प्रतिहार वंश के गोत्र-प्रवरादि- वंश – सूर्य वंश
- गोत्र – कपिल
- वेद – यजुर्वेद
- शाखा – वाजस्नेयी
- प्रवर – कश्यप, अप्सार, नैधुव
- उपवेद – धनुर्वेद
- कुल देवी – चामुंडा माता
- वर देवी – गाजन माता
- कुल देव – विष्णु भगवान
- सूत्र – पारासर
- शिखा – दाहिनी
- कुलगुरु – वशिष्ट
- निकास – उत्तर
- प्रमुख गादी – भीनमाल, मंडोर,कन्नोज
- ध्वज – लाल (सूर्य चिन्ह युक्त)
- वॄक्ष – सिरस
- पितर – नाहङराव, लूलर गोपालजी
- नदी – सरस्वती
- तीर्थ – पुष्कर राज
- मन्त्र – गायत्री जाप
- पक्षी – गरुड़
- नगारा – रणजीत
- चारण – लालस
- ढोली – सोनेलिया लाखणिया विरद – गुजरेश्वर, राणा ,
- तंवर (तोमर) वंश के गोत्र-प्रवरादि
- वंश – चंद्रवंशी
- कुल देवी – चिल्लाय माता
- शाखा – मधुनेक,वाजस्नेयी
- गोत्र – अत्रि, व्यागर, गागर्य
- प्रवर – गागर्य,कौस्तुभ,माडषय
- शिखा – दाहिनी
- भेरू – गौरा
- शस्त्र – खड़ग
- ध्वज – पंचरगा
- पुरोहित – भिवाल
- बारहठ – आपत केदार वंशी
- ढोली – रोहतान जात का
- स्थान – पाटा मानस सरोवर
- कुल वॄक्ष – गुल्लर
- प्रणाम – जय गोपाल
- निशान – कपि(चील),चन्द्रमा
- ढोल – भंवर
- नगारा – रणजीत/जय, विजय, अजय
- घोड़ा – श्वते
- निकास – हस्तिनापुर
- प्रमुख गदी – इन्द्रप्रस्थ,दिल्ली
- रंग – हरा
- नाई – क़ाला
- चमार – भारीवाल
- शंख – पिचारक
- नदी – सरस्वति,तुंगभद्रा
- वेद – यजुर्वेद
- सवारी – रथ
- देवता – शिव
- गुरु – सूर्य
- उपाधि – जावला नरेश.दिल्लीपति
- राठोड़ वंश के गोत्र-प्रवरादि
- गोत्र – गोतमस्य
- नदी – सरयू
- कुण्ड – सूर्य
- क्षेत्र – अयोध्या
- पुत्र – उषा
- पितृ – सोमसायर
- गुरु – वशिष्ठ
- पुरोहित – सोह्ड़
- कुलदेवी – नागनेचिया
- नख – दानेसरा
- वेद – शुक्ल यजुर्वेद
- घोड़ा – दलसिंगार
- तलवार – रणथली
- माला – रत्न
- वंश – इक्ष्वाकु (रघुवंशी)
- धर्म – सन्यास
- बड़ – अक्षय
- गऊ – कपिला
- नगारा – रणजीत
- निशान – पंचरंगा
- ढोल – भंवर
- दमामी – देहधङो
- भाट – सिंगेल्या
- बारहठ – रोहङिया
- शिखा – दाहिनी
- गादी – लाहोर
- चिन्ह – चील
- इष्ट – सीताराम
- सम्प्रदाय – रामानुज
- पोथी -बडवा,रानीमंगा,कुलगुरु
- शाखा – साडा तेरह (131/2)
- उपाधि – रणबंका, कमध्व्ज
- परमार वंश के गोत्र-प्रवरादि
- वंश – अग्निवंश
- कुल – सोढा परमार
- गोत्र – वशिष्ठ
- प्रवर – वशिष्ठ, अत्रि ,साकृति
- वेद – यजुर्वेद
- उपवेद – धनुर्वेद
- शाखा – वाजसनयि
- प्रथम राजधानी – उज्जेन (मालवा)
- कुलदेवी – सच्चियाय माता
- इष्टदेव – सूर्यदेव महादेव
- तलवार – रणतरे
- ढाल – हरियण
- निशान – केसरी सिंह
- ध्वजा – पीला रंग
- गढ – आबू
- शस्त्र – भाला
- गाय – कवली
- वृक्ष – कदम्ब,पीपल
- नदी – सफरा (क्षिप्रा)
- पाघ – पंचरंगी
- राजयोगी – भर्तहरी
- संत – जाम्भोजी
- पक्षी – मयूर
- प्रमुख गादी – धार नगरी
- गुहिलोत(सिसोदिया) वंश के गोत्र प्रवरादि
- वंश – सूर्यवंशी,गुहिलवंश,सिसोदिया गोत्र – वैजवापायन
- प्रवर – कच्छ, भुज, मेंष
- वेद – यजुर्वेद
- शाखा – वाजसनेयी
- गुरु – द्लोचन(वशिष्ठ)
- ऋषि – हरित
- कुलदेवी – बाण माता
- कुल देवता – श्री सूर्य नारायण
- इष्ट देव – श्री एकलिंगजी
- वॄक्ष – खेजड़ी
- नदी – सरयू
- झंडा – सूर्य युक्त
- पुरोहित – पालीवाल
- भाट – बागड़ेचा
- चारण – सोदा बारहठ
- ढोल – मेगजीत
- तलवार – अश्वपाल
- बंदूक – सिंघल
- कटार – दल भंजन
- नगारा – बेरीसाल
- पक्षी – नील कंठ
- निशान – पंच रंगा
- निर्वाण – रणजीत
- घोड़ा – श्याम कर्ण
- तालाब – भोडाला
- विरद – चुण्डावत, सारंगदेवोत
- घाट – सोरम
- ठिकाना – भिंडर
- चिन्ह – सूर्य
- शाखाए – 24
- चौहान वंश के गोत्र-प्रवरादि
- वंश – अग्निवंश
- वेद – सामवेद
- गोत्र – वत्स
- वॄक्ष – आशापाल
- नदी – सरस्वती
- पोलपात – द्सोदी
- इष्टदेव – अचलेश्वर महादेव
- कुल देवी – आशापुरा
- नगारा – रणजीत
- निशान – पीला
- झंडा – सूरज, चांद, कटारी
- शाखा – कौथुनी
- पुरोहित – सनादय(चन्दोरिया)
- भाट – राजोरा
- धुणी – सांभर
- भेरू – काला भेरव
- गढ़ – रणथम्भोर
- गुरु – वशिष्ठ
- तीर्थ – भॄगु क्षेत्र
- पक्षी – कपोत
- ऋषि – शांडिल्य
- नोबत – कालिका
- पितृ – लोटजी
- प्रणाम – जय आशापुरी
- विरद – समरी नरेश
- कछवाह वंश के गोत्र-प्रवरादि
- गोत्र – मानव, गोतम
- प्रवर – मानव, वशिष्ठ
- कुलदेव – श्री राम
- कुलदेवी – श्री जमुवाय माता जी
- इष्टदेवी – श्री जीणमाता जी
- इष्टदेव – श्री गोपीनाथ जी
- वेद – सामवेद
- शाखा – कोथुमी
- नदी – सरयू
- वॄक्ष – अखेबड़
- नगारा – रणजीत
- निशान – पंचरंगा
- छत्र – श्वेत
- पक्षी – कबूतर
- तिलक – केशर
- झाड़ी – खेजड़ी
- गुरु – वशिष्ठ
- भोजन – सुर्त
- गिलास – सुख
- पुरोहित – गंगावत, भागीरथ
- भाटी वंश के गोत्र-प्रवरादि
- वंश – चन्द्रवंश
- कुल – यदुवंशी
- कुलदेवता – लक्ष्मी नाथ जी
- कुलदेवी – स्वागिया माता
- इष्टदेव – श्री कृष्ण
- वेद – यजुर्वेद
- गोत्र – अत्रि
- छत्र – मेघाडम्भर
- ध्वज – भगवा पीला रंग
- ढोल – भंवर
- नक्कारा – अगजीत
- गुरु – रतन नाथ
- पुरोहित – पुष्करणा ब्राह्मण
- पोलपात – रतनु चारण
- नदी – यमुना
- वॄक्ष – पीपल
- राग – मांड
- विरुद – उतर भड किवाड़ भाटी
- प्रणाम – जय श्री कृष्ण
- सोलंकी वंश का गोत्र-प्रवरादि
- वंश – अग्निवंश
- गोत्र – वशिष्ठ, भारदाज
- प्रवर तीन – भारदाज, बार्हस्पत्य, अंगिरस
- वेद – यजुर्वेद
- शाखा – मध्यन्दिनी
- सूत्र – पारस्कर, ग्रहासूत्र
- इष्टदेव – विष्णु
- कुलदेवी – चण्डी, काली, खीवज
- नदी – सरस्वती
- धर्म – वैष्णव
- गादी – पाटन
- उत्पति – आबू पर्वत
- मूल पुरुष – चालुक्य देव
- निशान – पीला
- राव – लूतापड़ा
- घोड़ा – जर्द
- ढोली – बहल
- शिखापद – दाहिना
- दशहरा पूजन – खांडा
- झाला वंश के गोत्र-प्रवरादि
- वंश – सूर्य वंश
- गोत्र – मार्कण्डेय
- शाखा – मध्यनी
- कुल – मकवान(मकवाणा)
- पर्व तीन – अश्व, धमल, नील
- कुलदेवी – दुर्गा,मरमरा देवी,शक्तिमाता
- इष्टदेव – छत्रभुज महादेव
- भेरव – केवडीया
- कुलगोर – मशीलीया राव
- शाखाए – झाला,राणा
- गौङ वंश के गोत्र-प्रवरादि
- वंश – सूर्य वंश
- गोत्र — भारद्वाज
- प्रवर तीन – भारद्वाज,बाईस्पत्य, अंगिरस
- वेद – यजुर्वेद
- शाखा – वाजसनेयि
- सूत्र – पारस्कर
- कुलदेवी – महाकाली
- इष्टदेव – रुद्रदेव
- वॄक्ष – केला
- बल्ला वंश के गोत्र-प्रवरादि
- वंश – इक्ष्वाकु-सुर्यवंश
- गोत्र – कश्यप
- प्रवर – कश्यप, अवत्सार, नेधृव
- वेद – यजुर्वेद
- शाखा – माध्यन्दिनी
- आचारसुत्र – गोभिलग्रहासूत्र
- गुरु – वशिष्ठ
- ऋषि – कुण्डलेश्वर
- पितृ – पारियात्र
- कुलदेवी – अम्बा, कालिका, चावण्ड
- इष्टदेव – शिव
- आराध्यदेव – कासब पुत्र सूर्य
- मन्त्र – ॐ धृणी सूर्याय नम:
- भेरू – काल भेरू
- नदी – सरयू
- क्षेत्र – बल क्षेत्र
- वॄक्ष – अक्षय
- प्रणाम – जय श्री राम
- दहिया वंश के गोत्र-प्रवरादि
- वंश – सूर्य वंश बाद में ऋषि वंश
- गोत्र – गोतम
- प्रवर – अलो, नील-जल साम
- कुल देवी – कैवाय माता
- इष्टदेव – भेरू काला
- कुल देव – महादेव
- कुल क्षेत्र – काशी
- राव – चंडिया-एरो
- घोड़ा – श्याम कर्ण
- नगारा – रणजीत
- नदी – गंगा
- कुल वृक्ष – नीम और कदम
- पोलपात – काछेला चारण
- निकास – थानेर गढ
- उपाधि – राजा, राणा, रावत
- पक्षी – कबूतर
- ब्राह्मण – उपाध्याय
- तलवार – रण थली
- प्रणाम – जय कैवाय माता
- गाय – सुर
- शगुन – पणिहारी
- वेद – यजुर्वेद
- निशान – पंच रंगी
- शाखा –
- भेरव – हर्शनाथ
आस्था और अंधविश्वास के बीच बेहद महीन रेखा होती है, पता ही नहीं चलता कि कब आस्था अंधविश्वास में तब्दील हो गई. विज्ञान, वकील ,डॉक्टर की डिग्री होने के बावजूद ऐसे कई लोग गले मे काला डोरा या ताबीज धारण करते हैं और राशिफल,कुंडली के चक्कर से बाहर नहीं निकल पाते हैं -Dr.Dayaram Aalok,M.A.,Ayurved Ratna,D.I.Hom(London)
12.9.17
राजपूत वंशो के गोत्र
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राजपूत वंशो के गोत्र प्रवरादि
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9.9.17
बौद्ध धर्म के बारे मे ज्ञातव्य तथ्य
बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था। उनका जन्म कपिलवस्तु (शाक्य महाजनपद की राजधानी) के पास लुंबिनी (वर्तमान में दक्षिण मध्य नेपाल) में हुआ था। इसी स्थान पर, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक ने बुद्ध की स्मृति में एक स्तम्भ बनाया था।
सिद्धार्थ के पिता शाक्यों के राजा शुद्धोदन थे। परंपरागत कथा के अनुसार, सिद्धार्थ की माता महामाया उनके जन्म के कुछ देर बाद मर गयी थी। कहा जाता है कि उनका नाम रखने के लिये 8 ऋषियो को आमन्त्रित किया गया था, सभी ने 2 सम्भावनायें बताई थी, (1) वे एक महान राजा बनेंगे (2) वे एक साधु या परिव्राजक बनेंगे। इस भविष्य वाणी को सुनकर राजा शुद्धोदन ने अपनी योग्यता की हद तक सिद्धार्थ को साधु न बनने देने की बहुत कोशिशें की। शाक्यों का अपना एक संघ था। बीस वर्ष की आयु होने पर हर शाक्य तरुण को शाक्यसंघ में दीक्षित होकर संघ का सदस्य बनना होता था। सिद्धार्थ गौतम जब बीस वर्ष के हुये तो उन्होंने भी शाक्यसंघ की सदस्यता ग्रहण की और शाक्यसंघ के नियमानुसार सिद्धार्थ को शाक्यसंघ का सदस्य बने हुये आठ वर्ष व्यतीत हो चुके थे। वे संघ के अत्यन्त समर्पित और पक्के सदस्य थे। संघ के मामलों में वे बहुत रूचि रखते थे। संघ के सदस्य के रूप में उनका आचरण एक उदाहरण था और उन्होंने स्वयं को सबका प्रिय बना लिया था। संघ की सदस्यता के आठवें वर्ष में एक ऐसी घटना घटी जो शुद्धोदन के परिवार के लिये दुखद बन गयी और सिद्धार्थ के जीवन में संकटपूर्ण स्थिति पैदा हो गयी। शाक्यों के राज्य की सीमा से सटा हुआ कोलियों का राज्य था। रोहणी नदी दोनों राज्यों की विभाजक रेखा थी। शाक्य और कोलिय दोनों ही रोहिणी नदी के पानी से अपने-अपने खेत सींचते थे। हर फसल पर उनका आपस में विवाद होता था कि कौन रोहिणी के जल का पहले और कितना उपयोग करेगा। ये विवाद कभी-कभी झगड़े और लड़ाइयों में बदल जाते थे। जब सिद्धार्थ २८ वर्ष के थे, रोहणी के पानी को लेकर शाक्य और कोलियों के नौकरों में झगड़ा हुआ जिसमें दोनों ओर के लोग घायल हुये। झगड़े का पता चलने पर शाक्यों और कोलियों ने सोचा कि क्यों न इस विवाद को युद्ध द्वारा हमेशा के लिये हल कर लिया जाये। शाक्यों के सेनापति ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा के प्रश्न पर विचार करने के लिये शाक्यसंघ का एक अधिवेशन बुलाया और संघ के समक्ष युद्ध का प्रस्ताव रखा। सिद्धार्थ गौतम ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और कहा युद्ध किसी प्रश्न का समाधान नहीं होता, युद्ध से किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी, इससे एक दूसरे युद्ध का बीजारोपण होगा। सिद्धार्थ ने कहा मेरा प्रस्ताव है कि हम अपने में से दो आदमी चुनें और कोलियों से भी दो आदमी चुनने को कहें। फिर ये चारों मिलकर एक पांचवा आदमी चुनें। ये पांचों आदमी मिलकर झगड़े का समाधान करें। सिद्धार्थ का प्रस्ताव बहुमत से अमान्य हो गया साथ ही शाक्य सेनापति का युद्ध का प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हो गया। शाक्यसंघ और शाक्य सेनापति से विवाद न सुलझने पर अन्ततः सिद्धार्थ के पास तीन विकल्प आये। तीन विकल्पों में से उन्हें एक विकल्प चुनना था
(1) सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेना,
(2) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिए राजी होना,
(3) फाँसी पर लटकना या देश निकाला स्वीकार करना। उन्होंने तीसरा विकल्प चुना और परिव्राजक बनकर देश छोड़ने के लिए राज़ी हो गए।
परिव्राजक बनकर सर्वप्रथम सिद्धार्थ ने पाँच ब्राह्मणों के साथ अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढने शुरू किये। वे उचित ध्यान हासिल कर पाए, परंतु उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले। फ़िर उन्होने तपस्या करने की कोशिश की। वे इस कार्य में भी वे अपने गुरुओं से भी ज़्यादा, निपुण निकले, परंतु उन्हे अपने प्रश्नों के उत्तर फ़िर भी नहीं मिले। फ़िर उन्होने कुछ साथी इकठ्ठे किये और चल दिये अधिक कठोर तपस्या करने। ऐसे करते करते छः वर्ष बाद, बिना अपने प्रश्नों के उत्तर पाएं, भूख के कारण मृत्यु के करीब से गुज़रे, वे फ़िर कुछ और करने के बारे में सोचने लगे। इस समय, उन्हें अपने बचपन का एक पल याद आया, जब उनके पिता खेत तैयार करना शुरू कर रहे थे। उस समय वे एक आनंद भरे ध्यान में पड़ गये थे और उन्हे ऐसा महसूस हुआ था कि समय स्थिर हो गया है।
कठोर तपस्या छोड़कर उन्होने अष्टांगिक मार्ग ढूंढ निकाला, जो बीच का मार्ग भी कहलाता जाता है क्योंकि यह मार्ग दोनो तपस्या और असंयम की पराकाष्ठाओं के बीच में है। अपने बदन में कुछ शक्ति डालने के लिये, उन्होने एक बकरी-वाले से कुछ दूध ले लिया। वे एक पीपल के पेड़ (जो अब बोधि पेड़ कहलाता है) के नीचे बैठ गये प्रतिज्ञा करके कि वे सत्य जाने बिना उठेंगे नहीं। ३५ की उम्र पर, उन्होने बोधि पाई और वे बुद्ध बन गये। उनका पहिला धर्मोपदेश वाराणसी के पास सारनाथ मे था।
अपने बाकी के ४५ वर्ष के लिये, गौतम बुद्ध ने गंगा नदी के आस-पास अपना धर्मोपदेश दिया, धनवान और कंगाल लोगों दोनो को। उन्होने दो सन्यासियों के संघ की भी स्थापना जिन्होने बुद्ध के धर्मोपदेश को फ़ैलाना जारी रखा।
सत्य और अहिंसा के मार्ग को दिखाने वाले भगवान बुद्ध दिव्य आध्यात्मिक विभूतियों में अग्रणी माने जाते हैं। भगवान बुद्ध के बताए आठ सिद्धांत को मानने वाले भारत समेत दुनिया भर में करोड़ो लोग हैं।भगवान बुद्ध के अनुसार धम्म जीवन की पवित्रता बनाए रखना और पूर्णता प्राप्त करना है। साथ ही निर्वाण प्राप्त करना और तृष्णा का त्याग करना है। इसके अलावा भगवान बुद्ध ने सभी संस्कार को अनित्य बताया है। भगवान बुद्ध ने मानव के कर्म को नैतिक संस्थान का आधार बताया है। यानी भगवान बुद्ध के अनुसार धम्म यानी धर्म वही है। जो सबके लिए ज्ञान के द्वार खोल दे। और उन्होने ये भी बताया कि केवल विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है। विद्वान वही है जो अपने की ज्ञान की रोशनी से सबको रोशन करे। धर्म को लोगों की जिंदगी से जोड़ते हुए भगवान बुद्ध ने बताया कि करूणा शील और मैत्री अनिवार्य है। इसके अलावा सामाजिक भेद भाव मिटाने के लिए भी भगवान बुद्ध ने प्रयास करते हुए बताया था कि लोगों का मुल्यांकन जन्म के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर होना चाहिए। भगवान बुद्ध के बताए मार्ग पर दुनिया भर के करोड़ों लोग चलते है। जिससे वो सही राह पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं।तथागत गौतम बुद्ध अपने आपको भगवान या ईश्वर नहीं बताते है।
बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और महान दर्शन है। इसा पूर्व 6 वी शताब्धी में बौद्ध धर्म की स्थापना हुई है। बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध है। भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में लुंबिनी, नेपाल और महापरिनिर्वाण 483 ईसा पूर्व कुशीनगर, भारत में हुआ था। उनके महापरिनिर्वाण के अगले पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैला और अगले दो हजार वर्षों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फैल गया।
आज, हालाँकि बौद्ध धर्म में तीन सम्प्रदाय हैं: हीनयान या थेरवाद, महायान और वज्रयान, परन्तु बौद्ध धर्म एक ही है किन्तु सभी बौद्ध सम्प्रदाय बुद्ध के सिद्धान्त ही मानते है। बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है।आज पूरे विश्व में लगभग ५४ करोड़ लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी है, जो दुनिया की आबादी का ७वाँ हिस्सा है। आज चीन, जापान, वियतनाम, थाईलैण्ड, म्यान्मार, भूटान, श्रीलंका, कम्बोडिया, मंगोलिया, तिब्बत, लाओस, हांगकांग, ताइवान, मकाउ, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया एवं उत्तर कोरियासमेत कुल 18 देशों में बौद्ध धर्म 'प्रमुख धर्म' धर्म है। भारत, नेपाल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, रूस, ब्रुनेई, मलेशिया आदि देशों में भी लाखों और करोडों बौद्ध हैं|
बुद्ध की शिक्षाएँ
गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद, बौद्ध धर्म के अलग-अलग संप्रदाय उपस्थित हो गये हैं, परंतु इन सब के बहुत से सिद्धांत मिलते हैं।
तथागत बुद्ध ने अपने अनुयायिओं को चार आर्यसत्य अष्टांगिक मार्ग, दस पारमिता, पंचशील आदी शिक्षाओं को प्रदान किए हैं।
चार आर्य सत्य
तथागत बुद्ध का पहला धर्मोपदेश, जो उन्होने अपने साथ के कुछ साधुओं को दिया था, इन चार आर्य सत्यों के बारे में था। बुद्ध ने चार अार्य सत्य बताये हैं।१. दुःख
इस दुनिया में दुःख है। जन्म में, बूढे होने में, बीमारी में, मौत में, प्रियतम से दूर होने में, नापसंद चीज़ों के साथ में, चाहत को न पाने में, सब में दुःख है।२. दुःख कारण
तृष्णा, या चाहत, दुःख का कारण है और फ़िर से सशरीर करके संसार को जारी रखती है।३. दुःख निरोध
तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है।४. दुःख निरोध का मार्ग
तृष्णा से मुक्ति अष्टांगिक मार्ग के अनुसार जीने से पाई जा सकती है।
अष्टांगिक मार्ग
साँचा:Main:अष्टांगिक मार्ग
बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य सत्य का आर्य अष्टांग मार्ग है दुःख निरोध पाने का रास्ता। गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए :
१. सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य में विश्वास करना
२. सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना
३. सम्यक वाक : हानिकारक बातें और झूट न बोलना
४. सम्यक कर्म : हानिकारक कर्मों को न करना
५. सम्यक जीविका : कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हानिकारक व्यापार न करना
६. सम्यक प्रयास : अपने आप सुधरने की कोशिश करना
७. सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना
८. सम्यक समाधि : निर्वाण पाना और स्वयं का गायब होना
कुछ लोग आर्य अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है, जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को पाना आवश्यक है। और लोगों को लगता है कि इस मार्ग के स्तर सब साथ-साथ पाए जाते है। मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा, शील और समाधि।
पंचशील
भगवान बुद्ध ने अपने अनुयायिओं को पांच शीलो का पालन करने की शिक्षा दि हैं।१. अहिंसा
पालि में – पाणातिपाता वेरमनी सीक्खापदम् सम्मादीयामी !
अर्थ – मैं प्राणि-हिंसा से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।२. अस्तेय
पाली में – आदिन्नादाना वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
अर्थ – मैं चोरी से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।३. अपरिग्रह
पाली में – कामेसूमीच्छाचारा वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
अर्थ – मैं व्यभिचार से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।४. सत्य
पाली नें – मुसावादा वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
अर्थ – मैं झूठ बोलने से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।४. सभी नशा से विरत
पाली में – सुरामेरय मज्जपमादठटाना वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी।
अर्थ – मैं पक्की शराब (सुरा) कच्ची शराब (मेरय), नशीली चीजों (मज्जपमादठटाना) के सेवन से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
बोधि
गौतम बुद्ध से पाई गई ज्ञानता को बोधि कहलाते है। माना जाता है कि बोधि पाने के बाद ही संसार से छुटकारा पाया जा सकता है। सारी पारमिताओं (पूर्णताओं) की निष्पत्ति, चार आर्य सत्यों की पूरी समझ और कर्म के निरोध से ही बोधि पाई जा सकती है। इस समय, लोभ, दोष, मोह, अविद्या, तृष्णा और आत्मां में विश्वास सब गायब हो जाते है। बोधि के तीन स्तर होते है ः श्रावकबोधि, प्रत्येकबोधि और सम्यकसंबोधि। सम्यकसंबोधि बौध धर्म की सबसे उन्नत आदर्श मानी जाती है।
दर्शन एवं सिद्धान्त
गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद, बौद्ध धर्म के अलग-अलग संप्रदाय उपस्थित हो गये हैं, परंतु इन सब के बहुत से सिद्धांत मिलते हैं। सभी बौद्ध सम्प्रदाय तथागत बुद्ध के मूल सिद्धांत ही मानते हैं।मुख्य लेख : बौद्ध दर्शन
प्रतीत्यसमुत्पाद
प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि कोई भी घटना केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान होती है। प्राणियों के लिये, इसका अर्थ है कर्म और विपाक (कर्म के परिणाम) के अनुसार अनंत संसार का चक्र। क्योंकि सब कुछ अनित्य और अनात्मं (बिना आत्मा के) होता है, कुछ भी सच में विद्यमान नहीं है। हर घटना मूलतः शुन्य होती है। परंतु, मानव, जिनके पास ज्ञान की शक्ति है, तृष्णा को, जो दुःख का कारण है, त्यागकर, तृष्णा में नष्ट की हुई शक्ति को ज्ञान और ध्यान में बदलकर, निर्वाण पा सकते हैं।
क्षणिकवाद
इस दुनिया में सब कुछ क्षणिक है और नश्वर है। कुछ भी स्थायी नहीं। परन्तु वेदिक मत से विरोध है।
अनात्मवाद
क्षणिकवाद
आत्मा का अर्थ 'मै' होता है। किन्तु, प्राणी शरीर और मन से बने है, जिसमे स्थायित्व नही है। क्षण-क्षण बदलाव होता है। इसलिए, 'मै'अर्थात आत्मा नाम की कोई स्थायी चीज़ नहीं। जिसे लोग आत्मा समझते हैं, वो चेतना का अविच्छिन्न प्रवाह है। आत्मा का स्थान मन ने लिया है।
अनीश्वरवाद
बुद्ध ने ब्रह्म-जाल सूत् में सृष्टि का निर्माण कैसा हुआ, ये बताया है। सृष्टि का निर्माण होना और नष्ट होना बार-बार होता है। ईश्वर या महाब्रह्मा सृष्टि का निर्माण नही करते क्योंकि दुनिया प्रतीत्यसमुत्पाद अर्थात कार्यकरण-भाव के नियम पर चलती है। भगवान बुद्ध के अनुसार, मनुष्यों के दू:ख और सुख के लिए कर्म जिम्मेदार है, ईश्वर या महाब्रह्मा नही। पर अन्य जगह बुद्ध ने सर्वोच्च सत्य को अवर्णनीय कहा है।
शून्यतावाद
शून्यता महायान बौद्ध संप्रदाय का प्रधान दर्शन है।वह अपने ही संप्रदाय के लोगों को महत्व देते हैं।
यथार्थवाद
बौद्ध धर्म का मतलब निराशावाद नहीं है। दुख का मतलब निराशावाद नहीं है, लेकिन सापेक्षवाद और यथार्थवाद हैबुद्ध, धम्म और संघ बौद्ध धर्म के तीन त्रिरत्ने हैं। भिक्षु, भिक्षुणी, उपसका और उपसिका संघ के चार अवयव हैं
बोधिसत्व
बोधिसत्व
दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करने वाला बोधिसत्व कहलाता है। बोधिसत्व जब दस बलों या भूमियों (मुदिता, विमला, दीप्ति, अर्चिष्मती, सुदुर्जया, अभिमुखी, दूरंगमा, अचल, साधुमती, धम्म-मेघा) को प्राप्त कर लेते हैं तब "बुद्ध" कहलाते हैं। बुद्ध बनना ही बोधिसत्व के जीवन की पराकाष्ठा है। इस पहचान को बोधि (ज्ञान) नाम दिया गया है। कहा जाता है कि बुद्ध शाक्यमुनि केवल एक बुद्ध हैं - उनके पहले बहुत सारे थे और भविष्य में और होंगे। उनका कहना था कि कोई भी बुद्ध बन सकता है अगर वह दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करते हुए बोधिसत्व प्राप्त करे और बोधिसत्व के बाद दस बलों या भूमियों को प्राप्त करे। बौद्ध धर्म का अन्तिम लक्ष्य है सम्पूर्ण मानव समाज से दुःख का अंत। "मैं केवल एक ही पदार्थ सिखाता हूँ - दुःख है, दुःख का कारण है, दुःख का निरोध है, और दुःख के निरोध का मार्ग है" (बुद्ध)। बौद्ध धर्म के अनुयायी अष्टांगिक मार्ग पर चलकर न के अनुसार जीकर अज्ञानता और दुःख से मुक्ति और निर्वाण पाने की कोशिश करते हैं।
सम्प्रदाय
बौद्ध धर्म में संघ का बडा स्थान है। इस धर्म में बुद्ध, धम्म और संघ को 'त्रिरत्न' कहा जाता है। संघ के नियम के बारे में गौतम बुद्ध ने कहा था कि छोटे नियम भिक्षुगण परिवर्तन कर सकते है। उन के महापरिनिर्वाण पश्चात संघ का आकार में व्यापक वृद्धि हुआ। इस वृद्धि के पश्चात विभिन्न क्षेत्र, संस्कृति, सामाजिक अवस्था, दीक्षा, आदि के आधार पर भिन्न लोग बुद्ध धर्म से आबद्ध हुए और संघ का नियम धीरे-धीरे परिवर्तन होने लगा। साथ ही में अंगुत्तर निकाय के कालाम सुत्त में बुद्ध ने अपने अनुभव के आधार पर धर्म पालन करने की स्वतन्त्रता दी है। अतः, विनय के नियम में परिमार्जन/परिवर्तन, स्थानीय सांस्कृतिक/भाषिक पक्ष, व्यक्तिगत धर्म का स्वतन्त्रता, धर्म के निश्चित पक्ष में ज्यादा वा कम जोड आदि कारण से बुद्ध धर्म में विभिन्न सम्प्रदाय वा संघ में परिमार्जित हुए। वर्तमान में, इन संघ में प्रमुख सम्प्रदाय या पंथ थेरवाद, महायान और वज्रयान है। भारत में बौद्ध धर्म का नवयान संप्रदाय है जो पुर्णत शुद्ध, मानवतावादी और विज्ञानवादी है।
थेरवाद
साँचा:Main:थेरवाद
श्रावकयान
प्रत्येकबुद्धयान
थेरवाद बुद्ध के मौलिक उपदेश ही मानता है।
श्रीलंका, थाईलैंड, म्यान्मार, कम्बोडिया, लाओस, बांग्लादेश, नेपाल आदी देशों में थेरवाद बौद्ध धर्म का प्रभाव हैं।
महायान
साँचा:Main:महायान
बोधिसत्त्वयान
बोधिसत्त्वसुत्रयान
बोधिसत्त्वतन्त्रयान / वज्रयान
महायान में बुद्ध की पूजा करता है।
चीन, जापान, उत्तर कोरिया, वियतनाम, दक्षिण कोरिया आदी देशों में प्रभाव हैं।
वज्रयान
साँचा:Main:वज्रयान
वज्रयान को तांत्रिक बौद्ध धर्म भी कहां जाता हैं।
भूटान में राष्ट्रधर्म
भूटान, तिब्बत और मंगोलिया में प्रभाव
नवयान
साँचा:Main:नवयान
बुद्ध के मूल सिद्धांतों का अनुसरण
महायान, वज्रयान, थेरवाद के कई शुद्ध सिद्धांत
अंधविश्वास नहीं हैं।
विज्ञानवाद पर विश्वास
भारत में (मुख्यत महाराष्ट्र में) प्रभाव
प्रमुख तीर्थ
बौद्ध धर्म के तीर्थ स्थल
भगवान बुद्ध के अनुयायिओं के लिए विश्व भर में पांच मुख्य तीर्थ मुख्य माने जाते हैं :
भगवान बुद्ध के अनुयायिओं के लिए विश्व भर में पांच मुख्य तीर्थ मुख्य माने जाते हैं :
लुम्बिनी
लुम्बिनी – जहां भगवान बुद्ध का जन्म हुआ।
(2) बोधगया –
जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त हुआ।
(3) सारनाथ –
जहां से बुद्ध ने दिव्यज्ञान देना प्रारंभ किया।
(4) कुशीनगर –
जहां बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ।
(5) दीक्षाभूमि, नागपुर –
जहां भारत में बौद्ध धर्म का पुनरूत्थान हुआ।
यह स्थान नेपाल की तराई में नौतनवां रेलवे स्टेशन से 25 किलोमीटर और गोरखपुर-गोंडा लाइन के नौगढ़ स्टेशन से करीब 12 किलोमीटर दूर है। अब तो नौगढ़ से लुम्बिनी तक पक्की सडक़ भी बन गई है। ईसा पूर्व 563 में राजकुमार सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) का जन्म यहीं हुआ था। हालांकि, यहां के बुद्ध के समय के अधिकतर प्राचीन विहार नष्ट हो चुके हैं। केवल सम्राट अशोक का एक स्तंभ अवशेष के रूप में इस बात की गवाही देता है कि भगवान बुद्ध का जन्म यहां हुआ था। इस स्तंभ के अलावा एक समाधि स्तूप में बुद्ध की एक मूर्ति है। नेपाल सरकार ने भी यहां पर दो स्तूप और बनवाए हैं।
बोधगया
करीब छह साल तक जगह-जगह और विभिन्न गुरुओं के पास भटकने के बाद भी बुद्ध को कहीं परम ज्ञान न मिला। इसके बाद वे गया पहुंचे। आखिर में उन्होंने प्रण लिया कि जब तक असली ज्ञान उपलब्ध नहीं होता, वह पिपल वृक्ष के नीचे से नहीं उठेंगे, चाहे उनके प्राण ही क्यों न निकल जाएं। इसके बाद करीब छह दिन तक दिन रात एक पिपल वृक्ष के नीचे भूखे-प्यासे तप किया। आखिर में उन्हें परम ज्ञान या बुद्धत्व उपलब्ध हुआ। सिद्धार्थ गौतम अब बुद्धत्व पाकर आकाश जैसे अनंत ज्ञानी हो चूके थे। जिस पिपल वृक्ष के नीचे वह बैठे, उसे बोधि वृक्ष यानी ज्ञान का वृक्ष कहां जाता है। वहीं गया को तक बोधगया (बुद्ध गया) के नाम से जाना जाता है।
सारनाथ
बनारस छावनी स्टेशन से छह किलोमीटर, बनारस-सिटी स्टेशन से साढ़े तीन किलोमीटर और सडक़ मार्ग से सारनाथ चार किलोमीटर दूर पड़ता है। यह पूर्वोत्तर रेलवे का स्टेशन है और बनारस से यहां जाने के लिए सवारी तांगा और रिक्शा आदि मिलते हैं। सारनाथ में बौद्ध-धर्मशाला है। यह बौद्ध तीर्थ है। लाखों की संख्या में बौद्ध अनुयायी और बौद्ध धर्म में रुचि रखने वाले लोग हर साल यहां पहुंचते हैं। बौद्ध अनुयायिओं के यहां हर साल आने का सबसे बड़ा कारण यह है कि भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था। सदियों पहले इसी स्थान से उन्होंने धर्म-चक्र-प्रवर्तन प्रारंभ किया था। बौद्ध अनुयायी सारनाथ के मिट्टी, पत्थर एवं कंकरों को भी पवित्र मानते हैं। सारनाथ की दर्शनीय वस्तुओं में अशोक का चतुर्मुख सिंह स्तंभ, भगवान बुद्ध का प्राचीन मंदिर, धामेक स्तूप, चौखंडी स्तूप, आदि शामिल हैं।
कुशीनगर
कुशीनगर बौद्ध अनुयायिओं का बहुत बड़ा पवित्र तीर्थ स्थल है। भगवान बुद्ध कुशीनगर में ही महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए। कुशीनगर के समीप हिरन्यवती नदी के समीप बुद्ध ने अपनी आखरी सांस ली। रंभर स्तूप के निकट उनका अंतिम संस्कार किया गया। उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर से 55 किलोमीटर दूर कुशीनगर बौद्ध अनुयायिओं के अलावा पर्यटन प्रेमियों के लिए भी खास आकर्षण का केंद्र है। 80 वर्ष की आयु में शरीर त्याग से पहले भारी संख्या में लोग बुद्ध से मिलने पहुंचे। माना जाता है कि 120 वर्षीय ब्राह्मण सुभद्र ने बुद्ध के वचनों से प्रभावित होकर संघ से जुडऩे की इच्छा जताई। माना जाता है कि सुभद्र आखरी भिक्षु थे जिन्हें बुद्ध ने दीक्षित किया।
दीक्षाभूमी
दीक्षाभूमि, नागपुर महाराष्ट्र राज्य के नागपूर शहर में स्थित प्रवित्र एवं महत्त्वपूर्ण बौद्ध तीर्थ स्थल है। बौद्ध धर्म भारत में 12वी शताब्धी तक रहां, बाद हिंदूओं और मुस्लिमों के हिंसक आतंक से शांतिवादी बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होता गया और 12वी शताब्दी में जैसे बौद्ध धर्म भारत से गायब हो गया। 12वी से 20वी शताब्धी तक हिमालयीन प्रदेशों के अलावा पुरे भारत में बौद्ध धर्म के अनुयायिओं की संख्या बहूत ही कम रहीं। लेकिन, दलितों के मसिहा डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर ने 20वी शताब्धी के मध्य में अशोक विजयादशमी के दिन 14 अक्टूबर, 1956 को पहले स्वयं बौद्ध धम्म की दीक्षा अपनी पत्नी डॉ॰ सविता आंबेडकर के साथ ली और वे बौद्ध बने, फिर अपने 5,00,000 हिंदू दलित समर्थकों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी। बौद्ध धर्म की दीक्षा देने के लिए बाबासाहेब ने त्रिशरण, पंचशील एवं अपनी 22 प्रतिज्ञाँए अपने नव-बौद्धों को दी। अगले दिन नागपुर में 15 अक्टूबर को फिर बाबासाहेब ने 3,00,000 लोगों को धम्म दीक्षा देकर बौद्ध बनाया, तिसरे दिन 16 अक्टूबर को बाबासाहेब दीक्षा देने हेतू चंद्रपुर गये वहां भी उन्होंने भी 3,00,000 लोगों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी। इस तरह सिर्फ तीन दिन में डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर ने 10,00,000 से अधिक लोगों को बौद्ध धम्म की दिक्षा देकर विश्व के बौद्धों को जनसंख्या 10 लाख से बढा दी। यह विश्व का सबसे बडा धार्मिक रूपांतरण या धर्मांतरण माना जाता है। बौद्ध विद्वान, बोधिसत्व डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर जी ने भारत में बौद्ध धर्म का पुनरूत्थान किया। एक सर्वेक्षण के अनुसार मार्च 1959 तक लगभग 1.5 से 2 करोड़दलितों ने बौद्ध धर्म ग्रहन किया था। 1956 से आज तक हर साल यहाँ देश और विदशों से 20 से 25 लाख बुद्ध और बाबासाहेब के बौद्ध अनुयायी अभिवादन करने के लिए आते है। इस प्रवित्र एवं महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल को महाराष्ट्र सरकार द्वारा ‘अ’वर्ग पर्यटन एवं तीर्थ स्थल का दर्जा भी प्राप्त हुआ दी।
दुनिया के बौद्ध राष्ट्र और उनमें बौद्ध जनसंख्या का प्रतिशत
देश जिनमें अधिकतम बौद्ध रहते हैं[12]बौद्ध प्रतिशत
लाओस 98 %
मंगोलिया 98 %
कम्बोडिया 97 %
जापान 96 %
थाईलैण्ड 95 %
भूटान 94 %
ताइवान 93 %
हांगकांग 93 %
चीन 91 %
म्यान्मार (बर्मा) 90 %
मकाउ 90 %
तिब्बत 90 %
वियतनाम 85 %
श्रीलंका 75 %
क्रिस्मस द्वीप 75 %
उत्तर कोरिया 73 %
सिंगापुर 67 %
तूवा (रूस के गणतंत्र) 65 %
दक्षिण कोरिया 54 %
कालमिकिया (रूस के गणतंत्र) 50 %
मलेशिया 22 %
नेपाल 21 %
बुर्यातिया (रूस के गणतंत्र) 20 %
ब्रुनेई 17 %
बहुसंख्यक बौद्ध देश
आज विश्व में 20 से अधिक देशों (गणतंत्र राज्य भी) में बौद्ध धर्म बहुसंख्यक या प्रमुख धर्म के रूप में हैं।अधिकृत बौद्ध देश
विश्व में लाओस, कम्बोडिया, भूटान, थाईलैण्ड, म्यानमार और श्रीलंका यह छह देश "अधिकृत" 'बौद्ध देश' है, क्योंकी इन देशों के संविधानों में बौद्ध धर्म को ‘राजधर्म’ या ‘राष्ट्रधर्म’ का दर्जा प्राप्त है।
परिव्राजक बनकर सर्वप्रथम सिद्धार्थ ने पाँच ब्राह्मणों के साथ अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढने शुरू किये। वे उचित ध्यान हासिल कर पाए, परंतु उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले। फ़िर उन्होने तपस्या करने की कोशिश की। वे इस कार्य में भी वे अपने गुरुओं से भी ज़्यादा, निपुण निकले, परंतु उन्हे अपने प्रश्नों के उत्तर फ़िर भी नहीं मिले। फ़िर उन्होने कुछ साथी इकठ्ठे किये और चल दिये अधिक कठोर तपस्या करने। ऐसे करते करते छः वर्ष बाद, बिना अपने प्रश्नों के उत्तर पाएं, भूख के कारण मृत्यु के करीब से गुज़रे, वे फ़िर कुछ और करने के बारे में सोचने लगे। इस समय, उन्हें अपने बचपन का एक पल याद आया, जब उनके पिता खेत तैयार करना शुरू कर रहे थे। उस समय वे एक आनंद भरे ध्यान में पड़ गये थे और उन्हे ऐसा महसूस हुआ था कि समय स्थिर हो गया है।
कठोर तपस्या छोड़कर उन्होने अष्टांगिक मार्ग ढूंढ निकाला, जो बीच का मार्ग भी कहलाता जाता है क्योंकि यह मार्ग दोनो तपस्या और असंयम की पराकाष्ठाओं के बीच में है। अपने बदन में कुछ शक्ति डालने के लिये, उन्होने एक बकरी-वाले से कुछ दूध ले लिया। वे एक पीपल के पेड़ (जो अब बोधि पेड़ कहलाता है) के नीचे बैठ गये प्रतिज्ञा करके कि वे सत्य जाने बिना उठेंगे नहीं। ३५ की उम्र पर, उन्होने बोधि पाई और वे बुद्ध बन गये। उनका पहिला धर्मोपदेश वाराणसी के पास सारनाथ मे था।
अपने बाकी के ४५ वर्ष के लिये, गौतम बुद्ध ने गंगा नदी के आस-पास अपना धर्मोपदेश दिया, धनवान और कंगाल लोगों दोनो को। उन्होने दो सन्यासियों के संघ की भी स्थापना जिन्होने बुद्ध के धर्मोपदेश को फ़ैलाना जारी रखा।
सत्य और अहिंसा के मार्ग को दिखाने वाले भगवान बुद्ध दिव्य आध्यात्मिक विभूतियों में अग्रणी माने जाते हैं। भगवान बुद्ध के बताए आठ सिद्धांत को मानने वाले भारत समेत दुनिया भर में करोड़ो लोग हैं।भगवान बुद्ध के अनुसार धम्म जीवन की पवित्रता बनाए रखना और पूर्णता प्राप्त करना है। साथ ही निर्वाण प्राप्त करना और तृष्णा का त्याग करना है। इसके अलावा भगवान बुद्ध ने सभी संस्कार को अनित्य बताया है। भगवान बुद्ध ने मानव के कर्म को नैतिक संस्थान का आधार बताया है। यानी भगवान बुद्ध के अनुसार धम्म यानी धर्म वही है। जो सबके लिए ज्ञान के द्वार खोल दे। और उन्होने ये भी बताया कि केवल विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है। विद्वान वही है जो अपने की ज्ञान की रोशनी से सबको रोशन करे। धर्म को लोगों की जिंदगी से जोड़ते हुए भगवान बुद्ध ने बताया कि करूणा शील और मैत्री अनिवार्य है। इसके अलावा सामाजिक भेद भाव मिटाने के लिए भी भगवान बुद्ध ने प्रयास करते हुए बताया था कि लोगों का मुल्यांकन जन्म के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर होना चाहिए। भगवान बुद्ध के बताए मार्ग पर दुनिया भर के करोड़ों लोग चलते है। जिससे वो सही राह पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं।तथागत गौतम बुद्ध अपने आपको भगवान या ईश्वर नहीं बताते है।
बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और महान दर्शन है। इसा पूर्व 6 वी शताब्धी में बौद्ध धर्म की स्थापना हुई है। बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध है। भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में लुंबिनी, नेपाल और महापरिनिर्वाण 483 ईसा पूर्व कुशीनगर, भारत में हुआ था। उनके महापरिनिर्वाण के अगले पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैला और अगले दो हजार वर्षों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फैल गया।
आज, हालाँकि बौद्ध धर्म में तीन सम्प्रदाय हैं: हीनयान या थेरवाद, महायान और वज्रयान, परन्तु बौद्ध धर्म एक ही है किन्तु सभी बौद्ध सम्प्रदाय बुद्ध के सिद्धान्त ही मानते है। बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है।आज पूरे विश्व में लगभग ५४ करोड़ लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी है, जो दुनिया की आबादी का ७वाँ हिस्सा है। आज चीन, जापान, वियतनाम, थाईलैण्ड, म्यान्मार, भूटान, श्रीलंका, कम्बोडिया, मंगोलिया, तिब्बत, लाओस, हांगकांग, ताइवान, मकाउ, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया एवं उत्तर कोरियासमेत कुल 18 देशों में बौद्ध धर्म 'प्रमुख धर्म' धर्म है। भारत, नेपाल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, रूस, ब्रुनेई, मलेशिया आदि देशों में भी लाखों और करोडों बौद्ध हैं|
बुद्ध की शिक्षाएँ
गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद, बौद्ध धर्म के अलग-अलग संप्रदाय उपस्थित हो गये हैं, परंतु इन सब के बहुत से सिद्धांत मिलते हैं।
तथागत बुद्ध ने अपने अनुयायिओं को चार आर्यसत्य अष्टांगिक मार्ग, दस पारमिता, पंचशील आदी शिक्षाओं को प्रदान किए हैं।
चार आर्य सत्य
तथागत बुद्ध का पहला धर्मोपदेश, जो उन्होने अपने साथ के कुछ साधुओं को दिया था, इन चार आर्य सत्यों के बारे में था। बुद्ध ने चार अार्य सत्य बताये हैं।१. दुःख
इस दुनिया में दुःख है। जन्म में, बूढे होने में, बीमारी में, मौत में, प्रियतम से दूर होने में, नापसंद चीज़ों के साथ में, चाहत को न पाने में, सब में दुःख है।२. दुःख कारण
तृष्णा, या चाहत, दुःख का कारण है और फ़िर से सशरीर करके संसार को जारी रखती है।३. दुःख निरोध
तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है।४. दुःख निरोध का मार्ग
तृष्णा से मुक्ति अष्टांगिक मार्ग के अनुसार जीने से पाई जा सकती है।
अष्टांगिक मार्ग
साँचा:Main:अष्टांगिक मार्ग
बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य सत्य का आर्य अष्टांग मार्ग है दुःख निरोध पाने का रास्ता। गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए :
१. सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य में विश्वास करना
२. सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना
३. सम्यक वाक : हानिकारक बातें और झूट न बोलना
४. सम्यक कर्म : हानिकारक कर्मों को न करना
५. सम्यक जीविका : कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हानिकारक व्यापार न करना
६. सम्यक प्रयास : अपने आप सुधरने की कोशिश करना
७. सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना
८. सम्यक समाधि : निर्वाण पाना और स्वयं का गायब होना
कुछ लोग आर्य अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है, जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को पाना आवश्यक है। और लोगों को लगता है कि इस मार्ग के स्तर सब साथ-साथ पाए जाते है। मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा, शील और समाधि।
पंचशील
भगवान बुद्ध ने अपने अनुयायिओं को पांच शीलो का पालन करने की शिक्षा दि हैं।१. अहिंसा
पालि में – पाणातिपाता वेरमनी सीक्खापदम् सम्मादीयामी !
अर्थ – मैं प्राणि-हिंसा से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।२. अस्तेय
पाली में – आदिन्नादाना वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
अर्थ – मैं चोरी से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।३. अपरिग्रह
पाली में – कामेसूमीच्छाचारा वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
अर्थ – मैं व्यभिचार से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।४. सत्य
पाली नें – मुसावादा वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
अर्थ – मैं झूठ बोलने से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।४. सभी नशा से विरत
पाली में – सुरामेरय मज्जपमादठटाना वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी।
अर्थ – मैं पक्की शराब (सुरा) कच्ची शराब (मेरय), नशीली चीजों (मज्जपमादठटाना) के सेवन से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
बोधि
गौतम बुद्ध से पाई गई ज्ञानता को बोधि कहलाते है। माना जाता है कि बोधि पाने के बाद ही संसार से छुटकारा पाया जा सकता है। सारी पारमिताओं (पूर्णताओं) की निष्पत्ति, चार आर्य सत्यों की पूरी समझ और कर्म के निरोध से ही बोधि पाई जा सकती है। इस समय, लोभ, दोष, मोह, अविद्या, तृष्णा और आत्मां में विश्वास सब गायब हो जाते है। बोधि के तीन स्तर होते है ः श्रावकबोधि, प्रत्येकबोधि और सम्यकसंबोधि। सम्यकसंबोधि बौध धर्म की सबसे उन्नत आदर्श मानी जाती है।
दर्शन एवं सिद्धान्त
गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद, बौद्ध धर्म के अलग-अलग संप्रदाय उपस्थित हो गये हैं, परंतु इन सब के बहुत से सिद्धांत मिलते हैं। सभी बौद्ध सम्प्रदाय तथागत बुद्ध के मूल सिद्धांत ही मानते हैं।मुख्य लेख : बौद्ध दर्शन
प्रतीत्यसमुत्पाद
प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि कोई भी घटना केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान होती है। प्राणियों के लिये, इसका अर्थ है कर्म और विपाक (कर्म के परिणाम) के अनुसार अनंत संसार का चक्र। क्योंकि सब कुछ अनित्य और अनात्मं (बिना आत्मा के) होता है, कुछ भी सच में विद्यमान नहीं है। हर घटना मूलतः शुन्य होती है। परंतु, मानव, जिनके पास ज्ञान की शक्ति है, तृष्णा को, जो दुःख का कारण है, त्यागकर, तृष्णा में नष्ट की हुई शक्ति को ज्ञान और ध्यान में बदलकर, निर्वाण पा सकते हैं।
क्षणिकवाद
इस दुनिया में सब कुछ क्षणिक है और नश्वर है। कुछ भी स्थायी नहीं। परन्तु वेदिक मत से विरोध है।
अनात्मवाद
क्षणिकवाद
आत्मा का अर्थ 'मै' होता है। किन्तु, प्राणी शरीर और मन से बने है, जिसमे स्थायित्व नही है। क्षण-क्षण बदलाव होता है। इसलिए, 'मै'अर्थात आत्मा नाम की कोई स्थायी चीज़ नहीं। जिसे लोग आत्मा समझते हैं, वो चेतना का अविच्छिन्न प्रवाह है। आत्मा का स्थान मन ने लिया है।
अनीश्वरवाद
बुद्ध ने ब्रह्म-जाल सूत् में सृष्टि का निर्माण कैसा हुआ, ये बताया है। सृष्टि का निर्माण होना और नष्ट होना बार-बार होता है। ईश्वर या महाब्रह्मा सृष्टि का निर्माण नही करते क्योंकि दुनिया प्रतीत्यसमुत्पाद अर्थात कार्यकरण-भाव के नियम पर चलती है। भगवान बुद्ध के अनुसार, मनुष्यों के दू:ख और सुख के लिए कर्म जिम्मेदार है, ईश्वर या महाब्रह्मा नही। पर अन्य जगह बुद्ध ने सर्वोच्च सत्य को अवर्णनीय कहा है।
शून्यतावाद
शून्यता महायान बौद्ध संप्रदाय का प्रधान दर्शन है।वह अपने ही संप्रदाय के लोगों को महत्व देते हैं।
यथार्थवाद
बौद्ध धर्म का मतलब निराशावाद नहीं है। दुख का मतलब निराशावाद नहीं है, लेकिन सापेक्षवाद और यथार्थवाद हैबुद्ध, धम्म और संघ बौद्ध धर्म के तीन त्रिरत्ने हैं। भिक्षु, भिक्षुणी, उपसका और उपसिका संघ के चार अवयव हैं
बोधिसत्व
बोधिसत्व
दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करने वाला बोधिसत्व कहलाता है। बोधिसत्व जब दस बलों या भूमियों (मुदिता, विमला, दीप्ति, अर्चिष्मती, सुदुर्जया, अभिमुखी, दूरंगमा, अचल, साधुमती, धम्म-मेघा) को प्राप्त कर लेते हैं तब "बुद्ध" कहलाते हैं। बुद्ध बनना ही बोधिसत्व के जीवन की पराकाष्ठा है। इस पहचान को बोधि (ज्ञान) नाम दिया गया है। कहा जाता है कि बुद्ध शाक्यमुनि केवल एक बुद्ध हैं - उनके पहले बहुत सारे थे और भविष्य में और होंगे। उनका कहना था कि कोई भी बुद्ध बन सकता है अगर वह दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करते हुए बोधिसत्व प्राप्त करे और बोधिसत्व के बाद दस बलों या भूमियों को प्राप्त करे। बौद्ध धर्म का अन्तिम लक्ष्य है सम्पूर्ण मानव समाज से दुःख का अंत। "मैं केवल एक ही पदार्थ सिखाता हूँ - दुःख है, दुःख का कारण है, दुःख का निरोध है, और दुःख के निरोध का मार्ग है" (बुद्ध)। बौद्ध धर्म के अनुयायी अष्टांगिक मार्ग पर चलकर न के अनुसार जीकर अज्ञानता और दुःख से मुक्ति और निर्वाण पाने की कोशिश करते हैं।
सम्प्रदाय
बौद्ध धर्म में संघ का बडा स्थान है। इस धर्म में बुद्ध, धम्म और संघ को 'त्रिरत्न' कहा जाता है। संघ के नियम के बारे में गौतम बुद्ध ने कहा था कि छोटे नियम भिक्षुगण परिवर्तन कर सकते है। उन के महापरिनिर्वाण पश्चात संघ का आकार में व्यापक वृद्धि हुआ। इस वृद्धि के पश्चात विभिन्न क्षेत्र, संस्कृति, सामाजिक अवस्था, दीक्षा, आदि के आधार पर भिन्न लोग बुद्ध धर्म से आबद्ध हुए और संघ का नियम धीरे-धीरे परिवर्तन होने लगा। साथ ही में अंगुत्तर निकाय के कालाम सुत्त में बुद्ध ने अपने अनुभव के आधार पर धर्म पालन करने की स्वतन्त्रता दी है। अतः, विनय के नियम में परिमार्जन/परिवर्तन, स्थानीय सांस्कृतिक/भाषिक पक्ष, व्यक्तिगत धर्म का स्वतन्त्रता, धर्म के निश्चित पक्ष में ज्यादा वा कम जोड आदि कारण से बुद्ध धर्म में विभिन्न सम्प्रदाय वा संघ में परिमार्जित हुए। वर्तमान में, इन संघ में प्रमुख सम्प्रदाय या पंथ थेरवाद, महायान और वज्रयान है। भारत में बौद्ध धर्म का नवयान संप्रदाय है जो पुर्णत शुद्ध, मानवतावादी और विज्ञानवादी है।
थेरवाद
साँचा:Main:थेरवाद
श्रावकयान
प्रत्येकबुद्धयान
थेरवाद बुद्ध के मौलिक उपदेश ही मानता है।
श्रीलंका, थाईलैंड, म्यान्मार, कम्बोडिया, लाओस, बांग्लादेश, नेपाल आदी देशों में थेरवाद बौद्ध धर्म का प्रभाव हैं।
महायान
साँचा:Main:महायान
बोधिसत्त्वयान
बोधिसत्त्वसुत्रयान
बोधिसत्त्वतन्त्रयान / वज्रयान
महायान में बुद्ध की पूजा करता है।
चीन, जापान, उत्तर कोरिया, वियतनाम, दक्षिण कोरिया आदी देशों में प्रभाव हैं।
वज्रयान
साँचा:Main:वज्रयान
वज्रयान को तांत्रिक बौद्ध धर्म भी कहां जाता हैं।
भूटान में राष्ट्रधर्म
भूटान, तिब्बत और मंगोलिया में प्रभाव
नवयान
साँचा:Main:नवयान
बुद्ध के मूल सिद्धांतों का अनुसरण
महायान, वज्रयान, थेरवाद के कई शुद्ध सिद्धांत
अंधविश्वास नहीं हैं।
विज्ञानवाद पर विश्वास
भारत में (मुख्यत महाराष्ट्र में) प्रभाव
प्रमुख तीर्थ
बौद्ध धर्म के तीर्थ स्थल
भगवान बुद्ध के अनुयायिओं के लिए विश्व भर में पांच मुख्य तीर्थ मुख्य माने जाते हैं :
भगवान बुद्ध के अनुयायिओं के लिए विश्व भर में पांच मुख्य तीर्थ मुख्य माने जाते हैं :
लुम्बिनी
लुम्बिनी – जहां भगवान बुद्ध का जन्म हुआ।
(2) बोधगया –
जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त हुआ।
(3) सारनाथ –
जहां से बुद्ध ने दिव्यज्ञान देना प्रारंभ किया।
(4) कुशीनगर –
जहां बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ।
(5) दीक्षाभूमि, नागपुर –
जहां भारत में बौद्ध धर्म का पुनरूत्थान हुआ।
यह स्थान नेपाल की तराई में नौतनवां रेलवे स्टेशन से 25 किलोमीटर और गोरखपुर-गोंडा लाइन के नौगढ़ स्टेशन से करीब 12 किलोमीटर दूर है। अब तो नौगढ़ से लुम्बिनी तक पक्की सडक़ भी बन गई है। ईसा पूर्व 563 में राजकुमार सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) का जन्म यहीं हुआ था। हालांकि, यहां के बुद्ध के समय के अधिकतर प्राचीन विहार नष्ट हो चुके हैं। केवल सम्राट अशोक का एक स्तंभ अवशेष के रूप में इस बात की गवाही देता है कि भगवान बुद्ध का जन्म यहां हुआ था। इस स्तंभ के अलावा एक समाधि स्तूप में बुद्ध की एक मूर्ति है। नेपाल सरकार ने भी यहां पर दो स्तूप और बनवाए हैं।
बोधगया
करीब छह साल तक जगह-जगह और विभिन्न गुरुओं के पास भटकने के बाद भी बुद्ध को कहीं परम ज्ञान न मिला। इसके बाद वे गया पहुंचे। आखिर में उन्होंने प्रण लिया कि जब तक असली ज्ञान उपलब्ध नहीं होता, वह पिपल वृक्ष के नीचे से नहीं उठेंगे, चाहे उनके प्राण ही क्यों न निकल जाएं। इसके बाद करीब छह दिन तक दिन रात एक पिपल वृक्ष के नीचे भूखे-प्यासे तप किया। आखिर में उन्हें परम ज्ञान या बुद्धत्व उपलब्ध हुआ। सिद्धार्थ गौतम अब बुद्धत्व पाकर आकाश जैसे अनंत ज्ञानी हो चूके थे। जिस पिपल वृक्ष के नीचे वह बैठे, उसे बोधि वृक्ष यानी ज्ञान का वृक्ष कहां जाता है। वहीं गया को तक बोधगया (बुद्ध गया) के नाम से जाना जाता है।
सारनाथ
बनारस छावनी स्टेशन से छह किलोमीटर, बनारस-सिटी स्टेशन से साढ़े तीन किलोमीटर और सडक़ मार्ग से सारनाथ चार किलोमीटर दूर पड़ता है। यह पूर्वोत्तर रेलवे का स्टेशन है और बनारस से यहां जाने के लिए सवारी तांगा और रिक्शा आदि मिलते हैं। सारनाथ में बौद्ध-धर्मशाला है। यह बौद्ध तीर्थ है। लाखों की संख्या में बौद्ध अनुयायी और बौद्ध धर्म में रुचि रखने वाले लोग हर साल यहां पहुंचते हैं। बौद्ध अनुयायिओं के यहां हर साल आने का सबसे बड़ा कारण यह है कि भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था। सदियों पहले इसी स्थान से उन्होंने धर्म-चक्र-प्रवर्तन प्रारंभ किया था। बौद्ध अनुयायी सारनाथ के मिट्टी, पत्थर एवं कंकरों को भी पवित्र मानते हैं। सारनाथ की दर्शनीय वस्तुओं में अशोक का चतुर्मुख सिंह स्तंभ, भगवान बुद्ध का प्राचीन मंदिर, धामेक स्तूप, चौखंडी स्तूप, आदि शामिल हैं।
कुशीनगर
कुशीनगर बौद्ध अनुयायिओं का बहुत बड़ा पवित्र तीर्थ स्थल है। भगवान बुद्ध कुशीनगर में ही महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए। कुशीनगर के समीप हिरन्यवती नदी के समीप बुद्ध ने अपनी आखरी सांस ली। रंभर स्तूप के निकट उनका अंतिम संस्कार किया गया। उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर से 55 किलोमीटर दूर कुशीनगर बौद्ध अनुयायिओं के अलावा पर्यटन प्रेमियों के लिए भी खास आकर्षण का केंद्र है। 80 वर्ष की आयु में शरीर त्याग से पहले भारी संख्या में लोग बुद्ध से मिलने पहुंचे। माना जाता है कि 120 वर्षीय ब्राह्मण सुभद्र ने बुद्ध के वचनों से प्रभावित होकर संघ से जुडऩे की इच्छा जताई। माना जाता है कि सुभद्र आखरी भिक्षु थे जिन्हें बुद्ध ने दीक्षित किया।
दीक्षाभूमी
दीक्षाभूमि, नागपुर महाराष्ट्र राज्य के नागपूर शहर में स्थित प्रवित्र एवं महत्त्वपूर्ण बौद्ध तीर्थ स्थल है। बौद्ध धर्म भारत में 12वी शताब्धी तक रहां, बाद हिंदूओं और मुस्लिमों के हिंसक आतंक से शांतिवादी बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होता गया और 12वी शताब्दी में जैसे बौद्ध धर्म भारत से गायब हो गया। 12वी से 20वी शताब्धी तक हिमालयीन प्रदेशों के अलावा पुरे भारत में बौद्ध धर्म के अनुयायिओं की संख्या बहूत ही कम रहीं। लेकिन, दलितों के मसिहा डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर ने 20वी शताब्धी के मध्य में अशोक विजयादशमी के दिन 14 अक्टूबर, 1956 को पहले स्वयं बौद्ध धम्म की दीक्षा अपनी पत्नी डॉ॰ सविता आंबेडकर के साथ ली और वे बौद्ध बने, फिर अपने 5,00,000 हिंदू दलित समर्थकों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी। बौद्ध धर्म की दीक्षा देने के लिए बाबासाहेब ने त्रिशरण, पंचशील एवं अपनी 22 प्रतिज्ञाँए अपने नव-बौद्धों को दी। अगले दिन नागपुर में 15 अक्टूबर को फिर बाबासाहेब ने 3,00,000 लोगों को धम्म दीक्षा देकर बौद्ध बनाया, तिसरे दिन 16 अक्टूबर को बाबासाहेब दीक्षा देने हेतू चंद्रपुर गये वहां भी उन्होंने भी 3,00,000 लोगों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी। इस तरह सिर्फ तीन दिन में डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर ने 10,00,000 से अधिक लोगों को बौद्ध धम्म की दिक्षा देकर विश्व के बौद्धों को जनसंख्या 10 लाख से बढा दी। यह विश्व का सबसे बडा धार्मिक रूपांतरण या धर्मांतरण माना जाता है। बौद्ध विद्वान, बोधिसत्व डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर जी ने भारत में बौद्ध धर्म का पुनरूत्थान किया। एक सर्वेक्षण के अनुसार मार्च 1959 तक लगभग 1.5 से 2 करोड़दलितों ने बौद्ध धर्म ग्रहन किया था। 1956 से आज तक हर साल यहाँ देश और विदशों से 20 से 25 लाख बुद्ध और बाबासाहेब के बौद्ध अनुयायी अभिवादन करने के लिए आते है। इस प्रवित्र एवं महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल को महाराष्ट्र सरकार द्वारा ‘अ’वर्ग पर्यटन एवं तीर्थ स्थल का दर्जा भी प्राप्त हुआ दी।
दुनिया के बौद्ध राष्ट्र और उनमें बौद्ध जनसंख्या का प्रतिशत
देश जिनमें अधिकतम बौद्ध रहते हैं[12]बौद्ध प्रतिशत
लाओस 98 %
मंगोलिया 98 %
कम्बोडिया 97 %
जापान 96 %
थाईलैण्ड 95 %
भूटान 94 %
ताइवान 93 %
हांगकांग 93 %
चीन 91 %
म्यान्मार (बर्मा) 90 %
मकाउ 90 %
तिब्बत 90 %
वियतनाम 85 %
श्रीलंका 75 %
क्रिस्मस द्वीप 75 %
उत्तर कोरिया 73 %
सिंगापुर 67 %
तूवा (रूस के गणतंत्र) 65 %
दक्षिण कोरिया 54 %
कालमिकिया (रूस के गणतंत्र) 50 %
मलेशिया 22 %
नेपाल 21 %
बुर्यातिया (रूस के गणतंत्र) 20 %
ब्रुनेई 17 %
बहुसंख्यक बौद्ध देश
आज विश्व में 20 से अधिक देशों (गणतंत्र राज्य भी) में बौद्ध धर्म बहुसंख्यक या प्रमुख धर्म के रूप में हैं।अधिकृत बौद्ध देश
विश्व में लाओस, कम्बोडिया, भूटान, थाईलैण्ड, म्यानमार और श्रीलंका यह छह देश "अधिकृत" 'बौद्ध देश' है, क्योंकी इन देशों के संविधानों में बौद्ध धर्म को ‘राजधर्म’ या ‘राष्ट्रधर्म’ का दर्जा प्राप्त है।
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मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ-शिवमंगल सिंह 'सुमन
सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक
हम पंछी उन्मुक्त गगन के-शिवमंगल सिंह 'सुमन'
सूरदास के पद
रात और प्रभात.-डॉ॰दयाराम आलोक
घाघ कवि के दोहे -घाघ
मुझको भी राधा बना ले नंदलाल - बालकवि बैरागी
बादल राग -सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
आओ आज करें अभिनंदन.- डॉ॰दयाराम आलोक
प्रेयसी-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
साँसो का हिसाब -शिव मंगल सिंग 'सुमन"
राम की शक्ति पूजा -सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
गांधी के अमृत वचन हमें अब याद नहीं - डॉ॰दयाराम आलोक
बिहारी कवि के दोहे
रात और प्रभात.-डॉ॰दयाराम आलोक
कबीर की साखियाँ - कबीर
सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक
बीती विभावरी जाग री! jai shankar prasad
हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
उन्हें मनाने दो दीवाली-- डॉ॰दयाराम आलोक
रश्मिरथी - रामधारी सिंह दिनकर
सुदामा चरित - नरोत्तम दास
यह वासंती शाम -डॉ.आलोक
तुमने मेरी चिर साधों को झंकृत और साकार किया है.- डॉ॰दयाराम आलोक
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से ,गोपालदास "नीरज"
गायत्री शक्तिपीठ शामगढ़ मे बालकों को पुरुष्कार वितरण
कुलदेवी का महत्व और जानकारी
किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की रामबाण औषधि
किडनी फेल रोगी का डाईट चार्ट और इलाज
प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने से पेशाब रुकावट की कारगर हर्बल औषधि
सिर्फ आपरेशन नहीं ,किडनी की पथरी की १००% सफल हर्बल औषधि
सायटिका रोग की रामबाण हर्बल औषधि
हिन्दू मंदिरों और मुक्ति धाम को सीमेंट बैंच दान का सिलसिला
डॉ.दयाराम आलोक का जीवन परिचय
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8.9.17
स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय :swami dayanand saraswati
उन्नीसवीं शताब्दी यूँ तो समाज सुधारकों और धर्म सुधारकों का युग है और इस युग में कई ऐसे महापुरुष हुए जिन्होनें समाज में व्याप्त अन्धकार को दूर कर नयी किरण दिखाने की चेष्टा की. इनमें आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती (Swami Dayananda Saraswati) का नाम सर्वप्रमुख है. स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से भारतीय संस्कृति को एक श्रेष्ठ संस्कृति के रूप में पुनर्स्थापित किया. ये हिन्दू समाज के रक्षक थे. आर्य समाज आन्दोलन भारत के बढ़ते पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था. उन्होंने “वेदों की और लौटने – Back to Veda” का नारा बुलंद किया था. आज हम दयानंद सरस्वती के जीवन और उनके द्वारा संस्थापित आर्य समाज (Arya Samaj) के विषय में पढ़ेंगे.
दयानंद सरस्वती का जन्म
स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 ई. में काठियावाड़, गुजरात में हुआ था. उनके बचपन का नाम मूलशंकर था. बालक मूलशंकर को अपने बाल्यकाल से ही सामजिक कुरीतियों और धार्मिक आडम्बरों से चिढ़ थी. स्वामी दयानंद को भारत के प्राचीन धर्म और संस्कृति में अटूट आस्था थी. उनका कहना था कि वेद भगवान् द्वारा प्रेरित हैं और समस्त ज्ञान के स्रोत हैं. उनके अनुसार वैदिक धर्म के प्रचार से ही व्यक्ति, समाज और देश की उन्नति संभव है. अतः दयानंद सरस्वती ने अपने देशवासियों को पुनः वेदों की ओर लौटने का सन्देश दिया. आर्य समाज की स्थापना के द्वारा उन्होंने हिन्दू समाज में नवचेतना का संचार किया.
कुरीतियों पर प्रहार
देश में प्रचलित सभी धार्मिक और सामजिक कुरीतियों के खिलाफ स्वामी दयानंद सरस्वती ने बड़ा कदम उठाया. उन्होंने जाति भेद, मूर्ति पूजा, सती-प्रथा, बहु विवाह, बाल विवाह, बलि-प्रथा आदि प्रथाओं का घोर विरोध किया. दयानंद सरस्वती ने पवित्र जीवन तथा प्राचीन हिन्दू आदर्श के पालन पर बल दिया. उन्होंने विधवा विवाह और नारी शिक्षा की भी वकालत की. सबसे ज्यादा उन्हें जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता से चिढ़ थी और इसे समाप्त करने के लिए उन्होंने कई कठोर कदम उठाए. आर्य समाज की स्थापना कर उन्होंने अपने सारे विचारों को मूर्त रूप प्रदान करने की चेष्टा की. 1877 ई. में लाहौर में आर्य समाज के शाखा की स्थापना की गई थी (a branch was established).
आर्य समाज (Arya Samaj) के सिद्धांत
ईश्वर एक है, वह सत्य और विद्या का मूल स्रोत है.
ईश्वर सर्वशक्तिमान, निराकार, न्यायकारी, दयालु, अजर, अमर और सर्वव्यापी है, अतः उसकी उपासना की जानी चाहिए.
सच्चा ज्ञान वेदों में निहित है और आर्यों का परम धर्म वेदों का पठन-पाठन है.
प्रत्येक व्यक्ति को सदा सत्य ग्रहण करने तथा असत्य का त्याग करने के लिए प्रस्तुत रहना चाहिए.
समस्त समाज का प्रमुख उद्देश्य मनुष्य जाति की शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक उन्नति होनी चाहिए. तभी समस्त विश्व का कल्याण संभव है.
अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए तथा पारस्परिक सम्बन्ध का आधार प्रेम, न्याय और धर्म होना चाहिए.
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी उन्नति और भलाई में ही संतुष्ट नहीं रहना चाहिए बल्कि सब की भलाई में अपनी भलाई समझनी चाहिए.
प्रत्येक आदमी को व्यक्तिगत मामलों में आचरण की स्वतंत्रता रहनी चाहिए. लेकिन सर्वहितकारी नियम पालन सर्वोपरि होना चाहिए.
स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना कर भारत के सामजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन को नई दिशा प्रदान की. वे दलितों के उत्थान, स्त्रियों के उद्धार के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व कार्य किये. उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य को प्रोत्साहन दिया. हिंदी भाषा में ग्रंथों की रचना कर इन्होंने राष्ट्रीय गौरव बढ़ाया. इनके पूर्व भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा की कोई भी व्यवस्था नहीं थी. इन्होंने स्त्रियों को शिक्षित बनाने पर बल दिया और वेद-पाठ करने की आज्ञा दी. संस्कृत भाषा के महत्त्व को पुनः स्थापित किया गया. इन्होनें ब्रह्मचर्य और चरित्र-निर्माण की दृष्टि से प्राचीन गुरुकुल प्रणाली के द्वारा छात्रों को शिक्षित करने की प्रथा शुरू की.
इस प्रकार स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से न केवल हिन्दू धर्म को नया रूप देने की चेष्टा की बल्कि समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों को दूर कर उसे शिक्षित तथा सभी बनाने का प्रयास भी किया.
दयानंद सरस्वती की मृत्यु
दयानंद सरस्वती (Swami Dayanand Saraswati’s demise) की मृत्यु के बाद आर्य समाज दो भागों में बँट गया. एक दल का नेतृत्व लाला हरदयाल करते थे जो पश्चिमी शिक्षा पद्धति के समर्थक थे, दूसरे दल का नेतृत्व महात्मा मुंशी राम करते थे जो प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के समर्थक थे. आर्य समाज के प्रयास से अनेक अनाथालयों, गोशालाओं और विधवा आश्रमों का निर्माण किया गया. इस प्रकार हम देखते हैं कि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज आन्दोलन के माध्यम से हिन्दू समाज में नवचेतना और आत्मसम्मान का संचार किया. इस आन्दोलन के द्वारा धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में जो परिवर्तन हुआ उससे एक नयी राजनीतिक चेतना का जन्म हुआ और हमने अपनी संस्कृति की रक्षा हेतु अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की.
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मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ-शिवमंगल सिंह 'सुमन
सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक
हम पंछी उन्मुक्त गगन के-शिवमंगल सिंह 'सुमन'
सूरदास के पद
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डॉ.दयाराम आलोक का जीवन परिचय
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जैन धर्म का इतिहास :history of Jain dharm
दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है. जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे. वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है. माना जाता है कि वैदिक साहित्य में जिन यतियों और व्रात्यों का उल्लेख मिलता है वे ब्राह्मण परंपरा के न होकर श्रमण परंपरा के ही थे. मनुस्मृति में लिच्छवि, नाथ, मल्ल आदि क्षत्रियों को व्रात्यों में गिना है. आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है. महाभारतकाल में इस धर्म के प्रमुख नेमिनाथ थे:
(1) जैन धर्म के संस्थापक और पहले तीर्थंकर थे- ऋषभदेव.
(2) जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे- पार्श्वनाथ
(3) पार्श्वनाथ काशी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा अग्रसेन के पुत्र थे
(4) पार्श्वनाथ को 30 साल की उम्र में वैराग्य उत्पन्न हुआ, जिस कारण वो गृह त्यागकर संयासी हो गए.
(5) पार्श्वनाथ के द्वारा दी गई शिक्षा थी- हिंसा न करना, चोरी नृ करना, हमेशा सच बोलना, संपत्ति न रखना.
(6) महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं. ;(7) महावीर का जन्म 540 ई. पू. पहले वैशाली गणतंत्र के क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था.
(8) इनके पिता राजा सिद्धार्थ ज्ञातृक कुल के सरदार थे और माता त्रिशला लिच्छिवी राजा चेटक की बहन थीं.
(9) महावीर की पत्नी का नाम यशोदा और पुत्री का नाम अनोज्जा प्रियदर्शनी था.
(10) महावीर के बचपन का नाम वर्द्धमान था.
(11) महावीर का साधना काल 12 साल 6 महीने और 15 दिन का रहा. इस अवधि में भगवान ने तप, संयम और साम्यभाव की विलक्षण साधना की. इसी समय से महावीर जिन (विजेता), अर्हत (पूज्य), निर्ग्रंध (बंधनहीन) कहलाए.
(12) महावीर ने अपना उपदेश प्राकृत यानी अर्धमाग्धी में दिया.
(13) महावीर के पहले अनुयायी उनके दामाद जामिल बने.
(14) प्रथम जैन भिक्षुणी नरेश दधिवाहन की बेटी चंपा थी.
(15) महावीर ने अपने शिष्यों को 11 गणधरों में बांटा था.
(16) आर्य सुधर्मा अकेला ऐसा गंधर्व था जो महावीर की मृत्यु के बाद भी जीवित रहा.
(17) जैन धर्म दो भागों में विभाजित है- श्वेतांबर जो सफेद कपड़े पहनते हैं और दिगंबर जो नग्नावस्था में रहते हैं.
(18) भद्रबाहु के शिष्य दिगंबर और स्थूलभद्र के शिष्य श्वेतांबर कहलाए.
(19) दूसरी जैन सभा 512 में वल्लभी गुजरात में हुई.
(20) जैन धर्म के त्रिरत्न हैं- सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक आचरण.
(21) जैन धर्म में ईश्वर नहीं आत्मा की मान्यता है.
(22) महावीर पुनर्जन्म और कर्मवाद में विश्वास रखते थे.
(23) जैन धर्म ने अपने आध्यात्मिक विचारों को सांख्य दर्शन से ग्रहण किया.
(24) जैन धर्म को मानने वाले राजा थे- उदायिन, वंदराजा, चंद्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश खारवेल, राजा अमोघवर्ष, चंदेल शासक.
(25) मौर्योत्तर युग में मथुरा जैन धर्म का प्रसिद्ध केंद्र था.
(26) जैन तीर्थंकरों की जीवनी कल्पसुत्र में है.
(27) जैन तीर्थंकरों में संस्कृत का अच्छा विद्वान नयनचंद्र था.
(28 ) मथुरा कला का संबंध जैन धर्म से है.
(29) 72 साल में महावीर की मृत्यु 468 ई. पू. में बिहार राज्य के पावापुरी में हुई थी.
(30) मल्लराजा सृस्तिपाल के राजप्रसाद में महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ था
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सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक
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