4.12.17

प्रतियोगी परीक्षा मे पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण व्याकरण संबंधी प्रश्न और उत्तर





1. आँख की किरकिरी होने का अर्थ है→अप्रिय लगना।
2. लाल पीला होने का अर्थ है→क्रोध करना।
3. 'नमक का दरोगा' कहानी के लेखक हैं→प्रेमचंद।
4. किस नाटककार ने अपने नाटकों के लिए रंगमंच को अनिवार्य नहीं माना है? →जयशंकर प्रसाद।
5. 'प्रभातफेरी' काव्य के रचनाकार कौन हैं? →नरेन्द्र शर्मा।
6. 'निशा -निमंत्रण' के रचनाकार कौन हैं? → हरिवंश राय बच्चन।
7. बिहारी किस राजा के दरबारी कवि थे? →जयपुर नरेश जयसिंह के।
8. 'अतीत के चलचित्र' के रचयिता हैं→महादेवी वर्मा।
9. तुलसीदास का वह ग्रंथ कौन-सा है, जिसमें ज्योतिष का वर्णन किया गया है? →रामाज्ञा प्रश्नावली।
10. 'रामचरितमानस' में प्रधान रस के रूप में किस रस को मान्यता मिली है? →भक्ति रस।
वाक्यों में त्रुटियां एवं अशुद्धियां।
वाक्यों में त्रुटियाँ :- वाक्य भाषा की बहुत अहम् इकाई होता है । इसलिए आप की भाषा शुद्ध हो इसके लिए आवश्यक है की आपको वाक्य शुद्धि का ज्ञान हो वाक्य रचना में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण,क्रिया,अव्यय से सम्बंधित या अन्य प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं जिनसे सम्बंधित विभिन्न प्रश्न परीक्षाओं में पूछे जाते हैं ।
विभिन्न प्रकार की त्रुटियों के(विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न) उदाहण एवं उनमे सुधार निम्न प्रकार से है -
◆ संज्ञा संबंधी अशुद्धियाँ:-
1. अशुद्ध वाक्य:- हिंदी के प्रचार में आज भी बड़े बड़े संकट हैं।
शुद्ध वाक्य:- हिंदी के प्रचार में आज भी बड़ी बड़ी बाधाएं हैं।
2.अशुद्ध वाक्य:- सीता ने गीत की दो चार लड़ियाँ गायी।
शुद्ध वाक्य:- सीता ने गीत की दो चार कड़ियाँ गायी।
3. अशुद्ध वाक्य:- पतिव्रता नारी को छूने का उत्साह कौन करेगा।
शुद्ध वाक्य:- पतिव्रता नारी को छूने का साहस कौन करेगा।
4. अशुद्ध वाक्य:- मुझे सफल होने की निराशा है।
शुद्ध वाक्य:- मुझे सफल होने की आशा नहीं है।
भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर


◆ लिंग संबंधी अशुद्धियाँ:-
1. अशुद्ध वाक्य:- परीक्षा की प्रणाली बदलना चाहिए।
शुद्ध वाक्य:- परीक्षा की प्रणाली बदलनी चाहिए।
2. अशुद्ध वाक्य:- हिंदी की शिक्षा अनिवार्य कर दिया गया।
शुद्ध वाक्य:- हिंदी की शिक्षा अनिवार्य कर दी गयी।
3. अशुद्ध वाक्य:-रामायण का टीका।
शुद्ध वाक्य:- रामायण की टीका।
4. अशुद्ध वाक्य:- दंगे में बालक,युवा,नर नारी सब पकड़ी गयीं।
शुद्ध वाक्य:- दंगे में बालक,युवा,नर नारी सब पकडे गए।
◆ वचन संबंधी अशुद्धियाँ:-
1. अशुद्ध वाक्य:- सबों ने यह राय दी।
शुद्ध वाक्य:- सब ने यह राय दी।
2. अशुद्ध वाक्य:- मेरे आंसू से रुमाल भीग गया।
शुद्ध वाक्य:- मेरे आंसुओं से रुमाल भीग गया।
3. अशुद्ध वाक्य:- इस विषय पर एक भी अच्छी पुस्तकें नहीं हैं।
शुद्ध वाक्य:- इस विषय पर एक भी अच्छी पुस्तक नहीं हैं।
संधि, संधि के प्रकार एवं उदाहरण। हिन्दी व्याकरण।
दो वर्णों के परस्पर मेल से जो विकार उत्पन्न होता है उसे संधि कहते हैं।
जैसे- विद्या+आलय= विद्यालय।
सु+उक्ति= सूक्ति।
गण+ईश= गणेश।
■ संधि के भेद -
संधि तीन प्रकार की होती हैं-
1. स्वर संधि
2. व्यंजन संधि और
3. विसर्ग संधि
1. स्वर संधि -
दो स्वरों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को स्वर-संधि कहते हैं ।
जैसे- हिम+आलय= हिमालय ।
● स्वर-संधि पाँच प्रकार की होती हैं-
(I ) दीर्घ संधि
(ii) गुण संधि
(iii) वृद्धि संधि
(iv) यण संधि
(v) अयादि संधि
(i) दीर्घ संधि
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ वर्णों के बीच होने वाली संधि दीर्घ संधि कहलाती है । क्योंकि इनमें से वर्ण कोई भी हो संधि दीर्ध हो जाती है ।
इस वर्णों से बनने वाली संधि के कुछ उदाहरणों से समझा जा
सकता है ।
जैसे-
अ + अ= आ धर्म + अर्थ= धर्मार्थ
अ + आ= आ हिम +आलय= हिमालय
आ + अ= आ विद्या + अर्थी= विद्यार्थी
आ + आ= आ विद्या + आलय= विद्यालय
इ + इ= ई कवि + इच्छा= कवीच्छा
ई + इ= ई नदी + ईश= नदीश
उ + उ= ऊ भानु + उदय= भानूदय
उ + ऊ= ऊ लघु + ऊर्मि= लघूर्मि
ऊ + उ= ऊ वधू + उत्सव= वधूत्सव
ऊ + ऊ= ऊ वधू + ऊर्जा= वधूर्जा
ऋ + ऋ= ऋ मातृ + ऋण= मातृण
(ii) गुण संधि -
जब अ, आ वर्ण के आगे अगर इ, ई वर्ण को जोड़ा जाए तो ए वर्ण बनता है ।
जब अ, आ वर्ण के आगे उ, ऊ वर्ण को जोड़ा जाए तो ओ वर्ण बनता है ।
इसी तरह अ, आ वर्ण के आगे जब ऋ वर्ण जोड़ा जाए तो अर् बनता है । इसे गुण-संधि कहते हैं ।

जैसे-
अ+ इ= ए नर+ इंद्र= नरेंद्र
अ+ ई= ए नर+ ईश= नरेश
आ+ इ= ए महा+ इंद्र= महेंद्र
आ+ ई= ए महा+ ईश= महेश
अ+ ई= ओ ज्ञान+ उपदेश= ज्ञानोपदेश
आ+ उ= ओ महा+ उत्सव= महोत्सव
अ+ ऊ= ओ जल+ ऊर्मि= जलोर्मि
आ+ ऊ= ओ महा+ ऊर्मि= महोर्मि
अ+ ऋ= अर् देव+ ऋषि= देवर्षि
आ+ ऋ= अर् महा+ ऋषि= महर्षि
(iii) वृद्धि संधि -
अ, आ वर्ण का ए, ऐ, औ से मेल होने पर ऐ, औ बनता है । इसे वृद्धि संधि कहते हैं।
जैसे-
अ+ ए= ऐ एक+ एक= एकैक
अ+ ऐ= ऐ मत+ ऐक्य= मतैक्य
आ+ ए= ऐ सदा+ एव= सदैव
आ+ ऐ= ऐ महा+ ऐश्वर्य= महैश्वर्य
अ+ ओ= औ वन+ ओषधि= वनौषधि
आ+ ओ= औ महा+ औषध= महौषधि
अ+ औ= औ परम+ औषध= परमौषध
आ+ औ= औ महा+ औषध= महौषध
(iv) यण संधि -
जब इ, ई, उ,ऊ ,ऋ ,ल के आगे कोई स्वर आता है तो ये क्रमश: य्, व्, र्, ल् में बदल जाता है ।

जैसे-
इ+ अ= य् अति+ अल्प= अत्यल्प
ई+ अ= य् देवी+ अर्पण= देव्यपर्ण
उ+ अ= व् सु+ आगत= स्वागत
ऊ+ आ= व् वधू+ आगमन= वध्वागमन
ऋ+ आ= र् पितृ+ आज्ञा= पित्राज्ञा
लृ+ आ= ल् लृ+ आकृति= लाकृति
(v) अयादि संधि-
जब ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई स्वर आता है तो ए का अय , ऐ का आय और औ का आव् हो जाता है ।
जैसे-
ए+ अ= अय् ने+ अयन= नयन
ऐ+ अ= आय् नै+ अक= नायक
ओ+ अ= अव् पो+ अन= पवन
औ+ अ= आव् पौ+ अक= पावक
2. व्यंजन संधि -
व्यंजन का व्यंजन से अथवा किसी स्वर से मेल होने पर जो परिवर्तन होता है उसे व्यंजन संधि कहते हैं। व्यंजन संधि के कुछ नियम हैं जो इस प्रकार हैं-
(i) अगर क्, च्, ट्, त्, प् के आगे कोई स्वर या किसी वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ग अथवा य्, र्, ल्, व् आए तो क्, च्, ट्, प् के
स्थान पर उसी वर्ग का तीसरा अक्षर हो जाता है । क् के स्थान पर ग् , च् के स्थान पर ज् , ट् के स्थान पर ड् , त् के स्थान पर द् और प् के स्थान पर ब् हो जाता है ।
जैसे-
दिक्+ गज= दिग्गज
वाक्+ ईश= वागीश
अच्+ अंत= अजंत
षट्+ आनन= षडानन
अप्+ ज= अब्ज
(ii) यदि किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) का मेल न् या म् वर्ण से हो तो उसके स्थान पर उसी वर्ग का पाँचवाँ वर्ण
हो जाता है।
जैसे-
वाक्+ मय= वाङमय
अच्+ नाश= अञ्नाश
षट्+ मास= षण्मास
उत्+ नयन= उन्नयन
अप्+ मय= अम्मय
(iii) त् का मेल ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, व या किसी स्वर से हो जाए तो द् हो जाता है।

जैसे-
सत्+ भावना= सद्भावना
जगत्+ ईश= जगदीश
भगवत्+ भक्ति= भगवद्भक्ति
तत्+ रूप= तद्रूप
सत्+ धर्म= सद्धर्म
(iv) यदि किसी स्वर के बाद छ वर्ण आए तो छ से पहले च् वर्ण जुड़ जाता है ।
जैसे-
स्व+ छंद= स्वच्छंद
संधि+ छेद= संधिविच्छेद
अनु+ छेद= अनुच्छेद
परि+ छेद= परिच्छेद
(v) त् के बाद ह व्यंजन आए तो त् का द् तथा ह का ध हो जाता है ।

जैसे-
उत्+ हार= उद्धार
उत्+ हरण= उद्धरण
पद्+ हित= पद्धित
(VI) अगर त् के बाद श आए तो त् का च् तथा श का छ हो जाता है ।
जैसे-
उत्+ श्वास= उच्छवास
तत्+ शिव= तच्छिव
सत्+ शास्त्र= सच्छास्त्र
उत्त्+ शिष्ट= उच्छिष्ट
(vii) त् व्यंजन के बाद च/छ हों तो च्
ज/झ हो तो ज्
ट/ठ हो तो ट्
ड/ढ होने पर ड्
और ल् होने पर ल् हो जाता है ।
जैसे-
उत्+ लास= उल्लास
उत्+ चारण= उच्चारण
सत्+ चरित्र= सच्चरित्र
उत्+ ज्वल= उज्जवल
उत्+ लेख= उल्लेख
शरत्+ चंद्र= शरच्चंद्र
(viii) म के बाद जिस वर्ग का व्यंजन आता है, अनुस्वार उसी के वर्ग का बन जाता है ।
जैसे-
अहम्+ कार= अहंकार
सम्+ भव= संभव
किम्+ तु= किंतु
सम्+ बंध= संबंध
किम्+ चित= किंचिंत
(ix) अगर म् के बाद म आए तो म का द्वित्व हो जाता है ।

जैसे-
सम्+ मति= सम्मति
सम्+ मान= सम्मान

(X) म् के बाद य्, र्, ल्, व्, श्, ष्, स्, ह् में से कोई व्यंजन होने पर म् का अनुस्वार हो जाता है।
जैसे-
सम्+ योग= संयोग
सम्+ रक्षण= संरक्षण
सम्+ विधान= संविधान
सम्+ वाद= संवाद
सम्+ शय= संशय
सम्+ लग्न= संलग्न
सम्+ सार= संसार
(xi) ऋ,र्, ष् के बाद न् व्यंजन आता है तो उसका ण् हो जाता है।
भले ही बीच में क-वर्ग, प-वर्ग, अनुस्वार, य, र, ह आदि में से कोई भी वर्ण क्यों न आ जाए ।

जैसे-
परि+ नाम= परिणाम
प्र+ मान= प्रमाण
ऋ+ न= ऋण
विष्+ नु= विष्णु
पूर्+ न= पूर्ण
(xii) स व्यंजन से पहले अ, आ से भिन्न कोई स्वर आ जाता है तो स का परिवर्तन ष में हो जाता है ।
जैसे-
अभि+ सेक= अभिषेक
नि+ सिद्ध= निषिद्ध
वि+ सम= विषम
3. विसर्ग-संधि -
विसर्ग (:) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो विकार होता है उसे विसर्ग-संधि कहते हैं।
जैसे-
मनः+ अनुकूल= मनोनुकूल
(i) अगर विसर्ग के पहले अ स्वर और आगे अ अथवा कोई सघोष व्यंजन (किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण) अथवा य, र, ल, व,ह में से कोई वर्ण हो तो अ और विसर्ग(:) के बदले ओ हो जाता है ।जैसे-
मनः + बल= मनोबल
मनः+ अनुकूल= मनोनुकूल
अधः+ गति= अधोगति

(ii) विसर्ग से पहले अ, आ से भिन्न स्वर आए और विसर्ग के बाद किसी स्वर, किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण या य, र, ल,
व, ह में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग का र में परिवर्तन हो जाता है ।
जैसे-
दु:+ उपयोग= दुरुपयोग
नि:+ आहार= निराहार
निः+ आशा= निराशा
निः+ धन= निर्धन
(iii) विसर्ग से पहले कोई स्वर हो और बाद में च, छ या श हो तो विसर्ग का श हो जाता है ।
जैसे-
निः+ चल= निश्चल
निः+ छल= निश्छल
दुः+ शासन= दुश्शासन
(iv) विसर्ग के बाद यदि त या स हो तो विसर्ग स् बन जाता है ।
जैसे-
नमः+ ते= नमस्ते
निः+ संतान= निस्संतान
दुः+ साहस= दुस्साहस
(v) विसर्ग से पहले इ, उ और बाद में क, ख, ट, ठ, प, फ में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग का ष हो जाता है। जैसे-
निः+ फल= निष्फल
निः+ कलंक= निष्कलंक
चतुः+ पाद= चतुष्पाद
(vi) विसर्ग से पहले अ, आ हो और बाद में कोई भिन्न स्वर हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है ।
जैसे-
निः+ रस= नीरस
निः+ रोग= निरोग
(vii) विसर्ग के बाद क, ख अथवा प, फ होने पर विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता।
जैसे-
अंतः+ करण= अंतःकरण।
हिन्दी महत्वपूर्ण परीक्षाउपयोगी प्रश्नावली
1. 'पंचवटी' कौन-सा समास है? →द्विगु।
2. 'निरुत्तर' शब्द का शुद्ध सन्धि विच्छेद है? →निः + उत्तर।
3. 'रामचरितमानस' में कितने काण्ड हैं? →(7)
4. 'नवनीत' शब्द का सही अर्थ है-→मक्खन।
5. 'प्राचीन' का विलोम है-→अर्वाचीन।
6. 'मनुष्यता' का विपरीतार्थक है-→बर्बरता।
7. किस काल को स्वर्णकाल कहा जाता है? →भक्ति काल।
8. सूरदास के गुरु कौन थे? →बल्लभाचार्य।
9. 'जिसका जन्म न हो' एक शब्द बताएँ? →अजन्मा।
10. "कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय" में कौन-सा अलंकार है? →यमक।
हिन्दी व्याकरण वस्तुनिष्ठ प्रश्नावली
[B] व्यक्तित्व
[C] बड़प्पन
[D] सौंदर्य
Q.3: कौन सा वाक्य पूर्ण ‘‘भूतकाल‘‘ का है ?
[A] वह काम कर रही थी
[B] वह काम कर चुकी थी √
[C] वह काम करती थी
[D] वह काम कर चुकी
Q.4: वाक्य में ‘‘द्विकर्मक क्रिया‘‘ कौन सा है ?
[A] वह राम को पुस्तक देता है √
[B] वह राम को सुलाता है
[C] मैं अभी घर नहीं जाऊँगी
[D] आज तो खाना खाना ही पड़ेगा
Q.5: वाक्य में ‘‘क्रिया अकर्मक‘‘ कौन सा है ?
[A] राम खाता है
[B] राम गाता है
[C] राम जाता है √
[D] राम लिखता है
Q.6: निम्न में से ‘‘स्वर संधि‘‘ का उदाहरण कौन सा है ?
[A] जगदीश
[B] अन्वय √
[C] उच्छवास
[D] तल्लीन
Q.7: ‘‘शरत् + इंदु‘‘ में संधि करने पर ............... शब्द बनेगा।
[A] शरदेंदु
[B] शरदींदु
[C] शरदिंदु √
[D] शरदैंदु
Q.8: कौन सा शब्द ‘‘अव्ययीभाव समास‘‘ का उदाहरण है ?
[A] चिडिमार
[B] मुँहमाँगा
[C] मनमाना √
[D] राजदरबार
Q.9: वह हमेशा ‘‘नहाया-धोया‘‘ रहता है। रेखांकित पद में .................... समास है?
[A] अव्ययीभाव समास
[B] द्वन्द समास √
[C] तत्पुरूष समास
[D] द्रगु समास
Q.10: कौन से वाक्य में ‘‘कुछ शब्द‘‘ सर्वनाम है ?
[A] कुछ खड़े हैं, कुछ बैठे है
[B] उनमें कुछ बेवकूफ भी हैं √
[C] कुछ तो बोलो
[D] कुछ लड़कियाँ उधर भी गई है
[B] व्यक्तित्व
[C] बड़प्पन
[D] सौंदर्य
Q.3: कौन सा वाक्य पूर्ण ‘‘भूतकाल‘‘ का है ?
[A] वह काम कर रही थी
[B] वह काम कर चुकी थी √
[C] वह काम करती थी
[D] वह काम कर चुकी
Q.4: वाक्य में ‘‘द्विकर्मक क्रिया‘‘ कौन सा है ?
[A] वह राम को पुस्तक देता है √
[B] वह राम को सुलाता है
[C] मैं अभी घर नहीं जाऊँगी
[D] आज तो खाना खाना ही पड़ेगा

Q.5: वाक्य में ‘‘क्रिया अकर्मक‘‘ कौन सा है ?
[A] राम खाता है
[B] राम गाता है
[C] राम जाता है √
[D] राम लिखता है
Q.6: निम्न में से ‘‘स्वर संधि‘‘ का उदाहरण कौन सा है ?
[A] जगदीश
[B] अन्वय √
[C] उच्छवास
[D] तल्लीन
Q.7: ‘‘शरत् + इंदु‘‘ में संधि करने पर ............... शब्द बनेगा।
[A] शरदेंदु
[B] शरदींदु
[C] शरदिंदु √
[D] शरदैंदु
Q.8: कौन सा शब्द ‘‘अव्ययीभाव समास‘‘ का उदाहरण है ?
[A] चिडिमार
[B] मुँहमाँगा
[C] मनमाना √
[D] राजदरबार
Q.9: वह हमेशा ‘‘नहाया-धोया‘‘ रहता है। रेखांकित पद में .................... समास है?
[A] अव्ययीभाव समास
[B] द्वन्द समास √
[C] तत्पुरूष समास
[D] द्रगु समास
Q.10: कौन से वाक्य में ‘‘कुछ शब्द‘‘ सर्वनाम है ?
[A] कुछ खड़े हैं, कुछ बैठे है
[B] उनमें कुछ बेवकूफ भी हैं √
[C] कुछ तो बोलो
[D] कुछ लड़कियाँ उधर भी गई है

■ शब्द भेद -
● रूढ़ शब्द, यौगिक शब्द, योग रूढ़ शब्द।
० व्युत्पति/रचना/बनावट के आधार पर शब्द के भेद –
1. रूढ़ शब्द:- वे शब्द जिनके टुकडें करने पर इनका सार्थक अर्थ न निकले अर्थात् इनका स्वतंत्र अर्थ न
हो ।
उदाहरण:- देश – दे $ श देश के टुकड़े करने पर इसका सार्थक अर्थ नहीं निकलता है।

जैसे - पेड़ घर, दुध, रोटी, दीपक, पतार, आकाश।
अयादि संधि के शब्द हमेशा रूढ़ शब्द होगें।
2. यौगिक शब्द:- वे शब्द जो दो या दो से अधिक शब्दो के मेल से बने होते है, अर्थात इन्हें पृथक करने पर इनका सार्थक अर्थ भी होता है।
उदाहरण :- संधि, समास, उपसर्ग, प्रत्यय, से बने सभी शब्द यौगिक शब्द है।
जैसे:- विद्यालय, राजमाता, राष्ट्रपति, रसोईघर।
3. योग रूढ़ शब्द:- जिन शब्दों के एक या एक से अधिक अर्थ हो लेकिन रूढ़ि के आधार पर जिनका एक
ही अर्थ निश्चित कर लिया जाता है, उन्हें योग रूढ़ शब्द कहते है।
जैसेः- पीताम्बर – पीत $ अम्बर (विष्णु
के अर्थ में), जलज, दशानन, आशुतोष, वीणा पाणि।
योग रूढ़ शब्द के उदाहरण बहुव्रीहि समास में आते है।
■ शब्द भेद -
● रूढ़ शब्द, यौगिक शब्द, योग रूढ़ शब्द।

० व्युत्पति/रचना/बनावट के आधार पर शब्द के भेद –

1. रूढ़ शब्द:- वे शब्द जिनके टुकडें करने पर इनका सार्थक अर्थ न निकले अर्थात् इनका स्वतंत्र अर्थ न
हो ।
उदाहरण:- देश – दे $ श देश के टुकड़े करने पर इसका सार्थक अर्थ नहीं निकलता है।
जैसे - पेड़ घर, दुध, रोटी, दीपक, पतार, आकाश।
अयादि संधि के शब्द हमेशा रूढ़ शब्द होगें।
2. यौगिक शब्द:- वे शब्द जो दो या दो से अधिक शब्दो के मेल से बने होते है, अर्थात इन्हें पृथक करने पर इनका सार्थक अर्थ भी होता है।
उदाहरण :- संधि, समास, उपसर्ग, प्रत्यय, से बने सभी शब्द यौगिक शब्द है।
जैसे:- विद्यालय, राजमाता, राष्ट्रपति, रसोईघर।
3. योग रूढ़ शब्द:- जिन शब्दों के एक या एक से अधिक अर्थ हो लेकिन रूढ़ि के आधार पर जिनका एक
ही अर्थ निश्चित कर लिया जाता है, उन्हें योग रूढ़ शब्द कहते है।
जैसेः- पीताम्बर – पीत $ अम्बर (विष्णु
के अर्थ में), जलज, दशानन, आशुतोष, वीणा पाणि।
योग रूढ़ शब्द के उदाहरण बहुव्रीहि समास में आते है।
अनेक शब्दों के एक शब्द भाग
1. जिसका इलाज न हो सके - असाध्य।

2. जिसका विश्वास न किया जा सके - अविश्वसनीय।

3. जिस पर अभियोग लगाया गया हो - अभियुक्त।

4. जिसमे शक्ति न हो - अशक्त।

5. जो पहले न पढ़ा हो - अपठित।

6. जिसकी कोई उपमा न हो - अनुपम।

7. कम जानने वाला - अल्पज्ञ।

8. जो कुछ न करता हो - अकर्मण्य।

9. जो दिखाई न दे - अदृश्य।

10. जिसका मूल्य न आँका जा सके - अमूल्य।

11. जो नष्ट न होने वाला हो - अविनाशी।

12. जो आँखों के सामने न हो - अप्रत्यक्ष।

13. जिसका पार न पाया जाए - अपार।

14. जो परिचित न हो - अपरिचित।

15. जहाँ जाना संभव न हो - अगम।

16. चार मुखों वाला - चतुरानन।

17. दूसरों के दोष को खोजने वाला - छिद्रान्वेसी।

18. छात्रों के रहने का स्थान - छात्रवास।

19. जनता द्वारा चलाया जाने वाला राज - जनतंत्र।

20. जल में रहने वाला - जलचर।
1.जो दिखाई न दे - अदृश्य।

2.जिसका जन्म न हो - अजन्मा।

3.जिसका कोई शत्रु न हो - अजातशत्रु।

4.जो बूढ़ा न हो - अजर।

5.जो कभी न मरे - अमर।

6.जो पढ़ा -लिखा न हो - अपढ़ ,अनपढ़।

7.जिसके कोई संतान न हो - नि:संतान।

8.जो उदार न हो - अनुदार।

9. जिसमे धैर्य न हो - अधीर।

10.जिसमे सहन शक्ति हो - सहिष्णु।

11.जिसके समान दूसरा न हो - अनुपम।

12.जिस पर विश्वास न किया जा सके - अविश्वनीय।

13.जिसकी थाह न हो - अथाह।

14.दूर की सोचने वाला - दूरदर्शी।

15.जो दूसरों पर अत्याचार करें - अत्याचारी।

16.जिसके पास कुछ भी न हो - अकिंचन।

17.दुसरे देश से अपने देश में समान आना - आयात।

18.अपने देश से दुसरे देश में समान जाना - निर्यात।

19.जो कभी नष्ट न हो - अनश्वर।

20.जिसे कोई जीत न सके - अजेय।
1. जो जन्म से अँधा हो - जन्मांध।

2. जीने की इच्छा - जिजीविषा।

3. वह पहाड़ जिससे आग निकलती हो - ज्वालामुखी।

4. जो किसी का पक्ष न ले - तटस्थ।

5. जिसकी तीन भुजाएँ हो - त्रिभुज।

6. तीनों लोकों का स्वामी - त्रिलोकी।

7. जो पुत्र गोद लिया हो - दत्तक।

8. बुरे आचरण वाला - दुराचारी।

9. जो दो भाषाएँ जानता हो - दुभाषिया।

10. जिसकी आयु बड़ी लम्बी हो - दीर्घायु।

11. प्रतिदिन होने वाला - प्रतिदिन।

12. बुरे चरित्र वाला - दुश्चरित्र।

13. जिसमे दया हो - दयालु।

14. जो कठिनाई से प्राप्त हो - दुर्लभ।

15. जहाँ पहुँचना कठिन हो - दुर्गम।

16. दर्द से भरा हुआ - दर्दनाक।

17. जो धर्म का काम करे - धर्मात्मा।

18. जिसका कोई अर्थ न हो - निरर्थक।

19. जिसके मन में कोई कपट न हो - निष्कपट।

20. जो अभी - अभी पैदा हुआ हो - नवजात।


पाटीदार जाति की जानकारी

साहित्यमनीषी डॉ.दयाराम आलोक से इंटरव्यू

गायत्री शक्तिपीठ शामगढ़ मे बालकों को पुरुष्कार वितरण

कुलदेवी का महत्व और जानकारी

ढोली(दमामी,नगारची ,बारेठ)) जाती का इतिहास

रजक (धोबी) जाती का इतिहास

जाट जाति की जानकारी और इतिहास

किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की रामबाण औषधि

किडनी फेल रोगी का डाईट चार्ट और इलाज

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने से पेशाब रुकावट की कारगर हर्बल औषधि

सिर्फ आपरेशन नहीं ,किडनी की पथरी की १००% सफल हर्बल औषधि

सायटिका रोग की रामबाण हर्बल औषधि

बांछड़ा जाती की जानकारी

नट जाति की जानकारी

बेड़िया जाति की जानकारी

सांसी जाती का इतिहास

हिन्दू मंदिरों और मुक्ति धाम को सीमेंट बैंच दान का सिलसिला

जांगड़ा पोरवाल समाज की गोत्र और भेरुजी के स्थल

रैबारी समाज का इतिहास ,गोत्र एवं कुलदेवियां

कायस्थ समाज की कुलदेवियाँ

सुनार,स्वर्णकार समाज की गोत्र और कुलदेवी

जैन समाज की कुलदेवियों की जानकारी


चारण जाति की जानकारी और इतिहास

डॉ.दयाराम आलोक का जीवन परिचय

मीणा जाति समाज की जानकारी और गौत्रानुसार कुलदेवी

अलंकार परिचय

हिन्दी व्याकरण , विलोम शब्द (विपरीतार्थक शब्द)

रस के प्रकार और उदाहरण

12.11.17

राजपूत जाति की उत्पत्ति का इतिहास:rajput jati itihas


   



 राजपूत उत्तर भारत का एक क्षत्रिय कुल माना जाता है।जो कि राजपुत्र का अपभ्रंश है। पुराने समय में आर्य जाति में केवल चार वर्णों की व्यवस्था थी। राजपूत काल में प्राचीन वर्ण व्यवस्था समाप्त हो गयी थी तथा वर्ण के स्थान पर कई जातियाँ व उप जातियाँ बन गईं थीं। उस समय में क्षत्रिय वर्ण के अंतर्गत सूर्यवंश और चंद्रवंश के राजघरानों का बहुत विस्तार हुआ। राजपूतों में मेवाड़ के महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान का नाम सबसे ऊंचा है।
    हर्षवर्धन के उपरान्त भारत मे कोई भी ऐसा शक्तिशाली राजा नहीं हुआ जिसने भारत के वृहत भूभाग पर एकछत्र राज्य किया हो। ये वो समय था जब भारत अनेक छोटे बड़े राज्यों में विभाजित हो गया जो आपस मे लड़ते रहते थे। इनके राजा राजपूत कहलाते थे तथा सातवीं से बारहवीं शताब्दी के इस युग को राजपूत युग कहा गया है।
राजपूतों की उत्पत्ति के संबंध मे इतिहास में दो मत प्रचलित हैं। कर्नल टोड व स्मिथ आदि के अनुसार राजपूत वह विदेशी जातियाँ है जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया था।
 चंद्रबरदाई लिखते हैं कि परशुराम द्वारा क्षत्रियों के सम्पूर्ण विनाश के बाद ब्राह्मणों ने माउंट आबू पर यज्ञ किया व यज्ञ की अग्नि से चौहान, परमार, प्रतिहार व सोलंकी राजपूत वंश उत्पन्न हुये। इसे इतिहासकार विदेशियों के हिन्दू समाज में विलय हेतु यज्ञ द्वारा शुद्धिकरण की पारंपरिक घटना के रूप मे देखते हैं। दूसरी ओर गौरीशंकर हीराचंद ओझा आदि विद्वानों के अनुसार राजपूत विदेशी नहीं है अपितु प्राचीन क्षत्रियों की ही संतान हैं। राजपूत युग की  वीरता व परा क्रम का भारतीय इतिहास मे अद्वितीय स्थान है।
  राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में उतने ही मत हैं जितने कि उसके विद्वान। जहाँ एक ओर कुछ विद्वान राजपूतों को विदेशी बताते हैं, वहीं दूसरे उन्हें देशी मानते हैं जबकि एक तीसरा मत उनकी देशी - विदेशी मिश्रित उत्पत्ति मानता है। परन्तु मतों के इस विवेचना  के पूर्व हम "राजपूत" शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार कर लेते हैं।

"राजपूत" शब्द की व्युत्पत्ति-

     डॉ० वी० एस स्मिथ की यह मान्यता है कि राजपूतों की आठवीं या नवीं शताब्दी में सहसा उत्पत्ति हुई, अनेक इतिहासकारों के शोध - निष्कर्षों पर यह बात निर्मूल सिद्ध होती है। जयनारायण आसोपा ने राजपूत शब्द की उत्पत्ति के स्रोत संदर्भों को आधार पर विवेचना करते हुए स्पष्ट किया है कि वैदिक कालीन 'राजपुत्र' 'राजन्य', या 'क्षत्रिय' वर्ग ही कालान्तर में राजपूत जाति में परिणत हो गया। 'राजपूत' शब्द वैदिक 'राजपुत्र' का ही अपभ्रंश शब्द है। ॠगवेद में 'कस्य धतधवस्ता भवथ: कस्य बानरा, राजपुत्रेव सवनाय गच्छद', यजुर्वेद में 'पश्वी राजपुत्रो गोपायति राजन्यों वै प्रजानामधिपति रायुध्रुंव आयुरेव गोपात्यथो क्षेत्रमेव गोवायते', तथा ॠगवेद में ही ''ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्वाहू राजन्य कृत्य:'', के गहरे काले शब्द यह प्रकट करते हैं कि 'राजपुत्र' तथा 'राजन्य' समानार्थक रूप में प्रयुक्त हुए है । राजन्य 'क्षत्रिय' अर्थात् योद्धाओं के लिए प्रयुक्त होता था जो राज्य के अधिपति थे। 'मनस्मृति' में भी क्षत्रिय का यही अर्थ लिया गया है। 'शतपथ ब्राह्मण' में राजपुत्र, राजन्य तथा क्षत्रियों का पृथक रूप में उल्लेख मिलता है, ब्राह्मणकाल (१००० ई० पू०) से इनमें भेद किया जाना आरम्भ हो गया था।
    'महाभारत', 'तैत्रेय ब्राह्मण' तथा कालिदास की 'रघुवंश' काव्यकृति मे इन शब्दों का प्रयोग समानार्थक रूप में हुआ है। डॉ० गौरीशंकर प्रसाद ओझा ने 'राजपुत्र' शब्द का उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र  , कालिदास के 'मालविकाग्निमित्र', अश्वघोष के 'सौंदरानंद' तथा बाणभटट्  के 'हर्षचरित' एवं 'कादम्बरी' ग्रन्थों में विभिन्न अर्थों में किया जाना बतलाया है। कौटिल्य ने राजा के पुत्रों के लिए तथा कालिदास व अश्वघोष ने सामन्तों के पुत्रों के अर्थ में राजपुत्र शब्द का प्रयोग किया है। ह्मवेनसांग ने यात्रा वर्णन में राजाओं को राजपुत्र के रूप में उल्लेख न कर उन्हें क्षत्रिय माना है। कल्हण की 'राजतरंगिनी' में राजपुत्र शब्द का प्रयोग भूस्वामियों के लिए किया गया है और उन्हें राजपूतों के ३६ वंशों से सम्बन्धित माना है। इससे यह तथ्य स्पष्ट होता है कि १२वीं शताब्दी के आरंभ में राजपुत्र या राजपूत वंश एक जाति के रूप में अस्तित्व में आ गया था। महाभारत काल तक राजपुत्र, राजन्य तथा क्षत्रिय समानार्थक शब्द थे किन्तु बाद में राजपुत्र तथा क्षत्रियों में विभेद किया जाने लगा।
  सभी शासक 'राजन' कहलाते थे और उनके संबंधी 'राजपुत्र' प्राचीनकाल में कुछ शासक युनानी, शक एवं हूण विदेशी थे तथा कुछ शासक देश के ही क्षत्रिय जातियों के थे। इन देशी तथा विदेशी शासकों में परस्पर वैवाहिक संबंधों द्वारा विलयन की प्रक्रिया चल रही थी। शासकों तथा सामन्तों के वंशज राजपुत्र थे जो अपने राज्य विनष्ट होने के पश्चात् भी स्वयं को राजुपूत (राजपुत्र) नाम से पुकारने लगे।
   राजपूत शब्द मूलत: 'राजपुत्र' का अपभ्रंश है जिसमें देशी तथा विदेशी शासकों का धर्म परिवर्तन द्वारा भारतीयकरण होने के बाद उनके परस्पर विलियन से या सम्मिश्रण से उत्पन्न राजपुत्र वर्ग में सम्मिलित हैं। विलियन की यह प्रक्रिया १२ वीं शताब्दी तक सम्पन्न हो चुकी थी। अत: विलयन के पूर्व राजपूत अर्थात् राजपुत्रों के मूल वंशों के आधार पर इनकी उत्पत्ति सम्बन्धी विभिन्न मत प्रचलित हो गये।   उत्पत्ति सम्बन्धी विभिन्न मतों का वर्गीकृत वर्णन नीचे दिया जा रहा है -अग्निवंशीय मत अपने वंश की उत्पत्ति देवताओं से मानने की प्राचीन परम्परा रही है; दैव उत्पत्ति से अपने वंश की श्रेष्ठता स्थापित करना एक मानवीय दुर्बलता तो है ही, इसे प्रतिष्ठा का एक सूचक भी माना जाता है। मिस्र के शासक - 'फराहो' - स्वयं को 'रा' (सूर्य) का पुत्र कहते थे और यूनानी शासक अपनी एकता बनाये रखने के लिए अपनी उत्पत्ति एक ही देवता से मानते थे। कुशाण शासक चीनी शासकों की भाँति 'देवपुत्र' की उपाधि धारण करते थे। भारत में भी कुछ लोग अपनी उत्पत्ति सूर्य, चन्द्र, अग्नि देवता से मानते थे। अग्निवंशीय मत भी सूर्य तथा चंद्रवंशीय के समान एक मिथक है। पार्टि ने सर्वप्रथम 'आग्नेय' जाति का उल्लेख महाकाव्यों और पुराणों में किया जाना बतलाया। मार्कण्डेय पुराण, महाभारत के वन पर्व तथा अनुशासन पर्व और रामायण के अयोद्धया काण्ड में आग्नेय जाति का उल्लेख किया गया है। पार्टि के अनुसार यह जाति 'कुरु क्षेत्र' के उत्तर में रहती थी। वी० एस० पाठक ने इन्हीं स्रोतों के आधार पर इस जाति का अधिवासन उत्तरीय भारत में बतलाया है, जो आगे चल कर ब्राह्मणों में परिणत हो गई। आसोपा ने मार्कण्डेय तथा विष्णु पुराण के आधार पर आग्नेय अर्थात् अग्नि से उत्पन्न जाति के पूर्वज 'अग्निधारा' (जिसके वंश में भरत नामक प्रतापी राजा हुआ) की 'मनु स्वयंभुव' से उत्पत्ति मानी जाती है। मनु स्वयंभुव 'मनु वैवस्वत' से भिन्न है। मनु वैवस्वत सूर्य वंशियों का पूर्वज था तथा 'इला' चंद्रवंशियों का पूर्वज था। ॠग्वेद में वर्णित भरतवंशी आग्नेय थे जो बाद में ब्राह्मण बने और वे चंद्रवंशीय दुष्यन्त के पुत्र भरत से संबंधित नहीं थे।
   आसोपा की मान्यता है कि अग्निवंश की मान्यता मथुरा की कपोल कल्पना मात्र नहीं है बल्कि यह महाभारत तथा पुराणों के युग तक प्राचीन है। 'अग्निजया' शब्द अग्नि से उत्पन्न वंश का द्योतक है। कृष्ण स्वामी अयंगर ने दूसरी शताब्दी के तमिल भाषा के ग्रन्थ 'पुर्नानुरु' में एक सामन्त की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से बतलाई गई है। डी० सी० सरकार ने महाराष्ट्र के नानदेद जिले से प्राप्त अक उत्कीर्ण लेख में (जो ११वीं शताब्दी का है) अग्निवंश का उल्लेख पाया है। पद्मगुप्त के ग्रन्थ 'नवशशांक - चरित' (९७४ - १००० ई०) में परमार शासक को आबू पर्वत पर वशिष्ट के अग्निकुण्ड से उत्पन्न माना है तथा परमारों के परवर्ती सभी लेखों में अग्निवंशी होने का उल्लेख है। नीलकंठ शास्री को अग्निवंश का प्रमाण दक्षिण भारत के एक शासक कुलोतुंग तृतीय (११७८ - १२१६ ई०) के शिलालेख से मिलता है। चंदवरदायी द्वारा १२वीं शताब्दी के अन्त में रचित ग्रन्थ 'पृथ्वीराज रासो' में चालुक्य (सोलंकी), प्रतिहार, चहमान तथा परमार राजपूतों की उत्पत्ति आबू पर्वत के अग्निकुण्ड से बतलाई है, किन्तु इसी ग्रन्थ में एक अन्य स्थल पर इन्हीं राजपूतों को "रवि - शशि जाधव वंशी" कहा है।
अग्निवंशीय उत्पत्ति के स्रोतों की समीक्षा द्वारा इस मत से संबंधित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पद्मगुप्त ने परमारों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से बतलाते हुअ इन्हें 'ब्रह्म - क्षेत्र' भी माना है। बी० एम० राऊ ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है कि वशिष्ट के वंशज परमार क्षत्रियों को (जिनके पूर्वज पहले ब्राह्मण थे किन्तु बौद्ध बन गये थे) पवित्र अग्निकुण्ड से पवित्र किया। ओझा ने 'ब्रह्मक्षत्र' की व्याख्या करते हुए कहा है कि जो शासक ब्रह्मत्तव और क्षत्रीय दोनों गुण धारण करते थे उनके लिए 'ब्रह्मक्षत्र' कहा जाता था। डॉ० दशरथ शर्मा का मत है कि परमार पहले ब्राह्मण थे किन्तु धर्म की रक्षार्थ क्षत्रिय बन गये। इसके पूर्व भी श्री शुंग, सातवाहन, कदम्ब तथा पल्लव शासक ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय कहलाये। ओझा ने अग्निवंशी मत की एक अन्य व्याख्या की है। परमार वंश के प्रथम शासक 'धूम्रराज' का एक उत्कीर्ण लेख में उल्लेख है। अत:'धूम्र' अर्थात् अग्नि से निकले हुए धुएँ से धूम्रराज की अग्निवंशी उत्पत्ति मानी गई। किन्तु अन्य अग्निवंशी राजपूतों ने इस मत को मान्यता नहीं दी है। आसोपा का मत है कि परमार ब्राह्मण से क्षत्रिय बने।
   मंडौर के प्रतिहार ब्राह्मण हरिश्चन्द्र के वंशज तथा कन्नौज के प्रतिहार लक्ष्मण के वंशज कहे जाते हैं। अत: प्रतिहार भी ब्राह्मण से क्षत्रिय बने। चहमानों का पूर्वज सामन्त बिजोलिया लेख के अनुसार विप्र था। चालुक्य भी अभिलेखों के आधार पर ब्राहम्णों के वंशज थे। इस प्रकार 'पृथवीराज रासो' में उल्लिखित सभी चार राजपूत वंश ब्राह्मण से क्षत्रिय बने। अग्निवंशी कहने का तात्पर्य था कि अग्निकुण्ड से उनकी शुद्धि की गई। ये ब्राह्मण अपनी प्राचीन आग्नेय उत्पत्ति बनाये रखने के लिए अग्निवंशी राजपूत कहलाये।
    डॉ० गोपीनाथ शर्मा ने चन्दवरदाई के 'पृथवीराज रासो' वर्णित अग्निकुण्ड से उत्पन्न चार राजपूत वंशों के प्रकरण को मात्र कवि की कल्पना माना है। भाटों, मुहतों, नेणसी और सूर्यमल्ल मिश्र ने इस मत का काफी प्रचार किया किन्तु १६वीं शताब्दी के अभिलेखों व साहित्यिक ग्रन्थों से यह प्रमाणित होता हे कि इन चार राजवंशों में से तीन - प्रतिहार, चौहान व परमार सूर्यवंशी तथा (चालुक्य) चन्द्रवंशी थे। डॉ० दशरथ शर्मा ने भी अग्निवंश मत को भाटों की कल्पना की एक उपज मात्र बतलाया है। डॉ० ईश्वरीप्रसाद इसे तथ्य रहित बतलाते हुए लिखते हैं कि ब्राह्मणों का एक प्रतिष्ठित जाति की उत्पत्ति की महत्ता निर्धारित करने का प्रयास मात्र है। कुक इस मत के सम्बंध में यह निष्कर्ष निकालते हैं कि अग्निवंशी कहने का तात्पर्य है कि विदेशी तथा देशी शासकों को अग्नि से पवित्र कर राजपूत जाति में सम्मिल्लित किया गया। जे० एन० आसोपा का पूर्व उल्लिखित मत भी विचारणीय है कि ब्राह्मण जो क्षत्रिय बने थे अपनी प्राचीन आग्नेय उत्पत्ति को बनाये रखने के लिए राजपूत कहलाये।

सूर्य तथा चंद्रवंशीय मत-

   अग्निवंशी राजपूतों के समान ही अपनी दैव उत्पत्ति मानते हुए राजपूत वंशों ने स्वयं को सूर्यवंशी अथवा चंद्रवंशी होने की श्रेष्ठता प्रतिपादित की है। डॉ० ओझा अग्निवंशी मत का खण्डन करते हुए राजपूतों को सूर्य और चंद्रवंशीय मानते हैं। इसके प्रमाण स्वरुप शिलालेखों व ग्रन्थों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि नाथ लेख (९७१ ई०) आरपूर लेख (१२८५ ई०), आबू शिलालेख (१४२८ ई०) तथा श्रृंगी के लेख में गुहिल वंशी राजपूतों को रघुकूल (सूर्यवंश) से उत्पन्न माना है। पृथ्वीराज विजय, हम्मीर महाकाव्य और सुजान चरित्र में चौहानों को क्षत्रिय माना है। वंशावली लेखकों ने राठौरों को सूर्यवंशी और यादवों, भाटियों एवं चंद्रावती के चौहानों को चंद्रवंशी माना है। इन प्रमाणों के आधार पर डॉ० ओझा राजपूतों को प्राचीन क्षत्रियों के वंशज मानते हैं।
  डॉ० गोपीनाथ शर्मा ने इस मत को सभी राजपूतों की उत्पत्ति के लिए स्वीकार करना आपत्तिजनक माना है क्योंकि राजपूतों को सूर्यवंशी बतलाते हुए उनका वंशक्रम इक्ष्वाकु से जोड़ दिया गया है जो प्रथम सूर्यवंशी राजा था। बल्कि सूर्यवंशी और चंद्रवंशी समर्थक भाटों ने तो राजपूतों का संबंध इन्द्र, पद्मनाथ, विष्णु आदि से बताते बुए काल्पनिक वंशक्रम बना दिया है। इन मतों के समर्थक किसी निश्चय पर नहीं पहुँच पाये। अत: डॉ० गोपीनाथ शर्मा यह मानते हैं कि इस मत का एक ही उपयोग दिखाई देता है कि ११वीं शताब्दी से इन राजपूतों का क्षत्रियत्व स्वीकार कर लिया, क्योंकि इन्होंने क्षात्र - धर्म के अनुसार विदेशी आक्रमणों का सामना सफलतापूर्वक किया। आगे चलकर यह मत लोकप्रिय हो गया और तभी से इसको मान्यता प्रदान की जाने लगी।
    जयनारायण ओसापा ने सूर्य तथा चंद्रवंशी मिथक का विश्लेषण करते हुए यह मान्यता प्रकट की है कि सूर्यवंशी तथा चंद्रवंशी मूलत: आर्यों के दो दल थे जो भारत आये। पहला दल मध्य एशिया की जैक्सर्टीज तथा दूसरा दल उसी प्रदेश की इली नदियों से चलकर भारत में प्रविष्ट हुआ। महाभारत तथा पुराणों में सर्वप्रथम राजपूतों की सूर्य तथा चंद्र से उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है। पार्टि की यह मान्यता है कि सूर्यवंशी क्षत्रिय द्रविड़ थे और चंद्रवंशी क्षत्रिय प्रयाग में शासक थे। सी०वी० वैद्य इसे अस्वीकार करते हैं। वैंडीदाउ के आधार पर वैद्य यह मानते हैं कि सुदूर उत्तरी देशों से आर्यों की एक शाका ने भारत में प्रवेश किया और वे सप्त सिंधु में बस गये। वैद्य ने भारत की जनगणना रिपोर्ट (१९२१) के आधार पर कहा है कि आर्यों का पहला दल उत्तरी भारत में आये जिनकी प्रतिनिधि भाषाएँ राजस्थानी, पंजाबी, पहाड़ी तथा पूर्वी हिन्दी है। आर्यों का दूसरा दल उत्तरी भारत में प्रवेश कर दक्षिण से जबलपुर, दक्षिण - पश्चिम में काठियावाड़ तथा उत्तर - पूर्व में नेपाल तक पहुँच गया। ये दो आर्यों के दल ही महाभारत काल के सूर्य व चंद्रवंशी क्षत्रिय कहलाने लगे। वैद्य की मान्यता है कि मनु स्वयंभुव वंशज भरत ॠग्वेद में वर्णित भारत जाति है जो महाकाव्य काल में सूर्यवंशी कहलाये। यह आर्यों का पहला दल था। दूसरे दल में ॠग्वेद वर्णित यदु, तुर्वस, अनुस, द्रहयु तथा पुरु वर्ग के लोग थे जो चंद्रवंशी कहलाये।
   आसोपा, वैद्य की उपर्युक्त मान्यता को भाषायी आधार पर स्वीकार नहीं करते तथा वे ॠग्वेद के भारत तथा मनु स्वयंभुव के वंशज भरत को एक वर्ग का नहीं मानते। सूर्यवंशी इक्ष्वाकु राजा मनु वैवस्तव का पुत्र था, न कि मनु स्वयंभुव का। वैवस्तव का अर्थ सूर्य है जिसके वंशज इक्ष्वाकु कहलाये। वेदों में वर्णित 'इक्ष्वाकु' आर्यों के प्रथम दल के सूर्यवंसी थे तथा 'अइल' आर्यों के दूसरे दल के चंदवर्ंशी थे। आसोपा ने 'इक्ष्वाकु' तथा 'अइल' के मूल अधिवासन स्थल की खोज करते हुए कहा है कि महाभारत व हरिवंश पुराण में वर्णित 'इक्षुमति' नदी कुरुक्षेत्र में थी। रामायण में भी इसका उल्लेख है। स्ट्रैबो ने भी व्यास और यमुना नदियों के बीच एक नदी इमेसस (इक्षुमति) का उल्लेख किया है जिसे यूनानी मिनेन्डर ने पार किया था। इससे प्रतीत होता है कि आर्यों की इक्ष्वाकु शाखा 'इक्षुमति' नदी के तटों पर बस गई थी। मध्य एशिया में जैक्सर्टीज नदी में आनेवाले इन आर्यों ने भारत में कुरुक्षेत्र प्रदेश की नदी का नाम भी जैक्सर्टीज का भारतीय रूप इक्षुमति रख दिया तथा स्वयं इक्ष्वाकु कहलाये। इनका शासन इक्ष्वाकु मनु वैवस्तव (सूर्य) का पुत्र था। इसके कारण ही सूर्यवंशी मत का प्रचलन हुआ।
 महाभारत, हरिवंश तथा विष्णु पुराण में पंजाब की नदी 'इरा' का उल्लेख है जो अब 'रावी' के नाम से पुकारा जाती है। रामायण के अयोध्या काण्ड में वर्णन है कि भरत ने कैकेय प्रदेश से आते हुए शतद्रु के तट पर 'अइल' राज्य को पार किया। इससे स्पष्ट होता है कि 'अइल" आर्यों की दूसरी शाखा का अधिकार क्षेत्र 'इरा' (रावी) तथा "शतद्रु' (सतलज) नदियों के मध्य था। मध्य एशिया में, जहाँ से आर्य भारत आये, जैक्सर्टीज (इक्ष्वाकु) नदी के उत्तर में एक ओर नदी 'इली' थी। इली नदी से भारत आने वाली दूसरी शाखा के आर्य 'अइल' थे जो चन्द्रवंशी कहलाये। रुस में उत्खनन द्वारा भी आर्यों के अवशेष इस 'इली' नदी के तट पर मिले हैं। मध्य एशिया के यू - ची 'चन्द्रमा के लोग' इली नदी के तट पर बसे थे। इससे प्रतीत होता है कि जब ये लोग भारत आये थे तो स्वयं को चंद्रवंशी कहने लगे। आसोपा की मान्यता है कि इक्ष्वाकु मनु वैवस्तव से संबंधित थे। ये आर्य थे जो जैक्सर्टीज से होते हुए इक्षुमति को पार करके भारत में पूर्व की ओर चले गये। अइल भी जो सोम ॠषि तथा बुद्ध के वंशज थे, आर्य थे। ये इली व इरा नदी के तट पर रहते थे जिन्होंने यह नाम अन्य स्थानों तथा नदियों को भी दिया जहाँ वेगये। भारत की इरावती नदी तथा लंका का प्राचीन नाम इला भी इस तथ्य को प्रकट करते हैं। अत: आसोपा की मान्यता है कि सूर्यवंशी व चंद्रवंशी क्षत्रिय आर्यों की वे दो शाखआएँ थीं जो मध्य एशिया से भारत आईं। एक शाखा वहाँ की जैक्सर्टीज नदी तच पर तथा दूसरी शाखा वहाँ की इली नदी के तट से भारत आईं।
विदेशी वंश का मत
    पिछले दोनों मतों के विपरीत इतिहासकार कर्नल टॉड ने राजपूतों को शक और सिथियन बताया है। इसके प्रमाण में वे राजपूतों में प्रचलित ऐसे रीति - रिवाजों का उल्लेख करते हैं जो शक जाति के रीति - रिवाजों से साम्य रखते हैं। सूर्य की पूजा, सती प्रथा, अश्वमेघ यज्ञ, मद्यपान, शस्रों और घोड़ों की पूजा तथा तातारी और शकों की पुरानी कथाओं का पुराणों की कथाओं से साम्य रखना ऐसे तथ्य हैं जो राजपूतो की विदेशी उत्पत्ति प्रकट करते है। डॉ० स्मिथ ने भी शक, यूचि, गुर्जर व हूण विदेशी जातियों का भारत में धर्म परिवर्तन कर हिन्दू बन जाना स्वीकार किया है और इन विदेशी जातियों के राज्य स्थापित हो जाने पर उससे राजपूतों की उत्पत्ति मानी है। राजपूतों ने एपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने हेतु स्वयं को चन्द्र या सूर्यवंशी कहना प्रारम्भ किया। कर्नल टॉड की पुस्तक का सम्पादन करने वाले विलियम कुक भी इस मत का समर्थन करते हुए लिखते हैं कि वैदिक कालीन क्षत्रियों एवं मध्यकालीन राजपूतों की अवधि का अन्तराल इतना अधिक है कि दोनों के सम्बन्ध मूलवंश - क्रम से संबंधित करना संभव नहीं है। शक, सिथियन, हूण आदि विदेशी जातियाँ हिन्दू समाज में स्थान पा चुके थे और देश - रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। अत: उन्हें महाभारत तथा रामायण काल के क्षत्रियों से संबंधित कर दिया गया और सूर्य तथा चंद्रवंशी माना गया।
    डॉ० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने विदेशी उत्पत्ति को अस्वीकार किया है। जिन रीति - रिवाजों के आधार पर राजपूतों और शकों का साम्य किया गया है वे रीति - रिवाज वैदिक काल तथा पौराणिक काल में भी भारत में विद्यमान थे। डॉ० ओझा ने अभिलेखों के आधार पर तथ्य प्रकट किया है कि मौर्य और नन्दवंश के पतन के बाद भी सातवीं सदी तक क्षत्रियों का अस्तित्व था। द्वितीय शताब्दी के राजा खारवेल के उदयगिरी - लेख में 'कुसंब जाति के क्षत्रियों' का उल्लेख है, इसी अवधि के नासिक की पाण्डव गुहा लेख में 'उत्तम भाद्रक्षत्रियों' का वर्णन है, गिरिनार पर्वत -लेख में 'यौधेयों' को क्षत्रिय कहा गया है तथा तीसरी सदी के नागार्जुन कोंड - लेख में इक्ष्वाकुवंशीय राजाओं का उल्लेख है।
    यद्यपि डॉ० ओझा के विदेशी मत के विपक्ष में ये तर्क महत्वपूर्ण हैं किन्तु जो विदेशी भारत में आकर बस गये, उनका भारतीय समाज में विलनीकरण कैसे हुआ, यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है। डॉ० गोपीनाथ शर्मा का मत है - 'इस प्रश्न को हल करने में हमें यही युक्ति सहायक होगी कि इन विदेशियों के यहाँ आने पर पुरानी सामाजिक व्यवस्था में अवश्य हेर - फेर हुआ।
   डॉ० स्मिथ, कुक से सहमत होते हुए यह मानते हैं कि पृथ्वीराज रासो में जिन चार राजपूत वंशों की अग्निकुण्ड से उत्पत्ति बतलाई गई है, वे सभी विदेशी थे जिनको अग्नि द्वारा पवित्र कर राजपूत बनाया गया। दक्षिण के राजपूतों की उत्पत्ति तक गौड़, भार, कोल आदि जन - जातियों से मानते हैं। डॉ० आर० भण्डारकर प्रतिहारों की गुर्जरों से उत्पत्ति मानते हुए अन्य अग्निवंशीय राजपूतों को भी विदेशी उत्पत्ति का कहते हैं। नीलकण्ठ शास्री विदेशियों के अग्नि द्वारा पवित्रीकरण के सिद्धान्त में विश्वास करते हैं क्योंकि पृथ्वीराज रासो से पूर्व भी इसका प्रमाण तमिल काव्य 'पुरनानूर' में मिलता है। बागची गुर्जरों को मध्य एशिया की जाति वुसुन अथवा 'गुसुर 'मानते हैं क्योंकि तीसरी शताब्दी के अबोटाबाद - लेख में 'गुशुर 'जाति का उल्लेख है। जैकेसन ने सर्वप्रथम गुर्जरों से अग्निवंशी राजपूतों की उत्पत्ति बतलाई है। पंजाब तथा खानदेश के गुर्जरों के उपनाम पँवार तथा चौहान पाये जाते हैं। यदि प्रतिहार व सोलंकी स्वयं गुर्जर न भी हों तो वे उस विदेशी दल में भारत आये जिसका नेतृत्व गुर्जर कर रहे थे।
    सी० वी० वैद्य विदेशी उत्पत्ति को अस्वीकार करते हुए राजपूतों की वैदिक आर्यों से उत्पत्ति मानते हैं। इसके लिये वे पहला तर्क देते हैं कि केवल वैदिक आर्यों की संतान ही अपने धर्म की रक्षार्थ विदेशी आक्रांकाओं से युद्ध कर सकते थे। दूसरा तर्क यह है कि राजपूतों की सूर्य अवं चंद्रवंशीय होने की परम्परा उन्हें उन दो तथ्यों आर्यों के दलों का वंशज सिद्ध करता है जिन्होंने मध्य एशिया से भारत में प्रवेश किया। तीसरा तर्क १९०१ में हुई भारत की जनगणना से राजपूतों का आर्य वंश का होना प्रकट होता है।
   डॉ० गौरीशंकर ओझा ने राजपूतों की उत्पत्ति संबंधी देशी व विदेशी मतों में सामन्जस्य स्थापित करते हुए कहा है कि राजपूत वैदिक क्षत्रियों के वंशज थे तथा जिन विदेशी जातियों - सिथियन, कुषाण, हूण, आदि का भारतीयकरण हुआ, वे भी मध्य एशिया की आर्य जाति के ही वंशज थे। यह मत टॉड तथा वैद्य के विरोधी मतों में सामन्जस्य कर देता है। डॉ० दशरथ शर्मा ने भी इसी मत का समर्थन करते हुए कहा है कि भारत की समस्त जनता युद्ध - प्रिय जातियाँ स्वयं को क्षत्रिय होने का अधिकार रखती थीं। आसोपा ने भी इस मत का समर्थन किया है जो तर्कसम्मत प्रतीत होता है।

गुर्जर वंश का मत=

    विदेशी वंश के मत के संदर्भ में यह व्यक्त किया जा चुका है कि कुछ विद्वान राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी जाति गुर्जर  से होना मानते हैं। राजौर शिलालेख में प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है। गुर्जर कनिष्क के समय भारत आये और गुप्तकाल में सामन्त रूप में रहे। जैक्सन ने भी गुर्जरों 'हूणों' के साथ भारत अभियान पर आये 'खजर' जाति का माना है। आसोपा का मत है कि गुर्जरों ने छठी शताब्दी में राजस्थान तथा गुजरात में राज्य स्थापित कर लिये थे। ह्मवेनसांग ने इस प्रदेश को 'कुच -लो' अर्थात् गुजरात कहा है। बाणभ के ग्रन्थ 'हर्षचरित' में गुर्जर देश का उल्लेख है। अरब यात्री गुर्जरों को 'जुर्ज' कहते थे। नागौर जिले में दधिमाता मंदिर के शिलालेख में गुर्जर प्रदेश का उल्लेख है जो वहाँ की जोजरी नदी के कारण इस नाम से पुकारा गया है। ये साक्ष्य प्रकट करते हैं कि गुर्जर राजस्थान व गुजरात में निवास करते थे। किन्तु डॉ० गोपीनाथ शर्मा तथा डॉ० ओझा 'गुर्जर' शब्द का अर्थ प्रदेश विशेष मानते हैं शिलालेखों में इस प्रदेश के शासक को 'गुर्जरेश्वर 'या 'गुर्जर' कहा गया है।
डॉ० सत्यप्रकाश राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी जाति गुर्जर से मानना स्वीकार नहीं करते क्योंकि गुर्जर विदेशी नहीं थे और ह्मवेनसांग ने भी गुर्जर को क्षत्रिय माना है। गुर्जर प्रतिहारों के शिलालेखों में भी उन्होंने भारतीय आर्यों की संतान माना है। अत: निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि गुर्जर भारतीय थे और वे भारतीय क्षत्रिय वंश से संबंधित थे।

ब्राह्मणवंशीय मत-

   बिजोलिया - शिलालेख में वासुदेव (चहमान) के उत्तराधिकारी सामन्त को वत्स - गोत्रीय ब्राह्मण कहा गया है। राजशेखर ब्राह्मण का विवाह राजकुमारी अवन्ति सुन्दरी से होना भी चौहानों का ब्राह्मणवंशीय होना प्रकट करता है। 'कायमखाँ रासो' में भी चौहानों की उत्पत्ति वत्स से बतलाई गई है जो जमदग्नि गोत्र में था। इस तथ्य का साक्ष्य सुण्चा तथा आबू अभिलेख है। डॉ० भण्डारकर का मत है कि गुहिल राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से थी।
     डॉ० ओझा तथा वैद्य इस ब्राह्मणवंशीय मत को अस्वीकार करते हुए कहते हैं कि 'द्विज ब्रह्माक्षत्री', 'विप्र' आदि शब्दों का प्रयोग राजपूतों को क्षत्रिय जाति की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है न कि ब्राह्मण जाति के लिए। डॉ० गोपीनाथ शर्मा कुम्भलगढ़ - प्रशस्ति के आधार पर गुहिलवंशीय राजपूतों को ब्राह्मण वंशीय माना है। चाटसू अभिलेख में गुहिल भर्तृभ को 'ब्रह्मक्षत्री' इसलिये कहा गया है कि उसे ब्राह्मण संज्ञा से क्षत्रित्व प्राप्त हुआ। पहले भी कण्व तथा शुंग ब्राह्मणवंशीय क्षत्रिय शासक हुए हैं।

वैदिक आर्य वंश का मत-

    सूर्य तथा चंद्रवंशीय मतों के संदर्भ में यह विवेचन किया जा चुका है कि राजपूत वैदिक आर्यों की दो शाखाओं ने भारत में कुछ कालान्तर में प्रवेश किया। डॉ० ओसापा का मत है कि आर्यों की ये दो शाखआओं मध्य एशिया से भारत आईं। मध्य एशिया में इनके निवास - स्थल दो नदियों जैक्सर्टीज (इक्ष्वाकु) तथा इली के तट पर स्थित थे। इक्ष्वाकु से आने वाले चंद्रवंशीय क्षत्रिय कहलाये। रामायण, महाभारत, हरिवंश तथा विष्णु पुराणों के आधार पर यह तथ्य प्रकट होता है चीनी स्रोतों तथा रुस में हुए उत्खनन द्वारा भी इसकी पुष्टि होती है।
जाति इतिहासविद डॉ . दयाराम आलोक के मतनिसार  पश्चिमोत्तर प्रदेश से भारत में प्रवेश करने वाले आर्यों के समान अन्य विदेशी भी मूलत: आर्यवंशी प्रतीत होते हैं। भारत में ये विदेशी जातियाँ भी राज्य स्थापित कर राजपूत जाति के रूप में संगठित हो वैदिक आर्यों के क्षत्रिय वंश से अपना संबंध सूर्य तथा चंद्रवंशी बनकर स्थापित करने लगे।

निष्कर्ष-

   राजपूतों की उत्पत्ति सम्बन्धी उपर्युक्त मता - विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि राजपूत जाति में देशी क्षत्रिय तथा विदेशी, शक, , हूण आदि भी भारत में राज्य स्थापितकर 'राजपुत्र' बन इसमें सम्मिलित हो गये। डॉ० गोपीनाथ शर्मा की व्याख्यानुसार जिस तरह शक, पह्मलव, हूण आदि विदेशी यहाँ आए और जिस तरह इनका विलीनीकरण भारतीय समाज में हुआ, इसकी साक्षी इतिहास है। ये लोग लाखों की संख्या में थे। पराजित होने पर इनका यहाँ बस जाना प्रामाणिक है। ऐसी अवस्था में उसका किसी न किसी जाति से मिलना स्वाभाविक था। उस समय की युद्धोपजीवी जाति ही ऐसी थी जिसने इन्हें दबाया और उन्हें समानशील होने से अपने में मिलाया। इसी तरह छठी व सातवीं शताब्दी में क्षत्रियों और राजपूतों का समानार्थ में प्रयुक्त होना भी यह संकेत करता है कि इन विदेशियों के रक्त से मिश्रित जाति ही राजपूत जाति थी, जो यकायक क्षात्र - धर्म से सुसज्जित होकर प्रकाश में आ गई और शकादिकों का अस्तित्व समाप्त हो गया। यह स्थिति सामाजिक उथल - पुथल की पोषक है। हरिया देवी नामक हूण कन्या का विवाह गुहिलवंशी अल्लट के साथ होना, जो कि सं० १०३४ के शक्तिकुमार शिलालेख से स्पष्ट है इस सामंजस्य का अकाट्य प्रमाण है जब सभी राजसत्ता ऐसी जाति के हाथ आ गई तो ब्राह्मणों ने भी उन्हें क्षत्रिय की संज्ञा दी। उनकी राजनैेतिक स्थिती ने उन्हें राजपुत्र की प्रतिष्ठा प्रदान की जिसे लौकिक भाषा में राजपूत कहने लगे। इस सम्बन्ध में इतना अवश्य स्वीकार करना होगा कि सम्भवत: सभी क्षत्रियों का विदेशियों से सम्पर्क न हुआ हो और कुछ एक वंशों ने अपना स्वतन्त्र स्थान बनाये रखा हो।

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8.11.17

महाकवि कालिदास का जीवन परिचय:Mahakavi kalidas jeevan parichay




महाकवि कालिदास कब हुए और कितने हुए इस पर विवाद होता रहा है। विद्वानों के अनेक मत हैं। 150 वर्ष ईसा पूर्व से 450 ईस्वी तक कालिदास हुए होंगे ऐसा माना जाता है। नये अनुसंधान से ज्ञात हुआ है कि इनका काल गुप्त काल रहा होगा। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की रचना के पश्चात् संस्कृत साहित्य के आकाश में अनेक कवि-नक्षत्रों ने अपनी प्रभा प्रकट की, पर नक्षत्र - तारा - ग्रहसंकुला होते हुए भी कालिदास - चन्द्र के द्वारा ही भारतीय साहित्य की परम्परा सचमुच ज्योतिष्मयी कही जा सकती है। माधुर्य और प्रसाद का परम परिपाक, भाव की गम्भीरता तथा रसनिर्झरिणी का अमन्द प्रवाह, पदों की स्निग्धता और वैदिक काव्य परम्परा की महनीयता के साथ-साथ आर्ष काव्य की जीवनदृष्टि और गौरव-इन सबका ललित सन्निवेश कालिदास की कविता में हुआ है।
    कालिदास विश्ववन्द्य कवि हैं। उनकी कविता के स्वर देशकाल की परिधि को लाँघ कर सार्वभौम बन कर गूंजते रहे हैं। इसके साथ ही वे इस देश की धरती से गहरे अनुराग को पूरी संवेदना के साथ व्यक्त करने वाले कवियों में भी अनन्य हैं। कालिदास के समय तक भारतीय चिन्तन परिपक्व और विकसित हो चुका था, षड्दर्शन तथा अवैदिक दर्शनों के मत-मतान्तर और सिद्धान्त परिणत रूप में सामने आ चुके थे। दूसरी ओर आख्यान-उपाख्यान और पौराणिक वाङमय का जन-जन में प्रचार था। वैदिक धर्म और दर्शन की पुन: स्थापना का भी अभूतपूर्व समुद्यम उनके समय में या उसके कुछ पहले हो चुका था। ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद आदि विभिन्न विद्याओं का भी अच्छा विकास कालिदास के काल तक हो चुका था। कालिदास की कवि चेतना ने चिन्तन तथा ज्ञान-विज्ञान की इस सारी परम्परा, विकास को आत्मसात किया, अपने समकालीन समाज और जीवन को भी देखा-परखा और इन सबको उन्होंने अपनी कालजयी प्रतिभा के द्वारा ऐसे रूप में अभिव्यक्त किया, जो अपने अद्वितीय सौन्दर्य और हृदयावर्जकता के कारण युग-युग तक आकर्षक ही नहीं बना रहा, उसमें अर्थों और व्याख्याओं की भी सम्भावनाएं कभी चुकने को नहीं आतीं।

   कालिदास संस्कृत भाषा के एक महान नाटककार और कवि थे। कालिदास शिव के भक्त थे। कालिदास नाम का शाब्दिक अर्थ है, “काली का सेवक“। उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की।
महाकवी कालिदास की जीवनी – 

पूरा नाम – कालिदास 
जन्म – पहली से तीसरी शताब्दी के बीच ईस पूर्व माना जाता है।
जन्मस्थान – जन्मस्थान के बारे में विवाद है।
विवाह – राजकुमारी विद्योत्तमा से।
कलिदास अपनी अलंकार युक्त सरल और मधुर भाषा के लिये विशेष से जाने जाते हैं। उनके ऋतु वर्णन बहुत ही सुंदर हैं और उनकी उपमाएं बेमिसाल हैं। संगीत उनके साहित्य का प्रमुख है और रस का सृजन करने में उनकी कोई उपमा नहीं। उन्होंने अपने शृंगार रस प्रधान साहित्य में भी साहित्यिक सौन्दर्य के साथ-साथ आदर्शवादी परंपरा और नैतिक मूल्यों का समुचित ध्यान रखा है। उनका नाम सदा-सदा के लिये अमर है और उनका स्थान वाल्मीकि और व्यास की परम्परा शामिल हैं।
   कालिदास के काल के विषय में काफी मतभेद है। पर अब विव्दानों की सहमति से उनका काल प्रथम शताब्दी ई. पू. माना जाता है। इस मान्यता का आधार यह है कि उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के शासन काल से कालिदास का रचनाकाल संबध्द है।
    किंवदन्ती है कि प्रारंभ में कालिदास मंदबुध्दी तथा अशिक्षित थे। कुछ पंडितों ने जो अत्यन्त विदुषी राजकुमारी विद्योत्तमा से शास्त्रार्थ में पराजित हो चुके थे। बदला लेने के लिए छल से कालिदास का विवाह उसके साथ करा दिया। विद्योत्तमा वास्तविकता का ज्ञान होने पर अत्यन्त दुखी तथा क्षुब्ध हुई। उसकी धिक्कार सुन कर कालिदास ने विद्याप्राप्ति का संकल्प किया तथा घर छोड़कर अध्ययन के लिए निकल पड़े और विव्दान बनकर ही लौटे।
   जिस कृति कारण कालिदास को सर्वाधिक प्रसिध्दि मिली। वह है उनका नाटक ‘अभिग्यांशाकंतलम’ जिसका विश्व की अनेक भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है। उनके दुसरे नाटक ‘विक्रमोर्वशीय’ तथा ‘मालविकाग्निमित्र’ भी उत्कृष्ट नाट्य साहित्य के उदाहरण हैं। उनके केवल दो महाकाव्य उपलब्ध हैं – ‘रघुवंश’ तथा ‘कुमारसंभव’ पर वे ही उनकी कीर्ति पताका फहराने के लिए पर्याप्त हैं। काव्यकला की दृष्टि से कालिदास का ‘मेघदूत’ अतुलनीय है। इसकी सुन्दर सरस भाषा, प्रेम और विरह की अभिव्यक्ति तथा प्रकृति चित्रण से पाठक मुग्ध और भावविभोर हो उठते हैं। ‘मेघदूत’ का भी विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चूका है। उनका ‘ऋतु संहार’ प्रत्येक ॠतु के प्रकृति चित्रण के लिए ही लिखा गया है।

   
कविकुल गुरु महाकवि कालिदास की गणना भारत के ही नहीं वरन् संसार के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में की जाती है। उन्होंने नाटक, महाकाव्य तथा गीतिकाव्य के क्षेत्र में अपनी अदभुत रचनाशक्ति का प्रदर्शन कर अपनी एक अलग ही पहचान बनाई।
कालिदास की रचनाएं -
श्यामा दंडकम्
ज्योतिर्विद्याभरणम्
श्रृंगार रसाशतम्
सेतुकाव्यम्
श्रुतबोधम्
श्रृंगार तिलकम्
कर्पूरमंजरी
पुष्पबाण विलासम्

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा-

विशिष्ट कवियों की चयनित कविताओं की सूची (लिंक्स)

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से -गोपालदास "नीरज"

वीरों का कैसा हो वसंत - सुभद्राकुमारी चौहान

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा-अल्लामा इकबाल

उन्हें मनाने दो दीवाली-- डॉ॰दयाराम आलोक

जब तक धरती पर अंधकार - डॉ॰दयाराम आलोक

जब दीप जले आना जब शाम ढले आना - रविन्द्र जैन

सुमन कैसे सौरभीले: डॉ॰दयाराम आलोक

वह देश कौन सा है - रामनरेश त्रिपाठी

किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की रामबाण औषधि

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ -महादेवी वर्मा

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल - महादेवी वर्मा

प्रणय-गीत- डॉ॰दयाराम आलोक

गांधी की गीता - शैल चतुर्वेदी

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार -शिवमंगलसिंह सुमन

सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक

जंगल गाथा -अशोक चक्रधर

मेमने ने देखे जब गैया के आंसू - अशोक चक्रधर

सूरदास के पद

रात और प्रभात.-डॉ॰दयाराम आलोक

घाघ कवि के दोहे -घाघ

मुझको भी राधा बना ले नंदलाल - बालकवि बैरागी

बादल राग -सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

आओ आज करें अभिनंदन.- डॉ॰दयाराम आलोक

26.10.17

दया की प्रतिमूर्ति राजा रंतीदेव की कथा:Raja rantidev katha





रघुवंश में एक संस्कृति नाम के परम प्रतापी राजा थे | उनके गुरु और रन्तिदेव नामक दो पुत्र थे | रन्तिदेव दया के मूर्तिमान स्वरूप थे | उनका एकमात्र लक्ष्य था -संसार के सभी प्राणियों के दुःख का निदान | वह भगवान से प्रार्थना करते हुए कहते थे “मै आपसे अष्टसिद्धि या मोक्ष की भी कामना नही करता |मेरी आपसे इतनी ही प्रार्थना है कि समस्त प्राणियों के अन्त:करण में स्थित होकर मै ही उनके दुखो को भोग लू ,जिससे सब दुःख रहित हो जाए “|
इसलिए महाराज रन्तिदेव यही सोचते थरहते थे कि मेरे माध्यम से दीनो का उपकार कैसे हो , मै दुखी प्राणियों के दुःख किस प्रकार दूर करू | अंत: उनके द्वार से कोई भी याचक कभी निराश नही लौटता था | यह सबकी यथेष्ट सेवा करते थे इसलिए उनका यश सम्पूर्ण भूमंडल पर फ़ैल गया | संसार की वस्तुए चाहे कितनी ही अधिक ना हो , उन्हें निरंतर खर्च करने पर के न एक दिन समाप्त हो ही जाती है |
महाराज रन्तिदेव का राजकोष भी दीन को बांटते बांटते एक दिन खाली हो गया | यहा तक कि उनके पास खाने के लिए मुट्ठी भर अन्न भी नही रहा | वह अपने परिवार के साथ जंगल में निकल गये | एक बार उन्हें अन्न की कौन कहे , पीने के लिए जल की एक बूंद भी नही मिली | परिवार सहित बिना कुछ खाए पीये 48 दिन हो गये
भगवान की कृपा से 49वे दिन महाराज रन्तिदेव को कही से खीर ,हलवा और जल प्राप्त हुआ | भगवान का स्मरण करके वह उसे अपने परिवार में वितरित करना ही चाहते थे कि अचानक एक ब्राह्मण देव आ गये | उन्होंने कहा “राजन ! मै भूख से अत्यंत व्याकुल हु | कृपया मुझे भोजन देकर तृप्ति प्रदान करे |” महाराज ने ब्राह्मण को बड़े ही सत्कार से भोजन कराया और ब्राह्मण देव संतुष्ट होकर और राजा को आशीर्वाद देकर चले गये |
महाराज ने बचा हुआ अन्न अपने परिवार में वितरित करने के लिए सोचा | इतने में एक निर्धन आकर अन्न की याचना करने लगा | महाराज ने उसे भी तृप्त कर दिया | तदन्तर एक व्यक्ति कई कुत्तो के साथ वहा आया और बोला “महाराज ! मै और मेरे ये कुत्ते अत्यंत भूखे है | हमे अन्न देकर हमारी आत्मा को तृप्त करे “|
महाराज रन्तिदेव अपनी भूख प्यास भूल गये और बचा हुआ सारा अन्न उस व्यक्ति को दे दिया | अब उनके पास मात्र एक व्यक्ति की प्यास बुझाने लायक जल शेष था | महाराज उस जल को अपने परिवार में बांटकर पीना चाहते थे कि तभी एक चांडाल ने उनके पास आकर जल की याचना की | महाराज ने प्रसन्नतापूर्वक वह जल भी उसे पिलाकर तृप्त कर दिया |
वास्तव में ब्राह्मण ,निर्धन और चंडाल के वेश में स्वयं भगवान विष्णु ,ब्रह्मा और महेश जी महाराज की परीक्षा की परीक्षा लेने आये थे | प्राणीमात्र पर दया के कारण महाराज रन्तिदेव को अपने परिवार सहित योगियों के लिए दुर्लभ भगवान का परम धाम प्राप्त हुआ | भगवान अपने अंशभुत जीवो से प्रेम करने वालो पर ही अधिक संतुष्ट होते है |संसार में समस्त प्राणी भगवान के ही विभिन्न रूप है जो भगवत बुद्धि से सबकी सेवा करते है वे दुस्तर संसार सागर में सहज ही तर जाते है |
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25.10.17

भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्धों की जानकारी



भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्ध कब, कहाँ और किसके बीच लडे गए, आइये इसकी जानकारी प्राप्त करें, और अपनी प्राचीन धरोहर से परिचित हो सके |
भारतीय सभ्यता और संस्कृति हमेशा यही सिखाती रही है कि “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संत निरामया” |
फलस्वरूप भारत द्वारा इस धरती के किसी भी पडोसी मुल्क पर कभी भी आक्रमण या युद्ध का प्रयास नहीं किया गया | हमेशा से ही बाहरी लोगों ने हम पर आक्रमण किए और हमें गुलाम बनाया है | अपनी संस्कृति का पालन करते हुवे हमने तो हमेशा से यही दुहाई दी है कि हमें कोई भी गलत काम नहीं करना चाहिए क्योंकि गलत करनी का हिसाब परम पिता परमेश्वर करेगा |
आइये आज हिसाब करें भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्ध जो हमपर विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा थोपे गए थे |
ईसा पूर्व भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्ध
1. हाईडेस्पीज का युद्ध(326)- सिकंदर और पंजाब के राजा पोरस के बीच जिसमे सिकंदर की विजय हुई |
2. कलिंग की लड़ाई (261) -सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था और युद्ध के रक्तपात से विचलित होकर उन्होंने युद्ध न करने की कसम खाई |
ईस्वी काल के भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्ध
1. सिंध की लड़ाई (712)- मोहम्मद कासिम ने अरबों की सत्ता स्थापित की |
2. तराईन का प्रथम युद्ध (1191) – मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के बीच हुआ था | चौहान की विजय हुई |
3. तराईन का द्वितीय युद्ध (1192) – मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के बीच| इसमें मोहम्मद गौरी की विजय हुई |
4. चंदावर का युद्ध (1194) – इसमें मुहम्मद गौरी ने कन्नौज के राजा जयचंद को हराया
4. चंदावर का युद्ध (1194) – इसमें मुहम्मद गौरी ने कन्नौज के राजा जयचंद को हराया |
5. पानीपत का प्रथम युद्ध (1526) -मुग़ल शासक बाबर और इब्राहीम लोधी के बीच |
6. खानवा का युद्ध (1527) – इसमें बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया |
7. घाघरा का युद्ध (1529) -इसमें बाबर ने महमूद लोदी के नेतृत्व में अफगानों को हराया |


8. चौसा का युद्ध (1539)– इसमें शेरशाह सूरी ने हुमायु को हराया |
9. कन्नौज /बिलग्राम का युद्ध (1540) – इसमें फिर से शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को हराया व भारत छोड़ने पर मजबूर किया |
10. पानीपत का द्वितीय युद्ध (1556) -अकबर और हेमू के बीच |
11. तालीकोटा का युद्ध (1565)- इस युद्ध से विजयनगर साम्राज्य का अंत हो गया क्यूंकि बीजापुर, बीदर,अहमदनगर व गोलकुंडा की संगठित सेना ने लड़ी थी |
12. हल्दी घाटी का युद्ध (1576)- अकबर और राणा प्रताप के बीच, इसमें राणा प्रताप की हार हुई |
13. प्लासी का युद्ध (1757)- अंग्रेजो और सिराजुद्दौला के बीच, जिसमे अंग्रेजो की विजय हुई और भारत में अंग्रेजी शासन की नीव पड़ी |
14. वांडीवाश का युद्ध (1760)- अंग्रेजो और फ्रांसीसियो के बीच, जिसमे फ्रांसीसियो की हार हुई |
15. पानीपत का तृतीय युद्ध (1761)- अहमदशाह अब्दाली और मराठो के बीच | जिसमे फ्रांसीसियों की हार हुई |
 

16. बक्सर का युद्ध (1764)- अंग्रेजो और शुजाउद्दौला, मीर कासिम एवं शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना के बीच | अंग्रेजो की विजय हुई | अंग्रेजो को भारत वर्ष में सर्वोच्च शक्ति माना जाने लगा |

17. प्रथम मैसूर युद्ध (1767-69)- हैदर अली और अंग्रेजो के बीच, जिसमे अंग्रेजो की हार हुई |
18. द्वितीय मैसूर युद्ध (1780-84)- हैदर अली और अंग्रेजो के बीच, जो अनिर्णित छूटा |
19. तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध (1790)- टीपू सुल्तान और अंग्रेजो के बीच लड़ाई संधि के द्वारा समाप्त हुई |
20. चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध (1799)- टीपू सुल्तान और अंग्रेजो के बीच , टीपू की हार हुई और मैसूर शक्ति का पतन हुआ |
21. चिलियान वाला युद्ध (1849)- ईस्ट इंडिया कंपनी और सिखों के बीच हुआ था जिसमे सिखों की हार हुई |

22. भारत चीन सीमा युद्ध(1962)- चीनी सेना द्वारा भारत के सीमा क्षेत्रो पर आक्रमण | कुछ दिन तक युद्ध होने के बाद एकपक्षीय युद्ध विराम की घोषणा | भारत को अपनी सीमा के कुछ हिस्सों को छोड़ना पड़ा |
23. भारत पाक युद्ध (1965)- भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जिसमे पाकिस्तान की हार हुई | भारत पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता हुआ |
24. भारत पाक युद्ध (1971)- भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जिसमे पाकिस्तान की हार हुई | फलस्वरूप बांग्लादेश एक स्वतन्त्र देश बना |
25. कारगिल युद्ध (1999)- जम्मू एवं कश्मीर के द्रास और कारगिल क्षेत्रो में पाकिस्तानी घुसपैठियों को लेकर हुए युद्ध में पुनः पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और भारतीयों को जीत मिली |
उपर्युक्त वर्णित सभी युद्ध हमारे भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्ध का सिलसिलेवार वर्णन है | इनसे हमें हमारे इतिहास की जानकारी मिलती है और ये हमें अपने भविष्य के लिए तैयार रहने की प्रेरणा देते हैं |







23.10.17

भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उतार




1. चीनी यात्री ह्नेनसांग सर्वप्रथम किस भारतीय राज्य पहुँचा—
उत्तर: कपिशा
2. सर्वप्रथम भारतवर्ष का जिक्र किस अभिलेखा में मिला है—
उत्तर: हाथी गुंफा अभिलेख में
3. अभिलेखों का अध्ययन क्या कहलाता है—
उत्तर: इपीग्राफी
4. सिंधु सभ्यता के लोग किस क्षेत्र के निवासी थे—
उत्तर: भूमध्यसागरीय
5. गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश सबसे अधिक किस स्थान पर दिए —
उत्तर: श्रावस्ती में
6. सिकंदर किसका शिष्य था—
उत्तर: अरस्तू का
7. सिकंदर का सेनापति कौन था —
उत्तर: सेल्यूकस निकेटर
8. पुष्यमित्र किस धर्म का समर्थक था—
उत्तर: ब्राह्मण धर्म का
9. बेसनगर में स्थित गरुण स्तंभ का निर्माण किसने कराया—
उत्तर: हेलियोडोर ने
10. ‘गार्गी संहिता’ क्या है—
उत्तर: ज्योतिष ग्रंथ

11. ‘गार्गी संहिता’ की रचना किसने की—
उत्तर: कात्यायन ने
12. कुषाण वंश की स्थापना किसने की—
उत्तर: कुजुला कडफिसेस
13.कनिष्क को शासन कब प्राप्त हुआ—
उत्तर: 78 ई.
14. भारत में शिलालेखों का प्रचलन किसने कराया—
उत्तर: अशोक ने
भारत का प्राचीन इतिहास
15. पुराणों में अशोक को क्या कहा गया है—
उत्तर: अशोक वर्धन
16. ‘भरहूत स्तूप’ का निर्माण किसने कराया—
उत्तर: पुष्यमित्र शुंग ने
17. रेशम बनाने की तकनीक का अविष्कार सर्वप्रथम किस देश में हुआ—
उत्तर: चीन में
18. गुप्त वंश का संस्थापक कौन था—
उत्तर: श्रीगुप्त
19. मंदिर बनाने की कला का जन्म किस काल में हुआ—
उत्तर: गुप्त काल में
20. भारतीय इतिहास का कौन-सा स्त्रोत प्राचीन भारत के व्यापारिक
मार्गों पर मौन है—
उत्तर: मिलिंद पान्हो

21. सर्वप्रथम भारत को इंडिया किसने कहा—
उत्तर: यूनानवासियों ने
22. मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका में किसके शासनकाल का वर्णनकिया है—
उत्तर: चंद्रगुप्त मौर्य
23. ‘प्रिय दर्शिका’ नामक संस्कृत ग्रंथ की रचना किस शासक ने की—
उत्तर: हर्षवर्धन ने
24. नागनंदा’ नामक संस्कृतनटक की रचना किस शासक ने की
उत्तर: हर्षवर्धन ने
25. अजंता की गुफा किस धर्म से संबंधित है—
उत्तर: बौद्ध धर्म से
26. सुरदर्शन झील का पुर्नोद्धार किसने कराया—
उत्तर: स्कंधगुप्त ने
27. पुष्यभूति वंश की स्थापना किसने की—
उत्तर: पुष्यभूतिवर्धन
28. पुष्यभूति वंश का सबसे प्रतापी राजा कौन था—
उत्तर: हर्षवर्धन
29. हर्षवर्धन गद्दी पर कब बैठा
उत्तर: 606 ई.
30. हर्षवर्धन के समय नालंदा विश्वविद्यालय का कुलपति कौन था—
उत्तर: शीलभद्र

31. किस अभिलेख में हर्षवर्धन को परमेश्वर कहा गया है—
उत्तर: मधुबन व बाँसखेड़ा अभिलेखों में
32. कश्मीर का इतिहास किस ग्रंथ में है—
उत्तर: राजतरंगिणी
"" 33. राजतरंगिणी नामक ग्रंथ किसने लिखा—
उत्तर: कल्हण ने
34. एरण अभिलेख का संबंध किस शासक से है
उत्तर: भानुगुप्त से
35. चीनी यात्री फाह्यान किसके शासन काल में भारत आया—
उत्तर: चंद्रगुप्त द्वितीय
ये देश कितना भी तरक्की कर ले, लेकिन लोग
मुड़ने से पहले इंडिकेटर की जगह हाथ ही देंगे
36. भारतीय संस्कृति का स्वर्ण युग किस युग को कहा जाता है—
उत्तर: गुप्त युग को
37. ‘सेतुबंध’ की रचना किस वंश के शासक ने की—
उत्तर: वाकाटक
38. किस गुप्तकालीन शासक को कविराज कहा गया है —
उत्तर: समुद्रगुप्त
39. कोकार्कोट वंश की स्थापना किसने की—
उत्तर: दुर्लभर्वन
40. ‘अवंतिनगर’ नामक नगर को किस शासक ने बसाया—
उत्तर: अवंतिवर्मन ने

41. कार्कोट वंश के बाद किस वंश का उदय हुआ—
उत्तर: उत्पल वंश
42. सर्वप्रथम हर्षवर्धन ने कन्नौज में बौ धर्म सभा का आयोजन कब किया—
उत्तर: 643 ई.
43. हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् कन्नौज पर किसका शासन हुआ—
उत्तर: यशोवर्मन
44. गुप्त वंश के किस शासक ने ‘महाधिराज’ की उपाधि धारण की—
उत्तर: चंद्रगुप्त प्रथम ने
प्राचीन भारत का इतिहास:-
45. गुप्तवंश की स्थापना कब हुई—
उत्तर: 319 ई.
ये अखबार बेचने वालों की फेंकने की ऐसी आदत पडी हैं कि..सामने खडे हो तब भी साले पकडायेंगे नहीं फेक कर ही देंगे !!
46. गुप्त वंश की स्थापना किसने की—
उत्तर: चंद्रगुप्त I द्वारा
47. ह्नेनसांग की रचना की क्या नाम है
उत्तर: सी-यू- की
48. कौन-सा गुप्त शासक भारतीय नेपोलियन के नाम से प्रसिद्ध था—
उत्तर: समुद्रगुप्त
49. कालीदास द्वारा रचित ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक का नायक कौन था—
उत्तर: अग्निमित्र
50. स्कंदगुप्त को किस लेख से ‘शक्रोपम’ कहा गया है—
उत्तर: कहौमस्तम लेख

51. गुप्त काल के सबसे लोकप्रिय देवता कौन थे—
उत्तर: विष्णु
52. दिल्ली में स्थित ‘लौह स्तंभ’ किस सदी में निर्मित हुआ—
उत्तर: चौथी सदी में
53. ‘अमरकोष’ नामक ग्रंथ की रचना किसने की और वे किस शासक से जुड़ेथे—
उत्तर: अमर सिंह ने,चंद्रगुप्त II से
54. हरिषेण किसका राजदरबारी कवि था—
उत्तर: समुद्रगुप्त का
54. गुप्त काल की सोने की मुद्रा को क्या कहा जाता था—
उत्तर: दीनार
55. ‘कुमारसंभव’ महाकाव्य को किसने रचा—
उत्तर: कालीदास
56. नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना किस युग में हुई—
उत्तर: गुप्त युग में
57. गुप्त युग में भू-राजस्व की दर क्या थी—
उत्तर: उपज का छठा भाग
58. नगरों का क्रमिक पतन किस युग की विशेषता थी—
उत्तर: गुप्त युग की
59. फाह्यान द्वारा लिखित ग्रंथ ‘फो-कुओ-की’ में किसका वर्णन मिलता है—
उत्तर: बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का
60. किस वंश के शासकों ने मंदिरों और ब्राह्मणों को सबसे अधिक ग्रामअनुदान में दिए—
उत्तर: गुप्त वंश

61. महरौली स्थित लौह स्तंभ किसकी स्मृति में है
उत्तर: चंद्रगुप्त II
62. समुद्रगुप्त की सैनिक उपलब्धियों का वर्णन किस अभिलेख में है—
उत्तर: प्रयाग
63. बाल विवाह की प्रथा कब आरंभ हुई—
उत्तर: गुप्त युग में
64. सर्वप्रथम कौन-सा ग्रंथ यूरोपीय भाषा में अनुदित/अनुवादित हुआ—
उत्तर: अभिज्ञान शाकुंतलम्
65. सती प्रथा का प्रथम उल्लेख कहा से मिलता है—
उत्तर: एरण अभिलेख से
66. गुप्तकालीन सिक्कों का सबसे बड़ा ढेर कहाँ से प्राप्त हुआ—
उत्तर: बयाना (भरतपुर)
67. किस गुप्त शासक को नालंदा विश्वविद्यालय का संस्थापक
माना जाता था—
उत्तर: रूपक
68. कालीदास की कौन- सी कृति की गिनती विश्व की सर्वाधिक प्रसिद्ध 100कृतियों में की जाती हैं—
उत्तर: अभिज्ञान शाकुंतलम्
69. गणित की दशमलव प्रणाली के अविष्कार का श्रेय किसे दिया जाता है—
उत्तर: मौर्य युग को

70. किस विद्धान ने गणित को एक पृथक विषय के रूप में स्थापित
किया—
आर्यभट्ट

71. पालघाट मणि अय्यर प्रसिद्ध वादक थे—
उत्तर : मृदंगम के
72. गांधार शैली का संबंध है—
उत्तर : मूर्तिकला
73. सांची के स्तूप किसकी कला तथा मूर्तिकला को निरूपित करते हैं —
उत्तर : बौद्धों की

74. `दयाभाग’ का लेखक कौन था —
उत्तर : जीमूतवाहन
75. `हिन्दी दिवस’ कब मनाया जाता है —
उत्तर : 14 सितम्बर
76. मुहम्मद पैगम्बर के जन्म दिवस पर कौन-सा पर्व मनाया जाता है—
उत्तर : ईद-ए-मिलादुलनवी
77. `खालसा पंथ’ की स्थापना की गयी थी—
उत्तर : गुरू गोविन्द सिंह
78. तीर्थस्थल `कामाख्या’ किस राज्य में है —
उत्तर : असम
79. ताँबे के सिक्के जारी करने वाला प्रथम गुप्त शासक कौन था—
उत्तर: रामगुप्त
80. मिहिरकूल का संबंध किससे था —
उत्तर: हूण से

81. कौन-से गुप्त राजा ने विक्रमाद्वित्य की उपाधि ग्रहण की थी—
उत्तर: चंद्रगुप्त II
82. किस गुप्त शासक ने दक्षिण में 12 राज्यों पर विजय प्राप्त कीउत्तर: समुद्रगुप्त ने
83. ‘सर्वराजोच्छेता’ की उपाधि किसने धारण की—
उत्तर: समुद्रगुप्त ने
84. चंद्रगुप्त प्रथम ने गुप्त संवत् की स्थापना कब की—
उत्तर: 319 ई.
85. गुप्त संवत् एवं शक संवत् में कितना अंतर है—
उत्तर: 241 वर्ष
86. किस वंश के शासकों ने चाँदी की मुद्राओं का प्रचलन किया—
उत्तर: गुप्त वंश के शासकों ने
87. गुप्तकाल में प्रमुख शिक्षा केंद्र कौन-से थे—
उत्तर: पाटलिपुत्र, उज्जयिनी
88. गुप्तवंश का अंतिम शासक कौन था—
उत्तर: विष्णुगुप्त
89. ‘सूर्य सिद्धांत’ नामक ग्रंथ किसने लिखा—
उत्तर :आर्यभट्ट ने
90. नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई —
उत्तर: 415-454 ई.

91. संगम काल में कितनी रचनाओं का वर्णन है—
उत्तर: 2289
92. संगम काल की प्रसिद्ध रचना कौन सी थी—
उत्तर: तमिल व्याकरण ग्रंथ तोलकाप्पियम
93. ‘तोलकाप्पियम’ की रचना किसने की—
उत्तर: तोल काप्पियर ने
94. चोल वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक कौन-था—
उत्तर: करिकाल
95. करिकाल गद्दी पर कब बैठा—
उत्तर: 190 ई. के लगभग
96. किस चोल वंश के शासक ने उद्योग धंधे व कृषिको प्रोत्साहन दिया—
उत्तर: करिकाल ने
97. मानसून की खोज किसने की—
उत्तर: मिस्त्र के नाविक हिप्पालस ने
98. गुप्तकाल की प्रसिद्ध पुस्तक ‘नवनीतकम्’ का संबंध किस क्षेत्र में है—
उत्तर: चिकित्सा के क्षेत्र से
99. चोल काल में सूती वस्त्र उद्योग का प्रमुख कौन-सा था—
उत्तर: उरैयूर
100. सती होने का प्रमाण प्रथम बार कब मिला—
उत्तर: 510 ई

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