24.6.21

ढोली(दमामी,नगारची ,बारेठ)) जाती का इतिहास:Dholi Caste

वीडिओ 



ढोली समुदाय खुद को गंधर्व देव की सन्तान मानते हैं. राजा-महाराजाओं के काल में युद्ध के दौरान रणभेरी बजाने वालों के तौर पर ये जाति अस्तित्व में आई और ढोल बजाने की वजह से इन्हें ढोली कहा जाने लगा|
दमामी समाज की उत्पति – यह जाति शुद्ध क्षत्रिय है जो तीन प्रकार से बनी है
1. प्रसन्नतापूर्वक
2,इनका राज्य छीन कर जबरदस्ती बनाये हुये ।
3,कुछ आपत्तिवश इनमे मिले हुये ।
 किन्तु अधिकांश खांपे इस समाज में वे है, जिनको भिन्न भिन्न राजाओं ने अपने भाईयों में से तथा संबंधित  राजपूतों में से जो रणकुशल नायक थे, चुन चुन कर बनाई है यह समाज राजस्थान में क्षेत्र अनुसार कई नामो से पुकारी जाती है । जैसे नगारची ,राणा ,बारोट और दमामी। 
 इस जाति का इतिहास भी सिवाय राजपूतों के संसार में कोई और नहीं जानता और न कोई धार्मिक पुस्तक में ही इनका उल्लेख है । इसका एकमात्र कारण यह है कि यह जाति प्राचीन नहीं बल्कि अर्वाचिन है । यह नई न्यात अर्थात् नवीन जाति कहलाती है किन्तु दुर्भाग्यवश राजपूतों की स्वार्थमयी विचित्र नीति ने और द्वेषियों के विरोध ने इनको इतना गिराया है कि आज आम जनता में इनकी प्रतिष्ठा  पहिले की तरह नहीं रही |
 इस जाति के लोगों को  बारहठ  भी कहते है । जिसका अर्थ द्वार पर हठ करने वाला है । रणधवल (दमामी-नगारची) समाज की प्राचीन उपाधि बारहठ ही है मगर संवत 1808 में जोधपुर महाराज बख्तसिंह जी ने यह पदवी चारण समाज को देदी । इसी कारण मारवाड़ में बारेठ चारण कहलाते है |शेष मेवाड़ ,हाड़ोती आदि स्थानों  में लोग  नगारची जाति को ही बारहठ कहते आ रहे है । सोलंकी और गौड़ क्षत्रियों के यहां पोलपात नगारची जाति को ही बारहठ  कहते है जो   दमामी राजपूत जाति ही है
राजपूताने में क्षत्रियों का कोई ऐसा छोटे से छोटा भी ठिकाना नहीं है जहां पर दमामी कौम के  एक दो घर नहीं हों  और इन लोगो के गुजारे के लिए माफ़ी की जमीन और राज्य में तथा प्रजा में लगाने नहीं हो । चारण जाति के लोग  खास खास ठिकानों में ही है । जिससे भी स्पष्ट सिद्ध है कि राजपूत जाति के वास्तविक पोलपात दमामी ही है 
डांगी- राव डांगी जी के वंशज ढोली कहलाये। राव डांगी जी के पास किसी प्रकार कि भूमी नहीँ थी व ईसने डूमन या ढोली जाती की लङकी से शादी की । उसकी सन्तान कही ढोली तो कहीँ डांगी नाम से बसते है। राव डांगी जी के वंशज ढोली कहलाये।
डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार, ढोली जाति की उत्पत्ति डांगी जाति से नहीं हुई है, बल्कि यह एक अलग जाति है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। ढोली जाति के लोग ढोल और नगाड़े बजाने का काम करते थे, इसलिए उन्हें ढोली या नगारसी कहा जाता था।डांगी जाति के एक व्यक्ति ने ढोली जाति की लड़की से शादी की, जिससे उनका वंश राजपूत से अलग हो गया और ढोली वंश बन गया। इस प्रकार, डांगी के वंशज राजपूतों से अलग हो गए, लेकिन उनके रिश्ते और नाते अभी भी बने रहे।उनके अनुसार, राजस्थान में राठौड़ राजपूतों के साथ-साथ ढोली जाति भी फैल गई। यह सिलसिला आज तक कायम है।यह जानकारी डॉ. दयाराम आलोक के शोध और अध्ययन पर आधारित है, जो जाति इतिहास के क्षेत्र में एक प्रमुख विद्वान हैं|
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23.6.21

जाट जाति की उत्पत्ति का इतिहास:Jat jati ka itihas





जाट जाति वर्तमान समय की सबसे प्रतिष्ठित जातियों में से एक मानी जाती है। जाट क्षत्रिय समुदाय के अभिन्न अंग माने जाते हैं, इनका विस्तार भारत में मुख्यत: "पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि भारत के पठार इलाकों मैं है।
 पंजाब में जट्ट (Jatt) एवं अन्य राज्यों में इन्हें जाट (Jaat) नाम से संबोधित किया जाता है। जाट समाज के लोग आज के आधुनिक युग में  भी अपनी पुरानी परंपराओं से जुड़े हुए हैं, इस जाति की सामाजिक संरचना बेजोड़ है। जाट समाज की गोत्र और खाप  व्यवस्था प्राचीन समय की मानी जाती है।
जाट समाज की उत्पत्ति के विषय में कई मान्यताएं हैं  एक प्राचीन मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि राजसूय यज्ञ के बाद युधिष्ठिर को 'जेष्ठ' कहा गया और बाद में युधिष्ठिर की संतान को 'जेठर' शब्द से संबोधित किया जाने लगा, जैसे जैसे समय बीतता गया 'जेठर'  को कालांतर मे जाट नाम से संबोधित किया जाने लगा। इस मान्यता के अनुसार जाट समाज की उत्पत्ति युधिष्ठिर से मानी जाती है।
  इसके अलावा एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव शंकर से जाट समुदाय की उत्पत्ति को जोड़कर देखा जाता है, इस मान्यता के पीछे एक दिलचस्प कहानी है, यह कहानी 'देवसंहिता' नामक पुस्तक में उल्लेखित है। इस कहानी के अनुसार शिव के ससुर राजा दक्ष ने हरिद्वार के पास 'कनखल' में एक यज्ञ का आयोजन किया था। इस यज्ञ में सभी देवी देवताओं को बुलाया गया लेकिन भगवान शिव और शिव की पत्नी 'सती' को कोई निमंत्रण प्राप्त नहीं हुआ।
 जब सती को पिता के द्वारा यज्ञ के बारे में खबर प्राप्त हुई तो शिव से अपने पिता के यज्ञ कार्यक्रम में जाने की आज्ञा मांगी। शिव ने उन्हें यह कहकर आज्ञा दे दी कि - "तुम उनकी पुत्री हो और तुम्हे अपने घर बिना निमंत्रण के भी जा सकती हो" शिव से अनुमति लेकर सती अपने पिता के द्वारा आयोजित यज्ञ कार्यक्रम में जा पहुंची, लेकिन वहां सती को अपमानित किया गया एवं शिव के बारे में भी बुरा भला कहा गया। इसी बात पर क्रोधित होकर सती ने हवन कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया।
 जब इस बात का पता भगवान शिव को चला तो वह क्रोधित हो उठे और अपनी जटाओं से वीरभद्र नामक गण उत्पन्न किया | वीरभद्र यज्ञ आयोजित किए जाने वाले स्थान पर जाकर नरसंहार करता है, तथा शिव के ससुर दक्ष का सर काट देता है। इस नरसंहार को रोकने के लिए भगवान विष्णु, ब्रह्मा और सभी देवी देवता शिव से राजा दक्ष को माफ करने की याचना करते हैं। सभी देवी देवताओं की विनती के बाद भगवान शिव शांत हो जाते हैं और राजा दक्ष को पुनर्जीवित कर देते हैं।
इस कथा के अंतर्गत जो  वीरभद्र नामक किरदार है, उसे जाट समाज का पूर्वज माना जाता है।  
 जाट भारत की पुरानी जातियों में से एक है, विभिन्न इतिहासकारों का जाटो की उत्पत्ति की लेकर अलग-अलग मत है। कई इतिहासकारों का मानना है कि जाट शब्द की उत्पति महाराज युधिष्ठिर से हुई, उन्हें श्री कृष्ण द्वारा ज्येष्ठ से सम्बोधित किया गया, उन्हीं के वंशज ज्येष्ठ और फिर अपभ्रंश से जाट कहलाये।
  जाटों ने कभी ब्राह्मणवाद को स्वीकार नहीं किया। जाट समाज के लोग अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं, जिसे भंडारा कहा जाता है। इस जाति के लोग भगवान कृष्ण को अपना पूर्वज मानते हैं, लेकिन इस बात का प्रमाण किसी भी ग्रंथ में देखने को नहीं मिलता है। लेकिन मुख्यत: मूल रूप से इस जाति के लोग भारतीय हैं।
 जाटों की वर्तमान स्थिति  पहले से बेहतर है, ज्यादातर जाट मुख्य रूप से खेती करते हैं। इस जाति के लोग मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।  जाट समाज के लोगों की आर्थिक Growth Rate अन्य जातियों के मुकाबले बेहतर है।
जाटों की जनसंख्या 21वीं सदी के पूर्वार्द्ध में, पंजाब की कुल जनसंख्या का 20 प्रतिशत जाट थी, लगभग 10 प्रतिशत जनसंख्या ब्लोचिस्तान, राजस्थान और दिल्ली तथा 2 से 5 प्रतिशत जनसंख्या सिन्ध, उत्तर-पश्चिम सीमान्त और उत्तर प्रदेश में रहती थी। पाकिस्तान के 40 लाख जाट मुस्लिम हैं; भारत के लगभग 60 लाख जाट दो अलग जातियों के रूप में विभाजित हैं: एक सिख जो मुख्यतः पंजाब केन्द्रित हैं तथा अन्य हिन्दू हैं।
इतिहास के महान जाट
महाराजा रणजीत सिंह
महाराजा सूरजमल
तेजाजी
महाराजा जवाहर सिंह
  जाति इतिहासविद  डॉ . दयाराम आलोक के मतानुसार 17वीं शताब्दी के अंत और 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में जाटों ने मुगल साम्राज्य के खिलाफ हथियार उठाए| हिंदू जाट राज्य महाराजा सूरजमल के अधीन अपने चरम पर पहुंच गया 20वीं शताब्दी तक पंजाब पश्चिम उत्तर प्रदेश राजस्थान हरियाणा और दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में जमींदार जाट एक प्रभावशाली समूह बन गए इन वर्षों में कई जाटों ने शहरी नौकरियों के पक्ष में कृषि को छोड़ दिया और उच्च सामाजिक स्थिति का दावा करने के लिए अपनी प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का उपयोग किया

आजादी में योगदान और जाट -

कई इतिहासकार 1857 की क्रांति को स्वतंत्रता संग्राम नहीं मानते हैं। वीर सावरकर ने 1857 की क्रांति को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानते हुए पुस्तक लिखी जिसमें लिखा कि क्रांति की शुरुआत 10 मई को मेरठ से शुरु हुई, किन्तु जाट बाहुल्य इस क्षेत्र के जाटो का नाम नहीं लिखे जाने से स्वतंत्रता संग्राम में अपनी मजबूती खो बैठे। क्रांति महज रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, टीपू सुल्तान के इर्द-गिर्द घूमती रहीं तो वही मेरठ से महज मंगल पांडे के इर्द-गिर्द ही रह गई|
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11.5.21

बांछड़ा जाती की जानकारी:Banchada caste history

Dr.Dayaram Aalok donates benches to Hindu temples and Mukti Dham 


भारत में बेटियों के लिए और महिलाओं के लिए कई सरकार द्वारा कई स्कीम चलाई गई हैं. उज्जवला योजना से लेकर विधवा पेंशन तक ऐसा बहुत कुछ है जो महिलाओं की भलाई के लिए किया गया है, लेकिन फिर भी बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाले इस देश में बच्चियों का गर्भपात करवाया जाता है और पुरुष और महिलाओं की संख्या में बहुत बड़ा फर्क है. पर देश का एक समुदाय ऐसा है जो बेटी के पैदा होने पर खुशियां भी मनाता है और उन्हें बहुत अच्छे से पालता भी है. उन्हें काम भी करने देता है पर काम क्या है ये जानकर कोई भी समाज या सरकार चिंता में पड़ जाएगी!
मध्यप्रदेश का बांछड़ा समुदाय लड़कियों के पैदा होने पर खुशियां मनाता है क्योंकि इस समुदाय के लोग जिस्मफरोशी के धंधे से अपना घर चलाते हैं. लड़की पैदा होने का मतलब है एक और इंसान हो जाएगा घर चलाने के लिए.
हमारे सभ्य समाज के लोगों को वेश्यावृति के बारे में बात करने में शर्म आती है क्योंकि इसे वो सही नहीं मानते, घिनौना काम मानते हैं, लेकिन ये ही लोग दिन के उजाले से निकलते ही रात के अंधियारे में इन इलाकों की ख़ाक छानना शुरू कर देते हैं। ये बात भले ही आम लोगों के लिए चौंकाने वाली हो, लेकिन मालवा अंचल में 200 वर्षों से बेटी को सेक्स बाज़ार में धकेलने की परंपरा चली आ रही है। दरअसल इन गांवों में रहने वाले ‘बांछड़ा समुदाय’ के लिए बेटी के जिस्म का सौदा आजीविका का एकमात्र ज़रिया बना हुआ है, यहां 'वेश्यावृती' एक परंपरा है।
वैसे तो भारतीय समाज में आज भी बेटी को बोझ समझा जाता हो, लेकिन बांछड़ा समुदाय में बेटी पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है। बेटी के जन्म की खूब धूम होती है क्योंकि ये बेटी बड़ी होकर कमाई का ज़रिया बनती है.. चलो कहीं तो बेटियां आगे हैं (शर्मनाक)। इस समुदाय में यदि कोई लड़का शादी करना चाहे तो उसे दहेज़ में 15 लाख रुपए देना अनिवार्य है। इस वजह से बांछड़ा समुदाय के अधिकांश लड़के कुंवारे ही रह जाते हैं। यहां पर ये धंधा या कहें कि गंदगी इतनी फैल चुकी है कि बाछड़ा समाज देह मंडी के रूप में कुख्यात है, जो वेश्यावृत्ति के दूसरे ठिकानों की तुलना में इस मायने में अनूठे हैं, कि यहां सदियों से लोग अपनी ही बेटियों को इस काम में लगाए हुए हैं। इनके लिए ज्यादा बेटियों का मतलब है, ज्यादा ग्राहक!
 भारत में एक ऐसी जगह है जहां खुद मां-बाप अपने बेटी से जिस्‍मफरोशी का धंधा करवाते हैं और खुद ही ग्राहक भी ढूंढ कर लाते हैं तो आप यकीन नहीं करेंगे। लेकिन बता दें कि ये सच है। इस जगह बेटी पैदा होने पर जश्‍न मनाया जाता है। इस जश्‍न के पीछे का कारण भी उतना ही भयावह है। हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश के मालवा इलाके के रतलाम, मंदसौर और नीमच जिलों में निवास करने वाले बांछड़ा समुदाय की जहां लड़की होने पर जश्न इसलिए मनाया जाता है ताकि बड़ा होने पर उन्हें देह व्यापार के दलदल में धकेला जा सके। अब जो ताजा मामला सामने आया है उसके मुताबिक बांछड़ा समुदाय के लोग दूसरे समुदायों से लड़कियों को खरीद कर उन्हें देह व्यापार में धकेल रहे हैं। पेशे से वकील एक आरटीआई एक्टिविस्‍ट अमित शर्मा ने इस बात पर चिंता जाहिर की है और कहा है कि इस तरह इस गंदे धंधे में शामिल महिलाओं की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। विस्‍तार से जानिए पूरा मामला
बेहद अजीब है सामाजिक मान्‍यता
बांछड़ा समुदाय में देहव्यापार को सामाजिक मान्यता है और इसलिये इनके परिवार में लड़की का होना बड़ा अहमियत रखता है। बांछड़ा समुदाय में प्रथा के अनुसार घर में जन्म लेने वाली पहली बेटी को जिस्मफरोशी करनी ही पड़ती है। मालवा में करीब 70 गांवों में जिस्मफरोशी की करीब 250 मंडियां हैं, जहां खुलेआम परिवार के सदस्य ही बेटी के जिस्म का सौदा करते है।
बेटी के लिए ग्राहक पाकर खुश होते हैं मां-बाप इस समुदाय में बेटी के जिस्म के लिए मां-बाप ग्राहक का इंतज़ार करते है। कोई उनकी बेटी के साथ हम बिस्तर होने के लिए राजी हो जाता है तो उन्हें ख़ुशी होती है की चलो ग्राहक तो आया। सौदा होने के बाद बेटियां अपने परिजनों सामने ही हमबिस्‍तर हो जाती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि परिवार में सामूहिक रूप से ग्राहक का इंतज़ार होता है, जिसको ग्राह‍क पहले मिलता है उसकी कीमत परिवार में सबसे ज्यादा होती है।
ज्‍यादा बेटी मतलब ज्‍यादा कमाई इस समुदाय में यदि कोई लड़का शादी करना चाहे तो उसे दहेज़ में 15 लाख रुपए देना अनिवार्य है। इस वजह से बांछड़ा समुदाय के अधिकांश लड़के कुंवारे ही रह जाते हैं। यहां पर ये धंधा या कहें कि गंदगी इतनी फैल चुकी है कि बाछड़ा समाज देह मंडी के रूप में कुख्यात है, जो वेश्यावृत्ति के दूसरे ठिकानों की तुलना में इस मायने में अनूठे हैं, कि यहां सदियों से लोग अपनी ही बेटियों को इस काम में लगाए हुए हैं। इनके लिए ज्यादा बेटियों का मतलब है, ज्यादा ग्राहक!
2000 से ज्‍यादा महिलाएं इस धंधे में शामिल बांछड़ा समुदाय के उत्थान के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘‘ नई आभा सामाजिक चेतना समिति'' के संयोजक आकाश चौहान ने बताया, ‘‘ मंदसौर, नीमच और रतलाम जिले में 75 गांवों में बांछड़ा समुदाय की 23,000 की आबादी रहती है। इनमें 2,000 से अधिक महिलायें और युवतियां देह व्यापार में लिप्त हैं।'' चौहान ने दावा किया कि मंदसौर जिले की जनगणना के अनुसार यहां 1000 लड़कों पर 927 लड़कियां हैं, पर बांछड़ा समाज में स्थिति उलट है। महिला सशक्तिकरण विभाग द्वारा वर्ष 2015 में कराये गये सर्वे में 38 गांवों में 1047 बांछड़ा परिवार में इनकी कुल आबादी 3435 दर्ज की गयी थी। इनमें 2243 महिलायें और महज 1192 पुरूष थे, यानी पुरूषों के मुकाबले दो गुनी महिलायें।
दूसरे समुदाय की लड़कियां भी हो रही हैं शामिल वहीं नीमच जिले में वर्ष 2012 के एक सर्वे में 24 बांछड़ा बहुल गांवों में 1319 बांछड़ा परिवारों में 3595 महिलायें और 2770 पुरूष पाये गये। इस पूरे मामले में मालवा में पुलिस इंस्पेक्टर अनिरूद्व वाघिया ने बताया कि दूसरे समाज की लड़कियों को खरीदकर उनको वेश्यावृत्ति के धंधे मे धकेलना चौंकाने वाला हैं। नीमच, मन्दसौर जिले में इस तरह के अब तक करीब 70 से अधिक मामले उजागर हो चुके हैं।
 
  मंदसौर, नीमच और रतलाम के 75 गांव में निवासरत बाछड़ा समाज के 30 हजार लोग समाज की पहचान वर्षों से अछूत और आपराधिक प्रवृत्ति वाले होने की रही है। अब बदलाव की बयार चल रही है और निर्मल समाज का गठन कर युवा यह दाग मिटाने के लिए 5 साल से प्रयासरत है। असर यह हुआ कि समाज के 110 लोग कुरीतियों तिलांजलि देकर सरकारी नौकरी कर रहे हैं।
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विशिष्ट कवियों की चयनित कविताओं की सूची (लिंक्स)

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से -गोपालदास "नीरज"

वीरों का कैसा हो वसंत - सुभद्राकुमारी चौहान

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा-अल्लामा इकबाल

उन्हें मनाने दो दीवाली-- डॉ॰दयाराम आलोक

जब तक धरती पर अंधकार - डॉ॰दयाराम आलोक

जब दीप जले आना जब शाम ढले आना - रविन्द्र जैन

सुमन कैसे सौरभीले: डॉ॰दयाराम आलोक

वह देश कौन सा है - रामनरेश त्रिपाठी

किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की रामबाण औषधि

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ -महादेवी वर्मा

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल - महादेवी वर्मा

प्रणय-गीत- डॉ॰दयाराम आलोक

गांधी की गीता - शैल चतुर्वेदी

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार -शिवमंगलसिंह सुमन

सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक

जंगल गाथा -अशोक चक्रधर

मेमने ने देखे जब गैया के आंसू - अशोक चक्रधर

सूरदास के पद

रात और प्रभात.-डॉ॰दयाराम आलोक

घाघ कवि के दोहे -घाघ

मुझको भी राधा बना ले नंदलाल - बालकवि बैरागी

बादल राग -सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

आओ आज करें अभिनंदन.- डॉ॰दयाराम आलोक


8.5.21

कंजर जन जाति की जानकारी:Kanjar caste history



 प्राचीन काल की एक संकर जाति । विशेष—इसकी उत्पत्ति शौचकी स्त्री और शौंडिक पुरुष से मानी गई है और इसका काम गाना बजाना बतलाया गया है । ३. मनु के अनुसार क्षत्रियों की एक जाति जिसकी उत्पत्ति ब्रात्य क्षत्रियों से मानी जाती है । संपूर्ण उत्तर भारत की ग्राम्य और नगरीय जनसंख्या में छितराए कंजर जनजाति ऐसे कबीला हैं, जिनके कुछ समुदाय अपराध करना अपना मूल पेशा मानते हैं। माना जाता है कि कंजर अपराध करने से पहले ईश्वर का आशीर्वाद लेते हैं, जिसे पाती मांगना कहा जाता है। संगठित अपराधियों के सबसे क्रूर कबीलों में से एक कंजर प्रदेश के जिलों को पहले इलाकों में बांटते हैं। परिवार व रिश्तेदारों को मिलाकर तैयार की गई गैंग दीपावली की रात तांत्रिक अनुष्ठान करने के बाद घर से निकलती है। ठंड के मौसम में लूटपाट करने के बाद बसंत पंचमी से पहले घरों को लौट जाते हैं। 
 इतिहास विद् डा. रत्नाकर शुक्ल बताते हैं कि कंजरों तथा सांसिया,हाबूरा, बेरिया, भाट, नट, बंजारा, जोगी और बहेलिया आदि अन्य घुमक्कड़ कबीलों से कंजरों के बीच पर्याप्त सांस्कृतिक समानता मिलती है। एक ¨कवदंती के अनुसार कंजर दिव्य पूर्वज'मान'गुरु की संतान हैं। मान अपनी पत्नी नथिया कंजरिन के साथ जंगल में रहता था।  समाजशास्त्री डा. विद्याधर के मुताबिक इन कबीलों के पुरूष व घर की महिलाएं मिलकर अवैध शराब बनाती हैं। जिसे घर के पुरुष कबीले और कबीले के बाहर बेचते हैं। रोजाना रात को इस जाति की औरत और पुरुष दोनों ही साथ में शराब भी पीते हैं। पुलिस से बचने के लिए यह अपने घरों में सुरक्षा के काफी प्रबंध रखते हैं। भागने के लिए पीछे की तरफ खिड़की जरूर होती है परंतु चौखट पर दरवाजे नहीं होते हैं।
  
जाति इतिहासविद डॉ. दयाराम आलोक के मतानुसार कंजर जाति के लोग हनुमान और चौथ माता की पूजा करते हैं। कंजरों की कबीला पंचायत शक्तिशाली और सर्वमान्य सभा है। सभ्य समाज की दृष्टि से पेशेवर अपराधी माने जाने वाले कंजरों में भी कबीलाई नियमों के उल्लंघन पर कड़ी सजा मिलती है।
  कंजर एक घुमक्कड़ कबीला है जो सम्पूर्ण उत्तर भारत की ग्राम्य और नागरकि जनसंख्या में छितराया हुआ है। ये संभवत: द्रविड़ मूल के हैं। ' कंजर ' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत 'कानन-चर' से हुई भी बताई जाती है। वैसे भाषा, नाम, संस्कृति आदि में उत्तर भारतीय प्रवृत्तियाँ कंजरों में इतनी बलवती हैं कि उनका मूल द्रविड़ मानना वैज्ञानिक नहीं जान पड़ता। कंजरों तथा साँसिया, हाबूरा, बेरिया, भाट, नट, बंजारा, जोगी और बहेलिया आदि अन्य घुमक्कड़ कबीलों में पर्याप्त सांस्कृतिक समानता मिलती है। एक किंवदंती के अनुसार कंजर दिव्य पूर्वज 'मान' गुरु की संतान हैं। मान अपनी पत्नी नथिया कंजरिन के साथ जंगल में रहता था। मान गुरु के पुरावृत्त को ऐतिहासिकता का पुट भी दिया गया है, जैसा उस आख्यान से विदित है जिसमें मान दिल्ली सुल्तान के दरबार में शाही पहलवान को कुश्ती मेंरों का कबीली संगठन विषम है। वे बहुत से अंतिर्विवाही (एंडोगैमस) विभागों और बहिर्विवाही (एक्सोगैमस) उपविभागों के नाम 1891 की जनगणना में दर्ज किए गए 106 कंजर उपविभागों के नाम हिंदू और छह के नाम मुसलमानी थे। कंजरों का विभाजन पेशेवर विभागों में हुआ है, जैसा उनके जल्लाद, कूँचबंद, पथरकट, दाछबंद आदि विभागीय नामों से स्पष्ट होता है। कंजरों में वयस्क विवाह प्रचलन है। यद्यपि स्त्रियों को विवाहपूर्व यौन स्वच्छंदता पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होती है, तथापि विवाह के पश्चात्‌ उनसे पूर्ण पति व्रता  की अपेक्षा की जाती है। स्त्रीं एवं पुरुष दोनों के विवाहेतर यौन संबंध हेय समझे जाते हैं और दंडस्वरूप वंचित पति को अधिकार होता है कि वह अपराधी पुरुष की न केवल संपत्ति वरन संतान भी हस्तगत कर ले। विवाह वधू मूल्य देकर होता है। रकम का भुगतान दो किस्तों में होता है, एक विवाह के समय और दूसरी संतोनात्पत्ति के पश्चात्‌। परंपरागत विवाहों के अतिरिक्त पलायन विवाह (मैरिज बाई एलोपमेंट) का भी चलन है। अज्ञातवास से लौटने पर युग्म पूरे गाँव को भोज पर आमंत्रिक कर वैध पति-पत्नी का पद प्राप्त कर सकता है। विधवा विवाह संभव है और विधवा अधिकतर अपने अविवाहित देवर से ब्याही जाती है।
  पेशेवर नामधारी होने पर भी कंजरों ने किसी व्यवसाय विशेष को नहीं अपनाया। कुछ समय पूर्व तक ये यजमानी करते थे और गाँव वालों का मनोरंजन करने के बदले धन और मवेशियों के रूप में वार्षिक दान पाते थे। प्रत्येक कंजर परिवार की यजमानी में कुछ गाँव आते थे जहाँ वे उत्सव और विशेष अवसरों पर नाच गाकर गाँववालों का मनोरंजन करते थे। इनमें से कुछ परिवार गाँव की, मीना और अन्य जातियों के परंपरागत भाट और वंशावली संग्रहकर्ता का काम करते थे। कुछ कंजर स्त्रियाँ भीख माँगने के साथ-साथ वेश्यावृत्ति भी करती थीं। किंतु वर्तमान कंजर अपने परंपरागत धंधों को छोड़ आर्थिक दृष्टि से अधिक लाभदायक पेशों की ओर आकृष्ट हो रहे हैं।
वेशभूषा में कंजर अन्य ग्रामीण समुदायों के सदृश होते हैं। समय के साथ साथ दूसरो की तरह इनकी वेशभूषा भी बदल रही हैं|इनकी स्त्रियाँ मुसलमान स्त्रियों की भाँति लहँगे की बजाया लंबा कुरता और पाजामा पहनती हैं। खान-पान में ये कबीले जौ, बाजरे, कन्द, मूल, फल से लेकर छिपकली,बिल्ली गिरगिट और मेढ़क का मांस तक खाते हैं। छिपकली, साँडा, साँप और गिद्ध की खाल से विशेष प्रकार का तेल निकालकर ये उसे दु:साध्य रोगों की दवा कहकर बेचते हैं। भीख माँगनेवाली कंजर स्त्रियाँ प्राय: संभ्रांत कृषक महिलाओं को अपनी बातों फँसाकर बाँझपन तथा अन्य स्त्री रोगों की दवा बेचती हैं और हाथ देखकर भाग्य बताती हैं।
 कंजरों की कबीली पंचायत शक्तिशाली और सर्वमान्य सभा है। सभ्य समाज की दृष्टि से पेशेवर अपराधी माने जानेवाले कंजरों में भी कबीली नियमों के उल्लंघन की कड़ी सजा मिलती है। अपराध स्वीकृति के निराले और यातना पूर्ण ढंग अपनाए जाते हैं। कंजर कबीली देवी-देवताओं के साथ हिन्दू देवी देवताओं की भी मनौती करते हैं। विपत्ति पड़ने पर कबीली देवता 'अलमुंदी' और 'आसपाल' के क्रोध-शमन-हेतु बकरे, सुअर और मुर्गे की बलि दी जाती है। संपूर्ण भारत में एक गांव ऐसा है जहां पर इस घुमंतू जाति को स्थायी तौर पर बसाया गया है, यह ऐतिहासिक कार्य ग्राम पंचायत उमरिया, तहसील राठ जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश में लोधी समाज के बड़े जमींदार रघुवर दयाल लोधी व उनके पुत्र बृजेन्द्र सिंह उमरिया द्वारा आज से अस्सी वर्ष पूर्व किया गया था।आज भी वहां सैकड़ों कुंचबदिया परिवार स्थायी तौर पर निवास कर रहे हैं।
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बेड़िया जनजाति की जानकारी:Bediya jati ka itihas




बेडिया जनजाति मध्यप्रदेश की एक ऐसी जरायमपेशा जाति है, जो लड़कियों से सदियों से वेश्यावृत्ति कराते हैं। बेडिया की तरह ही बचड़ा, कंजर, सासी और नट तमाम ऐसी जनजातियां हैं जो इस पेशे को अपनाये हुए हैं और राजगढ़, शाहजहांपुर, गुना, सागर, शिवपुर, मुरैना, शिवपुरी सागर और विदिशा में इनका अच्छा खासा नेटवर्क फैला हुआ है, यहां से लड़कियां देश के अलग-अलग हिस्सों में खासतौर पर उत्तर प्रदेश के मेर", आगरा और राजस्थान वेश्यावृत्ति के बाजारों में भेजी जाती हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश के लगभग 16 जिलों में लगभग 18,000 बेडिया जनजाति के लोग फैले हुए हैं। मूलरूप से यह नृत्य और संगीत, काला जादू के काम से जुड़ी ऐसी जनजाति है, जो घर की बड़ी बेटी से वेश्यावृत्ति कराकर अपना गुजारा चलाते हैं। लेकिन उनका यह धंधा अब इस कदर फल फूल रहा है कि आजकल बेडिया लड़कियां दिल्ली और मुंबई और दूसरे बड़े शहरों के रेट लाइट एरिया में इस धंधे को करती हैं।

बेडिया समाज सुधार संघ के अध्यक्ष डॉ. अशोक सिंह बेडिया के शब्दों में `बेडिया जनजाति की लड़कियां आज पढ़ लिखकर बड़ी-बड़ी नौकरियां कर रही हैं, लेकिन उनकी स्थिति संतोषप्रद नहीं है; क्योंकि अगर बेडिया पुरुष इस काम को छोड़कर कुछ दूसरे काम करना चाहें तो सरकारी सहयोग न के बराबर है। सरकार केवल उनकी मदद करने का ढकोसला भर करती है। हां, इतना जरूर है कि प्राइवेट स्कूलों में लड़कियां पढ़ लिख रही हैं और सरकार द्वारा स्थापित स्कूलों की संख्या इनकी संख्या के हिसाब से बहुत कम है। स्थिति में काफी फर्क आया है। स्वयं सेवी संस्थाएं भी अपने स्तर पर काम कर रही हैं लेकिन वे सिर्फ रिसर्च वर्क करके इस जनजाति से संबंधित सर्वे ही करते हैं।' बेडिया जनजाति के उत्थान में मुरैना के राम स्नेही का अदभुत योगदान है, `उन्होंने अपनी जनजाति की लड़कियों के लिए बहुत कुछ किया है। उन्हें इस धंधे से बाहर निकाला है और उन्हें पढ़ लिखकर दूसरे काम करने के लिए कई प्रयास किये हैं।'

बेडिया जनजाति के बारे में यह कहा जाता है कि साल 1631 में मुमताज महल की मौत के अगले साल से ताजमहल बनना शुरु हो गया। इसके लिए ताजमहल के मुख्य आर्किटेक्ट उस्ताद अहमद लाहौरी समेत हजारों मजदूरों को दूर-दूर से बुलाया गया। बेडिया जाति के लोग दावा करते हैं कि ताजमहल को बनाने में जुटे राज मिस्त्रियों का दिल बहलाने के लिए बादशाह ने बेडिया जाति की वेश्याओं के छह गांव बसाये थे और करीब 21 साल तक ताजमहल बनता रहा और बेडिया जाति के ये गांव जिस्म फरोशी करके राज मिस्त्रियों का दिल बहलाते रहे। 21 साल के इस अरसे में एक पीढ़ी गुजर गई थी। आगरा के इतिहासविद वीरेश्वर नाथ त्रिपा"ाr के मुताबिक `बेडिया जाति के लोग इन 21 सालों में पूरी तरह जिस्म फरोश बनकर रह गये हैं। इसके पहले नाच गाना गाकर अपना पेट भरते थे, लेकिन आगरा में बेडिया जाति के लोगों को सिर्फ और सिर्फ जिस्म फरोशी के लिए जाना जाता रहा है।'

भारतीय पतिता उद्धार सभा के अध्यक्ष खैराती लाल भोला की अध्यक्षता में हुए एक सर्वेक्षण में यह बताया गया है कि बेडिया लड़कियां बाहरी लोगों का मनोरंजन करती हैं, वह अपनी जाति के पुरुषों के साथ धंधा नहीं करती। उनके अनुसार `बेडिया जनजाति में लड़की का जन्म शुभ माना जाता है और जैसे ही यहां लड़की के जन्म की सूचना मिलती है, चारो ओर इसका जश्न मनाया जाता है, पुरुषों को एक जिम्मेदारी माना जाता है। आगरा पुलिस द्वारा भी इस बात का खुलासा किया गया है कि पूरे देश में जहां कन्याओं को कोख में मार दिया जाता है, उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी समझकर उनकी भ्रूण हत्या कर दी जाती है, वहीं बेडिया जाति की महिलाएं पुरुषों के भ्रूण गिरवा देती है; क्योंकि यहां पुरुष कोई काम नहीं करते, सिर्फ बेटियों और बहनों की दलाली भर करते हैं। डॉ. अशोक सिंह बेडिया का कथन है कि `बेडिया जनजाति के उत्थान में चंपा बेन ने बहुत काम किया है। पुरुष अगर यहां अपनी बेटियों से वेश्यावृत्ति छुडवाना चाहें तो भी वह उनकी कमायी खाने का मोह नहीं त्याग पाते। क्योंकि उनके लिए सरकार के पास रोजगार की कोई "ाsस योजना नहीं है। यदि वह इस पेशे को छोड़ना चाहें तो भी यहां के पुरुष एक दूसरे को ही बरगलाते रहते हैं और वह खुद नहीं चाहते कि वे इस नरक से बाहर आयें। अगर सरकार इन्हें रोजगार दे और इनकी पहचान बेटियों से धंधा कराने वाले या बेटियों की कमायी खाने वालों की न हो चूंकि यह जो "प्पा इन पर लगा हुआ है, यही इन्हें वापस इस धंधे की ओर ले जाता है। अगर वह इससे बाहर आ जाएं तो काफी सुधार हो सकता है। बेडिया समाज के ऊपर लगा सदियों से यह धब्बा अगर मिट जाए तो उन्हें भी मुख्य धारा में लाया जा सकता है। बेडिया जनजाति की इस दूर्दशा को देखा जाए तो सवाल पैदा होता है, क्या सचमुच मोदी का नारा कि भारत बदल रहा है, सच और सार्थक हो सकता है? परंपरागत पेशे की आड में सदियों से बेडिया नट, और अन्य पिछड़ी जनजाति द्वारा किये जाने वाले देहव्यापार के धंधे ने एक नया रूप अख्तियार कर लिया है। विभिन्न सूत्र बताते हैं कि जो बेडिया पहले अपनी बेटियों से वेश्यावृत्ति कराते थे, वह राज्य के दूसरे हिस्सों से छोटी-छोटी बच्चियों को पकड़कर लाते हैं या इन्हें देहव्यापार की मंडियों से खरीदकर इन्हें देहव्यापार के लिए तैयार करते हैं। अब बेडिया अपनी बेटियों को पढ़ाकर उन्हें शिक्षा दिलाकर उनकी शादियां करके उनके घर बसाने की ख्वाहिश रखते हैं, लेकिन यही बेडिया पुरुष अपनी आरामतलबी, काहिली और मक्कारी के चलते दूसरों की बेटियों को इधर-उधर से अगुवा करके उनसे देहव्यापार कराते हैं, सच है अनादि काल से देहव्यापार का यह धंधा चला आ रहा है, पीढ़ियां बदल गई, देश बदलें, सरकारें बदली लेकिन यह धंधा नहीं बदला।

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सांसी जाती का इतिहास:sansi jati ka itihas




सांसी एक ख़ानाबदोश आपराधिक जनजाति है, जो मूलत: भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्र राजपूताना में केंद्रित रही, लेकिन 13वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा खदेड़ दी गई। अब यह जनजाति मुख्यत: राजस्थान में संकेंद्रित है और शेष भारत में बिखरी हुई भी है।
यह जनजाति अधिकांशत: राजस्थान के भरतपुर ज़िले में निवास करती है।
सांसी लोग राजपूतों से अपनी वंशोत्पत्ति का दावा करते हैं, लेकिन लोककथा के अनुसार इनके पूर्वज बेड़िया थे, जो एक अन्य आपराधिक जाति है।
एक अन्य मत के अनुसार सांसी जनजाति की उत्पति 'सांसमल' नामक व्यक्ति से मानी जाती है।
जीवन यापन के लिए पशुओं की चोरी तथा अन्य छोटे-छोटे अपराधों पर निर्भर रहने वाले सांसियों का उल्लेख अपराधी जनजाति क़ानूनों 1871, 1911 और 1924 में किया गया है, जिनमें उनके ख़ानाबदोश जीवन को ग़ैर क़ानूनी कहा गया।
'भारत सरकार' द्वारा प्रारंभ किए गए सुधारों के कार्यान्वयन में भी कठिनाई आती रही, क्योंकि इन्हें अछूत जाति में गिना जाता है और इन्हें दी गई कोई भी भूमि या पशु इनके द्वारा बेच दी जाती है या ये उसका विनिमय कर लेते हैं।
वर्ष 1961 में इनकी संख्या लगभग 59,073 थी।
सांसी जनजाति के लोग हिन्दी भाषा बोलते हैं और स्वयं को दो वर्गों में विभाजित करते हैं-
'खरे' यानी शुद्ध
अपहरणों के परिणामस्वरूप उत्पन्न 'मल्ला' यानी अर्द्ध जातीय
इस जनजाति में कुछ लोग कृषक और श्रमिक हैं, यद्यपि अधिकांश लोग अभी भी घुमंतू जीवन जीते हैं।
सांसी लोग अपनी वंश परंपरा पितृ सत्तात्मक मानते हैं और जाटों की पारिवारिक परंपरा के अनुसार चलते हैं।
इन लोगों में युवक-युवतियों के वैवाहिक संबंध उनके माता-पिता द्वारा किये जाते है। विवाह पूर्व यौन संबंध को अत्यन्त गंभीरता से लिया जाता है।
सगाई की रस्म इनमें अनोखी होती है, जब दो खानाबदोश समूह संयोग से घूमते-घूमते एक स्थान पर मिल जाते हैं, तो सगाई हो जाती है।
सांसी जनजाति में होली और दीपावली के अवसर पर देवी माता के सम्मुख बकरों की बली दी जाती है। ये लोग वृक्षों की पूजा करते हैं।
मांस और शराब इनका प्रिय भोजन है। मांस में ये लोमड़ी और सांड़ का मांस पसन्द करते हैं।
इनका धर्म सामान्य हिन्दू धर्म है, लेकिन कुछ लोग इस्लाम में धर्मान्तरित हो गए हैं।
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