‍हार बांडा और पुरबियों के साथ रिश्‍ता नहीं करते थे।
मारू कुम्‍हार दारू मांस का सेवन नहीं करती थे अत: इनका सामाजिक स्‍तर अन्‍य पिछड़ी जातियों से बहुत उंचा होता था। अगर कहीं बड़े स्‍तर पर भोजन बनाना होता तो ब्राहमण ना होने पर कुम्‍हार को ही वरीयता दी जाती थी। इसीलिए आज भी पश्चिमी राजस्‍थान में हलवाई का अधिकतर कार्य कुम्‍हार और ब्राहमण जाति ही करती है।
पूराने समय में आवगमन के साधन कम होने से केवल इतनी दूरी के गांव तक रिश्‍ता करते थे कि सुबह दुल्‍हन की विदाई हो और शाम को बारात वापिस अपने गांव पहुंच जाये। इसलिये 20 से 40 किलोमीटर की त्रिज्‍या के क्षेत्र को स्‍थानीय बोली मे पट्टी कहते थे। वे केवल अपनी पट्टी में ही रिश्‍ता करते थे। परन्‍तु आज आवागमन के उन्‍नत साधन विकसित होने से दूरी कोई मायने नहीं रखती।
कुछ बंधु हास्‍यास्‍पद कुतर्क भी करते है जैसे- कुम्‍हार कभी इतनी बड़ी तादाद में नहीं रहते की गांव के गांव बस जाये। जोधपुर शहर के पास ही गांव है नान्‍दड़ी। इसे नान्‍दीवाल गौत्र के कुम्‍हारो ने बसाया था। आज भी वहां बड़ी संख्‍या कुम्‍हारों की है। एक और गांव है झालामण्‍ड। वह भी कुम्‍हार बहुल आबादी का गांव है। ऐसे कई गांव है। पूर्वी राजस्‍थान में भी है। रूपबास भी ऐसा ही गांव है। ये ऐसा कुतर्क है जो केवल अनजान व्‍यक्ति ही दे सकता है जो कुपमण्‍डुक की तरह केवल एक जगह रहा हो। अौर कुम्‍हार जो मटके बनाते है वे कभी अकेले नहीं रहते। उनकी नियाव जहां मटके आग में पकाये जाते है, वहां सभी कुम्‍हारों के मटके साथ में पकते है और उस न्‍याव पर गांव का जागीरदार कर भी लगाता था।
कुछ लोग एक और हास्‍यास्‍पद तर्क देते है कि कुम्‍हार कारू जाति होने से लगान नहीं देते थे। ये भी इन लो्गों की अज्ञानता और पिछड़ापन और घटिया सोच दर्शाता है। ये भूल जाते है कि कुम्‍भ निर्माण एक शिल्‍पकला है। कुमार/कुम्‍भार ना केवल मिट्टी से कुम्‍भ का निर्माण करता है वरन अन्‍य वस्‍तु भी बनाता है। जैसे ईन्‍ट मूर्तियां और खिलौन एवं अन्‍य सजावटी उत्‍पाद। अत: कुम्‍भकार शिल्‍पकार वर्ग में आता ही नहीं वरन शिल्‍पकार वर्ग का जनक माना जाता है। मिट्टी के उत्‍पाद मुख्‍यतया सर्दियों मे बनाये जाते थे। और मानसून में तो लगभग सभी जातियों कृषि कार्य करती थी। और जो कृषि करते थे उनको लगान देना पड़ता था। सिर्फ ब्राह्मण से लगान नहीं लिया जाता था। और रही बात कुम्‍हारों को शादी ब्‍याह में नेग देने की बात तो  नेग केवल उसी कुम्‍हार को दिया जाता है जिसके घर में चाक होती है और जिसे पूजा जाना होता है। विवाह के अवसर पर चाक पूजन की अनिवार्य रस्‍म होती है। चाक से सृजन होता है और विवाह से वंश वृद्धि होती है अत: चाक को मंगलकारी माना जाता है। इसी चाक की वजह से कुम्‍हार को नेग मिलता है बदले में कुम्‍हार पवित्र कलश देता है। जो कुम्‍हार बर्तन बनाते थे वे सामूहिक तौर पर उनको न्‍याव में पकाते थे, और उस न्‍याव में जागीरदार कर लगाता था।
एक और तर्क है कि रहन सहन अलग होना। राजस्‍थान में जहां हर 12 कोस बाद बोली बदल जाती है तो उसके पीछे रहन सहन और संस्‍कृति का अलग होना ही है। राजस्‍थान के हर राजवंश की भी पगड़ी अलग तरीके की होती थी। हर राज्‍य की बोली अलग अलग होती थी रहन सहन अलग अलग होता था। तो इसका असर सभी जातियों पर दिखना ही था। लेकिन आज कल के लोगो को तो ये भी नहीं मालुम की उनकी परदादी और परदादा किस तरह के वस्‍त्र धारण करते थे। आजकल तो उस तरह के वस्‍त्र ही बड़ी मुस्किल से मिलते है। जोधपुर नागौर की तरफ के क्षेत्र में जाट और कुमार जाति की महिलायें हरा और उसमें लाल और गुलाबी लाइन और चोकड़ी की डिजाइन का मोटा खादी की तरह का कपड़े (स्‍थानीय भाषा में ‘साड़ी’) से बना घाघरा और उपर कुर्ती कांचली कमीज आदि पहनती थी। पुरूष धोती कुरता पहनते थे और हरी पीली सफेद केसरीया और चुनरी का साफा पहनते थे। वही बाड़मेर की तरफ पुरूष लाल रंग की पगड़ी और अंगरखी और धोती पहनते थे जो राईका जाति के पुरूषों के समान होती थी। धोती और पगड़ी बांधने के तरीके में भी अन्‍तर था।
कुमारो/कुम्‍भारों की जनसंख्‍या अधिक होने के कारण ज्‍यादातर ने कई पीढियों पूर्व अन्‍य व्‍यवसाय अपना लिया। कोई खेती करने लगे कोई चूने से चूनाई और भित्ति चित्र का निर्माण करते। वर्तमान में भी नये नये स्‍वरोजगार में लिप्‍त हैं।
अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग कथायें प्रचलित है। कहीं पर शिव पार्वति विवाह की घटना, कहीं पर राणा कुम्‍भा का स्‍थापत्‍य प्रेम, ताे कहीं पर संत कुबाजी को लेकर तो कहीं संत गरवाजी को लेकर कथायें प्रचलित है।
कुछ बन्‍धुओं का ये भी तर्क है कि हम दूसरें राज्‍य में सामान्‍य श्रेणी में आते है इसलिए क्षत्रिय है और कुम्‍हार चूंकि अन्‍य पिछड़ा वर्ग में आता है अत: हम अलग जाति के है। उन बन्‍धुओं को मेरा सुझाव है कि अन्‍य पिछड़ा वर्ग से संबंधित नियम पढे। ऐसा इसलिए होता है कि एक राज्‍य के अ.पि.व. दूसरे राज्‍य में जाने पर सामान्‍य श्रेणी में शामिल होते है। आप कभी दूसरे राज्‍य की भर्ती परीक्षा में केवल सामान्‍य श्रेणी में ही भाग ले सकते है। अब कुमावत शब्‍द की उत्‍पति राजस्‍थान में हुई है और राजस्‍थान से ही कुमावत सरनेम लगाने वाले लोग देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में जाकर बसे है। दूसरे राज्‍य के इतिहास में इस शब्‍द के बारे में ज्‍यादा कुछ उपलब्‍ध नहीं होने कारण और उनको स्‍थानीय ना मानकर राजस्‍थानी माना जाने के कारण अपिव श्रेणी में नहीं रखा गया। जब कि यहीं से जाकर अन्‍य राज्‍य में, जंहा कुम्‍हार प्रजापति शब्‍द प्रचलित है, बसने वाले लोग जाे स्‍वयं को कुम्‍हार कहते थे प्रशासनिक मिली भगत से स्‍वयं को स्‍थानीय बताकर अपिव श्रेणी का और जिस राज्‍य में अनुसूचित जाति में हैं वहां अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र बनवा लिया। हालांकि वंहा बस गये फिर भी वंहा के स्‍थानीय लोगो से रिश्‍ता नहीं करते।
कुछ बन्‍धु राजपूत महासभा की पुस्‍तक का हवाला देते हुए कहते है कि कुमावत कछवाहा राजपूत वंश की एक खाप है। जैसे नाथावत या खंगारोत। यहां में यही कहुंगा कि बिल्‍कुल कुमावत कछवाहा वंश की एक खाप हो सकती है लेकिन खाप होने पर कुमावत का रिश्‍ता कुमावत से ना होकर अन्‍य राजपूत वंश से होगा। जैसे किसी नाथावत का विवाह नाथावत से नहीं होता वैसे ही कुमावत का विवाह कुमावत से नहीं होगा। लेकिन जब कुमावत जाति हो तो कुमावत से रिश्‍ता हो सकता है अत: जो समाज बन्‍धु राजपूत समाज की पुस्‍तक का हवाला देते हैं उन्‍हे अपनी बुद्धि का थोड़ा इस्‍तेमाल करना चाहिए।
कुछ बन्‍धु मरदुशुमारी (जनगणना, census) का हवाला देते है। उनके लिये फिर यही कहना चाहुंगा कि जनगणना में वही आंकड़े होते है जो लोग देते है। अब तक पश्चिमी राजस्‍थान के लोग कुम्‍हार लिखवाते आये है और अगली गणना में कुमावत लिखवाते है तो वही लिखा जायेगा जो लिखवायेंगे। जनगणना में जैन पंथ के लोग धर्म हिन्‍दू लिखवाते आये है। इसलिये जनगणना से पूर्व जैन समाज के लोग कहते भी है कि जनगणना के समय धर्म जैन लिखवाना है हिन्‍दू नहीं। कुमावत शब्‍द का प्रचलन देखा देखी ही शुरू हुआ है। पहले 17 वी सदी में एक ने लगाया बाद में देखा देखी दूसरे भी लगाते गये। और अभी भी देखा देखी लगाते जा रहे है।
कुछ बंधु यह तर्क देते हैं कि मारू कुम्‍हारों में राजपूती नख होते है अत: जरूर राजपूतों से कनेक्‍शन है और उनका कहना है कि नखों के आधार पर भाटों की बात सही प्रतीत होती है कि हमारे पूर्वज राजपूत थे, किसी कारणवश उन्‍होने शिल्‍प कार्य कुम्‍भकला को अपनाया था। मेरा उन बंधुओं के लिये इतना ही कहना है कि कुम्‍हार कुमावत राजकुम्‍हार सभी शिल्‍पी जातियां है ना कि सेवा करने वाली जातियां, इनमें रिश्‍तें करते समय गोत्र ही देखी जाती रही है, और चार गौत्र ही टाली जाती रही है। सेवा करने वाली जातियां अपने राजा के वंश के अनुरूप स्‍वयं का वंश बताती है। अकाल दुर्भिक्ष के समय मेहनत मजदूरी जो भी मिले वो कार्य करने से व्‍यक्ति की जाति का स्‍वरूप नहीं बदलता, शिल्‍पी जातियां सेवा करने वाली जातियों मे तब्‍दील नहीं हो जाती। अत: मेरा बन्‍धुओं से विनम्र अनुरोध है कि राजपूती नख जैसी बातों को भूल कर स्‍वाभिमानी शिल्पियों की तरह केवल गोत्र ही बतायें। सेवा करने वाली जातियों के पास गोत्र नही होती केवल नख होता है।
कुम्हार समाज की कुल देवी श्रीयादे माता है|

रस सिद्धांत ,प्रकार और उदाहरण :Ras theory Hindi literature

 

रस सिद्धांत : साहित्यिक आनंद की परिभाषा

काव्य या साहित्य को पढ़ने‑सुनने या देखने से जो आनंद मिलता है, उसे रस कहा जाता है।

✨ रस के अवयव और अंग

1. भाव

मन के विकारों या आवेगों को भाव कहते हैं।

  • स्थायी भाव (9 प्रकार): रति, उत्साह, विस्मय, हास, शोक, क्रोध, भय, जुगुप्सा, वैराग्य

  • संचारी भाव (33 प्रकार): शंका, चिंता, हर्ष, गर्व आदि

स्थायी भाव और रस का संबंध

स्थायी भावरस
रतिश्रृंगार
उत्साहवीर
वैराग्यशांत
शोककरुण
क्रोधरौद्र
भयभयानक
घृणावीभत्स
विस्मयअद्भुत
हासहास्य
वात्सलतावात्सल्य

2. विभाव

भावों के कारण को विभाव कहते हैं। इसके तीन अंग हैं:

  • आश्रय – जिनके हृदय में भाव जागते हैं

  • आलंबन – प्रमुख व्यक्ति/वस्तु जिससे भाव उत्पन्न होता है

  • उदीपन – प्रेरक तत्व जो भाव जागरण में सहायक हों

3. अनुभाव

भावों की बाहरी अभिव्यक्ति को अनुभाव कहते हैं।

🌸 रसों के प्रकार और उदाहरण

1. श्रृंगार रस

  • संयोग और वियोग दोनों रूपों में प्रेम का रस।

  • उदाहरण: "एक पल मेरे प्रिय के दृग पलक..."

2. वीर रस

  • उत्साह स्थायी भाव से उत्पन्न।

  • प्रकार: युध्यवीर, दानवीर, दयावीर, धर्मवीर।

3. शांत रस

  • संसार के प्रति निर्वेद से उत्पन्न।

4. करुण रस

  • इष्ट की हानि या वियोग से उत्पन्न।

5. रौद्र रस

  • विरोधी के प्रति क्रोध और प्रतिशोध।

6. भयानक रस

  • भय स्थायी भाव से उत्पन्न।

7. वीभत्स रस

  • जुगुप्सा और घृणा से उत्पन्न।

8. अद्भुत रस

  • आश्चर्य और विस्मय से उत्पन्न।

9. हास्य रस

  • हास और विनोद से उत्पन्न।

10. वात्सल्य रस

  • बाल‑रति पर आधारित, माता‑पिता का स्नेह।

✅ निष्कर्ष

रस सिद्धांत भारतीय काव्यशास्त्र का मूल है। भाव, विभाव और अनुभाव के संयोग से ही साहित्यिक आनंद की अनुभूति होती है।

काव्य या साहित्य को पढने-सुनने या देखने से जो आनंद मिलता है, उसे रस कहा जाता है!

रस के अवययो और अंगो पर प्रकाश डालिए!
रस-निष्पति के तिन प्रमुख अवयय है-
1.भाव
2.विभाव
3.अनुभाव
1.भाव
मन के विकारो या आवेगों को भाव कहते है! ये दो प्रकार के होते है-
1.स्थायी भाव
2.व्यभिचारी या संचारी भाव
स्थायी भाव-ये प्रत्येक मनुष्य के ह्रदय में स्थायी रूप से स्थित होते है! कोई भी मनुष्य इनसे
वंचित नहीं है! ये संख्या नौ है-
रति, उत्साह, विस्मय, हास, शोक, क्रोध, भय, जुगुप्सा, बैराग्य!
स्थायी भाव     रस
1.रति           श्रृंगार
2.उत्साह       वीर
3.वैराग्य         शांत
4.शोक          करुण
5.क्रोध           रौद्र
6.भय          भयानक
7.घृणा         वीभत्स
8.बिस्मय    अद्भुत
9.हास        हास्य
10.वत्सलता   वात्सल्य

व्यभिचारी या संचारी भाव: 

ये संख्या में 33 होते है! ये मनोभाव स्थायी ना होकर चंचल होते है
तथा बुलबुलों की तरह उठाते गिरते रहते है! कुछ प्रमुख संचारी भाव निम्न है-
शंका, जड़ता, चिंता, उग्रता, हर्ष, गर्व आदि!

2.विभाव

विभाव का अर्थ है- भावो के कारण! जिन विषय-प्रस्तुतियों के द्वारा मन के स्थायी भाव
जाग्रत होते है, उन्हें विभाव कहते है!
विभाव के तिन अंग है-
आश्रय, आलंबन और उधीपन
1.आश्रय: जिनके ह्रदय में भाव जागते है, उन्हें आश्रय कहते है! ये दो प्रकार के होते है-
1.विभव के अंग:जैसे कहानी में राम को देखकर सीता के मन में प्रेम की अनुभाती हुई!
इसमें सीता आश्रय है! सीता के ह्रदय में प्रेम जाग्रत हुआ! सीता आश्रय विभव है!
2.सहृदय का ह्रदय:कहानी या काव्या को पढने, सुनने या देखने वाला भी आश्रय है! उसके
ह्रदय में सभी भाव जाग्रत होते है!
2.आलंबन:जिस प्रमुख व्यक्ति, वास्तु को देखकर ह्रदय में भाव जागता है, उसे आलंबन कहते है!
3.उधीपन:जिन प्रेरक व्यक्तियों के सहयोग से नुल भाव जागने में सहायता मिली, उन्हें उधीपन कहते है!

3.अनुभाव:

आश्रय की चेस्ठावो को अनुभाव कहते है!

1.श्रृंगार रस-
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नायक-नायिका के प्रेम को देखकर श्रृंगार रस प्रकट होता है! यह सृष्टि का सबसे व्यापक भाव है
जो सभी में पाया जाता है, इसलिए इसे रसराज भी कहा जाता है! इसके दो प्रमुख प्रकार है-
1.संयोग श्रृंगार 2.वियोग श्रृंगार
संयोग श्रृंगार: उदाहरण-
एक पल मेरे प्रिय के दृग पलक, थे उठे ऊपर सहज निचे गिर
चपलता ने इसे विकंपित पुलक से दृढ किया मनो प्रणय सम्बन्ध था!
वियोग श्रृंगार: उदाहरण-
पीर मेरी कर रही गमगीन मुझको
और उससे भी अधिक तेरे नयन का नीर, रानी
और उससे भी अधिक हर पाँव की जंजीर, रानी!
2.वीर रस-
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उत्साह स्थायी भाव जब विभावो अनुभावो और संचारी भावो की सहायता से पुष्ट होकर
आस्वादन के योग्य हो जाता है तब वीर रस निष्पन होता है!
वीर चार प्रकार के मने गए है-
(1)युद्याविर
(2)दानवीर
(3)दयावीर
4)धर्मवीर
इनमे युध्यविर रूप प्रमुख है!
उदाहरण- ‘‘हे सारथे ! हैं द्रोण क्या, देवेन्द्र भी आकर अड़े,
है खेल क्षत्रिय बालकों का व्यूह-भेदन कर लड़े।

3.शांत रस-

जहा संसार के प्रति निर्वेद रस रूप में परिणत होता है वहा शांत रस होता है!
उदाहरण: ऐसेहू साहब की सेवा सों होत चोरू रे।
अपनी न बूझ, न कहै को राँडरोरू रे।।
मुनि-मन-अगम, सुगत माइ-बापु सों।
कृपासिंधु, सहज सखा, सनेही आपु सों।।

4.करुण रस-

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इष्ट की हानि का चिर वियोग अर्थ हानि शोक का विभाग अनुभाव और संचारी भावो के सहयोग
से रस रूप में व्यक्त होता है, उसे करुण रस कहते है!
उदाहरण:
हा सही ना जाती मुझसे
अब आज भूख की जवाला !
कल से ही प्याश लगी है
हो रहा ह्रदय मतवाला!
सुनती हु तू राजा है
मै प्यारी बेटी तेरी!
क्या दया ना आती तुझको
यह दशा देख कर मेरी!

5.रौद्र रस 

जहा विरोधी के प्रति प्रतिशोध एवं क्रोध का भाव जाग्रत हो, वहा रौद्र रस होता है!
उदाहरण:
श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन छोभ से जलने लगे!
सब शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे!
संसार देखे अब हमारे शत्रु रन में मृत पड़े!
करते हुए यह घोषणा हो गए उठकर खड़े!!

6.भयानक रस-Image result for भयानक रस-
जहा भय स्थायी भाव पुष्ट और विकशित हो वहा भयानक रस होता है!
उदाहरण:
एक ओर अजग्रही लखी, एक ओर मृगराय!
विकल बटोही बिच ही, परयो मूर्छा खाय!!

7.वीभत्स रस-

Image result for वीभत्स रस-
जहा किसी वास्तु अथवा दृश्य के प्रति जुगुप्सा का भाव परिप्रुष्ट हो, वहा वीभत्स रस होता है!
उदाहरण:
सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खाक निकारत!
खींचत जिभाही स्यार अतिहि आनंद उर धारत!!
गीध जांघि को खोदी-खोदी के मांश उपारत!
स्वान अंगुरिन काटी-काटी के खात विदारत!!

8.अद्भुत रस-
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आश्चर्जनक एवं विचित्र वास्तु के देखने व सुनने जब सब आश्चर्य का परिपोषण हो, तब अद्भुत
रस की प्रतीति होती है!
उदाहरण:
अखील भुवन चर अचर सब, हरी मुख में लखी मातु!
चकित भई गदगद वचन, विकशित दृग पुल्कातु!!

9.हास्य रस-
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विलक्षण विषय द्वारा जहा हास्य का विस्तार एवं पोषण हो, वहा हास्य रस होते है!
उदाहरण:
लाला की लाली यो बोली-
सारा खाना ये चर जायेंगे!
जो बचे भूखे बैठे है
क्या पंडित जी को खायेंगे!!

10.वात्सल्य रस-

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संस्कृत आचार्यो ने केवल नौ रासो को ही मान्यता दी है! कुछ आधुनिक विद्वान वात्सल्य और
भक्ति रस को भी मानते है! उनके अनुसार-बाल-रति के आधार पर क्रमशः वात्सल्य और भक्ति
रस का प्रकाशन होता है!
उदाहरण:
बाल दशा मुख निरखि जसोदा पुनि पुनि नन्द बुलावति!
अंचरा तर तै ढंकी सुर के प्रभु को दूध पियावति!!