24.3.25

गणेश भगवान को क्यों लगाना पड़ा था गज मुख? क्या है पौराणिक कथा



भगवान गणेश के अनेक नामों में एक नाम गजानन और गजमुख है। इनके इस नाम के पीछे वजह यह है कि इनका धड़ तो मनुष्य का है लेकिन मुख गज का है। गणेश पुराण सहित दूसरे अन्य पुराणों में उल्लेख मिलता है कि भगवान गणेश जन्म से गजमुख नहीं थे। आरंभ में इनका मुख मनुष्य के समान था लेकिन बाद में एक ऐसी घटना हुई जिससे गणेशजी का मनुष्य वाला सिर कट गया और गज का मुख लगाकर इन्हें फिर से जीवित किया गया।

  हिंदू देवी- देवताओं में गणपति का विशेष महत्व है. किसी भी शुभ काम की शुरुआत से पहले गणेश भगवान की आराधना की जाती है. पुराणों में गणपति के जन्म से लेकर उनके शारीरिक बनावट के संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं.
गणेश भगवान का मुंह हाथी का है इसलिए उन्हें गजमुख भी कहा जाता है. आइए जानते हैं कि आखिर क्यों गणेश जी को हाथी का सिर मिला. शिवजी तो जंगल में निवास करते थे और वो किसी भी जानवर का सिर उन्हें लगा सकते थे फिर भी उन्होंने हाथी का मुख ही गणपति को क्यों लगाया. आइए जानते हैं इस कहानी के बारे में.
गणेश जी का सिर हाथी का है. उनके इस सिर के पीछे एक असुर की कहानी है. गज और असुर के संयोग से एक असुर का जन्म हुआ. इस असुर का मुख गज जैसा होने के कारण उसे गजासुर कहा जाने लगा.
  कूर्मपुराण के अनुसार गजासुर शिवजी का बड़ा भक्त था और दिन-रात उनकी आराधना में लीन रहता था. उसकी भक्ति से भोले भंडारी प्रसन्न हो गए और उससे इच्छानुसार वरदान मांगने को कहा
गजासुर ने वरदान में शिव को ही मांग लिया. गजासुर ने कहा कि प्रभु यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हैं तो कैलाश छोड़कर मेरे पेट में ही निवास करें. शिव जी बहुत भोले थे इसलिए वो गजासुर की ये बात मान गए और उसके पेट में समा गए.
   जब माता पार्वती ने शंकर भगवान को खोजना शुरू किया लेकिन वह कहीं नहीं मिले. उन्होंने विष्णुजी का स्मरण कर शिवजी का पता लगाने को कहा. इसके बाद विष्णु जी ने एक योजना बनाई. अपनी लीला से विष्णु भगवान सितारवादक बने, ब्रह्मा जी को तबला वादक और नंदी को नाचने वाला बैल बनाया. तीनों ने मिलकर गजासुक के महल में नाच किया.
बांसुरी की धुन पर नंदी के अद्भुत नृत्य से गजासुर बहुत प्रसन्न हो गया और उसने वरदान में कुछ भी मांगने को कहा. मौका मिलते ही नंदी ने भोलेनाथ गजासुर से उन्हें अपने पेट से निकालकर वापस करने को कहा. गजासुर समझ गया कि ये कोई आम लोग नहीं बल्कि साक्षात प्रभु के अवतार हैं. अपने वचन का मान रखते हुए उसने भगवान शिव को वापस कर दिया.वचन पूरा करने पर विष्णु भगवान गजासुर से प्रसन्न हुए और उसे मनचाहा वर मांगने को कहा. तब गजासुर ने कहा की वो चाहता है सभी उसके गजमुख को याद रखें और हमेशा सब इसकी पूजा करें. भगवान ने तथास्तु कहा और उसकी ये इच्छा पूरी की. उन्होंने कहा कि समय आने पर तुम्हें ऐसा ही सम्मान मिलेगा.
जब भगवान शिव ने पार्वती के बनाये पुत्र की गर्दन को अलग किया तो श्रीहरि गजासुर के शीश को ही काट कर लाए और गणपति के धड़ से जोड़कर उन्हें जीवित किया था. इस तरह वह शिवजी के प्रिय पुत्र के रूप में प्रथम आराध्य हो गया.

गणेशजी को गज का मुख लगाए जाने का रहस्य गणेश पुराण में मिलता है। इस पुराण में बताया गया है कि नारद मुनि के द्वारा जब यह प्रश्न पूछा गया कि गणेशजी को गज का ही मुख क्यों लगा तो नारायण ने इसका रहस्य बताया। नारायण ने बताया कि पाद्म कल्प में देवराज इंद्र की एक भूल की वजह से गणेशजी को गज का सिर लगाना पड़ा।
एक समय देवराज इंद्र पुष्पभद्रा नदी के तट पर टहल रहे थे। उस निर्जन वन में कोई जीव जंतु नहीं था। संयोगवश रंभा नामकी अप्सरा उस समय वन में आराम कर रही थी। देवराज इंद्र ने जब रंभा को देखा तो उनके मन में काम भाव जागृत हो गया। दोनों एक-दूसरे को आकर्षित होकर देख रहे थे। संयोगवश उस वन में दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ बैकुंठ से होकर लौट रहे थे। देवराज इंद्र ने जैसे ही दुर्वासा को देखा तो सकुचा गए और तुरंत ही प्रणाम किया। दुर्वासा ने आशीर्वाद स्वरूप भगवान विष्णु द्वारा प्राप्त पारिजात पुष्प देवराज इंद्र को दे दिया और कहा यह पुष्प जिसके मस्तक पर होगा वह तेजस्वी, परम बुद्धिमान होगा। देवी लक्ष्मी की उस पर कृपा रहेगी और वह भगवान विष्णु के समान ही पूजित होगा।
लेकिन देवराज ने पुष्प का अनादर किया और उसे हाथी के सिर पर रख दिया। ऐसा करते ही देवराज इंद्र का तेज समाप्त हो गया। अप्सरा रंभा भी इंद्र को वियोग में छोड़कर चली गई। हाथी मतवाला होकर इंद्र को छोड़कर चला गया। वन में एक हथिनी उस हाथी पर मोहित हो गई और उसके साथ रहने लगी। हाथी अपने मद में वन के प्राणियों को पीड़ित करने लगा। इस हाथी के मद को कम करने के लिए ही ईश्वरीय लीला हुई और उस हाथी का सिर काटकर गणेशजी के धड़ से लगाया गया और पारिजात पुष्‍प को प्राप्त वरदान गणेशजी को मिला।

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23.3.25

माँ गंगा की उत्पत्ति की रोचक कथा | Interesting story of the origin of Mother Ganga

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माँ गंगा की उत्पत्ति (Ganga River Story) की कहानी बहुत रोचक और प्रेरणादायी है। यह बात उस समय की है जब श्री हरि विष्णु ने देवमाता अदिति के पुत्र के रूप में अपना वामन अवतार लिया था। उस समय धरती और स्वर्ग लोग के अधिपति दैत्यराज बलि थे। वह अपने गुरु शुक्राचार्य के बताए मार्ग पर चलते हुए निरंतर चलने वाले यज्ञ करवाते थे और गरीबों एवं ब्राह्मणो को दान देते थे। उन्हें अपने दानवीर होने का अहंकार था। उनके राज्य काल में देवताओं के लिए बुरा समय चल रहा था। उनके राज्य में असुरों को उनकी सुरक्षा प्रदान थी जिस से आम जन को कष्ट भी भोगने पड़ रहे थे। तब प्रभु ने इस समस्या को हल करने हेतु वामन अवतार लिया।

वामन देव का बलि के दरबार में आगमन
बालक ब्राह्मण रुपी वामन देव दैत्यराज बलि के यज्ञ स्थान पर पहुंचे। जब बलि की नजर उन पर पड़ी तो बलि ने उनसे उनकी इच्छा पूछी। यह सुन वामन देव ने कहा “राजन! आपकी बहुत प्रशंसा सुनी है। आप दानवीर हैं, मुझे केवल उतनी भूमि चाहिए जितनी भूमि मेरे तीन पग (कदम) में नप जाये। यह सुन सभी लोग वामन देव पर हसने लगे। महाराज बलि भी अहंकार में आकर हंस पड़े। फिर हाथ जोड़ कर वामन देव से और भी कुछ मांगने का आग्रह किया परन्तु वामन देव तीन पग भूमि पर अड़े रहे। ब्राह्मण बालक से महाराज बलि ने कहा ” दान के लिए आशवस्त कर मैं पीछे नहीं हटूंगा आखिर मैं दानवीर हूँ। ऐसा तो आपने भी कहा है भगवन! मैं आपको आपकी नापी हुई तीन पग भूमि दान करने का संकल्प लेता हूँ।

वामन देव का विकराल रूप

जैसे ही राजा ने संकल्प लिया वैसे ही वामन देव ने विराट रूप धरा। लोग भयभीत होकर इधर उधर भागने लगे। वामन देव ने एक पग में धरती और दूसरे पग में आकाश को नाप दिया और फिर तीसरे पग के लिए अपने पैर उठाये और बालि की ओर देखा। तभी बलि ने हाथ जोड़ कर अपने घुटनों पर बैठ कर कहा “हे प्रभु! तीसरे पग में आप मुझे नाप लें और मुझपर भी स्वामित्व स्थापित कर ले, यह रहा मेरा मस्तक आपकी सेवा में..आप मेरे मस्तक पर पग धरें।

गंगा की उत्पत्ति

जब प्रभु आकाश को नाप रहे थे तभी उनके पैर का अंगूठा ब्रह्माण्ड में टकराया और वहीं से दिव्य जल बहने लगा, जिससे प्रभु श्री हरी के चरण कमल धुले। वो दिव्य जल की धारा जैसे ही प्रभु के चरण धो कर नीचे की ओर गिरा तभी ब्रह्मा जी ने उस जल की धारा को अपने कमण्डल में धारण कर लिया। और यही जल धारा ब्रम्हा जी की पुत्री गंगा कहलायीं। ये जल धारा श्री हरि विष्णु के पैर यानि पद से टकरा कर निकली इसलिए देवी गंगा को विष्णुपदी भी कहते हैं।

भागीरथी

महाराज भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी गंगा के पिता भगवान ब्रम्हा जी ने उन्हें धरती पे अवतरित होने की आज्ञा दी। किन्तु देवी गंगा की जल धारा के वेग को सहने की क्षमता धरती में नहीं थी इसलिए कैलाशपति प्रभु शिव ने उन्हें अपने जटाओं में धारण किया। और इसलिए देवादि देव महादेव को गंगाधर भी कहते हैं। महाराज भागीरथी की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्होंने अपनी एक जटा खोल देवी गंगा को धरती पर आने दिया। माता गंगा ने धरती पर आकर भागीरथी के पूर्वजों को मुक्ति दी और माता गंगा की सकारात्मक ऊर्जा से पूर्ण अमृत तुल्य जल धारा मनुष्यों के लिए कल्याणमयी सिद्ध हुई। माता गंगा को देवनदी भी कहतें हैं। 

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विक्रम बेताल की कहानी - अजीबोगरीब फैसला

 

राजा राजेंद्र और रानी प्रेमा की एक सुंदर बेटी थी जिसका नाम सोना था, जो धनुष-बाण और तलवार चलाने में निपुण हो गई थी। जब वह विवाह योग्य हो गई, तो राजा ने उसका विवाह करवाना चाहा, लेकिन सोना ने उस व्यक्ति से विवाह करने का निश्चय किया जो उसे धनुष-बाण और तलवार चलाने में हरा दे। कई राजकुमार उसके साथ लड़ने आए, लेकिन सोना ने उन्हें हरा दिया और उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा। उदय नाम का एक युवक सोना को दूसरों से लड़ते हुए देखता था और धीरे-धीरे सोना द्वारा अपने विरोधियों को हराने के लिए अपनाई जाने वाली तकनीकों को सीखता था। वह आगे आया और सोना को आसानी से हरा दिया। जब राजा ने उदय से उसके प्रशिक्षण के बारे में पूछा, तो उसने कहा कि उसने सोना को देखकर कौशल और तकनीक सीखी है। लेकिन सोना ने इस आदमी से शादी करने से इनकार कर दिया और उदय ने भी इसे स्वीकार कर लिया। तब बेताल ने राजा बिक्रम से पूछा कि सोना ने उदय से शादी क्यों नहीं की, हालाँकि उदय ने उसे हरा दिया था। राजा ने उत्तर दिया कि उदय ने सोना से तकनीक और रणनीति सीखी थी, इसलिए सोना उदय की शिक्षिका बन गई। संस्कृति के अनुसार एक शिक्षक अपने छात्र से विवाह नहीं कर सकता, और दोनों ने इसे स्वीकार कर लिया। नैतिक: कहानी एक सुंदर संदेश देती है: यदि आप किसी से कुछ सीखते हैं, तो आपको उन्हें अपना गुरु या शिक्षक मानना ​​चाहिए।

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21.3.25

भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की कहानी


                                         भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की कहानी का विडिओ देखें
                                           



कृष्ण और इंद्र की कहानी का परिचय


छोटे बच्चों को बहुत समय से भगवान कृष्ण द्वारा अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाने की पौराणिक कहानी सुनाई जाती रही है। कहानी की शुरुआत में बताया गया है कि कैसे वृंदावन के लोग हर साल अपनी फसलों को बारिश से आशीर्वाद देने के लिए भगवान इंद्र के लिए अनुष्ठान करते थे। एक साल, भगवान कृष्ण ने स्थानीय लोगों से बात की और "कर्म" का अर्थ सिखाया। उन्होंने लोगों को अपने कर्तव्यों का पालन करने और अपने नियंत्रण से परे चीजों के बारे में चिंता न करने की सलाह दी। उनका मानना ​​था कि उनकी बेहतरीन फसल के लिए इंद्र नहीं बल्कि गोवर्धन पर्वत जिम्मेदार है। आश्वस्त होने के बाद सभी ने इस प्रक्रिया को करने का विकल्प नहीं चुना। इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने एक शक्तिशाली तूफान भेजा, जिससे बस्ती डूब गई। श्री कृष्ण द्वारा उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाने के परिणामस्वरूप किसानों ने कई दिनों तक गोवर्धन पर्वत के पीछे शरण ली।



गोवर्धन पर्वत की कहानी

भगवान इंद्र देवताओं के राजा थे और बारिश और आंधी को नियंत्रित करते थे। वे मेरु पर्वत पर आकाश में रहते थे, जहाँ से वे अन्य सभी देवताओं पर शासन करते थे। हालाँकि, इंद्र में कई बुराइयाँ थीं। वे अपने से कमतर (कम शक्तिशाली देवता, नश्वर और राक्षस) व्यक्तियों के कार्यों से आसानी से प्रसन्न और क्रोधित हो जाते थे। वे सत्ता के नशे में इतने चूर थे कि वे भूल गए कि देवताओं के भी कर्म होते हैं। इंद्र इस बात का उदाहरण हैं कि अगर शक्ति का इस्तेमाल विनम्रता से न किया जाए तो यह मनुष्यों की तो बात ही छोड़िए देवताओं को भी नष्ट कर सकती है। वृंदावन के लोग अपने जीवनयापन के लिए कृषि और मवेशियों पर निर्भर थे। प्रचुर और समय पर बारिश उनकी आजीविका के लिए महत्वपूर्ण थी। और इसने इंद्र को वृंदावन के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण देवता बना दिया। जिन वर्षों में अच्छी बारिश होती थी, वे इंद्र की उदारता के लिए उनकी पूजा करते थे और उन्हें धन्यवाद देने के लिए एक भव्य उत्सव मनाते थे। सूखे के वर्षों में, वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए प्रसाद चढ़ाते थे और अपने द्वारा किए गए किसी भी पाप के लिए क्षमा मांगते थे।




  एक साल बारिश बहुत ज़्यादा हुई और वृंदावन में एक इंच ज़मीन भी बंजर नहीं थी। गांव वालों ने आपस में विचार-विमर्श के बाद इंद्र को धन्यवाद देने के लिए एक उत्सव मनाने का फ़ैसला किया। उत्सव के दिन, लोग सुबह जल्दी उठे, अपने घरों की सफ़ाई की और पूरे शहर को फूलों और रोशनी से सजाया। कृष्ण अपने घर में गहरी नींद में सो रहे थे, उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि वहाँ क्या-क्या तैयारियाँ चल रही थीं। जब वे जागे, तो उन्हें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि सभी गांव वाले वृंदावन की सफ़ाई और सजावट में कड़ी मेहनत कर रहे थे। वे अपने घर से बाहर निकले और उत्सव के बारे में पूछा। उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि सभी गांव वाले इंद्र को श्रद्धांजलि देने के लिए इस उत्सव की योजना बना रहे थे, क्योंकि उनका मानना ​​था कि इंद्र ही बारिश के लिए ज़िम्मेदार हैं। उन्होंने सभी गांव वालों को पुकारते हुए कहा कि यह इंद्र नहीं बल्कि पास का एक पर्वत-गिरि गोवर्धन है - जो इतनी अच्छी फ़सल के लिए ज़िम्मेदार है। उन्होंने तर्क दिया कि गांव वालों को इंद्र की बजाय गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए।
   स्वर्ग के राजा इंद्र, ब्रज के निवासियों पर बालक कृष्ण की बात सुनने और उनकी जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के कारण बहुत क्रोधित थे, और उन्होंने वृंदावन के क्षेत्र में बाढ़ लाने के लिए भयानक वर्षा वाले बादल भेजकर उन्हें दंडित करने का संकल्प लिया। इंद्र ने विनाश के समावर्तक बादलों को आदेश दिया कि वे वृंदावन पर बारिश और आंधी के साथ हमला करें, जिससे व्यापक बाढ़ आए और निवासियों की आजीविका तबाह हो जाए।
  जब भयंकर बारिश और तूफ़ान ने ज़मीन को तबाह कर दिया और उसे पानी में डुबो दिया, तो वृंदावन के डरे हुए और असहाय लोग भगवान कृष्ण से मदद के लिए पहुंचे। कृष्ण ने स्थिति को पूरी तरह से समझ लिया और अपने बाएं हाथ से पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया और उसे छतरी की तरह थाम लिया। वृंदावन के सभी निवासियों ने अपनी गायों और घर के दूसरे सामानों के साथ एक-एक करके गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण ली। वे सात दिनों तक पहाड़ी के नीचे रहे, मूसलाधार बारिश से सुरक्षित और आश्चर्यजनक रूप से भूख या प्यास से अप्रभावित। वे यह देखकर भी  चकित थे कि विशाल गोवर्धन पर्वत कृष्ण की छोटी उंगली पर पूरी तरह से संतुलित था।
  इस घटना से स्तब्ध और चकित राजा इंद्र ने विनाशकारी बादलों को बुलाया, जिससे आंधी और बारिश रुक गई। आसमान साफ ​​हो गया और वृंदावन में एक बार फिर सूरज चमक उठा। नन्हे कृष्ण ने प्यार से गोवर्धन पर्वत को उसके मूल स्थान पर लौटा दिया, जिससे निवासियों को बिना किसी डर के घर लौटने की अनुमति मिल गई। सभी आगंतुकों ने कृष्ण का खुशी से स्वागत किया और उन्हें गले लगा लिया। इस तरह राजा इंद्र का झूठा अभिमान चूर-चूर हो गया। वह हाथ जोड़कर भगवान कृष्ण के पास गया और क्षमा मांगी। भगवान के रूप में श्री कृष्ण ने इंद्र पर अपनी कृपा बरसाई और उन्हें उनकी जिम्मेदारियों के बारे में भी बताया।

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दर्जी समाज के आदि पुरुष  संत दामोदर जी महाराज की जीवनी 

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संत नामदेव जी महाराज का जीवन परिचय | Life story of sant Namdev

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   दर्जी संत नामदेव जी एक महान संत और कवि थे, जिन्होंने 13वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में रहते हुए अपना जीवन व्यतीत किया। उनका जन्म 1270 ईस्वी में हुआ था और उनका निधन 1350 ईस्वी में हुआ था।

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 उल्लेखनीय है कि  दर्जी समाज (दामोदर वंश) के आराध्य महापुरुष संत दामोदर जी महाराज का जन्म  नामदेव जी के जन्म से 97  वर्ष बाद  5अप्रैल 1367 को जूनागढ़ मे हुआ था | 
भक्त नामदेव महाराज का जन्म २६ अकटुबर १२७० (शके ११९२) में महाराष्ट्र के सतारा जिले में कृष्णा नदी के किनारे बसे नरसीबामणी नामक गाँव में एक शिंपी जिसे सुचिकार (दर्जी) भी कहते है के परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम दामाशेट और माता का नाम गोणाई देवी था। इनका परिवार भगवान विट्ठल का परम भक्त था। नामदेव का विवाह राधाबाई के साथ हुआ था और इनके पुत्र का नाम नारायण था।
  संत नामदेव ने विसोबा खेचर को गुरु के रूप में स्वीकार किया था। ये संत ज्ञानेश्वर के समकालीन थे और उम्र में उनसे ५ साल बड़े थे। संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर के साथ पूरे महाराष्ट्र का भ्रमण किए, भक्ति-गीत रचे और जनता जनार्दन को समता और प्रभु-भक्ति का पाठ पढ़ाया।


   संत ज्ञानेश्वर के परलोकगमन के बाद इन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया। इन्होंने मराठी के साथ ही साथ हिन्दी में भी रचनाएँ लिखीं। इन्होंने अठारह वर्षो तक पंजाब में भगवन्नाम का प्रचार किया। अभी भी इनकी कुछ रचनाएँ सिक्खों की धार्मिक पुस्तकों में मिलती हैं। मुखबानी नामक पुस्तक में इनकी रचनाएँ संग्रहित हैं। 
  आज भी इनके रचित गीत पूरे महाराष्ट्र में भक्ति और प्रेम के साथ गाए जाते हैं। ये संवत १४०७ में समाधि में लीन हो गए।
 सन्त नामदेव के समय में नाथ और महानुभाव पंथों का महाराष्ट्र में प्रचार था। नाथ पंथ "अलख निरंजन" की योगपरक साधना का समर्थक तथा बाह्याडंबरों का विरोधी था और महानुभाव पंथ वैदिक कर्मकांड तथा बहुदेवोपासना का विरोधी होते हुए भी मूर्तिपूजा को सर्वथा निषिद्ध नहीं मानता था। 
  इनके अतिरिक्त महाराष्ट्र में पंढरपुर के "विठोबा" की उपासना भी प्रचलित थी। सामान्य जनता प्रतिवर्ष आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी को उनके दर्शनों के लिए पंढरपुर की "वारी" (यात्रा) किया करती थी (यह प्रथा आज भी प्रचलित है), इस प्रकार की वारी (यात्रा) करनेवाले "वारकरी" कहलाते हैं। 



  विट्ठलोपासना का यह "पंथ" "वारकरी" संप्रदाय कहलाता है। नामदेव इसी संप्रदाय के प्रमुख संत माने जाते हैं।ज्ञानेश्वर और नामदेव उत्तर भारत की साथ साथ यात्रा की थी। ज्ञानेश्वर मारवाड़ में कोलदर्जी नामक स्थान तक ही नामदेव के साथ गए। वहाँ से लौटकर उन्होंने आलंदी में शके 1218 में समाधि ले ली।
    ज्ञानेश्वर के वियोग से नामदेव का मन महाराष्ट्र से उचट गया और ये पंजाब की ओर चले गए। गुरुदासपुर जिले के घोभान नामक स्थान पर आज भी नामदेव जी का मंदिर विद्यमान है। वहाँ सीमित क्षेत्र में इनका "पंथ" भी चल रहा है।
   संतों के जीवन के साथ कतिपय चमत्कारी घटनाएँ जुड़ी रहती है। नामदेव के चरित्र में भी सुल्तान की आज्ञा से इनका मृत गाय को जीवित करना , विट्ठल की मूर्ति का इनके हाथ दुग्धपान करना जैसी घटनाएँ समाविष्ट हैं। महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक विट्ठल मंदिर के महाद्वार पर शके 1272 में समाधि ले ली। कुछ विद्वान् इनका समाधिस्थान घोमान मानते हैं, परंतु बहुमत पंढरपुर के ही पक्ष में हैं।
  बिसोवा खेचर से दीक्षा लेने के पूर्व तक ये सगुणोपासक थे। पंढरपुर के विट्ठल (विठोबा) की उपासना किया करते थे। दीक्षा के उपरांत इनकी विट्ठलभक्ति सर्वव्यापक हो गई। महाराष्ट्रीय संत परंपरा के अनुसार इनकी निर्गुण भक्ति थी, जिसमें सगुण निर्गुण का काई भेदभाव नहीं था। उन्होंने मराठी में कई सौ अभंग और हिंदी में सौ के लगभग पद रचे हैं। 

 निर्गुणी कबीर के समान नामदेव में भी व्रत, तीर्थ आदि बाह्याडंबर के प्रति उपेक्षा तथा भगवन्नाम एवं सतगुरु के प्रति आदर भाव विद्यमान है। कबीर के पदों में यततत्र नामदेव की भावछाया दृष्टिगोचर होती है। कबीर के पूर्व नामदेव ने उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति का प्रचार किया, जो निर्विवाद है।

परलोक गमन

आपने दो बार तीर्थ यात्रा की व साधु संतो से भ्रम दूर करते रहे। ज्यों ज्यों आपकी आयु बढती गई, त्यों त्यों आपका यश फैलता गया। आपने दक्षिण में बहुत प्रचार किया। आपके गुरु देव ज्ञानेश्वर जी परलोक गमन कर गए तो आप भी कुछ उदासीन रहने लग गए। अन्तिम दिनों में आप पंजाब आ गए। अन्त में आप अस्सी साल की आयु में 1407 विक्रमी को परलोक गमन कर गए।
 टाँक क्षत्रिय दर्जी समाज भी अपना गुरु संत नामदेव जी को मानते हैं। 
टाँक क्षत्रिय दर्जी समाज की कुलदेवी माता शीतला हैं। माता शीतला को समाज की रक्षक और संरक्षक देवी माना जाता है। समाज के लोग माता शीतला की पूजा करते हैं और उनकी कृपा के लिए प्रार्थना करते हैं।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि टाँक क्षत्रिय दर्जी समाज की परंपराएं और मान्यताएं समय और स्थान के अनुसार भिन्न हो सकती हैं

साहित्यक देन

नामदेव जी ने जो बाणी उच्चारण की वह गुरुग्रंथ साहिब में भी मिलती है। बहुत सारी वाणी दक्षिण व महाराष्ट्र में गाई जाती है। आपकी वाणी पढ़ने से मन को शांति मिलती है व भक्ति की तरफ मन लगता है।

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कर्म में अकर्म कैसे | विश्वामित्र और वशिष्ठ की कहानी

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कर्म में अकर्म कैसे | विश्वामित्र और वशिष्ठ की कहानी

वैदिककाल की बात है । सप्त ऋषियों में से एक ऋषि हुए है महर्षि वशिष्ठ । महर्षि वशिष्ठ राजा दशरथ के कुलगुरु और श्री राम के आचार्य थे ।
 
उन दिनों महर्षि वशिष्ठ का आश्रम नदी के तट के सुरम्य वातावरण में था । महर्षि वशिष्ठ अपनी पत्नी अरुन्धती के साथ गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ – साथ योगाभ्यास और तपस्या में भी लीन रहते थे ।
 
उन्हीं दिनों राजा विश्वामित्र जो अब राजपाट अपने पुत्र के हवाले कर घोर तपस्या में संलग्न थे । महर्षि विश्वामित्र का आश्रम भी थोड़ी ही दूर नदी के दूसरी ओर स्थित था ।
 
असल में बात यह थी कि महर्षि वशिष्ठ द्वारा नन्दनी गाय नहीं दिए जाने के कारण राजा विश्वामित्र उसे छिनकर ले जाना चाहते थे । तब नन्दनी गाय ने महर्षि वशिष्ठ की अनुमति से विश्वामित्र की सम्पूर्ण सेना को धराशायी कर दिया था । अतः महर्षि वशिष्ठ से अपनी हार का बदला लेने के लिए विश्वामित्र घोर तपस्या कर रहे थे ।
 
महर्षि वशिष्ठ एकाकी जीवन की कठिनाइयों से भलीभांति परिचित थे । अतः उन्होंने महर्षि विश्वामित्र के भोजन की व्यवस्था अपने ही आश्रम में कर रखी थी । विश्वामित्र भी भली प्रकार जानते थे कि महर्षि वशिष्ठ की पत्नी बहुत ही सुसंस्कारी है । अतः उनके हाथों से बना भोजन उनकी साधना में कोई अड़चन पैदा नहीं करेगा ।
 
हमेशा की तरह एक दिन अरुन्धती महर्षि विश्वामित्र का भोजन लेकर निकली । वर्षाकाल का समय था । पानी इतना गिरा कि नदी से निकलना मुश्किल हो गया । मार्ग की कठिनाई से व्यथित होकर उन्होंने यह समस्या महर्षि वशिष्ठ को बताई ।
 
महर्षि वशिष्ठ बोले – “ हे देवी ! तुम संकल्प पूर्वक नदी से यह निवेदन करो कि यदि तुम एक निराहारी ऋषि की सेवा में भोजन ले जा रही हो तो वह तुम्हें मार्ग प्रदान करें ” इतना सुनकर अरुन्धती चल पड़ी । महर्षि के कहे अनुसार उन्होंने नदी से विनती की और नदी ने उन्हें रास्ता प्रदान किया । अरुन्धती ने ख़ुशी – ख़ुशी विश्वामित्र तक भोजन पहुंचा दिया ।
 
भोजन देने के बाद जब वह वापस लौटने लगी तब भी नदी का उफ़ान जोरों – शोरों पर था । व्यथित होकर वह वापस आकर आश्रम में बैठ गई । तब महर्षि ने वापस लौटने का कारण पूछा तो वह बोली – “ ऋषिवर ! नदी का उफान रुकने का नाम ही नहीं ले रहा । लगता है आज यही रुकना पड़ेगा ।”
 
इसपर महर्षि विश्वामित्र बोले – “हे देवी ! इसमें रुकने की कोई आवश्यकता नहीं । आप जाइये और संकल्प पूर्वक नदी से विनती कीजिये कि यदि मैं आजीवन ब्रह्मचारी महर्षि की सेवा में जा रही हूँ तो मुझे रास्ता प्रदान करें ।”
 
महर्षि के कहे अनुसार अरुन्धती ने विनती की और नदी ने रास्ता दे दिया । वह पूर्ववत अपने स्वामी के पास लौट गई ।
 
जब घर आकर उन्होंने से प्रार्थना के साथ किये गये संकल्पों पर विचार किया तो उनका माथा ठनका । उन्हें आश्चर्य हुआ कि “यदि मैं महर्षि विश्वामित्र को प्रतिदिन भोजन देकर आती हूँ तो फिर वह निराहारी कैसे हुए ? और जबकि मैं अपने पति के कई पुत्रों की माँ बन चुकी हूँ तो फिर ये ब्रह्मचारी कैसे ? वो भी आजीवन ?” अरुन्धती बहुत सोचने पर भी इस रहस्य को समझ नहीं पाई । अतः वह दोनों प्रश्न लेकर अपने पति महर्षि वशिष्ठ के पास गई और पूछने लगी ।
 
तब महर्षि वशिष्ठ बोले – “ हे देवी ! तुमने बड़ी ही सुन्दर जिज्ञासा व्यक्त की है । जिस तरह निष्काम भाव से किया गया कर्म मनुष्य को कर्मफल में नहीं बांधता । जिस तरह जल में खिलकर भी कमल सदा उससे दूर रहता है । उसी तरह जो तपस्वी केवल जीवन रक्षा के लिए भोजन ग्रहण करता है वह सदा ही निराहारी है और जो गृहस्थ लोक कल्याण के उद्देश्य से केवल पुत्र प्राप्ति के लिए निष्काम भाव से अपनी पत्नी से सम्बन्ध स्थापित करता है, वह आजीवन ब्रह्मचारी ही है ।
 
अब अरुन्धती की शंका का समाधान हो चूका था ।
 
इस दृष्टान्त से हमें यह सीख मिलती है कि असल में कोई कर्म बुरा नहीं है बल्कि उस कर्म के प्रति आसक्ति बुरी है । जहाँ आसक्ति है वहाँ दुःख होगा और जहाँ दुःख है वहाँ बंधन निश्चित है ।

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