3.4.25

क्यों पत्थरकी शीला बनी अहिल्या ,किसने किया अहिल्या उद्धार !



अ हिल्या एक बहुत ही सुंदर स्त्री थी. अहिल्या को ये वरदान मिला हुआ था कि उनका योवन सदा बना रहेगा. अहिल्या की सुंदरता के आगे तो स्वर्ग की अप्सराएं भी पानी थी, इसलिए देवता भी अहिल्या के कायल हुआ करते थें. लेकिन एक श्राप के कारण अहिल्या पत्थर की शिला में तब्दील हो गई थी.
पौराणिक ग्रंथों में अहिल्या के बारे में बहुत सारी कथाएं प्रचलित हैं. तो चलिए जानते हैं आखिर किस श्राप की वजह से अहिल्या पत्थर की शिला बन गई थीं और फिर उसके बाद किस प्रकार से नया जीवनदान मिला.
पुराणों के अनुसार अहिल्या ब्रह्मा की पुत्री थी. इसलिए वो काफी ज्ञानी और सुंदर थीं. अहिल्या के बड़ी होने पर ब्रह्माजी ने उनकी शादी किसी साधु से ही करने का फैसला किया. लेकिन शर्त यह रखी कि जो कोई पृथ्वी का चक्कर लगाकर सबसे पहले आएगा, उसी का विवाह अहिल्या से होगा.अति सुंदर अहिल्या को पाने के लिए सभी देवता और अन्य गणमान्य लोग शर्त पूरी करने के लिए निकल पड़ते हैं. लेकिन अहिल्या का ध्यान गौतम ऋषि की ओर जाता है. अहिल्या उनके चेहरे से इतनी प्रभावित होती हैं कि गौतम ऋषि से ही शादी करने की बात कहती है.

विवाह से इंद्र हुए नाराज : 

महर्षि गौतम और अहिल्या का आपस में विवाह होता है. लेकिन दूसरे देवता इस शादी से बिल्कुल भी खुश नहीं होते हैं और ऐसा भी कहा जाता है कि देवराज इंद्र को भी अहिल्या काफी पसंद थी .इसीलिए जब उन्हें अहिल्या प्राप्त नहीं हुई तो इंद्र ने अपनी वासना को शांत करने के लिए एक षड्यंत्र रचा. 
  गौतम रोजाना भोर होने से पहले जग जाते और अपने नित्यकर्म निपटाने के लिए नदी किनारे जाते थे। वहां 2-3 घंटे का समय बिताकर फिर कुटिया में आते थे। इंद्र ने इसी मौके का फायदा उठाने की योजना बनाई। एक रात जब गौतम ऋषि और अहिल्या सो गए, फिर कुछ समय बाद इंद्र ने अपनी शक्ति से भोर होने का कृत्रिम आवरण बना लिया। ऋषि गौतम को लगा कि सुबह होने को है, वे रोजाना की तरह उठ गए और नित्यकर्म के लिए निकल पड़े।
  इधर इंद्र ने गौतम ऋषि का भेस धारण कर कुटिया में प्रवेश किया। अहिल्या को लगा कि उनके पति नित्यकर्म से निपटकर आ गए हैं। फिर इंद्र ने गौतम ऋषि के भेस में अहिल्या से प्यार भरी बातें की और उसके साथ संबंध बना लिए। दूसरी ओर, जब ऋषि नदी किनारे पहुंचे तो वहां के जनजीवन को देखकर उन्हें आभास हो गया कि किसी ने धोखे से सुबह का आवरण बनाया है। वे तुरंत अपनी कुटिया में पहुंचे, जहां उनके भेस में इंद्र उनकी पत्नी के साथ सो रहे थे।

गौतम ऋषि ने दिया श्राप

अहिल्या के साथ समागम करने के बाद इंद्र आश्रम से निकले. इंद्र को अपने ही आश्रम से निकलते हुए गौतम ऋषि ने देख लिया, एक ही बार में उन्हें सारी बात समझ में आ गई. इसलिए उन्होंने बिना किसी से कारण जाने अहिल्या को पत्थर बनने का श्राप दे दिया. इसके बाद कोई गलती ना होने के बावजूद भी अहिल्या ने पति के श्राप को स्वीकार किया |
अहिल्या ने गौतम ऋषि से कहा कि उन्हें बिल्कुल भी यह एहसास नहीं हुआ कि उनके भेस में कोई और शख्स उनके साथ सोया है। इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी। उनके मन में छल की कोई भावना नहीं थी। गौतम ऋषि ने अहिल्या को वरदान दिया कि कालांतर में भगवान विष्णु का अवतार राम तुम्हारे पास आएगा और उसके छूने से तुम फिर से पहले जैसी बन जाओगी। सालों बाद श्रीराम ने विष्णु के अवतार के रूप में धरती पर जन्म लिया। राम ने ही बाद में अहिल्या को छूकर उन्हें श्राप से मुक्त किया।





दूसरी तरफ अहिल्या ने भी गौतम ऋषि से कहा कि उन्हें बिल्कुल भी यह एहसास नहीं हुआ कि उनके भेस में कोई और शख्स उनके साथ सोया है। इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी। उनके मन में छल की कोई भावना नहीं थी। गौतम ऋषि ने अहिल्या को वरदान दिया कि कालांतर में भगवान विष्णु का अवतार तुम्हारे पास आएगा और उसके छूने से तुम फिर से पहले जैसी बन जाओगी। सालों बाद श्रीराम ने विष्णु के अवतार के रूप में धरती पर जन्म लिया। राम ने ही बाद में अहिल्या को छूकर उन्हें श्राप से मुक्त किया।

1.4.25

राजा शिवि और बाज की पौराणिक कहानी





दानवीर महाराजा शिवि की कहानी 

भारतीय धार्मिक कहानियों में महाराजा शिवि की कहानी (प्रमुख है। पुरुवंश में जन्मे उशीनर देश के राजा शिवि बड़े ही परोपकारी और धर्मात्मा थे । परम दानवीर राजा शिवि के द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं जाता था। प्राणियों के प्रति राजा शिवि का बड़ा स्नेह था। उनके राज्य में हमेशा सुख – शांति और स्नेह का वातावरण बना रहता था। ईश्वर भक्त राजा शिवि की चर्चा स्वर्गलोक तक होती थी। देवताओं के मुख से राजा शिवि की इस प्रसिद्धि के बारे में सुनकर इंद्र और अग्नि को विश्वास नहीं होता था। अतः उन्होंने उशीनर  नरेश की परीक्षा करने की ठानी और एक युक्ति निकाली।

महाराजा शिवि की परीक्षा

अग्नि ने कबूतर का रूप धारण किया और इंद्र ने एक बाज का रूप धारण किया। दोनों उड़ते – उड़ते राजा शिवि के राज्य में पहुँचे। उस समय राजा शिवि एक धार्मिक यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे। कबूतर उड़ते – उड़ते आर्तनाद करता हुआ राजा शिवि की गोद में आ गिरा और मनुष्य की भाषा में बोला – “ राजन ! मैं आपकी शरण आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।”
थोड़ी ही देर में कबूतर के पीछे – पीछे बाज भी वहाँ आ पहुँचा और बोला – “ राजन ! निसंदेह आप धर्मात्मा और परोपकारी राजा है। आप कृतघ्न को धन से, झूठ को सत्य से, निर्दयी को क्षमा से और क्रूर को साधुता से जीत लेते है, इसलिए आपका कोई शत्रु नहीं इसलिए आप अजातशत्रु नाम से प्रसिद्ध है। आप अपकार करने वाले का भी उपकार करते है, आप दोष खोजने वालों में भी गुण खोजते है। ऐसे महान होकर आप यह क्या कर रहे है ?
मैं क्षुधा से व्याकुल होकर भोजन की तलाश में भटक रहा था। तभी संयोग से मुझे यह पक्षी मिला और आप इसे शरण दे रहे है। यह आप अधर्म कर रहे है। कृपा करके यह कबूतर मुझे दे दीजिये। यह मेरा भोजन है।” इतने में कबूतर बोला – “ शरणार्थी की प्राण रक्षा करना आपका धर्म है । अतः आप इस बाज की बात कभी मत मानिये। यह दुष्ट बाज मुझे मार डालेगा।”

धर्मपरायण महाराजा शिवि  का जवाब


दोनों की बात सुनकर राजा शिवि बाज से बोले – “ हे बाज ! यह कबूतर तुम्हारे भय से भयभीत होकर मेरी शरण आया है, अतः यह मेरा शरणार्थी है। मैं अपनी शरण आये शरणार्थी का त्याग कैसे कर सकता हूँ ? जो मनुष्य भय, लोभ, ईर्ष्या, लज्जा या द्वेष से शरणागत की रक्षा नहीं करते या उसे त्याग देते है उन्हे ब्रह्महत्या के समान पाप लगता है। सभी जीवों को अपने प्राण प्रिय होते हैं। समर्थ और बुद्धिमान मनुष्यों को चाहिए कि असमर्थ व मृत्युभय से भयभीत जीवों की रक्षा करें। अतः हे बाज ! मृत्यु के भय से भयभीत यह कबूतर मैं तुझे नहीं दे सकता। इसके बदले तुम जो चाहो खाने के लिए मांग सकते हो। मैं तुझे वह अभीष्ट वस्तु देने को तैयार हूँ ।”
तब बाज बोला – “हे राजन ! मैं क्षुधा से पीड़ित हूँ । आप तो जानते ही है, भोजन से ही जीव उत्पन्न होता है और बढ़ता है। यदि मैं क्षुधा से मरता हूँ तो मेरे बच्चे भी मर जायेंगे। आपके एक कबूतर को बचाने से कई जीवों के प्राण जाने की संभावना है। हे राजन ! आप ऐसे कैसे धर्म का अनुसरण कर रहे है जो अधर्म को जन्म देने वाला है। बुद्धिमान मनुष्य उसी धर्म का अनुसरण करते है जो दुसरे धर्म का हनन न करें। आप अपने विवेक के तराजू से तोलिये और जो धर्म आपको अभीष्ट हो वह मुझे बताइए।”

शरणार्थी की रक्षा धर्म है

राजा शिवि बोले – “ हे बाज ! भय से व्याकुल हुए शरणार्थी की रक्षा करने से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। जो मनुष्य दया और करुणा से द्रवित होकर जीवों को अभयदान देता है, वह देह के छूटने पर सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है। धन, वस्त्र, गौ और बड़े बड़े यज्ञों का फल यथासमय नष्ट हो जाता है किन्तु भयाकुल प्राणी को दिया अभयदान कभी नष्ट नहीं होता। अतः मैं अपने सम्पूर्ण राज्य और इस देह का त्याग कर सकता हूँ, परन्तु इस भयाकुल पक्षी को नहीं छोड़ सकता।”

हे बाज ! तुझे आहार ही अभीष्ट है सो जो चाहो सो आहार के लिए मांग लो।” बाज बोला – “ हे राजन ! प्रकृति के विधान के अनुसार कबूतर ही हमारा आहार है, अतः आप इसे त्याग दीजिये।“राजा बोला – “ हे बाज ! मैं भी विधान के विपरीत नहीं जाता । शास्त्र कहता है दया धर्म का मूल है, परोपकार पूण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है। अतएव तुम जो चाहो सो दे सकता हूँ, परन्तु ये कबूतर नहीं दे सकता।”

कहानी विडिओ मे देखें 


बाज की मांग

तब बाज बोला – “ ठीक है राजन ! यदि आपका इस कबूतर के प्रति इतना ही प्रेम है तो मुझे ठीक इसके बराबर तोलकर अपना मांस दे दीजिये, जिससे मैं अपनी क्षुधा शांत कर सकूं। मुझे इससे अधिक और कुछ नहीं चाहिए ”। प्रसन्न होते हुए राजा शिवि ने कहा – “ हे बाज ! तुम जितना चाहो, उतना मांस मैं देने को तैयार हूँ। यदि यह क्षणभंगुर देह धर्म के काम न आ सके तो इसका होना व्यर्थ है।” यह कहकर राजा ने तराजू मंगवाया और उसके एक पलड़े में कबूतर को बिठा दिया और दुसरे पलड़े में वह अपना मांस काटकर रखने लगे। लेकिन कबूतर का पलड़ा जहाँ का तहाँ ही रहा। तब अंत में राजा शिवि स्वयं उस पलड़े में बैठ गये और बोले – “हे बाज ! ये लो मैं तुम्हारा आहार तुम्हारे सामने बैठा हूँ।”

पुष्प वर्षा और महाराजा शिवि 

इतने में आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी, मृदंग बजने लगे। स्वयं भगवान अपने भक्त के इस अपूर्व त्याग को देखकर प्रसन्न हो रहे थे। यह देखकर राजा शिवि विस्मय से सोचने लगे कि इस सबका क्या कारण हो सकता है ? इतने मैं वह दोनों पक्षी अंतर्ध्यान हो गये और अपने असली रूप में प्रकट हो गये।
इंद्र ने कहा – “ हे राजन ! आपके जैसा धर्म परायण और त्यागी मैंने कभी नहीं देखा। मैं इंद्र हूँ जो बाज बना था और ये अग्नि देव हैं जो कबूतर बने थे। हम दोनों तुम्हारे त्याग की परीक्षा लेने आये थे। हे राजन ! ऐसे मनुष्य विरले ही होते है जो दूसरों के उपकार के लिए अपने प्राणों का भी मोह न करें। ऐसा मनुष्य उस लोक को जाता है, जहाँ से फिर लौटना नहीं पड़ता है। अपना पेट पालने के लिए तो पशु भी जीते है, किन्तु अभिनंदनीय तो वही मनुष्य है जो दूसरों के हित के लिए जीता है।” इतना कहकर इंद्र और अग्नि देव स्वर्ग को चले गये। राजा शिवि ने अपना यज्ञ पूरा और कई वर्षो तक पृथ्वी का राज्य भोगने के बाद परमपद को प्राप्त हुए।




30.3.25

चमार ,चँवर ,मेघवाल ,मेघवंश ,जाटव जातियों का इतिहास आपको हैरान कर देगा


            चमार ,चँवर ,मेघवाल ,मेघवंश ,जाटव  जातियों  का इतिहास video                         


   चमार शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर दलितों के लिए एक अपमानजनक शब्द के रूप में किया जाता है। इसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जातिवादी गाली के रूप में वर्णित किया गया है और किसी व्यक्ति को संबोधित करने के लिए इस शब्द का उपयोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का उल्लंघन है। सिकन्दर लोदी के शासनकाल से पहले पूरे भारतीय इतिहास में 'चमार' नाम की किसी जाति का उल्लेख नहीं मिलता। आज जिन्हें हम 'चमार' जाति से संबोधित करते हैं और जिनके साथ छूआछूत का व्यवहार करते हैं, दरअसल वह वीर चंवरवंश के क्षत्रिय हैं। जिन्हें सिकन्दर लोदी ने चमार घोषित करके अपमानित करने की चेष्टा की। प्रख्यात लेखक डॅा विजय सोनकर शास्त्री ने भी गहन शोध के बाद इनके स्वर्णिम अतीत को विस्तार से बताने वाली पुस्तक "हिन्दू चर्ममारी जाति: एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास" लिखी। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस राजवंश का उल्लेख है। डॉ शास्त्री के अनुसार प्राचीनकाल में न तो चमार कोई शब्द था और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी।
चमार भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला एक दलित समुदाय है। दलित का अर्थ है। वे लोग जिन्हें दबाया गया हो, शोषित किया गया हो या जिनके अधिकार छीने गए हों। ऐतिहासिक रूप से, उन्हें जातिगत भेदभाव और छुआछूत का दंश भी झेलना पड़ा है। इसीलिए आधुनिक भारत की सकारात्मक भेदभाव प्रणाली के तहत चमार जाति की स्थिति को सुधारने के लिए उन्हें अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 
चमार जाति का इतिहास, 
चमार शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई? चमार जाति का इतिहास चमार शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई? चमार शब्द संस्कृत के शब्द 'चर्मकार' से लिया गया है। ऐतिहासिक रूप से जाटव जाति को चमार या चर्मकार के नाम से जाना जाता है। ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल टाड का मत है कि चमार समुदाय के लोग वास्तव में अफ्रीकी मूल के हैं, जिन्हें व्यापारियों द्वारा काम के लिए लाया गया था। लेकिन  अधिकांश इतिहासकार इस मत से सहमत नहीं हैं और उनका कहना है कि इस समुदाय के लोग प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में मौजूद हैं। चंवर वंश का इतिहास डॉ. विजय सोनकर ने अपनी पुस्तक 'हिन्दू चर्मकार जाति: एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंश का इतिहास' में लिखा है कि चमार वास्तव में चंवर वंश के क्षत्रिय हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है कि ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स टॉड ने राजस्थान के इतिहास में चंवर वंश के बारे में विस्तार से लिखा है। सोनकर ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि विदेशी और इस्लामी आक्रमणकारियों के आने से पहले भारत में मुसलमान, सिख और दलित नहीं थे। लेकिन आंतरिक लड़ाई के कारण वे क्षत्रिय समुदाय से अलग हो गए और उनकी गिनती निचली जाति में होने लगी। यहां यह बताना जरूरी है कि इस बात का उल्लेख किसी ऐतिहासिक पुस्तक या ग्रंथ में नहीं है, इसीलिए यह शोध का विषय है।
राणा सांगा व उनकी पत्नी झाली रानी ने चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत रैदासजी को अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे चित्तौड़ के किले में रहने की प्रार्थना की थी। संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे थे। उनके महान व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें गुरू माना और उनके अनुयायी बने। उसी का परिणाम है आज भी विशेषकर पश्चिम भारत में बड़ी संख्या में रविदासी हैं। राजस्थान में चमार जाति का बर्ताव आज भी लगभग राजपूतों जैसा ही है। औरतें लम्बा घूंघट रखती हैं आदमी ज़्यादातर मूंछे और पगड़ी रखते हैं। संत रविदास की प्रसिद्धी इतनी बढ़ने लगी कि इस्लामिक शासन घबड़ा गया सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा वह जानता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी स्वयं मुल्ला सदना फकीर शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सका और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त वैष्णव (हिन्दू) हो गया। दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार यानी अछूत चंडाल घोषित कर दिया। उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए। लेकिन उन्होंने कहा ----- ''वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान, फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान. वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार, तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार'' (रैदास रामायण) चंवरवंश के वीर क्षत्रिय जिन्हें सिकंदर लोदी ने 'चमार' बनाया और हमारे-आपके हिंदू पुरखों ने उन्हें अछूत बना कर इस्लामी बर्बरता का हाथ मजबूत किया। इस समाज ने पददलित और अपमानित होना स्वीकार किया, लेकिन विधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है।
19वीं सदी के अंत तक, चमारों ने क्षत्रिय वंश का दावा करते हुए अपने जाति इतिहास को फिर से लिखना शुरू कर दिया।[10] उदाहरण के लिए, लगभग 1910 में, यूबीएस रघुवंशी ने कानपुर से श्री चंवर पुराण प्रकाशित किया, जिसमें दावा किया गया कि चमार मूल रूप से क्षत्रिय शासकों का एक समुदाय था। उन्होंने यह जानकारी चंवर पुराण से प्राप्त करने का दावा किया, जो एक प्राचीन संस्कृत भाषा का ग्रंथ है जिसे कथित तौर पर एक ऋषि ने हिमालय की एक गुफा में खोजा था। रघुवंशी की कथा के अनुसार, भगवान विष्णु एक बार समुदाय के प्राचीन राजा चामुंडा राय के सामने शूद्र के रूप में प्रकट हुए थे। राजा ने वेदों को पढ़ने के लिए विष्णु को दंडित किया, एक शूद्र के लिए निषिद्ध कार्य। तब भगवान ने अपना असली रूप प्रकट किया, और अपने वंश को चमार बनने का श्राप दिया, जो शूद्रों से भी निम्न दर्जे का होगा। चमारों के एक वर्ग ने जाटवों के रूप में क्षत्रिय होने का दावा किया, उनका वंश कृष्ण से जुड़ा था, और इस प्रकार, उन्हें यादवों के साथ जोड़ा गया। 1917 में स्थापित जाटव पुरुषों के एक संगठन जाटव वीर महासभा ने 20वीं सदी के पहले भाग में इस तरह के दावे करते हुए कई पर्चे प्रकाशित किए। इस संगठन ने निम्न-स्थिति वाले चमारों, जैसे कि "गुलिया" के साथ भेदभाव किया, जिन्होंने क्षत्रिय होने का दावा नहीं किया था। 20वीं सदी की शुरुआत के पहले भाग में, सबसे प्रभावशाली चमार नेता स्वामी अच्युतानंद थे, जिन्होंने ब्राह्मणवाद विरोधी आदि हिंदू आंदोलन की स्थापना की, और निचली जातियों को भारत के मूल निवासियों के रूप में चित्रित किया, जिन्हें आर्य आक्रमणकारियों ने गुलाम बना लिया था।
1940 के दशक में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बी.आर. अंबेडकर के प्रभाव का प्रतिकार करने के लिए चमार राजनेता जगजीवन राम को बढ़ावा दिया; हालाँकि, वे उच्च जातियों के वर्चस्व वाली पार्टी में एक अपवाद ही रहे। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में, उत्तर प्रदेश में अंबेडकरवादी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (RPI) पर चमारों/जाटवों का वर्चस्व बना रहा, बावजूद इसके कि B.P. मौर्य जैसे नेताओं ने अपना आधार बढ़ाने की कोशिश की। 1970 के दशक में RPI के पतन के बाद, बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने चमार मतदाताओं को आकर्षित किया। इसने चमार नेताओं कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में चुनावी सफलता का अनुभव किया; मायावती जो अंततः उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। अन्य दलित समुदाय, जैसे भंगी, आरक्षण जैसे राज्य लाभों पर चमारों के एकाधिकार की शिकायत करते थे।चमारों/जाटवों द्वारा दलित राजनीति पर वर्चस्व से नाराज़ कई अन्य दलित जातियाँ संघ परिवार के प्रभाव में आ गईं।
फिर भी, उत्तर प्रदेश में बीएसपी के उदय के साथ, एक सामूहिक एकजुटता और एक समान दलित पहचान तैयार हुई, जिसके कारण विभिन्न विरोधी दलित समुदाय एक साथ आए। 
Disclaimer: इस content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे

शिव तांडव स्तोत्र :हिंदी अर्थ सहित




शिव तांडव स्तोत्र 



जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले 

गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं 

चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥१॥

जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले = जटाओं से घिरे हुए गले से जल का प्रवाह होता है, जो पवित्र स्थल है
गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌ = गले में लंबी और लंबी साँपों की माला है
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद = डमड्डमड्डमड्डम की ध्वनि से निनाद होता है
वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं = वड्डमर्व नामक ड्रम की ध्वनि से चण्डताण्डव करता है
तनोतु नः शिव: शिवम्‌ = शिव हमें शिवत्व प्रदान करें
॥१॥ = यह पहला श्लोक है

इस श्लोक में भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है, जो अपनी जटाओं से जल का प्रवाह करते हैं, अपने गले में साँपों की माला पहनते हैं, और वड्डमर्व नामक ड्रम की ध्वनि से चण्डताण्डव करते हैं




जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी

 विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।

धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके 

किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥

जटाकटा = जटाओं के समूह से घिरा हुआ
हसंभ्रम = हंसते हुए और भ्रम से भरा हुआ
भ्रमन्निलिंपनिर्झरी = जल के झरने से भरा हुआ
विलोलवीचिवल्लरी = विलोल और विचित्र तरंगों से भरा हुआ
विराजमानमूर्धनि = सिर पर विराजमान
धगद्धगद्धगज्ज्वल = धगधगधग की ध्वनि से जलते हुए
ल्ललाटपट्टपावके = ललाट पर पट्टी बांधे हुए अग्नि के समान
किशोरचंद्रशेखरे = किशोर चंद्र के समान शेखर (सिर के ऊपरी भाग) वाले
रतिः प्रतिक्षणं मम: = मेरी रति (प्रेम) प्रतिक्षण उनके लिए है
॥२॥ = यह दूसरा श्लोक है

इस श्लोक में भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है, जो अपनी जटाओं से जल का झरना बनाते हैं, अपने सिर पर विराजमान होते हैं, और अपने ललाट पर अग्नि के समान प्रकाशित होते हैं




धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर 

स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।

कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि 

क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

इस श्लोक का संधि विग्रह करते हुए भावार्थ इस प्रकार है:

धराधरेंद्रनंदिनी = धरा (पृथ्वी) और धरेंद्र (पर्वत) की नंदिनी (पुत्री)
विलासबन्धुबन्धुर = विलास (खुशी) के बन्धु (सखा) और बन्धुर (मित्र)
स्फुरद्दिगंतसंतति = स्फुरत (चमकत) दिगंत (आकाश) की संतति (संतान)
प्रमोद मानमानसे = प्रमोद (आनंद) और मान (सम्मान) के मानसे (मन में)
कृपाकटाक्षधोरणी = कृपा (दया) की कटाक्ष (नजर) धोरणी (धारण करने वाली)
निरुद्धदुर्धरापदि = निरुद्ध (रोके हुए) दुर्धरा (कठिन) आपदि (विपत्ति) में
क्वचिद्विगम्बरे = क्वचित (कभी) विगम्बरे (वस्त्रों से रहित)
मनोविनोदमेतु वस्तुनि = मनोविनोद (आनंद) के लिए वस्तुनि (वस्तु में)

॥३॥ = यह तीसरा श्लोक है

इस श्लोक में भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है, जो धरा और धरेंद्र की नंदिनी हैं, विलास के बन्धु और बन्धुर हैं, और स्फुरत दिगंत की संतति हैं। वे कृपा की कटाक्ष धोरणी हैं और निरुद्ध दुर्धरा आपदि में मनोविनोद के लिए वस्तुनि में प्रसन्न होते हैं

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे,
अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं,
जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं,
जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है,
और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं।


जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा 

कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।

मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे 

मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥

जटाभुजंगपिंगल = जटाओं से घिरे हुए भुजंग (साँप) के पिंगल (भूरे रंग) के समान
स्फुरत्फणामणिप्रभा = स्फुरत (चमकत) फणा (साँप की फन) माणिक्य (मोती) प्रभा (प्रकाश) के समान
कदंबकुंकुमद्रव = कदंब (फूल) कुंकुम (लाल रंग का पाउडर) द्रव (तरल) के समान
प्रलिप्तदिग्वधूमुखे = प्रलिप्त (लिपटे हुए) दिग्व (दिशाओं को) धूमुखे (धुएं के मुख के समान)
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे = मदांध (मद में अंधे) सिंधु (समुद्र) रस्फुरत (फेनिल) त्वगु (त्वचा) उत्तरीय (उत्तरीय वस्त्र) मेदुरे (मेदुरे के समान)
मनोविनोदद्भुतं = मनोविनोद (आनंद) द्भुतं (अद्भुत)
बिंभर्तुभूत भर्तरि = बिंभर्तु (बिंब को धारण करने वाला) भूत (भूतों को) भर्तरि (पति के रूप में)

॥४॥ = यह चौथा श्लोक है

इस श्लोक में भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है, जो जटाओं से घिरे हुए भुजंग के पिंगल के समान हैं, स्फुरत फणा माणिक्य प्रभा के समान हैं, और कदंब कुंकुम द्रव के समान हैं। वे मदांध सिंधु रस्फुरत त्वगु उत्तरीय मेदुरे के समान हैं और मनोविनोद द्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि हैं

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं,
उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है,
ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है,
जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है।


सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर

 प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।

भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः 

श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥

सहस्रलोचन = सहस्र (हज़ार) लोचन (आँखें)
प्रभृत्यशेषलेखशेखर = प्रभृति (प्रारंभ से) अशेष (अनंत) लेख (चित्र) शेखर (शिखर)
प्रसूनधूलिधोरणी = प्रसून (फूलों की) धूलि (धूल) धोरणी (धारण करने वाली)
विधूसरां = विधु (चंद्रमा) सुरां (देवताओं के लिए)
घ्रिपीठभूः = घ्रि (अग्नि) पीठ (आधार) भूः (पृथ्वी)
भुजंगराजमालया = भुजंग (साँप) राज (राजा) मालया (माला से)
निबद्धजाटजूटकः = निबद्ध (बंधे हुए) जाट (जटा) जूटकः (जूट के समान)
श्रियैचिरायजायतां = श्रियै (श्री के साथ) चिराय (चिरकाल से) जायतां (जन्म लेते हैं)
चकोरबंधुशेखरः = चकोर (चकोर पक्षी) बंधु (बंधु के समान) शेखरः (शिखर)

॥५॥ = यह पाँचवाँ श्लोक है

इस श्लोक में भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है, जो सहस्र लोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर हैं, प्रसूनधूलिधोरणी हैं, और विधूसरां घ्रिपीठभूः हैं। वे भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः हैं और श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः हैं।


भगवान शिव हमें संपन्नता दें,
जिनका मुकुट चंद्रमा है,
जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं,
जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है,
जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है।


ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा

 निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।

सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं 

महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥

इस श्लोक का संधि विग्रह करते हुए भावार्थ इस प्रकार है:

ललाटचत्वरज्वल = ललाट (माथे) पर चत्वर (चौकोर) ज्वल (प्रकाश)
द्धनंजयस्फुलिंगभा = द्धनंजय (अग्नि) स्फुलिंग (चिंगारी) भा (प्रकाश)
निपीतपंचसायकंनम = निपीत (पीते हुए) पंच (पाँच) सायकं (बाण) नम (नमस्कार)
न्निलिंपनायकम्‌ = निलिंपनायकम्‌ (नीले रंग का आकार)
सुधामयूखलेखया = सुधा (अमृत) मयूख (किरण) लेखया (लिखने वाली)
विराजमानशेखरं = विराजमान (विराजमान) शेखरं (शिखर)
महाकपालिसंपदे = महा (महान) कपालि (कपाल) संपदे (संपदा में)
शिरोजटालमस्तुनः = शिरो (सिर) जटा (जटा) अलमस्तुनः (अलंकृत)

॥६॥ = यह छठा श्लोक है

इस श्लोक में भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है, जो ललाट पर चत्वर ज्वल द्धनंजय स्फुलिंग भा के साथ प्रकाशित होते हैं। वे निपीत पंच सायकं नम न्निलिंपनायकम्‌ के साथ अपने पाँच बाणों को पीते हुए नमस्कार करते हैं। उनका शेखर सुधामयूखलेखया से विराजमान होता है और वे महाकपालिसंपदे में शिरोजटालमस्तुनः होते हैं

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें,
जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था,
जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं,
जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं।


करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल

 द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।

धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक

प्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥

इस श्लोक का संधि विग्रह करते हुए भावार्थ इस प्रकार है:

करालभालपट्टिका = कराल (भयानक) भाल (माथे) पट्टिका (पट्टी)
धगद्धगद्धगज्ज्वल = धगधगधग (ध्वनि) ज्ज्वल (प्रकाश)
द्धनंजया = द्धनंजय (अग्नि)
धरीकृतप्रचंड पंचसायके = धरीकृत (धारण किया हुआ) प्रचंड (प्रचंड) पंचसायके (पाँच बाण)
धराधरेंद्रनंदिनी = धरा (पृथ्वी) धरेंद्र (पर्वत) नंदिनी (पुत्री)
कुचाग्रचित्रपत्रक = कुच (स्तन) अग्र (आगे) चित्र (चित्रित) पत्रक (पत्र)
प्रकल्पनैकशिल्पिनी = प्रकल्पना (कल्पना) एक (एकमात्र) शिल्पिनी (कलाकार)
त्रिलोचनेरतिर्मम = त्रिलोचन (तीन आँखों वाला) एरति (प्रेम) मम (मेरे लिए)

॥७॥ = यह सातवाँ श्लोक है

इस श्लोक में भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है, जो कराल भाल पट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया के साथ प्रकाशित होते हैं। वे धरीकृत प्रचंड पंचसायके को धारण किए हुए हैं और धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक के साथ प्रकल्पनैकशिल्पिनी हैं। भगवान शिव त्रिलोचनेरतिर्मम के साथ मेरे लिए प्रेम का प्रतीक हैं

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं,
जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया,
उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्... की घ्वनि से जलती है,
वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर,
सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं।


नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर

 त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।

निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः 

कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥

इस श्लोक का संधि विग्रह करते हुए भावार्थ इस प्रकार है:

नवीनमेघमंडली = नवीन (नया) मेघ (बादल) मंडली (समूह)
निरुद्धदुर्धरस्फुर = निरुद्ध (रोके हुए) दुर्धर (कठिन) स्फुर (चमक)
त्कुहुनिशीथनीतमः = त्कुहु (तुम्हारी) निशीथ (रात्रि) नीतमः (नीति)
प्रबद्धबद्धकन्धरः = प्रबद्ध (बढ़े हुए) बद्ध (बंधे हुए) कन्धरः (कंधे)
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु = निलिम्प (निर्लेप) निर्झरी (झरने वाली) धर (धारण करने वाला) स्तनोतु (स्तनों को)
कृत्तिसिंधुरः = कृत्ति (केश) सिंधुरः (सिंदूर)
कलानिधानबंधुरः = कला (कला) निधान (निधान) बंधुरः (बंधु)
श्रियं जगंद्धुरंधरः = श्रियं (श्री) जगंद्धुरंधरः (जगत के धारण करने वाले)

॥८॥ = यह आठवाँ श्लोक है

इस श्लोक में भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है, जो नवीन मेघमंडली के साथ निरुद्ध दुर्धर स्फुर के साथ प्रकाशित होते हैं। वे त्कुहुनिशीथनीतमः के साथ प्रबद्धबद्धकन्धरः हैं और निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु के साथ कृत्तिसिंधुरः हैं। भगवान शिव कलानिधानबंधुरः हैं और श्रियं जगंद्धुरंधरः हैं


भगवान शिव हमें संपन्नता दें,
वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं,
जिनकी शोभा चंद्रमा है,
जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है,
जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है।


प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा 

विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं 

गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है,
पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ,
जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है।
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,
और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।


अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी 

रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं

 गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं
शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण,
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,
जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,
और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।


जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध

 गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।

धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगल

ध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥

शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड
तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है,
जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण,
गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई।


दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र 

जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।

तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः 

समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता,
जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि,
घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,
सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति,
सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति?


कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌

 विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः

 शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए,
अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए,
अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए,
महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?


इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम 

स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं

 विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है,
वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है।
इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।
बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।

29.3.25

बीते समय मे केमिकल इंजिनीयर रहे लोनिया समाज का गौरवशाली इतिहास | History of Noniya samaj


   नून का व्यापार करने वाले नोनिया, पहले के जमाने के कैमिकल इंजीनियर थे जो नमक, शोरा, तेजाब गंधक आदि बनाने के काम में माहिर थे। लोनिया संस्कृत शब्द ‘लवण’ से आया हैl लवण से लोन /नोन/नून हुआ और लोन से लोनिया , नून से नोनिया हो गया। लवण को हिन्दी में नमक कहते हैं।
 जाति इतिहासकार डॉ. दयाराम आलोक के मुताबिक नोनिया जाति नमक, खाड़ी और शोरा के खोजकर्ता और निर्माता जाति है जो किसी काल खंड में नमक बना कर देश ही नहीं दुनिया को अपना नमक खिलाने का काम करती थी। तोप और बंदूक के आविष्कार के शुरूआती दिनों में इनके द्वारा बनाये जानेवाले एक विस्फोटक पदार्थ शोरा के बल पर ही दुनियां में शासन करना संभव था। पहले भारतवर्ष में नमक, खाड़ी और शोरा के कुटिर उद्योग पर नोनिया समाज का ही एकाधिकार था, क्योंकि इसको बनाने की विधि इन्हें ही पता था। रेह (नमकीन मिट्टी) से यह तीनों पदार्थ कैसे बनेगा यह नोनिया लोगों को ही पता था। इसलिए प्राचीन काल में नमक बनाने वाली नोनिया जाति इस देश की आर्थिक तौर पर सबसे सम्पन्न जाति हुआ करती थी।
  देश 1947 में क्रूर अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ। यह आजादी कई आंदोलनों और कुर्बानियों के बाद मिला था। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ विद्रोह करने की शुरुआत नोनिया समाज को जाता है जिसे इतिहास ने अनदेखा कर दिया है। यह विद्रोह 1700-1800 ईस्वी के बीच अंग्रेजी सरकार के खिलाफ हुआ था। बिहार के हाजीपुर, तिरहुत, सारण और पूर्णिया शोरा उत्पादन का प्रमुख केन्द्र था। शोरे के इकट्‍ठे करने एवं तैयार करने का काम नोनिया करते थे। अंग्रेजों का नमक और शोरा पर एकाधिकार होते ही अब नमक और शोरा बनाने वाली जाति नोनिया का शोषण प्रारम्भ हो गया। जो शोरा नोनिया लोग पहले डच, पुर्तगाली और फ्रांसीसी व्यापारीयों को अपनी इच्छा से अच्छी कीमतो पर बेचा किया करते थे उसे अब अंग्रेजों ने अपने शासन और सत्ता के बल पर जबरदस्ती औने पौने दामों में खरीदना/लुटना शुरू कर दिया। नोनिया जाति के लोग अंग्रेजों के शोषण पूर्ण व्यवहार से बहुत दुखी और तंग थे।
  अंग्रेज सरकारने नमक बनाने के 5 लाख परवाने रद कर दिए थे । नोनिया चौहान समुदाय ने इसका कडा विरोध किया  लेकिन अंग्रेज  शासन  ने न्याय नहीं किया  फलस्वरूप  नोनिया  समाज  के लोग दाने दाने को मोहताज हो गए।मजबूरन दूसरे जमीदारो,बडे किसानो और ठेकेदारों के यहाँ मजदूरी करने को बाध्य होना पडा। कडी धूप मे मजदूरी एवम पोषक आहार की कमी के कारण  यह क्षत्रिय  नोनिया चौहान  समुदाय कमजोर और श्यामवर्ण होता गया।

जनकधारी सिंह नोनिया समुदाय के महापुरुष :

बहुमुखी प्रतिभा के धनी और बिहार के नोनिया समाज के भीष्म पितामह एवं अन्य पिछड़ी जातियों के अग्रदूत स्वर्गीय जनकधारी सिंह का जन्म 14 जनवरी 1914 में बिहार प्रांत के पटना जिले के दनियावा गांव के एक सम्पन्न नोनिया परिवार में हुआ था । स्कूली शिक्षा के बाद जब वे थोड़ा होशियार हुए तो उस समय देश की आजादी के लिए संघर्ष करने का दौर चल रहा था, जिससे ये अछुते नहीं रहे बल्कि अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता की लड़ाई में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
  बिना अंजाम को जाने मुकुटधारी प्रसाद चौहान ने अंग्रेजों के खिलाफ हल्ला बोल दिया वही बुद्धू नोनिया जिन्होंने सुखधारी सिंह चौहान के नेतृत्व में अंग्रेजो के खिलाफ जंग छेड़ी| पुरे सूबे के अवाम को एकजुट कर लड़ने को प्रोत्साहित किया तब अंग्रेजों ने कैद कर कई जुल्म ढाहे और अधीनता स्वीकार करने को कहा| तरह तरह के प्रलोभन दिए पर उनके इरादों और देश भक्ति को हिला नहीं सके और तेल से खौल खौलते तेल में उन्हें डाल दिया और वो वीर गति को प्राप्त हो गए| ऐस ही कई वीर सपूत हैं जो इतिहास के पन्नो में खो गए और हम उनके बलिदान को भी भुला गए|
  इस जाति के लोगों के उपनाम आमतौर पर देश के किस हिस्से से हैं, इस पर निर्भर करते हैं। वे 'चौहान', 'प्रसाद', 'मेहतो', 'नूनिया', 'सिंह चौहान', 'जमेदार', 'लोनिया', 'बेलदार'  सरनेम का इस्तेमाल करते हैं। अगर महिलाएं अपने पति का उपनाम इस्तेमाल नहीं करती हैं, तो वे आमतौर पर अपने उपनाम में 'देवी' लगाती हैं।
नोनिया समाज के लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के आस-पास के इलाकों में रहते हैं.
राज्य सरकारों ने नोनिया समाज को मल्लाह, बिंद, और बेलदार समुदायों के साथ अत्यंत पिछड़ा वर्ग में शामिल किया है.
नोनिया  मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार से मे बसते हैं और इस जाति का एक बड़ा वर्ग  ब्रिटिश राज काल में तीन पीढ़ियों से "चौहान राजपूत" बन गया था।
  कहा जाता है कि वे उत्तर प्रदेश में 1.5 मिलियन से अधिक हैं और कहा जाता है कि वे राजस्थान में सांभर नमक झील क्षेत्र से पलायन कर गए थे। वे लखनऊ, कानपुर, फर्रुखाबाद, राय बरेली, सीतापुर, लखीमपुर, आजमगढ़, वाराणसी, देवरिया, गोंडा, गोरखपुर, गाजीपुर और जौनपुर के उपजाऊ मध्य और पूर्वी जिलों में रहते हैं। ये जिले उच्च अपराध दर के लिए जाने जाते हैं। वे बिहार में भी रहते हैं और पश्चिम बंगाल में कम संख्या में, जहाँ वे संवैधानिक रूप से अनुसूचित जाति के रूप में सूचीबद्ध हैं। यह स्थिति उन्हें कई फायदे देती है।
   नोनिया समाज के अध्यक्ष  अशोक प्रसादजी  ने  सरकार के समक्ष  निम्न मांगें रखी हैं और आग्रह किया है कि  मांगे शीघ्र पूरी की जाए  और नोनिया समाज को सम्मान और अधिकार दें। 
* हमारी आबादी के हिसाब से सरकार में भागीदारी सुनिश्चित हो 
* नोनिया ,बिन्द ,बेलदार को राज्य सरकार द्वारा ST की सुविधा प्रदान करें 
*) नोनिया समाज का इतिहास एवं महापुरुषों के बारे में राज्य शिक्षा बोर्ड के द्वारा इतिहास के विषय में पढ़ाया जाए * नोनिया समाज के आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के स्नातक स्नाकोत्तर शिक्षा प्राप्ति के लिए निशुल्क व्यवस्था की जाए एवं छात्रावास की व्यवस्था की जाए 
*नोनिया समाज के पैतृक पेशा मिट्टी से नमक, सोडा कड़ी बनाने की पारंपरिक व्यवस्था को आधुनिकरण  अनुसंधान केंद्र खोला जाए और इसे नोनिया समाज के लिए आरक्षित किया जाए



क्या जान बूझकर श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध मे नहीं बचाए अभिमन्यु के प्राण?




   महाभारत की कथा में वीर योद्धाओं में एक बड़ा नाम अर्जुन पुत्र अभिमन्यु का है. अभिमन्यु ने जन्म लेने से पहले ही चक्रव्यूह में प्रवेश करने का ज्ञान प्राप्त कर लिया था लेकिन बाहर आने का मार्ग न जानने के कारण उसकी मृत्यु हो गई. अधिकांश लोग इसे ही पूरा सच मानते हैं लेकिन अभिमन्यु की मृत्यु के पीछे एक विशेष कारण था जिसकी वजह से भगवान श्री कृष्ण ने भी अभिमन्यु के प्राणों की रक्षा नहीं की थी.

जन्म से पहले ही तय थी अभिमन्यु की उम्र

अभिमन्यु के जन्म से पहले ही उसके पिता ने मृत्यु की उम्र तय कर दी थी. आपको जानकर हैरानी होगी कि अभिमन्यु के पिता अर्जुन नहीं बल्कि चंद्रदेव थे. चंद्रदेव के पुत्र प्रेम के कारण ही अभिमन्यु कम उम्र लेकर पैदा हुए थे. दरअसल, चंद्रदेव के बेटे वर्चा का जन्म अर्जुन के बेटे अभिमन्यु के रूप में हुआ था. इसका उल्लेख महाभारत में मिलता है.

अभिमन्यु थें इस देवता का रूप

अभिमन्यु महाभारत कथा के वीर योद्धाओं में से एक थें. अभिमन्यु हर व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है, इस योद्धा ने महाभारत के युद्ध में अकेले एक पूरे दिन उन सभी योद्धाओं को रोक कर रखा था, जो अकेले कई सेना के बराबर थे. और यही कारण है कि, युद्ध पर लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गए. भगवान कृष्ण ये सब खड़े होकर देखते रहे. लेकिन आपको बता दें कि यह सब एक उद्देश्य को पूरा करने के लिए किया गया था.
जब धर्म की रक्षा के लिए देवताओं ने धरती पर अवतार लिया तब अभिमन्यु के रूप में चंद्रमा के पुत्र वर्चा ने जन्म लिया था, वर्चा को भेजते समय चंद्रमा ने देवताओं से कहा, मैं अपने प्राणों से प्यारे पुत्र को नहीं दे सकता परंतु इस काम से पीछे हटना भी उचित नहीं जान पड़ता, इसलिए वर्चा मनुष्य तो बनेगा परंतु अधिक दिनों तक नहीं रहेगा, भगवान इंद्र के अंश नरावतार होगा, जो भगवान श्रीकृष्ण से मित्रता करेगा अर्थात अर्जुन, मेरा पुत्र अर्जुन का ही पुत्र होगा.

चंद्रदेव के बेटे थे अभिमन्यु

जब धर्म की स्थापना करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी पर अवतार लेने वाले थे तब सभी देवी-देवताओं ने भगवान की लीला देखने के लिए किसी ना किसी अवतार में धरती पर आने का फैसला किया. कई देवी-देवता मनुष्य बनकर धरती पर जन्मे, तो कई ने अपने अंश या अपने पुत्रों को धरती पर भेजा दिया. जैसा- सूर्य के बेटे कर्ण, इंद्र के बेटे अर्जुन. लेकिन चंद्र देव पीछे रह गए थे. उनसे कहा गया कि वो अपने पुत्र ‘वर्चा’ को पृथ्वी पर आने की आज्ञा दें. लेकिन चंद्र देव अपने पुत्र  वरचा  बहुत प्रेम करते थे और उससे दूर नहीं सह सकते.

शर्त पर विवश हुए भगवान

वर्चा ने धरती पर अभिमन्यु के रूप में जन्म लिया। अभिमन्यु अर्जुन और सुभद्रा का पुत्र था। महज 16 साल की उम्र में उसने महाभारत का युद्ध लड़ा और वीरगति को प्राप्त हुए। अभिमन्यु ने इतने कम उम्र में कौरवों की सेना में तबाही मचा दी थी। अभिमन्यु को मारने के लिए कौरव नीचता पर उतर आये और युद्ध के नियम को ताक पर रख दिया गया। अभिमन्यु ने युद्ध के दौरान दुर्योधन के बेटे लक्ष्मण, बृहदबाला, शल्यपुत्रों जैसे बड़े-बड़े योद्धाओं को मार गिराया। युद्ध के 13 वें दिन अभिमन्यु को भी छलपूर्वक चक्रव्यूह में बुलाकर मार दिया गया। चंद्रमा की शर्त पर भगवान विवश थे, इस कारण वो अभिमन्यु को बचाने नहीं गए।