26.10.19

मीणा जाति समाज की जानकारी और गौत्रानुसार कुलदेवी:Meena caste history




मीणा इतिहास एक परिचय..
मीणा जाति मूल रूप से भारत के राजस्थान राज्य में निवास करने वाली एक जऩजाति है। मीणा जाति भारतवर्ष की प्राचीनतम पांच सबसे बडी जनजातियों में से एक मानी जाती है ।

*वेद पुराणों के अनुसार मीणा जाति मत्स्य  भगवान की वंशज है। पुराणों के अनुसार चैत्र शुक्ला तृतीया को कृतमाला नदी के जल से मत्स्य भगवान प्रकट हुए थे। इस दिन को मीणा समाज जहां एक ओर मत्स्य जयन्ती के रूप में मनाया जाता है वहीं दूसरी ओर इसी दिन संम्पूर्ण राजस्थान में गणगौर का त्योहार बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है।*
मीणा जाति का गणचिह्न मीन (मछली) था। मछली को संस्कृत में मत्स्य कहा जाता है। प्राचीनकाल में मीणा जाति के राजाओं के हाथ में वज्र तथा ध्वजाओं में मत्स्य का चिह्न अंकित होता था, इसी कारण से प्राचीनकाल में मीणा जाति को मत्स्य माना गया।
प्राचीन ग्रंथों में मत्स्य जनपद का स्पष्ट उल्लेख है जिसकी राजधानी विराट नगर थी, जो अब जयपुर वैराठ है। इस मस्त्य जनपद में अलवर, भरतपुर एवं जयपुर के आस-पास का क्षेत्र शामिल था। आज भी मीणा लोग इसी क्षेत्र में बहुत अधिक संख्या में रहते हैं।
मीणा जाति के भाटों के अनुसार मीणा जाति में 12 पाल, 32 तड़ एवं 5248 गौत्र हैं। मूलतः मीना एक सत्तारूढ़ [जाति] थे, और मत्स्य, यानी, राजस्थान या मत्स्य संघ के शासक थे, लेकिन उनका पतन स्य्न्थिअन् साथ आत्मघात से शुरू हुआ और पूरा जब ब्रिटिश सरकार ने उन्हें राजपूतों के साथ मिलकर "आपराधिक जाति" में डाल दिया था। यह कार्रवाई, राजस्थान में राजपूत राज्य के साथ उनके गठबंधन के समर्थन में लिया गया निर्णय थी |
राजा आम्बेर (जयपुर) सहित राजस्थान के प्रमुख भागों के प्रारंभिक शासक थे। पुस्तक 'संस्कृति और भारतीय जातियों की एकता में कहा गया है कि मीणा  राजपूतों के समान एक क्षत्रिय जाति के रूप में मानी जाती हे परंतु इतिहास में उल्लेख बहुत कम किया गया हैै।
प्राचीन समय में राजस्थान मे मीणा  वंश के राजाओ का शासन था। मीणा राज्य मछली (राज्य) कहा जाता था। संस्कृत में मत्स्य राज्य का ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है| बाद में भील और मीना, विदेशी लोगों से जो कि सिंध्, हेप्थलिते या अन्य मध्य एशियाई गुटों के साथ आये थे, से मिश्रित हुए।
 जाति इतिहासकार डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार  मीणा  मुख्य रूप से मीन भगवान और  शिव की पुजा करते हैं। मीणाओ मे कई अन्य हिंदू जातिओं की तुलना में महिलाओं के लिए बेहतर अधिकार रहे हैं। विधवाओं और तलाकशुदा का पुनर्विवाह एक आम बात है और इसे अच्छी तरह से  समाज में स्वीकार कर लिया  गया है। इस तरह के अभ्यास वैदिक सभ्यता का हिस्सा हैं।
आक्रमण के वर्षों के दौरान, और १८६८ के भयंकर अकाल में तबाही  के तनाव के तहत कई  समुह बने। एक परिणाम के रूप मे भूखे परिवारों को जाति और ईमानदारी का संदेह का परित्याग करने के लिए पशु चोरी और उन्हें खाने के लिए मजबूर होना पडा।.
*विषय सूची*
1 वर्ग
2 मीणा जाति के प्रमुख राज्य निम्नलिखित थे
3 मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख किले
4 मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख बाबड़ियां
5 मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख मंदिर :
*१-मीणा जाति प्रमुख रूप से निम्न वर्गों में बंटी हुई है..*
:-जमींदार या पुरानावासी मीणा :-
जमींदार या पुरानावासी मीणा वे हैं जो प्रायः खेती एवं पशुपालन का कार्य बर्षों से करते आ रहे हैं। ये लोग राजस्थान के सवाईमाधोपुर, करौली,दौसा व जयपुर जिले में सर्वाधिक हैं|
*-:चौकीदार या नयाबासी मीणा :-*
चौकीदार या नयाबासी मीणा वे मीणा हैं जो अपनी स्वछंद प्रकृति के कारण चौकीदारी का कार्य करते थे। इनके पास जमींने नहीं थीं, इस कारण जहां इच्छा हुई वहीं बस गए। उक्त कारणों से इन्हें नयाबासी भी कहा जाता है। ये लोग सीकर, झुंझुनू, एवं जयपुर जिले में सर्वाधिक संख्या में हैं।
-:प्रतिहार या पडिहार मीणा :-
इस वर्ग के मीणा टोंक, भीलवाड़ा, तथा बूंदी जिले में बहुतायत में पाये जाते हैं। प्रतिहार का शाब्दिक अर्थ उलट का प्रहार करना होता है। ये लोग छापामार युद्ध कौशल में चतुर थे इसलिये प्रतिहार कहलाये।
-:रावत मीणा :-
रावत मीणा अजमेर, मारवाड़ में निवास करते हैं। रावत एक उपाधी थी जो बहादुरी के लिये दी जाती थी!
-:भील मीणा :-
ये लोग सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं चित्तोड़गढ़ जिले में प्रमुख रूप से निवास करते हैं।
२-मीणा जाति के प्रमुख राज्य :-
खोहगंग का चांदा राजवंश,
मांच का सीहरा राजवंश,
गैटोर तथा झोटवाड़ा के नाँढला राजवंश,
आमेर का सूसावत राजवंश,
नायला का राव बखो [beeko] देवड़वाल (द॓रवाल) राजवंश,
नहाण का गोमलाडू राजवंश,
रणथम्भौर का टाटू राजवंश,
नाँढ़ला का राजवंश,
बूंदी का उषारा एवम् मोटिश राजवंश,
मेवाड़ का मीणा राजवंश,
माथासुला ओर नरेठका ब्याड्वाल
झान्कड़ी अंगारी (थानागाजी) का सौगन मीना राजवंश!
*प्रचीनकाल में मीणा जाति का राज्य राजस्थान में चारों ओर फ़ैला हुआ था!*
३-मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख किले :-
तारागढ़ का किला बूंदी,
आमागढ़ का किला,
हथरोई का किला,
खोह का किला,
जमवारामगढ़ का किला,
४-मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख बाबड़ियां:-
भुली बाबड़ी ग्राम सरजोली,
मीन भग्वान राणी जी की बावड़ी बूंदी बावदी, सरिस्का, अल्वर
पन्ना मीणा की बाबड़ी, आमेर
खोहगंग की बाबड़ी,जयपुर
मीणा राजा चन्द की आभानेरी चाँद बावड़ी
५-मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख मंदिर :-
दांत माता का मंदिर, जमवारामगढ़- सीहरा मीणाओं की कुल देवी,
शिव मंदिर, नई का नाथ, बांसखो,जयपुर
बांकी माता का मंदिर, रायसर,जयपुर-ब्याडवाल मीणाओं की कुलदेवी,
बाई का मंदिर, बड़ी चौपड़, जयपुर
आशावरी माता का मंदिर, चूलगिरी की पहाड़ी की तलहटी में, पुराना घाट, खाँनिया सरकारी स्कूल के पिछे , जयपुर - नाँढला (बडगोती) मीणा समाज की कुलदेवी,
ज्वालादेवी का मंदिर, जोबनेर, जयपुर टोडा महादेव का मंदिर, टोडामीणा, जमवारामगढ़, जयपुर
सेवड माता का मंदिर, मीन भगवान का मंदिर, मलारना चौड़,सवाई माधोपुर (राजस्थान) मीन भगवान का मंदिर, चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर (राजस्थान)
मीन भगवान का मंदिर, खुर्रा, लालसोट, दौसा (राजस्थान)
इतिहास प्रसिद्द पूरात्वविद स्पेन निवासी फादर हेरास ने 1940- 1957 तक सिन्धु सभ्यता पर खोज व शोद्द कार्य किया 1957 में उनके शोद्द पत्र मोहन जोदड़ो के लोग व भूमि शोद्द पत्र संख्या-4 में लिखा है* मोहन जोदड़ो सभ्यता के समय यह प्रदेश चार भागो में विभक्त था जिनमे एक प्रदेश मीनाद था जिसे संस्कृत साहित्य में मत्स्य नाम दिया गया और साथ ही यह भी लिखा की *मीना (मीणा) आर्यों और द्रविड़ो से पूर्व बसा मूल आदिवासी समुदाय था जो ऋग्वेद काल के मत्स्यो के पूर्वज है जिसका गण चिह्न मछली (मीन) था*
इस *मीना समुदाय का प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद में किया गया है वहा लिखा है ये लोग बड़े वीर पराक्रमी और शूरवीर है* पर आर्य राजा सुदास के शत्रु है इसका ही उल्लेख डिस्ट्रिक गजेटियर बूंदी 1964 के पृष्ट -29 पर भी किया गया है; *हरमनगाइस ने अपनी पुस्तक द आर्ट एण्ड आर्चिटेक्चर ऑफ़ बीकानेर के पृष्ट -98 पर  एक इतिहासकार  ने मीणा समुदाय की प्राचीनता का उल्लेख करते हुए लिखा है की मीना आदिवासी लोग मत्स्य लोगो के वंसज है जो आर्यों की और से लडे राजा सुदास से पराजित हुए और महाभारत के युद्द में मत्स्य जनपद के शासक के रूप में शामिल हुई | महाभारत युद्द में हुई क्षति से ये बिखर गए छोटे छोटे अनेक राज्य अस्तित्व में आ गए जिनमे इनका पूर्व का कर्द राज्य गढ़ मोरा महाभारत काल में जिसका शासक ताम्र ध्वज थे मोरी वंश प्रसिद्द हुवा जिसका राजस्थान में अंतिम शासक चित्तोड़ के मान मोर हुए जिसे बाप्पा रावल ने मारकर गुहिलोतो का राज्य स्थापित किया जो आगे जाकर सिसोदिया कहलाया |

मीणा जाति का इतिहास विडिओ -



मोरी (मोर्य) साम्राज्य के अंत और गुप्त  साम्राज्य  के समय अनेक छोटे छोटे राज्य हो गए मेर, मेव और मीना कबीलाई मेवासो के रूप में अस्तित्व में आये .उत्तर से आने वाली आक्रमण करी जातियों ने इनको काफी क्षति पहुचाई .शेष बचे गणराज्यो को समुद्रगुप्त ने कर्द राज्य बनाया उस समय मेरवाडा में मेर मेवाड़ में मेव और ढूढाड में मीना काबिज थे हर्ष वर्धन के समय उसके अधीन रहे |
हर्ष वर्धन के अंत के बाद पुन जोर पकड़ा | कई राज्य बने कमजोर थे उन्होंने ताकत अर्जित करी | *वरदराज विष्णु को हीदा मीणा लाया था दक्षिण से आमेर रोड पर परसराम द्वारा के पिछवाड़े की डूंगरी पर विराजमान वरदराज विष्णु की एतिहासिक मूर्ति को साहसी सैनिक हीदा मीणा दक्षिण के कांचीपुरम से लाया था। मूर्ति लाने पर मीणा सरदार हीदा के सम्मान में सवाई जयसिंह ने रामगंज चौपड़ से सूरजपोल बाजार के परकोटे में एक छोटी मोरी का नाम हीदा की मोरी रखा। उस मोरी को तोड़ अब चौड़ा मार्ग बना दिया लेकिन लोगों के बीच यह जगह हीदा की मोरी के नाम से मशहूर है।
देवर्षि श्री कृष्णभट्ट ने ईश्वर विलास महाकाव्य में लिखा है, कि *कलयुग के अंतिम अश्वमेध यज्ञ* केलिए जयपुर आए वेदज्ञाता रामचन्द्र द्रविड़, सोमयज्ञ प्रमुखा व्यास शर्मा, मैसूर के हरिकृष्ण शर्मा, यज्ञकर व गुणकर आदि विद्वानों ने महाराजा को सलाह दी थी कि कांचीपुरम में आदिकालीन विरदराज विष्णु की मूर्ति के बिना यज्ञ नहीं हो सकता हैं। यह भी कहा गया कि द्वापर में धर्मराज युधिष्ठर इन्हीं विरदराज की पूजा करते था। जयसिंह ने कांचीपुरम के राजा से इस मूर्ति को मांगा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। तब जयसिंह ने साहसी हीदा को कांचीपुरम से मूर्ति जयपुर लाने का काम सौंपा। हीदा ने कांचीपुरम में मंदिर के सेवक माधवन को विश्वास में लेकर मूर्ति लाने की योजना बना ली। कांचीपुरम में विरद विष्णु की रथयात्रा निकली तब हीदा ने सैनिकों के साथ यात्रा पर हमला बोला और विष्णु की मूर्ति जयपुर ले आया। इसके साथ आया माधवन बाद में माधवदास के नाम से मंदिर का महंत बना।
अष्टधातु की बनी सवा फीट ऊंची विष्णु की मूर्ति के बाहर गण्शोमध्ययुगीन इतिहास प्राचीन समय मे मीणा राजा आलन सिंह ने, एक असहाय राजपूत माँ और उसके बच्चे को उसके दा बच्चे, ढोलाराय को दिल्ली भेजा, मीणा राज्य का प्रतिनिधित करने के लिए। राजपूत ने इस् एहसान के लिए आभार मे राजपूत सणयन्त्रकारिओ ने दीवाली पर पुरखो को पानी देते समय निहत्थे मीनाओ पर हमला करके मीनाओ की लाशे बिछा दि, उस समय मीना पित्र तर्पन रस्में कर रहे थे मीनाओ को उस् समय निहत्था होना होता था। जलाशयों को"जो मीनाऔ के मृत शरीर के साथ भर गये। ] और इस प्रकार कछवाहा राजपूतों ने खोगओन्ग पर विजय प्राप्त की थी, सबसे कायर हर्कत और राजस्थान के इतिहास में शर्मनाक।
एम्बर के कछवाहा राजपूत शासक भारमल हमेशा नह्न मीना राज्य पर हमला करता था, लेकिन बहादुर बड़ा मीणा के खिलाफ सफल नहीं हो सका। अकबर ने राव बड़ा मीना को कहा था,अपनी बेटी कि शादी उससे करने के लिए। बाद में भारमल ने अपनी बेटी जोधा की शादी अकबर से कर दि। तब अकबर और भारमल की संयुक्त सेना ने बड़ा हमला किया और मीना राज्य को नस्त कर दिया। मीनाओ का खजाना अकबर और भारमल के बीच साझा किया गया था। भारमल ने एम्बर के पास जयगढ़ किले में खजाना रखा ।
-:कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:-
कर्नल जेम्स- टॉड के अनुसार कुम्भलमेर से अजमेर तक की पर्वतीय श्रृंखला के अरावली अंश परिक्षेत्र को मेरवाड़ा कहते है । मेर+ वाड़ा अर्थात मेरों का रहने का स्थान । कतिपय इतिहासकारों की राय है कि " मेर " शब्द से मेरवाड़ा बना है ।
यहां यह भी सवाल खड़ा होता है कि क्या मेर ही रावत है? कई इतिहासकारो का कहना है किसी समय यहां विभिन्न समुदायो के समीकरण से बने  'रावत' समुदाय का बाहुल्य रहा है जो आज भी है । रावत एक उपाधी है जो बहादुर लोगो को दी जाती थी! कहा यह भी जाता है कि यह समुदाय परिस्थितियों और समय के थपेड़ों से संघर्ष करते  कतिपय झुंझारू समुदायों से बना एक समीकरण है ।
सुरेन्द्र अंचल अजमेर का मानना है कि रावत ही मीणा है या यो कह लें कि मीणाओ मे से ही रावत वर्ग है । रावत और राजपूतो में परस्पर विवाह सम्बन्ध के उदाहरण मुश्किल से हि मिल पाए । जबकि रावतों और मीणाओ के विवाह होने के अनेक उदाहरण आज भी है ।
श्री प्रकाश चन्द्र मेहता ने अपनी पुस्तक " आदिवासी संस्कृति व प्रथाएं के पृष्ठ 201 पर लिखा है कि मेवात मे मेव मीणा व मेरवाड़ा में मेर मीणाओं का वर्चस्व था।
महाभारत के काल का मत्स्य संघ की प्रशासनिक व्यवस्था लौकतान्त्रिक थी जो मौर्यकाल में छिन्न- भिन्न हो गयी और इनके छोटे-छोटे गण ही आटविक (मेवासा ) राज्य बन गये । चन्द्रगुप्त मोर्य के पिता इनमे से ही थे । समुद्रगुप्त की इलाहाबाद की प्रशस्ति मे आ...टविक ( मेवासे ) को विजित करने का उल्लेख मिलता है राजस्थान व गुजरात के आटविक राज्य मीना और भीलो के ही थे इस प्रकार वर्तमान ढूंढाड़ प्रदेश के मीना राज्य इसी प्रकार के विकसित आटविक राज्य थे ।
वर्तमान हनुमानगढ़ के सुनाम कस्बे में मीनाओं के आबाद होने का उल्लेख आया है कि *सुल्तान मोहम्मद तुगलक ने सुनाम व समाना के विद्रोही जाट व मीनाओ के संगठन ' मण्डल ' को नष्ट करके मुखियाओ को दिल्ली ले जाकर मुसलमान बना दिया ( E.H.I, इलियट भाग- 3, पार्ट- 1 पेज 245 ) इसी पुस्तक में अबोहर में मीनाओ के होने का उल्लेख है (पे 275 बही) इससे स्पष्ट है कि मीना प्राचीनकाल से सरस्वती के अपत्यकाओ में गंगा नगर हनुमानगढ़ एवं अबोहर- फाजिल्का मे आबाद थे ।
रावत एक उपाधि थी जो महान वीर योध्दाओ को मिलती थी जो सम्मान सूचक मानी जाती थी मुस्लिम आक्रमणो के समय इनमे से काफी लोगों को मुस्लिम बनाया गया अतः मेर मेरात मेहर मुसमानो मे भी है
17 जनवरी 1917 में मेरात और रावत सरदारो की राजगढ़ ( अजमेर ) में महाराजा उम्मेद सिह शाहपूरा भीलवाड़ा और श्री गोपाल सिह खरवा की सभा मेँ सभी लोगो ने मेर मेरात मेहर की जगह रावत सरनेम  याने  टाइटल  धारण किया । इसके प्रमाण के रूप में 1891 से 1921 तक के जनसंख्या आकड़े देखे जा सकते है 31 वर्षो मे मेरो की संख्या में 72% की कमी आई है वही रावतो की संख्या में 72% की बढोत्तर हुई है । गिरावट का कारण मेरो का रावत नाम धारण कर लेना है ।
सिन्धुघाटी के प्राचीनतम निवासी मीणाओ का अपनी शाखा मेर, महर के निकट सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हुए कहा जा सकता है कि -- *सौराष्ट्र (गुजरात ) के पश्चिमी काठियावाड़ के जेठवा राजवंश का राजचिन्ह मछली के तौर पर अनेक पूजा स्थल " भूमिलिका " पर आज भी देखा जा सकता है इतिहासकार जेठवा लोगो को मेर( महर, रावत) समुदाय का माना जाता है जेठवा मेरों की एक राजवंशीय शाखा थी जिसके हाथ में राजसत्ता होती थी
(I.A 20 1886 पेज नः 361) कर्नल टॉड ने मेरों को मीणा समुदाय का एक भाग माना है |आज भी पोरबन्दर काठियावाड़ के महर समाज के लोग उक्त प्राचीन राजवंश के वंशज मानते है अतः हो ना हो गुजरात का महर समाज भी मीणा समाज का ही हिस्सा है ।
फादर हैरास एवं सेठना ने सुमेरियन शहरों में सभ्यता का प्रका फैलाने वाले सैन्धव प्रदेश के मीना लोगो को मानते है । इस प्राचीन आदिम निवासियों की सामुद्रिक दक्षता देखकर मछलि ध्वजधारी लोगों को नवांगुतक द्रविड़ो ने मीना या मीन नाम दिया* मीलनू नाम से मेलुहा का समीकरण उचित जान पड़ता है मि *स्टीफन ने गुजरात के कच्छ के मालिया को मीनाओ से सम्बन्धीत बताया है दूसरी ओर गुजरात के महर भी वहां से सम्बन्ध जोड़ते है । कुछ महर समाज के लोग अपने आपको हिमालय का मूल मानते है उसका सम्बन्ध भी मीनाओ से है हिमाचल में मेन(मीना) लोगो का राज्य था । स्कन्द में शिव को मीनाओ का राजा मीनेश कहा गया है ।
हैरास सिन्धुघाटी लिपी को प्रोटो द्रविड़ियन माना है उनके अनुसार भारत का नाम मौहनजोदड़ो के समय सिद था इस सिद देश के चार भाग थे जिनमें एक मीनाद अर्थात मत्स्य देश था । फाद हैरास ने एक मोहर पर मीना जाती का नाम भी खोज निकाला । उनके अनुसार मोहनजोदड़ो में राजतंत्र व्यवस्था थी । एक राजा का नाम " मीना " भी मुहर पर फादर हैरास द्वारा पढ़ा गया ( डॉ॰ करमाकर पेज न॰ 6) अतः कहा जा सकता है कि मीना जाति का इतिहास बहुत प्राचीन है इस विशाल समुदाय ने देश के विशाल क्षेत्र पर शासन किया और इससे कई जातियो की उत्पत्ती हुई और इस समुदाय के अनेक टूकड़े हुए जो किसी न किसी नाम से आज भी मौजुद है ।
आज भी 10-11 हजार मीणा लोग फौज में है *बुदी का उमर गांव पूरे देश मे एक अकेला मीणो का गांव है जिसमें 7000 की जनसंख्या मे से 2500 फौजी है* टोंक बूंन्दी जालौर सिरोही मे से मीणा लोग बड़ी संख्या मे फौज मे है। उमर गांव के लोगो ने प्रथम व द्वीतिय विश्व युध्द लड़कर शहीद हुए थे *शिवगंज के नाथा व राजा राम मीणा को उनकी वीरता पर उस समय का परमवीर चक्र जिसे विक्टोरिया चक्र कहते थे मिला था जो उनके वंशजो के पास है । आजादी के समय भारत में तीन मीणा बटालियने थी पर दूर्भावनावश खत्म कर दी गई थी!
तूंगा (बस्सी) के पास जयपुर नरेश प्रतापसिंह और माधजी सिन्धिया मराठा के बीच 1787 मे जो स्मरणिय युध्द हुआ उसमें प्रमुख भूमिका मीणो की रही जिसमे मराठे इतिहास मे पहली बार जयपुर के राजाओ से प्राजित हुए थे वो भी मीणाओ के कारण इस युध्द में राव चतुर और पेमाजी की वीरता प्रशंसनीय रही । उन्होने चार हजार मराठो को परास्त कर मीणाओ ने अपना नाम अमर कर दिया । तूँगा के पास अजित खेड़ा पर जयराम का बास के वीरो ने मराठो को हराया इसके बदले जयराम का बास की जमीन व जयपुर खजाने मे पद दिया गया ।
सम्माननीय वीर इमानदार कर्तव्यनिष्ठ मीणा बंधुवर, आपसे मेरा व्यक्तिगत आग्रह है कि आप समाज हित में जनजाति की लड़ाई व अशिक्षा दूर करने के लिए अभियान के तहत छात्रावासो के निर्माण कार्यो मैं सहयोग अवश्य करें, इस हेतु किसी अन्य बंधुवर का इंतजार नहीं करें, (क्योंकि कोई अन्य व्यक्ति आपसे कहेगा या आपके पास आएगा इसका इंतजार किया तो कोई भी सामाजिक कार्य नहीं हो सकता है) !
अतः आप सहयोग करें एवं अपने बंधुओं से सहयोग कराएं तो ही यह सामाजिक कार्य संभव है !
आपको ईश्वर ने किसी महान उद्देश्य से मानव जीवन देकर अन्य करोड़ो जीव-जंतुओं से श्रेष्ठ बनाकर यह अपेक्षा की है कि आप अन्य सभी के हितों की रक्षा करेंगे और मानवता अर्थात समाज सेवा को सर्वोपरि स्थान देंगे।
राजस्थान के मीणा समाज में कुल मिलाकर 5248 गोत है, उनमें से कुछ गोत / surnames
A
Auraj औराज
Aamroo आमरू

B
Beflawat बैफ़लावत
Bagdi बागड़ी
Bagodiya बागोडिया
Bagranya बगरान्या
Bainada बैनाडा
Bajota बजोटा
Bakala बाकला
Barwal बारवाल
Bargoti बड़गोती
Barld बल्ड़
Basanwal बासनवाल
Byadwal ब्याडवाल
Bhodna भोदना
Bhorawat भौरावत or bhorayat भौरायत
Banskhowa बांसखोवा
Bhakand भाकंड
Bandwal बान्डवाल
Bamnawat बामनावत
Bankliya बांकलिया
Buriya बूरियाल
Benade बेनाडे
Bhabhla भाभला
Bhonda भोन्डा
Bohra / bahure बोहरा / बहुरे
Balot बालोत
Bunas बूनस
Buriya बूरिया
Banskho बांसखो
Beelwal बीलवाल
Bail बेल
Bundas बूंदस
Besar बेसर
Bhaskar भास्कर
Bhabhrya भाभर्या

C
cholak छोलक
chedwal छेड़वाल
chandwal छान्डवाल
chanda चांदा
chawal छावल
chhanwal छानवाल
channavat छन्नावत
chirawat छिरावत
chitach छिताच
chhapola छापोला
charnawat चर्नावत
charawadiya चारावंड्या
choriya छोरिया
charawat छरावत
chandwara चंन्दवारा
chandadiya चंदाड्या
chaudhari चौधरी
chetriya चेत्रीया
chorasya चोरस्या
chandrawat चंन्द्रावत
choolwal चुलवाल
chorawat छोरावत
chookleda चोकलेडा
chungada चुंगडा

D
dagal डागल
dhyawana ध्यावणा
dewana देवणा
devadwal देवदवाल
dovwal डोबवाल
domala डुमाला
domela डुमेला
dewanda देवंदा
dhanawat धनावत
dundya दुन्ध्या
dhankariya ढाकर्या
dudawat दुडावत
didawat दिदावत
dedwal डेडवाल
dakriya डाकर्या
dadarwal डाडरवाल
dechalwal डेचरवाल
damachya दमाच्या
dondaga दोन्डगा
duwanya दुवाण्या
dugarwal डुगरवाल
donawat दोनावत
dhaigal डहंगळ
dechalwal डेचरवाल
dhawaniya धावण्या
dhurwal धुरवाल
dhakal डाकल
damriya दामर्या
dussawat दुसावत
dheerawat धिरावत
dawer डावर

F
faneta फानेटा
farwa फार्वा

G
gohli गोसली
gomladoo गोमलाडू
gothwal गोठवाल
gunawat घुनावत
ghusinga घुसिंगा
gahlot गहलोत
goliya गोलिया
Golwal गोलवाल
govli गवली
goyali गोयली
gorwad गोरवाड
ghumariya घुमार्या
ghusrawat घुस्रावत
goththulगोठल
ghodeta घोडटा
gorni घोर्णी

H
hazari हजारी
hatwal हटवाल
hadchoor हाडचोर

J
Jundia जून्दिया
jaif जैफ
jhirval झिरवाल
jagarwal जगरवाल
jeejarh जिजर्ह
joharwal जोहरवाल
jharwal झारवाल
jhamuhre झामूर्हे
jakhiwal जखिवाल
jareda जारेडा
jorwad जोरवाड
jorwal / jarwal जोरवाल / जारवाल
jorawat जुरावत
jurdiya जुर्डीया
junwal / jonwal जुनवाल / जोनवाल
jendera जेन्डेरा
jalodiya जलोड्या
jhajhra झाझरा
janera जानेरा

K
kanwat कांवत
kankas कांकस
khoda खोड़ा
kholwal खोलवाल
kotwadya कोटवाड्या
kunwaliya कुनवालिया
khokaar खोक्कर
kahite काहीटे
khora खोरा
khata खाटा
kakroda काकरोडा
kawadiya कवाडीया
kathumariya कठूमार्या
kankarwal काकरवाल
kanwatiya कन्वाट्या
kantiya कान्तिया
kokra कोकरा
kotwar कोटवार
kotwadiya कोटवाड्या
kotwada कोटवाडा
kotwal कोटवाल
kalot कलोत
kumrawat कुमरावत
kudaliya कुडालिया
kajodiya कजोडीया
katrawat कतरावत
khorwal खोरवाल
khani खाणी
khatla खाटला
kunjlot कुंजलोत
kotawariya कोटवारिया
kanriwal कनरीवाल
kanetiya कानेटीया
kuwal कुवल
kiwad किवड
kanet कानेत
kawaliya कवाल्या
khandal खंडल
khokhalwar खोकरवार
Khaneda खानेडा

L
lotan लोटण
lalsotya लालसोट्या
luckwads लुकवाड
lukwal लकवाल
lodhwal लोदवाल
lookhdiya लुखडिया
lakhnauta लखनौटा
luhar meena लुहार मीणा
lakhnawat लखनावत

M
mandar मंदार
myal म्याळ
mehar मेहर
marmat मरमट
machya मच्या
motis मोटीस
mewal मेवाळ
mimrot मिमरोट
mandawat मंडावत
madhaiya मांधिया
manatwal मनतवाल
mainawat मैनावत
mandal मांडल
mandar मंदार
marag मारग
mothiya मोठ्या
mothu मोठू
morajhwal मोर्झवाल
morjal मोर्झाल
marwadiya मारवाड़्या
mohsal मोहसल
moja मोझा
mohnot मोहनोत
muradiya मुर्हाड्या
mandiya मांड्या

N
naurawat नौरावत
nareda नार्हेडा
nandla नांढला
naananiya नानानिया
neemrot निमरोट
naglod नागलोद
nimroth निमरोठ
naugara नौगरा
nakwal नकवाल
neemwal निमवाल
nathawat नाथावत
newla नेवला
nai meena नाई मीणा / नाईमण्या
neemawat निमावत

P
pawadi पबड़ी
pokhriya पोखरिया
perwa पेरवा
perwal पेरवाल
poonjlot पुंजलोत
panwar पंवार
parihar परिहार
pakar पाकळ
pratihar प्रतिहार
pyara प्यारा
parala पारला
purawat पुरावत

R
rajalwal राजलवाल
rankala रांकळा
rajarwal राजरवाल
Reknot रेकनोत
rodiya रोडीया

S
susawat सुसावत
sattawan सत्तावन
sawara सवारा
singhal सिंघल
sirra सिर्हा
sonet सोनेत
singhalwal सिंघलवाल
seeswal सिसवाल
sogan सोगण
sewariya सेवरिया
sapawat सपावत
sulaniya सुलाण्या
siwal सिवल
soorwal सुरवाल
simal सिमल
sandoora संदुरा
seelwar सिलवार
shahar सहर
saharia सहारीया
seenam सिनम
Sisodiya सीसोदिया 
Sastiya साष्टीया

T
tatu टाटू
thanwal थानवाल
thahgal थंघल
thoorwar थोरवार
teelan तिलान
tatar तातर
tatwara टटवारा
tatunya तटाण्या
tamri तामरी
tazi ताजी

U
ussara उषारा

Z
zurawat झुरावत

मीणा जाती की गौत्रानुसार कुलदेवी 
गोत्र- बैफलावत,
कुलदेवी :- पालीमाता पीठ नांगल (लालसोट) दौसा ।

गोत्र - छाण्डवाल
कुलदेवी: पपलाज माता लालसोट को भी मानते है ।

गोत्र - महर,
कुलदेवी - घटवासन माता, स्थान:- गुढा चन्द्रजी तह॰ टोडाभीभ करौली ।

गोत्र -जगरवाल
कुलदेवी - अरहाई माता

गोत्र - टाटू
कुलदेवी- बरवासन स्थान:- सपोटरा करौली

गोत्र- चांदा
कुलदेवी - बाण माता(आसावरी) स्थान:- खो गंग (खो नागोरियान झालाना पहाड़ी) जयपुर

गोत्र - माणतवाल
कुलदेवी - जीणमाता(जयंति देवी) स्थान:- हर्ष पहाड़ी (रेवासा) दाता रामगढ़ सीकर

गौत्र - बारवाल(बारवाड़)
कुलदेवी - चौथ माता, स्थान :- चौथ का बरवाड़ा सवाई माधोपुर

गोत्र - मरमट
कुलदेवी - दुगाय (दुर्गामाता) माता स्थान :- गुढ़ा बरथल तह॰ निवाई जि॰ टौंक । मलारना चौड़ बौली सवाई माधोपुर में भी है ।
गोत्र - जोरवाल जारवाळ
कुलदेवी - ब्रह्माणी माता (प्याली माता) स्थान :-आमेर पहाड़ी जयपुर,पल्लु(हनुमान गढ़), मण्डावरी दौसा ।
गौत्र - ब्याडवाल, गोमलाडू
कुलदेवी - बांकी माता, स्थान :- माताशुला रायसर तह॰ जमुवारामगढ़ जयपुर
गोत्र - नायी मीना (नायमण्या), ककरोड़ा
कुलदेवी - नारायणी माता स्थान:- बरवा की पहाड़ी नारायणी धाम तह॰ राजगढ़ अलवर
गोत्र - सुसावत
कुलदेवी - अम्बा माता स्थान:-आमेर पहाड़ी जयपुर
गोत्र - बैन्दाड़ा
कुलदेवी - आशोजाई माता (चंड माता) स्थान :- चतरपुरा तह॰ सांभरलेक जयपुर
गोत्र- खोडा
कुलदेवी - सेवाद माता village chitanu, tehsil amer, distt.l Jaipur
गोत्र :- उषहारा(उसारा)
कुलदेवी :- बीजासण माता, स्थान :- बीजासण पहाड़ी तह॰ इन्द्रगढ़ जिला बुंदी
गोत्र - चरणावत
कुलदेवी - कैला माता स्थान - कैला पहाड़ी तह॰ सपोटरा करौली । अब कैला माता को टाटू आदि अन्य गोत्र भी मानने लग गये ।
jef - badhasan mata alwar ko mante hai...
गोत्र - शहर, सहरिया
कुलदेवी - गुमानो माता, स्थान - इन्दौर मध्यप्रदेश
गोत्र - मांदड़
कुलदेवी - खुर्रा माता स्थान - गांव खुर्रा मण्डावरी लालसोट दौसा
गौत्र - डोबवाल,
कुलदेवी - खलकाई माता, स्थान - गांव डोब तह॰ लालसोट जि॰ दौसा ।
गोत्र - कटारा
कुलदेवी - धराल माता, स्थान - गांव निठारा की पाल त॰ सराड़ा जि॰ उदयपुर ।
गौत्र - पारगी, नटरावत, टौरा, मन्दलावत, चरणावत
कुलदेवी - काली माता (कालका), स्थान - निठाऊवा (बांसवाड़ा), कालीसिंध के किनारे (पीपलदा), दिगोद कोटा ।
गौत्र - हरमोर(कलासुआ)
कुलदेवी - जावर माता, स्थान - जावर माइन्स उदयपुर ।
गौत्र - घुणावत,
कुलदेवी - लाखोड माता, स्थान - गांव पीलोदा तह॰ गंगापुर सीटी जि॰ सवाई माधोपुर ।
गोत्र - गोली
कुलदेवी - चामुंडा देवी village tigriya, bamanavash

गौत्र - मेवाल
कुलदेवी - मैणसी (आसावरी) स्थान - कूकस खोरा मेवाल दिल्ली रोड़ आमेर जयपुर । पहले अनासन देवी को भी पूजा था ।
गोत्र - करेलवाल
कुलदेवी - ईट माता, स्थान - बुढ़ादित दिगोद कोटा ।
गोत्र - कोटवार ,कोटवाल,कोटवाड़, घुणावत
कुलदेवी - मोरा माता (चन्द्रगुप्त मौर्य की मा का नाम मोरा था) स्थान -रायसाना गढ़मोरा करौली, गांव घुमणा के घुणावतो ने भी मोरा माता का मंदिर बना रखा है वैसे उनकी कुलदेवी लहकोड़ माता है अतः तरूण जी आप वहां जाए और माता का दर्शन करें आपके गोत्र का बड़ा गांव बिलौना कला लालसोट रोड़ और कमालपुरा जो गढ़मोरा के पास है ये काफी बड़े गांव है यहां से आपको और जानकारी मिल सकती है । घुणावत बाद में लहकोड़ माता गांव पीलेदा त॰ गंगापुर सीटी सवाई माधोपुर को भी मानने लग गये ।
गोत्र - सिहरा
कुलदेवी - दन्त माता
गोत्र - मंडाल, मान्ड्या
कुलदेवी - जुग्निया माता
स्थान :- मंडलगढ, भिलवाडा
गोत्र - जार्हेडा
कुलदेवी - बिर्ताई माता
प्रमुख गोत्रो के धराड़ी कुल वृक्ष
[आदिवासी मीणा गोत्र] [निर्धारित कुल वृक्ष]

बैफ्लावत,
महर,
झरवाल,
ध्यावना,
सुलानिया,
खोड़ा,
टाटू,
बडगोती,
जाल,
सिहरा,
सेहरा,
सिरा,
सीमल
बैनाडा,
चिता(कुदाल्या),
मानतवल,
वनवाल,
छान्दवाल
== पीपल
सुसावत(खरगोश का शिकार नहीं करते),
सत्तावन
खेजड़ा,
गोमलाडू,
नीमवाल,
करेलवाल,
ढूंचा/दमाच्या आशापाला
== (अशोक)
ब्याडवाल,
केमर
मरमट,
झाऊ,
डोबवाल,
सरस,
मीमरोट,
कदम,
बासंवाल,
मंद्लावत
== बड़
जिन्देडा,
चांदा
केम/गांदल,
देवाना/देवंदा/देवन्द
केर
कटारा,
पारगी,
हरमोर,
खराड़ी,
डामोर,
बांसखोवा,
बांस
मोरडा/मोर,
मौर्य,
ताजी
मोर (पक्षी)
Disclaimer: इस  content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे

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30.7.19

संकट हरण हनुमान प्रश्नावली यंत्र:sankat haran hanuman prashnavali





हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो में कई तरह के यंत्र(चक्र)के बारे में बताया गया हैं जिनकी सहायता से हम अपने मन में उठ रहे सवाल, हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयों आदि का समाधान पा सकते है। हम अब तक आपको श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र और नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र के बारे में बता चुके है आज हम आपको बताएँगे हनुमान प्रश्नावली चक्र के बारे में।

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प्रयोग विधि :-
जिसे भी अपने प्रश्नों का उत्तर चाहिए वे स्नान आदि कर साफ वस्त्र धारण करे और पांच बार ऊँ रां रामाय नम:मंत्र का जप करने के बाद 11 बार ऊँ हनुमते नम:मंत्र का जप करे। इसके बाद आंखें बंद हनुमानजी का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर कर्सर घुमाते हुए रोक दें। जिस कोष्ठक(खाने) पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक को देखकर अपने प्रश्न का उत्तर देखें। कोष्ठकों के अंकों के अनुसार फलादेश

1- आपका कार्य शीघ्र पूरा होगा।

2- आपके कार्य में समय लेगगा। मंगलवार का व्रत करें।

3- प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तो कार्य शीघ्र पूरा होगा।

4- कार्य पूर्ण नहीं होगा।

5- कार्य शीघ्र होगा, किंतु अन्य व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ेगी।

6- कोई व्यक्ति आपके कार्यों में रोड़े अटका रहा है, बजरंग बाण का पाठ करें।

7- आपके कार्य में किसी स्त्री की सहायता अपेक्षित है।

8- आपका कार्य नहीं होगा, कोई अन्य कार्य करें।

9- कार्यसिद्धि के लिए यात्रा करनी पड़ेगी।

10- मंगलवार का व्रत रखें और हनुमानजी को चोला चढ़ाएं, तो मनोकामना पूर्ण होगी।

11- आपकी मनोकामना शीघ्र पूरी होगी। सुंदरकांड का पाठ करें।

12- आपके शत्रु बहुत हैं। कार्य नहीं होने देंगे।

13- पीपल के वृक्ष की पूजा करें। एक माह बाद कार्य सिद्ध होगा।

14- आपको शीघ्र लाभ होने वाला है। मंगलवार को गाय को गुड़-चना खिलाएं।

15- शरीर स्वस्थ रहेगा, चिंताएं दूर होंगी।

16- परिवार में वृद्धि होगी। माता-पिता की सेवा करें और रामचरितमानस के बालकाण्ड का पाठ करें।

17- कुछ दिन चिंता रहेगी। ऊँ हनुमते नम: मंत्र की प्रतिदिन एक माला का जप करें।

18- हनुमानजी के पूजन एवं दर्शन से मनोकामना पूर्ण होगी।

19- आपको व्यवसाय द्वारा लाभ होगा। दक्षिण दिशा में व्यापारिक संबंध बढ़ाएं।

20- ऋण से छुटकारा, धन की प्राप्ति तथा सुख की उपलब्धि शीघ्र होने वाली है। हनुमान चालीसा का पाठ करें।

21- श्रीरामचंद्रजी की कृपा से धन मिलेगा। श्रीसीताराम के नाम की पांच माला रोज करें।

22- अभी कठिनाइयों का सामाना करना पड़ेगा पर अंत में विजय आपकी होगी।

23- आपके दिन ठीक नहीं है। रोजाना हनुमानजी का पूजन करें। मंगलवार को चोला चढ़ाएं। संकटों से मुक्ति मिलेगी।

24- आपके घर वाले ही विरोध में हैं। उन्हें अनुकूल बनाने के लिए पूर्णिमा का व्रत करें।

25- आपको शीघ्र शुभ समाचार मिलेगा।

26- हर काम सोच-समझकर करें।

27- स्त्री पक्ष से आपको लाभ होगा। दुर्गासप्तशती का पाठ करें।

28- अभी कुछ महीनों तक परेशानी है।

29- अभी आपके कार्य की सिद्धि में विलंब है।

30- आपके मित्र ही आपको धोखा देंगे। सोमवार का व्रत करें।

31- संतान का सुख प्राप्त होगा। शिव की आराधना करें व शिवमहिम्नस्तोत्र का पाठ करें।

32- आपके दुश्मन आपको परेशान कर रहे हैं। रोज पार्थिव शिवलिंग का पूजन कर शिव ताण्डवस्तोत्र का पाठ करें। सोमवार को ब्राह्मण को भोजन कराएं।

33- कोई स्त्री आपको धोखा देना चाहती है, सावधान रहें।

34- आपके भाई-बंधु विरोध कर रहे हैं। गुरुवार को व्रत रखें।

35- नौकरी से आपको लाभ होगा। पदोन्नति संभव है, पूर्णिमा को व्रत रख कथा कराएं।

36- आपके लिए यात्रा शुभदायक रहेगी। आपके अच्छे दिन आ गए हैं।

37- पुत्र आपकी चिंता का कारण बनेगा। रोज राम नाम की पांच माला का जप करें।

38- आपको अभी कुछ दिन और परेशानी रहेगी। यथाशक्ति दान-पुण्य और कीर्तन करें।

39- आपको राजकार्य और मुकद्मे में सफलता मिलेगी। श्रीसीताराम का पूजन करने से लाभ मिलेगा।

40- अतिशीघ्र आपको यश प्राप्त होगा। हनुमानजी की उपासना करें और रामनाम का जप करें।

41- आपकी मनोकामना पूर्ण होगी।

42- समय अभी अच्छा नहीं है।

43- आपको आर्थिक कष्ट का सामना करना पड़ेगा।

44- आपको धन की प्राप्ति होगी।

45- दाम्पत्य सुख मिलेगा।

46- संतान सुख की प्राप्ति होने वाली है।

47- अभी दुर्भाग्य समाप्त नहीं हुआ है। विदेश यात्रा से अवश्य लाभ होगा।

48- आपका अच्छा समय आने वाला है। सामाजिक और व्यवसायिक क्षेत्र में लाभ मिलेगा।

49- आपका समय बहुत अच्छा आ रहा है। आपकी प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होगी।

17.7.19

इस्लाम से पहिले अरब जगत मे हिन्दू संस्कृति का अस्तित्व था




इस्तांबुल, तुर्की के प्रसिद्ध राजकीय पुस्तकालय ‘मक्तब-ए-सुल्तानिया’ (सम्प्रति मक्तब-ए-ज़म्हूरिया), जो प्राचीन पश्चिम एशियाई-साहित्य के विशाल भण्डार के लिए प्रसिद्ध है, के अरबी विभाग में प्राचीन अरबी-कविताओं का संग्रह ‘शायर-उल्-ओकुल’ हस्तलिखित ग्रन्थ के रूप में सुरक्षित है। इस ग्रन्थ का संकलन एवं संपादन बग़दाद के ख़लीफ़ा हारून-अल्-रशीद के दरबारी एवं सुप्रसिद्ध अरबी-कवि अबू-अमीर अब्दुल अस्मई ने किया था, जिसे ‘अरबी-काव्य-साहित्य का कालिदास’ कहा जाता है।
सन् 1792 ई. में तुर्की के प्रसिद्ध शासक सलीम-III (1789-1807) ने अत्यन्त यत्नपूर्वक किसी प्राचीन प्रति के आधार पर इसे लिखवाया था। इस दुर्लभ हस्तलिखित ग्रन्थ के पृष्ठ लेखनयोग्य कच्ची रेशम की एक कि़स्म ‘हरीर’ के बने हैं, जिसके कारण यह सर्वाधिक मूल्यवान पुस्तकों में से एक है। इस ग्रन्थ के प्रत्येक पृष्ठ को सुनहले सजावटी किनारी (बॉर्डर) से सुसज्जित किया गया है। जावा एवं अन्य स्थानों पर पाई गई अनेक प्राचीन संस्कृत-पाण्डुलिपियाँ ऐसे ही सुनहली किनारी से सुसज्जित हैं। इस महान् ग्रन्थ का प्रथम अंग्रे़ज़ी-संस्करण सन् 1864 ई. में बर्लिन, जर्मनी से प्रकाशित हुआ। द्वितीय संस्करण सन् 1932 में बेरुत, फिलिस्तीन से प्रकाशित हुआ । सन् 1963 में प्रो. (डॉ.) हरवंशलाल ओबराय (1925-1983) ने अपने इराक़-प्रवास के दौरान बग़दाद विश्वविद्यालय में हुए अपने व्याख्यान के समय इस ग्रन्थ को वहाँ पुनर्प्रकाशन हेतु संपादित होते देखा।
डॉ. ओबराय उस ग्रन्थ की महत्त्वपूर्ण कविताओं को नोट करके भारत लाए। उन्होंने अप्रैल, 1978 में दिए अपने एक भाषण, जिसका कैसेट हमारे पास उपलब्ध है, में ‘शायर-उल्-ओकुल’ की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए कहा था— ‘‘सन् 1963 में अपने इराक़-प्रवास के दौरान इराक़ से लौटते समय मैंने उस ग्रन्थ का दर्शन किया और उसे अपनी इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक (1917-2007) ने बिड़ला मंदिर, दिल्ली से ही उस कविता को प्राप्त किया था— इसका उल्लेख उन्होंने अपने अनेक शोध-पत्रों में किया है। डॉ. ओबराय के इसी निबन्ध के आधार पर राम साठे (1920-2006), रामस्वरूप (1920-1998), अरुण शौरी , ए. घोष, जय दुबाशी, हर्ष नारायण, अदिति चतुर्वेदी, सीताराम गोयल (1921-2003), डॉ. सतीश चन्द्र मित्तल, महेश प्रसाद, मौलवी आलिम फ़ाजि़ल, ईशदत्त शास्त्री, श्रीकृष्ण सिंह सोंढ़, आदि इतिहासकारों ने भी शोध-पत्र लिखा। स्मरण रहे, मूल कविता डॉ. ओबराय ने अपने इराक़-प्रवास के दौरान प्राप्त की थी।डायरी में नोट किया था। भारत लौटने पर बाबू जुगल किशोर बिड़ला ने एक बार मुझसे कहा कि कुछ रोचक प्रसंग सुनाइये, तो मैंने उन्हें बताया कि इराक़ से मैं यह कविता लेकर आया हूँ। कविता सुनकर बिड़ला जी उछल पड़े। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्होंने तुरन्त उस कविता को एक बड़े लाल संगमरमर की पट्टी पर खुदवाकर दिल्ली के बिड़ला-मन्दिर में लगवाने का आदेश दिया। आज भी वह पत्थर बिड़ला-मन्दिर में लगा हुआ है।”
बाद में डॉ. ओबराय ने इन्हीं प्रागैस्लामी अरबी-कविताओं के आधार ‘A Glimpse of Pre-Islamic Arabia’ अथवा ‘Influence of Indian Culture on Arabia’ शीर्षक शोध-पत्र लिखा, जिसे उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, मद्रास विश्वविद्यालय तथा राजकीय संग्रहालय, एगमोर, मद्रास के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 12-14 फरवरी, 1982 को आयोजित ‘अखिल भारतीय इतिहास एवं संस्कृति सम्मेलन’ में पढ़ा। इस सम्मेलन में उपस्थित सम्पूर्ण देश के इतिहास एवं संस्कृति के लगभग दो सौ विद्वानों ने इस शोध-पत्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। इस सम्मेलन का उद्घाटन तमिलनाडु के तत्कालीन शिक्षा-मंत्री श्री सी. आरंगानायगम ने किया था एवं इसकी अध्यक्षता मद्रास विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. एम. संतप्पा ने की थी। स्वयं मद्रास विश्वविद्यालय इसी शोध-पत्र पर डॉ. ओबराय को ‘डी. लिट्.’ की उपाधि देकर गौरवान्वित हुआ था।
‘शायर-उल्-ओकुल’ ग्रन्थ तीन भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में प्रागैस्लामी अरबी-कवियों का जीवनवृत्त एवं उनकी कविताएँ हैं। दूसरे भाग में इस्लाम के जनक मुहम्मद साहब की वाणी से लेकर ‘बानी उमय्या वंश’ (Bani Umayyads of Damascus : 661-750) के ख़लीफ़ाओं के काल तक के कवियों की जीवनियाँ एवं उनकी रचनाएँ संकलित हैं। तीसरे भाग में ‘बानी अब्बासी वंश’ Bani Abbasids of Baghdad : 750-) के प्रारम्भ से लेकर संकलनकर्ता (अबू-अमीर अब्दुल असमई) के काल तक के कवियों की रचनाएँ संकलित हैं। प्राचीन अरबी-कविताओं का यह संग्रह वस्तुतः एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है, जो प्राचीन अरबों के जनजीवन, शिष्टाचार, मर्यादाएँ, मनोरंजन, प्रचलित प्रथाओं तथा इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। इसके अतिरिक्त मुख्य रूप से प्राचीनकालीन अरबों के प्रधान तीर्थ ‘मक्का’ का भी बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है।
‘शायर-उल्-ओकुल’ की भूमिका में मक्का में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित होनेवाले वार्षिक मेले ‘ओकाज़’ का वर्णन है। स्मरण रहे, वर्तमान प्रचलित वार्षिक हज-यात्रा भी कोई इस्लामी-विशेषता नहीं है, बल्कि प्रागैस्लामी ‘ओकाज़’ (धार्मिक मेला) का ही परिवर्तित रूप है।
किन्तु, अरबी ‘ओकाज़’ क़ैथोलिक़-ईसाइयों के अबाध आनन्दोत्सव से भिन्न था। यह प्रतिभाशाली और विद्वान् व्यक्तियों को अरब पर समकालीन वैदिक-संस्कृति के सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, साहित्यिक तथा अन्य विविध पक्षों पर वार्तालाप करने का उपयुक्त मंच प्रदान करता था। ‘शायर-उल्-ओकुल’ उल्लेख करता है कि उन वार्तालाप-वाद-विवादों में निकले हुए निष्कर्षों-निर्णयों का सम्पूर्ण अरब में व्यापक रूप से सम्मान किया जाता था। इस प्रकार, विद्वानों में परस्पर विचार-विमर्श करने एवं जनता को आध्यात्मिक शान्ति के लिए एकत्रित करने का स्थान उपलब्ध कराने की काशी-पद्धति का अनुसरण ही मक्का ने किया।
इस मेले का मुख्य आकर्षण मक्का के मुख्य मन्दिर मक्केश्वर महादेव (अब ‘अल्-मस्जि़द-अल्-हरम्’) के प्रांगण में होनेवाला एक सारस्वत कवि-सम्मेलन था, जिसमें सम्पूर्ण अर्वस्थान से आमन्त्रित कवि काव्य-पाठ करते थे। ये कविताएँ पुरस्कृत होती थीं। सर्वप्रथम कवि की कविता को स्वर्ण-पत्र पर उत्कीर्णकर मक्केश्वर महादेव मन्दिर के परमपावन गर्भगृह में लटकाया जाता था। द्वितीय और तृतीय स्थानप्राप्त कविताओं को क्रमशः ऊँट और भेड़/बकरी के चमड़े पर निरेखितकर मन्दिर की बाहरी दीवारों पर लटकाया जाता था। इस प्रकार अरबी-साहित्य का अमूल्य संग्रह हज़ारों वर्षों से मन्दिर में एकत्र होता चला आ रहा था। यह ज्ञात नहीं है कि यह प्रथा कब प्रारम्भ हुई थी, परन्तु पैगम्बर के जन्म से 23-24 सौ वर्ष पुरानी कविताएँ उक्त मन्दिर में विद्यमान थीं।
सन् 630 में मुहम्मद साहिब की इस्लामी सेना द्वारा मक्का पर की गई चढ़ाई के समय उनकी सेना ने ये स्वर्ण-प्रशस्तियाँ लूट लीं और शेष में से अधिकांश को नष्ट कर दिया। जिस समय इन्हें लूटा जा रहा था, उस समय स्वयं मुहम्मद साहब का एक सिपहसालार-शायर— हसन-बिन्-साबिक़— ने नष्ट की जा रही कविताओं में से कुछ को अपने कब्ज़े में कर लिया। इस संग्रह में 5 स्वर्ण-पत्रों व 16 चमड़े पर निरेखित कविताएँ थीं ।
साबिक़ की तीन पीढि़यों ने उन कविताओं को सुरक्षित रखा। तीसरी पीढ़ी का उत्तराधिकारी पुरस्कृत होने की आशा से इन कविताओं को मदीने से बग़दाद, वहाँ के ख़लीफ़ा और संस्कृति के महान् संरक्षक हारून-अल् रशीद (786-809) के पास ले गया, जहाँ उसे ख़लीफ़ा के दरबारी कवि अबू-अमीर अब्दुल अस्मई ने विपुल धनराशि देकर खरीद लिया।
उन 5 स्वर्ण-पत्रों में से दो पर प्रागैस्लामी अरबी शायरों— ‘अमर इब्न-ए-हिशाम’ (?-624) और ‘लबी-बिन-ए-अख़्तब-बिन-ए-तुर्फा’ की कविताएँ उत्कीर्ण थीं। साहित्यप्रेमी हारून-अल्-रशीद ने अस्मई को ऐसी समस्त पूर्वकालीन और वर्तमान कवियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को संकलित करने का आदेश दिया, जिसे अरब का विशालतम काव्य-संग्रह कहा जा सके। उसी का परिणाम है ‘शायर-उल्-ओकुल’ का संकलन।
शेष 3 पर उत्कीर्ण कविताएँ ज़र्हम बिन्तोई नामक कवि की थीं, जो मुहम्मद साहिब से 165 वर्ष पूर्व मक्का के प्राचीन ज़र्हम राजकुल में पैदा हुआ था। इस कुल के 12 शासकों ने मक्का पर 74 ई.पू. से 206 ई. तक शासन किया था—
1. जर्हम I इब्न झाला (74-44 ई.पू.)
2. अब्द जलिल इब्न जर्हम (44-14 ई.पू.)
3. जर्हम II अब्द जलिल (14-16 ई.)
4. अब्द उल्-मेदेन इब्न जर्हम (16-46)
5. थाकिला इब्न अब्द अल्-मेदेन (46-76)
6. अब्द उल्-मेस्सिह इब्न थाकिला (76-103)
7. मौधाध I अब्द उल् मेस्सिह महान् (106-136)
8. अम्र I इब्न मौधाध (136-150
9. हारिथ इब्न मौधाध (150-160
10. अम्र II इब्न ल अल्-हारिथ (160-180)
11. बिचर इब्न अल्-हारिथ 180-190)
12. मौधाध II अल-असगर (190-206 ई.)
कवि-हृदय होने के कारण स्वयं बिन्तोई को मक्का पर शासन करने का अवसर कभी प्राप्त नहीं हुआ, तथापि उसे स्मरण था कि उसके पूर्वजों के शासनकाल में ही एक समय भारतीय-सम्राट् विक्रमादित्य ने अर्वस्थान से सांस्कृतिक-राजनैतिक संबंध स्थापित किया था। इसलिए बिन्तोई ने अपनी एक कविता में विक्रमादित्य के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की। राजकुल से संबंधित होते हुए भी बिन्तोई एक उच्च कोटि का कवि था। उसे ओकाज़ मेले में आयोजित होनेवाले कवि-सम्मेलन में सर्वश्रेष्ठ कविताओं के लिए प्रथम पुरस्कार लगातार तीन वर्षों तक मिला था। बिन्तोई की वे तीनों कविताएँ स्वर्ण-पत्र पर उत्कीर्ण हो वर्षों तक मक्केश्वर महादेव मन्दिर के गर्भगृह में टंगी रहीं। उन्हीं में से एक में अरब पर पितृसदृश शासन के लिए उज्जयिनी-नरेश शकारि विक्रमादित्य का यशोगान किया गया है—
‘इत्रश्शफ़ाई सनतुल बिकरमातुन फ़हलमिन क़रीमुन यर्तफ़ीहा वयोवस्सुरू ।।1।।
बिहिल्लाहायसमीमिन इला मोतक़ब्बेनरन, बिहिल्लाहा यूही क़ैद मिन होवा यफ़ख़रू।।2।।
फज़्ज़ल-आसारि नहनो ओसारिम बेज़ेहलीन, युरीदुन बिआबिन क़ज़नबिनयख़तरू।।3।।
यह सबदुन्या कनातेफ़ नातेफ़ी बिज़ेहलीन, अतदरी बिलला मसीरतुन फ़क़ेफ़ तसबहू।।4।।
क़ऊन्नी एज़ा माज़करलहदा वलहदा, अशमीमान, बुरुक़न क़द् तोलुहो वतस्तरू।।5।।
बिहिल्लाहा यकज़ी बैनना वले कुल्ले अमरेना, फ़हेया ज़ाऊना बिल अमरे बिकरमातुन।।6।।’
अर्थात्, वे लोग धन्य हैं, जो राजा विक्रमादित्य के साम्राज्य में उत्पन्न हुए, जो दानवीर, धर्मात्मा और प्रजावत्सल था ।।1।। उस समय हमारा देश (अरब) ईश्वर को भूलकर इन्द्रिय-सुख में लिप्त था। छल-कपट को ही हमलोगों ने सबसे बड़ा गुण मान रखा था। हमारे सम्पूर्ण देश पर अज्ञानता ने अन्धकार फैला रखा था।।2।। जिस प्रकार कोई बकरी का बच्चा किसी भेडि़ए के चंगुल में फँसकर छटपटाता है, छूट नहीं सकता, उसी प्रकार हमारी मूर्ख जाति मूर्खता के पंजे में फँसी हुई थी।।3।। अज्ञानता के कारण हम संसार के व्यवहार को भूल चुके थे, सारे देश में अमावस्या की रात्रि की तरह अन्धकार फैला हुआ था। परन्तु अब जो ज्ञान का प्रातःकालीन प्रकाश दिखाई देता है, यह कैसे हुआ?।।4।। यह उसी धर्मात्मा राजा की कृपा है, जिन्होंने हम विदेशियों को भी अपनी कृपा-दृष्टि से वंचित नहीं किया और पवित्र धर्म का सन्देश देकर अपने देश के विद्वानों को भेजा, जो हमारे देश में सूर्य की तरह चमकते थे।।5।। जिन महापुरुषों की कृपा से हमने भुलाए हुए ईश्वर और उसके पवित्र ज्ञान को समझा और सत्पथगामी हुए; वे महान् विद्वान्, राजा विक्रमादित्य की आज्ञा से हमारे देश में ज्ञान एवं नैतिकता के प्रचार के लिए आए थे।।6।।
प्रागैस्लामी अरबी-कवि बिन्तोई द्वारा सम्राट् विक्रमादित्य की प्रशंसा में रचित उपर्युक्त कविता से अरब-प्रायद्वीप से भारतवर्ष के राजनैतिक-सांस्कृतिक संबंधों का पता चलता है। यह सर्वविदित है कि भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा से भारत पर समय-समय पर अनेक विदेशी आक्रमण होते रहे। शकारि विक्रमादित्य ने अपनी वीरता और शौर्य का परिचय देते हुए 77 ई.पू. में कंधार व बेबीलोन को विजितकर अरब को भी विजित किया और उसे भारतीय साम्राज्य का अंग बनाया। उन्होंने वहाँ की धार्मिक तथा सांस्कृतिक परम्पराओं का सम्मान करते हुए वहाँ अनेक सुधार किए। भारतीय विद्वानों को वहाँ भेजकर ज्ञान का दीपक जलाया। उन विद्वानों ने वहाँ भारतीय संस्कृति का प्रसार किया। इसलिए विक्रमादित्य का सम्मान एक विजेता के रूप में न होकर एक तारणहार के रूप में हुआ। अर्वों, पारसियों, कुर्द, हूणों तथा यहूदियों ने भी विक्रमादित्य का सम्मान किया। इससे एक बार पुनः यह सिद्ध हो जाता है कि वैदिक-सभ्यता ज्ञान के प्रसार के लिए थी। इसका ध्येय यह कभी नहीं था कि धर्म के नाम पर अत्याचार किए जाएँ।
सम्राट् विक्रमादित्य महाकाल के परम भक्त थे। उन्होंने अरब की धार्मिक-सांस्कृतिक राजधानी मक्का में महादेव के मन्दिर का पुनर्निर्माण कराया। इसके अतिरिक्त 360 मन्दिर स्थापित किए। उन्होंने बेबीलोन, फ़ारस एवं अनातोलिया में भी कई मन्दिर स्थापित किए, शिक्षा का प्रसार किया। अनातोलिया के एक व्यक्ति को वहाँ का राज्यपाल बनाकर वह उज्जयिनी लौटे। लेकिन लगभग चालीस वर्ष बाद ही, अर्थात् 33 ई.पू. में रोमन साम्राज्य ने अन्तोलिया पर आक्रमण किया, जिससे उसपर वैदिक प्रभाव कम हो गया । अभी हाल ही में कुवैत में स्वर्ण-पॉलिश की हुई गणेश जी की एक प्रतिमा वहाँ के पुरातत्त्व विभाग ने प्राप्त की है, जो निश्चय ही हिंदुस्थान के साथ अर्वस्थान के दृढ़ संबंधों की हमारी मान्यता को पुष्ट करती है।
‘शायर-उल्-ओकुल’ की एक अन्य महत्त्वपूर्ण एवं रहस्योद्घाटनकारी कविता अरब के महाकवि और भगवान् महादेव के परम भक्त ‘अमर-इब्न हिशाम’ की है, जिन्हें उनके समकालीन व्यक्ति सम्मानपूर्वक ‘अबूल हक़म’ (ज्ञान का पिता) कहकर पुकारते थे। हिशाम मक्का के एक प्रसिद्ध नेता थे, जो कुरैशी वंश के ‘बानु मखजुम’ शाखा से संबंध रखते थे। इस दृष्टि से हिशाम, मुहम्मद साहब के चाचा लगते थे, यद्यपि वह उनके सगे चाचा नहीं थे। हिशाम ने मक्का के इस्लामीकरण के समय इस्लाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, अतः मुसलमान द्वेषवश उन्हें ‘अबू ज़हाल’ (अज्ञान का पिता) कहते थे। हिशाम के पुत्र इकरिमाह इब्न अबि-जहाल ने सन् 630 ई. में इस्लाम स्वीकार कर लिया और वह प्रारम्भिक इस्लामी राज्य का महत्त्वपूर्ण नेता हुआ। हिशाम हिंदू-धर्म को बचाने के लिए लड़े गए बद्र के युद्ध (17 मार्च, 624 ई.) में उन मुसलमानों के हाथों शहीद हुए जो सभी ग़ैर-इस्लामी चिह्नों को मिटा देना चाहते थे। इस महाकवि ने मक्का के कुलदेवता मक्केश्वर महादेव और पवित्र भारतभूमि के लिए कविता लिखी थी, जो मक्का के वार्षिक ओकाज़ मेले में प्रथम पुरस्कृत होकर काबा देवालय के भीतर स्वर्णाक्षरों में उत्कीर्ण होकर टंगी थी—
‘कफ़विनक़ जि़क़रा मिन उलुमिन तब असेरू।
क़लुवन अमातातुल हवा तज़क्क़रू ।।1।।
न तज़ख़ेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा।
वलुकएने ज़ातल्लाहे औम तब असेरू।।2।।
व अहालोलहा अज़हू अरामीमन महादेव ओ।
मनोज़ेल इलमुद्दीने मीनहुम व सयत्तरू।।3।।
व सहबी के याम फ़ीम क़ामिल हिंदे यौग़न।
व यकुलून न लातहज़न फ़इन्नक़ तवज़्ज़रू।।4।।
मअस्सयरे अख़्लाक़न हसनन कुल्लहूम।
नजुमुन अज़ा अत सुम्मा ग़बुल हिंदू।।5।।’
अर्थात्, वह मनुष्य, जिसने अपना जीवन पाप और अधर्म में बिताया हो; काम-क्रोध में अपना यौवन नष्ट कर लिया हो।।1।। यदि अन्त में उसे पश्चाताप हो और वह भलाई के मार्ग पर लौटना चाहे तो क्या उसका कल्याण हो सकता है?।।2।। हाँ, यदि वह एक बार भी सच्चे हृदय से महादेव की आराधना करे, तो वह धर्म-मार्ग पर परम पद को प्राप्त कर सकता है।।3।। हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन हिंद (भारत) में निवास के लिए दे दो, क्योंकि उस पवित्र भूमि पर पहुँचकर मनुष्य आध्यात्मिकतः मुक्त हो जाता है।।4।। वहाँ की यात्रा से सत्कर्म के गुणों की प्राप्ति होती है और आदर्श हिंदू-गुरुजनों का सत्संग मिलता है।।5।।
प्रागैस्लामी अरबी-कवि अमर इब्न हिशाम की उपर्युक्त कविता से अनेक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं। सर्वप्रथम, हमारी यह मान्यता और भी पुष्ट हुई है कि भगवान् महादेव समस्त अर्वस्थान में परमपूज्य देवता के रूप में प्रतिष्ठित थे।इस कविता के सन्दर्भ में एक और तथ्य महत्त्वपूर्ण है। इस कविता के रचयिता ‘लबी-बिन-ए-अख़्तर-बिन-ए-तुर्फा’ का नाम किसी व्यक्ति का अपनी तीसरी पीढ़ी तक परिचय देने की संस्कृत-पद्धति का स्मरण कराता है। भारतीय विवाहों तथा अन्य महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्मकाण्डों में पूजा करनेवाले व्यक्ति का नामोल्लेख अमुक का पुत्र व अमुक का पौत्र कहकर ही किया जाता है। अभिलेखों में राजाओं के परिचय में उनकी तीन पीढि़यों के नाम देने की प्रथा बारहवीं शती तक प्रचलित रही है। भारतीय संस्कृति में पले होने के कारण अरबों ने भी किसी व्यक्ति को उनके पिता व पितामह के सन्दर्भ में कहने की पद्धति को अपना लिया। ‘बिन’, ‘का बेटा’ का द्योतक है। इस प्रकार लबी ‘अख़्तर’ का पुत्र था और अख़्तर ‘तुर्फा’ का।
ये तो उदाहरणमात्र हैं। इस प्रकार की 64 कविताएँ अबतक प्राप्त हुई हैं, जिनमें ऐसी ही चमत्कारी बातों का वर्णन है। इन कविताओं से यह पूर्णतया सिद्ध हो जाता है कि प्रागैस्लामी अरबवासी हिंदू-धर्म को माननेवाले तथा आर्य-सभ्यता के पक्के अनुयायी थे।
उक्त तथ्य के आलोक में यह धारणा भी निर्मूल सिद्ध हो जाती है कि अरब लोग अपरिचितों की भाँति यदा-कदा भारत आते रहे, यहाँ की पुस्तकों का अनुवाद करते रहे और यहाँ की कला एवं विज्ञान के कुछ रूपों को अनायास ही धारण करके उन्हें अपने देशों में प्रचलित करते रहे। बहुविध ज्ञान यदा-कदा यात्रा करनेवालों को कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। पाण्डित्य के लिए गम्भीर अध्ययन, निष्ठापूर्वक प्रयत्नों तथा ध्यानपूर्वक बनाई गई योजना की आवश्यकता होती है। दूसरा, उपर्युक्त कविता में ‘हिंद’ (भारत) और ‘हिंदू’ शब्द अरबवासियों के लिए वरदानस्वरूप बताया गया है। प्रागैस्लामी युग में अरबवासी भारतभूमि को ‘हिंद’ कहते थे और उसकी यात्रा के लिए अत्यन्त उत्सुक रहा करते थे। हिंद के प्रति अरबों में इतना श्रद्धाभाव था कि अरबवासी प्रायः अपनी बेटियों के नाम ‘हिंद’ रखते थे। प्रागैस्लामी अर्वस्थान में ‘हिंद-बिन-उतबाह’ (छठी शती के अन्त और सातवीं शती के प्रारम्भ में) नामक एक प्रभावशाली महिला हुई, जिसने मुहम्मद साहब के विचारों का विरोध किया थ । इस कारण इस्लामी इतिहास में वह कुख्यात है। स्वयं मुहम्मद साहब की एक पत्नी का नाम भी हिंद (पूरा नाम ‘उम्म सलमा हिंद बिन्त अबी उम्मैया’: 580?-680) इनके अतिरिक्त अर्वस्थान में हिंद नामवाली कई महिलाएँ हुईं। अरबवासी भारतीय ऋषि-मुनियों, चिन्तकों, वेदांतियों, विद्वानों तथा द्रष्टाओं को अपना मार्गदर्शक मानते थे । उन्हीं के चरणों में बैठकर अरबों ने सभ्यता का प्रथम पाठ सीखा।
उसी प्राचीन अरबी काव्य-संग्रह ‘शायर-उल्-ओकुल’ में एक अन्य महत्त्वपूर्ण कविता है। इस कविता का रचयिता ‘लबी-बिन-ए-अख़्तर-बिन-ए-तुर्फा’ है। यह मुहम्मद साहब से लगभग 2300 वर्ष पूर्व (18वीं शती ई.पू.) हुआ था । इतने लम्बे समय पूर्व भी लबी ने वेदों की अनूठी काव्यमय प्रशंसा की है तथा प्रत्येक वेद का अलग-अलग नामोच्चार किया है—
‘अया मुबारेक़ल अरज़ युशैये नोहा मीनार हिंद-ए।
वा अरादकल्लाह मज़्योनेफ़ेल जि़करतुन।।1।।
वहलतज़ल्लीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जि़करा।
वहाज़ेही योनज़्ज़ेलुर्रसूल बिनल हिंदतुन।।2।।
यकूलूनल्लहः या अहलल अरज़ आलमीन फुल्लहुम।
फ़त्तेवेऊ जि़करतुल वेद हुक्कुन मानम योनज़्वेलतुन।।3।।
वहोवा आलमुस्साम वल यजुरम्निल्लाहे तनजीलन।
फ़ए नोमा या अरवीयो मुत्तवेअन मेवसीरीयोनज़ातुन।।4।।
ज़इसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-ख़ुबातुन ।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।।5।।’
अर्थात्, हे हिंद (भारत) की पुण्यभूमि! तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना।।1।। वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश जो चार प्रकाश-स्तम्भों (चार वेद) सदृश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है। यह भारतवर्ष में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुए।।2।। और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान हैं, इनके अनुसार आचरण करो।।3।। वे ज्ञान के भण्डार ‘साम’ और ‘यजुर्’ हैं, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए हे मेरे भाइयो! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते हैं।।4।। और इनमें से ‘ऋक्’ और ‘अथर्व हैं, जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते हैं, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अंधकार को प्राप्त नहीं होता।।5।।

अठारह सौ ई.पू. एक अरबी-कवि द्वारा रचित वेदों के नामोल्लेखवाली कविता, क्या वेदों की प्राचीनता, उनकी श्रेष्ठता व हिंदुओं के अंतरराष्ट्रीय प्रसार को सिद्ध नहीं करती? क्या यह कविता उन तथाकथित इतिहासकारों को तमाचा नहीं लगाती, जो वेदों को 1500-1200 ई.पू. के अत्यन्त संकुचित दायरे में ठूँसते रहे हैं? इस विषय पर निष्पक्षतापूर्वक शोधाध्ययन की आवश्यकता है।


  इराक का एक पुस्तक है जिसे इराकी सरकार ने खुद छपवाया था। इस किताब में 622 ई से पहले के अरब जगत का जिक्र है। आपको बता दें कि ईस्लाम धर्म की स्थापना इसी साल हुई थी। किताब में बताया गया है कि मक्का में पहले शिवजी का एक विशाल मंदिर था जिसके अंदर एक शिवलिंग थी जो आज भी मक्का के काबा में एक काले पत्थर के रूप में मौजूद है। पुस्तक में लिखा है कि मंदिर में कविता पाठ और भजन हुआ करता था।
प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ ‘सेअरूल-ओकुल’ के 257वें पृष्ठ पर हजरतमोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-
“अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।”
अर्थात-
(1) हे भारत की पुण्य भूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। 
(2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। 
(3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनकेअनुसार आचरण करो।
(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।
(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।
  इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगेअस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरब में एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात ‘ज्ञान का पिता’ कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईर्ष्यावश अबुलजिहाल ‘अज्ञान का पिता’ कहकर उनकी निन्दा की।
जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल, अश्विनीकुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था। ‘Holul’ के नाम से अभिहित यह मूर्ति वहां इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियों के बराबर रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहां बने कुएं में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात ‘संगे अस्वद’ को आदर मान देते हुए चूमते है।
प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों कात्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे। हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।
 अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ‘ से अरूल-ओकुल’ के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है। ‘उमर-बिन-ए-हश्शाम’ की कविता नई दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़लामन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर काली स्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है -
” कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।
व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।
अर्थात् –
(1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। 
(2) यदि अन्त में उसको पश्चाताप हो, और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ?
 (3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्चपद को पा सकता है। 
(4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहां पहुंचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है।
 (5) वहां की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्श गुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है।

30.5.19

हनुमान चालीसा हिन्दी अर्थ सहित:Hanuman Chalisa



   श्री हनुमान चालीसा हिन्दी अर्थ सहित!!



श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
📯《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।★
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बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।★
📯《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।★
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जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥★
📯《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।★
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राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥★
📯《अर्थ》→ हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।★
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महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥★
📯《अर्थ》→ हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।★
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कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥★
📯《अर्थ》→ आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।★
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हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥★
📯《अर्थ》→ आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।★
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शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥★
📯《अर्थ 》→ हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।★
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विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥★
📯《अर्थ 》→ आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।★
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प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥★
📯《अर्थ 》→ आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।★
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सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥★
📯《अर्थ》→ आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।★
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भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥★
📯《अर्थ 》→ आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।★
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लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥★
📯《अर्थ 》→ आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।★
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रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।★
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सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥★
📯《अर्थ 》→ श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।★
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सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥★
📯《अर्थ》→श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।★
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जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥★
📯《अर्थ 》→ यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।★
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तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥★
📯《अर्थ 》→ आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।★
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तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥★
📯《अर्थ 》→ आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।★
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जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥★
📯《अर्थ 》→ जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।★
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प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥★
📯《अर्थ 》→ आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।★
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दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥★
📯《अर्थ 》→ संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।★
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राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।★
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सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥★
📯《अर्थ 》→ जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।★
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आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥★
📯《अर्थ. 》→ आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।★
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भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥★
📯《अर्थ 》→ जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।★
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नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥★
📯《अर्थ 》→ वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।★
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सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥★
📯《अर्थ 》→ तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।★
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और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥★
📯《अर्थ 》→ जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।★
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥★
📯《अर्थ 》→ चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।★
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साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥★
📯《अर्थ 》→ हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।★
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अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥★
📯《अर्थ 》→ आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।★
1.) अणिमा → जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।★
2.) महिमा → जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।★
3.) गरिमा → जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।★
4.) लघिमा → जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।★
5.) प्राप्ति → जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।★
6.) प्राकाम्य → जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।★
7.) ईशित्व → जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।★
8.)वशित्व → जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।★
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राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥★
📯《अर्थ 》→ आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।★
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तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥★
📯《अर्थ 》→ आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।★
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अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥★
📯《अर्थ 》→ अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।★
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और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।★
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संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥★
📯《अर्थ 》→ हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥★
📯《अर्थ 》→ हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।★
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जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥★
📯《अर्थ 》→ जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।★
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जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥★
📯《अर्थ 》→ भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।★
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तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥★
📯《अर्थ 》→ हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।★
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पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥★
📯《अर्थ 》→ हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।★
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12.5.19

गायत्री मन्त्र का रचियता कौन?:Gayatri mantra rachanakar




                                           

गायत्री मन्त्र का रचियता कौन ? किसने बनाया था गायत्री मन्त्र ? 

जानिये गायत्री मंत्र  बनाने वाले के बारे में ..
Gayatri-Mantra : जिस प्रकार भारत में पुष्कर Pushkar को तीर्थराज माना जाता है उसी प्रकार मन्त्रों में भी गायत्री मंत्र Gayatri Mantra को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
 यह वास्तव में सूर्य नारायण का मंत्र है और उससे भी आगे गौरव की बात यह है कि इस श्रेष्ठतम मंत्र के दृष्टा क्षत्रिय विश्वामित्र Rishi Vishvamitra थे। मंत्र शब्दार्थ इस प्रकार है-
ॐ भू भुवः स्वः तत सवितृ वरेण्यम भर्गो देवस्य धीमहि धियोयोनः प्रचोदयात।
ॐ – जो कि प्रणव, आदि स्वर, बीज है।
भू- भू लोक- यह पृथ्वी।
भुवः- भुवर्लोक – पृथ्वी से ऊपर वायुमंडल।
स्वः- स्वर्गलोक जहाँ देवता, अप्सराएँ गंधर्व आदि निवास करते है।
भू लोक पर रहने वाले अच्छे व्यक्तियों, संतों, तपस्वियों आदि से भूवर्लोक में सती, झुंझार, भौमिया व अन्य हुतात्माएँ सूक्षम शरीरों में तपस्यारत अन्य सद्शाक्तियों से और स्वर्गलोक में रहने वाले देवताओं से साधक अपनी साधना में सहायता के लिए आह्वान करता है।
सवितृ देव का मंत्र तो अब आरम्भ होता है-
तत सवितृ वरेण्यम- वरण करने योग्य उस सवितृ।
भर्गो देवस्य धीमहि- श्रेष्ठ देवताओं का ध्यान करते है।
धियोयोनः प्रचोदयात- जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।
अतः मंत्र का अर्थ हुआ-“वरण करने योग्य श्रेष्ठ देवता सवितृ का हम ध्यान करते है जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।
यहाँ मंत्र के दृष्टा ऋषि विश्वामित्र में सवितृदेव से कोई धन, धान्य, राज्य, सत्ता, शक्ति, बुद्धि, मुक्ति, प्रेम, दया आदि की याचना नहीं की। मात्र सन्मार्ग की ओर बुद्धि को प्रेरित करने का कार्य करे यह अभिलाषा है।
विश्वामित्र जी ने इस बात को सूक्ष्म रूप से समझा कि सन्मार्ग की ओर प्रेरित बुद्धि ही कल्याणकारी है, न कि शक्तिशाली बुद्धि और ऐसे मंत्र की रचना की जिसकी सर्वश्रेष्ठता आज तक निर्विवाद है।
रावण, कंस, हिरण्यकश्यप, परशुराम आदि पथभ्रष्ट व्यक्ति मुर्ख नहीं थे, बल्कि बुद्धिमान थे पर सन्मार्ग पर ना चलने की वजह से बुद्धि का आधिक्य होने के बावजूद इतिहास में खलनायक के रूप में दर्ज है।
गायत्री मंत्र- सवितृदेव सूर्य जिनसे यह सम्पूर्ण सृष्टि निसरित हुई है-का मंत्र है। मंत्र के शब्दों में कहीं गायत्री देवी का उल्लेख नहीं आता। मंत्र की रचना का छन्द अवश्य गायत्री है। किसी भी श्लोक अथवा मंत्र जिसमें 24 अक्षर हों उसे गायत्री छन्द में रचित कहते है। अतः छन्द के नाम पर मंत्र का नाम Gayatri-Mantra कर देना और उसे गायत्री देवी से सम्बद्ध कर गायत्री देवी नाम से छोटे-मोटे ग्रंथों की रचना कर उन्हें जन प्रचलित करना विश्वामित्र जी के साथ खिलवाड़ ह
क्षत्रियों द्वारा इस मंत्र (Gayatri-Mantra) के तत्व और महत्त्व को व विश्वामित्र के चरित्र के महात्म्य को विस्मृत कर दिए जाने का परिणाम यह हुआ कि आज इस मंत्र के ठेकेदार कोई और बन बैठे और क्षत्रिय इसके लाभों से उसी प्रकार दूर हो गये जैसे श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को बताये गए रास्ते से दूर हो गये। परिणामतः इस राह के भी मालिक कोई और बन बैठे।

विस्तृत वर्णन-

गायत्री मंत्र की उत्पत्ति कहाँ से है? 
वेदमाता गायत्री, ब्राह्मणमाता गायत्री की चर्चा आश्रमीय प्रकाशन ‘शंका-समाधान’ में द्रष्टव्य है। उसकी पुनरावृत्ति न कर संक्षेप में चर्चा अपेक्षित है। वैसे गायत्री कोई देवी नहीं है। पौराणिककाल के कतिपय प्रवृत्तमार्गी व्यवस्थाकारों ने गायत्री को देवी-जैसा रूप दे डाला। गायत्री मंत्र की उत्पत्ति मर्हिष विश्वामित्र से है। जीवन के आरम्भिक वर्षों में यह मर्हिष राजा गाधि के पुत्र विश्वरथ नामक नरेश थे। चक्रर्वितत्व की कामना से विश्व-विजय कर रहे यह नरेश ब्रह्र्मिष वशिष्ठ के ब्रह्मतेज से पराभूत हो गये अत: ब्रह्मतेज र्अिजत करने के लिए तपस्या करने लगे।
उन्हें तपस्या से विरत करने के लिए देवताओं ने मेनका नामक अप्सरा को भेजा। विश्वामित्र उस पर आसक्त हो गये। उससे शकुन्तला नामक एक कन्या उत्पन्न हुई।
सद्य:जात बालिका की सुरक्षा से चिन्तित ऋषि मेनका को जंगल में ढूँढ़ने लगे। आकाशवाणी हुई– वह तो माया थी, ठगने आई थी चली गई। आप तप से च्युत हो गये!
विश्वामित्र पुन: तपश्चर्या में लग गये। एक नरेश त्रिशंकु ने उनसे सदेह स्वर्ग जाने का अनुरोध किया। मर्हिष ने अपने तपोबल से उसे स्वर्ग भेज भी दिया। देवताओं को यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने त्रिशंकु की प्रशंसा कर जानना चाहा कि किस पुण्यकर्म से वह सदेह स्वर्ग आया। त्रिशंकु ने अपने पुण्यकर्मों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जिससे उसका पुण्य क्षीण होने लगा। वह स्वर्ग से नीचे गिरने लगा। उसने विश्वामित्र को अपनी दुर्दशा से अवगत कराया। ऋषि ने उसे अधर में ही रुकने का आदेश दिया और उसके लिए अलग स्वर्ग और सृष्टि की संरचना में लग गये। देवताओं के अनुरोध पर विश्वामित्र नवीन सृष्टि-रचना से विरत तो हो गये किन्तु इससे उनकी तपस्या को गहरी क्षति पहुँची।
एक बार महाराज अम्बरीष अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। इन्द्रपद छिन जाने के भय से देवराज इन्द्र ने यज्ञ का अश्व चुरा लिया। अश्व की शोध में राजा जंगलों में पहुँचे। वहाँ एक राजा, उनकी रानी तथा तीन राजकुमार राज्य छिन जाने से शान्त-एकान्त में जीवन व्यतीत कर रहे थे। अम्बरीष ने उन राजा को बताया कि यज्ञ का घोड़ा गायब हो गया है। आप अपना कोई पुत्र दे दें तो मैं आपको लाखों गायें, स्वर्णमुद्राएँ दूँगा। बच्चों के पिता ने कहा– बड़ा पुत्र मुझे प्रिय है, मैं नहीं दे सकता। माँ बोली– छोटा पुत्र मुझे प्रिय है, मैं नहीं दे सकती। मझले लड़के ने कहा– राजन्! मैं किसी को प्रिय नहीं हूँ अत: मैं आपके साथ चलूँगा। आप गायें, स्वर्णमुद्राएँ इन्हें दे दें। उस बालक का नाम शुन:शेप था।
राजा और बालक उसी मार्ग से जा रहे थे जहाँ विश्वामित्र तपस्या कर रहे थे। विश्वामित्र ने बालक को पहचान लिया क्योंकि वह उनका भांजा था। शुन:शेप ने बताया कि वह बलि चढ़ने जा रहा है। विश्वामित्र ने कहा– मेरे सौ पुत्र हैं, उनमें से कोई तुम्हारे स्थान पर चला जायेगा। तुम चिन्ता न करो। विश्वामित्र ने अपने पुत्रों से कहा– इसे मैंने अभयदान दिया है, मेरी शरण में है। तुममें से कोई इसके बदले अपने को बलि हेतु प्रस्तुत कर दो। बच्चों ने कहा– सबके पिता झूठ-सच बोलकर अपने पुत्रों का हित करते हैं, आप कैसे पिता हैं जो मरने के लिए कहते हैं! सबने अस्वीकार कर दिया। विश्वामित्र को क्रोध आ गया, बोले– बचोगे तब भी नहीं! जाओ सब-के-सब मर जाओ। सब मर गये। आकाशवाणी हुई कि आपका तप नष्ट हो गया।
विश्वामित्र ने तब ध्यानस्थ होकर देखा और शुन:शेप से कहा कि अश्व को इन्द्र ने चुराया है। तुम बलि के लिए जाओ और जब तुम्हें बलि हेतु स्तम्भ से बाँध दिया जाय, तब तुम इन्द्र की स्तुति करना। इन्द्र अश्व दे देगा, तुम छूट जाओगे। घोड़ा मिल गया। शुन:शेप बच गया। सप्र्तिषयों ने उस बालक को अपनी संरक्षा में ले लिया।
विश्वामित्र ने विचार किया कि लाख प्रयत्न करके भी मैं तपस्या में सफल नहीं हो पा रहा हूँ। माया कब प्रवेश करती है मुझे पता ही नहीं चलता। जब आकाशवाणी सूचित करती है तब ज्ञात हो पाता है। लगता है कि मैं अपने बल से इन बाधाओं पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता। अन्तत: विश्वामित्र ने एक परमात्मा की शरण ली कि– ‘‘ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।’’ (यजुर्वेद, अध्याय ३६, कण्डिका ३) अर्थात् ॐ शब्द से उच्चरित, भू:, भुव: और स्व: तीनों लोकों में तत्त्वरूप से व्याप्त ‘सवितु:’– ज्योतिर्मय परमात्मा! आपके ‘वरेण्य भर्ग’ अर्थात् तेज का हम ‘धीमहि’- ध्यान करते हैं। ‘न: धिय: प्रचोदयात्’– हमारी बुद्धि में निवास करें, मुझे प्रेरणा दें। इस प्रकार अपने को भगवान के प्रति सर्मिपत कर विश्वामित्र तपस्या में लग गये। माया विश्वामित्र के पास आई, उनकी परिक्रमा कर लौट गयी। ब्रह्मा आये और कहा– आज से आप ऋषि हुए, मर्हिष हुए; किन्तु विश्वामित्र ने कहा– हमें जितेन्द्रिय ब्रह्र्मिष कहें। ब्रह्मा ने कहा– अभी आप जितेन्द्रिय नहीं हैं।
विश्वामित्र तपस्या में लगे ही रह गये। विधाता तीसरी बार समस्त देवताओं सहित पहुँचे और कहा– आज से आप ब्रह्र्मिष हुए। विश्वामित्र ने कहा– यदि मैं ब्रह्र्मिष हूँ तो वेद मेरा वरण करें। विश्वामित्र के पास वेद आ गये। जो परमात्मा अविदित था वह विदित हो गया। वेदों का अध्ययन नहीं करना पड़ता बल्कि प्राप्ति के साथ मिलनेवाली प्रत्यक्ष अनुभूति का नाम वेद है। वेद का अर्थ है जानकारी, परमात्मा जानने में आ गया। विश्वामित्र ने कहा– वशिष्ठ दर्शन दें। वशिष्ठ आये, विश्वामित्र से गले मिले।
इस प्रकार गायत्री एक परमात्मा के प्रति समर्पण है। इसके द्वारा हम-आप त्रिगुणमयी प्रकृति का पार पा सकते हैं कि भू: भुव: स्व: तीनों लोकों में तत्त्वरूप से जो व्याप्त है, जो सहज प्रकाशस्वरूप है, हे परमात्मा! आप मेरी बुद्धि में निवास करें जिससे मैं आपको जान लूँ। यह प्रार्थना गीता के अनुरूप है कि ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।’ (१८/६६)– सारे धर्मों को त्याग दे, मात्र मेरी शरण हो जा। मैं तुम्हें सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा। तू मुझे प्राप्त होगा। सदा रहनेवाला जीवन और शान्ति प्राप्त कर लेगा। यही है गायत्री!
रामचरितमानस में वर्णन आता है कि सीताजी ने जब रंगभूमि में चरण रखा, धनुष-यज्ञ हो रहा था। अनेक पराक्रमी राजा-महाराजा असफल होते जा रहे थे। दस-दस हजार राजा एक साथ प्रयास कर रहे थे। रावण और बाणासुर जैसे पराक्रमी नरेश भी चुपचाप लौट गये थे। सीता ने राम को देखा– शिरीष पुष्प जैसा कोमल शरीर!
तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही।। (मानस, १/२५६/४)
भयभीत हृदय से उस समय जो भी याद आया ‘जेहि तेही’– सबकी प्रार्थना की किन्तु कोई लाभ नहीं निकला। तब वह भोलेनाथ शिव-पार्वती की शरण गयीं– ‘मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।।’ (१//५६/५)– हे शंकर-पार्वती जी! मैंने आपकी जो सेवा की है, उसके बदले में ‘करि हितु हरहु चाप गरुआई’– मेरा हित सधता दिखायी पड़े तो चाप को हल्का कर दें। अभी हल्का कर देंगे तो ऐरा-गैरा कोई भी उसे तोड़ देगा।
जब रामजी की उँगलियाँ धनुष का स्पर्श करें तभी चाप को हल्का करें किन्तु कोई लाभ दिखायी न पड़ा, तब–
गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा।।
बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी।। (मानस, १/२५६/७-८)
हे गणेश जी! वर देने में आपकी ख्याति है। हमारी बार-बार विनती सुनकर चाप के भारीपन को बहुत ही कम कर दीजिए। सफलता मिलता न देख उन्होंने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं को एक साथ मना डाला–
देखि देखि रघुवीर तन, सुर मनाव धरि धीर।
भरे बिलोचन प्रेम जल, पुलकावली सरीर।। (मानस, १/२५७)
प्रेमाश्रु छलक आये। समस्त देवतागण चाप को हलका करें, फिर भी कहीं कोई लाभ नहीं हुआ। तब सीता आँखें बन्द कर उन प्रभु की शरण चली गयीं जिनकी शरण जाने का विधान है–
तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा।।
तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी।। (मानस, २/२५८/४-५)
मन-क्रम-वचन से यदि मेरा प्रण सत्य है, श्रीराम के चरणों में मेरा मन अनुरक्त है तो ‘भगवानु सकल उर बासी’– जो घट-घट में वास करते हैं, वह भगवान मुझे राम की दासी बना दें। कृपानिधान राम ने उसी क्षण जान लिया कि अब यह मेरी शरण आ गयी है– ‘तेहिं छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।’ (१/२६०/८)– उसी क्षण धनुष टूट गया, जयमाला पड़ गयी, सफलता मिल गयी। अर्थात् एक परमात्मा की शरण जिस क्षण सीता गयीं, सफलता मिल गयी। यही है गायत्री कि ओम् शब्द से उच्चरित ‘भू: भुव: स्व:’ तीनों लोकों में व्याप्त घट-घट वासी प्रभु मुझे राम की दासी बना दें। जिन्हें भी वह सत्य चाहिए, उन सबको एक प्रभु के प्रति समर्पण के साथ भजन करना चाहिए। यही है गायत्री!
गायत्री मंत्र का अर्थ क्या है?
गायत्री मंत्र का आशय अभी विस्तार से बताया गया। संक्षेप में यह उन प्रभु के प्रति समर्पण है जिससे त्रिगुणमयी प्रकृति से पार पाया जा सकता है।
गायत्री मंत्र का वैज्ञानिक, तार्किक या दार्शनिक पक्ष क्या है? गायत्री मंत्र जपने से क्या लाभ है?
गायत्री मंत्र एक परमात्मा के प्रति समर्पण मात्र है। इसका वैज्ञानिक, तार्किक या दार्शनिक होने प्रश्न ही नहीं है। गायत्री मंत्र से अनन्त देवी-देवताओं की पूजा से आपका सम्बन्ध हट जायेगा और एक परमात्मा में श्रद्धा जुट जायेगी, फिर जीवन में कभी भ्रान्ति नहीं होगी।– यही सर्वोपरि लाभ है।
गायत्री मंत्र से किस कठिनाई को दूर किया जा सकता है?
गायत्री मंत्र अर्थात् एक परमात्मा में समर्पण से सभी कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं, फिर जीवन में कभी कठिनाई आती ही नहीं किन्तु समर्पण के पश्चात् भजन करना होगा जिसकी विधि गीताभाष्य ‘यथार्थ गीता’ में द्रष्टव्य है। एक परमात्मा की शरण गायत्री है। संस्कृत भाषा में ‘ॐ भूर्भुव:....’ पढ़ा जाता है। हिन्दी में इसी को कहेंगे कि हे परमतत्त्व परमात्मा! हे घट-घट वासी प्रभु! मुझे अपनी शरण में ले लें। मैं आपको प्रत्यक्ष जानना चाहता हूँ। यह भावना ही गायत्री है। सही अर्थ न समझने से किसी ने गायत्री को देवी कहा, किसी ने मंत्र कहा, किसी ने कहा कि ब्राह्मण को ही गायत्री मंत्र जपने का अधिकार है जबकि इसके प्रणेता विश्वामित्र जी क्षत्रिय नरेश थे। जब उन्होंने ब्रह्मतत्त्व को जान लिया, तत्त्व विदित हो गया, उनमें वेद उतर आये, वह ब्राह्मण हो गये, भगवान को पा गये, फिर वह क्यों गायत्री जपें? जिसने ब्राह्मणत्व को न पाया हो ऐसा प्रत्येक प्राणी जप सकता है, भजन कर सकता है। यह सबके लिये है।
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6.12.18

सुभाषचंद्र बोस की जीवनी और अनमोल वचन





भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने वाले क्रांतिकारियों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम प्रथम पंक्ति में आता है वे सच्चे अर्थों में देश पर मर मिटने वाले क्रान्तिवीर थे। उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक के विख्यात वकील श्री जानकीनाथ बोस के घर हुआ था, उनकी माता का नाम प्रभावती था। सुभाष चंद्र बोस बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थे, वह पढ़ने में बहुत होशियार थे। अपने कॉलेज के दिनों में भी छात्र नेता के रूप में उभरे वह बहुत ही प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। जब सुभाष चंद्र बोस जी ने अपने देश को ब्रिटिश शासन के अधीन देखा और अंग्रेजों द्वारा अपने देश के नागरिकों पर हो रहे अत्याचारों को देखा तो उनका युवा खून खौल उठा उन्होंने अंग्रेजों को अपने देश से खदेड़ने का संकल्प किया।

उन्होंने देश की आजादी के खातिर भारतीय सिविल सेना जैसी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। आजादी को मांगकर नहीं बल्कि छीनकर हासिल करना चाहते थे वे देश के सम्मान स्वाभिमान के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। उन्होंने देश में चल रहे आंदोलन में हिस्सा लिया और अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया और जब अंग्रेजों ने स्वाधीनता की ओर बढ़ते उनके कदमों में जंजीरे डालने का प्रयास किया तो वे देश त्याग कर विदेशों की ओर रवाना हो गए। उन्होंने विदेशों में रहते हुए भी देश की स्वाधीनता के लिए संघर्ष जारी रखा। 5 जुलाई 1945 को सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज की गठन की विधिवत घोषणा की और उन्होंने सिंगापुर में म्युनिसिपल भवन के सामने आजाद हिंद की सभी पलटनों की संयुक्त परेड का निरीक्षण किया।
इसी अवसर पर उन्होंने दिल्ली चलो और दिल्ली पर अधिकार करो का नारा दिया। उन्होंने देशवासियों को तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा भी दिया। आजाद हिंद फौज में लगभग 40000 सैनिक थे उनमें 1000 रूसी सैनिकों वाली रानी झांसी रेजिमेंट भी शामिल थी। आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति बनने के बाद सुभाष चंद्र बोस ने नागरिक वेशभूषा त्याग दी और सैनिक पोशाक पहनने लगे। 25 अक्टूबर 1945 को सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी और कई जगह सफलता प्राप्त की, किंतु 5 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और 8 अगस्त 1945 को नागासाकी पर हुए परमाणु बम के हमले ने जापान को मित्र राष्ट्रों के सामने घुटने टेकने को मजबूर कर दिया।
इसी के साथ सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज की आकांक्षाएं दम तोड़ती नजर आने लगी। लेकिन वह अंत तक अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब देते रहे 27 अगस्त 1945 को अचानक जापान की टोक्यो न्यूज़ एजेंसी ने यह समाचार प्रसारित किया कि विगत 18 अगस्त को श्री सुभाष चंद्र बोस हवाई जहाज की दुर्घटना से बुरी तरह घायल होकर एक अस्पताल में भर्ती हुए थे और उसी रात में संसार से चल बसे। लेकिन अनेक ज्योतिषियों कैप्टन स्वामीनाथ ने तथा गांधी जी ने अपने अनेक भासनो में इस समाचार पर अविश्वास प्रकट किया था। आजादी के इतिहास में अंग्रेजी सरकार से लोहा लेने वाला जिसने अपना संपूर्ण जीवन स्वाधीनता संग्राम की भेंट चढ़ा दिया ऐसे महान देशभक्त को हमारा शत-शत नमन।

नेताजी के अनमोल वचन

*बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता।नश्वर संसार में हर चीज नष्ट हो जाती है लेकिन विचार आदर्श और सपने कभी खत्म नहीं होते।
*आजादी का मतलब सिर्फ राजनीतिक गुलामी से छुटकारा ही नहीं देश की संपत्ति का समान बंटवारा, जात पात के बंधनों और सामाजिक ऊंच-नीच से मुक्ति तथा संप्रदायिकता वर्धमान धर्मांधता को जड़ से उखाड़ फेंकना ही सच्ची आजादी होगी।
*यदि मनुष्य चाहे तो धरती क्या आकाश तक को बदल सकता है।
*यदि कोई अन्याय या अनुचित काम करने से वास्तविकता की सिद्धि हो सकती है तो ऐसा करना मनुष्य का
दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता।यदि कुछ लेना चाहते हो तो कुछ देना सीखो।
*गुलामी दुनिया का सबसे घृणित पाप है।
*मनुष्य का जीवन इसलिए है कि वह बात या चार के खिलाफ लड़े।
*अस्पृश्यता हमारे देश और समाज के मस्तिक पर कलंक है।
*शिक्षित व्यक्ति यदि चरित्रहीन हो तब भी क्या उसे विद्वान कहेंगे? कभी नहीं।
*हिंदी के विरोध का कोई भी आंदोलन राष्ट्र की प्रगति में बाधक है।
*जीवन चाहते हो तो जीवन देना सीखो और याद रखो महानतम गुण अन्याय से संघर्ष करना है चाहे उसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।
*तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।
*इस सनातन नियम को याद रखो तुम कुछ प्राप्त करना चाहो तो अर्पित करना सीखो।
*देश से ही नहीं जो दिल से गुलाम हो गए हो बे कभी आजादी हासिल नहीं कर सकते।
*अपनी ताकत पर भरोसा करो उधार की शक्ति तुम्हारे लिए घातक है|
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