21.7.17

हिन्दू धर्म में हवन पूजा का उद्धेश्य और महत्व //The importance and significance of havan puja in Hinduism


हवन अथवा यज्ञ भारतीय परंपरा अथवा हिंदू धर्म में शुद्धीकरण का एक कर्मकांड है। कुण्ड में अग्नि के माध्यम से देवता के निकट हवि पहुँचाने की प्रक्रिया को यज्ञ कहते हैं। हवि, हव्य अथवा हविष्य वह पदार्थ हैं जिनकी अग्नि में आहुति दी जाती है (जो अग्नि में डाले जाते हैं).हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित करने के पश्चात इस पवित्र अग्नि में फल, शहद, घी, काष्ठ इत्यादि पदार्थों की आहुति प्रमुख होती है। ऐसा माना जाता है कि यदि आपके आस पास किसी बुरी आत्मा इत्यादि का प्रभाव है तो हवन प्रक्रिया इससे आपको मुक्ति दिलाती है। शुभकामना, स्वास्थ्य एवं समृद्धि इत्यादि के लिए भी हवन किया जाता है।

स्वास्थ्य के लिए हवन का महत्त्व:-
प्रत्येक ऋतु में आकाश में भिन्न-भिन्न प्रकार के वायुमण्डल रहते हैं। सर्दी, गर्मी, नमी, वायु का भारीपन, हलकापन, धूल, धुँआ, बर्फ आदि का भरा होना। विभिन्न प्रकार के कीटणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है। इसलिए कई बार वायुमण्डल स्वास्थ्यकर होता है। कई बार अस्वास्थ्यकर हो जाता है। इस प्रकार की विकृतियों को दूर करने और अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं, जो इस उद्देश्य को भली प्रकार पूरा कर सकती हैं।
हवन एक ऐसी विधा है जिसके नियमित करने से मनवांछित फल प्राप्त होता है तथा अपने विरोधी का नुकसान व अपनी शक्ति ज्यादा बढ़ा देता है इसलिए तामसी प्रवृत्ति वाले तांत्रिक भी इसका भरपुर उपयोग करते है। गायत्री परिवार वाले भी विधि-विधान से हवन करते है जिससे वाणी में सत्यता तथा विश्व बन्धुत्व की भावना बढ़ती है। नियमित हवन करने वालो पर किसी भी प्रकार के बुरी तरंगो का कुप्रभाव नही पड़ता हैं। जानकार की निगरानी में हवन करने से मनवांछित फल प्राप्त होता हैं।

हवन करने की विधी: हवन कुण्ड षुदध होना चाहिए तथा आहुति देने वाला व्यक्ति सन कर ढंग से बैठकर आहूति दें
हवन का उद्देश्य:-
हवन शुभ ऊर्जा के जागरण में निर्देशित प्रक्रिया है और हमारे आसपास की नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति दिलाती है हवन के दौरान बोले जाने वाले पवित्र मंत्र एक विशेष कंपन पैदा करते है जो बुरी ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में परिवार्तित करते है।
। सिर पर पगडी तथा धोती व सफेद कपडे पहने हुए होने चाहिऐ। नीले रंग का कोई भी कपडा पहना हुआं नहीं
होना चाहीए। फिर षुध्द सात्विक भावसे श्रध्दापुर्वक ओ3म स्वाहा के साथ आहुति देनी चाहिए। पहले वैदिक मंत्र फिर गोत्राचार बोलकर भी जम्भेष्वर भगवान के षब्दो से हन करें । तो विषेष फलदायक हैं।
जानिए हवन के विभिन्न प्रकार:-
मृत्युंजय हवन जो लंबे जीवन और जीवन की विकट स्थिति के लिए होता है,
दुर्गा हवन नकारात्मक ताकतों के लिए,
चंडी हवन सभी क्षेत्रों में जीत के लिए,
गायत्री हवन सकारात्मक सोच की सुविधा के लिए।
गणपति हवन बाधाओं को दूर करने के लिए
लक्ष्मी हवन धन और समृद्धि के लिए
कृत्या परिहरना हवन काला जादू के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए।
रुद्र हवन नकारात्मक प्रभावों से छुटकारा पाने के लिए।
वास्तु हवन इमारतों और घरों में अच्छी ऊर्जा के लिए
विद्या हवन सीखने की सुविधा के लिएजानिए, अलग-अलग रोग और पीड़ाओं से मुक्ति के लिए कौन-सीहवन सामग्रियां बहुत प्रभावी होती हैं-
1. दूध में डूबे आम के पत्ते - बुखार
2. शहद और घी - मधुमेह
3. ढाक के पत्ते - आंखों की बीमारी
4. खड़ी मसूर, घी, शहद, शक्कर - मुख रोग
5. कन्दमूल या कोई भी फल - गर्भाशय या गर्भ शिशु दोष
6. भाँग,धतुरा - मनोरोग
7. गूलर, आँवला - शरीर में दर्द
8. घी लगी दूब या दूर्वा - कोई भयंकर रोग या असाध्य बीमारी
9. बेल या कोई फल - उदर यानी पेट की बीमारियां
10. बेलगिरि, आँवला, सरसों, तिल - किसी भी तरह का रोग शांति
11. घी - लंबी आयु के लिए
12. घी लगी आक की लकडी और पत्ते - शरीर की रक्षा और
स्वास्थ्य के लिए।

हिन्दू धर्म के १० रोचक तथ्य10 :Interesting Facts About Hinduism




हिन्दू धर्म विश्व के सबसे प्राचीनतम धर्मों में से एक है इसमें कोई दो राय नहीं, पर इस धर्म में कई ऐसी चीज़ें है जो इसे बाकी धर्मों की तुलना से भिन्न तो बनाती ही हैं साथ में
एक ऐसा आधार भी देती हैं जो इसे मानने वालों को गर्व भी प्रदान करती हैं.

इस धर्म के संथापक का ही पता नहीं

हिन्दू धर्म का संस्थापक कौन हैं इसके बारे में कोई साक्ष्य ही नहीं है, पर इसके प्रचार-प्रसार में काफ़ी सारे ऋषि-मुनियों और लोगों ने भूमिका निभाई है जिनका जिक्र हिन्दू धर्म की कई पुस्तकों में मिलता हैं.ऐसा आधार भी देती हैं जो इसे मानने वालों को गर्व भी प्रदान करती है|

कोई एक धर्म शास्त्र नहीं

हिन्दू धर्म का कोई एक धर्मशास्त्र नहीं है बल्कि बहुत सारी किताबें मिलाकर इसे एक धार्मिक आधार  प्रदान करती है|

.विश्व का तीसरा सबसे बड़ा धर्म

क्रिश्चियनिटी और इस्लाम के बाद हिन्दू धर्म विश्व का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है और 90% हिन्दू, हिंदुस्तान में ही रहते है|

ऋग्वेद का प्रसार कई वर्षो तक केवल मौखिक रूप में ही होता रहा था

ऋग्वेद का इतिहास लगभग 3800 साल पुराना है जबकि 3500 साल तक इसे केवल मौखिक रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जाता रहा था.
 
मंदिर जाने के लिए कोई एक समय निर्धारित नहीं है

हिन्दू धर्म की एक खास बात यह है कि यहां पर ऊपर वाले को याद करने के लिए कोई एक खास दिन या समय नहीं होता. जब भी आपका दिल करे आप प्राथना के लिए मंदिर जा सकते हैं.

.108 एक पवित्र नंबर है

हिन्दू धर्म में 108 को पवित्र माना जाता है, तभी तो मालाओं में 108 मोती होते हैं 

सभी त्यौहार ख़ास होते हैं

हिन्दू धर्म में सभी त्यौहारों को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. यहां शोक के लिए कोई स्थान नहीं |

नास्तिकता को भी स्वीकार करता है

यह इकलौता ऐसा धर्म है जो नास्तिकों को भी स्वीकृति देता है.

औरत और मर्द दोनों समान है

हिन्दू धर्म शायद इकलौता ऐसा धर्म है जिसमें देवी-देवताओं की संख्या समान है और दोनों को एक ही श्रद्धा के साथ पूजा जाता हैं.

Juggernaut शब्द जगन्नाथ से लिया गया है

Juggernaut जिसका मतलब विशाल रथ से होता है, देवता जगन्नाथ से ही लिया गया है.









आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध // Spirit and God Relationship




 

आत्मा - परमात्मा का ही अंश है। जिस प्रकार जल की धारा किसी पत्थर से टकराकर छोटे छींटों के रूप में बदल जाती है, उसी प्रकार परमात्मा की महान सत्ता अपने क्रीड़ा विनोद के लिए अनेक भागों में विभक्त होकर अगणित जीवों के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं। सृष्टि सञ्चालन का क्रीड़ा कौतुक करने के लिए परमात्मा ने इस संसार की रचना की। वह अकेला था। अकेला रहना उसे अच्छा न लगा, सोचा एक से बहुत हो जाऊँ। उसकी यह इच्छा ही फलवती होकर प्रकृति के रूप में परिणित हो गई। इच्छा की शक्ति - महान है। आकाँक्षा अपने अनुरूप परिस्थितियाँ तथा वस्तुयें एकत्रित कर ही लेती है। विचार ही कार्य रूप में परिणित होते हैं और उन कार्यों की साक्षी देने के लिए पदार्थ सामने आ खड़े होते हैं। परमात्मा की एक से बहुत होने की इच्छा ने ही अपना विस्तार किया तो यह सारी वसुधा बन कर तैयार हो गई।



वीर्य की मात्रा बढ़ाने और गाढ़ा करने के उपाय

परमात्मा ने अपने आपको बखेरने का झंझट भरा कार्य इसलिए किया कि बिखरे हुए कणों को फिर एकत्रित होते समय असाधारण आनन्द प्राप्त होता रहे। बिछुड़ने में जो कष्ट है उसकी पूर्ति मिलन के आनन्द से हो जाती है। परमात्मा ने अपने टुकड़ों को - अंश, जीवों को बिखेरने का विछोह कार्य इसलिए किया कि वे जीव परस्पर एकता, प्रेम, सद्भाव, संगठन, सहयोग का जितना - जितना प्रयत्न करें उतने आनन्दमग्न होते रहें। प्रेम और आत्मीयता से बढ़कर उल्लास शक्ति का स्रोत और कहीं नहीं है। अनेक प्रकार के बल इस संसार में मौजूद हैं पर प्राणियों की एकता के द्वारा जो शक्ति उत्पन्न होती है उसकी तुलना और किसी से भी नहीं की जा सकती। पति-पत्नी, भाई - भाई, मित्र - मित्र, गुरु- शिष्य, आदि की आत्मीयता जब उच्च स्तर तक पहुंचती है तो उस मिलन का आनन्द और उत्साहवर्धक प्रतिफल इतना सुन्दर होता है कि प्राणी अपने को कृत्य - कृत्य मानता है।
कबीर का एक दोहा प्रसिद्ध है --


भक्त के वश में भगवान को बताया गया है। इन मान्यताओं का कारण एक ही है कि प्रेम की हिलोरें जिस अन्तरात्मा में उठ रही होंगी उसका स्तर साधारण न रहेगा। जिसमें दिव्य गुण, दिव्य स्वभाव का आविर्भाव होगा, वह दिव्य कर्म ही कर सकेगा। ऐसे ही व्यक्तियों को देवता कहकर पुकारा जाता है। जहाँ देवता रहेंगे वहाँ स्वर्ग तो अपने आप ही होगा।







पुनर्जन्म सम्बंधित प्रश्नों के समाधान // Solutions for rebirth related questions




पुनर्जन्म क्या है, और क्यों होता है?

प्रश्न: पुनर्जन्म किसको कहते हैं?
उत्तर: जब जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके किसी दूसरे शरीर में जाती है तो इस बार बार जन्म लेने की क्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं ।
प्रश्न: पुनर्जन्म क्यों होता है?
उत्तर: जब एक जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के फल अधुरे रह जाते हैं तो उनको भोगने के लिए दूसरे जन्म आवश्यक हैं ।
प्रश्न: अच्छे बुरे कर्मों का फल एक ही जन्म में क्यों नहीं मिल जाता? एक में ही सब निपट जाये तो कितना अच्छा हो?
उत्तर: नहीं जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं ।
प्रश्न: पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है?
उत्तर: पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन और मृत्यु को समझना आवश्यक है । और जीवन मृत्यु को समझने के लिए शरीर को समझना आवश्यक है ।
प्रश्न: शरीर के बारे में समझाएँ?
उत्तर: हमारे शरीर को निर्माण प्रकृति से हुआ है ।
जिसमें मूल प्रकृति ( सत्व रजस और तमस ) से प्रथम बुद्धि तत्व का निर्माण हुआ है ।
बुद्धि से अहंकार ( बुद्धि का आभामण्डल ) ।
अहंकार से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ( चक्षु, जिह्वा, नासिका, त्वचा, श्रोत्र ), मन ।
पांच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) ।
शरीर की रचना को दो भागों में बाँटा जाता है ( सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर ) ।
प्रश्न: सूक्ष्म शरीर किसको बोलते हैं?
उत्तर: सूक्ष्म शरीर में बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ । ये सूक्ष्म शरीर आत्मा को सृष्टि के आरम्भ में जो मिलता है वही एक ही सूक्ष्म शरीर सृष्टि के अंत तक उस आत्मा के साथ पूरे एक सृष्टि काल ( ४३२००००००० वर्ष ) तक चलता है । और यदि बीच में ही किसी जन्म में कहीं आत्मा का मोक्ष हो जाए तो ये सूक्ष्म शरीर भी प्रकृति में वहीं लीन हो जायेगा ।
प्रश्न: स्थूल शरीर किसको कहते हैं?
उत्तर: पंच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) , ये समस्त पंचभौतिक बाहरी शरीर ।
प्रश्न: जन्म क्या होता है?
उत्तर: जीवात्मा का अपने करणों ( सूक्ष्म शरीर ) के साथ किसी पंचभौतिक शरीर में आ जाना ही जन्म कहलाता है ।
प्रश्न: मृत्यु क्या होती है?
उत्तर: जब जीवात्मा का अपने पंचभौतिक स्थूल शरीर से वियोग हो जाता है, तो उसे ही मृत्यु कहा जाता है । परन्तु मृत्यु केवल सथूल शरीर की होती है , सूक्ष्म शरीर की नहीं । सूक्ष्म शरीर भी छूट गया तो वह मोक्ष कहलाएगा मृत्यु नहीं । मृत्यु केवल शरीर बदलने की प्रक्रिया है, जैसे मनुष्य कपड़े बदलता है । वैसे ही आत्मा शरीर भी बदलता है ।
: मृत्यु होती ही क्यों है?
उत्तर: जैसे किसी एक वस्तु का निरन्तर प्रयोग करते रहने से उस वस्तु का सामर्थ्य घट जाता है, और उस वस्तु को बदलना आवश्यक हो जाता है, ठीक वैसे ही एक शरीर का सामर्थ्य भी घट जाता है और इन्द्रियाँ निर्बल हो जाती हैं । जिस कारण उस शरीर को बदलने की प्रक्रिया का नाम ही मृत्यु है ।
प्रश्न: मृत्यु न होती तो क्या होता?
उत्तर: तो बहुत अव्यवस्था होती । पृथ्वी की जनसंख्या बहुत बढ़ जाती । और यहाँ पैर धरने का भी स्थान न होता ।
प्रश्न: क्या मृत्यु होना बुरी बात है?
उत्तर: नहीं, मृत्यु होना कोई बुरी बात नहीं ये तो एक प्रक्रिया है शरीर परिवर्तन की ।
प्रश्न: यदि मृत्यु होना बुरी बात नहीं है तो लोग इससे इतना डरते क्यों हैं?
उत्तर: क्योंकि उनको मृत्यु के वैज्ञानिक स्वरूप की जानकारी नहीं है । वे अज्ञानी हैं । वे समझते हैं कि मृत्यु के समय बहुत कष्ट होता है । उन्होंने वेद, उपनिषद, या दर्शन को कभी पढ़ा नहीं वे ही अंधकार में पड़ते हैं और मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं ।
प्रश्न: तो मृत्यु के समय कैसा लगता है? थोड़ा सा तो बतायें?
उत्तर: जब आप बिस्तर में लेटे लेटे नींद में जाने लगते हैं तो आपको कैसा लगता है?? ठीक वैसा ही मृत्यु की अवस्था में जाने में लगता है उसके बाद कुछ अनुभव नहीं होता । जब आपकी मृत्यु किसी हादसे से होती है तो उस समय आमको मूर्छा आने लगती है, आप ज्ञान शून्य होने लगते हैं जिससे की आपको कोई पीड़ा न हो । तो यही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है कि मृत्यु के समय मनुष्य ज्ञान शून्य होने लगता है और सुषुुप्तावस्था में जाने लगता है ।
प्रश्न: मृत्यु के डर को दूर करने के लिए क्या करें?
उत्तर: जब आप वैदिक आर्ष ग्रन्थ ( उपनिषद, दर्शन आदि ) का गम्भीरता से अध्ययन करके जीवन,मृत्यु, शरीर, आदि के विज्ञान को जानेंगे तो आपके अन्दर का, मृत्यु के प्रति भय मिटता चला जायेगा और दूसरा ये की योग मार्ग पर चलें तो स्वंय ही आपका अज्ञान कमतर होता जायेगा और मृत्यु भय दूर हो जायेगा । आप निडर हो जायेंगे । जैसे हमारे बलिदानियों की गाथायें आपने सुनी होंगी जो राष्ट्र की रक्षा के लिये बलिदान हो गये । तो आपको क्या लगता है कि क्या वो ऐसे ही एक दिन में बलिदान देने को तैय्यार हो गये थे? नहीं उन्होने भी योगदर्शन, गीता, साँख्य, उपनिषद, वेद आदि पढ़कर ही निर्भयता को प्राप्त किया था । योग मार्ग को जीया था, अज्ञानता का नाश किया था । महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन भीष्म, द्रोणादिकों की मृत्यु के भय से युद्ध की मंशा को त्याग बैठा था तो योगेश्वर कृष्ण ने भी तो अर्जुन को इसी सांख्य, योग, निष्काम कर्मों के सिद्धान्त के माध्यम से जीवन मृत्यु का ही तो रहस्य समझाया था और यह बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है ही तो उसी शरीर विज्ञान को जानकर ही अर्जुन भयमुक्त हुआ । तो इसी कारण तो वेदादि ग्रन्थों का स्वाध्याय करने वाल मनुष्य ही राष्ट्र के लिए अपना शीश कटा सकता है, वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता , प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को आलिंगन करता है ।
प्रश्न: किन किन कारणों से पुनर्जन्म होता है?
उत्तर: आत्मा का स्वभाव है कर्म करना, किसी भी क्षण आत्मा कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता । वे कर्म अच्छे करे या फिर बुरे, ये उसपर निर्भर है, पर कर्म करेगा अवश्य । तो ये कर्मों के कारण ही आत्मा का पुनर्जन्म होता है । पुनर्जन्म के लिए आत्मा सर्वथा ईश्वराधीन है ।
प्रश्न: पुनर्जन्म कब कब नहीं होता?
उत्तर: जब आत्मा का मोक्ष हो जाता है तब पुनर्जन्म नहीं होता है ।
प्रश्न: मोक्ष होने पर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता?
उत्तर: क्योंकि मोक्ष होने पर स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में लीन हो ही जाता है, पर सूक्ष्म शरीर जो आत्मा के सबसे निकट होता है, वह भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाता है ।
प्रश्न: मोक्ष के बाद क्या कभी भी आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता?
उत्तर: मोक्ष की अवधि तक आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता । उसके बाद होता है ।
प्रश्न: लेकिन मोक्ष तो सदा के लिए होता है, तो फिर मोक्ष की एक निश्चित अवधि कैसे हो सकती है?

उत्तर: सीमित कर्मों का कभी असीमित फल नहीं होता । यौगिक दिव्य कर्मों का फल हमें ईश्वरीय आनन्द के रूप में मिलता है, और जब ये मोक्ष की अवधि समाप्त होती है तो दुबारा से ये आत्मा शरीर धारण करती है ।
प्रश्न: मोक्ष की अवधि कब तक होती है?
उत्तर: मोक्ष का समय ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्ष है, जब तक आत्मा मुक्त अवस्था में रहती है ।
प्रश्न: मोक्ष की अवस्था में स्थूल शरीर या सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ रहता है या नहीं?
उत्तर: नहीं मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाता रहता है और ईश्वर के आनन्द में रहता है, बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे कि मछली पूरे समुद्र में रहती है । और जीव को किसी भी शरीर की आवश्यक्ता ही नहीं होती।
प्रश्न: मोक्ष के बाद आत्मा को शरीर कैसे प्राप्त होता है?
उत्तर: सबसे पहला तो आत्मा को कल्प के आरम्भ ( सृष्टि आरम्भ ) में सूक्ष्म शरीर मिलता है फिर ईश्वरीय मार्ग और औषधियों की सहायता से प्रथम रूप में अमैथुनी जीव शरीर मिलता है, वो शरीर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य या विद्वान का होता है जो कि मोक्ष रूपी पुण्य को भोगने के बाद आत्मा को मिला है । जैसे इस वाली सृष्टि के आरम्भ में चारों ऋषि विद्वान ( वायु , आदित्य, अग्नि , अंगिरा ) को मिला जिनको वेद के ज्ञान से ईश्वर ने अलंकारित किया । क्योंकि ये ही वो पुण्य आत्मायें थीं जो मोक्ष की अवधि पूरी करके आई थीं ।
प्रश्न: मोक्ष की अवधि पूरी करके आत्मा को मनुष्य शरीर ही मिलता है या जानवर का?
उत्तर: मनुष्य शरीर ही मिलता है ।
प्रश्न: क्यों केवल मनुष्य का ही शरीर क्यों मिलता है? जानवर का क्यों नहीं?
उत्तर: क्योंकि मोक्ष को भोगने के बाद पुण्य कर्मों को तो भोग लिया , और इस मोक्ष की अवधि में पाप कोई किया ही नहीं तो फिर जानवर बनना सम्भव ही नहीं , तो रहा केवल मनुष्य जन्म जो कि कर्म शून्य आत्मा को मिल जाता है ।
प्रश्न: मोक्ष होने से पुनर्जन्म क्यों बन्द हो जाता है?
उत्तर: क्योंकि योगाभ्यास आदि साधनों से जितने भी पूर्व कर्म होते हैं ( अच्छे या बुरे ) वे सब कट जाते हैं । तो ये कर्म ही तो पुनर्जन्म का कारण हैं, कर्म ही न रहे तो पुनर्जन्म क्यों होगा??
प्रश्न: पुनर्जन्म से छूटने का उपाय क्या है?
उत्तर: पुनर्जन्म से छूटने का उपाय है योग मार्ग से मुक्ति या मोक्ष का प्राप्त करना ।
प्रश्न: पुनर्जन्म में शरीर किस आधार पर मिलता है?
उत्तर: जिस प्रकार के कर्म आपने एक जन्म में किए हैं उन कर्मों के आधार पर ही आपको पुनर्जन्म में शरीर मिलेगा ।
प्रश्न: कर्म कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर: मुख्य रूप से कर्मों को तीन भागों में बाँटा गया है: सात्विक कर्म , राजसिक कर्म , तामसिक कर्म ।
(१) सात्विक कर्म: सत्यभाषण, विद्याध्ययन, परोपकार, दान, दया, सेवा आदि ।
(२) राजसिक कर्म: मिथ्याभाषण, क्रीडा, स्वाद लोलुपता, स्त्रीआकर्षण, चलचित्र आदि ।
(३) तामसिक कर्म: चोरी, जारी, जूआ, ठग्गी, लूट मार, अधिकार हनन आदि ।
और जो कर्म इन तीनों से बाहर हैं वे दिव्य कर्म कलाते हैं, जो कि ऋषियों और योगियों द्वारा किए जाते हैं । इसी कारण उनको हम तीनों गुणों से परे मानते हैं । जो कि ईश्वर के निकट होते हैं और दिव्य कर्म ही करते हैं ।
प्रश्न: किस प्रकार के कर्म करने से मनुष्य योनि प्राप्त होती है?
उत्तर: सात्विक और राजसिक कर्मों के मिलेजुले प्रभाव से मानव देह मिलती है , यदि सात्विक कर्म बहुत कम है और राजसिक अधिक तो मानव शरीर तो प्राप्त होगा परन्तु किसी नीच कुल में , यदि सात्विक गुणों का अनुपात बढ़ता जाएगा तो मानव कुल उच्च ही होता जायेगा । जिसने अत्यधिक सात्विक कर्म किए होंगे वो विद्वान मनुष्य के घर ही जन्म लेगा ।
प्रश्न: किस प्रकार के कर्म करने से आत्मा जीव जन्तुओं के शरीर को प्राप्त होता है?
उत्तर: तामसिक और राजसिक कर्मों के फलरूप जानवर शरीर आत्मा को मिलता है । जितना तामसिक कर्म अधिक किए होंगे उतनी ही नीच योनि उस आत्मा को प्राप्त होती चली जाती है । जैसे लड़ाई स्वभाव वाले , माँस खाने वाले को कुत्ता, गीदड़, सिंह, सियार आदि का शरीर मिल सकता है , और घोर तामसिक कर्म किए हुए को साँप, नेवला, बिच्छू, कीड़ा, काकरोच, छिपकली आदि । तो ऐसे ही कर्मों से नीच शरीर मिलते हैं और ये जानवरों के शरीर आत्मा की भोग योनियाँ हैं ।
प्रश्न: तो क्या हमें यह पता लग सकता है कि हम पिछले जन्म में क्या थे? या आगे क्या होंगे?
उत्तर: नहीं कभी नहीं, सामान्य मनुष्य को यह पता नहीं लग सकता । क्योंकि यह केवल ईश्वर का ही अधिकार है कि हमें हमारे कर्मों के आधार पर शरीर दे । वही सब जानता है ।
प्रश्न: तो फिर यह किसको पता चल सकता है?
उत्तर: केवल एक सिद्ध योगी ही यह जान सकता है , योगाभ्यास से उसकी बुद्धि । अत्यन्त तीव्र हो चुकी होती है कि वह ब्रह्माण्ड एवं प्रकृति के महत्वपूर्ण रहस्य़ अपनी योगज शक्ति से जान सकता है । उस योगी को बाह्य इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती है
वह अन्तः मन और बुद्धि से सब जान लेता है । उसके सामने भूत और भविष्य दोनों सामने आ खड़े होते हैं ।
प्रश्न: यह बतायें की योगी यह सब कैसे जान लेता है?
उत्तर: अभी यह लेख पुनर्जन्म पर है, यहीं से प्रश्न उत्तर का ये क्रम चला देंगे तो लेख का बहुत ही विस्तार हो जायेगा । इसीलिये हम अगले लेख में यह विषय विस्तार से समझायेंगे कि योगी कैसे अपनी विकसित शक्तियों से सब कुछ जान लेता है? और वे शक्तियाँ कौन सी हैं? कैसे प्राप्त होती हैं? इसके लिए अगले लेख की प्रतीक्षा करें ।
प्रश्न: क्या पुनर्जन्म के कोई प्रमाण हैं?
उत्तर: हाँ हैं, जब किसी छोटे बच्चे को देखो तो वह अपनी माता के स्तन से सीधा ही दूध पीने लगता है जो कि उसको बिना सिखाए आ जाता है क्योंकि ये उसका अनुभव पिछले जन्म में दूध पीने का रहा है, वर्ना बिना किसी कारण के ऐसा हो नहीं सकता । दूसरा यह कि कभी आप उसको कमरे में अकेला लेटा दो तो वो कभी कभी हँसता भी है , ये सब पुराने शरीर की बातों को याद करके वो हँसता है पर जैसे जैसे वो बड़ा होने लगता है तो धीरे धीरे सब भूल जाता है ।

प्रश्न: क्या इस पुनर्जन्म को सिद्ध करने के लिए कोई उदाहरण हैं?
उत्तर: हाँ, जैसे अनेकों समाचार पत्रों में, या TV में भी आप सुनते हैं कि एक छोटा सा बालक अपने पिछले जन्म की घटनाओं को याद रखे हुए है, और सारी बातें बताता है जहाँ जिस गाँव में वो पैदा हुआ, जहाँ उसका घर था, जहाँ पर वो मरा था । और इस जन्म में वह अपने उस गाँव में कभी गया तक नहीं था लेकिन फिर भी अपने उस गाँव की सारी बातें याद रखे हुए है , किसी ने उसको कुछ बताया नहीं, सिखाया नहीं, दूर दूर तक उसका उस गाँव से इस जन्म में कोई नाता नहीं है । फिर भी उसकी गुप्त बुद्धि जो कि सूक्ष्म शरीर का भाग है वह घटनाएँ संजोए हुए है जाग्रत हो गई और बालक पुराने जन्म की बातें बताने लग पड़ा ।
प्रश्न: लेकिन ये सब मनघड़ंत बातें हैं, हम विज्ञान के युग में इसको नहीं मान सकते क्योंकि वैज्ञानिक रूप से ये बातें बेकार सिद्ध होती हैं, क्या कोई तार्किक और वैज्ञानिक आधार है इन बातों को सिद्ध करने का?
उत्तर: आपको किसने कहा कि हम विज्ञान के विरुद्ध इस पुनर्जन्म के सिद्धान्त का दावा करेंगे । ये वैज्ञानिक रूप से सत्य है , और आपको ये हम अभी सिद्ध करके दिखाते हैं ।
प्रश्न: तो सिद्ध कीजीए ?
उत्तर: जैसा कि आपको पहले बताया गया है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, पर सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ वैसे ही आगे चलता है , तो हर जन्म के कर्मों के संस्कार उस बुद्धि में समाहित होते रहते हैं । और कभी किसी जन्म में वो कर्म अपनी वैसी ही परिस्थिती पाने के बाद जाग्रत हो जाते हैं ।
इसे उदहारण से समझें :- एक बार एक छोटा सा ६ वर्ष का बालक था, यह घटना हरियाणा के सिरसा के एक गाँव की है । जिसमें उसके माता पिता उसे एक स्कूल में घुमाने लेकर गये जिसमें उसका दाखिला करवाना था और वो बच्चा केवल हरियाणवी या हिन्दी भाषा ही जानता था कोई तीसरी भाषा वो समझ तक नहीं सकता था । लेकिन हुआ कुछ यूँ था कि उसे स्कूल की Chemistry Lab में ले जाया गया और वहाँ जाते ही उस बच्चे का मूँह लाल हो गया !! चेहरे के हावभाव बदल गये !! और उसने एकदम फर्राटेदार French भाषा बोलनी शुरू कर दी !! उसके माता पिता बहुत डर गये और घबरा गये , तुरंत ही बच्चे को अस्पताल ले जाया गया । जहाँ पर उसकी बातें सुनकर डाकटर ने एक दुभाषिये का प्रबन्ध किया । जो कि French और हिन्दी जानता था , तो उस दुभाषिए ने सारा वृतान्त उस बालक से पूछा तो उस बालक ने बताया कि " मेरा नाम Simon Glaskey है और मैं French Chemist हूँ । मेरी मौत मेरी प्रयोगशाला में एक हादसे के कारण ( Lab. ) में हुई थी । "
तो यहाँ देखने की बात यह है कि इस जन्म में उसे पुरानी घटना के अनुकूल मिलती जुलती परिस्थिति से अपना वह सब याद आया जो कि उसकी गुप्त बुद्धि में दबा हुआ था । यानि की वही पुराने जन्म में उसके साथ जो प्रयोगशाला में हुआ, वैसी ही प्रयोगशाला उस दूसरे जन्म में देखने पर उसे सब याद आया । तो ऐसे ही बहुत सी उदहारणों से आप पुनर्जन्म को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर सकते हो ।
प्रश्न: तो ये घटनाएँ भारत में ही क्यों होती हैं ? पूरा विश्व इसको मान्यता क्यों नहीं देता ?
उत्तर: ये घटनायें पूरे विश्व भर में होती रहती हैं और विश्व इसको मान्यता इसलिए नहीं देता क्योंकि उनको वेदानुसार यौगिक दृष्टि से शरीर का कुछ भी ज्ञान नहीं है । वे केवल माँस और हड्डियों के समूह को ही शरीर समझते हैं , और उनके लिए आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है । तो ऐसे में उनको न जीवन का ज्ञान है, न मृत्यु का ज्ञान है, न आत्मा का ज्ञान है, न कर्मों का ज्ञान है, न ईश्वरीय व्यवस्था का ज्ञान है । और अगर कोई पुनर्जन्म की कोई घटना उनके सामने आती भी है तो वो इसे मानसिक रोग जानकर उसको Multiple Personality Syndrome का नाम देकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं और उसके कथनानुसार जाँच नहीं करवाते हैं ।
प्रश्न: क्या पुनर्जन्म केवल पृथिवी पर ही होता है या किसी और ग्रह पर भी ?
उत्तर: ये पुनर्जन्म पूरे ब्रह्माण्ड में यत्र तत्र होता है, किसने असंख्य सौरमण्डल हैं, कितनी ही पृथीवियाँ हैं । तो एक पृथीवी के जीव मरकर ब्रह्माण्ड में किसी दूसरी पृथीवी के उपर किसी न किसी शरीर में भी जन्म ले सकते हैं । ये ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन है ।
प्रश्न: परन्तु यह बड़ा ही अजीब लगता है कि मान लो कोई हाथी मरकर मच्छर बनता है तो इतने बड़े हाथी की आत्मा मच्छर के शरीर में कैसे घुसेगी ?
उत्तर: यही तो भ्रम है आपका कि आत्मा जो है वो पूरे शरीर में नहीं फैली होती । वो तो हृदय के पास छोटे अणुरूप में होती है । सब जीवों की आत्मा एक सी है । चाहे वो व्हेल मछली हो, चाहे वो एक कीड़ी हो । 







20.7.17

हिन्दू धर्म पूर्णत: वैज्ञानिक है//Hindu religion is completely scientific -डॉ.आलोक



   हिंदू धर्म विश्व के सबसे प्राचीनतम धर्मो में से एक हैं। हिंदू धर्म के चमत्कार व ज्ञान के कारण ही भारत विश्वगुरु बना था। आज हिंदू धर्म को विज्ञान भी स्वीकारने लगा। हिंदू धर्म के संस्कारों से लेकर अनेक क्रिया-कलापों में विज्ञान व जनकल्याण छुपा हुआ है।
*ओम मंत्र का महत्व- हिंदू धर्म में ओम का अत्यधिक महत्व है। सभी मंत्र, यंत्र व तंत्र में ओम का प्रयोग किया जाता है। ओम से मंत्रों के दोष खत्म हो जाते है। भारतीय ऋषियों के अनुसार यह सम्पूर्ण संसार ओममयी है। कण-कण में ओम व्याप्त है। हाल ही में यूरोपियन स्पेस एजेंसी और नासा की संयुक्त प्रयोगशाला सोहो ने संयुक्त रूप से सूर्य से निकलने वाली ध्वनि का अध्ययन किया और पाया की सूर्य से निकलने वाली ध्वनि हिंदू धर्म की ओम के समान ही है।
* हाथ जोडकर नमस्कार करना- हिंदू धर्म में किसी से मिलने पर नमस्कार किया जाता हैं। नमस्कार करने से न सिर्फ दूसरों का आदर सम्मान होता है अपितु विज्ञान अनुसार ऐसा करने से हमारे हाथ पर दबाव पडता है। जिसका सीधा प्रभाव हमारी आंख और मस्तिष्क पर पडता है।
* जनेऊ संस्कार- हिंदू धर्म में जनेऊ प्रयोग किया जाता हैं। यह हमारी आत्मिक शक्ति को बढाने वाला होता है। जनेऊ संस्कार के पश्चात हम पूजा-पाठ और यज्ञ करने के अधिकारी बन पाते हैं मल-मूत्र विसर्जन के समय इसे कान पर लपेटा जाता हैं। ऐसा करने के पीछे एक विज्ञान का रहस्य छुपा हुआ है। हमारे कान के पीछे दो नशे होती हैं जिनका सीधा सम्बंध हमारे मस्तिष्क और पेट से है। इन नशों पर दबाव से हमे मल-मूत्र त्यागने में आसानी होती है एवं कब्ज,गैस, एसीडीटी, मूत्र रोग आदि नही होते।
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* शिखा रखना- हिंदू धर्म में शिखा व्यक्ति की शक्ति के रूप में देखा जाता है। शिखा मनुष्यों को ज्ञान और विद्धा से युक्त रखती है। शिखा वाले स्थान पर दोनों दिमाग का जुडाव होता है। यह अत्यधिक नाजुक व कोमल भाग होता है। यह सहस्त्रचार चक्र का स्थान होता है।
* तुलसी और पीपल की पूजा- हिंदू धर्म में पीपल एवं तुलसी को अत्यधिक पवित्र माना जाता है। इनका पूजन और पालन अनेक पापों से मुक्ति देता है। विज्ञान के अनुसार पीपल एक ऐसा वृक्ष हैं जो सर्वाधिक ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है।जबकी तुलसी की गंध से अनेक किटाणुओं से बचाव होता है।
* शंख बजाना- पूजन में शंख बजाने की प्रथा यह देवता के आगमन और पवित्रता का सूचक है। वैज्ञानिक मानते हैं की शंख बजाने से अनेक विकिरण और किटाणु नष्ट हो जाते हैं। इसके जल का प्रयोग गले व हृदय के अनेक दोषों को दूर करता है।
* सूर्य नमस्कार- सूर्य नमस्कार के पीछे का विज्ञान हमें आलस्य से दूर रखता है। सूर्य को आठ प्रकार से नमस्कार करने से हमारे शरीर की अच्छी तरह से कसरत हो जाती है जिससे शरीर में आलस्य नही फैलता।
* उतर दिशा में सोना वर्जित- हिंदू धर्म में प्राचीन काल से उत्तर दिशा की तरफ सोना वर्जित माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तर दिशा विशाल मेग्नेटिक फिल्ड होता है जिस कारण इधर सर रखकर सोने से मस्तिष्क में अधिक खिचाव होता है। बुरे स्वप्न आना या नींद न आने जैसी समस्या आती है।
\* पूजन में आरती का प्रयोग करना- पूजन करने के उपरांत आरती करने का विधान है। आरती से हमारी पूजा पूर्ण होती है। विज्ञान के अनुसार आरती करते समय घी और कपूर का प्रयोग वातावरण शुद्धि के लिये अत्यधिक लाभदायक होता है।
*माथे पर टीका लगाना- हिंदू धर्म में टीका लगाने का विशेष महत्व है। तिलक के बिना सभी धार्मिक कार्यो का फल प्राप्त नही हो पाता। विज्ञान के अनुसार दोनों भृकुटियों के बीच का भाग अत्यधिक संवेदन शील होता है। मस्तिष्क के इस हिस्से में “सेराटोनिन” एवं “ बीटाएंडोरफिन” नाम के दो रसायनों का स्त्राव होता है, तिलक के प्रयोग से इन दोनों रसायनो का स्राव संतुलित हो जाता है। जिससे मस्तिष्क शांत होकर अधिक से अधिक कार्य करता है।
\*ओम मंत्र का महत्व- हिंदू धर्म में ओम का अत्यधिक महत्व है। सभी मंत्र, यंत्र व तंत्र में ओम का प्रयोग किया जाता है। ओम से मंत्रों के दोष खत्म हो जाते है। भारतीय ऋषियों के अनुसार यह सम्पूर्ण संसार ओममयी है। कण-कण में ओम व्याप्त है। हाल ही में यूरोपियन स्पेस एजेंसी और नासा की संयुक्त प्रयोगशाला सोहो ने संयुक्त रूप से सूर्य से निकलने वाली ध्वनि का अध्ययन किया और पाया की सूर्य से निकलने वाली ध्वनि हिंदू धर्म की ओम के समान ही है।









4.7.17

योग और सूर्य विज्ञान के चमत्कार




   

यद्यपि भारतीय योग का चरम लक्ष्य आत्मानुभूति और जीवन्मुक्ति की अवस्था को प्राप्त करना है, तो भी योगाभ्यास से साधक की भौतिक शक्तियाँ भी इतनी बढ़ जाती है कि अनेक ऐसे कार्य कर दिखा सकते हैं जो बड़े-बड़े वैज्ञानिक यंत्रों और विधियों से भी सम्भव नहीं है। उदाहरण के लिये एक तत्व को दूसरे तत्व में परिवर्तित करने के लिये आधुनिक वैज्ञानिक बहुत समय से प्रयत्न कर रहे हैं, पर अभी तक उनको इस प्रयोग को सफलता प्राप्त नहीं हुई है। अब अणु शक्ति का ज्ञान होने और उसके प्रयोग की विधि मालूम होने पर उनको आशा होने लगी है कि वे निकट भविष्य में एक तत्व को दूसरे में बदलने में समर्थ हो सकेंगे। उदाहरणार्थ वे लोहे या ताँबे का सोना बना सकेंगे या मिट्टी को चीनी के रूप में परिवर्तित कर सकेंगे।
पर भारतीय योगियों ने इस प्रकार की शक्ति प्राचीन समय से प्राप्त कर ली हैं और समय-समय पर वे इसका परिचय भी देते रहे हैं। हमने ऐसी एक दो नहीं सैकड़ों घटनायें पढ़ी और सुनी है कि सिद्ध महात्माओं ने आवश्यकता पड़ने पर पानी से घी का काम ले लिया, या थोड़े से भोजन को इतना बढ़ा दिया कि दस व्यक्तियों की सामग्री से सौ का काम चल गया है।
आधुनिक समय में इस प्रकार चमत्कार दिखला सकने वालों में काशी के स्वामी विशुद्धानन्द जी का नाम बहुत प्रसिद्ध है। वे बाल्यावस्था में वर्द्धवान के निकट एक गाँव में रहते थे, पर 17 वर्ष की आयु में जब आपको एक पागल कुत्ते ने काट खाया और प्राण नाश की आशंका होने लगी तो एक योगी ने आकर इनको बचाया और फिर योग मार्ग का उपदेश देकर हिमालय में पहुँचा दिया। वहाँ वे “ज्ञान-गंज” नामक योगाश्रम में विभिन्न गुप्त विद्याओं का अध्ययन करते रहे और अनेक वर्षों के बाद एक शक्ति सम्पन्न योगी के रूप में पुनः लोकालय में आये और यहाँ विभिन्न स्थानों में घूम-फिर दीन दुखी जनों का कल्याण साधन करते रहे।
स्वामी जी साधारण लोगों में “गन्ध बाबा” के नाम से विख्यात थे। जितने लोग उनके संपर्क में आते थे उन सबका यही अनुभव था कि उनकी देह से एक विशेष प्रकार की मनोरम गन्ध निकला करती है। वह प्रायः कमल फल (पद्म) की गन्ध से मिलती होती थी, पर वास्तव में वह एक निराली ही चीज थी। स्वामी जी जहाँ उठते-बैठते वहाँ बहुत दूर तक यह सुवास फैली रहती थी।

कुछ समय पहले इंग्लैंड के एक पत्रकार पालब्रंटन भारत भ्रमण के लिये आये। उनका मुख्य उद्देश्य यहाँ के योगियों और महात्माओं की रहस्यपूर्ण शक्तियों की जाँच करना था। अनेक स्थानों में घूमते-फिरते वे बनारस में स्वामी विशुद्धानन्दजी के पास भी पहुँचे थे और उनकी अलौकिक शक्तियों का उन्होंने ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया था। उन्होंने अपनी पुस्तक में इस सम्बन्ध में जो विवरण दिया है उसकी कुछ बातें यहाँ दी जाती हैं-
“जब मैं पहुँचा तो कुछ लोग जमीन पर अर्द्ध वृत्ताकार बैठे हुये थे और कुछ ही दूर पर एक वृद्ध महात्मा विराजमान थे। उनके श्रद्धा उत्पन्न करने वाले रूप को देखकर मैं समझ गया यही योगी जी हैं। उनकी आयु 70 वर्ष से अधिक होगी। किसी विचित्र शक्ति से उनका कमरा परिपूर्ण जान पड़ता था। मेरे पहुँचने के कुछ देर बाद योगी ने बंगला में कहा “कल तीसरे पहर पंडित गोपीनाथ कविराज के साथ आना तभी बातचीत हो सकेगी।”
“दूसरे दिन 4 बजे जब मैं गोपीनाथ जी के साथ आश्रम में पहुँचा तो योगी ने पूछा कि “क्या तुम मेरा कोई चमत्कार देखना चाहते हो?”
ब्रंटन-यदि आपकी ऐसी दया हो तो मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी।
विशुद्धानन्द-अच्छा अपना रुमाल मुझे दो। यदि रेशम का रुमाल होगा तो अच्छा है। जो सुगन्ध तुम चाहो इस रुमाल पर आतिशी शीशे एवं सूर्य किरणों द्वारा मैं पैदा कर सकता हूँ। तुम कौन सी सुगन्ध चाहते हो?
ब्रंटन-चमेली की!
योगी ने बाँये हाथ से ब्रंटन का रुमाल लिया और आतिशी शीशा दाहिने हाथ से उसके ऊपर थोड़ी दूर रखा। दो सैकिण्ड तक एक सूर्य किरण रुमाल पर पड़ी। इसके बाद योगी ने रुमाल ब्रंटन को लौटा दिया। ब्रंटन ने रुमाल नाक से लगाया तो चमेली की खुशबू दिमाग में भर गई।
ब्रंटन ने अच्छी तरह रुमाल की परीक्षा की, पर उसमें कहीं गीलापन न था, न इस बात का कोई चिन्ह था कि उस पर तरल सुगन्ध या इत्र टपकाया गया है। ब्रंटन ने आश्चर्य से वृद्ध योगी की तरफ देखा। योगी ने चमत्कार को फिर से दिखाने का वचन दिया। ब्रंटन ने इस बाल गुलाब का इत्र चुना। वे लिखते हैं कि “इस बार मैं बड़े ध्यान से सब काम देखता रहा। जरा सा हिलने-डुलने पर और योगी के चारों तरफ मेरा ध्यान था। मैंने उनके हाथों की परीक्षा की, उनके दूध से श्वेत वस्त्रों की जाँच करके देख लिया, परन्तु कोई भी सन्देहजनक बात नहीं मिली। योगी ने फिर पहली तरकीब से रुमाल के दूसरे कोने में गुलाब की गहरी सुगन्ध पैदा कर दी।” तीसरी बार ‘वायलेट’ के फल का नाम लिया और योगी ने शीशे के द्वारा वायलेट की खुशबू पैदा कर दी। विशुद्धानन्द अपनी इन सफलताओं से बिल्कुल अनासक्त से हैं। वे सारे प्रदर्शन के प्रति एक साधारण बात की तरह व्यवहार करते थे। उनके चेहरे की गम्भीरता एक क्षण के लिए कम नहीं होती। चौथी बार विशुद्धानन्द ने कहा कि “अच्छा, अब मैं अपनी तरफ से एक ऐसे फूल की खुशबू पैदा करूंगा जिसको तुमने आज तक नहीं सूँघा होगा, क्योंकि वह फल तिब्बत में ही पैदा होता है। यह कह कर उन्होंने आतिशी शीशे का प्रकाश रुमाल के चौथे कोने पर डाला और उसमें से वास्तव में ऐसी खुशबू आने लगी जिसे हम पहिचान नहीं सकते थे।”
“दूसरे दिन हम फिर एक जीवित कबूतर लेकर विशुद्धानंद जी के पास गये। वहाँ उनके कहने से कबूतर का गला घोंटकर मार डाला गया। इसके बाद वह एक घंटे तक सब लोगों के सामने पड़ा रहा कि जिससे लोग देखलें कि वह वास्तव में निर्जीव है उसकी आँखें पथरा गई थी और शरीर कठोर पड़ गया। बहुत गौर करने पर भी उसमें कोई ऐसा लक्षण दिखलाई नहीं पड़ता था जिससे उसे जीवित समझा जा सकता।
“तब योगी ने अपना काँच का गोला उठाया और उसके द्वारा पक्षी की एक आँख में सूर्य किरण का प्रतिबिम्ब केन्द्रित किया। कुछ देर ऐसा करने के बाद वे कोई मंत्र पढ़ने लगे और थोड़ी देर में पक्षी का शरीर हिलने लगा। ऐसा जान पड़ता था कि मृत्यु की वेदना से वह तड़प रहा है। कुछ देर बीतने पर उसने पर फड़फड़ाये और देखते-देखते अपने पैरों पर खड़ा हो गया। कुछ मिनट बीतने पर पक्षी कमरे में उड़कर एक ताक पर बैठ गया। आधे घंटे से ज्यादा समय तक वह एक स्थान से दूसरे स्थान तक उड़ता रहा, फिर निर्जीव होकर गिर पड़ा।”
विशुद्धानन्द जी ने ब्रंटन को बतलाया कि इन चमत्कारों से “योग” का कोई सम्बन्ध नहीं है। वरन् ये सूर्य-विज्ञान द्वारा किये गये हैं और इनकी विधि वैसी ही स्पष्ट है जैसी कि आजकल के अन्य वैज्ञानिक प्रयोगों की होती है। इसके लिये योगाभ्यास की आवश्यकता नहीं। साधारण संसारी व्यक्ति कुछ समय अभ्यास करके इसे कर सकता है। उन्होंने यह भी बतलाया कि इसी प्रकार “चन्द्र विज्ञान” “नक्षत्र विज्ञान” “वायु विज्ञान” “क्षण विज्ञान” “शब्द विज्ञान” “मनोविज्ञान आदि और भी बहुत सी विद्याएं हैं, जिनसे अनेक अभूतपूर्व और असम्भव समझे जाने वाले काम करके दिखाये जा सकते।



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