लोकसखा पर पढ़ें सटीक जाति इतिहास, पौराणिक कथाएं, मंदिर दर्शन और डॉ. आलोक द्वारा मुक्तिधाम व गौशालों को दान किए गए बेंच व नकद सहयोग की पूरी जानकारी। सनातन आध्यात्म -जाति इतिहास-दान विमर्श : 02.23

28.2.23

मोची समाज की जानकारी और इतिहास :Mochi samaj history


मोची समाज का इतिहास विडिओ-



परिचय / इतिहास

मोची समाज के लोग चमड़े का काम करने वाले या जूते बनाने वाले होते हैं. मोची शब्द संस्कृत के 'मुञ्चक' या फ़ारसी के 'मोजा' और 'ई' से मिलकर बना है, जिसका मतलब है छुड़ाना. मोची समाज के लोग कई जातियों के गांवों में रहते हैं, लेकिन अपने अलग-अलग क्वार्टर में रहते हैं. हरियाणा के मोची का दावा है कि वे राजस्थान से पलायन करके आए हैं और मुख्य रूप से अंबाला के छावनी शहर में पाए जाते हैं. वे अभी भी ब्रजभाषा बोलते हैं और अंतर्जातीय विवाह करते हैं. फैक्ट्री निर्मित जूतों के प्रसार के साथ मोची का पारंपरिक व्यवसाय कम हो गया है. बड़ी संख्या में मोची भूमिहीन कृषि मजदूर हैं, जिनमें से कुछ अन्य व्यवसायों को अपना रहे हैं. मोची समाज को अनुसूचित जाति में रखा गया है और सकारात्मक कार्रवाई द्वारा समर्थित किया जाता है.
 मोची जाति को कुछ लोग चमार जाति की एक शाखा मानते हैं, लेकिन मोची ने इसे अस्वीकार कर दिया है, वे खुद को चमार से उच्च दर्जे की एक अलग जाति मानते हैं। चमार लोग खाल को संसाधित करते हैं, जबकि मोची इस कच्चे उत्पाद से चमड़े के उत्पाद बनाते हैं। अतीत में, कुछ मोची सड़े हुए मांस को हटाने और हड्डियों और खाल को बेचने में शामिल थे। मोची उपसमूहों और कुलों में विभाजित हैं, और उपसमूहों के बीच एक सामाजिक रैंकिंग प्रणाली है।
मोची लोग मुख्य रूप से भारत और बांग्लादेश में रहते हैं, लेकिन नेपाल और पाकिस्तान में भी छोटे समुदाय हैं।

उनका जीवन किस जैसा है?

चमड़े के उत्पाद बनाने के साथ-साथ मोची ईंटें और टोकरियाँ भी बनाते हैं। साल के एक निश्चित समय में, मोची परिवारों में सभी ईंटें बनाते हैं। हालाँकि, केवल पुरुष ही टोकरियाँ बनाते हैं। वे अपनी टोकरियाँ बेचने और दूसरे लोगों के खेतों में मज़दूर के रूप में काम करने जैसी आर्थिक गतिविधियों के ज़रिए दूसरे समुदायों से नियमित संपर्क में रहते हैं।
मोची लोगों की कुछ बुरी स्वास्थ्य आदतें हैं जैसे सूअर का मांस खाना, धूम्रपान करना, पान चबाना और पुरुषों के मामले में शराब पीना।

उनकी मान्यताएं क्या हैं?

मोची लोग हिंदू धर्म का पालन करते हैं, जो भारत का प्राचीन धर्म है। हिंदू धर्म दक्षिण एशिया के स्थानीय धर्मों के लिए एक व्यापक मुहावरा है, इसलिए यह बहुत विविध है। लोकप्रिय स्तर पर, हिंदू हिंदू देवताओं की पूजा और सेवा करते हैं। वे हिंदू मंदिरों में जाते हैं और सुरक्षा और लाभ प्राप्त करने की उम्मीद में अपने देवताओं को प्रार्थना, भोजन, फूल और धूप चढ़ाते हैं। ईसाई या यहूदियों की तरह उनका अपने देवताओं के साथ कोई व्यक्तिगत या पारिवारिक संबंध नहीं है। ऐसे अन्य हिंदू भी हैं जो बहुत अधिक दार्शनिक हैं, खासकर ब्राह्मणों में।
लगभग सभी हिंदू होली, रंगों का त्योहार और वसंत की शुरुआत / दिवाली, रोशनी का त्योहार / नवरात्रि, शरद ऋतु का उत्सव / और राम नवमी, राम के जन्मदिन जैसे वार्षिक उत्सवों में भाग लेते हैं।मोची दक्षिण एशिया में पाया जाने वाला एक व्यवसायिक जाति समुदाय है. चमड़े के जूते बनाना इनका पारंपरिक कार्य रहा है. ऐतिहासिक रूप से यह समुदाय चमड़े के सुरक्षात्मक शिल्प के निर्माण में शामिल था. सैनिकों के लिए सुरक्षात्मक चमड़े के कपड़े निर्माण में शामिल होने के कारण यह समुदाय सेना के साथ निकटता से जुड़ा हुआ था. जूता निर्माण करना इनका पारंपरिक व्यवसाय था, लेकिन कारखानों में निर्मित जूतों के प्रसार के कारण इनके पारंपरिक व्यवसाय में गिरावट आई है. वर्तमान में अधिकांश मोची ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं, और स्थानीय रूप से प्रभावशाली जातियों पर निर्भर हैं. यह खेतिहर मजदूरों के रूप में काम करते हैं. इन्हें रोजी-रोटी की तलाश में शहरी क्षेत्रों में पलायन करना पड़ता है. यह अन्य व्यवसायों भी अपनाने लगे हैं. 
आइए जानते हैं मोची समाज का इतिहास, 
मोची ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ मुञ्चक या फा़॰ मोजा (= जूता) + ई (प्रत्य॰) (= चमड़ा) छुड़ाना] चमड़े का काम बनानेवाला । वह जो जूते आदि बनाने का व्यवसाय करता हो ।


पाटनवाडा  गुजराती मोची समाज की महिलाएं 

मोची किस कैटेगरी में आते हैं?

गुजरात में, मोची (हिंदू) जाति को बक्शीपंच में ओबीसी के रूप में वर्गीकृत किया गया है. उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मोची को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. भारत के कई राज्यों में इन्हें अनुसूचित जाति (scheduled caste) के रूप में वर्गीकृत किया गया है.

मोची की जनसंख्या, कहां पाए जाते हैं?

यह मुख्य रूप से भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में पाए जाते हैं. भारत में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और गुजरात में पाए जाते हैं. पंजाब में यह व्यापक रूप से पाए जाते हैं और लगभग हर जिले में निवास करते हैं. हरियाणा के मोची राजस्थान से पलायन करने का दावा करते हैं. यह मुख्य रूप से अंबाला के छावनी शहर में पाए जाते हैं.


बांसवाडा में मोची समाज की महिलाऐं एक सामाजिक उत्सव में 

मोची किस धर्म को मानते हैं?

धर्म से यह हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई या बौद्ध हो सकते हैं. भारत में पाए जाने वाले ज्यादातर मोची हिंदू धर्म का अनुसरण करते हैं. मुस्लिम मोची भी पहले हिंदू थे जो 14 वीं मई और 16 वीं शताब्दी के बीच धर्म परिवर्तन करके मुसलमान हो गए. विभाजन के पूर्व पंजाब के अधिकांश मोची को जबरन इस्लाम में परिवर्तित कर दिया गया था. मुस्लिम मोची पूरे उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं, लेकिन लखनऊ और फैजाबाद जिलो में इनकी अधिक एकाग्रता है. यह सुन्नी इस्लाम का अनुसरण करते हैं. अन्य मुसलमानों की तरह, यह बरेलवी और देवबंदी विभाजन में विभाजित हैं. हिंदी, अवधी और उर्दू भाषा बोलते हैं. पाकिस्तान और बांग्लादेश में पाए जाने ज्यादातर मोची मुस्लिम हैं.
  मोची समाज छोटा होने के बावजूद अनुशासन और अपनी धार्मिक भावना में अग्रणी है। यहां पर समाज में किसी भी प्रकार के विवाद को समाज के पंचों के माध्यम से निपटाया जाता है। करीब 95 प्रतिशत को समाज स्तर पर ही सुलझाया गया है। समाज अध्यक्ष नानुराम मोची, कोषाध्यक्ष शिवराम मोची, सचिव शिवराम मोची और संरक्षक बसंतलाल मोची हैं। समाज के समक्ष सास-बहू, ननद-भाभी और पिता पुत्र जैसे मामले भी आए हैं। इन्हें समाज स्तर पर निपटारा कराया गया है। कई मामलों मे कोर्ट के निर्णय से पहले राजीनामा कर समाज की मुख्यधारा से लोगों को जोड़ने का प्रयास किया गया है। समाज के 16 गांवों के चौखला स्तर पर मामले को निपटाने के लिए सहयोग लिया जाता है। समाज के लोग कुवैत में ज्यादा रोजगाररत हैं। ऐसे में समाज एकरूपता और अनुशासन के साथ विकास कर रहा है। हर 1 तारीख को मासिक बैठक का आयोजन होता है। इसमें समाज में किसी भी प्रकार विवाद उसी समय पंचों के सामने सुलझाया जाता है। जिसे पूरा समाज स्वीकार करता है। समाज में परिवारों के विवाद निपटारे के साथ ही शराबबंदी पर भी सख्ती की गई है। समाज के किसी भी प्रोगाम में शराब पर रोक लगा रखी है। समाज में सरकारी नौकरी के साथ ही व्यापार में भी अव्वल है।

मोची शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

मोची संस्कृत के शब्द मोचिका से बना है, जिसका अर्थ होता है- मोची या जूता बनाने वाला (cobbler). परंपरागत रूप से यह गांव में जूता बनाने का कार्य करते थे. मूल रूप से चमार जाति से संबंध रखते हैं. यह मूल रूप से चमार जाति की एक शाखा हैं.
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे।


20.2.23

"माँ बगलामुखी शक्तिपीठ: समाजसेवी डॉ. आलोक का आध्यात्मिक दान-पथ"



जय माँ बगलामुखी पीताम्बरा!


 सेवा, श्रद्धा और त्याग का त्रिवेणी संगम


भारत की मध्यप्रदेश की पावन धरा पर, आगर-मालवा से लगभग 30 किलोमीटर और सुसनेर नगर से 26 किलोमीटर दूर, लखुंदर नदी के तट पर बसा है एक ऐसा चमत्कारी धाम - माँ बगलामुखी पीताम्बरा महाशक्तिपीठ, नलखेड़ा।

यह केवल एक मंदिर नहीं है। यह वह सिद्ध-पीठ है जहाँ सत्ता के शिखर पर बैठे राजनेता से लेकर जीवन के अंतिम छोर पर खड़ा सामान्य जन तक, सभी शीश झुकाने आते हैं। जहाँ तंत्र-साधना के साधक मौन में सिद्धि खोजते हैं, तो वहीं नवरात्रि के पावन पर्व पर आस्था का ऐसा जन-सैलाब उमड़ता है कि इस पुण्यभूमि का प्रांगण छोटा पड़ जाता है। शासन द्वारा करोड़ों की लागत से निर्मित यहाँ का नवनिर्मित गोलाकार विश्राम-शेड और उसका निखरा हुआ रंग-रोगन इस दिव्यता को और भी आलोकित करता है, जिसका समस्त प्रबंधन तहसीलदार महोदय के दिशा-निर्देश और कार्यालय प्रबंधक श्री विनोद जी गवली के कुशल सहयोग से संचालित होता है।

ऐसी ही पुण्यभूमि पर, दर्शनार्थियों के थके चरणों को विश्राम देने का एक छोटा सा, पर भाव से भरा हुआ सेवा-संकल्प आकार लेता है।

समाजसेवी, साहित्य मनीषी, सेवानिवृत्त अध्यापक डॉ. दयाराम जी आलोक, शामगढ़ द्वारा अपने संकल्पित 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत इस महाशक्तिपीठ में 12 सीमेंट की बेंचें और 10,000 रुपये नकद सहित कुल 51,000 रुपये का दान समर्पित किया गया है।

यह दान ईंट और सीमेंट का केवल हिसाब नहीं है। यह एक शिक्षक की पेंशन से निकला हुआ त्याग है। डॉ. आलोक जी अपनी पाँच वर्ष की सम्पूर्ण पेंशन राशि को राजस्थान और मध्यप्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जिलों के 151 से अधिक मंदिरों, मुक्तिधामों और गौशालाओं में विश्राम हेतु बेंचों और निर्माण कार्य हेतु समर्पित करने के विराट अनुष्ठान पर हैं। इस यज्ञ में उनके ब्लॉग और YouTube चैनल से प्राप्त Google की समस्त आय भी आहुति बन रही है। और इस समस्त पुण्य का उत्सर्ग हो रहा है उनके सुपुत्र डॉ. अनिल कुमार राठौर, दामोदर पथरी अस्पताल, शामगढ़ के नाम।

इस सेवा की स्मृति को चिरस्थायी बनाने और अन्य भक्तों में दान-प्रेरणा जगाने हेतु, तहसीलदार आदरणीय श्री पारस जी की अनुमति एवं श्री विनोद जी गवली के सहयोग से, दान-पट्टिका को दिनांक 19/02/2023 को अखंड रामायण पाठ-भवन की दीवार पर स्थापित किया गया है। उस शिलालेख पर अंकित नाम अब प्रत्येक आने वाले यात्री को कह रहा है - बैठो, विश्राम करो, और सेवा-पथ पर आगे बढ़ो।

आइये, इस त्याग, श्रद्धा और सेवा से बुने हुए दान-पथ की इस भावपूर्ण यात्रा का दर्शन, चित्रों और चल-चित्रों की झलक के साथ करते हैं, और माँ पीताम्बरा से यही प्रार्थना करते हैं -

सेवा, श्रद्धा, त्याग का संगम,
दान-पथ बने धर्म का आलम।

जय माँ बगलामुखी पीताम्बरा !

मध्यप्रदेश की पावन धरा नलखेड़ा में स्थित माँ बगलामुखी का यह महाशक्तिपीठ केवल एक मंदिर नहीं, आस्था का वह केंद्र है जहाँ देश के कोने-कोने से, बड़े-बड़े राजनेताओं से लेकर सामान्य भक्त तक, अपनी मनोकामना लेकर आते हैं। आगर-मालवा से 30 किमी दूर स्थित इस चमत्कारी धाम में नवरात्रि पर तो जन-सैलाब उमड़ पड़ता है।
इसी पुण्यभूमि पर यात्रियों और दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए एक छोटा सा सेवा-प्रयास किया गया है।
समाजसेवी, साहित्य मनीषी, सेवानिवृत्त अध्यापक डॉ. दयाराम जी आलोक, शामगढ़ द्वारा अपने संकल्पित आध्यात्मिक दान-पथ के अंतर्गत माँ बगलामुखी शक्तिपीठ में दर्शनार्थियों के विश्राम हेतु 12 सीमेंट बेंचें और 10,000 रुपये नकद सहित कुल 51,000 रुपये का दान समर्पित किया गया है।
यह दान केवल ईंट-सीमेंट का दान नहीं, यह पेंशन से निकला त्याग है। डॉ. आलोक जी अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को राजस्थान और मध्यप्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जिलों के 151 से अधिक मंदिरों, मुक्तिधामों और गौशालाओं में बेंचों और निर्माण हेतु समर्पित कर रहे हैं। उनके ब्लॉग और YouTube से प्राप्त राशि भी इसी पुण्य कार्य में लग रही है। यह समस्त दान उनके सुपुत्र डॉ. अनिल कुमार राठौर, दामोदर पथरी अस्पताल, शामगढ़ के नाम से समर्पित है।
तहसीलदार आदरणीय श्री पारस जी की अनुमति एवं कार्यालय प्रबंधक श्री विनोद जी गवली के सहयोग से इस सेवा की स्मृति स्वरूप दान-पट्टिका को अखंड रामायण पाठ-भवन की दीवार पर स्थापित किया गया है, ताकि इसे देखकर अन्य भक्त भी दान-पथ पर प्रेरित हो सकें।
आइये, इस दान-यात्रा की भावपूर्ण झलक, तस्वीरों और वीडियो के साथ दर्शन करते हैं और माँ पीताम्बरा से प्रार्थना करते हैं -
सेवा, श्रद्धा, त्याग का संगम,
दान-पथ बने धर्म का आलम।
जय हो माँ बगला मुखी !

माँ बगलामुखी पीतांबरा शक्तिपीठ हेतु

यात्रियों ,दर्शनार्थियों की बैठक सुविधा के लिए

समाजसेवी डॉ .आलोक शामगढ़ द्वारा

सीमेंट बेंचें और नकद दान


पीताम्बरा माँ के दरबार में, श्रद्धा की गूँज है अपार में। नलखेड़ा की पावन भूमि पर, भक्तों का स्नेह है हर क्षण स्वर।

सीमेंट बेंचें बनीं विश्राम हेतु, दान-पट्टी चमके धर्म के वेतु। डॉ. आलोक का संकल्प महान, पेंशन समर्पित, सेवा का दान।

रामायण भवन की दीवार पे, शिलालेख जगमगाए उजियार पे। भक्त जन बैठें सुख से यहाँ, माँ बगला मुखी दें आशीर्वाद जहाँ।

सेवा, श्रद्धा, त्याग का संगम, दान-पथ बने धर्म का आलम। जय हो माँ की कृपा अपार, भक्तों का जीवन हो सदा साकार।

दान के श्लोक -

श्लोक १
दानं महादानमिदं महात्मा, भक्तानुकम्पा परमार्थ साध्या। 
आलोक दयाराम कृपानिधानं, सुवर्णस्मृति स्थिरमस्तु लोके॥

श्लोक २
माँ बगलामुख्याः कृपानुग्रहेण, नलखेड़ायां पुण्यभूमिरेषा। 
विनोद गवली व्यवस्थायुक्तं, दानपट्टेन प्रेरणा जनानाम्॥

श्लोक ३
सुविधा सम्मानमिदं प्रदत्तं, भक्तजनानां सुखसंपदर्थम्।
 यः पश्यति दानपट्टं समृद्धं, स प्रेरितो धर्ममार्गे प्रवृत्तः॥

श्लोक ४ दानं यशः कीर्तिमिदं प्रदत्तं, भक्तजनानां सुखसंपदर्थम्। आलोक दयाराम धर्मपथेन, प्रेरयति लोकं सत्कर्मयुक्तम्॥

श्लोक ५ माँ बगलामुख्याः कृपानुग्रहेण, भक्तजनानां मनोकामनाः सिद्धाः। नलखेड़ायां पुण्यभूमिरेषा, दान-पथेन धर्ममार्गः प्रदीप्तः॥

श्लोक ६ सुवर्णस्मृति स्थिरमस्तु लोके, आलोक दानं भवतु प्रेरणाय। भक्तजनानां सुखसमृद्ध्यर्थं, जयति धर्मः जयति श्रद्धाय॥


बगलामुखी मंदिर नलखेड़ा, मध्य प्रदेश एक बहुत ही पवित्र और चमत्कारी धर्म स्थल है, जहां देश के कोने-कोने से लोग दर्शन और पूजा-पाठ के लिए आते हैं। यह मंदिर आगर मालवा से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है और यहां बड़े-बड़े राजनेताओं, कलाकारों, तांत्रिकों का आना-जाना लगा रहता है।
नवरात्रि के पर्व के समय तो यहां दर्शनार्थियों की भीड़ को संभालने में अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है, और  यहां आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस मंदिर का प्रबंधन तहसीलदार साहेब के निर्देशों के मुताबिक होता है और विनोदजी गवली यहां के मैनेजर हैं।
मंदिर के विकास के लिए शासन ने करोड़ों रुपये स्वीकृत किए हैं, जिससे यहां एक सुंदर गोलाकार  शेड बनाया गया है और रंग-रोगन से स्थान की खूबसूरती बढ़ गई है। समाज सेवी डॉ. दयाराम जी आलोक ने मध्य प्रदेश और राजस्थान के चयनित मंदिरों को नकद दान और दर्शनार्थियों के विश्राम करने के लिए सीमेंट की बेंचें भेंट करने के आध्यात्मिक दान पथ के तहत इस मंदिर के लिए 51 हजार का दान समर्पित किया है।
इस दान में 12 सीमेंट की बेंचें और 10 हजार नकद दान शामिल हैं और दान दाता का शिलालेख लोगों को दान हेतु प्रेरित करने के लिए मंदिर प्रबंधक गवली जी ने रामायण पाठ भवन की दीवाल पर स्थापित कर दिया है।
जय हो मां बगला मुखी



अखंड रामायण पाठ-भवन की दीवार पर 

दान पट्टी का दृश्य 



                                      


 समाजसेवी 

डॉ.दयाराम जी आलोक



शामगढ़ का

आद्यात्मिक दान-पथ

  साहित्य मनीषी  डॉ.दयाराम जी आलोक  राजस्थान और मध्यप्रदेश के 
मंदसौर,आगर नीमच ,झालावाड़ ,रतलाम और झाबुआ जिलों के  मंदिरों ,मुक्ति धाम और  गौशालाओं में निर्माण व विकास  हेतु नकद और  आगंतुकों के बैठने  हेतु  सीमेंट की बेंचें दान देने का अनुष्ठान संपन्न कर रहे हैं.
 डॉ.आलोक जी  एक  सेवानिवृत्त अध्यापक हैं और वे अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि दान करने के संकल्प के साथ  आध्यात्मिक दान-पथ  पर अग्रसर हैं . 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था उन्नत करने  हेतु  सीमेंट  बेंचें और रंग रोगन के लिए नकद दान के अनुष्ठान में  आपकी वो राशि भी शामिल है जो  google कंपनी से उनके ब्लॉग  और  You tube चैनल से  प्राप्त होती  है| समायोजित दान राशि और सीमेंट बेंचें  पुत्र डॉ.अनिल कुमार राठौर "दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ "के नाम से समर्पित हो रही हैं.

माँ बगलामुखी शक्ति पीठ (नलखेड़ा)
12 सीमेंट बैंच +दस हजार रुपये

दान -पट्टिका  तहसीलदार श्री पारस जी की अनुमति से बगलामुखी  भेजी गई| 

 दान-पट्टिका   रामायण पाठ भवन की दीवार पर  

तहसीलदार आदरणीय पारस जी  की अनुमति से 

विनोद जी  गवली (कार्यालय प्रबंधक)  के  निर्देशानुसार रामायण -पाठ भवन 

की दीवार पर  स्थापित . १९/२/२०२३ 

दान पट्टिका  के इस फोटो में  कार्यालय प्रबंधक श्री विनोद जी गवली ,डॉ. दयाराम जी आलोक ,डॉ. अनिल जी दामोदर हैं 



माँ बगला मुखी का एक दृश्य 

माँ बगला मुखी का विडियो १९/२/२०२३ 



मन्दिर की समिति के खाते में नकद राशी जमा की गई|२०/२/२०२३ 


बगलामुखी शक्तिपीठ मे 12 बेंच लगीं  1/9/2022







बगलामुखी में दामोदर अस्पताल की भेंट की हुई बेंच का दृश्य का विडियो


बगलामुखी मंदिर का विडिओ


पेंटर अनिलजी  सूर्य वंशी को दान पट्टी वाली दीवार पर कलर  करने का चार्ज १५००/- 

मोहनलाल जी रान्गोट के नंबर पर  फोन  किये 

बगलामुखी मंदिर मे बेंच पर बैठे  यात्री 

बगलामुखी मंदिर मे स्थापित शिलालेख  के फ़ोटो मे झाबुआ की अल्पना देवी और ऐश्वर्या चोहान 


माँ बगला मुखी के दरबार में डॉ अनिल कुमार जी " दामोदर पथरी अस्पताल" शामगढ़ .



झाबुआ का चौहान परिवार बगलामुखी के दरबार में  विडियो

यह मंदिर सुसनेर नगर से करीब 26 किलोमीटर है.

मंदिर के कार्यकलापों का प्रबंधन तहसीलदार सा.

 दिशा निर्देशों के अनुसार होता है|

मंदिर के कार्यालय प्रबंधक श्री  विनोदजी  गवली 98933-30300   हैं 

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18.2.23

शनि देव मन्दिर: दूधाखेडी माता चौराहा :भक्तों को सुविधा विश्राम :दयारामजी आसन दान:Shani Temple

दूधा खेड़ी माता चौराहा स्थित पवित्र शनि मंदिर : श्रद्धा, सेवा और समर्पण की त्रिवेणी




भारतीय संस्कृति में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, लोक-जीवन के विश्राम, संवाद और संस्कार के केंद्र होते हैं। ऐसा ही एक पवित्र स्थल है -
"दूधा खेड़ी माता चौराहा पर स्थित पवित्र शनि मंदिर श्रद्धा और आस्था का केंद्र है। यहाँ की आध्यात्मिक आभा, सांस्कृतिक धरोहर और दिव्य आशीर्वाद का अनुभव करें।"
यहाँ शनि देव की न्याय-प्रिय दृष्टि और दूधाखेड़ी माताजी की करुणा का संगम होता है। विगत कुछ वर्षों में शनि भक्तों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, और जगह-जगह शनि मंदिरों का निर्माण इस आस्था का प्रमाण है। मध्यप्रदेश की प्रसिद्ध दूधाखेड़ी माताजी के चौराहे पर स्थित यह शनि मंदिर इसी श्रृंखला की एक दिव्य कड़ी है।
इस पावन स्थल की महिमा को एक भक्त-हृदय ने इस प्रकार गुनगुनाया है -
शनि देव मंदिर की पावन छाया,
दूधाखेड़ी माता चौराहे पर आया।
भक्तों के विश्राम का सुंदर विधान,
डॉ. आलोक का अद्भुत दान।
साहित्य मनीषी डॉ. दयाराम जी आलोक का आध्यात्मिक दान-पथ
इस विश्राम-विधान के प्रणेता हैं - शामगढ़ के साहित्य मनीषी, सेवानिवृत्त अध्यापक डॉ. दयाराम जी आलोक।
उनके इस 'आध्यात्मिक दान-पथ' की प्रमुख विशेषताएँ इसे युग-धर्म बनाती हैं -
1. पेंशन का तप, सेवा का संकल्प: सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होंने अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण हेतु समर्पित करने का अलौकिक संकल्प लिया। यह दान नहीं, तप है।

2. स्व-वित्तपोषित, तकनीक-संचालित परोपकार: उनका यह अनुष्ठान पूरी तरह स्व-वित्तपोषित है। अपनी पेंशन के साथ-साथ गूगल से ब्लॉग और यूट्यूब के माध्यम से प्राप्त आय को भी वे जनसेवा में लगाते हैं - जहाँ लेखनी परोपकार बन जाती है।

3. व्यापक सेवा का भूगोल: उनका दान एक चौराहे तक सीमित नहीं। मध्यप्रदेश और राजस्थान के मंदसौर, नीमच, रतलाम, झालावाड़, आगर, झाबुआ जिलों के 151 से अधिक मंदिरों, गौशालाओं और मुक्तिधामों में उन्होंने बैठक व्यवस्था, रंग-रोगन और जन-सुविधा के कार्य किए हैं।
4. सुविधा-केंद्रित दृष्टि: वे भव्य शिलालेखों से अधिक उपयोगी सुविधाओं में विश्वास रखते हैं। वृद्धजनों, महिलाओं और पदयात्रियों के लिए सीमेंट की बेंचें दान करना उनकी पहचान बन गई है - जो श्रद्धा का प्रतीक भी हैं और सेवा का आधार भी।
इसी भाव को हमारे कवि ने आगे कहा -
पेंशन की राशि, तप का संकल्प,
जनसेवा में उनका अनुपम विकल्प।
पुत्र अनिल संग दामोदर पथरी,
दान-पथ पर चली जीवन गाथा गंभीर।

मंदसौर, नीमच, रतलाम, झालावाड़,
गौशालाएँ, मंदिर, मुक्तिधाम अपार।
सीमेंट बेंचें बनें श्रद्धा का प्रतीक,
आलोक जी का दान रहे सदा अद्वितीय।
शनि मंदिर दूधा खेड़ी पर विशेष दान - 5 बेंचों का समर्पण

इसी श्रृंखला में दिनांक 4/10/2022 को शनि देव मंदिर, दूधाखेड़ी माताजी चौराहा पर 15,000/- रुपये की लागत से 5 सीमेंट बेंचों की भेंट की गई।
यह दान डॉ. दयाराम जी आलोक (99265-24852) के आदर्शों से प्रेरित उनके सुपुत्र डॉ. अनिल कुमार राठौर, दामोदर पथरी हॉस्पिटल, शामगढ़ (98267-95656) द्वारा सम्पन्न हुआ।
इस पुण्य कार्य में मुख्य पुजारी संतोष जी जोशी (98269-57551), उप सरपंच सत्यनारायण जी परमार बाबूल्दा (70678-24886) की पहल और रामेश्वर जी परमार बाबूल्दा के सुझाव का विशेष सहयोग रहा, जिनके सहयोग से शिलालेख स्थापित किया गया।
इस सेवा-यज्ञ की पावनता को दो श्लोकों में इस प्रकार निबद्ध किया गया है -

दानं धर्मस्य मूलं हि, लोकहिताय समर्पितम्।
आलोकस्य महादेयं, भक्तजनस्य सुखाय च॥

शनि देवालये पुण्ये, आसनानि प्रदत्तानि।
विश्रान्तिं जनभक्तानां, साधुकार्यं प्रशस्यते॥

अर्थात - दान ही धर्म का मूल है जो लोकहित में समर्पित है। आलोक जी का यह महान दान भक्तजनों के सुख के लिए है। पुण्य शनि देवालय में प्रदान किए गए ये आसन जन-भक्तों को विश्रांति देंगे - यह साधुकार्य प्रशंसनीय है।

आइए, इस वीडियो और आलेख के माध्यम से इस पवित्र धाम की आध्यात्मिक आभा और डॉ. आलोक जी के निःस्वार्थ सेवा-भाव के दर्शन करें।

"दूधा खेड़ी माता चौराहा  पर स्थित पवित्र शनि मंदिर श्रद्धा और आस्था का केंद्र है। यहाँ की आध्यात्मिक आभा, सांस्कृतिक धरोहर और दिव्य आशीर्वाद का अनुभव करें।"

शनि देव मंदिर की पावन छाया, दूधाखेड़ी माता चौराहे पर आया। भक्तों के विश्राम का सुंदर विधान, डॉ. आलोक का अद्भुत दान।

पेंशन की राशि, तप का संकल्प, जनसेवा में उनका अनुपम विकल्प। पुत्र अनिल संग दामोदर पथरी, दान-पथ पर चली जीवन गाथा गंभीर।

मंदसौर, नीमच, रतलाम, झालावाड़, गौशालाएँ, मंदिर, मुक्तिधाम अपार। सीमेंट बेंचें बनें श्रद्धा का प्रतीक, आलोक जी का दान रहे सदा अद्वितीय।



        



मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के


मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु

साहित्य मनीषी

डॉ.दयाराम जी आलोक


शामगढ़ का

आध्यात्मिक दान पथ

डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।

व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।

सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।

स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।

निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।

पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।


शनि देव मंदिर ,दूधाखेड़ी माताजी चौराहा 
 15000/- का दान 5 बेंच

shani temple dudha khedi chouraha video  


शनि देव मंदिर माताजी चौराहा  मे 5 बेंच भेंट  4/10/2022


सत्यनारायण जी परमार 70678-24886 उप सरपंच बाबुल्दा की पहल 

रामेश्वर जी   परमार  बाबुल्दा का सुझाव 

संतोषजी जोशी 98269-57551 शनि मंदिर के मुख्य पुजारी हैं 


डॉ.अनिल कुमार दामोदर 98267-95656  s/o डॉ.दयाराम जी आलोक 99265-24852, दामोदर पथरी अस्पताल 98267-95656 शामगढ़ द्वारा  शनि देव मंदिर दूधा खेड़ी माता जी चौराहा हेतु दान सम्पन्न 

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17.2.23

नीलकंठेश्वर महादेव मन्दिर :तितरोद का पावन धाम : दामोदरजी बेंच प्रदान: भक्तों को सुविधा सम्मान


                          


नीलकंठेश्वर के आंगन में - एक सेवानिवृत्त शिक्षक के दान-पथ की प्रस्तावना

मालवा धरा गहन गंभीर, पग-पग रोटी डग-डग नीर। इसी मालवा के मंदसौर जिले की सीतामऊ तहसील में बसा है एक छोटा सा गांव - तितरोद। और तितरोद की आत्मा है - श्री नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर।

यह मंदिर ईंट-पत्थरों से नहीं, आस्था से बना है। गांव के बुजुर्ग आज भी कहते हैं, इसका निर्माण ग्रामीणों ने नहीं करवाया। सैकड़ों वर्ष पूर्व किसी सिद्ध संत महात्मा द्वारा यह मंदिर वायुमार्ग से उड़ाकर ले जाया जा रहा था। भोर हो गई, और भोर की लाली के साथ यह दिव्य धाम तितरोद की धरती पर ही उतर गया। तब से आज तक यह सिद्ध, प्राचीन और चमत्कारी स्थान के रूप में पूजनीय है। न कोई शिलालेख इसका काल बताता है, न कोई इतिहास इसका निर्माता - यही तो इसके स्वयंभू होने का प्रमाण है।

ऐसे ही जागृत देवालय में, जहां आध्यात्मिक आयोजनों की गूंज निरंतर रहती है, एक छोटा सा अभाव था - थके हुए भक्तों के दो पल बैठने का। इस अभाव की ओर ध्यान दिलाया तितरोद के सजग पत्रकार, मंदसौर गाथा चैनल के स्वामी श्री देविदास जी बैरागी ने।

बस एक फोन पर बात हुई। न मिलना हुआ, न मंदिर देखना। केवल महादेव के फोटो, वीडियो और मंदिर की कथा भेजी गई। और उधर शामगढ़ में बैठे समाजसेवी, साहित्य मनीषी, सेवानिवृत्त अध्यापक डॉ. दयाराम जी आलोक ने संकल्प ले लिया।

यह संकल्प केवल तीन सीमेंट बेंचों का नहीं था। यह एक आध्यात्मिक दान-पथ का संकल्प है। परमात्मा की असीम अनुकंपा और कुलदेवी माँ नागणेचिया जी के आशीर्वाद से प्रेरित होकर डॉ. आलोक जी ने अपनी 5 वर्ष की समस्त पेंशन राशि, और अपनी 8 वेबसाइटों से गूगल विज्ञापन से प्राप्त होने वाली आय का 68% भाग, मंदिरों, गौशालाओं और मुक्तिधामों के लिए समर्पित करने का व्रत लिया है। यह व्रत मंदसौर, झालावाड़, आगर, नीमच, रतलाम, झाबुआ और कोटा जिलों तक विस्तृत है।

इसी व्रत की एक कड़ी के रूप में, अपने पुत्र डॉ. अनिल कुमार राठौर, दामोदर पथरी अस्पताल, शामगढ़ के नाम पर, श्री नीलकंठेश्वर मंदिर के लिए 3 सीमेंट बेंचें और 1501 रुपये की सहयोग राशि भेंट की गई। मंदिर के व्यवस्थापक श्री राकेश पुरी जी गोस्वामी और मुख्य पुजारी श्री मुकेश पुरी जी की अनुमति से, दिनांक 28/01/2023 को नेम प्लेट के साथ ये बेंचें मंदिर प्रांगण में स्थापित कर दी गईं और 15001/- की राशि फोन पे के माध्यम से प्रबंधक के खाते में प्रेषित की गई।

तितरोद नगर की ओर से बैरागी न्यूज एजेंसी, बस स्टैंड तितरोद ने अपने आभार संदेश में लिखा - "ऐसे दानदाता बंधु का हृदय से धन्यवाद, जिनसे न कभी मिले, जो कभी मंदिर नहीं आए, पर महादेव के नाम पर भक्तों के बैठने हेतु कुर्सियां प्रदान कर दीं।"

यह ब्लॉग केवल तीन बेंचों की कथा नहीं है। यह एक शिक्षक की पेंशन के महादेव के चरणों में फूल बन जाने की कथा है। यह इस बात का प्रमाण है कि दान के लिए दौलत नहीं, दृष्टि चाहिए।

नीलकंठेश्वर महादेव की जय हो!

नीलकंठेश्वर महादेव मन्दिर तितरोद -सीतामऊ को 

समाजसेवी  डॉ . दयाराम जी आलोक शामगढ़ द्वारा 

मंदिर मे बैठक व्यवस्था उन्नत करने हेतु 

3 सिमेन्ट बेंच भेंट

 मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के अंतर्गत सितामऊ तहसील के गाँव तितरोद मे  निलकंठेश्वर  महादेव का मंदिर अपनी प्राचीनता और आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजनों के लिए जाना जाता है। पत्रकार श्री  देविदास जी बैरागी से परिचय हुआ ,इस मंदिर के लिए 3 सिमेन्ट की बेंचें  भेंट करने  के सिलसिले मे  मंदिर के व्यवस्थापक और पुजारी राकेश पुरीजी और मुकेश पुरीजी की अनुमति लेकर बेंचें मंदिर के प्रांगण मे लगवा दी गई हैं।  नील कंठेश्वर महादेव की जय हो !

                                               

                                                

मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम झाबुआ  जिलों  के


मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु

साहित्य मनीषी

डॉ.दयाराम जी आलोक


 का


आध्यात्मिक दान-पथ 

मित्रों ,
 परमात्मा की असीम अनुकंपा और कुलदेवी माँ नागणेचिया के आशीर्वाद और प्रेरणा से डॉ.दयारामजी आलोक द्वारा आगर,मंदसौर,झालावाड़ ,कोटा ,झाबुआ जिलों के चयनित मंदिरों और मुक्तिधाम में निर्माण/विकास / बैठने हेतु सीमेंट बेंचें/ दान देने का अनुष्ठान प्रारम्भ किया है|
 मैं एक सेवानिवृत्त अध्यापक हूँ और अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि दान करने का संकल्प लिया है| इसमे वो राशि भी शामिल रहेगी जो मुझे google कंपनी से नियमित प्राप्त होती रहती है| खुलासा कर दूँ कि मेरी 8 वेबसाईट हैं और google उन पर विज्ञापन प्रकाशित करता है| विज्ञापन से होने वाली आय का 68% मुझे मिलता है| यह दान राशि और सीमेंट बेंचें पुत्र डॉ.अनिल कुमार राठौर "दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ "के नाम से समर्पित हो रही हैं| 

श्री नीलकंठेश्वर  महादेव मंदिर तितरोद 
3 बेंच +1501रुपये

यह विडियो मंदसौर गाथा चेनल के मालिक देविदास जी बैरागी पत्रकार ने बनाकर भेजा है |


नील कंठेश्वर महादेव मंदिर का शिलालेख 

मंदिर मे नेम प्लेट चस्पा की गई 28/1/2023 


मंदिर के प्रबंधक मुकेश पूरी जी के अकाउंट मे 15001/- फोन पे किए| 


दामोदर पथरी का दवाखाना  शामगढ़ द्वारा दान की गई  बेंचों  का दृश्य 


                                                    आभार ज्ञापन 


शामगढ के दान दाता बन्धु द्वारा डॉक्टर दयाराम जी आलोक
की प्रेरणा से डॉक्टर श्री अनिल कुमार जी राठौर (दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ) द्वारा श्री नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर तितरोद हेतु 3 सीमेंट की कुर्सिया भेट करने की घोषणा की थी जो आज महादेव मंदिर पर लगाई गई।। तितरोद नगर की ओर से दानदाता बन्धु का ह्रदय से धन्यवाद।। दानदाता बन्धु से न में कभी मिला न वो कभी श्री नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर तितरोद आये बस एक बार फोन पर बात हुई,,महादेव जी के फोटो/वीडियो/मन्दिर की डिटेल भेजी तो उन्होंने कुर्सियां दान स्वरूप भक्तों के बैठने हेतु प्रदान कर दी ऐसे दान दाता बन्धु का पुनः धन्यवाद साथ ही क्षेत्र के अन्य प्रमुख मन्दिरो पर यह कुर्सियां उंन्होने भेंट करी।। महाकाल महाराज की कृपा सदैव आप पर बनी रहे।।--बैरागी न्यूज एजेंसी बस स्टैण्ड तितरोद
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नीलकंठेश्वर महादेव मन्दिर तितरोद,तहसील-सीतामउ,जिला मन्दसौर मध्यप्रदेश

   श्री नीलकंठेश्वर महादेव जी तितरोद का मंदिर ऐतिहासिक होकर अत्यंत प्राचीन सिद्ध व चमत्कारी स्थान के रूप में सेकड़ो वर्षो से पूजनीय है।। गाँव के बड़े बुजुर्गों से हमने सदैव सुना है की इस मंदिर का निर्माण ग्रामीणों ने नही करवाया है प्राचीन समय मे यह मन्दिर किसी सिद्ध सन्त महात्मा द्वारा वायुमार्ग से उड़ाकर ले जाया रहा था लेकिन भोर का समय होने पर यह मंदिर तितरोद नगर में ही उतर गया ओर तब से आजतक मन्दिर यही है ओर इसकी पूजा अर्चना होती आई है इसलिये लिखित में ऐसा कोई इतिहास नही है कि मन्दिर किसने,,कब व किस काल मे बनाया जो यह साबित करता है कि यह मन्दिर सेकड़ो वर्षो पहले का मंदिर है।। 
  

देविदास जी बैरागी 9479707432 पत्रकार  ने बेंच के लिए अनुरोध  किया 

राकेश पूरी जी  गोस्वामी 96305-18313 मंदिर प्रबंधक हैं| 

मुकेश पुरी जी मंदिर के मुख्य पुजारी हैं| 


शिव-हनुमान मन्दिर लुका का खेड़ा चिकनिया -गरोठ-मंदसौर /डॉ.दयाराम आलोक शामगढ़ द्वारा 3 बेंच दान

                                                        

मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम  जिलों  के


मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु

साहित्य मनीषी

डॉ.दयाराम जी आलोक


शामगढ़ का

आध्यात्मिक  दान -अनुष्ठान 

साथियों,

शामगढ़ नगर अपने दानशील व्यक्तियों के लिए जाना जाता रहा है| शिव हनुमान मंदिर,मुक्तिधाम ,गायत्री शक्तिपीठ आदि संस्थानों के जीर्णोद्धार और कायाकल्प के लिए यहाँ के नागरिकों ने मुक्तहस्त दान समर्पित किया है|
परमात्मा की असीम अनुकंपा और कुलदेवी माँ नागणेचिया के आशीर्वाद और प्रेरणा से डॉ.दयारामजी आलोक द्वारा आगर,मंदसौर,झालावाड़ ,कोटा ,झाबुआ जिलों के चयनित मंदिरों और मुक्तिधाम में निर्माण/विकास / बैठने हेतु सीमेंट बेंचें/ दान देने का अनुष्ठान प्रारम्भ किया है|
मैं एक सेवानिवृत्त अध्यापक हूँ और अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि दान करने का संकल्प लिया है| इसमे वो राशि भी शामिल रहेगी जो मुझे google कंपनी से नियमित प्राप्त होती रहती है| खुलासा कर दूँ कि मेरी 6 वेबसाईट हैं और google उन पर विज्ञापन प्रकाशित करता है| विज्ञापन से होने वाली आय का 68% मुझे मिलता है| यह दान राशि और सीमेंट बेंचें पुत्र डॉ.अनिल कुमार राठौर "दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ "के नाम से समर्पित हो रही हैं| 



 शिव -हनुमान मंदिर ,लूका का खेड़ा
11001/- का दान (3 sement bench+1500/

ग्राम लुका का खेड़ा (चिकनिया) तहसील गरोठ जिला मंदसौर | इस गाँव में शिव हनुमान मन्दिर का विशेष महत्व है| मन्दिर शिवजी और बालाजी के भक्तों की आस्था का केंद्र है| लोगों की मनोकामना पूरी होती हैं| मन्दिर में दर्शनार्थियों के बैठने की सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए साहित्य मनीषी डॉ.दयाराम जी आलोक
के आदर्शों से प्रेरित पुत्र डॉ अनिल कुमार राठौर ,दामोदर पथरी चिकित्सालय ९८२६७९५६५६ द्वारा ३ सीमेंट बेंच और १५००/- नकद दान दिया गया| इस मन्दिर की देख रेख श्री तूफ़ान सिंग जी लुका का खेड़ा वाले करते हैं|मन्दिर पहुँचने के लिए गरोठ से बस मिल जाती है| पावटी गाँव से भी जा सकते हैं|




शिव हनुमान मंदिर मे शिलालेख लगाया 


विडिओ शिव हनुमान मंदिर मे बेंच लगने का


Shiv Hanuman Mandir ke liye 200/-+1300=1500/-ka payment kiya 12/2/2023 




मंदिर के शुभ चिंतक 

तुफान सिंग जी 88890-34253  

उमराव सिंग जी चौहान 78794-97915 के खाते मे दान की राशि फोन पे की 

गोर्धन जी पंवार 88270-3375

 डॉ.अनिल कुमार दामोदर 98267-95656 s/o डॉ.दयाराम जी आलोक 99265-24852, दामोदर पथरी अस्पताल 98267-95656  शामगढ़  द्वारा शिव हनुमान मन्दिर लुका का खेडा  हेतु दान सम्पन्न १६/२/२०२३ 
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14.2.23

नरेंद्र यादव (राजू भाई) लिख रहे हैं शामगढ के विकास की नई इबारत


" होनहार बिरवान के होत चिकने पात "


  नरेंद्र जी यादव (राजू भाई)अपने छात्र जीवन मे मेरे प्रिय शिष्य रह चुके हैं । उक्त कहावत को चरितार्थ करने वाले अतुल्य बौद्धिक प्रतिभा सम्पन्न इस बालक मे भविष्य के जन नायक बनने के सभी गुण विध्यमान थे।आज इसी जननायक व्यक्तित्व की कहानी प्रस्तुत करते हुए गौरव की अनुभुति हो रही है।
मेरे अध्यापन काल की स्मृतियों में एक नाम सदैव एक दीपक की भाँति प्रकाशमान रहा है - नरेंद्र जी यादव, सबके प्रिय राजू भाई। मेरे प्रिय शिष्य के रूप में जब वे मेरे सान्निध्य में थे, तभी उनकी आँखों में एक स्वप्न था, वाणी में ओज था और चाल में भविष्य के जननायक का आत्मविश्वास था। उस अतुल्य बौद्धिक प्रतिभा सम्पन्न बालक में वे सभी गुण विद्यमान थे जो एक साधारण छात्र को असाधारण जनसेवक बनाते हैं। आज उसी जननायक व्यक्तित्व की कथा लिखते हुए हृदय गौरव से भर उठा है।
बीज से वटवृक्ष तक की यात्रा
जन्म: 4 अक्टूबर 1963, ग्राम - शामगढ़, एक संस्कारवान यादव परिवार में।
विद्यालयीन शिक्षा के उपरांत जब अधिकांश युवा भविष्य की अनिश्चितता में भटकते हैं, तब नरेंद्र जी ने सेवा का राजपथ चुना। भारतीय जनता पार्टी के बैनर तले उन्होंने राजनीति में पदार्पण किया, पर यह पदार्पण सत्ता के लिए नहीं, सिद्धांत के लिए था।
भाजपा ने भी इस हीरे को पहचाना। मात्र 19 वर्ष की आयु में, वर्ष 1983 में, जब शामगढ़ नगर परिषद में कुल 12 वार्ड ही होते थे, तब पार्टी ने उन पर विश्वास व्यक्त कर वार्ड क्रमांक 12 से पार्षद प्रत्याशी बनाया। और उस किशोरवय युवक ने पहले ही प्रयास में विजय पताका फहरा कर यह सिद्ध कर दिया कि नेतृत्व उम्र का मोहताज नहीं होता।
पार्षद रहते हुए ही अपनी कर्तव्यनिष्ठा और प्रशासनिक कुशलता के बल पर वे नगर परिषद के उपाध्यक्ष मनोनीत हुए। इसी कार्यकाल में उन्होंने दो ऐसे कार्य किए जो आज भी स्मरणीय हैं -
वार्ड क्रमांक 12 के 90 जरूरतमंद परिवारों को नगर परिषद की ओर से पट्टे दिलवाकर उन्हें छत का अधिकार दिया।
भाजपा की स्थायी समिति के अध्यक्ष के रूप में नगर के विकास की नींव को सुदृढ़ किया।
उनकी संगठन क्षमता का ही परिणाम था कि 1989 से 1999 तक - पूरे एक दशक तक - वे ऐसे समय में भाजपा के नगर अध्यक्ष (तत्कालीन मंडल अध्यक्ष के समकक्ष) रहे जब प्रदेश में कांग्रेस का शासन था। विपरीत धारा में भी उन्होंने भगवा ध्वज को मजबूती से थामे रखा और पार्टी को जन-जन तक पहुँचाया।
जनसेवा का यह क्रम अनवरत चलता रहा। 1999 से 2004 तक वार्ड क्रमांक 14 से उन्होंने सर्वाधिक मत - 971 मतों से ऐतिहासिक विजय प्राप्त की और पुनः नगर परिषद उपाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया।
2005 से 2010 तक उन्होंने गरोठ जनपद के वार्ड क्रमांक 17 से जनपद प्रतिनिधि और सभापति के रूप में ग्रामीण अंचल की सेवा की।
उनका व्यक्तित्व केवल अपने लिए नहीं, अपनों के लिए जीने वाला रहा है। 2003 और 2013 के विधानसभा चुनावों में अपने चचेरे भाई स्वर्गीय श्री राजेश यादव जी की उम्मीदवारी में उन्होंने तन-मन-धन से दिन-रात एक कर भाजपा को विजयश्री दिलाने में अहम भूमिका निभाई। यह उनके परिवार और संगठन दोनों के प्रति निष्ठा का अनुपम उदाहरण है।
शक्ति के रूप में - श्रीमती कविता यादव
कहते हैं हर सफल जननायक के पीछे एक सशक्त परिवार की प्रेरणा होती है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाया श्रीमती कविता यादव जी ने।
जन्म: 13 अगस्त 1966
2010 में अपने राजनीतिक जीवन का शुभारंभ कर उन्होंने 2010 से 2015 तक गरोठ जनपद के वार्ड क्रमांक 17 से भाजपा समर्थित सदस्य के रूप में सर्वाधिक मतों से विजय प्राप्त की।
संगठन ने उनकी क्षमता को पहचानते हुए उन्हें 2018 से 2021 तक शामगढ़ महिला भाजपा मोर्चा की प्रभारी और वर्तमान में जिला कोषाध्यक्ष, महिला मोर्चा का दायित्व सौंपा।
जनता के असीम स्नेह के फलस्वरूप विगत नगर परिषद चुनाव में वे वार्ड क्रमांक 9 से पार्षद निर्वाचित हुईं और 13 अगस्त 2022 को भाजपा के बैनर तले विजयी होकर शामगढ़ नगर परिषद की अध्यक्ष - अर्थात प्रथम नागरिक के गौरवमयी पद पर आसीन हुईं।
अल्प कार्यकाल, विराट उपलब्धियाँ
अक्सर कहा जाता है कि कार्य करने के लिए समय नहीं, संकल्प चाहिए। मात्र 6 माह के अल्प कार्यकाल में अध्यक्ष श्रीमती कविता यादव जी ने जो विकास की गंगा बहाई, वह आम जनमानस के समक्ष है।
1. राजस्व क्रांति: 2017 से लंबित पड़े लगभग 400 नामांतरणों का निस्तारण कर उन्होंने न केवल जरूरतमंदों को राहत दी, बल्कि नगर परिषद के राजस्व में अभूतपूर्व वृद्धि की। परिणामस्वरूप शामगढ़ नगर परिषद मध्यप्रदेश में राजस्व के मामले में चौथे स्थान पर पहुँची और माननीय मुख्यमंत्री जी के करकमलों से भोपाल में 5 लाख रुपये की सम्मान राशि प्राप्त हुई।
2. सुशासन का सम्मान: आयुष्मान कार्ड के लक्ष्य को शत-प्रतिशत पूर्ण करने पर 26 जनवरी 2023 को जिलाधीश, मंदसौर द्वारा शामगढ़ नगर परिषद को जिले में प्रथम स्थान का सम्मान प्राप्त हुआ।
3. भ्रष्टाचार पर प्रहार: विगत वर्षों में प्रधानमंत्री आवास योजना में हुए लगभग 30 लाख के घोटाले को उजागर कर उन्होंने प्रेस वार्ता के माध्यम से जिलाधीश महोदय को लिखित शिकायत प्रेषित की। साथ ही 400 पात्र हितग्राहियों को आवास दिलाकर गृह प्रवेश भी करवाया।
4. खेल और संस्कृति: पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती के अवसर पर 22 से 25 दिसंबर तक अखिल भारतीय महिला कबड्डी प्रतियोगिता का ऐतिहासिक आयोजन कर उन्होंने नगर को राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाई।
5. दशकों पुरानी समस्या का समाधान - अंडरब्रिज: वार्ड 13, 14, 15 और रेलवे पटरी पार के नागरिकों की चिर-लंबित अंडरब्रिज की माँग को उन्होंने गंभीरता से लिया। रेलवे प्रशासन, रेल मंत्री, सांसद श्री सुधीर गुप्ता जी, क्षेत्रीय विधायक एवं कैबिनेट मंत्री श्री हरदीप सिंह डंग जी से सतत पत्राचार और संपर्क कर अंडरब्रिज की स्वीकृति करवाई, जिसका भूमिपूजन आज नगर के लिए उत्सव का क्षण है।
भविष्य का स्वप्न - एक विकसित शामगढ़
अध्यक्ष महोदया की आगामी योजनाएँ केवल ईंट-पत्थर की नहीं, बल्कि एक सुंदर, सुव्यवस्थित नगर के स्वप्न की हैं
नगर को भारी यातायात से मुक्ति हेतु 4.5 किलोमीटर लंबे बायपास का निर्माण।
बस स्टैंड पर आधुनिक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और बम बम आश्रम व बस स्टैंड क्षेत्र में आधुनिक पार्क।
गायत्री शक्तिपीठ के समक्ष स्विमिंग पूल का निर्माण।
सुवासरा एवं गरोठ मार्ग पर माँ महिषासुर मर्दिनी देवी की नगरी में आपका स्वागत है के भव्य स्वागत द्वार।
नवीन तहसील रोड से कथोड़ चौक तक सीसी रोड, वार्ड 5 में अल्फा इंग्लिश स्कूल के सामने 3 फीट की गली को 16 फीट चौड़ा कर आमजन को सुविधा।
नगर सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों के विकास कार्य।
आज शामगढ़ नगर परिषद के गठन के पश्चात परिवर्तन स्पष्ट दिखता है - हर गली में स्ट्रीट लाइट जगमगा रही है, स्वच्छता और पेयजल की व्यवस्था सुचारू है।
नरेंद्र जी (राजू भाई) और कविता जी की यह जोड़ी इस बात का प्रमाण है कि जब नीयत सेवा की हो, तो विकास स्वतः ही पग-चग करता हुआ चला आता है।
मेरे उस होनहार शिष्य ने आज सच में यह सिद्ध कर दिया है कि -
होनहार बिरवान के होत चिकने पात।
लेखक: साहित्य मनीषी डॉ. दयाराम आलोक
 

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साहित्य मनीषी डॉ. दयाराम आलोक का परिचय सुनिए इसी लिंक में 

भारत के  मन्दिरों और मुक्ति धाम हेतु शामगढ़ के समाजसेवी  द्वारा दान की विस्तृत श्रृंखला