ढाबला खींची जिला झालावाड के
श्री बालाजी मंदिर में
दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ द्वारा
बेंच व्यवस्था
काव्यात्मक छंद
छंद 1 ढाबला खींची गाँव में, बालाजी का धाम, भक्तों की आस्था यहाँ, जग में लेती नाम। डॉ. आलोक ने दान दिया, बेंचों का उपहार, बैठक सुविधा से हुआ, मंदिर का विस्तार।
छंद 2 सरपंच लाखन सिंह जी, मंदिर के रखवाले, सेवा भाव से सजाए, प्रांगण टाइलों वाले। मोहन लाल टेलर जी, शुभचिंतक महान, सहयोग से मंदिर हुआ, और भी सम्मान।
छंद 3 दिलीप चौहान कैमरे से, उत्सव करे उजागर, हर दृश्य को कैद कर, भक्तों को दे सागर। दानदाता का पुण्य पथ, समाज में फैला दूर, आलोक जी की सेवा से, मंदिर हुआ भरपूर।
छंद 4 मंदसौर से रतलाम तक, दान की गाथा गाई, गौशालाएँ, मुक्ति धाम, सेवा की छवि छाई। पेंशन धन समर्पित कर, आलोक बने प्रकाश, जनकल्याण की राह में, जग में फैला विश्वास।
श्लोक -
लाखनसिंहः सरपञ्चो, रक्षकोऽस्य देवालये। मोहनलालः शुभेच्छुः, सेवायां नित्यसन्नतः॥ आलोकस्य महादानं, बञ्चकानां प्रदाय च। भक्तानां सुखसंपन्नं, धर्ममार्गप्रवर्तकम्॥ ढाबलाखींचिग्रामेऽस्मिन्, बालाजी देवमन्दिरे। दानं दामोदरालयात्, पुण्यकीर्तिर्विराजते॥
राजस्थान के झालावाड़ जिले का ग्राम ढाबला खींची
यहाँ का बालाजी का मंदिर सनातन धर्मावलंबियों की आस्था का केंद्र है।
विशाल प्रांगण टाइल्स से सुशोभित है। बालाजी की प्रतिमा मनोहारी है।
सरपंच लाखन सिंह मंदिर के संरक्षक व प्रबंधक हैं ।
मोहन लाल जी टेलर मंदिर के शुभचिंतक हैं ।
दिलीप जी चौहान मंदिर मे होने वाले उत्सवों की निशुल्क videography करते हैं .
मंदिर मे भक्तों की बैठक सुविधा के मध्येनजर शामगढ़ के डॉ . आलोक ने बेंच व्यवस्था की है।
सरपंच महोदय ने आभार व्यक्त किया ।
मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के
मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु
साहित्य मनीषी
डॉ.दयाराम जी आलोक
शामगढ़ का
आध्यात्मिक दान पथ
डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।
व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।
सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।
स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।
निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।
पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।
यूट्यूब विडिओ की प्लेलिस्ट -



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