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3.8.26

"वह एक फैसला... जिसने कर्ण को खलनायक और दुर्योधन का यार बना दिया!

 


गुरु द्रोणाचार्य ने कर्ण को शिष्य क्यों नहीं बनाया?

नमस्कार दोस्तों। महाभारत के इतिहास में एक ऐसा चरित्र है, जो आज भी हमारे दिलों में सहानुभूति, सम्मान और कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है। वह चरित्र है—दानवीर कर्ण। एक ऐसा योद्धा जिसके पास अर्जुन के समान ही प्रतिभा थी, पिता सूर्य का तेज था, और कवच-कुंडल जैसी अजेय शक्ति थी। लेकिन इतिहास गवाह है कि कर्ण को जीवन के हर मोड़ पर केवल संघर्ष और तिरस्कार मिला।
और इस संघर्ष की शुरुआत हुई थी शिक्षा के द्वार से। जब एक युवा, ऊर्जावान और धनुर्विद्या सीखने को लालायित कर्ण हस्तिनापुर के शाही आचार्य, गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में पहुंचा। कर्ण के मन में विश्वास था कि उसकी प्रतिभा देखकर गुरु द्रोण उसे सहर्ष अपना शिष्य बना लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गुरु द्रोण ने कर्ण को अपनी गुरुकुल परंपरा में शामिल करने से साफ मना कर दिया।
आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों एक महान शिक्षक ने एक अद्वितीय प्रतिभा को ठुकरा दिया? क्या गुरु द्रोण जातिवादी थे? या इसके पीछे कोई गहरा राजनीतिक और सामाजिक कारण था? आज के इस वीडियो में हम प्राचीन ग्रंथों, मुख्य रूप से महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत के संदर्भों के आधार पर इस रहस्य की पूरी परतों को खोलेंगे। इस वीडियो को अंत तक जरूर देखिएगा, क्योंकि सच आपकी सोच से कहीं अधिक गहरा है।
आइए सबसे पहले उस समय की सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था को समझते हैं। द्वापर युग के उस दौर में हस्तिनापुर का राजपरिवार गुरुकुल का संचालन करता था। गुरु द्रोणाचार्य कोई स्वतंत्र शिक्षक नहीं थे जो किसी भी राह चलते राहगीर को शिक्षा दे सकें। वे हस्तिनापुर राज्य के 'राजगुरु' यानी 'राजकीय आचार्य' थे। उनका मुख्य कर्तव्य था—कुरु वंश के राजकुमारों, यानी कौरवों और पांडवों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देना ताकि वे भविष्य में राज्य की रक्षा कर सकें।
जब कर्ण गुरु द्रोण के पास पहुंचा, तब तक समाज में उसकी पहचान 'सूत-पुत्र' के रूप में हो चुकी थी। हम सब जानते हैं कि कर्ण का जन्म माता कुंती के गर्भ से सूर्य देव के आशीर्वाद से हुआ था। लेकिन लोक-लाज के डर से कुंती ने उसे नदी में बहा दिया था। वह बालक महाराज धृतराष्ट्र के सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा को मिला। उन्होंने कर्ण का पालन-पोषण किया। इसी कारण समाज कर्ण को एक सारथी का पुत्र, यानी 'सूत-पुत्र' मानता था।
उस काल की गुरुकुल परंपरा और राजकीय नियमों के अनुसार, राजगुरु केवल क्षत्रियों या ब्राह्मणों को ही उच्च अस्त्र-शस्त्र और ब्रह्मास्त्र जैसी गुप्त विद्याएं सिखा सकते थे। सूत वर्ग का काम रथ चलाना और राजाओं की सेवा करना था, युद्ध लड़ना या सेनापति बनना नहीं। जब कर्ण ने गुरु द्रोण से शिक्षा मांगी, तो द्रोणाचार्य ने नियम का हवाला देते हुए कहा कि वे केवल राजपरिवार के बालकों या क्षत्रियों को ही शिक्षा देने के लिए वचनबद्ध हैं। वह एक राजकीय पद पर थे, इसलिए वे राज्य के नियमों और परंपराओं को तोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकते थे।
लेकिन कहानी सिर्फ इतनी ही नहीं है। अगर हम इतिहास को गहराई से देखें, तो गुरु द्रोण के इनकार के पीछे एक और बहुत बड़ा कारण था—उनका अपनी प्रिय शिष्य अर्जुन के प्रति अत्यधिक मोह।
गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन की एकाग्रता, उसकी मेहनत और उसकी प्रतिभा को देखकर उसे एक वचन दिया था। उन्होंने अर्जुन से कहा था, "हे अर्जुन, इस पूरी पृथ्वी पर तुम्हारे जैसा श्रेष्ठ धनुर्धर दूसरा कोई नहीं होगा। मैं तुम्हें संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाऊंगा।" यह गुरु द्रोण का महत्वाकांक्षी संकल्प था। वे अपने इस वचन को हर हाल में पूरा करना चाहते थे।
जब कर्ण द्रोणाचार्य के आश्रम में आया, तो उसने अपनी असाधारण प्रतिभा की झलक दिखाई। कर्ण ने बहुत ही कम समय में वह सब सीख लिया जो सामान्य बालकों के लिए कठिन था। द्रोणाचार्य एक कुशल पारखी थे। वे तुरंत भांप गए कि इस बालक के भीतर जो आग है, जो जन्मजात प्रतिभा है, वह भविष्य में अर्जुन के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन सकती है।
यदि कर्ण को भी वही उच्च शिक्षा, दिव्य अस्त्र और ब्रह्मास्त्र की विद्या मिल जाती, तो वह अर्जुन से आगे निकल सकता था। गुरु द्रोण किसी भी कीमत पर अर्जुन की श्रेष्ठता को खतरे में नहीं डालना चाहते थे। अपने चहेते शिष्य को नंबर वन बनाए रखने की इस चाहत ने भी द्रोणाचार्य को विवश किया, या यूं कहें कि उन्हें पक्षपाती बना दिया, और उन्होंने कर्ण को आगे की गुप्त और दिव्य शिक्षा देने से साफ इनकार कर दिया।
अब बात करते हैं उस तीसरे पहलू की, जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं—वह है हस्तिनापुर की अंदरूनी राजनीति। गुरुकुल में रहते हुए ही कौरवों और पांडवों के बीच ईर्ष्या और दुश्मनी के बीज बोए जा चुके थे। दुर्योधन हमेशा पांडवों, विशेषकर अर्जुन और भीम से चिढ़ता था। दुर्योधन को एक ऐसे योद्धा की तलाश थी जो अर्जुन का मुकाबला कर सके।
कर्ण की प्रतिभा को देखकर दुर्योधन ने तुरंत समझ लिया कि यह लड़का उसका सबसे बड़ा हथियार बन सकता है। गुरुकुल के दिनों में ही कर्ण और दुर्योधन के बीच मित्रता बढ़ने लगी थी। कर्ण का झुकाव दुर्योधन की तरफ साफ दिखाई दे रहा था।
गुरु द्रोणाचार्य राजनीति के भी बड़े खिलाड़ी थे। वे जानते थे कि दुर्योधन का स्वभाव कैसा है। उन्हें डर था कि यदि एक सूत-पुत्र, जो स्वभाव से अत्यंत महत्वाकांक्षी है और दुर्योधन का मित्र बनता जा रहा है, उसे अगर ब्रह्मास्त्र जैसी विनाशकारी विद्याएं मिल गईं, तो वह अधर्म के पक्ष को मजबूत करेगा। द्रोणाचार्य को डर था कि कर्ण को दी गई शिक्षा भविष्य में कुरु वंश के विनाश का कारण बन सकती है। इसलिए, राज्य की सुरक्षा और भविष्य के खतरों को भांपते हुए भी द्रोण ने कर्ण को अपने आश्रम से दूर रखना ही बेहतर समझा।
गुरु द्रोणाचार्य के इस इनकार ने कर्ण के भीतर एक गहरी ठेस, एक कड़वाहट पैदा कर दी। कर्ण ने इसे केवल अपना नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभा का अपमान माना। उसने ठान लिया कि चाहे समाज जो भी कहे, वह खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करके रहेगा।
जब द्रोण ने मना किया, तो कर्ण सीधे भगवान परशुराम के पास पहुंच गया। लेकिन वहां भी एक समस्या थी। भगवान परशुराम ने कसम खाई थी कि वे केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा देंगे, क्योंकि क्षत्रियों के अहंकार को वे पहले ही नष्ट कर चुके थे। कर्ण ने अपनी शिक्षा पाने की तीव्र लालसा में खुद को ब्राह्मण बताकर भगवान परशुराम से शिक्षा ग्रहण की।
वहां उसने अपनी प्रतिभा से परशुराम जी का दिल जीत लिया और ब्रह्मास्त्र सहित कई दिव्य अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। लेकिन हम सब जानते हैं कि अंत में जब एक कीड़े के काटने पर भी कर्ण ने अपना पैर नहीं हिलाया ताकि गुरु की नींद न खुले, तो परशुराम जी समझ गए कि इतनी सहनशीलता केवल एक क्षत्रिय या योद्धा में ही हो सकती है, ब्राह्मण में नहीं। झूठ पकड़े जाने पर परशुराम जी ने कर्ण को श्राप दे दिया कि 'जब तुम्हें मेरी सिखाई विद्या की सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तुम उसे भूल जाओगे।'
यह श्राप और गुरु द्रोण द्वारा किया गया वह शुरुआती इनकार, दोनों ने मिलकर कुरुक्षेत्र के मैदान में कर्ण की नियति तय कर दी। अगर गुरु द्रोण ने उसे स्वीकार कर लिया होता, तो शायद कर्ण को झूठ नहीं बोलना पड़ता, उसे श्राप नहीं मिलता और इतिहास कुछ और होता।
तो दोस्तों, जब हम इस पूरी घटना का विश्लेषण करते हैं, तो हमें समझ आता है कि गुरु द्रोणाचार्य का कर्ण को शिष्य न बनाना केवल किसी व्यक्तिगत दुश्मनी का परिणाम नहीं था। इसके पीछे कुरु वंश के कड़े नियम, राजकीय सीमाएं, अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ बनाने का उनका अपना गुरु-मोह और भविष्य की राजनैतिक आशंकाएं थीं।
द्रोणाचार्य अपने स्थान पर एक राजगुरु के धर्म का पालन कर रहे थे, तो दूसरी ओर कर्ण अपनी व्यक्तिगत योग्यता के बल पर सम्मान पाने की लड़ाई लड़ रहा था। दोनों ही अपने-अपने नजरिए से सही और विवश थे। यही महाभारत की सबसे बड़ी खूबसूरती और त्रासदी है—यहां कोई पूरी तरह सही नहीं है और कोई पूरी तरह गलत नहीं है।
आपको क्या लगता है? क्या गुरु द्रोणाचार्य को सामाजिक नियमों को तोड़कर कर्ण की प्रतिभा का सम्मान करना चाहिए था? क्या उनका अर्जुन के प्रति मोह न्यायसंगत था? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
अगर आपको यह राजनैतिक और ऐतिहासिक विश्लेषण पसंद आया हो, तो इस वीडियो को लाइक करें, अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें ताकि ऐसी ही और भी ज्ञानवर्धक कहानियां आप तक पहुंचती रहें। मिलते हैं अगले वीडियो में, तब तक के लिए धन्यवाद और जय हिंद!

23.7.26

महर्षि वेदव्यास: महाकाव्य रचयिता की अद्भुत गाथा

 


हर्षि वेदव्यास, भारतीय संस्कृति के उस अद्वितीय ऋषि का नाम है, जिनकी कलम से महाभारत जैसे महाकाव्य का जन्म हुआ। जब हम वेदव्यास की गाथा का स्मरण करते हैं, तो केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं सुनते, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा को अनुभव करते हैं। वेदव्यास का जीवन ज्ञान, तपस्या और सृजनशीलता का अद्भुत संगम है। वे केवल एक लेखक नहीं थे, वे युगों के मार्गदर्शक थे। उनके द्वारा रचित महाभारत विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है, जिसमें धर्म, नीति, राजनीति, युद्ध, शांति, प्रेम और त्याग सब कुछ समाहित है।

वेदव्यास का जन्म पराशर ऋषि और मत्स्यगंधा सत्यवती के संयोग से हुआ। उनका जन्म यमुना नदी के तट पर हुआ था और जन्म से ही वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। बाल्यकाल से ही उन्होंने वेदों का गहन अध्ययन किया और आगे चलकर वेदों का विभाजन कर उन्हें चार भागों में व्यवस्थित किया। इसी कारण उन्हें वेदव्यास कहा गया। वेदों का विभाजन केवल विद्वानों के लिए नहीं था, बल्कि सामान्य जन तक ज्ञान पहुँचाने का प्रयास था। वे चाहते थे कि हर व्यक्ति धर्म और ज्ञान का लाभ उठा सके।

महर्षि वेदव्यास का जीवन तपस्या से परिपूर्ण था। उन्होंने हिमालय की गुफाओं में रहकर वर्षों तक ध्यान और साधना की। उनके मन में केवल एक ही संकल्प था—मानवता को ज्ञान का प्रकाश देना। वेदव्यास ने महाभारत की रचना की, जो केवल एक युद्धकथा नहीं है, बल्कि जीवन का संपूर्ण दर्शन है। महाभारत में हमें धर्म और अधर्म का संघर्ष दिखाई देता है, हमें कर्तव्य और मोह के बीच की द्वंद्व दिखाई देता है। यह महाकाव्य हमें सिखाता है कि जीवन में सबसे बड़ा धर्म सत्य और न्याय है।

महाभारत की रचना के समय वेदव्यास ने गणेशजी को लेखन का कार्य सौंपा। वे स्वयं बोलते गए और गणेशजी लिखते गए। यह दृश्य भारतीय संस्कृति में अद्वितीय है—एक ऋषि का ज्ञान और एक देवता का लेखन। महाभारत में लाखों श्लोक हैं, जिनमें जीवन के हर पहलू का वर्णन है। इसमें राजनीति है, युद्धनीति है, धर्मशास्त्र है, और सबसे बढ़कर है भगवद्गीता। गीता का उपदेश स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया, लेकिन इसे महर्षि वेदव्यास ने ही अमर कर दिया। गीता आज भी विश्वभर में जीवन का मार्गदर्शन करती है।

वेदव्यास केवल महाभारत के रचयिता ही नहीं थे, उन्होंने अठारह पुराणों की भी रचना की। विष्णु पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण—ये सभी उनके ही सृजन हैं। भागवत पुराण में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया है, जो भक्तों के हृदय को आनंद से भर देता है। वेदव्यास ने धर्म को केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रखा, उन्होंने उसे जीवन का अंग बनाया।

उनकी गाथा हमें यह भी बताती है कि वेदव्यास ने केवल लेखन ही नहीं किया, बल्कि समाज को दिशा भी दी। उन्होंने राजाओं को धर्म का उपदेश दिया, उन्होंने साधुओं को तपस्या का मार्ग दिखाया, और उन्होंने सामान्य जन को जीवन का सत्य समझाया। वेदव्यास का जीवन हमें यह सिखाता है कि ज्ञान केवल पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि जीने के लिए है।

महर्षि वेदव्यास का व्यक्तित्व अत्यंत गंभीर और तेजस्वी था। उनका स्वर गूंजता था तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। वे जब बोलते थे तो उनके शब्दों में केवल विद्वता नहीं होती थी, बल्कि करुणा और प्रेम भी होता था। वे चाहते थे कि हर व्यक्ति जीवन में धर्म का पालन करे और सत्य के मार्ग पर चले।

उनकी गाथा में हमें यह भी मिलता है कि वेदव्यास ने भविष्यवाणी की थी कि महाभारत का युद्ध होगा और उसमें धर्म की विजय होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि इस युद्ध से मानवता को एक नया मार्ग मिलेगा। वास्तव में महाभारत का युद्ध केवल कुरुक्षेत्र का युद्ध नहीं था, वह मानव मन का युद्ध था।

महर्षि वेदव्यास की अद्भुत गाथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएं, हमें सत्य और धर्म का पालन करना चाहिए। वेदव्यास ने अपने जीवन से यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि ज्ञान ही सबसे बड़ा धन है। उन्होंने दिखाया कि लेखनी तलवार से भी अधिक शक्तिशाली होती है।

आज जब हम वेदव्यास की गाथा सुनते हैं, तो हमें यह अनुभव होता है कि वे केवल एक ऋषि नहीं थे, वे युगपुरुष थे। उनका ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था। महाभारत और गीता आज भी हमें जीवन का मार्ग दिखाते हैं।

महर्षि वेदव्यास की गाथा वास्तव में भारतीय संस्कृति की आत्मा है। वेदव्यास ने हमें यह सिखाया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के हर कार्य में धर्म होना चाहिए। उन्होंने हमें यह भी बताया कि ज्ञान का उद्देश्य केवल विद्वता नहीं है, बल्कि मानवता की सेवा है।

इस प्रकार महर्षि वेदव्यास की अद्भुत गाथा हमें प्रेरणा देती है कि हम अपने जीवन में सत्य, धर्म और ज्ञान का पालन करें। वेदव्यास का जीवन एक दीपक है, जो युगों तक मानवता को प्रकाश देता रहेगा।

17.10.17

महाभारत:द्रौपदी की कथा




अग्निकुंड से हुआ था द्रोपदी का जन्म:
महाभारत ग्रंथ के अनुसार एक बार राजा द्रुपद ने कौरवो और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य का अपमान कर दिया था। गुरु द्रोणाचार्य इस अपमान को भूल नहीं पाए। इसलिए जब पण्डवों और कौरवों ने शिक्षा समाप्ति के पश्चात गुरु द्रोणाचार्य से गुरु दक्षिणा माँगने को कहा तो उन्होंने उनसे गुरु दक्षिणा में राजा द्रुपद को बंदी बनाकर अपने समक्ष प्रस्तुत करने को कहाँ। पहले कौरव राजा द्रुपद को बंदी बनाने गए पर वो द्रुपद से हार गए। कौरवों के पराजित होने के बाद पांडव गए और उन्होंने द्रुपद को बंदी बनाकर द्रोणाचार्य के समक्ष प्रस्तुत किया। द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला लेते हुए द्रुपद का आधा राज्य स्वयं के पास रख लिया और शेष राज्य द्रुपद को देकर उसे रिहा कर दिया।
गुरु द्रोण से पराजित होने के उपरान्त महाराज द्रुपद अत्यन्त लज्जित हुये और उन्हें किसी प्रकार से नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे। इसी चिन्ता में एक बार वे घूमते हुये कल्याणी नगरी के ब्राह्मणों की बस्ती में जा पहुँचे। वहाँ उनकी भेंट याज तथा उपयाज नामक महान कर्मकाण्डी ब्राह्मण भाइयों से हुई। राजा द्रुपद ने उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न कर लिया एवं उनसे द्रोणाचार्य के मारने का उपाय पूछा। उनके पूछने पर बड़े भाई याज ने कहा, “इसके लिये आप एक विशाल यज्ञ का आयोजन करके अग्निदेव को प्रसन्न कीजिये जिससे कि वे आपको वे महान बलशाली पुत्र का वरदान दे देंगे।” महाराज ने याज और उपयाज से उनके कहे अनुसार यज्ञ करवाया। उनके यज्ञ से प्रसन्न हो कर अग्निदेव ने उन्हें एक ऐसा पुत्र दिया जो सम्पूर्ण आयुध एवं कवच कुण्डल से युक्त था। उसके पश्चात् उस यज्ञ कुण्ड से एक कन्या उत्पन्न हुई जिसके नेत्र खिले हुये कमल के समान देदीप्यमान थे, भौहें चन्द्रमा के समान वक्र थीं तथा उसका वर्ण श्यामल था। उसके उत्पन्न होते ही एक आकाशवाणी हुई कि इस बालिका का जन्म क्षत्रियों के सँहार और कौरवों के विनाश के हेतु हुआ है। बालक का नाम धृष्टद्युम्न एवं बालिका का नाम कृष्णा रखा गया जो की राजा द्रुपद की बेटी होने के कारण द्रौपदी कहलाई।

शिवजी के वरदान के कारण मिले पांच पति :

द्रौपदी पूर्व जन्म में एक बड़े ऋषि की गुणवान कन्या थी। वह रूपवती, गुणवती और सदाचारिणी थी, लेकिन पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण किसी ने उसे पत्नी रूप में स्वीकार नहीं किया। इससे दुखी होकर वह तपस्या करने लगी। उसकी उग्र तपस्या के कारण भगवान शिव प्रसन्न हए और उन्होंने द्रौपदी से कहा तू मनचाहा वरदान मांग ले। इस पर द्रौपदी इतनी प्रसन्न हो गई कि उसने बार-बार कहा मैं सर्वगुणयुक्त पति चाहती हूं। भगवान शंकर ने कहा तूने मनचाहा पति पाने के लिए मुझसे पांच बार प्रार्थना की है। इसलिए तुझे दुसरे जन्म में एक नहीं पांच पति मिलेंगे। तब द्रौपदी ने कहा मैं तो आपकी कृपा से एक ही पति चाहती हूं। इस पर शिवजी ने कहा मेरा वरदान व्यर्थ नहीं जा सकता है। इसलिए तुझे पांच पति ही प्राप्त होंगे।
द्रौपदी से पांचाली बनने की कहानी :
महाभारत की अन्य पौराणिक कहानियाँ :-

कुंती तथा पांडवों ने द्रौपदी के स्वयंवर के विषय में सुना तो वे लोग भी सम्मिलित होने के लिए धौम्य को अपना पुरोहित बनाकर पांचाल देश पहुंचे। कौरवों से छुपने के लिए उन्होंने ब्राह्मण वेश धारण कर रखा था तथा एक कुम्हार की कुटिया में रहने लगे। राजा द्रुपद द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ करना चाहते थे। लाक्षागृह की घटना सुनने के बाद भी उन्हें यह विश्वास नहीं होता था कि पांडवों का निधन हो गया है, अत: द्रौपदी के स्वयंवर के लिए उन्होंने यह शर्त रखी कि निरंतर घूमते हुए यंत्र के छिद्र में से जो भी वीर निश्चित धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाकर दिये गये पांच बाणों से, छिद्र के ऊपर लगे, लक्ष्य को भेद देगा, उसी के साथ द्रौपदी का विवाह कर दिया जायेगा। ब्राह्मणवेश में पांडव भी स्वयंवर-स्थल पर पहुंचे। कौरव आदि अनेक राजा तथा राजकुमार तो धनुष की प्रत्यंचा के धक्के से भूमिसात हो गये। कर्ण ने धनुष पर बाण चढ़ा तो लिया किंतु द्रौपदी ने सूत-पुत्र से विवाह करना नहीं चाहा, अत: लक्ष्य भेदने का प्रश्न ही नहीं उठा। अर्जुन ने छद्मवेश में पहुंचकर लक्ष्य भेद दिया तथा द्रौपदी को प्राप्त कर लिया। कृष्ण उसे देखते ही पहचान गये। शेष उपस्थित व्यक्तियों में यह विवाद का विषय बन गया कि ब्राह्मण को कन्या क्यों दी गयी है। अर्जुन तथा भीम के रण-कौशल तथा कृष्ण की नीति से शांति स्थापित हुई तथा अर्जुन और भीम द्रौपदी को लेकर डेरे पर पहुंचे। उनके यह कहने पर कि वे लोग भिक्षा लाये हैं, उन्हें बिना देखे ही कुंती ने कुटिया के अंदर से कहा कि सभी मिलकर उसे ग्रहण करो। पुत्रवधू को देखकर अपने वचनों को सत्य रखने के लिए कुंती ने पांचों पांडवों को द्रौपदी से विवाह करने के लिए कहा। द्रौपदी का भाई धृष्टद्युम्न उन लोगों के पीछे-पीछे छुपकर आया था। वह यह तो नहीं जान पाया कि वे सब कौन हैं, पर स्थान का पता चलाकर पिता की प्रेरणा से उसने उन सबको अपने घर पर भोजन के लिए आमन्त्रित किया। द्रुपद को यह जानकर कि वे पांडव हैं, बहुत प्रसन्नता हुई, किंतु यह सुनकर विचित्र लगा कि वे पांचों द्रौपदी से विवाह करने जा रहे हैं। तभी व्यास मुनि ने अचानक प्रकट होकर एकांत में द्रुपद को उन छहों के पूर्वजन्म की कथा सुनायी कि- एक वार रुद्र ने पांच इन्द्रों को उनके दुरभिमान स्वरूप यह शाप दिया था कि वे मानव-रूप धारण करेंगे। उनके पिता क्रमश: धर्म, वायु, इन्द्र तथा अश्विनीकुमार (द्वय) होंगे। भूलोक पर उनका विवाह स्वर्गलोक की लक्ष्मी के मानवी रूप से होगा। वह मानवी द्रौपदी है तथा वे पांचों इन्द्र पांडव हैं। व्यास मुनि के व्यवस्था देने पर द्रौपदी का विवाह क्रमश: पांचों पांडवों से कर दिया गया। इस तरह से पांचो पांडवो से विवाह करके द्रौपदी पांचाली कहलाई।
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