साहित्य मनीषी डॉ. दयाराम आलोक की जीवन यात्रा
जन्म
आर्य समाज की निर्मल धारा, पूरालाल राठौर कुल पावन।
ग्यारह अगस्त सन् चालीस में, जन्मे आलोक नाम मनभावन।।
परिवार
छह भाई तीन बहिन संग, परिवार विशाल था भारी।
पिता का रेडीमेड वस्त्रों का, कारोबार पर दशा थी खस्ता सारी।
निर्धनता में पले-बढ़े पर, संस्कारों में कमी न आई।
सेवा धर्म
शासकीय शिक्षक बनकर तुमने, शिक्षा-दीप जलाया।
अक्षर-अक्षर ज्ञान बाँटकर, भावी पीढ़ी को चमकाया।।
शिक्षा
एम.ए. की उपाधि संग, आयुर्वेद रत्न सम्मान।
डी.आई.होम लंदन तक अर्जित, किया ज्ञान का गौरव गान।।
काव्य साधना
डेढ़ सौ से अधिक कविताएँ, पत्र-पत्रिका में छाई।
कलम के साहित्य मनीषी ने, भावों की गंगा बहाई।।
समाज सेवा का शंखनाद
डग के दर्जी मंदिर में, सन् छियासठ बना मिसाल
मूर्ति प्रतिष्ठा का विराट उत्सव, रच डाला इतिहास विशाल।।
सामूहिक विवाह
सामूहिक विवाह की नींव धरी, रामपुर में प्रथम आयोजन।
इक्यासी में किया साकार, फिर बोलिया में स्ववित्त पोषण।
कितने घर बसाए तुमने, बिना लिए कुछ दान।।
निष्काम दान
मंदिर, मुक्तिधाम, गौशाला, विद्यालयों के द्वार।
सात सौ से अधिक सीमेंट बेंचें, बाँटा मुक्त हस्त से प्यार।
नकद दान से संस्थाओं को, दिया नव-विकास आधार।।
वंशावली और इतिहास लेखन
पन्द्रह हजार नामों की वंशावली, दर्जी समाज की लिख डाली।
अंतरजाल पर सुलभ कराई, धरोहर अनुपम निराली।
जाति इतिहास के शोध लेखक, यूट्यूब पर ज्ञान की लड़ी।
सैंकड़ों जातियों का इतिहास, तुमने खोज-खोज कर गढ़ी।।
आयुर्वेद और जनसेवा
पचास वर्षों का अनुभव भर, आयुर्वेद लेख सैंकड़ों बनाए।
वेबसाइट पर सुलभ कराए, जन-जन को रोग-मुक्त कराए।
सेवा-निवृत्ति बाद भी रुके नहीं, भाजपा बोलिया नगर अध्यक्ष कहलाए।
जिला अध्यापक प्रकोष्ठ के महामंत्री बन, संगठन धर्म निभाए।।
वर्तमान और अतृप्त अभिलाषा
आज भी चार-पाँच घंटे, सोशल मीडिया पर सेवा जारी।
तन अशक्त है किंतु मन में, लोकहित की लगन है भारी।।
श्लोक
देहदान संकल्प
मरणोपरान्तम् देहदानं, मम अन्तिमं अभिलाषितम्।
परार्थाय शरीरमस्तु, इति मे निश्चयं कृतम्।।
अशक्त तन, अटल मन
शरीरं क्षीणं अशक्तं च, तथापि मनः सशक्तकम्।
समाजकार्ये उपस्थितिः, उत्कटेच्छा गरीयसी।।
पुत्र पर विश्वास
पुत्रो मे अनिलः सुयोग्यः, दामोदरालय संचालकः।
ममातृप्ताभिलाषाणां, पूरकः स भविष्यति।।
प्रभु कृपा
षडशीति वर्षाणि पूर्णानि, परमात्म कृपा-प्रसादतः।
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं, लब्ध्वा जीवनम् उत्तमम्।।
अधुना जीवनं समेटुं, उत्कण्ठा प्रबला मम।
ईश्वरेच्छा बलीयसी, तस्यै नित्यं नमो नमः।।

