22.10.17

हिन्दी व्याकरण , विलोम शब्द (विपरीतार्थक शब्द)


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किसी शब्द का विलोम शब्द उस शब्द के अर्थ से उल्टा अर्थ वाला होता है। दूसरे शब्दो में एक - दूसरे के विपरीत या उल्टा अर्थ देने वाले शब्द विलोम कहलाते हैं। अत: विलोम का अर्थ है - उल्टा या विरोधी अर्थ देने वाला ।
उदाहरण - प्रमुख शब्दों के विलोम शब्द
शब्द - विलोम
दिन - रात
अच्छा - बुरा
राजा - रंक या रानी या प्रजा
बालक - वृद्ध / बालिका
स्त्री - पुरुष
कृतज्ञ - कृतघ्न
अंकुश - निरंकुश
अकाल - सुकाल
अक्रुर -क्रुर
अकलुष - कलुष
अग्राह्य - ग्राह्य
अग्रज - अनुज
अगला - पिछला
अग्रिम - अन्तिम
अचल - चल
अजल -निर्जल
वृष्टि - अनावृष्टि
अनंत - अंत
अति -अल्प
अथ - इति
अतुकान्त - तुकान्त
अतिवृष्टि - अनावृष्टि
अनाहूत - आहुत
अनुकूल - प्रतिकूल
अनुरक्ति -विरक्ति
अनित्य - नित्य
अनुलोम- - विलोम
अनभिज्ञ- - भिज्ञ
अभिज्ञ - अनभिज्ञ
अमृत, - अमि, (अमिय)
विष - जहर
अर्पण - ग्रह्र्ण
अपेक्षा- - उपेक्षा
अर्वाचीन - प्राचीन
अपकार - उपकार
अवलम्ब - निरालम्ब
अल्प - अधिक
अधम - उत्तम
अवनत - उन्नत
अन्तरंग - बहिरंग
अनाथ - सनाथ
अथ - इति
आदर -अनादर




अदेय -देय
अन्तरंग- -बहिरंग
अंतर -बाह्य
अंशतः -पूर्णतः
अल्पकालीन -दीर्घकालीन
अल्पज्ञ - बहुज्ञ
अपेक्षित - अनपेक्षित
अधुनातन -पुरातन
अस्पृश्य- - स्पृश्य
स्वीकार - अस्वीकार
अवनि, - पृथ्वी,
भू, -अम्बर,
आकाश - नभ
अधर्म - सध्दर्म
अदोष - सदोष
अल्पायु - दीर्घायु
अभ्यस्त - अनभ्यस्त
अनुरक्त - विरक्त
अमर - मर्त्य
अतल - वितल
अवर - प्रवर
अमावस्या - प्रूर्णिमा
असली - नकली
अरूचि - सुरूचि
अज्ञ - विज्ञ
अपकार - उपकार
अनागत - आगत
अनिष्ट - इष्ट
अस्त - उदय
अस्ताचल - उदयाचल
अनातुर - आतुर
अनैतिहासिक - ऐतिहासिक


अपचार - उपचार
अवरोह - आरोह
अनुर्तीण - उर्तीण
रात - दिन
अमृत - विष
अथ - इति
अन्धकार - प्रकाश
अल्पायु - दीर्घायु
इच्छा - अनिच्छ।
उत्कर्ष - अपकर्ष
अनुराग - विराग
आदि - अंत
आगामी - गत
उत्थान - पतन
आग्रह - दुराग्रह
एकता - अनेकता
अनुज - अग्रज
आकर्षण - विकर्षण
उद्यमी - आलसी
अधिक - न्यून
आदान - प्रदान
उर्वर - ऊसर
एक - अनेक
आलस्य - स्फूर्ति
अर्थ - अनर्थ
उधार - नगद
उत्कृष्ट - निकृष्ट
उत्तम - अधम
आदर्श - यथार्थ
आय - व्यय
स्वाधीन - पराधीन
आहार - निराहार
दाता - याचक
खेद - प्रसन्नता
गुप्त - प्रकट
प्रत्यक्ष - परोक्ष
घृणा - प्रेम
सजीव - निर्जीव
सुगंध - दुर्गन्ध
मौखिक - लिखित
संक्षेप - विस्तार
घात - प्रतिघात
निंदा - स्तुति
मितव्यय - अपव्यय
सरस - नीरस
सौभाग्य - दुर्भाग्य
मोक्ष - बंधन
कृतज्ञ - कृतघ्न
क्रय - विक्रय
दुर्लभ - सुलभ
निरक्षर - साक्षर
नूतन - पुरातन
बंधन - मुक्ति
ठोस - तरल
यश - अपयश
सगुण - निर्गुण
मूक - वाचाल
रुग्ण - स्वस्थ
रक्षक - भक्षक
वरदान - अभिशाप
शुष्क - आर्द्र
हर्ष - शोक
क्षणिक - शाश्वत
विधि - निषेध
विधवा - सधवा
शयन - जागरण
शीत - उष्ण
सक्रिय - निष्क्रय
सफल - असफल
सज्जन - दुर्जन
शुभ - अशुभ
संतोष - असंतोष

अमृत- विष
अथ- इति
अन्धकार- प्रकाश
अल्पायु- दीर्घायु
अनुराग- विराग
अनुज- अग्रज
अधिक- न्यून
अर्थ- अनर्थ
अतिवृष्टि- अनावृष्टि
अनुपस्थिति- उपस्थिति
अज्ञान- ज्ञान
अनुकूल- प्रतिकूल
अभिज्ञ- अनभिज्ञ
अल्प- अधिक
अनिवार्य- वैकल्पिक
अगम- सुगम
अभिमान- नम्रता
अनुग्रह- विग्रह
अपमान- सम्मान
अरुचि- रुचि
अर्वाचीन- प्राचीन
अवनति- उन्नति
अवनी- अंबर
अच्छा- बुरा
अच्छाई- बुराई
अमीर- ग़रीब
अंधेरा- उजाला
अर्जित- अनर्जित
अंत- प्रारंभ
अंतिम- प्रारंभिक
अनजान- जाना-पहचाना
आदि- अंत
आगामी- गत
आग्रह- दुराग्रह
आकर्षण- विकर्षण
आदान- प्रदान
आलस्य- स्फूर्ति
आदर्श- यथार्थ
आय- व्यय
आहार- निराहार
आविर्भाव- तिरोभाव
आमिष- निरामिष
आर्द्र- शुष्क
आज़ादी- ग़ुलामी
आकाश- पाताल
आशा- निराशा
आश्रित- निराश्रित

आरंभ- अंत
आदर- अनादर
आयात- निर्यात
आर्य- अनार्य
आदि- अनादि
आस्तिक- नास्तिक
आवश्यक- अनावश्यक
आनंद- शोक
आधुनिक- प्राचीन
आना- जाना
आलस्य- फुर्ती
आध्यात्मिक- भौतिक
इच्छा- अनिच्छा
इष्ट- अनिष्ट
इच्छित- अनिच्छित
इहलोक- परलोक
उत्कर्ष- अपकर्ष
उत्थान- पतन
उद्यमी- आलसी
उर्वर- ऊसर
उधार- नक़द
उपस्थित- अनुपस्थित
उत्कृष्ट- निकृष्ट
उपजाऊ- बंजर
उदय- अस्त
उपकार- अपकार
उदार- अनुदार
उत्तीर्ण- अनुत्तीर्ण
उत्तर- दक्षिण
ऊंचा- नीचा
उन्नति- अवनति
उचित- अनुचित
उत्तरार्द्ध- पूर्वार्द्ध
एकता- अनेकता
एक- अनेक
ऐसा- वैसा
औपचारिक- अनौपचारिक
कृतज्ञ- कृतघ्न
क्रय- विक्रय
कमाना- खर्च करना
क्रूर- दयालु
कच्चा- पक्का
कटु- मधुर
क्रिया- प्रतिक्रिया
कड़वा- मीठा
क्रुद्ध- शान्त
कर्म- निष्कर्म
कठिनाई- सरलता
कभी-कभी- अक्सर
कठिन- सरल
केंद्रित- विकेंद्रित
क़रीबी- दूर के
कम- अधिक
खेद- प्रसन्नता
खिलना- मुरझाना
खुशी- दु:ख
ख़रीददार- विक्रेता
ख़रीद- बिक्री
ख़रीदना- बेचनागर्म- ठंडा
गन्दा- साफ़
गहरा- उथला
ग़रीब- अमीर
गुण- दोष, अवगुण
ग़लत- सही
घृणा- प्रेम
घात- प्रतिघात
घर- बाहर
घाटा- फ़ायदा
चर- अचर
चौड़ी- संकरी, तंग
छोटा- बड़ा
छूत- अछूत
जन्म- मृत्यु
जल्दी- देरी
जीवन- मरण
जल- थल
जड़- चेतन
जटिल- सरस
झूठ- सच
ठोस- तरल
डरपोक- निड़र
तुच्छ- महान
तकलीफ़- आराम
तपन- ठंडक
दुर्लभ- सुलभ
दाता- याचक
दिन- रात
देव- दानव
दुराचारी- सदाचारी
दयालु- निर्दयी
देशी- परदेशी
धीरे- तेज़
धनी- ग़रीब, निर्धन
धर्म- अधर्म
धूप- छाँव
धीर- अधीर
न्याय- अन्याय
निजी- सार्वजनिक
नक़द- उधार
नियमित- अनियमित
निश्चित- अनिश्चित
निरक्षर- साक्षर
नूतन- पुरातन
निंदा- स्तुति
निर्दोष- र्दोष
नीचा- ऊंचा
नकली- असली
निर्माण- विनाश
निकट- दूर
प्यार- घृणा
प्रत्यक्ष- परोक्ष
पतला- मोटा
पाप- पुण्य
पतिव्रता- कुलटा
प्रलय- सृष्टि
पवित्र- अपवित्र
प्रश्न- उत्तर
पूर्ण- अपूर्ण
प्रेम- घृणा
परतंत्र- स्वतंत्र
प्राचीन- नवीन / नया
पक्ष- निष्पक्ष
प्राकृतिक- अप्राकृतिक
प्रसन्न- अप्रसन्न
प्रभावित- अप्रभावित
पोषण- कुपोषण
परिचित- अपरिचित
प्रवेश- निकास
पदोन्नति- पदावनति
प्रतिकूल- अनुकूल
प्रारंभ- अंत
पसंद- नापसंद
बंधन- मुक्ति
बुद्धिमता- मूर्खता
बासी- ताजा
बाढ़- सूखा
बुराई- भलाई
भूलना- याद करना
भाव- अभाव
मूक- वाचाल
मितव्यय- अपव्यय
मोक्ष- बंधन
मौखिक- लिखित
मानवता- दानवता
महात्मा- दुरात्मा
मान- अपमान
मधुर- कटु
मित्र- शत्रु
मिथ्या- सत्य
मंगल- अमंगल
महंगा- सस्ता
मेहनती- आलसी / कामचोर
मृत्यु- जन्म
मंजूर- नामंजूर
मुमकिन- नामुमकि
नयशनयश- अपयश
युद्ध- शांति
योग्य- अयोग्य
रात- दिन
रुग्ण- स्वस्थ
रक्षक- भक्षक
राग- द्वेष
रात्रि- दिवस
राजा- रंक
रुचि- अरुचि
रोज़गार- बेरोज़गा
लाभ- हानि
व्यवस्था- अव्यवस्था
व्यावहारिक- अव्यावहारिक
विधि- निषेध
विधवा- सधवा
वरदान- अभिशाप
विनम्रता- घमंड
विजय- पराजय
वसंत- पतझड़
विरोध- समर्थन
विशुद्ध- दूषित
विषम- सम
विद्वान- मूर्ख
विश्वास- अविश्वास
विकसित- अविकसित
विशिष्ट- सामान्य / साधारण
विश्वनीय- अविश्वनीय
विस्तृत- संक्षिप्त
विकास- ह्रास
श्वेत- श्याम
शयन- जागरण
शीत- उष्ण
शुभ- अशुभ
शुष्क- आर्द्र
शोर- शांन्ति
श्रम- विश्राम
श्रोता- वक्ता
स्वतंत्र- परतंत्र
स्वस्थ- अस्वस्थ
स्वीकृत- अस्वीकृत
स्वदेश- विदेश
स्वर्ग- नरक
स्तुति- निंदा
स्वाधीन- पराधीन
स्वतंत्रता- दासता
स्वीकार- अस्वीकार
स्थाई- अस्थायी
सजीव- निर्जीव
सुगंध- दुर्गन्ध
संक्षेप- विस्तार
सरस- नीरस
सौभाग्य- दुर्भाग्य
सगुण- निर्गुण
सक्रिय- निष्क्रय
सफल- असफल
सज्जन- दुर्जन
संतोष- असंतोष
सुखान्त- दुखांत
सच- झूठ
सुन्दर- बदसूरत, कुरूप
साक्षर- निरक्षर
साधु- असाधु
सुपुत्र- कुपुत्र
सुर- असुर
सुमति- कुमति
साकार- निराकार
सुजन- दुर्जन
सम्मान- अपमान, अनादर
सुबह- शाम
सूर्योदय- सूर्यास्त
सरकारी- ग़ैरसरकारी
सुविधा- असुविधा
सस्ता- महंगा
सक्षम- अक्षम
सुरक्षित- असुरक्षित
संभव- असंभव
संतुलित- असंतुलित
संतुलन- असंतुलन
सावधानी- असावधानी
सघन- विरल
सहायक- बाधक
सहमत- असहमत
सुख- दुख
सहयोग- असहयोग
सहमति- असहमति
समापन- उद्घाटन
सर्दी- गर्मी
हर्ष- शोक
हित- अहित
हिंसा- अहिंसा
हार- जीत
हानि- लाभ
क्षणिक- शाश्वत
ज्ञान- अज्ञान
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हिन्दी : समास के भेद या प्रकार




हिन्दी : समास के भेद या प्रकार 

समास दो अथवा दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए नए सार्थक शब्द को कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि "समास वह क्रिया है, जिसके द्वारा कम-से-कम शब्दों मे अधिक-से-अधिक अर्थ प्रकट किया जाता है।
समास का शाब्दिक अर्थ है- 'संक्षेप'। समास प्रक्रिया में शब्दों का संक्षिप्तीकरण किया जाता है।
समास के भेद या प्रकार
समास के छ: भेद होते है-
अव्ययीभाव समास - (Adverbial Compound)
तत्पुरुष समास - (Determinative Compound)
कर्मधारय समास - (Appositional Compound)
द्विगु समास - (Numeral Compound)
द्वंद्व समास - (Copulative Compound)
बहुव्रीहि समास - (Attributive Compound)
अव्ययीभाव समास
जिस समास का पहला पद प्रधान हो और वह अव्यय हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। जैसे - यथामति (मति के अनुसार), आमरण (मृत्यु कर) न् इनमें यथा और आ अव्यय हैं।
कुछ अन्य उदाहरण -
आजीवन - जीवन-भर
यथासामर्थ्य - सामर्थ्य के अनुसार
यथाशक्ति - शक्ति के अनुसार
यथाविधि- विधि के अनुसार
यथाक्रम - क्रम के अनुसार
भरपेट- पेट भरकर
हररोज़ - रोज़-रोज़
हाथोंहाथ - हाथ ही हाथ में
रातोंरात - रात ही रात में
प्रतिदिन - प्रत्येक दिन
बेशक - शक के बिना
निडर - डर के बिना
निस्संदेह - संदेह के बिना
प्रतिवर्ष - हर वर्ष
अव्ययीभाव समास की पहचान - इसमें समस्त पद अव्यय बन जाता है अर्थात समास लगाने के बाद उसका रूप कभी नहीं बदलता है। इसके साथ विभक्ति चिह्न भी नहीं लगता। जैसे - ऊपर के समस्त शब्द है।
तत्पुरुष समास - जिस समास का उत्तरपद प्रधान हो और पूर्वपद गौण हो उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे - तुलसीदासकृत = तुलसी द्वारा कृत (रचित)
ज्ञातव्य- विग्रह में जो कारक प्रकट हो उसी कारक वाला वह समास होता है।
विभक्तियों के नाम के अनुसार तत्पुरुष समास के छह भेद हैं-
कर्म तत्पुरुष (गिरहकट - गिरह को काटने वाला)
करण तत्पुरुष (मनचाहा - मन से चाहा)
संप्रदान तत्पुरुष (रसोईघर - रसोई के लिए घर)
अपादान तत्पुरुष (देशनिकाला - देश से निकाला)
संबंध तत्पुरुष (गंगाजल - गंगा का जल)
अधिकरण तत्पुरुष (नगरवास - नगर में वास)
 

तत्पुरुष समास के प्रकारनञ तत्पुरुष समास
जिस समास में पहला पद निषेधात्मक हो उसे नञ तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे -
समस्त पदसमास-विग्रहसमस्त पदसमास-विग्रह
असभ्य न सभ्य अनंत न अंत
अनादि न आदि असंभव न संभव
कर्मधारय समास
जिस समास का उत्तरपद प्रधान हो और पूर्वपद व उत्तरपद में विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का संबंध हो वह कर्मधारय समास कहलाता है। जैसे -
समस्त पदसमास-विग्रहसमस्त पदसमास-विग्रह
चंद्रमुख चंद्र जैसा मुख कमलनयन कमल के समान नयन
देहलता देह रूपी लता दहीबड़ा दही में डूबा बड़ा
नीलकमल नीला कमल पीतांबर पीला अंबर (वस्त्र)
सज्जन सत् (अच्छा) जन नरसिंह नरों में सिंह के समान
द्विगु समास
जिस समास का पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण हो उसे द्विगु समास कहते हैं। इससे समूह अथवा समाहार का बोध होता है। जैसे -
समस्त पदसमास-विग्रहसमस्त पदसमास-विग्रह
नवग्रह नौ ग्रहों का समूह दोपहर दो पहरों का समाहार
त्रिलोक तीन लोकों का समाहार चौमासा चार मासों का समूह
नवरात्र नौ रात्रियों का समूह शताब्दी सौ अब्दो (वर्षों) का समूह
अठन्नी आठ आनों का समूह त्रयम्बकेश्वर तीन लोकों का ईश्वर
द्वंद्व समास
जिस समास के दोनों पद प्रधान होते हैं तथा विग्रह करने पर ‘और’, अथवा, ‘या’, एवं लगता है, वह द्वंद्व समास कहलाता है। जैसे-
समस्त पदसमास-विग्रहसमस्त पदसमास-विग्रह
पाप-पुण्य पाप और पुण्य अन्न-जल अन्न और जल
सीता-राम सीता और राम खरा-खोटा खरा और खोटा
ऊँच-नीच ऊँच और नीच राधा-कृष्ण राधा और कृष्ण
बहुव्रीहि समास
जिस समास के दोनों पद अप्रधान हों और समस्तपद के अर्थ के अतिरिक्त कोई सांकेतिक अर्थ प्रधान हो उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। जैसे -
समस्त पदसमास-विग्रह
दशानन दश है आनन (मुख) जिसके अर्थात् रावण
नीलकंठ नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव
सुलोचना सुंदर है लोचन जिसके अर्थात् मेघनाद की पत्नी
पीतांबर पीला है अम्बर (वस्त्र) जिसका अर्थात् श्रीकृष्ण
लंबोदर लंबा है उदर (पेट) जिसका अर्थात् गणेशजी
दुरात्मा बुरी आत्मा वाला (कोई दुष्ट)
श्वेतांबर श्वेत है जिसके अंबर (वस्त्र) अर्थात् सरस्वती जी
कर्मधारय और बहुव्रीहि समास में अंतर
कर्मधारय में समस्त-पद का एक पद दूसरे का विशेषण होता है। इसमें शब्दार्थ प्रधान होता है। जैसे - नीलकंठ = नीला कंठ। बहुव्रीहि में समस्त पद के दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य का संबंध नहीं होता अपितु वह समस्त पद ही किसी अन्य संज्ञादि का विशेषण होता है। इसके साथ ही शब्दार्थ गौण होता है और कोई भिन्नार्थ ही प्रधान हो जाता है। जैसे - नील+कंठ = नीला है कंठ जिसका अर्थात शिव।.पदों की प्रधानता के आधार पर वर्गीकरण-
पूर्वपद प्रधान - अव्ययीभाव
उत्तरपद प्रधान - तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु
दोनों पद प्रधान - द्वंद्व
दोनों पद अप्रधान - बहुव्रीहि (इसमें कोई तीसरा अर्थ प्रधान होता है)
संधि और समास में अंतरसंधि वर्णों में होती है। इसमें विभक्ति या शब्द का लोप नहीं होता है। जैसे - देव+आलय = देवालय। समास दो पदों में होता है। समास होने पर विभक्ति या शब्दों का लोप भी हो जाता है। जैसे - माता-पिता = माता और पिता।



रस के प्रकार और उदाहरण






काव्य या साहित्य को पढने-सुनने या देखने से जो आनंद मिलता है, उसे रस कहा जाता है!
रस के अवययो और अंगो पर प्रकाश डालिए!
रस-निष्पति के तिन प्रमुख अवयय है-
1.भाव
2.विभाव
3.अनुभाव
1.भाव
मन के विकारो या आवेगों को भाव कहते है! ये दो प्रकार के होते है-
1.स्थायी भाव
2.व्यभिचारी या संचारी भाव
स्थायी भाव-ये प्रत्येक मनुष्य के ह्रदय में स्थायी रूप से स्थित होते है! कोई भी मनुष्य इनसे
वंचित नहीं है! ये संख्या नौ है-
रति, उत्साह, विस्मय, हास, शोक, क्रोध, भय, जुगुप्सा, बैराग्य!
स्थायी भाव     रस
1.रति           श्रृंगार
2.उत्साह       वीर
3.वैराग्य         शांत
4.शोक          करुण
5.क्रोध           रौद्र
6.भय          भयानक
7.घृणा         वीभत्स
8.बिस्मय    अद्भुत
9.हास        हास्य
10.वत्सलता   वात्सल्य

व्यभिचारी या संचारी भाव: 
ये संख्या में 33 होते है! ये मनोभाव स्थायी ना होकर चंचल होते है
तथा बुलबुलों की तरह उठाते गिरते रहते है! कुछ प्रमुख संचारी भाव निम्न है-
शंका, जड़ता, चिंता, उग्रता, हर्ष, गर्व आदि!
2.विभाव
विभाव का अर्थ है- भावो के कारण! जिन विषय-प्रस्तुतियों के द्वारा मन के स्थायी भाव
जाग्रत होते है, उन्हें विभाव कहते है!
विभाव के तिन अंग है-
आश्रय, आलंबन और उधीपन
1.आश्रय: जिनके ह्रदय में भाव जागते है, उन्हें आश्रय कहते है! ये दो प्रकार के होते है-
1.विभव के अंग:जैसे कहानी में राम को देखकर सीता के मन में प्रेम की अनुभाती हुई!
इसमें सीता आश्रय है! सीता के ह्रदय में प्रेम जाग्रत हुआ! सीता आश्रय विभव है!
2.सहृदय का ह्रदय:कहानी या काव्या को पढने, सुनने या देखने वाला भी आश्रय है! उसके
ह्रदय में सभी भाव जाग्रत होते है!
2.आलंबन:जिस प्रमुख व्यक्ति, वास्तु को देखकर ह्रदय में भाव जागता है, उसे आलंबन कहते है!
3.उधीपन:जिन प्रेरक व्यक्तियों के सहयोग से नुल भाव जागने में सहायता मिली, उन्हें उधीपन कहते है!
3.अनुभाव:
आश्रय की चेस्ठावो को अनुभाव कहते है!
1.श्रृंगार रस-Image result for श्रृंगार रस-
नायक-नायिका के प्रेम को देखकर श्रृंगार रस प्रकट होता है! यह सृष्टि का सबसे व्यापक भाव है
जो सभी में पाया जाता है, इसलिए इसे रसराज भी कहा जाता है! इसके दो प्रमुख प्रकार है-
1.संयोग श्रृंगार 2.वियोग श्रृंगार
संयोग श्रृंगार: उदाहरण-
एक पल मेरे प्रिय के दृग पलक, थे उठे ऊपर सहज निचे गिर
चपलता ने इसे विकंपित पुलक से दृढ किया मनो प्रणय सम्बन्ध था!
वियोग श्रृंगार: उदाहरण-
पीर मेरी कर रही गमगीन मुझको
और उससे भी अधिक तेरे नयन का नीर, रानी
और उससे भी अधिक हर पाँव की जंजीर, रानी!
2.वीर रस-Image result for वीर रस-
उत्साह स्थायी भाव जब विभावो अनुभावो और संचारी भावो की सहायता से पुष्ट होकर
आस्वादन के योग्य हो जाता है तब वीर रस निष्पन होता है!
वीर चार प्रकार के मने गए है-
(1)युद्याविर
(2)दानवीर
(3)दयावीर
4)धर्मवीर
इनमे युध्यविर रूप प्रमुख है!
उदाहरण- ‘‘हे सारथे ! हैं द्रोण क्या, देवेन्द्र भी आकर अड़े,
है खेल क्षत्रिय बालकों का व्यूह-भेदन कर लड़े।
3.शांत रस-
जहा संसार के प्रति निर्वेद रस रूप में परिणत होता है वहा शांत रस होता है!
उदाहरण: ऐसेहू साहब की सेवा सों होत चोरू रे।
अपनी न बूझ, न कहै को राँडरोरू रे।।
मुनि-मन-अगम, सुगत माइ-बापु सों।
कृपासिंधु, सहज सखा, सनेही आपु सों।।
4.करुण रस-Image result for करुण रस-
इष्ट की हानि का चिर वियोग अर्थ हानि शोक का विभाग अनुभाव और संचारी भावो के सहयोग
से रस रूप में व्यक्त होता है, उसे करुण रस कहते है!
उदाहरण:
हा सही ना जाती मुझसे
अब आज भूख की जवाला !
कल से ही प्याश लगी है
हो रहा ह्रदय मतवाला!
सुनती हु तू राजा है
मै प्यारी बेटी तेरी!
क्या दया ना आती तुझको
यह दशा देख कर मेरी!
5.रौद्र रस-Image result for रौद्र रस-
जहा विरोधी के प्रति प्रतिशोध एवं क्रोध का भाव जाग्रत हो, वहा रौद्र रस होता है!
उदाहरण:
श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन छोभ से जलने लगे!
सब शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे!
संसार देखे अब हमारे शत्रु रन में मृत पड़े!
करते हुए यह घोषणा हो गए उठकर खड़े!!
6.भयानक रस-Image result for भयानक रस-
जहा भय स्थायी भाव पुष्ट और विकशित हो वहा भयानक रस होता है!
उदाहरण:
एक ओर अजग्रही लखी, एक ओर मृगराय!
विकल बटोही बिच ही, परयो मूर्छा खाय!!

7.वीभत्स रस-

Image result for वीभत्स रस-
जहा किसी वास्तु अथवा दृश्य के प्रति जुगुप्सा का भाव परिप्रुष्ट हो, वहा वीभत्स रस होता है!
उदाहरण:
सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खाक निकारत!
खींचत जिभाही स्यार अतिहि आनंद उर धारत!!
गीध जांघि को खोदी-खोदी के मांश उपारत!
स्वान अंगुरिन काटी-काटी के खात विदारत!!

8.अद्भुत रस-
Image result for अद्भुत रस के उदाहरण
आश्चर्जनक एवं विचित्र वास्तु के देखने व सुनने जब सब आश्चर्य का परिपोषण हो, तब अद्भुत
रस की प्रतीति होती है!
उदाहरण:
अखील भुवन चर अचर सब, हरी मुख में लखी मातु!
चकित भई गदगद वचन, विकशित दृग पुल्कातु!!
9.हास्य रस-Image result for हास्य रस के उदाहरण
विलक्षण विषय द्वारा जहा हास्य का विस्तार एवं पोषण हो, वहा हास्य रस होते है!
उदाहरण:
लाला की लाली यो बोली-
सारा खाना ये चर जायेंगे!
जो बचे भूखे बैठे है
क्या पंडित जी को खायेंगे!!
10.वात्सल्य रस-
Image result for वात्सल्य रस-
संस्कृत आचार्यो ने केवल नौ रासो को ही मान्यता दी है! कुछ आधुनिक विद्वान वात्सल्य और
भक्ति रस को भी मानते है! उनके अनुसार-बाल-रति के आधार पर क्रमशः वात्सल्य और भक्ति
रस का प्रकाशन होता है!
उदाहरण:
बाल दशा मुख निरखि जसोदा पुनि पुनि नन्द बुलावति!
अंचरा तर तै ढंकी सुर के प्रभु को दूध पियावति!!
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जीवन मे धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष का महत्व





मनुष्य जीवन के 4 पुरुषार्थ माने गए हैं। ये 4 हैं धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। लेकिन इन चारों का उद्देश्य क्या है? धर्म का उद्देश्य मोक्ष है, अर्थ नहीं। धर्म के अनुकूल आचरण करो तो किसके लिए? मोक्ष के लिए। अर्थ से धर्म कमाना है, धर्म से अर्थ नहीं कमाना। धन केवल इच्छाओं की पूर्ति के लिए मत कमाओ।
पुरुषार्थ दो शब्दों से बना है- पुरुष तथा अर्थ। पुरुष का अर्थ है विवेकशील प्राणी तथा अर्थ का मतलब है लक्ष्य। इसलिए पुरुषार्थ का अर्थ हुआ विवेकशील प्राणी का लक्ष्य। एक विवेकशील प्राणी का लक्ष्य होता है परमात्मा से मिलन। इसके लिए वह जिन उपायों को अपनाता है वे ही पुरुषार्थ हैं। हिंदू चिंतन के अनुसार इस पुरुषार्थ के चार अंग हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। हमारे महान ऋषियों ने मानव जीवन में इन अंगों को अनिवार्य मानते हुए इन्हें अपनाने का उपदेश दिया है।
अच्छे कपड़े हों, महंगे आभूषण हों, दुनिया भर के संसाधन हों, इन सबकी जीवन के लिए जरूरत है, इसमें दो राय नहीं। लेकिन जीवन का लक्ष्य यह नहीं है कि केवल इन्हीं में उलझे रहें।
सिर्फ कामनाओं की पूर्ति के लिए ही अर्थ नहीं कमाना है। हम दान कर सकें, इसलिए भी धन कमाना है। हम परमार्थ में उसको लगा सकें इसलिए भी कमाना है। वर्ना अर्थ, अनर्थ का कारण बनेगा। धन परमार्थ की ओर भी ले जाएगा और इससे अनर्थ भी हो सकता है इसीलिए धर्म का हेतु मोक्ष है, अर्थ नहीं और अर्थ का हेतु धर्म है, काम नहीं। काम का हेतु इस जीवन को चलायमान रखना है। केवल इंद्रियों को तृप्त करना काम का उद्देश्य नहीं है।
काम इसलिए है कि जीवन चलता रहे। मकान, कपड़ा, रोटी ये सब जीवन की आवश्यकताएं हैं और आवश्यकताओं को जुटाने के लिए पैसा कमाना पड़ता है। इसी तरह जीवन की आवश्यकता है काम ताकि जीवन चलता रहे, वंश परम्परा चलती रहे।
धर्म क्या है?
पुरुषार्थों में पहला स्थान धर्म का है। जीवन में जो भी धारण किया जाता है वही धर्म कहलाता है। धर्म मनुष्य को अच्छे कार्यों की ओर ले जाता है। वह व्यक्ति की विभिन्न रुचियों, इच्छाओं और आवश्यकताओं के बीच एक संतुलन बनाए रखता है। 'महाभारत' के अनुसार धर्म वही है जो किसी को कष्ट नहीं देता। धर्म में लोककल्याण की भावना निहित है। मनु के अनुसार जो व्यक्ति धर्म का सम्मान करता है, धर्म उस व्यक्ति की सदैव रक्षा करता है। धर्म के मार्ग पर चलकर व्यक्ति इस संसार में तथा परलोक में शांति प्राप्त कर सकता है। मनुष्य समाज में रहकर अनेक प्रकार के क्रियाकलाप करता है। धर्म उसके सामाजिक आचरण को एक निश्चित और सकारात्मक रूप देता है।
भारतीय संस्कृति में अर्थ का क्या महत्व है?
अर्थ का सीधा संबंध जीवनयापन करने में सहायक भौतिक उपादानों से है।
अधिकांश लोगों का मानना है कि भारतीय संस्कृति में परलोक एवं मोक्ष को ही प्रमुखता दी गई है, इहलोक (सांसारिक जीवन) वहां उपेक्षित है। यह एक गलत धारणा है। वास्तव में भारतीय संस्कृति में इहलोक एवं परलोक दोनों को समान महत्व दिया गया है। मनुष्य के इहलौकिक एवं पारलौकिक उद्देश्यों के मध्य जितना उदात्त एवं उत्कृष्ट सामंजस्य भारतीय संस्कृति में है उतना किसी अन्य संस्कृति में नहीं। इसी सामंजस्य के कारण ही भारत जहां दर्शन के क्षेत्र में ऊंचाई पर पहुंचा, वहीं उसकी भौतिक उपलब्धियां भी विशिष्ट रहीं।
यह सही है कि भारतीय संस्कृति में मनुष्य का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है, किंतु अर्थ का महत्व भी इस संस्कृति में कम नहीं है। अर्थ को यदि जीवन का अंतिम लक्ष्य माना जाता तो भारत संभवत: अर्थ का दास बनकर ही रह जाता।
काम का मर्यादित रूप क्या है?
भारतीय संस्कृति में पुरुषार्थों के अंतर्गत काम की भी गणना की गई है। मनुष्य के जीवन में काम का भी उतना ही महत्व है, जितना धर्म व अर्थ का। मनुष्य की रागात्मक प्रवृत्ति का नाम है- काम। आहार, निदा, भय एवं काम मनुष्य एवं पशुओं में सामान्य रूप से पाए जाते हैं, मगर मनुष्य एक सामाजिक एवं बुद्धिसंपन्न प्राणी है। वह प्रत्येक कार्य बुद्धि की सहायता से करता है। पशुओं में काम स्वाभाविक रूप से होता है। उनमें विचार तथा भावना नहीं होती है। मनुष्य का काम संबंध शिष्ट एवं नियंत्रित होता है। मनुष्य के इस व्यवहार को मर्यादित करने के लिए स्त्री-पुरुष संबंध को स्थायी, सभ्य एवं सुसंस्कृत रूप दिया गया। विवाह द्वारा मनुष्य की उच्छृंखल काम वासना को मर्यादित किया गया। भारतीय परंपरा में काम का उद्देश्य संतानोत्पत्ति माना गया है, काम वासना की पूर्ति नहीं।
मोक्ष कैसे संभव है?
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों में गहरा संबंध है। मोक्ष से धर्म का प्रत्यक्ष संबंध है। सभी प्राणी केवल धर्म का आश्रय ग्रहण कर तथा उसी के अनुसार आचरण कर मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। इसलिए कहा गया है कि मनुष्य अर्थ एवं काम का सेवन करता हुआ मोक्ष को प्राप्त करे। कौटिल्य ने कहा है कि व्यक्ति संसार में रहकर सारे ऐश्वर्य प्राप्त करे, उपभोग करे, धन संचय करे, किंतु सब धर्मानुकूल हो। उनके मूल में धर्म का अनुष्ठान हो। काम के लिए भी वात्स्यायन ने कामसूत्र में कहा है कि वही काम प्रवृत्ति पुरुषार्थ के अंतर्गत आ सकती है जो धर्म के अनुरूप हो। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि धर्मपूर्ण काम में ईश्वर विद्यमान रहता है। इस प्रकार धर्मानुकूल अर्थ व काम का सेवन करने से मनुष्य परम पुरुषार्थ- मोक्ष के समीप पहुंचता है।
पुरुषार्थ की अवधारणा भौतिक एवं आध्यात्मिक जगत के बीच संतुलन स्थापित करती है। पुरुषार्थों के माध्यम से ही मनुष्य के जीवन का सर्वांगीण विकास हो पाता है। पुरुषार्थ का सिद्धांत भारतीय संस्कृति की आत्मा है।