13.10.16

ओशो प्रेम और ध्यान





सुंदर स्त्री आभूषणों से मुक्त हो जाती है;
कुरूप स्त्री कभी भी
आभूषणों से मुक्त नहीं हो सकती।
सुंदर स्त्री सरल हो जाती है;
कुरूप स्त्री कभी भी नहीं हो सकती।
क्योंकि उसे पता है,
आभूषण हट जाएं,
बहुमूल्य वस्त्र हट जाएं,
सोना-चांदी हट जाए,
तो उसकी कुरूपता ही प्रकट होगी।
वही शेष रह जाएगी,
और तो वहां कुछ बचेगा न।
सुंदर स्त्री को आभूषण शोभा देते ही नहीं,
वे थोड़ी सी खटक पैदा करते हैं
उसके सौंदर्य में।
क्योंकि कोई सोना कैसे
जीवंत सौंदर्य से महत्वपूर्ण हो सकता है?
हीरे-जवाहरातों में होगी चमक,
लेकिन जीवंत सुंदर आंखों से उनकी क्या,
क्या तुलना की जा सकती है?
जैसे ही कोई स्त्री सुंदर होती है,
आभूषण-वस्त्र का दिखावा कम हो जाता है।
तब एक्झिबीशन की वृत्ति कम हो जाती है।
असल में, सुंदर स्त्री का लक्षण ही यही है
कि जिसमें प्रदर्शन की कामना न हो।
जब तक प्रदर्शन की कामना है
तब तक उसे खुद ही पता है
कि कहीं कुछ असुंदर है,
जिसे ढांकना है, छिपाना है,
प्रकट नहीं करना है।
स्त्रियां घंटों व्यतीत करती हैं दर्पण के सामने।
क्या करती हैं दर्पण के सामने घंटों?
कुरूपता को छिपाने की चेष्टा चलती है;
सुंदर को दिखाने की चेष्टा चलती है।
ठीक यही जीवन के सभी संबंधों में सही है।
अज्ञानी अपने ज्ञान को दिखाना चाहता है।
वह मौके की तलाश में रहता है;
कि जहां कहीं मौका मिले,
जल्दी अपना ज्ञान बता दे। 

ज्ञानी को कुछ अवसर की तलाश नहीं होती;
न बताने की कोई आकांक्षा होती।
जब स्थिति हो कि उसके ज्ञान की
कोई जरूरत पड़ जाए,
जब कोई प्यास से मर रहा हो
और उसको जल की जरूरत हो
तब वह दे देगा।
लेकिन प्रदर्शन का मोह चला जाएगा।
अज्ञानी इकट्ठी करता है
उपाधियां कि वह एम.ए. है,
कि पीएच.डी. है, कि डी.लिट. है,
कि कितनी ऑननेरी डिग्रियां उसने ले रखी हैं।
अगर तुम अज्ञानी के घर में जाओ
तो वह सर्टिफिकेट दीवाल पर लगा रखता है।
वह प्रदर्शन कर रहा है कि मैं जानता हूं।
लेकिन यह प्रदर्शन ही बताता है
कि भीतर उसे भी पता है
कि कुछ जानता नहीं है।
परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हैं,
प्रमाणपत्र इकट्ठे कर लिए हैं।
लेकिन जानने का न तो
परीक्षाओं से संबंध है,
न प्रमाणपत्रों से।
जानना तो जीवन के अनुभव से संबंधित है।
जानना तो जी-जीकर घटित होता है,
परीक्षाओं से उपलब्ध नहीं होता।
परीक्षाओं से तो इतना ही पता चलता है
कि तुम्हारे पास अच्छी यांत्रिक स्मृति है।
तुम वही काम कर सकते हो
जो कंप्यूटर कर सकता है।
लेकिन इससे बुद्धिमत्ता का
कोई पता नहीं चलता।
बुद्धिमत्ता बड़ी और बात है;
कालेजों, स्कूलों और
विश्वविद्यालयों में नहीं मिलती।
उसका तो एक ही विश्वविद्यालय है,
यह पूरा अस्तित्व।
यहीं जीकर, उठ कर, गिर कर,
तकलीफ से, पीड़ा से, निखार से,
जल कर आदमी धीरे-धीरे निखरता है,
परिष्कृत होता है।

“ध्यान का रहस्य” – ओशो



ध्यान कोई भारतीय विधि नहीं है और यह केवल एक विधि मात्र भी नहीं है। तुम इसे सीख नहीं सकते। तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या का, तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या में यह एक विकास है। ध्यान कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे, जैसे कि तुम हो, उसमें जोड़ा जा सके। यह एक मौलिक रूपांतरण है जो कि तुम्हारे स्वयं के उपर उठने के द्वारा ही आ सकता है। यह एक खिलावट है, यह विकसित होना है। विकास सदा ही पूर्ण होने से होता है, यह कुछ और जोड़ना नहीं है। तुम्हें ध्यान की ओर विकसित होना पड़ेगा।
व्यक्ति की इस समग्र खिलावट को ठीक से समझ लेना चाहिए। अन्यथा कोई अपने साथ खेल, खेल सकता है, वह अपने ही मन की तरकीबों में उलझ सकता है। और बहुत सी तरकीबें है। उनके द्वारा न केवल तुम मूर्ख बनोगे, उनके द्वारा न केवल तुम कुछ नहीं पाओगे, बल्कि वास्तविक अर्थ में तुम्हें उनसे नुकसान ही होगा। यह मान लेना कि ध्यान की कोई तरकीब है- ध्यान की एक विधि के रूप में कल्पना करना- आधारभूत रूप से गलत है। और जब कोई व्यक्ति मन की चालाकियों में रस लेने लगता है तब मन की गुणवत्ता नष्ट होने लगती है।
जैसे कि मन है, यह गैर-ध्यान पूर्ण है। ध्यान के घटित होने से पूर्व संपूर्ण मन का रूपांतरण होना चाहिए। मन सदा व्याख्या करता है। तुम शब्दों को जान सकते हो, तुम भाषा को जान सकते हो, तुम विचार की प्रक्रिया को, उसकी संरचना को जान सकते हो, लेकिन यह विचारणा नहीं है। बल्कि इसके विपरीत यह विचारणा से पलायन है। तुम एक फूल देखते हो, और तुम इसकी व्याख्या करते हो। मन प्रत्येक आकार को, वस्तु को शब्दों में रूपांतरित कर सकता है। तब शब्द एक कारागृह, एक अवरोध बन जाते हैं। वस्तुओं का शब्दों में, उनके होने का; उनके अस्तित्व का, शब्दों में निरंतर बंध जाना ध्यान पूर्ण चित्त के लिए बाधा है।
इसलिये ध्यान पूर्ण चित्त के लिए प्रथम आवश्यकता है, चिजों की व्याख्या करने की इस आदत के प्रति सतत जागरुकता और इसको रोक सकने की योग्यता। वस्तुओं को मात्र देखो, उनकी व्याख्या मत करो। उनकी उपस्थिति के प्रति बोध पूर्ण रहो; किंतु उनको शब्दों में मत बदलो। वस्तुओं को होने दो, भाषा के बिना, व्यक्तियों को होने दो, भाषा के बिना, परिस्थितियों को होने दो, भाषा के बिना। यह असंभव नहीं है, यह स्वाभाविक है। अभी जो स्थिति है कृत्रिम तो वह है, लेकिन हमारी ऐसी आदत पड़ गई है, यह सब इतना यांत्रिक हो गया है, कि हमें इसका बोध भी नहीं रहता कि हम निरंतर अनुभवों को शब्दों में रूपांतरित कर रहे हैं।
सूर्योदय है, तुम कभी इसको ‘देखने’ और ‘इसकी व्याख्या करने’ के अंतराल के प्रति जागरुक नहीं होते। तुम सूर्य को देखते हो, तुम इसे अनुभव करते हो और तुरंत ही तुम इसकी व्याख्या कर देते हो। देखने और व्याख्या के बीच का अंतराल खो जाता है। यह तथ्य; एक उपस्थिति है। मन स्वतः ही अनुभवों को शब्दों में रूपांतरित कर लेता है। तब ये शब्द, तुम्हारे और अनुभव के मध्य में आ जाते हैं।
ध्यान का अर्थ है- शब्दों के बिना जीना, भाषा रहित होकर जीना। कभी-कभी यह सहज स्फूर्त रूप से घटित हो जाता है। जब तुम प्रेम में होते हो, उपस्थिति अनुभव होती है, भाषा नहीं। जब दो प्रेमी एक दूसरे के प्रति आत्मीयता से भरे होते हैं, तो मौन हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि वहां अभिव्यक्त करने को कुछ नहीं है। इसके विपरीत इस समय अभिव्यक्ति के लिए बहुत कुछ उद्वेलित होता है। किंतु शब्द वहां कभी नहीं होते, वे हो भी नहीं सकते। वे सिर्फ तब आते हैं, जब प्रेम जा चुकता है।
यदि दो प्रेमी कभी मौन न हों, तो यह एक संकेत है कि प्रेम मर चुका है। अब वे उस अंतराल को शब्दों से भर रहे हैं। जब प्रेम जीवित होता है, शब्द वहां नहीं होते, क्योंकि प्रेम की उपस्थिति इतनी उद्वेलित करने वाली, इतनी पैनी होती है कि भाषा और शब्दों का अवरोध पार हो जाता है। और सामान्यतः यह सिर्फ प्रेम में ही पार होता है।
ध्यान प्रेम की पराकाष्ठा है। किसी एक व्यक्ति के प्रति प्रेम नहीं, वरन समग्र अस्तित्त्व के प्रति जीवंत संबंध है, जो तुम्हें घेरे हुए है। यदि तुम किसी भी परिस्थिति में प्रेममय रह सको तो तुम ध्यान में हो।और यह कोई मन की तरकीब नहीं है। यह कोई मन को स्थिर करने की विधि नहीं है। बल्कि इसके लिए मन की यंत्रवत होने की गहन समझ अनिवार्य है। जिस पल तुम व्याख्या की, अस्तित्त्व को शब्दों में बदलने की, अपनी यांत्रिक आदत को समझते हो, एक अंतराल उत्पन्न हो जाता है। यह सहज स्फूर्त आता है। यह समझ का एक छाया की भांति अनुगमन करता है।
वास्तविक समस्या यह नहीं है, कि ध्यान में कैसे हों, बल्कि यह जानना है कि ध्यान में तुम क्यों नहीं हो। ध्यान की पूरी प्रक्रिया निषेधात्मक है। यह तुममें कुछ जोड़ना नहीं है, यह कुछ घटाता है जो पहले से ही जोड़ दिया गया है।
समाज भाषा के बिना नहीं रह सकता, इसे भाषा चाहिए ही। किंतु अस्तित्त्व को इसकी जरूरत नहीं है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम्हें भाषा के बिना रहना चाहिए। तुम्हें इसका प्रयोग तो करना ही पड़ेगा। किंतु तुम्हें इस योग्य होना चाहिए कि व्याख्या करने की यांत्रिक आदत को रोक सको और जीना शुरू कर सको। जब तुम एक सामाजिक प्राणी के रूप में होते हो, तो भाषा की यांत्रिक आदत आवश्यक है; किंतु जब तुम अस्तित्त्व के साथ अकेले हो तो तुम्हें इस योग्य होना पड़ेगा कि इसे रोक सको। यदि तुम इसे बंद नहीं कर सकते तो यह लगातार चलती चली जाती है, और तुम इसे रोकने में असमर्थ हो, तब तुम इसके गुलाम बन गये हो।
मन को एक उपकरण होना चाहिए, मालिक नहीं। जब मन मालिक होता है, यह एक गैर ध्यान पूर्ण अवस्था होती है। जब तुम मालिक होते हो, तुम्हारी चेतना मालिक होती है, तब यह एक ध्यान पूर्ण अवस्था होती है। इसलिये ध्यान का अर्थ है, मन की यांत्रिक आदत का मालिक हो जाना। मन और मन की भाषा संसार में उपयोगी है लेकिन परम सत्य को जानने में बाधा है। तुम इसके पार हो, अस्तित्त्व इसके पार है। चेतना भाषा से परे है, अस्तित्त्व भाषा से परे है। जब चेतना और अस्तित्त्व एक हों, वे संवाद में होते हैं। यह संवाद ही ध्यान है।
भाषा को छोड़ना पड़ेगा। मेरा अर्थ यह नहीं है कि तुम्हें इसे दमित या फेंक देना पड़ेगा। मेरा अर्थ सिर्फ इतना है कि यह तुम्हारे लिए दिन के चौबीसो घंटो की आदत न बनी रहे। जब तुम चलते हो तो तुम अपने पांवो को गतिमान करते हो। किंतु यदि तुम बैठे हो और तब भी वे गतिमान रहें तो तुम पागल हो। तुम्हें इस योग्य होना पड़ेगा कि उन्हें रोक सको। ठीक इसी तरह जब तुम किसी से बातचीत नहीं कर रहे हो भाषा को वहां नहीं होना चाहिए। यह तो संवाद का माध्यम है। जब तुम किसी के साथ संवाद नहीं कर रहे हो, तो यह वहां नहीं होनी चाहिए।
यदि तुम ऐसा करने में समर्थ हो तो तुम ध्यान में विकसित हो सकते हो। ध्यान एक विकसित होने की सतत प्रक्रिया है, कोइ ठहरी हुइ स्थिती या विधी नहीं। विधी सदा ही मृत होती है, इसलिये यह तुममें जोड़ी जा सकती है, किंतु प्रक्रिया सदा जीवंत है। यह विकसित होती है, इसका विस्तार होता है।
भाषा आवश्यक है, किंतु तुम्हें सदा इसमें नहीं रहना चाहिए। कुछ पल ऐसे होने चाहिए, जब कोई व्याख्या न हो, बस तुम हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम मात्र पौधों की तरह हो। चेतना तो वहां है ही और यह अधिक पैनी, अधिक जीवंत होती है, क्योंकि भाषा इसे मंद कर देती है। भाषा पुनरूक्त होने के लिए बाध्य है, इसलिये यह ऊब पैदा करती है। तुम्हारे लिए भाषा जितनी अधिक महत्त्व पूर्ण होगी, उतना ही तुम अधिक ऊबोगे।
इसलिये मेरे लिए ध्यान कोई विधि नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है; ध्यान कोई विधि नहीं , बल्कि एक समझ है। यह सिखाया नहीं जा सकता, इसका मात्र संकेत दिया जा सकता है। तुम्हें इसके बारे में सूचित नहीं किया जा सकता क्योंकि कोई सूचना, वास्तविक रूप से सूचना नहीं है। क्योंकि यह बाहर से है, और ध्यान तुम्हारी अपनी भीतरी गहराइयों से आता है।
इसलिये खोजो, खोजी हो जाओ, और शिष्य मत बनो। तब तुम किसी एक गुरु के शिष्य नहीं होगे बल्कि समस्त जीवन के शिष्य होगे। तब तुम मात्र शब्दों को नहीं सीख रहे होगे। आध्यात्मिक सीख शब्दों से नहीं आ सकती, बल्कि अंतरालों से, उस मौन से जो तुम्हें सदा घेरे हुए है, आती है। वे भीड़ में, हाट में, बाजार में भी हैं। मौन को खोजो, अंदर और बाहर अंतरालों को खोजो और एक दिन तुम पाओगे कि तुम ध्यान में हो।
ध्यान तुम तक आता है। यह सदा आता है, तुम इसे ला नहीं सकते। किंतु तुम्हें इसकी खोज में होना पड़ेगा, क्योंकि जब तुम खोज में होते होगे, तभी तुम इसके प्रति खुल जाआगे, उपलब्ध होओगे, अब तुम इसके मेजबान हो। ध्यान अतिथि है। तुम इसे निमंत्रित कर सकते हो और इसकी प्रतीक्षा कर सकते हो। यह बुद्ध के पास आता है, जीसस के पास आता है, यह हर उस व्यक्ति के पास आता है, जो तैयार है, जो खुला है और खोज रहा है।
किंतु इसे कहीं और से मत सीखो; अन्यथा तुम धोखा खा जाओगे। मन सदा किसी सुगमतर को खोजता है। यह शोषण का कारण बन जाता है। तब गुरु हैं और गुरु परंपरायें हैं, और आध्यात्मिक जीवन विषाक्त हो जाता है। सर्वाधिक खतरनाक व्यक्ति वह है जो किसी की आध्यात्मिक मांग का शोषण करता है। यदि कोई तुम्हारी संपदा पर डाका डाले, तो यह इतना खतरनाक नहीं है, यदि कोई तुम्हें असफल करता है, तो यह इतनी गंभीर बात नहीं है, किंतु यदि कोई तुम्हें मूर्ख बनाकर और तुम्हें तुम्हारी ध्यान की, दिव्यता की, समाधि की ओर जो प्यास है उसको मिटाता है या स्थगित भी करता है, तो यह पाप बहुत बड़ा और अक्षम्य है।

किंतु ऐसा किया जा रहा है। इसलिये इसके प्रति सावधान रहो और किसी से मत पूछो, ध्यान क्या है? मैं ध्यान कैसे करूं? इसके स्थान पर पूछो, बाधायें क्या हैं? रुकावटें क्या हैं? पूछो, हम सदा ध्यान में क्यों नहीं होतेः विकास कहां रुक गया हैः हम कहां पंगु हो गये हैं? और गुरु मत खोजो क्योंकि गुरु पंगु बना रहे हैं। कोई भी जो तुम्हें पूर्व निर्मित सूत्र देता है, मित्र नहीं अपितु शत्रु है।
अंधःकार में टटोलो क्योंकि और कुछ भी नहीं किया जा सकता। यह टटोलना ही समझ बनेगा जो तुम्हें अंधकार से मुक्त करेगा। जीसस ने कहा है, ‘सत्य स्वतंत्रता है।’ इस स्वतंत्रता को समझो। सत्य सदा समझ के माध्यम से आता है। यह कुछ ऐसा नहीं है कि तुम इससे मिलो और साक्षात्कार करो, यह कुछ ऐसा है जिसमें तुम विकसित होते हो। इसलिये समझ की खोज में रहो, क्योंकि जितना अधिक समझपूर्ण तुम होगे, उतना ही तुम सत्य के निकटतर होगे। और किसी अज्ञात, अनपेक्षित, अ-पूर्व कल्पनीय पल में, जब समझ अपनी चरमावस्था पर आती है, तुम खाई मे होते हो। अब तुम नहीं रहते और ध्यान घटित हो जाता है।
जब तुम नहीं होते, तब तुम ध्यान में हो। ध्यान तुम्हारा न होना है, यह सदा तुमसे पार है। जब तुम खाई में होते हो, ध्यान वहां होता है। तब अहंकार नहीं होता; तब तुम नहीं होते। तब अस्तित्त्व होता है। यही है, जो धर्मों का परमात्मा से, परम अस्तित्त्व से अर्थ है। यह सार है, सारे धर्मों का, सारी खोजों का किंतु यह तुम्हें कहीं भी पूव-निर्मित नहीं मिलेगा। इसलिये उनसे सावधान रहो, जो इसके बारे में दावा करते हैं।
टटोलते रहो और असफलता से मत डरो। असफलता को स्वीकार करो, किंतु वे ही असफलतायें फिर-फिर मत दोहराओ। एक बार पर्याप्त है, यही काफी है।

10.10.16

सुख—दुःख का स्‍वरूप -आठवां प्रवचन- ओशों



सुख—दुःख का स्‍वरूप—आठवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
दिनांक 12 जनवरी, 1972 प्रात:
माथेरान।



सूत्र:

सुखदुःख बुद्धयाश्रयोऽन्त: कर्ता यदा
तदा इष्ट विषये बुद्धि: सुखबुद्धि:
अनिष्ट विषये बुद्धिदु:खबुद्धि:।
शब्दस्पर्शरूपरसगधा: सुखदुःखहेतव:।
पुण्यपापकर्मानुसारी
भूत्वा प्राप्त शरीरसयोगमप्राप्त-
शरीरसयोगमिव कुर्वाणो यदा दृश्यते
तदोपहितजीव इत्युच्यते ।। 6 ।।


सुख-दुख की दृष्टि-अंतर में रुचिकर वस्तु की जो इच्छा है
यह सुख-बुद्धि है और अरूचिकर वस्तु की कल्पना दुख-बुद्धि है ।
सुख को प्राप्त करने और दुख को त्यागने के लिए जीव जो क्रियाएं करता है,
उन्हीं के कारण उसे कर्ता कह जाता है ।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध-ये पांच विषय सुख दुख के कारण हैं ।
पुण्य और पाप कर्मों का अनुसरण करनेवाला आला,
प्राप्त हुए शरीर के संयोग को अप्राप्त होते हुए भी
स्वयं की तरह समझने लगता है,
तब उसे उपाधियुक्त जीव कहते हैं ।


शरीरों के बीच में घिरा है जो शून्य, शरीरों की पर्तों के बीच बंध गया है जो अस्तित्व, उस तक पहुंचने के लिए सुख-दुख को समझ लेना अत्यंत जरूरी है, क्योंकि सुख-दुख के कारण ही बंधा है।

शरीर नहीं बांधता है, शरीर नहीं बांध सकता है; लेकिन शरीर से सुख मिल सकता है, यह धारणा ही बांधती है। और अगर कारागृह से भी सुख मिल सकता है तो कारागृह भी बांध लेगा।
यहां एक बात समझ लेनी जरूरी है कि कारागृह में तो कोई और आपको बंधन में डालता है, जिस कारागृह की हम यहां चर्चा कर रहे हैं, उसमें कोई और आपको बंधन में नही डालता, आप ही अपने को बंधन में डालते हैं। इसलिए बंधन तोड़ना बहुत मुश्किल भी है और आसान भी। मुश्किल इसलिए कि जब आपने ही अपने को बांधा है, तो बांधने में जरूर रस पा रहे होंगे, नहीं तो बौधने का कोई कारण नहीं। कोई दूसरा बांधता, तो आपको उस बंधन में रस नहीं होता; आपने ही बांधा है, तो बंधन को प्रीतिकर समझ कर बांधा है, इसलिए तोड़ना मुश्किल है। आसान भी है, क्योंकि आपने ही बांधा है; इसलिए जिस क्षण निर्णय करें उसी क्षण टूट भी सकता है। किसी और ने बांधा होता तो आपके मुक्त होने की आकांक्षा पर्याप्त नहीं थी, बंधन को तोड़ने के लिए संघर्ष करना पड़ता-- और फिर भी निर्णय इससे होता कि कौन शक्तिशाली है।अगर बांधने वाला शक्तिशाली होता तो बंधन से छूटना जरूरी नहीं था कि हो ही जाता।
हमने ही बांधा है अपने को, तो बंधन में जरूर कोई रस होगा; बंधन नीरस नहीं हो सकता। चाहे रस आत ही क्यों न हो! चाहे रस प्रतीत ही क्यों न होता हो, वस्तुत: न ही हो, फिर भी होगा--स्वभवत ही सही, चाहे मरीचिका दिखाई पड़ती हो मरुस्थल में, न हो वहां जल, लेकिन दिखाई पड़ता है। और प्यासे को दिखाई पड़ना भी काफी है। और प्यासे को यह निर्णय करने की सुविधा नहीं है कि वह तय करे कि जो जल दूर दिखाई पड़ता है वह है भी या नहीं? दौड़ेगा।
यह सारी दौड़ सुख-दुख के आस-पास है। इसलिए सुख-दुख के तत्व में भीतर प्रवेश कर जाना जरूरी है। शायद सुख-दुख की संभावना ही बंधन का कारण है।
सुख क्या है? और दुख क्या है? ऊपर से देखने पर लगता है, दोनों बड़े विपरीत हैं; एक-दूसरे के बिलकुल दुश्मन हैं। ऐसा है नहीं। सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए एक मजे की घटना घटती है लेकिन हम खयाल नहीं कर पाते कि जिसे हम आज सुख कहते हैं वही कभी कल दुख हो जाता है; और जिसे आज हम दुख कहते हैं वह कल सुख हो सकता है। कल तो बहुत दूर है, जिसे हम सुख कहते हैं, वह क्षण भर बाद दुख हो सकता है। यह भी हो सकता है कि जब हम कह रहे हैं यह सुख है, तभी वह दुख हो गया हो।
जो गहन खोज करते हैं मनुष्य के मन की, वे तो यह कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति कहता है, यह सुख है, तभी वह दुख हो गया होता है। क्योंकि जब तक वह सुख होता है, तब तक यह कहने की भी सुविधा नहीं मिलती कि यह सुख है। वह जब क्षीण होने लगता है तभी।
सुख-दुख के संबंध में पहली बात समझ लेनी जरूरी है कि वे विपरीत नहीं हैं; वे एक-दूसरे में रूपातरित होते रहते हैं,लहर की भांति हैं--कभी इस किनारे, कभी उस किनारे। हम सब जानते हैं; हमने अपने सुखों को दुखों में परिवर्तित होते देखा है। लेकिन देख कर भी हमने निष्कर्ष नहीं लिए। शायद निष्कर्ष लेने के लिए हम अपने मन को अवसर नही देते हैं। एक सुख दुख बन जाता है, तब हम तत्काल दूसरे सुख की तालाश में चल पड़ते हैं। रुकते नहीं, ठहर कर देखते नहीं कि जिसे कल सुख जाना था, वह आज दुख हो गया, तो ऐसा तो नहीं है कि हम जिसे भी सुख जानेंगे, वह फिर दुख हो जाएगा? ऐसा मन कहता है कि यह हो गया दुख, कोई बात नहीं, कहीं कोई भूल हो गई, यह दुख रहा ही होगा, हमने भ्रांति से सुख समझ लिया था।
इसलिए और एक मजे की बात है कि जिस चीज को आप जितना बड़ा सुख मानते हैं, वह उतना बड़ा दुख बदलेगा, जब बदलेगा। जिस चीज को आप ज्यादा सुख नहीं मानते वह बदल कर ज्यादा दुख नहीं हो सकता। अनुपात वही होगा। इसलिए उदाहरण के लिए कहता हूं : अगर किसी का विवाह उसके माता-पिता ने कर दिया है, तो उसमें बहुत सुख की अपेक्षा ही नहीं होती, इसलिए दुख भी बहुत फलित नहीं होता।
प्रेम-विवाह जितना दुख लाता है, उतना दुख आयोजित विवाह नहीं ला सकता; क्योंकि आयोजित विवाह में कभी बहुत सुख की आशा ही नहीं थी। तो टूटेगा क्या? बिगड़ेगा क्या? बिखरेगा क्या? जितनी बड़ी अपेक्षा, उतना बड़ा दुख फलित हो सकता है। इसलिए पश्चिम ने सोचा था इधर पचास-सौ वर्षों में कि प्रेम-विवाह बहुत सुख ले आएगा। उन्होंने ठीक सोचा था। लेकिन उन्हें दूसरी बात का पता नहीं था कि प्रेम- विवाह बहुत दुख भी ले आएगा। और अनुपात सदा बराबर होगा। जितना बड़ा सुख अपेक्षा में होगा, जब रूपांतरण होगा, उतना ही बड़ा दुख होगा।
पूरब के लोग होशियार थे एक लिहाज से; उन्होंने एक दूसरी कोशिश की... उन्होंने कोशिश यह की कि सुख की अपेक्षा को ही कम करो ताकि जब परिवर्तन हो-- और परिवर्तन तो होगा ही--तो बहुत दुख फलित न हो।
आयोजित विवाह न तो सुख दे सकता है ज्यादा, न दुख दे सकता है ज्यादा। इसलिए आयोजित विवाह चल सकता है,प्रेम-विवाह चल नहीं सकता; क्योंकि इतने बड़े सुख की आशा जब इतने बड़े दुख में बदल जाती है--चाहा था शिखर और खाई उपलब्ध हो जाती है, तो टूटना निश्चित है।
आदमी चल सकता है समतल जमीन पर, जहां बहुत खाइयां और बहुत शिखर नहीं हैं। जहा शिखरों से खाइयों में गिरना पड़ता हो, उस पर ज्यादा देर चला नहीं जा सकता।इसलिए सिर्फ सौ वर्ष के प्रयोग में पश्चिम प्रेम-विवाह के बाद न-विवाह की हालत में आया चला जा रहा है। पांच हजार वर्ष तक पूरब बिना प्रेम-विवाह के बराबर विवाह को चलाया। समतल भूमि थी--न बड़ी खाइयां थीं, न बड़े शिखर थे। लेकिन पश्चिम सौ वर्ष भी प्रेम-विवाह की धारणा को चलाने में समर्थ नहीं हो पाया। अब वहां का विचारशील आदमी कह रहा है, यह विवाह ही छोड़ देने जैसा है; यह विवाह को रखने की जरूरत नहीं है। अगर सुख ज्यादा चाहिए तो विवाह छोड़ दो।
अब फिर वही भूल हो रही है। क्योंकि खयाल यह था कि सुख अगर ज्यादा चाहिए तो आयोजित विवाह छोड़ दो, प्रेम-विवाह ज्यादा सुख देगा। अब प्रेम-विवाह ने ज्यादा सुख तो क्षण भर को दिया और पीछे बड़े दुख की खाई छोड़ गया। और उस सुख की तुलना में यह खाई बहुत बड़ी मालूम पड़ती है।
अब फिर वही भूल पश्चिम की बुद्धि कर रही है, वह यह कि अगर और ज्यादा सुख चाहिए तो विवाह ही छोड़ दो। उन्हें पता नहीं किं वह और ज्यादा सुख और बड़े दुख. में छोड़ जाएगा। पर वह भूल स्वाभाविक है, क्योंकि हम सुख-दुख को विपरीत मानते हैं, कनवर्टिबल नहीं--कि वे एक-दूसरे में बदल जाते हैं। बदलते ही रहते हैं। एक क्षण को भी बदलाहट रुकती नहीं।
इस समझ के कारण पूरब ने एक और प्रयोग किया। उसने यह प्रयोग किया कि जब सुख दुख में बदल जाता है, तो क्या हम दुख को सुख में नहीं बदल सकते?
तपश्चर्या का सूत्र इस समझ से निकला। बहुत अनूठा सूत्र है तपश्चर्या का... यह इस समझ से निकला है कि जब सुख दुख में बदल जाता है तो कौन सी अड़चन है कि दुख सुख में न बदल जाए? और हमने दुख को भी सुख में बदल कर देखा। अगर आप दुख में रहने को राजी हो जाएं, तो दुख सुख में बदलने को तैयार हो जाता है। अगर आप सुख में रहने को राजी हो जाएं, तो सुख दुख में बदलने को तैयार हो जाता है।
आपके राजी होने से बदलाहट होती है। आपके राजी होने से बदलाहट होती है-- आप जिसमें भी रहने को राजी हो जाएं,वही बदलने को तत्पर हो जाता है। असल में आपके राजी होते ही बदलाहट शुरू हो जाती है। जैसे ही आपने कहा कि बस सुख मिल गया, अब मैं इसमें ही रहना चाहता हूं; अब मैं इसको बदलना नहीं चाहता.. बस समझिए कि बदलाहट शुरू हुई। अगर आप दुख में भी यही कह सके कि दुख मिल गया, मैं इसमें राजी हूं; अब मैं इसे बदलना नहीं चाहता--यही तपश्चर्या का सूत्र है कि दुख आया, मैं राजी हूं मैं बदलना नहीं चाहता।
और बड़े मजे की बात है कि दुख सुख में बदल जाता है। और अगर इन दोनों में ही चुनना हो, तो सुख को दुख में बदलने की कला के बजाय दुख को सुख में बदलने की कला ज्यादा बुद्धिमानी है। क्यों? उसका कारण है, क्योंकि दुख को जो सुख में बदल लेता है.. जो दुख को सुख में बदल लेता है, उसका सुख फिर दुख में नहीं बदल सकता। उसका कारण है कि जो दुख तक को सुख में बदल लेता है, उसका सुख कैसे दुख बन सकेगा? जो दुख तक को सुख में बदल लेता है, उसका सुख अब उस पर काम नहीं कर पाएगा, बदलाहट होगी नहीं उसे। असल में जो दुख को सुख में बदल लेता है, वह सुख की आकांक्षा ही छोड़ देता है, तभी बदल पाता है। और जब सुख की कोई आकांक्षा नहीं होती, तो सुख दुख में बदलने की क्षमता खो देता है।
आकांक्षा से क्षमता निर्मित होती है। इसे कभी प्रयोग करके देखें और आप बहुत हैरान हो जाएंगे। यह मनुष्य के भीतर रूपांतरण की गहरी कीमिया के सूत्रों में से एक है। जब दुख आपके ऊपर आए, तो उसे स्वीकार कर लें। इनकार से ही वह दुख है, अस्वीकार से ही वह दुख है; उसे स्वीकार कर लें समग्र मन से--राजी हो जाएं, आलिंगन कर लें और कह दें कि अब तुझे छोड़ने का कोई मन नहीं, तेरे साथ ही रहेंगे। और आप अचानक पाएंगे कि सब बदल गया जिसे आपने दुख की तरह देखा था,वह सुख हो गया है।
सुख दुख में बदल सकता है, दुख सुख में--क्यों? क्योंकि वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और बदल क्यों जाते हैं?...और बदल क्यों जाते हैं--इस बदलने का क्या कारण है?
असल में जब एक आदमी सुख में जीता है, तो सुख से भी ऊब जाता है। जो चीज भी निरंतर मिलती है उससे ऊब पैदा हो जाती है। ऊब स्वाभाविक है। सुख भी ऊबाने लगता है।
जिसको आप प्रेम करते हैं, और चाहते हैं कि चौबीस घंटे उसके साथ रहें, और अगर चौबीस घंटे साथ रहना मिल जाए,तो मन करने लगेगा. कुछ देर तो फुर्सत मिले!
कुछ देर तो एकांत मिले। कुछ देर को तो पीछा छूटे! यह, यह बिलकुल स्वाभाविक हो जाएगा। जिसके साथ कभी सुख चाहा था, आज उससे थोड़े अलग होगें तो सुख मिलेगा। ऊब खड़ी हो जाती है। चित ऊबने लगता है। असल में जिसे भी आप जान लेते हैं, उसी से चित्त ऊबने लगता है, जिसे भी आप पूरा जान लेते हैं उसी से चित्त ऊबने लगता है। चित्त नये की तलाश पर निकल जाता है, रुचिकर भी अरुचिकर हो जाता है। आज जो भोजन अच्छा लगा है, भूल कर कल उसे मत करना, परसों उसे मत दोहराना, नहीं तो रुचि अरुचि बन जाएगी।
यह ऋषि कहता है

''जो रुचिकर वस्तु की इच्छा है, वही सुख है; और जो अरुचिकर वस्तु की कल्पना है, वही दुख है।''
किसी वस्तु को रुचिकर कल्पित करना सुख है, और किसी वस्तु को अरुचिकर कल्पित करना दुख है। और रुचि अरुचि में बदल जाती है, अरुचि रुचि में बदल जाती है।
शराब पीने वाले जानते हैं कि शराब पीने में शुरू में स्वाद तो अरुचिकर ही होता है, स्वाद को, वे कहते हैं, विकसित करना पड़ता है। वे कहते हैं, विकसित करना पड़ता है; जो जानते हैं, वे कहते हैं, विकृत करना पड़ता है, स्वाद की बुद्धि ही नष्ट करनी पड़ती है। अगर एक आदमी काँफी पीना शुरू करता है, तो काँफी रुचिकर नहीं मालूम पड़ती, लेकिन पीने वाले कहते हैं,घबड़ाओ मत, अभ्यास से रुचिकर हो जाएगी; स्वाद विकसित करना पड़ता है।
और आदमी कैसे भी स्वाद विकसित कर लेता है। एक आदमी धूम्रपान शुरू करता है, सिवाय कष्ट के कुछ भी नहीं मालूम पड़ता पहले दिन, लेकिन कल्पना रुचिकर की कि इतने लोग पी रहे हैं तो बहुत आनंद पा ही रहे होंगे, क्योंकि इतने लोग नासमझ नहीं हो सकते। और जब पीने वाला.. नया पीने वाला देखता है कि जो कहते हैं कि पीना बुरा है, वे भी पी रहे हैं--वे कहते हैं, मजबूरी है, लेकिन तुम मत पीओ--तब उसे लगता है कि जरूर कोई गहरा राज है; कोई छिपी हुई बात है; कोई सुख जरूर पाया जा रहा है जिससे मैं रोका जा रहा हूं। जब वह पहली दफे पीता है तो दुखद ही अनुभव है; पहला अनुभव सुखद नहीं हो सकता। तिक्त है स्वाद, धुआं ही शरीर में डाल रहा है, जो किसी कारण सुखद नहीं हो सकता--खांसी आएगी, बेचैनी होगी,माथा गर्म हो जाएगा, लेकिन इस आशा में, रुचिकर की आशा में, वह सुख की कल्पना किए चला जाएगा। धीरे- धीरे यह दुख सुख बन जाएगा। धीरे- धीरे यह दुख सुख बन जाएगा!
अभ्यास से दुख सुख हो जाता है; अभ्यास से ही सुख दुख हो जाता है।
दुख को भी कोई झेलता चला जाए तो संवेदनशीलता क्षीण हो जाती है और आदत बन जाती है; दुख की भी आदतें होती हैं। सुख को अगर कोई.. -झेलना ही पड़े सुख किसी को, तो ऊब पैदा हो जाती है; उससे भी बेचैनी और छुटकारे की आकांक्षा हो जाती है।
रुचिकर क्या है, अरुचिकर क्या है, इसे हम समझें तो सुख दुख कैसे रूपांतरित होते रहते हैं, और एक ही चीज के दो पहलू हैं, खयाल में आ जाएगा।
रुचिकर क्या है? किस बात को आप रुचिकर कहते हैं?
ऋषि ने कहा है इंद्रियों के लिए जो अनुकूल है, सानुकूल है, वह रुचिकर है। आपके लिए नहीं, इंद्रियों के लिए जो अनुकूल है वह रुचिकर है, और इंद्रियों के लिए जो अनुकूल नहीं है वह अरुचिकर है।

संगीत बज रहा है, कान को रुचिकर है; क्योंकि उस संगीत की जो चोट है, वह कान के लिए अनुकूल है। उससे व्याघात पैदा नहीं होता, उपद्रव पैदा नहीं होता, बल्कि विपरीत मन के भीतर चलता हुआ उपद्रव शिथिल होता है, शांत होता है। लेकिन जरूरी नहीं है। अगर बहुत शांत व्यक्ति हो, तो संगीत भी अरुचिकर है; क्योंकि तब संगीत भी एक व्याघात है, तब संगीत भी एक उपद्रव है।
पश्चिम का एक बहुत बड़ा संगीतज्ञ सुबर्ट कहा करता था--कहा करता था संगीत के संबंध में, खुद बड़ा संगीतज्ञ था वह.. कहा करता था कि संगीत जो है, वह सबसे कम अरुचिकर ध्वनियों का समूह है--सबसे कम अरुचिकर! सबसे कम उपद्रव है उसमें। है तो उपद्रव, क्योंकि है तो आखिर स्वरों का आघात ही। इसलिए परम संगीत तो शून्य है, लेकिन जिसने शून्य को जाना,उसे संगीत भी अरुचिकर मालूम पड़ेगा.. उसके कान को।
चीन का एक बहुत बड़ा संगीतज्ञ हुआ, हुई हाई। जैसे-जैसे संगीत उसका गहरा होता चला गया, वैसे-वैसे उसका वाद्य शांत होता चला गया। फिर एक दिन उसने अपने वाद्य को उठा कर फेंक दिया। दूर-दूर लोक-लोकांतर तक उसकी खबर पहुंच गई थी,हजारों मील चल कर लोग उसके पास आते थे। और जब दूसरे दिन सुबह नये यात्री आए उसका संगीत सुनने, और उसे उन्होंने बैठा वृक्ष के नीचे देखा बिना वाद्य के, तो उन्होंने पूछा. तुम्हारा वाद्य कहां है? तो हुई हाई ने कहा : अब वाद्य भी संगीत में बाधा हो गया। और हुई हाई ने कहा कि जब संगीत पूर्ण हो जाता है तो वीणा तोड़ देनी पड़ती है।
उसका कारण है, अगर बहुत ठीक से समझें तो कान के लिए जो ध्वनियां प्रीतिकर लगती हैं, वे इसीलिए प्रीतिकर लगती हैं कि भीतर और अप्रीतिकर ध्वनियां चल रही हैं, भीतर और उपद्रव, अराजकता है। उस अराजकता में यह सुलाने वाली दवा की तरह मालूम पड़ता है। सुखद लगता है, सांत्वना देता है; एक तरह की शाति को जन्म देता है। रुचिकर है।
लेकिन, अगर संगीत अस्तव्यस्त हो, सिर्फ शोरगुल हो आवाजों का तो अरुचिकर हो जाता है, क्योंकि कान को पीड़ा होती है। पीड़ा इसलिए होती है कि कान को ध्वनियां सिर्फ बेचैन करती हैं, शांत नहीं करतीं। सारे शरीर में जब हमने... इंद्रियों की जो व्यवस्था है हमारी--इंद्रियां हैं ग्राहक, बाहर के जगत में जो घटित हो रहा है उसे भीतर ले जाने के द्वार हैं। इन इंद्रियों को जो प्रीतिकर मालूम होता है वह वही है जो इन इंद्रियों को शांत करता है, अप्रीतिकर वही मालूम पड़ता है जो इन इंद्रियों को अशात करता है। बस, इससे ज्यादा प्रीतिकर, अप्रीतिकर का कोई अर्थ नहीं है। लेकिन जो चीज इंद्रियों को आज शांत करती है, कल अशांत कर सकती है; क्योंकि इंद्रियां स्वयं सरित-प्रवाह हैं, वे भी बदली जा रही हैं।
जैसे, एक आदमी नया रेलवे की नौकरी पर जाता है, स्टेशन पर सोता है, नींद नहीं आती--ट्रेन की आवाजें हैं, इंजन की आवाजें हैं, शंटिंग है और शोरगुल है, और सब तरह का उपद्रव है--नींद नहीं आती, बड़ा बेचैन होता है कान। लेकिन नींद एक जरूरी चीज है। आज नहीं कल, इस बेचैनी को एक तरफ रख कर नींद आनी शुरू हो जाती है, लेकिन बहुत जल्दी वह वक्त आ जाता है कि यह आदमी अब अपने घर नहीं सो सकता, क्योंकि यह सब उपद्रव इसकी नींद का अनिवार्य हिस्सा हो गया। यह हो तो ही यह सो सकता है, यह न हो तो यह नहीं सो सकता। यह इसका क्रियाकांड का हिस्सा हो गया। इतना उपद्रव चाहिए ही।
बहुत लोग मेरे पास आते हैं, वे कहते हैं कि बड़ी मुसीबत है, बड़ी बेचैनी है, बड़ी अशांति है। मैं भलीभांति जानता हूं कि अगर उनकी सब बेचैनी और सब अशाति छीन ली जाए तो फौरन परमात्मा से वे प्रार्थना करेंगे, बेचैनी वापस दो, अशांति वापस दो। उनको पता नहीं है कि वह उनका क्रियाकांड है, वे उसके बीच ही जी सकते हैं। इसलिए अगर उन्हें एकांत में भेज दिया जाए,तो दो-चार दिन में वे कहते हैं कि वापस जाना है; यहां बहुत खाली-खाली लगता है; यहां कोई सार नहीं है। सार वहीं है जहां सारा उपद्रव चल रहा है। क्यों?
इंद्रियां अगर आप उनको अरुचिकर का भी भोजन दिए चले जाएं तो थोड़े दिन में राजी हो जाती हैं, क्योंकि मजबूरी है। और जब राजी हो जाती हैं तो वही प्रीतिकर हो जाता है जो अरुचिकर मालूम पड़ा था, अप्रीतिकर मालूम पड़ा था। अगर आप रुचिकर का भोजन दिए चले जाएं तो रुचिकर बार-बार लेने से धीरे- धीरे इंद्रिय का स्वाद मर जाता है... वही- वही रोज देने से उसकी संवेदना क्षीण हो जाती है; वही अरुचिकर मालूम पड़ने लगता है।
एक बड़े कवि मुझे मिलने आए थे। बातचीत चलती थी, तभी एक संगीतज्ञ भी आ गए। उन संगीतज्ञ ने कवि को कहा कि कोई एकाध कविता सुनाएं। उन कवि ने कहा:
क्षमा करें। कविता से इस बुरी तरह ऊब गया हूं कि कुछ और.. कुछ और चलेगा, कविता नहीं। बड़े कवि हैं, कविता से ऊब गए हैं। ऊब ही जाएंगे।
और इसलिए अक्सर दुनिया में एक अनूठी घटना घटती है कि आदमी जिंदगी में कई बार छलांगें ले लेता है। बड़े बुद्धिमान आदमी कई बार बड़े गैर-बुद्धिमानी के काम करने में लग जाते हैं; वह सिर्फ बदलाव है, वह सिर्फ बदलाहट है; ऊब गए हैं। इसलिए कभी-कभी दिखाई पड़ता है कि गांव का एक साधारण आदमी है--कुछ कीमत नहीं है, कोई अनुभव नहीं है, कोई गहराई नहीं है, लेकिन हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस उसके चरणों में बैठा हुआ है। क्या हो गया है इस हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को? यह ऊब गया है बुद्धिमानी से। काफी बुद्धि इसने झेल ली। अब यह कोई गैर-बुद्धिमानी का काम न करे, तो इसे अपने से ही छुटकारा नहीं है। और फिर इसको देख कर न मालूम कितने नासमझ इसके पीछे आएंगे, क्योंकि वे इसे बुद्धिमान समझ कर चले आ रहे हैं.. कि जब यह बुद्धिमान जा रहा है कहीं, तो अब तो गैर-बुद्धिमानों को जाने के लिए रास्ता खुल गया। और उन्हें पता नहीं कि यह जा रहा है सिर्फ इसलिए कि अब यह बुद्धि से बुरी तरह ऊब गया है 1 बुरी तरह ऊब गया है!रुचिकर सदा रुचिकर नहीं रहता। इसके और भी कारण हैं, क्योंकि आप पूरे समय विकसित हो रहे हैं। बच्चा है, खिलौना रुचिकर लगता है; लेकिन एक उम्र आ जाएगी कि खिलौना रुचिकर नहीं लगेगा, क्योंकि बच्चा बच्चा नहीं रहा। खिलौने फेंकने ही पड़ेंगे। और ये वे ही खिलौने हैं जो अगर टूट जाते तो बच्चा समझता कि जैसे उसका कोई प्रियजन मर गया है। इन्हीं को वह छोड कर एक दिन हट जाएगा; क्योंकि उसकी चेतना विकसित हो रही है।
जो कल रुचिकर था, वह आज रुचिकर नहीं रहा। आज वह नये खिलौने खोजेगा, हालांकि उसे खयाल में नहीं होगा, ये भी खिलौने हैं। कल उसने गुड़िया सजाई थी, आज वह पत्नी सजाका। सजावट वही होगी, ढंग वही होगा। लोग उसकी गुड़िया की प्रशंसा करें, यह कल चाहा था; आज उसकी पत्नी की प्रशंसा करें, यह चाहा जाएगा। लेकिन गुड़िया थी गुड़िया, इसलिए किसी दिन फेंक दिया तो कठिनाई नहीं हुई। अब यह पत्नी को फेंकना इतना आसान पड़ने वाला नहीं है। और आज नहीं कल, इसके भी पार हो जाएगा मन, तब बेचैनी खड़ी होगी; तब पुराने किए वायदे और आश्वासन बाधा बनेंने। तब अपने से ही बंधा हुआ आदमी पाता है कि यह तो मैन ही कहा था, अब इसको मुकरना भी मुश्किल है। और बात भी खो गई, यह सजावट भई ब्रो गई,अब इसमें भी कोई रस न रहा। तो रोज हम बदल रहे हैं। रोज हम बदल रहे हैं। जवान आदमी था, मंदिर रुचिकर नहीं मालूम पड़ता था। निकला था उसके सामने से, समझता था पागल उसके भीतर गए होंगे। अभी वेश्यागृह ज्यादा सुखद और प्रीतिकर था। अभी मंदिर बिलकुल नासमझों की जमात दिखाई पड़ती थी। लेकिन आज नहीं कल, मंदिर सार्थक हो जाएगा।
कार्ल गुस्ताव जुग ने अपने जीवन के संस्मरणों में लिखा है कि मेरे पास इलाज कराने वाले हजारों मरीज मन के जो आए हैं, उनमें अधिकतम वे हैं जो चालीस साल के ऊपर हैं, और उनकी एक ही तकलीफ यह है कि वे मंदिर का द्वार भूल गए हैं, और कोई उनकी अड़चन नहीं। एक ही उनकी बीमारी है कि उन्हें मंदिर का कोई पता ही नहीं कि मंदिर भी है, और चालीस साल की उम्र के बाद मंदिर का द्वार सार्थक होना शुरू हो जाता है। लेकिन वह भी खिलौना है।
बच्चे के खिलौने हैं, जवान के खिलौने हैं, बूढ़े के खिलौने हैं। और एक दिन उससे भी ऊब आ जाती है। और जब तक खिलौनों से ही कोई मुक्त नहीं हो जाता, तब तक उपद्रव में बदलाहट होती रहती है लेकिन उपद्रव समाप्त नहीं होता।
तो एक आदमी अपनी पत्नी को सजाने से अब ऊब गया है, तो रामचंद्र जी को सजा रहा है! अब उनका जुलूस निकाल रहा है, शोभायात्रा चल रही है। मगर यह आदमी यह नहीं समझ पा रहा कि यह सजावट कब तक? यह कब तक जारी रखनी है? सिर्फ गुड़िया बदलते चले जाना है? खयाल ही नहीं आता कि आज जो सुखद है, कल वह.. कल अरुचिकर हो जाएगा।
क्या, किया क्या जाए? रुचि और अरुचि क्या है, इसे ठीक से समझ लिया जाए। जो आज मेरी इंद्रिय को इस क्षण में सुखद मालूम पड़ता है, संगतिपूर्ण मालूम पड़ता है, अनुकूल मालूम पड़ता है, उसे मैं कहता हूं 'सुख', जो आज इस क्षण में इसके विपरीत पड़ता है, उसे मैं कहता हूं 'दुख।' सुख को मैं चाहता हूं दुख को मैं नहीं चाहता हूं सुख मुझे मिल जाए पूरा और दुख मुझे बिलकुल न मिले, यह मेरी आकांक्षा है। यह आकांक्षा ही शरीर से बंधने का कारण बन जाती है; क्योंकि शरीर में ही इंद्रियों के द्वार हैं, उन्हीं से सुख मिलता है, और उन्हीं से दुख रोका जा सकता है। इसलिए चेतना शरीर के साथ सम्मिश्रित होकर बंध जाती है। और जब तक कोई सुख-दुख दोनों को ठीक से समझ कर पार न हो, तब तक शरीर के पार नहीं हो सकता।
इसलिए पांच शरीरों के बाद तत्काल ऋषि ने सुख-दुख की चर्चा शुरू की है। यह सुख-दुख की चर्चा अर्थपूर्ण है इसलिए कि यह पांच शरीर की चर्चा से कुछ भी न होगा, जब तक कि शरीर के बंधने का राज ही हमारे खयाल में न आ जाए कि हम बंधते क्यों हैं? इससे विपरीत अगर हम कर सकें, उसी का नाम तप है।
सुख की आकांक्षा न करें, दुख को हटाने का खयाल न करें; सुख को मागें न, दुःख को हटाएं न। सुख को जो मांगेगा,दुख से जो बचेगा, वह शरीर से बंधा रहेगा। सुख की जो मांग नहीं करेगा, दुख मिल जाए तो राजी हो जाएगा, वह शख्स.. वह व्यक्ति शरीर से छूटने लगेगा।

सुख की अपेक्षा, दुख से भय--शरीर के बाहर ले जाता है; सुख की अपेक्षा नहीं, दुख से निर्भय--शरीर के भीतर ले जाता है। भोग और तप का यही भेद है।
सुख मांगते हैं तो बाहर संघर्ष करना पड़ेगा--सुख को बचाना पड़ेगा, दुख से बचना पड़ेगा; गहन संघर्ष होगा बाहर। इसलिए चेतना को सदा शरीर के बाहर भटकना पड़ेगा--मकानों में, धनों में, पदों में, दूसरों में।

तप का अर्थ है.. कि नहीं, सुख की कोई आकांक्षा नहीं है, क्योंकि बहुत सुख जाने और उनको दुखों में बदलते देखा। अब सुख को नहीं जानना; और अब दुख को भी हटाने की कोई इच्छा नहीं है। क्योंकि दुख को हटा-हटा कर देख लिया, वह हटता कहां है! वह बना ही रहा चला जाता है। उलटे उसे हटाने में और दुख भोगना पड़ता है... और वह फिर लौट-लौट कर आ जाता है। न ही दुख को हटाते हैं, न ही सुख को मांगते हैं; अब हम राजी हैं, जो जैसा है। यात्रा भीतर की तरफ शुरू हो गई; बाहर कोई संघर्ष न रहा। यह अंतर्यात्रा ही शरीरों से छुटकारा दिला सकती है।
सुख-दुख के लिए जो क्रियाएं करता है व्यक्ति, ऋषि ने उसे ही कर्ता कहा है--दि डुअर; जो सुख-दुख के लिए क्रियाएं करता है--जो मांगता है कि सुख मुझे मिले और दुख मुझे न मिले, यह कर्ता है। लेकिन जो कहता है कि जो मिले, ठीक; न मिले, ठीक; दोनों में भेद ही नहीं करता, यह अकर्ता हो जाता है; यह नॉन-डुअर हो जाता है। और जब व्यक्ति अकर्ता होता है तो परमात्मा कर्ता हो जाता है। इसी से भाग्य की कीमती धारणा पैदा हुई।
भाग्य का मतलब ज्योतिषी से नहीं है; भाग्य का खयाल बहुत आध्यात्मिक है। उसका हाथ की रेखाओं से कुछ लेना-देना नहीं; उसका भविष्य से कोई संबंध नहीं; उससे रास्ते के किनारे पर बैठे हुए ज्योतिषी से कोई संदर्भ ही नहीं है उसका। भाग्य की धारणा इससे पैदा हुई कि जब मैं कर्ता नहीं हूं और चीजें तो हो ही रही हैं, चीजें तो घटित हो ही रही हैं और मैं कर्ता नहीं हूं क्योंकि कर्ता तभी तक मैं होता हूं जब तक मैं मांगता हूं कि सुख मिले और दुख न मिले; तब तक संघर्ष करता हूं तो कर्ता होता हूं। अब कर्ता नहीं रहा; अब जो मिल जाए ठीक है, न मिल जाए ठीक है, मैंने फिकर ही छोड़ दी मिलने-न मिलने की। सुख आए तो मैं फिकर नहीं करता कि सुख है, दुख आए तो मैं फिकर नहीं करता कि दुख है-- धीरे- धीरे भेद ही गिर जाता है और पहचानना ही मुश्किल हो जाता है कि क्या सुख है और क्या दुख है; दोनों के बीच आदमी निर्लिप्त हो जाता है।
ऐसी जो निर्लिप्ता है, इसमें कर्ता तो खो जाएगा, क्योंकि करने को कुछ बचा नहीं। करना था ही क्या? एक ही था : सुख कैसे पाएं और दुख से कैसे बचें.. वही करना था। अब कर्म का कोई उपाय न रहा.. फिर भी चीजें तो होती ही चली जाती हैं। जब व्यक्ति कर्ता नहीं रह जाता तो परमात्मा कर्ता हो जाता है। और जब परमात्मा कर्ता हो जाता है, इस भाव-दशा का नाम ही भाग्य है, विधि है।
ऐसे व्यक्ति की गर्दन काट दो, तो वह कहता है, कटनी थी। वह इसमें उसको भी दोषी नहीं ठहराता है जिसने काटी,क्योंकि अब वह मानता है, कर्ता कोई है नहीं। कटनी थी; कर्ता विलीन हो गया। ऐसे व्यक्ति को जहर पिला दो, तो वह कहता है,पीना था, होना था। और जो व्यक्ति जहर पिलाते वक्त भी जानता हो कि होना था, क्या उसके मन में क्षण भर को भी क्रोध आ सकता है उसके प्रति जिसने जहर पिला दिया? क्योंकि अब वह मानता ही नहीं कि कोई कर्ता है; इसलिए अब दोषारोपण समाप्त हुआ; इसलिए अब कोई जिम्मेवार है यह बात ही खत्म हुई--अब जो भी हो रहा है, वह परम नियति है; उसमें व्यक्ति का कोई लेना-देना नहीं है। ऐसा व्यक्ति अगर परम शांति को, परम संतोष को उपलब्ध हो जाए तो आश्चर्य क्या है?
जो सुख-दुख के बीच चुनाव करता है, वह कभी संतोष को उपलब्ध नहीं हो सकता; जो सुख-दुख में भेद करता है वह कभी संतोष नहीं पा सकता। जिसने सुख-दुख का भेद ही छोड़ दिया, वह संतुष्ट है। इसलिए लोग जो समझाते रहते हैं--बड़ी कीमती बातें भी कभी बहुत नासमझी के आधार बन जाती हैं।
लोग कहते हैं : संतोष में ही सुख है। पागल हैं बिलकुल, उन्हें संतोष का पता ही नहीं; अभी भी वे सुख को ही संतोष के साथ एक कर रहे हैं! और वे जिसको समझा रहे हैं, इसलिए समझा रहे हैं कि अगर सुख चाहते हो तो संतोष रखो। और जो सुख चाहता है वह संतुष्ट हो नहीं सकता, क्योंकि सुख असंतोष का सूत्र है। जो सुख चाहता है वह दुख से बचेगा ही; नहीं तो सुख चाह नहीं सकता। तो संतुष्ट कैसे होगा? सुख संतोष नहीं है। संतोष सुख नहीं है; संतोष सुख-दुख के पार है। और संतुष्ट वही है,जिसने सुख-दुख का भेद ही त्यागा। संतोष दोनों का अतिक्रमण करता है। इसलिए आप अगर कभी सुख मान कर संतोष कर रहे हों तो भ्रांति में मत पड़ना, आपका संतोष निपट धोखा है।
नियति, भाग्य, विधि परम आध्यात्मिक शब्द हैं। व्यक्ति अहंकार से मुक्त हुआ, यह उनका प्रयोजन है। अस्मिता नहीं है अब, शिकायत नहीं है अब, जो हो रहा है उसकी परम स्वीकृति है, टोटल एक्सेप्टेंस है। उससे अन्यथा होने का कोई कारण ही नहीं है। उससे अन्यथा हो ही नहीं सकता था। उससे अन्यथा की कोई चाह भी नहीं है। उससे अन्यथा होना चाहिए था इसका कोई स्वप्न भी नहीं है।
ऐसी जो तथाता है, ऐसा जो भाव है स्वीकार का, यह अगर आपके भीतर सारी लहरों को शांत कर जाए तो आश्चर्य है?सब लहरें खो जाएं तो आश्चर्य है? और इस लहर के खोने में ही आप भीतर... और भीतर... और भीतर प्रवेश करते चले जाते हैं।
इंद्रियां ही सुख और दुख के कारण हैं।
''शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध--ये ही सुख-दुख के कारण हैं।''

''पुण्य और पाप कर्मों का अनुसरण करने वाला आत्मा प्राप्त हुए शरीर के संयोग को अप्राप्त होते हुए भी स्वयं की तरह समझने लगता है, तब उसे उपाधिग्रस्त जीव कहते हैं। '' शरीर में हूं मैं, लेकिन शरीर नहीं हूं। शरीर में होना एक बात है, शरीर हो जाना बिलकुल दूसरी। शरीर में हूं ऐसा जो जानता है, वह आत्मा है; शरीर ही हूं ऐसा जो जानता है, वह जीव है--उपाधिग्रस्त हो गया, भ्रम में पड़ गया, भूल में पड़ गया; भ्रांति में पड़ गया; जो है, नहीं समझ रहा अपने को और जो नहीं है वह समझने लगा।शरीर हूं मैं
, यह क्यों पैदा हो जाता है? वही सुख-दुख के कारण, क्योंकि जिससे सुख-दुख मिलते हैं, जब सुख-दुख की.. सुख की आकांक्षा और दुख से बचने का भाव प्रबल होता है, तो जिससे मिलते हैं उसके साथ हम एकात्म अनुभव करने लगते हैं। प्रेमी अपनी प्रेयसी से कहता है, मुझमें और तुझमें अब कोई भेद नहीं, हम बिलकुल एक हो गए.. कभी हो नहीं सकते.. हम बिलकुल एक हो गए--क्यों? क्योंकि जिससे सुख मिलता है, हम उससे एकता साधना चाहते हैं, फासला नहीं रखना चाहते, क्योंकि फासले से कहीं सुख चूक न जाए। जरा सा भी फासला हुआ तो सुख पार कैसे आएगा--तो हम सब रंध्र-रंध्र तोड़ देना चाहते हैं,स्थान मिटा देना चाहते हैं, बिलकुल पास हो जाना चाहते हैं। इतने पास हो जाना चाहते हैं कि बीच में कोई जगह खाली न रह जाए, नहीं तो सुख के आने में बाधा पड़ेगी।
इसलिए जिससे हमें सुख मिलता है उससे हम अपने को एक कर लेते हैं। जिससे दुख मिलता है, उससे बड़ा फासला करते हैं, उससे बचते हैं, उसे देखना भी नहीं चाहते; उसके पास नहीं होना चाहते, उससे दूर होना चाहते हैं। इसलिए जिससे दुख मिलता है उसकी हम हत्या तक करने का विचार करते हैं, उसका जीवित होना भी हमारे लिए निकटता मालूम पड़ती है। वह कहीं भी जीए--हिमालय पर रहे, तिब्बत चला जाए, लेकिन जिंदा है, तो लगता है कि उसी हवा को छू रहा है जिसको हम छू रहे हैं, उसी आकाश के नीचे है जिसके नीचे हम हैं। उसको हम इतना भी बर्दाश्त नहीं करना चाहते, उसको मिटा ही डालना चाहते हैं--वह रह ही न जाए; वह कहीं न हो, तभी हमें चैन मिलेगा। फासला इतना हो जाना चाहिए, जितना जिंदा और मुर्दें के बीच होता है।
जिससे दुख मिलता है उसे हम दूर करना चाहते हैं, जिससे सुख मिलता है उसे हम पास करना चाहते हैं।
अब यह बहुत मजे की बात है : जब भी हमें सुख मिलता है तो हम समझते हैं वह हमारे शरीर से मिल रहा है; और जब भी दुख मिलता है हम समझते हैं वह दूसरे के शरीर से मिल रहा है। यह बहुत मजे का मामला है। यह बहुत ही मजे का राज है. जब भी हमें सुख मिलता है, तो हम समझते हैं हमारे शरीर से मिल रहा है। सुख के लिए हम कभी किसी दूसरे को जिम्मेवार नहीं ठहराते, सुख के लिए हम सदा स्वयं ही जिम्मेवार होते हैं; और दुख के लिए हम सदा दूसरे को जिम्मेवार ठहराते हैं।
अगर मुझे कोई प्रेम करता है, तो मैं समझता हूं कि मैं प्रेम करने योग्य हूं ही। होना ही चाहिए, जैसा हो रहा है, इसमें कोई.. इसमें कोई धन्यवाद देने तक का कारण नहीं है; मैं प्रेम करने योग्य हूं ही। और जब मुझ पर कोई क्रोध करता है तो मैं समझता हूं यह आदमी दुष्ट है, क्रोधी है। तब मैं ऐसा नहीं सोचता कि मैं क्रोध करने योग्य हूं ही।
और दोनों बातें एक साथ हैं। यह विभाजन तरकीब है, और धोखा है। या तो मैं दोनों हूं या मैं दोनों नहीं हूं। दो में से कुछ भी आदमी चुन ले तो सत्य की तरफ आसानी हो जाती है। दो में से कुछ भी चुन ले : या तो मैं दोनों हूं--प्रेम करने योग्य भी और घृणा करने योग्य भी। अगर मैं दोनों चुन लूं तो दोनों काट देते हैं एक-दूसरे को, क्योंकि मैं दोनों एक साथ कैसे हो सकता हूं? या मैं यह चुन लूं कि मैं दोनों नहीं हूं--न घृणा करने योग्य, न प्रेम करने योग्य; तब भी मैं खालीरह जाता हूं।
लेकिन हमारी तरकीब यह है कि हम अपने को समझ लेते हैं कि मैं समस्त सुखों को पाने का अधिकारी हूं और अगर मुझे दुख मिलते हैं तो दूसरों की कृपा से, सदा दूसरे कारणभूत हैं।
इसलिए कोई आदमी यह नहीं पूछता कि संसार में सुख क्यों है। मुझसे लोग आकर पूछते हैं, संसार में इतना दुख क्यों है? अभी मुझे एक ऐसा आदमी नहीं मिला जिसने आकर पूछा हो कि संसार में इतना सुख क्यों है? उसको तो वह मानता ही है कि अधिकारी है, उसमें कोई पूछने का सवाल ही नहीं.. टेकन फॉर ग्रांटेड। होना ही चाहिए, ऐसा है। दुख क्यों है, यह सवाल है। कोई मुझसे आकर नहीं पूछता कि आदमी जीता क्यों हैं? लोग पूछते हैं कि आदमी मरता क्यों है? मृत्यु क्यों है? जीवन तो होना ही चाहिए, लेकिन मृत्यु क्यों है? ऐसा लगता है कि जीवन तो हमारे भीतर है, मृत्यु कहीं बाहर से 'मती है। यह मजा है। तो मृत्यु को हम सदा दूर सोचते हैं.. कहीं बाहर से आती है और हमको मार डालती है। और जीवन हम हैं, और मृत्यु कहीं बाहर है--कभी बीमारी की उससे हम अपने को एक मानने लगते हैं; जिससे दुख मिल रहा है, उससे हम अपने को तोड़ना चाहते हैं। और चूंकि हम अपने शरीर को समझते हैं कि इससे सुख मिल रहा है, हम शरीर के साथ बंध जाते हैं।
आत्मा जब शरीर को समझने लगती है कि मैं शरीर ही हूं तो इसको ही उपाधि, बीमारी, दि वेरी डिज़ीज़, दि ओनली डिज़ीज़--एकमात्र बीमारी, ज्ञानियों ने कहा है। यही है उपाधि, यही है बीमारी। इस बीमारी से छूटने का एक ही उपाय है.. कि शरीर से सुख भी मिलता है तो दुख भी मिलता है--इस पूरे सत्य को देख लें; तो सुख और दुख एक- दूसरे को काट देंगे, निगेट कर देंगे--और आपको लगेगा कि अब हम उसकी तलाश करें, जिससे न दुख मिलता, न सुख मिलता, जिससे आनंद मिलता है।
आनंद न दुख है, न सुख; आनंद दोनों का अभाव है। उस खोज पर हम निकलें।
आज इतना ही।
अब हम... अब हम कोशिश करें शरीर से थोड़ा पीछे हटने की।...








15.9.16

दस अंध विश्वास जो विज्ञान-सम्मत नहीं हैं



हमारे समाज में कुछ ऐसी मान्यताएं प्रचलित हैं जिन्हें अंधविश्वास कहा जाता है। हालांकि विज्ञान इस संबंध में रिसर्च कर रहा है और कुछ हद तक वह इन सवालों के जवाब देने में सफल भी हुआ है और कुछ को उसने अंधविश्‍वास मानकर छोड़ दिया। जो लोग अंधविश्वासों को मानते हैं वे डरे हुए ही जीवन गुजार देते हैं, लेकिन साहसी लोग अपनी बुद्धि और समझ पर भरोसा करते हैं।
ढेरों विश्वास या अंधविश्वास हैं जिनमें से कुछ का धर्म में उल्लेख मिलता है और उसका कारण भी, लेकिन बहुत से ऐसे विश्वास हैं, जो लोक परंपरा और स्थानीय लोगों की मान्यताओं पर आधारित हैं। हालांकि इन विश्वासों को अनुभव पर आधारित माना जाता है। इनमें किस हद तक सच्चाई है यह शोध का विषय है।
यहां प्रस्तुत हैं ऐसे 10 अंधविश्वास जिनसे रोज ही आपका सामना होता है या कि जो सीधे-सीधे आपके जीवन को प्रभावित करते हैं और जिनके प्रभाव को भी आपने आजमाया होगा। इन सभी का हिन्दू धर्म से कोई नाता नहीं है।
* बिल्ली का रास्ता काटना, रोना और आपस में दो बिल्लियों का झगड़ना अशुभ है?
-बिल्ली का रास्ता काटना : माना जाता है कि बिल्ली की छठी इंद्री मनुष्यों की छठी इंद्री से कहीं ज्यादा सक्रिय है जिसके कारण उसे होनी-अनहोनी का पूर्वाभास होने लगता है।
मान्यता अनुसार काली बिल्ली का रास्ता काटना तभी अशुभ माना जाता है जबकि बिल्ली बाईं ओर रास्ता काटते हुए दाईं ओर जाए। अन्य स्थ‌ित‌ियों में बिल्ली का रास्ता काटना अशुभ नहीं माना जाता है।
जब बिल्ली रास्ता काटकर दूसरी ओर चली जाती है तो अपने पीछे वह उसकी नेगेटिव ऊर्जा छोड़ जाती है, जो काफी देर तक उस मार्ग पर बनी रहती है। खासकर काली बिल्ली के बारे में यह माना जाता है। हो सकता है कि प्राचीनकाल के जानकारों ने इसलिए यह अंधविश्वास फैलाया हो कि बिल्ली के रास्ता काटने पर अशुभ होता है।
बिल्ली का रोना : बिल्ली के रोने की आवाज बहुत ही डरावनी होती है। निश्‍चित ही इसको सुनने से हमारे मन में भय और आशंका का जन्म होता है। माना जाता है कि बिल्ली अगर घर में आकर रोने लगे तो घर के किसी सदस्य की मौत होने की सूचना है या कोई अनहोनी घटना हो सकती है।
बिल्ली का आपस में झगड़ना : बिल्लियों का आपस में लड़ना धनहानि और गृहकलह का संकेत है। यदि किसी के घर में बिल्लियां आपस में लड़ रही हैं तो माना जाता है कि शीघ्र ही घर में कलह उत्पन्न होने वाली है। गृहकलह से ही धनहानि होती है।
बिल्ली से जुड़े अन्य अंधविश्वास :
* लोक मान्यता है कि दीपावली की रात घर में ब‌िल्ली का आना शुभ शगुन होता है।
* बिल्ली घर में बच्चे को जन्‍म देती है तो इसे भी अच्छा माना जाता है।
* किसी शुभ कार्य से कहीं जा रहे हों और बिल्ली मुंह में मांस का टुकड़ा लिए हुए दिखाई दे तो काम सफल होता है।
* लाल किताब के अनुसार बिल्ली को राहु की सवारी कहा गया है। जिस जातक की कुण्डली में राहु शुभ नहीं है उसे राहु के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए ब‌िल्ली पालना चाहिए।
* लाल क‌िताब के टोटके के अनुसार बिल्ली की जेर को लाल कपड़े में लपेटकर बाजू पर बांधने से कालसर्प दोष से बचाव होता। ऊपरी चक्कर, नजर दोष, प्रेत बाधा इन सभी में ब‌िल्ली की जेर बांधने से लाभ मिलता है।
* यदि सोए हुए व्यक्ति के ‌स‌िर को बिल्ली चाटने लगे तो ऐसा व्यक्ति सरकारी मामले में फंस सकता है।
* बिल्ली का पैर चाटना निकट भविष्य में बीमार होने का संकेत होता है।
* ब‌िल्ली ऊपर से कूदकर चली जाए तो तकलीफ सहनी पड़ती है।
* यदि आप कहीं जा रहे हैं और बिल्ली आपके सामने कोई खाने वाली वस्तु लेकर आए और म्याऊं बोले तो- अशुभ होता है। यही क्रिया आपके घर आते समय हो तो- शुभ होता है।
* कुत्ते के रोने को अशुभ क्यों माना जाता है?
-कुत्ते का रोना अशुभ माना जाता है। मान्यता है कि घर के सामने घर की ओर मुंह करके कोई कुत्ता रोए तो उस घर पर किसी प्रकार की विपत्ति आने वाली है या घर के किसी सदस्य की मौत होगी।
* क्या बंदर का सुबह-सुबह मुंह देखने से खाना नहीं मिलता?-ऐसी मान्यता है कि सुबह-सवेरे बंदर के दर्शन हो जाने के बाद दिनभर खाना नसीब नहीं होता। बंदर से जुड़ी ऐसे कई शुभ और अशुभ मान्यताएं हैं।
* किसी सुनसान स्थान पर पेशाब कर देने से क्या भूत लग जाता है?



-ऐसी मान्यता हैं कि किसी सुनसान या जंगल की किसी विशेष भूमि कर पेशाब कर देने से भूत पीछे लग जाता है। मान्यता अनुसार वहां कोई आत्मा निवास कर रही हो और आपने वहां जाकर पेशाब कर दिया हो तो।
ऐसे में कुछ लोग पहले थूकते हैं फिर पेशाब करते हैं और कुछ लोग कोई मंत्र वगैरह पढ़कर ऐसा करते हैं। जैन धर्म के अनुसार पेशाब करने के बाद कहा जाता हैं कि भगवान शकेंद्रनाथ की आज्ञा से ऐसा किया गया। कुछ लोग यह कहने के बाद पेशाब करते हैं- उत्तम धरती मध्यम काया, उठो देव मैं मूतन आया।
अन्य मान्यता :
* नदी, पूल या जंगल की पगडंडी पर पेशाब नहीं करते।
* मान्यता अनुसार एकांत में पवित्रता का ध्यान रखते हैं और पेशाब करने के बाद धेला अवश्य लेते हैं। उचित जगह देखकर ही पेशाब करते हैं।
* भोजन के बाद पेशाब करना और उसके बाद बाईं करवट सोना बड़ा हितकारक है।
बंदर से जुड़े अंधविश्वास :
* जाते वक्त बंदर बाईं ओर दिखे तो- यह शुभता का प्रतीक है। कार्य में सफलता मिलेगी।
* संध्याकाल में यात्रा के लिए निकले और बंदर दिखाई पड़े तो आपकी यात्रा मंगलमय होगी।
* बंदर का दाहिनी ओर तथा बिल्ली का बाईं ओर दिखना शुभ होता है।
कुत्ते से जुड़े अन्य अंधविश्वास :
* मान्यता है कि घर के सामने सुबह के समय यदि कुत्ता रोए तो उस दिन कोई भी महत्वपूर्ण कार्य नहीं करना चाहिए। यदि किसी मकान की दीवार पर कुत्ता रोते हुए पंजा मारता दिखे तो समझा जाता है कि उक्त घर में चोरी हो सकती है या किसी अन्य तरह का संकट आ सकता है।
* यदि कोई व्यक्ति किसी के अंतिम संस्कार से लौट रहा है और साथ में उसके कुत्ता भी आया है तो उस व्यक्ति की मृत्यु की आशंका रहती है अथवा उसे कोई बड़ी विपत्ति का सामना करना पड़ सकता है।
* माना जाता है कि पालतू कुत्ते के आंसू आए और वह भोजन करना त्याग दे तो उस घर पर संकट आने की सूचना है।
* आप किसी कार्य से बाहर जा रहे हैं और कुत्ता आपकी ओर देखकर भौंके तो आप किसी विपत्ति में फंसने वाले हैं। ऐसे में उक्त जगह नहीं जाना ही उचित माना जाता है।
* घर से निकलते समय यदि कुत्ता अपने शरीर को कीचड़ में सना हुआ दिखे और कान फड़फड़ाए तो यह बहुत ही अपशकुन है। ऐसे समय में कार्य और यात्रा रोक देनी चाहिए।
* कुत्ता यदि सामने से हड्डी अथवा मांस का टुकड़ा लाता हुआ नजर आए तो अशुभ।
* संभोगरत कुत्ते को देखना भी अशुभ माना गया है, क्योंकि इससे आपके कार्य में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं और परिवार में झगड़ा हो सकता है।
* यदि किसी के दरवाजे पर लगातार कुत्ता भौंकता है तो परिवार में धनहानि या बीमारी आ सकती है।
* मान्यता है कि कुत्‍ता अगर आपके घुटने सूंघे तो आपको कोई लाभ होने वाला है।
* यदि आप भोजन कर रहे हैं और उसी समय कुत्ते का रोना सुनाई दे, तो यह बेहद अशुभ होता है।
* क्या सपनों से शुभ और अशुभ संकेत मिलते हैं?
-ज्योतिष लोग सपनों के शुभ और अशुभ फल बताते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है यह शोध का विषय हो सकता है, लेकिन यह अंधविश्वास लोगों के बीच बहुत प्रचलित है और लोग इसे मानते भी हैं।
व्यक्ति को अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के सपने आते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये हमारे शरीर और मन की अवस्था के अनुसार आते हैं। यदि भारी और ठोस आहार खाया है तो बुरे सपने आने के चांस बढ़ जाते हैं। पेट खराब रहने की स्थिति में भी ऐसा होता है। यदि आपकी मानसिक स्थिति खराब है और नकारात्मक विचारों की अधिकता है तब भी बुरे सपने आते हैं।
* सूर्यास्त के बाद झाडू क्यों नहीं लगाते और झाड़ू को खड़ा क्यों नहीं रखते?
- झाड़ू को हिन्दू धर्म में लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि संध्याकाल और रात में झाड़ू लगाने से लक्ष्मी चली जाती है और व्यक्ति के बुरे दिन शुरू हो जाते हैं। झाड़ू को खड़ा करके रखने पर घर में कलह होती है।
इस मान्यता के कारण लोग रात में झाड़ू नहीं लगाते और झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखते हैं। झाड़ू और पोंछे को घर में प्रवेश करने वाली बुरी अथवा नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करने का प्रतीक भी माना जाता है।
झाड़ू से जुड़े अन्य अंधविश्वास :
* कुछ विद्वानों का मानना है कि दिनभर घर में जो ऊर्जा इकट्ठी हो गई है उसे रात में बाहर करना ठीक नहीं।
* खुले स्थान पर झाड़ू रखना अपशकुन माना जाता है इसलिए इसे छिपाकर रखा जाता है। जिस प्रकार धन को छुपाकर रखते हैं उसी प्रकार झाड़ू को भी। वास्तु विज्ञान के अनुसार जो लोग झाड़ू के लिए एक नियत स्थान बनाने की बजाय कहीं भी रख देते हैं, उनके घर में धन का आगमन प्रभावित होता है। इससे आय और व्यय में असंतुलन बना रहता है। आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
* भोजन कक्ष में झाड़ू भूलकर न रखें। मान्यता अनुसार इससे अनाज खत्म होने और इंकम के रुक जाने का डर बना रहता है।
* घर के बाहर दरवाजे के सामने झाड़ू उल्टी करके रखने से यह चोर और बुरी ताकतों से आपके घर की रक्षा करती है। यह काम केवल रात के समय किया जा सकता है। दिन के समय झाड़ू छिपाकर रखना चाहिए ताकि किसी को नजर न आए।
* अगर कोई बच्चा अचानक झाड़ू लगाने लगे तो समझना चाहिए आपके घर में अनचाहा मेहमान आने वाला है।
* घर में नमक मिले पानी से पोंछा लगाने से घर से नकारात्मकता खत्म हो जाएगी। बुरी ताकतें बेअसर हो जाती हैं।
* गुरुवार को घर में पोंछा न लगाएं, ऐसा करने से लक्ष्मी रूठ जाती है। गुरुवार को छोड़कर घर में रोज पोंछा लगाने से लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
* जो लोग किराए से रहते हैं वे नया घर किराए पर लेते हैं अथवा अपना घर बनवाकर उसमें गृह प्रवेश करते हैं तब इस बात का ध्यान रखें कि आपकी झाड़ू पुराने घर में न रह जाए। मान्यता है कि ऐसा होने पर लक्ष्मी पुराने घर में ही रह जाती है और नए घर में सुख-समृद्घि का विकास रुक जाता है।
बांस को जलाने से क्या वंश नष्ट हो जाता है?
* प्राचीनकाल से ही बांस की उपयोगिता रही है। इससे जहां घर बनते थे वहीं इससे टोकरियां, बिछात और बांसुरियां भी बनाई जाती थीं। बांस मनुष्य जीवन के लिए बहुत ही उपयोगी माने गए हैं। लोग इनका उपयोग जलाने की लकड़ी की तरह नहीं करें, शायद इसीलिए यह अफवाह फैलाई गई कि बांस जलाने से वंश नष्ट होता है।
बांस प्रतिकूल परिस्थितियों में भी भरपूर वृद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं और किसी भी प्रकार के तूफानी मौसम का सामना करने का सामर्थ्य रखने के प्रतीक हैं। यह पौधा अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक है।
हालांकि बांसों की रगड़ से कभी-कभी आग लग जाती है तो सारे बांस अपनी ही आग में जल जाया करते थे जिससे बांसों की पहले से ही कमी हो जाती थी। ऐसे में बांसों को बचाना और भी जरूरी हो जाता है। आजकल तो अगरबत्तियों में भी बांस का उपयो‍ग किया जाता है।
* जूते-चप्पल उल्टे हो जाए तो आप मानते हैं कि किसी से लड़ाई-झगड़ा हो सकता है?
-ऐसा माना जाता है कि घर के बारह रखे जूते या चप्पल यदि उल्टे हो जाएं तो उन्हें तुरंत सीधा कर देना चाहिए अन्यथा आपकी किसी से लड़ाई होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा होने से बचने के लिए चप्पल उल्टी हुई है तो एक चप्पल से दूसरी चप्पल को मारकर सीधा रखने का अंधविश्वास है। इसी तरह जूते के साथ भी किया जाता है।
जूते से जुड़े अन्य अंधविश्वास :
* जूते या चप्पल को कई लोग नजर और अनहोनी से बचने का टोटका भी मानते हैं इसीलिए वे अपनी गाड़ी के पीछे निचले हिस्से में जूता लटका देते हैं।
* कुछ लोग मानते हैं कि शनिवार को किसी मंदिर में चप्पल या जूते छोड़कर आ जाने से शनि का बुरा असर समाप्त हो जाता है।
* जूता सुंघाने से मिरगी का दौरा शांत हो जाता है।
बांस से जुड़े अन्य अंधविश्वास :
* फेंगशुई में लंबी आयु के लिए बांस के पौधे बहुत शक्तिशाली प्रतीक माने जाते हैं। यह अच्छे भाग्य का भी संकेत देता है इसलिए आप बांस के पौधों का चित्र लगाकर उन्हें शक्तिशाली बना सकते हैं।
* जाते समय अगर कोई पीछे से टोक दे या छींक दे तो आप क्यों चिढ़ जाते हैं?
- यदि आप किसी प्रयोजन से जा रहे हैं और कोई टोक दे अर्थात पूछे कि कहां जा रहो? या कहे कि चाय पीकर जाओ या कुछ और कह दे, तो जिस कार्य के लिए आप कहीं जा रहे हैं उस कार्य में असफलता ही मिलेगी।
हालांकि किसी विशेष कार्य के लिए जाते समय गाय, बछड़ा, बैल, सुहागिन, मेहतर और चूड़ी पहनाने वाला दिखाई दे अथवा रास्ता काट जाए तो यह शुभ शकुन कार्य सिद्ध करने वाला होता है।
* किसी दिन विशेष को बाल कटवाने या दाढ़ी बनवाने से परहेज क्यों करते हैं?
-अधिकतर लोग मानते हैं कि मंगलवार, शनिवार को बाल नहीं कटवाना चाहिए और न ही दाढ़ी बनवाना चाहिए। बहुत से लोग गुरुवार के दिन भी ऐसा करने से परहेज करते हैं।
ज्योतिष के अनुसार मंगलवार का खासा मह‍त्व है। यह हनुमानजी का दिन है और मंगलवार का कारक ग्रह हैं मंगल देव। मंगल ग्रह को क्रूर ग्रह माना जाता है।







आत्मविश्वास बढ़ाने के आसान तरीके



इंटरव्यू के समय या किसी मंच पर बोलते समय कई लोगो के हाथ-पैर इसलिए फूल जाते हैं क्योंकि उनको खुद पर विश्वास नहीं होता. आपके पास चाहे कितनी भी नॉलेज क्यों न हो पर यदि आप confidence नहीं है तो आपका ज्ञान आपके लिए कुछ भी नहीं.
कई बार आपके सामने अपनी काबिलियत साबित करने मौका आता है और उस वक्त पर आपका आत्मविश्वास अगर हिल गया तो आपको पीछे हटना पड़ता है.आत्मविश्वास की कमी के कारण हमारा व्यक्तित्व पर नकारात्मक असर पड़ता है.
कई बार आत्मविश्वास की कमी के कारण आने वाली कई बड़ी संभावनाएं हमसे छूट जाती हैं.
अगर आप अपने आसपास या किसी भी मौके पर किसी सफल आदमी को देखते है तो आपने यह जरुर note किया होगा की उस आदमी में आपको पूरा confidence दिख जायेगा. जो भी व्यक्ति अपने जीवन में बड़े मुकाम पर पहुंचता है या सफल होता है वह हमेशा aatmvishvas से लबरेज होता है. कई एक्टर और एक्ट्रेस, राजनेता, महान क्रिकेटर, या कोई बिजनेसमैन सभी में आत्मविश्वास का गुण कूट-कूट कर भरा होता है.
कोई व्यक्ति अगर शारीरिक व मानसिक रूप से अस्वस्थ होते हुये भी अगर सफलता प्राप्त करता है तो इसका Main Reason उस व्यक्ति का आत्मविश्वास होता है.
Self confidence के कारण ही अब्राहम लिंकन कई बार चुनाव हारने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति बने उनकी यह सफलता confidence के कारण ही थी. ऐसे ही आप अगर अपने आसपास देखेंगे तो कई exmple आपको भी मिल जायेंगे.
सफल व्यक्ति को खुद पर पूर्ण रूप से विश्वास होता है जिस कारण वह सफलता जरूर प्राप्त करता है. किसी व्यक्ति में कॉन्फिडेंस कम या ज्यादा हो सकता है परन्तु आपको खुद में Self confidence बढ़ाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए.

अपने आत्मविश्वास को मजबूत रखने और व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने के लिए अगर आप अपनी सोच में ये बदलाव लाएंगे तो यकीनन सफलता आपके कदम चूमेगी.
आत्मविश्वास बढ़ाने के 10 tips-:
* सफल लोगो की तरह खुद को ढालें:
आपको अपने जीवन में कई ऐसे लोग जरुर मिले होंगे जिनको देखकर आपको लगा होगा की यह व्यक्ति पूरी तरह aatmvishvas से भरा हुआ है. उन लोगो की उन खास बातो को नोट जरुर करा होगा जो उनका कॉन्फिडेंस बढाती है. जैसे- चलने और बैठने के ढंग पर ध्यान दे, जो बोलना है उसे दबी आवाज में मत बोले और बाते करते वक्त नजरे मिलाये आदि .
जब मैं अपने स्कूल में पढता था तो अपने से बेहतर स्टूडेंट को फॉलो करता था और उसी की तरह कई चीजे करने का प्रयास करता था. for example- class में first सीट पर बैठना, अध्यापक के पूछने पर सबसे पहले आंसर देना और साथी सहपाठियों को नयी-नयी जानकारियां देना आदि. इन चीजो से मुझे बहुत confidence मिलता था.
* बीते समय में मिले अपने achievements को याद करे:
आपको अपने past में कई अचीवमेंट्स मिले होंगे. उदाहरण- आप अपने class में कभी first आये होंगे, किसी विषय में स्कूल में सबसे ज्यादा मार्क्स होंगे, किसी कॉम्पटीसन में में बेस्ट किया होगा या किसी sports में ख़िताब जीता होगा. आपका खुद पर विश्वास जब कम होता है तो उस समय आप अपने पिछले प्राप्त किये हुए achivments को याद करे यह आपका self-confidence जरुर improve करेगा.
* यह महसूस करे की आप confident हैं:
कई बार हम सिर्फ इसलिए low confidence feel करते है क्योंकि हमें लगता है की मेरे अन्दर आत्मविश्वास नहीं है जो हमारा confidence और गिरा देता है तो आप किसी भी वक्त पर बिलकुल Negative न सोचे बल्कि यह सोचे की आप पूरी तरह से full-confidence है. आप अपने mind में यह imazine कर सकते है की आपकी सभी लोग तारीफ कर रहे है. वो आपकी ओर आकर्षित हो रहे है.ऐसा सोचना आपको बहुत benifit देगा.
* गलतियाँ होने पर घबराये मत:
अगर कोई व्यक्ति आपसे यह कहे की उसने अपने जीवन में कभी कोई गलती नहीं की तो आप यह समझ ले की वह व्यक्ति आपसे कोरा झूठ बोल रहा है. गलती तो इंसान ही करता है.जब वह गलती करता है तभी उस गलती से सीखता है और अगली बार वह उस काम को बेहतर ढंग से करता है.
सबसे बड़ी गलती हम तब करते है जब हम कोई भी काम सिर्फ इस सोच के कारण नहीं करते कि मुझसे यह काम नहीं होगा या मुझसे कोई गलती हो जाएगी और इस सोच के कारण हम प्रयास ही नहीं करते जो हमारे लिए बहुत नुकसानदायक होता है. इसलिए गलती होने के डर से या असफल होने के डर से आप अपने बेहतरीन मौको को न गवाएं. बल्कि प्रयास करे यह आपको नयी सीख देगा.

* खुद को किसी चीज में और लोगो से बेहतर बनाये:

आज के दौर में हर आदमी औरो से कुछ अलग करना चाहता है. भगवान ने हमें कुछ ऐसा Special telent दिया है जो हमें और लोगो से अलग करता है बस जरुरत है तो उसे खोजने की. कोई भी आदमी हर फील्ड में एक्सपर्ट नहीं बन सकता लेकिन वह अपने हॉबी और interest के कुछ चीजो में expert जरुर बन सकता.
मैं जब अपने स्कूल में पढता था तो मेरे कई दोस्त singing, dancing, sports, cricket में मुझसे बेहतर थे लेकिन मैं स्कूल में पढाई में अच्छा था जो मुझे उनसे अलग बनाता था. वही आज मैं nayichetana.com ब्लॉग बना कर लोगो को अपने आर्टिकल,अपने विचारो व अनुभवों के द्वारा जब उनकी हेल्प करता हूँ तो यह मुझे confidence देता है.
इसलिए दोस्तों आप भी खुद के interest का कुछ ऐसा काम करिए या ऐसी हॉबी जैसे क्रिकेट, फूटबाल, डांस, म्यूजिक आदि creat करिए जो आपको आपके एरिया में सबसे अलग बनाये. अगर आप अपने ऑफिस में काम करते है तो वहां औरो से बेहतर बने, अगर स्टूडेंट हो तो अपने school or college में बेहतर बने. अगर आप किसी चीज में better होंगे तो यह आपका confidence level बहुत ही high कर देगा.
इंटरव्यू के समय या किसी मंच पर बोलते समय कई लोगो के हाथ-पैर इसलिए फूल जाते हैं क्योंकि उनको खुद पर विश्वास नहीं होता. आपके पास चाहे कितनी भी नॉलेज क्यों न हो पर यदि आप confidence नहीं है तो आपका ज्ञान आपके लिए कुछ भी नहीं.
कई बार आपके सामने अपनी काबिलियत साबित करने मौका आता है और उस वक्त पर आपका आत्मविश्वास अगर हिल गया तो आपको पीछे हटना पड़ता है.आत्मविश्वास की कमी के कारण हमारा व्यक्तित्व पर नकारात्मक असर पड़ता है.
कई बार आत्मविश्वास की कमी के कारण आने वाली कई बड़ी संभावनाएं हमसे छूट जाती हैं.

अगर आप अपने आसपास या किसी भी मौके पर किसी सफल आदमी को देखते है तो आपने यह जरुर note किया होगा की उस आदमी में आपको पूरा confidence दिख जायेगा. जो भी व्यक्ति अपने जीवन में बड़े मुकाम पर पहुंचता है या सफल होता है वह हमेशा aatmvishvas से लबरेज होता है. कई एक्टर और एक्ट्रेस, राजनेता, महान क्रिकेटर, या कोई बिजनेसमैन सभी में आत्मविश्वास का गुण कूट-कूट कर भरा होता है.

कोई व्यक्ति अगर शारीरिक व मानसिक रूप से अस्वस्थ होते हुये भी अगर सफलता प्राप्त करता है तो इसका Main Reason उस व्यक्ति का आत्मविश्वास होता है.
Self confidence के कारण ही अब्राहम लिंकन कई बार चुनाव हारने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति बने उनकी यह सफलता confidence के कारण ही थी. ऐसे ही आप अगर अपने आसपास देखेंगे तो कई exmple आपको भी मिल जायेंगे.
सफल व्यक्ति को खुद पर पूर्ण रूप से विश्वास होता है जिस कारण वह सफलता जरूर प्राप्त करता है. किसी व्यक्ति में कॉन्फिडेंस कम या ज्यादा हो सकता है परन्तु आपको खुद में Self confidence बढ़ाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए.

अपने आत्मविश्वास को मजबूत रखने और व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने के लिए अगर आप अपनी सोच में ये बदलाव लाएंगे तो यकीनन सफलता आपके कदम चूमेगी.
आत्मविश्वास बढ़ाने के 10 tips-:


* सफल लोगो की तरह खुद को ढालें:
आपको अपने जीवन में कई ऐसे लोग जरुर मिले होंगे जिनको देखकर आपको लगा होगा की यह व्यक्ति पूरी तरह aatmvishvas से भरा हुआ है. उन लोगो की उन खास बातो को नोट जरुर करा होगा जो उनका कॉन्फिडेंस बढाती है. जैसे- चलने और बैठने के ढंग पर ध्यान दे, जो बोलना है उसे दबी आवाज में मत बोले और बाते करते वक्त नजरे मिलाये आदि .
जब मैं अपने स्कूल में पढता था
 तो अपने से बेहतर स्टूडेंट को फॉलो करता था और उसी की तरह कई चीजे करने का प्रयास करता था. for example- class में first सीट पर बैठना, अध्यापक के पूछने पर सबसे पहले आंसर देना और साथी सहपाठियों को नयी-नयी जानकारियां देना आदि. इन चीजो से मुझे बहुत confidence मिलता था.






* बीते समय में मिले अपने achievements को याद करे:
आपको अपने past में कई अचीवमेंट्स मिले होंगे. उदाहरण- आप अपने class में कभी first आये होंगे, किसी विषय में स्कूल में सबसे ज्यादा मार्क्स होंगे, किसी कॉम्पटीसन में में बेस्ट किया होगा या किसी sports में ख़िताब जीता होगा. आपका खुद पर विश्वास जब कम होता है तो उस समय आप अपने पिछले प्राप्त किये हुए achivments को याद करे यह आपका self-confidence जरुर improve करेगा.
* यह महसूस करे की आप confident हैं:
कई बार हम सिर्फ इसलिए low confidence feel करते है क्योंकि हमें लगता है की मेरे अन्दर आत्मविश्वास नहीं है जो हमारा confidence और गिरा देता है तो आप किसी भी वक्त पर बिलकुल Negative न सोचे बल्कि यह सोचे की आप पूरी तरह से full-confidence है. आप अपने mind में यह imazine कर सकते है की आपकी सभी लोग तारीफ कर रहे है. वो आपकी ओर आकर्षित हो रहे है.ऐसा सोचना आपको बहुत benifit देगा.
* गलतियाँ होने पर घबराये मत:
अगर कोई व्यक्ति आपसे यह कहे की उसने अपने जीवन में कभी कोई गलती नहीं की तो आप यह समझ ले की वह व्यक्ति आपसे कोरा झूठ बोल रहा है. गलती तो इंसान ही करता है.जब वह गलती करता है तभी उस गलती से सीखता है और अगली बार वह उस काम को बेहतर ढंग से करता है.
सबसे बड़ी गलती हम तब करते है जब हम कोई भी काम सिर्फ इस सोच के कारण नहीं करते कि मुझसे यह काम नहीं होगा या मुझसे कोई गलती हो जाएगी और इस सोच के कारण हम प्रयास ही नहीं करते जो हमारे लिए बहुत नुकसानदायक होता है. इसलिए गलती होने के डर से या असफल होने के डर से आप अपने बेहतरीन मौको को न गवाएं. बल्कि प्रयास करे यह आपको नयी सीख देगा.""


* खुद को किसी चीज में और लोगो से बेहतर बनाये:
आज के दौर में हर आदमी औरो से कुछ अलग करना चाहता है. भगवान ने हमें कुछ ऐसा Special telent दिया है जो हमें और लोगो से अलग करता है बस जरुरत है तो उसे खोजने की. कोई भी आदमी हर फील्ड में एक्सपर्ट नहीं बन सकता लेकिन वह अपने हॉबी और interest के कुछ चीजो में expert जरुर बन सकता.
मैं जब अपने स्कूल में पढता था तो मेरे कई दोस्त singing, dancing, sports, cricket में मुझसे बेहतर थे लेकिन मैं स्कूल में पढाई में अच्छा था जो मुझे उनसे अलग बनाता था. वही आज मैं nayichetana.com ब्लॉग बना कर लोगो को अपने आर्टिकल,अपने विचारो व अनुभवों के द्वारा जब उनकी हेल्प करता हूँ तो यह मुझे confidence देता है.
इसलिए दोस्तों आप भी खुद के interest का कुछ ऐसा काम करिए या ऐसी हॉबी जैसे क्रिकेट, फूटबाल, डांस, म्यूजिक आदि creat करिए जो आपको आपके एरिया में सबसे अलग बनाये. अगर आप अपने ऑफिस में काम करते है तो वहां औरो से बेहतर बने, अगर स्टूडेंट हो तो अपने school or college में बेहतर बने. अगर आप किसी चीज में better होंगे तो यह आपका confidence level बहुत ही high कर देगा.

* जरुरतमंदो की सहायता करे:

आप अपने जीवन में उन लोगो के लिए कुछ अच्छा करे जो बदले में आपको कुछ नहीं दे सकते. अगर आप दुसरे लोगो की मदद करते है तो इससे आपका आत्मविश्वास बढेगा. अपने आस-पड़ोस में लोगो की हेल्प करके और किसी गरीब आदमी को कुछ सहारा देकर और शारारिक रूप से अक्षम लोगो की मदद करके आपको जो ख़ुशी मिलेगी वह कही और आपको नहीं मिल सकती और यह आपके अन्दर एक self-respect भी पैदा करेगा.

* अपनी dressing में सुधार करे:

आप किसी भी तरह के प्रोग्राम,पार्टी,शादी या किसी मीटिंग में अगर जाते हो तो अपने ड्रेस का ध्यान जरुर रखे. जब भी कपड़े खरीदने जाये तो ऐसे कपड़े ख़रीदे जो आपको confidence दे. आप कभी भी यह नोट जरुर करना की जब आप अच्छे तरह से तैयार होते है और आपका dressing जब अच्छा रहता है तो आप तब खुद को आत्मविश्वास से भरा हुआ पाएंगे क्योंकि इससे हमको लोगो का सामना करने का आत्मविश्वास मिल जाता है.





* जिस चीज से आपका confidence घटता है उसे करते रहे:
कई लोगो ऐसे होते है जो किसी खास कारण से अपना आत्मविश्वास low करते है.किसी को प्रेजेंटेशन के वक्त डर लगता है तो कोई स्टेज पर आने से डरता है. कई लोग तो ऐसे होते है जिनका दिल तो चाहता है की वह यह काम करे लेकिन सिर्फ डर और लोग क्या कहेंगे के कारण उस काम को करने से डरते है. अगर मैं अपनी बात करूँ तो जब मैंने n.g.o. में पहली बार काम करा तब मुझे मीटिंग में अपने साथियो के साथ बात करने में घबराहट होती थी जिस कारण मैं अपनी बात को सही ढंग से नहीं रख पाता था. जो मेरे confidence को पूरा low कर देता था.
लेकिन धीरे-धीरे मैंने कोशिश करी और इसमें सफलता पाई और आज न कोई घबराहट है न confidence low होता है. इसलिए आप भी उस चीज को बार-बार करिए जो आपके आत्मविश्वास को कम करता है.
* दूसरो से अपनी तुलना न करे:
अगर आपका confidence low होता है तो इसका main reason आपका अपनी तुलना दूसरो से करना है. अगर आप देखेंगे तो यह पाएंगे की आप हमेशा उन लोगो की तरह बनना चाहते है जो आपकी नजर में आपसे बेहतर या सफल है. यह आपके लिए आत्मविश्वास के लिए बहुत बड़ी बात होती है जो आपके आत्मविश्वास को बिलकुल जीरो कर देता है. आपको यह ध्यान रखना चाहिए की हर व्यक्ति की situatian और हालात अलग-अलग होते है.
क्या पता उस आदमी को आपसे बेहतर हालात और मौके मिले हो जिस कारण वह सफल हुआ हो. इसलिए किसी भी व्यक्ति को कामयाब देखकर खुद से तुलना न करे बल्कि अपनी प्रतिभा और ताकत को अपना औजार बनाये. अपने लक्ष्य तय करे और उसे हासिल करने की सोचे.
* अपना कार्य समय पर पूरा करे:
आप अपने दिनभर के कार्यो का टाइम टेबल बना ले.आपने एक दिन में क्या-क्या करना है वह पहले ही सोच ले और उसके बाद सुबह से ही अपने कार्यो को पूरा करने के लिए जुट जाए. अगर आप अपने works को निश्चित समय के अन्दर पूरा करते है तो यह आपके आत्मविश्वास को बहुत ही बढ़ा देगा.


दोस्तों हमारी ज़िन्दगी का जो समय है वह दिन-प्रतिदिन कम होता रहेगा. कब हम युवा से बुड्ढे हो जाये समय के साथ पता ही नहीं चलेगा. अपने low-confidence के कारण life में घबराओ मत.जीवन में सफलता के लिए confidence बहुत ही आवश्यक है. बिना confidence के शायद ही कोई व्यक्ति सफल हो पाए. अगर आप प्रैक्टिस करोगे तो आप अपना confidence आसानी से boost कर सकते है.
इसके लिए जरुरत है तो बस अभ्यास की. आप इस बात को जान लिजिये की आपका confidence आपके looks,आपके घर के हालात, समाज की दशा, आपकी शिक्षा या पैसो पर depend नहीं करता बल्कि यह तो आपके अन्दर से आता है. अगर आप self-confident है तो बिना आपके permission के कोई भी बाहरी तत्व आपको low-confidence feel नहीं करा सकता.
इसलिए अपना confidence को बढ़ाये और बढ़ा ले कदम सफलता की ओर.