बालाजी मंदिर, ढाबला खींची - आस्था, सेवा और आध्यात्मिक दान-पथ का संगम
राजस्थान के झालावाड़ जिले का शांत और पवित्र ग्राम ढाबला खींची सनातन संस्कृति की एक अनुपम धरोहर को अपने आँचल में समेटे हुए है। यहाँ स्थित श्री बालाजी मंदिर केवल एक मंदिर नहीं, अपितु क्षेत्र के हजारों धर्मावलंबियों की अटूट आस्था का केंद्र है।
मंदिर का विशाल प्रांगण आकर्षक टाइल्स से सुशोभित है, जहाँ श्री बालाजी की मनोहारी प्रतिमा के दर्शन कर भक्तों का मन श्रद्धा और शांति से भर जाता है। इस पवित्र धाम के संरक्षक व प्रबंधक के रूप में सरपंच श्री लाखन सिंह जी निरंतर सेवा में रत हैं, जिनके प्रयासों से मंदिर व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो रही है। मंदिर के शुभचिंतक श्री मोहन लाल जी टेलर (चौहान) का सहयोग भी अतुलनीय है। मंदिर में होने वाले प्रत्येक उत्सव और धार्मिक आयोजन को श्री दिलीप जी चौहान अपनी निःशुल्क वीडियोग्राफी के माध्यम से कैमरे में कैद कर भक्तों तक पहुँचाते हैं, यह विडियो उन्हीं के सौजन्य से है।
भक्तों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए, इस पावन स्थल पर एक अत्यंत आवश्यक कार्य संपन्न हुआ।
दिनांक 10/01/2023 को शामगढ़ के दामोदर पथरी अस्पताल के माध्यम से डॉ. आलोक जी द्वारा श्री बालाजी मंदिर, ढाबला खींची में भक्तों के बैठने हेतु सीमेंट कुर्सियों / बेंच व्यवस्था भेंट की गई।
वृद्ध, महिलाओं और दूर-दराज से आने वाले यात्रियों के लिए यह बैठक व्यवस्था एक बड़ी सुविधा सिद्ध हुई है। इस पुनीत कार्य के लिए सरपंच महोदय ने हृदय से आभार व्यक्त किया।
ढाबला खींची गाँव में, बालाजी का धाम,
भक्तों की आस्था यहाँ, जग में लेती नाम।
डॉ. आलोक ने दान दिया, बेंचों का उपहार,
बैठक सुविधा से हुआ, मंदिर का विस्तार।
सरपंच लाखन सिंह जी, मंदिर के रखवाले,
सेवा भाव से सजाए, प्रांगण टाइलों वाले।
मोहन लाल टेलर जी, शुभचिंतक महान,
सहयोग से मंदिर हुआ, और भी सम्मान।
दिलीप चौहान कैमरे से, उत्सव करे उजागर,
हर दृश्य को कैद कर, भक्तों को दे सागर।
दानदाता का पुण्य पथ, समाज में फैला दूर,
आलोक जी की सेवा से, मंदिर हुआ भरपूर।
मंदसौर से रतलाम तक, दान की गाथा गाई,
गौशालाएँ, मुक्ति धाम, सेवा की छवि छाई।
पेंशन धन समर्पित कर, आलोक बने प्रकाश,
जनकल्याण की राह में, जग में फैला विश्वास।
श्लोक -
लाखनसिंहः सरपञ्चो, रक्षकोऽस्य देवालये।
मोहनलालः शुभेच्छुः, सेवायां नित्यसन्नतः॥
आलोकस्य महादानं, बञ्चकानां प्रदाय च।
भक्तानां सुखसंपन्नं, धर्ममार्गप्रवर्तकम्॥
ढाबलाखींचिग्रामेऽस्मिन्, बालाजी देवमन्दिरे।
दानं दामोदरालयात्, पुण्यकीर्तिर्विराजते॥
शामगढ़ का आध्यात्मिक दान-पथ
यह बेंच व्यवस्था कोई एकल घटना नहीं, बल्कि साहित्य मनीषी, सेवानिवृत्त अध्यापक डॉ. दयाराम जी आलोक, शामगढ़ द्वारा चलाए जा रहे विराट 'आध्यात्मिक दान-पथ' का एक हिस्सा है।
इस दान-पथ की प्रमुख विशेषताएँ हैं -
1. सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण में समर्पित करने का पवित्र संकल्प लिया है।
2. व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह कार्य केवल एक गाँव तक सीमित नहीं। राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, झालावाड़, आगर, नीमच, रतलाम, झाबुआ जिलों के मंदिरों, गौशालाओं और मुक्ति धामों में वे निरंतर योगदान दे रहे हैं।
3. सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे दिखावे पर नहीं, बल्कि आम जन की मूलभूत आवश्यकता पर ध्यान देते हैं। मंदिरों में सीमेंट बेंचें, मुक्ति धाम में बैठक व्यवस्था और रंग-रोगन जैसी सुविधाएँ इसका प्रमाण हैं।
4. स्व-वित्तपोषित मॉडल: यह संपूर्ण दान उनकी स्वयं की पेंशन और उनके ब्लॉग व यूट्यूब चैनल से प्राप्त गूगल आय पर आधारित है - तकनीक का परोपकार के लिए सदुपयोग।
5. निरंतरता और पारदर्शिता: अब तक वे 151 से अधिक संस्थानों में अपना सहयोग प्रदान कर चुके हैं और प्रेरणा हेतु दान स्थल पर शिलालेख भी लगवाते हैं, ताकि अन्य लोग भी प्रेरित हो सकें।
ढाबला खींची के बालाजी मंदिर में की गई यह बेंच व्यवस्था उसी प्रकाशपुंज की एक किरण है, जो बताती है कि सच्चा धर्म केवल पूजा में नहीं, अपितु जन-सुविधा और सेवा में भी है।
मंदिर के प्रमुख कार्यकर्ता -
मोहन लाल जी चौहान टेलर
फोटो और विडियो - दिलीप जी चौहान के सौजन्य से
मंदिर प्रबंधन - सरपंच लाखन सिंह जी
यह विडियो दिलीप टेलर, ढाबला खींची के सौजन्य से।
ढाबला खींची जिला झालावाड के
श्री बालाजी मंदिर में
दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ द्वारा
बेंच व्यवस्था
मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के
मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु
साहित्य मनीषी
डॉ.दयाराम जी आलोक

का
आध्यात्मिक दान पथ
डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।
व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।
सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।
स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।
निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।
पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।
यूट्यूब विडिओ की प्लेलिस्ट -


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