21.3.18

शिवाजी महाराज का इतिहास:Shivaji ka jeevan parichay

                                                              



शिवाजी भारत के महान् योद्धा एवं रणनीतिकार थे, जिन्होंने 1674 ई. में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। उन्होंने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुग़ल साम्राज्य से संघर्ष किया। सन 1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ और वे छत्रपति बने। शिवाजी ने अपनी अनुशासित सेना एवं सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया। उन्होंने समर-विद्या में अनेक नवाचार किये तथा छापामार युद्ध की नयी शैली (शिवसूत्र) को विकसित किया। उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनैतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया और फ़ारसी के स्थान पर मराठी एवं संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया।
                                       
मराठा राज्य के प्रथम शासक थे शिवाजी महाराज |शिवाजी का जन्म ६ अप्रैल १६२७ को शिवनेर के दुर्ग में हुआ था . शिवाजी के पिता का नाम शाहजी भोंसले और माता का नाम जीजाबाई था . शाहजी भसले पहले अहमदनगर के निजाम थे और बाद में बीजापुर के दरबार में नौकरी करने लगे | शिवाजी के पालन पोषण का दायित्व पूरा उनकी माता जीजाबाई पर था | शिवाजी बचपन से ही बहुत साहसी थे | कहा जाता है उनकी माता बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की थी , जिनका प्रभाव भी शिवाजी पर पड़ा | माता जीजाबाई बचपन में शिवाजी को वीरता की कहानिया सुनाया करती , जिसका प्रभाव शिवाजी पर पडा | शिवाजी के गुरु थे स्वामी रामदास जिन्होंने शिवाजी की निर्भीकता , अन्याय से जूझने की सामर्थ्य और संगठनात्मक योगदान का विकास किया |
शिवाजी राजे के कुछ बढे होने पर शाहजी ने शिवाजी को अपनी एक जागीर पुणे दे दी | शिवाजी बहुत साहसी थे और सोचते थे की वह दूसरे राजायो की सेवा क्यों करे . शिबवाजी का सपना था मराठो का अलग राज्य हो , इसी सपने को लेकर शिवाजी १८ साल की उम्र से ही सेना इकठा करने लगे . धीरे धीरे एक अलग मराठा राज्य बनाने के उद्देश्य से शिवाजी ने आस पास के छोटे छोटे राज्यो पर आक्रमण करना शुरू कर दिया और उन्हें जीत लिया | शिवाजी ने पुणे के आस पास के कई किलो को जीत लिया और नए किलों का निर्माण भी कराया जैसे ‘ रायगढ़ का किला ‘
शिवाजी को स्वत्रंत राज्य की स्थापना करने में दक्षिण में बीजापुर और अहमदाबाद के सुल्तान और दिल्ली में मुग़ल बादशाह से संघर्ष करना पढ़ा |
शिवाजी को मारने के लिए बीजापुर के सुल्तान ने अपने प्रमुख सेनापति अफजल को एक विशाल सेना के साथ पुणे की तरफ भेजा | अफजल खान ने शिवाजी को मारने के लिए चालाकी से उन्हें अपने तम्बू में संधि करने बुलाया | शिवाजी अपने कुछ सिपाहियों के साथ अफजल से मिलने गए | अफजल शिवजी महाराज को मारता इससे पहले ही शिवाजी ने उसे मार गिराया | शिवाजी की बढ़ती हुई ताकत को देखकर मुग़ल बादशाह शिवाजी को खतरे के रूप में देखने लगा . औरंगजेब ने शिवाजी को मारने के लिए सूबेदार शाहिस्ता खान को भेजा | शिवाजी ने उसे भी हरा दिया |
उसके बाद औरंगजेब ने जयसिंह को शिवाजी के पास भेजा | जयसिंह के समझने पर शिवाजी औरंगजेब से संधि करने औरंगजेब के दरवार में आ गए |वहां औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर दिया | शिवाजी कुछ समय बाद औरंगजेब की कैद से योजना बनाकर निकल गए | इसके बाद १६७० में सूरत पर आक्रमण करके उन्होंने बहुत सी संपत्ति इक्कठी कर ली | शिवाजी का रायगढ़ में पंडित गंगाभट्ट द्वारा राज्याभिषेक हुआ और शिवाजी "छत्रपती शिवाजी महाराज" हो गए | शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के कुछ दिन बाद ही उनकी माता जीजाबाई का देहांत हो गया | शिवाजी ने अपने गुरु की चरण पादुका रखकर शासन किया और अपने गुरु के नाम पर ही सिक्के बनवाये | 1680 में शिवाजी महाराज का देहांत हो गया |
शिवाजी की शासन प्रणाली
शिवाजी महाराज एक कुशल शासक, योग्य सेनापति थे , शिवाजी ने अपनी योग्यता के बल पर मराठो को संगठित करके अलग मराठा साम्राज्य की स्थापना की .
शिवाजी ने अपनी राज्य व्यवस्था के लिए 8 मंत्री नियुक्त किये | उन्हें अष्ट प्रधान कहा जाता था | जिसमे पेशवा का पद सबसे महत्वपूर्ण होता था
साम्राज्य की सुरक्षा के लिए शिवाजी ने एक अनुशासित सेना बनायीं |उन्होंने एक जहाजी बेडा भी बनाया इसलिए शिवाजी को आधुनिक नौ सेना का जनक भी कहा जाता है | शिवाजी छापामार युद्ध प्रणाली का प्रयोग करते थे | भूमि कर मराठा राज्य की आय का मुख्य स्रोत्र था |
मराठा प्रणाली के ८ मुख्य पद
1. पेशवा (प्रधानमंत्री )
2.अमात्य ( मजूमदार )
3.मंत्री
4.सचिव
5.सुमंत
6.सेनापति
7.पंडित राव
8.न्यायधीश
शिवाजी महाराज के उत्तारधिकारी
शिवाजी महाराज के पौत्र शाहू ने एक ब्राह्मण बालाजी विश्वनाथ को अपना पेशवा नियुक्त किया | बालाजी विश्वनाथ ही राज्य की सभी व्यवस्था देखते थे | बालाजी विश्वनाथ ने अपनी योग्यता और कुशलता के बल पर मराठा शासन को मजबूत बनाया . उन्होंने मुग़ल शासक मोह्म्मद शाह रंगीला से दक्षिण इलाके से चौथे और सरदेशमुखी कर बसूलना शुरू कर दिया | और उन सब इलाको पर पुनः अधिकार कर लिया जिसे मुगलो ने अपने अधिकार में ले लिया था | सैनिक और आर्थिक दृस्टि से मराठो ने अपनी शक्ति बढ़ा ली अब वह मुग़ल सेना का सामना भली भांति कर सकते थे | मुगलो के साथ युद्ध करने में मराठो ने छापामार प्रणाली अपनायी .
बालाजी विश्वनाथ के बाद उनका पुत्र बाजीराव ( Peshwa Bajirao )प्रथम को पेशवा के पद पर नियुक्त किया गया | बाजीराव एक कुशल सेनापति व उच्च कोटि का कूटनीतिज्ञ थे | बाजीराव प्रथम के बाद बाजीराव के पुत्र बाजीराव द्वितीय को पेशवा बनाया गया|
बाजीराव द्वितीय का अफगानिस्तान के शासक अब्दाली से पानीपत में युद्ध हुआ | इस युद्ध में मराठाओ की हर हुई | और मराठा साम्राज्य का पतन हुआ |
शिवाजी महाराज की विशेषता
1. अच्छी संगठन शक्ति का होना
शिवाजी ने बिक्री हुए मराठाओ को इक्कठा करके उनकी शक्ति को एक जुट कर एक महान मराठा राज्य की स्थापना की|
2. वीर सैनिक
शिवाजी जैसे वीर भारत देश में बहुत कम हुए हैं , आज भी उनकी वीरता की कहानियो लोगो के उत्साह को बढ़ा देती हैं
3. महान मार्गदर्शक
शिवाजी ने मुगलो के राज्य में हिन्दू साम्राज्य स्थापित करने वाले एक मात्र राजा थे , उन्होंने केवल मराठाओ को ही नहीं वल्कि सभी भारतवासियो को भी नयी दिशा दिखाई|
4.आज्ञाकारी पुत्र और शिष्य
कहा जाता है शिवाजी अपनी माता की हर आज्ञा का पालन करते थे|
शिवाजी महाराज से जुडी महत्वपूर्ण जानकारियां
1. उनका जन्म 6 अप्रैल 1627 को शिवनेर के दुर्ग में हुआ था .
2. शिवाजी की पत्नी का नाम सइबाई था
3. उन्होंने मात्र 18 साल की उम्र में मराठा सेना बनाकर स्वत्रंत मराठा राज्य बनाना प्रारम्भ कर दिया|
4. 1674 में उन्हें छत्रपति की उपाधि दी गयी
5. 1680 में शिवाजी महाराज का देहांत हो गया |
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14.3.18

बेरवा समाज एक अध्ययन: Berawa Society A Study

                                                 

 

   बैरवा जाति /समाज मूलत:राजस्थान की मूल निवासी मानी जाती है। हिन्दू धर्म में बैरवा समाज को अनुसूचित जाति वर्ग में माना जाता हैं। भारतीय संविधान की राज्यवार सूची के अनुसार राजस्थान की अनुसूचित जातियों की सूची में बैरवा समाज को एससी वर्ग में 5 वें नम्बर पर दर्शाया गया हैं। हालांकि ये राजस्थान की अनुसूचित जातियों में की सूची में तो शामिल हो गई, लेकिन कई राज्यों में बैरवा समाज के लोग अब भी एससी वर्ग में शामिल होने की लड़ाई लड़ रहे हैं। बैरवा समाज के लोगों को स्वाभिमानी , ईमानदार और मेहनतकश माना जाता हैं। वर्तमान में देशभर में बैरवा समाज के लोग हर प्रांत और कस्बे में मिल जाएंगें। लेकिन कहा जाता है कि बैरवा समाज के लोग राजस्थान से ही खाने – कमाने के लिए दूसरे प्रदेशों में गए थे और अब वहीं के होकर रह गए। वर्तमान में देशभर में बैरवा समाज की आबादी करीब 11 करोड़ बताई जाती हैं। अकेले राजस्थान में बैरवा समाज 40 से 45 लाख की संख्या में हैं । राजस्थान की विधानसभा की 200 सीटों में से करीब 70 सीटों पर बैरवा समाज के लोगों के वोट जीत – हार का निर्णय करते हैं। प्रत्येक विधानसभा में कांग्रेस, बीजेपी, सपा और दूसरे दलों में 10 से 12 विधायक चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचते हैं। अब तक का राजस्थान का कोई सा ही मंत्री मंडल ऐसा रहा होगा जिसमें दो से तीन मंत्री बैरवा समाज से लिए जाते रहे हैं। स्वर्गीय बनवाली लाल बैरवा राजस्थान के उप मुख्यमंत्री रहे हैं। अशोक बैरवा, रामगोपाल बैरवा,कैबिनेट मंत्री, रहे हैं । बाबूलाल वर्मा वर्तमान में खादय मंत्री हैं। बैरवा समाज के स्वर्गीय द्वारका प्रसाद बैरवा, रामकुमार बैरवा, बनवारी लाल बैरवा , जिया लाल बंशीवाल, श्याम लाल बंशीवाल, चर्चित सांसद और राजनेता रहे हैं। बैरवा समाज के लोग मध्यप्रदेश और दिल्ली में भी अपना राजनीतिक वर्चस्व रखते हैं। दिल्ली में प्रकाश आप पार्टी से विधायक चुने गए हैं। इंदौर की महापौर भी बैरवा समाज से ही हैं। कई विधायक, जिला प्रमुख, सांसद बैरवा समाज से हैं। वर्तमान में रामकुमार वर्मा राज्यसभा में समाज का नाम रोशन कर रहे हैं। बैरवा समाज के लोग राजनीति के साथ- साथ प्रशासनिक, पुलिस सेवा में भी अपना दबदबा रखते हैं। लेकिन आबादी के हिसाब से बैरवा समाज के लोग प्रशासनिक सेवाओं में आरक्षित वर्ग की दूसरी जातियों से काफी पिछ़ड़ गए हैं। इसका कारण शिक्षा की ओर ध्यान नहीं देना रहा हैं। हालांकि इससे पूर्व कई आईएएस और आईपीएस अधिकारी बैरवा समाज से रहे हैं। लेकिन समय के साथ आगे बढ़ने की बजाए समाज के लोगों में शिक्षा का प्रचार – प्रसार कम रहा और समय पर विवाह करने के कारण बैरवा समाज के लोगों का सरकारी नौकरियों की तरफ रुझान घट गया। जिसके चलते आज हमारे समाज के गिनते के अधिकारी – कर्मचारी बचे हैं। लेकिन ये कहा जा सकता है कि अनुसूचित जाति वर्ग में बैरवा समाज अग्रणी , पढ़ा लिखा और समझदार समाज माना जाता हैं। बैरवा समाज के लोगों पर राजनीतिक दल भी भरोसा करते हैं। राजनीतिक दलों के लोगों का कहना है कि इस समाज के लोग जो कहते है वो जरुर करते है भले ही परिणाम कुछ भी हों। इसलिए राजस्थान की सभी राजनीतिक पार्टियों में बैरवा समाज के लोगों को बराबर का भागीदार बनाया जाने लगा हैं। बीजेपी , कांग्रेस, सपा और अन्य दलों में बैरवा समाज की जागरुकता का ही परिणाम है कि उन्हें प्रदेश पदाधिकारी बनाया जाने लगा हैं। हालांकि समाज की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण जो जगह राजनीतिक दलों में बैरवा समाज को मिलनी चाहिए वो नहीं मिली हैं। लेकिन फिर भी कहीं न कहीं समाज के लोगों ने राजनीतिक दलों में एक पहचान बनाई हैं।

बैरवा समाज का इतिहास
बैरवा समाज के लोगों को राजस्थान में अनुसूचित जाति वर्ग में माना जाता हैं। राजस्थान की अनुसूचित जातियों की क्रमांक संख्या पांच में बैरवा समाज का नाम हैं। जिससे साफ है कि बैरवा समाज एससी वर्ग की प्रमुख जातियों में से एक हैं। कुछ स्थानों पर बैरवा समाज के लोगों को जयपुर, दौसा , सवाई माधोपुर में बैरवा समाज के लोगों को बोलचाल की भाषा में बलाई के नाम से भी पुकारते हैं। लेकिन बलाई समाज अलग हैं। उनका अपना अलग वजूद हैं। दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा सहित कई प्रदेशों में रह रहे बैरवा समाज के लोग आज भी आरक्षित वर्ग में नहीं होने से वहां इन्हें अनुसूचित जाति वर्ग का फायदा नहीं मिल रहा। दिल्ली में तो बैरवा समाज के लोग लंबे समय से एससी वर्ग में शामिल करने को लेकर आंदोलन चला रहे हैं। बैरवा समुदाय के लोग आज भी खेती,पशुपालन ,भवन निर्माण, मजदूरी, खेतीहर मजदूरी, ईंट भट्टों, व्यवसाय, सरकारी और गैर सरकारी विभागों में नौकरियां भी करते हैं। राजस्थान के जयपुर, दौसा, टोंक, सवाई माधोपुर, कोटा, भरतपुर, भीलवाड़ा, अजमेर, बारां, झालावाड़, करौली. धौलपुर सहित कई जिलों में अच्छी खासी संख्या में बैरवा समाज के लोग निवास करते हैं। बैरवा समाज के लोग मेहनतकश माने जाते हैं। देश में कहीं भी निवास करे मेहनत – मजदूरी करके ही अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं। कहीं पर भी बैरवा समाज के लोग अस्पृश्य कृत्य नहीं करते । इस जाति के लोगों को मरना मंजूर है लेकिन गलत कर्म या नीच कर्म करना मंजूर नहीं हैं। बताया जाता है कि जहां भी बैरवा जाति के स्वाभिमान पर आंच आने लगी तो इस जाति के लोगों ने अपने घर – जमीन जायदाद छोड़कर दूसरे शहर जाना पसंद किया लेकिन गुलामी मंजूर नहीं की। इसलिए बैरवा समाज को अनुसूचित जाति वर्ग में ही नहीं सामान्य वर्ग के लोग भी सम्मानीय और स्वाभिमानी मानते हैं। बैरवा समाज के लोग भी दूसरे एससी वर्ग की तरह ही अपने आपको इस देश का मूल निवासी और शासक वर्ग के बताते हैं। इस समाज के लोग भी अपने – आपको आर्यों से पूर्व का मूल निवासी और शासक वर्ग बताता है। क्योंकि आर्यों से पूर्व भारत में अनार्यों का ही शासन था। इसलिए न केवल बैरवा अपितू एससी वर्ग की अधिकांश जातियां ही इस बात के दावे करती हैं कि वे इस देश के शासक रहे हैं। ये दावा एससी वर्ग की तमाम जातियों के लोग , इतिहासकार करते हैं। इसलिए एससी वर्ग के लोग अपने रीति रिवाज भी क्षत्रिय वर्ग की तरह निभाते हैं। हालांकि एससी वर्ग का ये दावा कितना सत्य है ये कोई नहीं जानता है। लेकिन ये दावा सभी जातियों के लोग करते हैं। लेकिन जहां तक बैरवा समाज का सवाल है इस समाज के लोगों का कहना है अनार्यों पर जब आर्यों ने आक्रमण किया तो भारत पर अनार्यों का ही शासन था इसलिए सभी अनार्यों को मार पीट कर उनसे गुलामी स्वीकार कराई गई । जबरन उन्हें दलित बनाया गया। उनसे धीरे-धीरे कर बेगारी ली जाने लगी। और उन्हें समाज के उच्च वर्ग से का निचला तबका कहा जाने लगा। इसलिए आरक्षित वर्ग के लोग आज भी इस बात को ठोक बजाकर कहते है कि इस देश के असली शासक तो दलित आदिवासी ही हैं। हालांकि ये अलग बहस का विषय हो सकता हैं। लेकिन फिर भी बैरवा समाज का इतिहास भी शानदार रहा है और अब इस समाज के लोग वर्तमान को संवारने में लगे हैं। अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
व्यवसाय-रोजगार
     बैरवा समाज की आर्थिक स्थिति दयनीय ही हैं। बैरवा समाज के लोगों के पास खेती की जमीन भी छोटी जोत की होने के कारण आर्थिक रुप से ये वर्ग विकास नहीं कर सका। और दूसरे समाजों की तुलना में आर्थिक रुप से पिछड़ा हुआ और कमजोर ही हैं।
     दूसरा सिर्फ मजदूरी ही आजिविका का साधन होने के कारण ये समाज दूसरे समाजों की तुलना में आर्थिक दृष्टि से काफी कमजोर और पिछड़ा हुआ हैं। ऐसे में सरकार को भी एससी वर्ग के उत्थान के लिए कुछ विशेष योजनाएँ बनानी चाहिए। बैरवा समाज के लोग मुख्यत: खेती, पशु पालन , और मजदूरी पर ही निर्भर थे। पूर्वांतंर में दूसरों के खेतों पर काम करने के लिए आजादी से पूर्व बेगारी ली जाती थी। इसलिए इस जाति के लोगों को अनुसूचित जाति में माना गया। वर्तमान में बैरवा समाज के लोग खेती करने के साथ- साथ भवन निर्माण , मजदूरी, खेतों पर काम करके और अन्य व्यवसाय करके अपना गुजर बसर करते हैं। आज भी इस समाज के सतर फीसदी लोग खेती और भवन निर्माण के काम पर ही निर्भर हैं। लेकिन बैरवा समाज के लोग भी पढ़ – लिखकर अब सरकारी नौकरियों में भी आने लगे हैं। निजी कल –कारखानों में भी काम कर अपना पेट पाल रहे हैं। लेकिन बैरवा समाज के पास खुद के उधोग – धंधे बहुत कम हैं। इसलिए इस जाति के सतर फीसदी लोग आज भी अपने खेतों पर रहकर खेती करते हैं , पशु पालन करते हैं या फिर शहरों में जाकर मजदूरी करते हैं। जिनमें भवन निर्माण का कार्य प्रमुख हैं। भवन निर्माण के साथ जिन परिवारों के पास खेती की जमीन नहीं है वे दूसरों की जमीन पर बंटाई से खेती करते हैं। तो कुछ बड़े खेत मालिकों के खेत ठेके में लेकर काम करते हैं। अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं।
     इसलिए इस वर्ग के लोगों की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं हैं। क्योंकि इस जाति के पास कोई स्थाई धंधा नहीं हैं। हालांकि सरकारी और गैर सरकारी सेवाओं में आने से समाज के कुछ लोगों ने अच्छी प्रगति भी की हैं। लेकिन समाज की आबाधी के हिसाब से सरकारी नौकरियों में वो मुकाम हासिल नहीं कर सकी जो दूसरी जातियों ने किया हैं। इसलिए बैरवा समाज के लोगों के लिए कहा जा सकता है कि इस समाज के लोग रोजी – रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनकी आर्थिक स्थिति दूसरे समाजों से कहीं कमजोर ही हैं। इसका मुख्य कारण सबके पास खेती की पूरी जमीन नहीं होना और रोजगार के लिए दूसरों पर निर्भर रहना हैं।
शिक्षा का स्तर-
     बैरवा समाज में आज के समय साक्षरता तो शत – प्रतिशत हैं। लेकिन अधिकांश लोग मात्र साक्षर हैं । महिलाओं में भी पहले के मुकाबले साक्षरता का प्रतिशत बढ़ा हैं। लेकिन बैरवा समाज के लोगों में 10 वीं और 12 वीं पास करने के बाद काम धंधे के चक्कर में फंस कर युवा पढ़ाई छोड़ देते हैं। शहरों में जरुर बैरवा समाज के लोग स्नातक, स्नातकोत्तर, मेडिकल, इंजिनियरिंग,एमबीए, वकालत कर रहे हैं। पढ – लिख कर बैरवा समाज के लोग सरकारी और गैर सरकारी सेवाओं में भी जाने लगे हैं। रेस्टोरेंट, सब्जी विक्रय , किराना स्टोर , फैंशी स्टोर आदि के व्यापार में बैरवा समाज के लोगों ने पहचान बनाई हैं। लेकिन अभी भी सुधार की गुंजाईस हैं। लोगों को उम्मीद है कि आने वाले समय में बैरवा समाज के लोगों का भी आरएएस और आईएएस जैसी परीक्षाओं में भी गौरवमयी स्थान हासिल करेंगे। हालांकि अभी भी इन सेवाओं में बैरवा समाज के लोग है लेकिन उनकी गिनती ऊंगलियों पर ही इसलिए समाज में शिक्षा के प्रचार- प्रसार की आवश्यकता हैं।
बेरावा समाज मे विवाह-
     बैरवा समाज में एकल विवाह ही प्रचलन में हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत लोग विवाह करते हैं। पूर्व में लड़के या लड़की की रिश्तेदार शादियां तय करके विवाह करा देते थे। लेकिन अब समय के साथ बदलाव आया हैं। बैरवा समाज के युवक- युवतियां एक – दूसरे को देखने समझने के बाद ही विवाह के लिए हां करने पर ही परिजन उनका विवाह करते हैं। बैरवा समाज में दहेज प्रथा का भी प्रचलन हैं। लोग अपनी हैसियत के अनुसार लड़के वाले को उपहार देता हैं। नाता प्रथा का भी बैरवा समाज में प्रचलन हैं। पहली पत्नी के मरने या तलाक देने पर दुसरा विवाह करने की छूट हैं। बैरवा समाज में सामूहिक विवाह भी खूब होने लगे हैं। विवाह के लिए बैरवा समाज में स्वंय का, मां , दादी और नानी का गौत्र टालने की परम्परा हैं। हालांकि अब कई स्थानों पर नानी का गौत्र नहीं मानते । सामाजिक मंचों से भी कई बार खूद का मां और दादी का ही गौत्र शादियों में टालने की बात उठने लगी हैं। समाज में बहु पति या बहु पत्नी विवाह का प्रचलन नहीं हैं। विवाह हिन्दू रिति रिवाज से होते हैं। विवाह के दौरान भात भरने , पुत्र होने पर जामणा भरने का रिवाज हैं। लेकिन इस तरह के रिती रिवाजों का अधिकांश लोग विरोध करते हैं। कुछ दकियानूसी लोग ही जामणा, मांडाचपड़ी के रिवाज निभा रहे हैं। अधिकांश तो इन्हें मानते भी नहीं हैं।
बेरावा समाज  के रिती-रिवाज
    बैरवा समाज में रिती रिवाज के नाम पर हिन्दू धर्म की सभी रिती रिवाज मानते हैं। विवाह के समय लग्न भेजना, टीका करना , सगाई करना, चाक –भात, साकड़ी विंधायक और कपड़ों का लेन देन करने और रुपये पैसे देने की रिवाज हैं। विवाह में सात फेरे लेने और सनातन धर्म का पालन करना श्रेष्ठ माना जाता हैं। समाज में आज भी मृत्यु भोज का रिवाज हैं। हालांकि अब ये सीमित हो गया हैं। कुछ लोग इसे सिंबोलिक करने लगे हैं। टीके पर 101 रुपये देने का रिवाज बढ़ने लगा हैं। तीय की बैठक और अन्य रितियां अभी भी चल रही है। धीरेः धीरे इसमें सुधार हो रहा है। खास तौर पर युवा पीढ़ी इन सब पारंपरिक रिति- रिवाजों के खिलाफ हैं। समाज में पहले विवाह का लग्न एक माह फिर 15 दिन और उसके बाद 7 या 8 दिन का भेजा जाने लगा था। अब ये घटकर 3 या 5 दिन का हो गया। लोग अब विवाह भी एक ही दिन में सम्पन्न करने लगे हैं। इसका प्रचलन अधिक से अधिक बढ़ने लगा हैं। लेकिन समाज में दहेद प्रथा बढ़ना चिंता का विषय हैं। विवाह के दौरान पंगत और बफर दोनों ही सिस्टम हैं। ये व्यक्ति की हैसियत के अऩुसार होता हैं। शहरों में शादियां गार्डन में तो कच्ची बस्तियों और गांवों में घर के बाहर ही शादियां होती हैं। शादियों में शाकाहारी खाना ही बनाया जाता हैं। जहां शुद्दता का पूरा ख्याल रखा जाता हैं।
     बैरवा समाज के लोग हिन्दू धर्म के सभी देवी- देवताओं की पूजा पाठ करते हैं। लेकिन फिर भी बैरवा समाज के लोगों में भैरव, पितृ ,भोमिया, शहीद, सातों बहिनें, दुर्गा माता, वैष्णों माता, काली माता, बालाजी, शिवजी , गंगा मैय्या, तेजाजी महाराज, बाबा रामदेव की पूजा पाठ अधिक की जाती हैं। गांवों में लोग बीमार होने पर डाक्टर के पास जाने के बजाय आज भी पहले भैरु – भोमिया या माता के थड़े पर जाना पसंद करते हैं। हालांकि पिछले कुछ सालों में लोगों का इनसे मोह भंग होने लगा है। और अब बैरवा समाज के लोग राधा स्वामी, धन- धन सतगुरु, जय गुरुदेव, निरंकारी बाबा , मुरारी बापू, के शिष्य बन गए। बैरवा समाज की आधी से ज्यादा आबादी इन सतगुरुओं को मानने लगी हैं। इसका सकारात्मक प्रभाव भी लोगों पर पड़ा। लोग शाकाहार को अपनाने लगे है। अब लोगों पर बुद्द धर्म का प्रभाव भी पड़ने लगा हैं। कुछ लोगों ने हिन्दू धर्म की भेदभाव की नीतियों से परेशान होकर कई स्थानों पर बौद्द धर्म भी अंगीकार कर लिया हैं। कई लोग बौद्द का प्रचार – प्रसार करने में लगे हैं। लेकिन धर्म के मामले में बैरवा समाज के लोग स्थानीय आधार पर देवी- देवताओं की पूजा पाठ करते हैं। लेकिन बाबा रामदेव को सर्वाधिक लोग मानते हैं। इसके पीछे रामदेव की एससी वर्ग के लोगों के लिए किए गए काम हैं। लोगों में संत – महात्माओं का प्रभाव लगातार बढ़ रहा हैं। इन संत – महात्माओं की शिक्षा का ही असर है कि बैरवा समाज के लोग रुढियों और परम्पराओं से दूर हो रहे हैं। समाज में शिक्षा का असर बढ़ रहा हैं। युवा पीढी नशे से भी दूर हो रही हैं। शाकाहार बढ़ने से लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा हैं। लोगों में अब ऱाधा स्वामी, धन- धन सतगुरु, निरंकारी , जय गुरुदेव जैसे संत –महात्माओं का प्रभाव बढ़ा हैं। लाखों लोग इनके अनुयायिय बन चुके हैं।
बाबा साहेब

  डाक्टर भीम राव अंबेडकर का समाज के लोगों पर गहरा असर हैं। समाज के लोगों का मानना है कि बैरवा समाज को ही नहीं एससी, एसटी , पिछड़ा वर्ग , मुस्लिम, महिलाओं को सम्मान का अधिकार कहीं न कहीं संविधान से ही मिला हैं। इसलिए बैरवा समाज के लोग बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को अपना आदर्श मानते हैं। बैरवा समाज के लोग बाबा साहेब के साथ – साथ बालिनाथ जी के फालोअर हैं। बैरवा समाज के लोगों में महर्षि बालिनाथ जी के प्रति अटूट श्रद्दा हैं। क्योंकि बैरवा समाज में सामाजिक चेतना का काम बालिनाथ जी महाराज ने बाबा साहब से पूर्व ही कर दिया था। इसलिए बैरवा समाज पर बालिनाथ जी महाराज का अमिट प्रभाव हैं। बैरवा समाज की वर्तमान स्थिति के लिए बालिनाथ जी महाराज और बाबा साहेब का असर हैं। बैरवा समाज के लोगों की महात्मा ज्योबा फूले, सावित्री बाई और रामदेव जी महाराज के प्रति अटूट श्रद्दा हैं। संत रविदास जी भी बैरवा समाज के आदर्श हैं।
बेरावा समाज का रहन सहन पहनावा
बैरवा समाज के लोगों का पहनावा गांवों में पुरुषों का धोती-कमीज और चूंदड़ी या सफेद साफे हैं। वहीं महिलाएं गांवों में घाघरा – लूगड़ी और साड़ी पहनती हैं। लेकिन अब गांवों में भी इस समाज के लोग धोती- कमीज, पेंट – शर्ट –टी शर्ट पहनते हैं। युवाओं में जो धनाढ़य होते हैं कानों में सोने की मुर्कियां पहनने का चलन है। महिलाओं में घाघरा – लूगड़ी के साथ साड़ी, लड़कियां सलवार सूट और अन्य कपड़े पहनती हैं। शादीशुदा महिलाएं पैरों और हाथों में चांदी के कड़े, कमर में कनकती, गले में मंगलसूत्र- पुराने समय में खुंगाली, हाथ में कड़े नेवरे, कंगन कानों में बालियां, नाक में नथ – टीका चूड़े पहनती हैं। बैरवा समाज के लोग आज भी समूह में ही रहना पसंद करते हैं। जहां चार – पांच परिवार समाज के होंगे वहीं पर रहना पसंद करते हैं। शहरों में कच्ची बस्तियों में कालोनियों में फ्लैट्स विलास में भी रहने लगे हैं। लेकिन साफ – सुथरा रहना सबकी आदत में शुमार हैं। साफ – सफाई से रहना इस समाज के लोगों का सलग हैं। रहन – सहन व्यक्ति की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता हैं।
बेरवा समाज मे महिलाओं की स्थिति-
     बैरवा समाज भी यूं तो पितृ सतात्मक ही है। लेकिन महिलाओं की भागीदारी सभी कार्यों में अनिवार्य हैं। बैरवा समाज का कोई भी कार्य बगैर महिला की भागीदारी के पूरा नहीं होता। शादी – समारोह से लेकर रिश्तेदारी में लेन-देन सभी कार्यों में महिलाओं की राय लेना जरुरी समझा जाता हैं। यूं कह सकते हैं कि बैरवा समाज में महिलाओं की हिस्सेदारी और भागीदारी बराबर की हैं। वे घर की उतनी ही पार्टनर है जितना पुरुष हैं। इसलिए महिला शिक्षा पर जोर दिया जा रहा हैं। महिलाओं को समाज में पुरुषों की तरह ही सम्मान दिया जाता हैं। हालांकि पंच- पटेलों में उनकी राय नहीं ली जाती । लेकिन उनका हस्तक्षेप पूरा रहता है। सामाजिक घटनाक्रम और कोई पूजा – पाठ का कार्य बगैर महिला के पूरा नहीं होता। पूरे देश में लड़कियों की संख्या घट रही है लेकिन एससी वर्ग में लड़कियों की संख्या कम नहीं है। बैरवा समाज में आज भी लड़कियों का रेसो लड़कों के बराबर है। जिससे साफ है कि समाज में कन्या भ्रूण हत्या को पाप समझा जाता हैं। इसिलए उन्हें पढ़ाने में माता- पिता पूरा ध्यान देते हैं। हालांकि गांवों मे लड़कियों का विवाह जल्द करने के चक्कर में उनकी पढ़ाई पूरी नहीं होती हैं। विवाह के लिए भी महिलाओं की स्वीकृति ली जाती हैं। नाता प्रथा करते समय भी महिला की स्वीकृति को जरुरी माना जाता हैं। बैरवा समाज में महिलाओं का स्थान सम्मानीय हैं।

सुधार की आवश्यकता

    यूं तो बैरवा समाज के लोगों ने वक्त के साथ अपने आपको बदलने का प्रयास किया हैं। लेकिन फिर भी विवाह में होने वाली फिजूल खर्ची को रोकने , दहेज प्रथा को रोकने का प्रयास करना चाहिए। इसके साथ ही समाज में लोगों को अंधविश्वासों से दूर रहने के लिए भी अभियान चलाना चाहिए। क्योंकि लोग भोपा – भोपियों के चक्कर में समय और पैसा दोनों बर्बाद कर रहे हैं। समाज में सभी को पढ़ाई पर ध्यान देना होगा। नुकता पृथा को पूरी तरह से बंद करना होगा। जिससे लोगों की बर्बादी रुक सके। जो लोग नशा करते है उन्हें नशे से दूर होना होगा। क्योंकि जब तक समाज में सामाजिक क्रांति नहीं आएगी ये सुधार होने वाले नहीं हैं। हालांकि अब तो सार्वजनिक स्थानों पर नशा करने वालों के खिलाफ दंड का प्रावधान होने से लोगों में नशे का चलन कम हुआ है। लेकिन अभी भी इसमें काफी गुंजाईश हैं। लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वरोजगार की और ध्यान देना होगा। जिससे लोग आत्मनिर्भर बन सके। शिक्षा को बढ़ावा देना होगा जिससे समाज की आर्थिक स्थिति में सुधार लाया जा सके। सरकार भी इस समाज के उत्थान के लिए कुछ विशेष योजनाएं लाएं जिससे बैरवा समाज के लोग भी स्वरोजगार से जूड़ सके। आत्मनिर्भर बन सके। विकास की मुख्यधारा में आ सके।
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बैरवा समाज में प्रचलित गोत्रों का विवरण:Details of the Gotras in Barwa society





क्रम. सं. मूलगोत्र गोत्रों का उपनामी उच्चारण

अणिजवाल – अनिजवाल, रणिजवाल, उनिजवाल, आनन्दकर, उज्जवल
अन्धेरिया – ओध, अन्धावत
आकोदिया – अकेश, अरविन्द
अरल्या – अलोरिया, अलोरी, अन्जान, अजय, अलोरया, अलिन्द
उचिण्या – उचिनियाँ, अचिनिया, उज्जेनवाल
उमैणा – उमिणिया, उदभिणा, उदभिणिया
उदाणी – उदित, उद्वाल, उदेईवाल, उदिणिया
कारोल्या – करोल,केरोल, कलोलकर, केलकर, करोला
कांकरवाल – काँकर,कीरवाल,काँकोरिया
कामीवाल – कामीवाल,कामी
कालरवाल – कालरा,कारोलिया
कुवाल – कुलवाल,किवाड,कव्वाल
कुण्डारा – खुण्डारा,कुन्दारे,कुन्दन,कुन्द्रा,कदम,खखर
कोलवाल – कोल, कौल, कोदवाल
खटनावाडिया – कठनवडिया,खटाना,वाडिया
खप्परवाडिया – कफनवाडिया, कक्कनवाडिया, वाडिया
खापरया – खापरयिा, खापर
खोडवाल – खोवाल
गांगिया – गंगवाल, गांगी, गंगवंशी,गंगोत्री , गांगे, गोयल
गजराण्या – गजराना, गजरानिया
गोगडया – गोगडे, गोगाडिया, गोवाडिया, गहलोद
गोठवाल – गोथवाल, गोठीवाल, गोडवाल, गोड
गोमलाडू – गोमा, गोभे, गुलाटी, गौरव, गौतम, गोमावत, गुजराल
घुणावत – घुणावत्या, डोणावत, द्रौड, द्रौणावत
चांचोडया – चांचोडिया
चन्दवाडा – चन्द्रनावत, चन्दन चन्द्रावत,चण्डाल
चैडवाल – चेरवाल, चडवाल
चरावण्ड्या – चन्द्रवाल,चरावण्डिया, चावण्ड, चापड, , चहवाण, चैहान, चरावंडा
जाटवा – यादव, जटवाडिया, जाटव
जारवाल – जरवाल, जेरवाल, जावरवाल
जीणवाल – जीनवाल, जीवनवाल, जीन्वाल, जेनल
जेडिया – जेरिया, जडिया
जोणवाल – जोनवाल ,जोरवाल जानेवाल,जूनवाल, जोनरवाल, जौहर
जाजोरया – जाजोरिया
झांटल – बडगोती, बडगोल्या, बदोतरा, बडोतरा, बडगोत्रा, जटिल
टटवाड्या – टटवाल, टटवाडिया, टाटीवाल, टाटावत, टाटा वाडिया
टाटू – कोइ उपनाम नहीं
टोंटा – टावर, टाँक
टैंटवा – टेंटवाल, टडेल,टेंडुला
ठाकुरिया – ठाकरसी, ठुकरिया, ठाकरिया
डबरोल्या – डबरोलिया, डाबी, डबिया, डाबर, डबोत
डोरेलिया, – डोयाॅ,डोरिया, डोरोल्या, डोरेला, डरोलिया
ढण्डेरवाल – दण्देरवाल,उन्डेरवाल, धन्डेरवाल, थंदेरवाल, दादर,
तलावल्या – तलवल्या, तलवाडियां, तिलकर, लिवालिया, तलवार
तोण्गरया – तोपागरिया, तंवर, तेेन
दोंढिया – कोइ उपनाम नहीं
दबकवाल – दबक, दबोह
देवतवाल – देव, देवतराल देतवाल
ध्यावणा – धावनिया, धावन, देवनिया, देवनियाध, धलय, धवन, धमेणिया
धोरण – धौरण, धोरावत
नंगवाडा – नागरवाल,नागर, निहौर, नागा, नागवंशी, नागेशरव,नागावत,
पचवाडिया – पाँचाल, पचेेर, पचवानियाँ
पराल्या – परालिया, पालीवाल, पाल पीलाडिया
पिडुल्या – पिन्डुलिया
पीलाडिया – कोई उपनाम नहीं
पातलवारया – पातलवाल
परसोया – फरसोया, पारस
पेडला – पेडवा, पेरवा
बन्दावड्या – बन्दावदिया, बैनाडा, बैन्दा बनावडिया, बनेरा, बिडला
बमणावत0 – बमनावत, बह्रमावत, ब्ररूपाल
बडोदया – बडोदिया
बारवाल – बहरवाल, बारूपाल
बन्दरवाल – कोई उपनाम नहीं
बासणवाल – बासनवाल, बंशीवाल, बसन, भसन, बंसल
बासोटया – बासोटिया
बीलवाल – बीलवाल
बुआ – ब्बुबदिया
बुहाडिया – कोई उपनाम नहीं
बैथाडा – बेथेडा, बेतेडा, बैथ, बथानिया, बकेडा
बसुआ – कोइ उपनाम नहीं
बागौरया – बागौरिया, भागोरिया, बागडिया, बागडी, बागवंशी
बौररा – बोर्या ,बोहरा वोहरा
बिनोल्या – बिनोलिया
बखण्ड – भखण्ड, अखण्ड
भदाला – भदावर, भदाले, भदावरिया
भरथूण्या – भ्रथूणिया, भरयूनिया, भारती
भिटोल्य – भीटनवाल, भिटोलिया, ब्ठिालिया
भियाणा – भियाानिया, भियाणिया, बिहाणिया, भ्यााणिया
भैण्डवाल – बैण्डवाल, वेदवाल, वेद, बैद, बेनीवाल
मरमट – मरमढ, मरमिट
मीमरोट – मीमरोठ, नीमरोट, मधुकर, मीरवाल, नीमरोह
मुराडया – मुराडिया, मुरारिया,
मेहर – मेहरवाल, मेहरा
माली – मानवीय, मालवीभा, मालवीया,
मीचडवाल – कोइ उपनाम नही
मैनावत – कोइ उपनाम नही
रमण्डवाल – रमन्डवाल, रमनवाल, रमन, रमेटवाल, रमैया,
राजलवाल – राजनवाल , राजावत
राणीवाल – रानीवाल, रानावत, रेनीवाल, राना , रेनवाल
रैसवाल – रेसवाल, रईसवाल, रायसवाल, रेसवाला
रोघिया – रोदिया, रोद, रोड, रल्लावाद, रोलिया
राजौरया – राजोसिया
रेवाड्या – रेवाडिया, रावत, रेवडिया
लकवाल – लांकावाल, लंाका, लक्की,लक्कीवाल
लोटन – कोई उपनाम नही
लोदवाल – लोदीवाल,लोदिया,लोदनवाल,लोघा,लोदी
लोडोत्या – लोडेवा, लालावत,लोखण्डी
लोरवाड्या – लोरवाडिया, लोडवालिया
सरखण्डया – सरकन्डया, सरकाण्डिया, सरखन्डिया,सरेख
सुरेल्या – सुरिला, सुरेलिया, सुरिया
सेकरवाल – सरसूणिया, सरसूनिया
सरसूण्या – सरसूणिया, सारस्वत
सरसूंघा – सरसूतिया, सरस्वत
सरोया – सुरोया , सुरोहिया, सिरोहिया
सीवत्या – सींवतिया, सावत ,सीसोदया
सेररा – शेर,शेरवात,शेरा,शहर
सेवाल्या – सेवालिया,सेवाल,सेवलिया, सहेलिया, शिवाल्या
सुलाण्या – सुलाणिया,सुलानिया,सल्वानिया
सरवडिया – कोई उपनाम नही
वरणमाल – कोई उपनाम नही
हणोत्या – कोई उपनाम नही
हुकीणया – हुकीडिया, हुकीणा
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10.3.18

कलवार, कलाल व कलार जाति का इतिहास

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भारत वर्ष में जाति प्रथा आदि काल से चली आ रही हैं. प्रारंभ की वर्ण व्यवस्था आज जातियों व उपजातियो में बिखर चुकी हैं। दिन प्रतिदिन यह लघु रूपों में बिखरती जा रही हैं। आज की कलवार, कलाल या कलार जाति जो कभी क्षत्रिय थी, आज कई राज्यों में वैश्यों के रूप में पहचानी जाती हैं। यह हैहय वंश या कलचुरि वंश की टूटती हुई श्रंखला की कड़ी मात्र हैं। इसे और टूटने से बचाना हैं।

       वर्ण व्यवस्था वेदों की देन हैं, तो जातियाँ व उपजातियाँ सामाजिक व्यवस्था की उपज हैं।
कलवार वंश का अतीत गौरवशाली व यशपूर्ण रहा हैं। यह गौरव की बात हैं। वेदों से प्रमाण मिलता हैं कि कलवार वंश का उदगम विश्वविख्यात चन्द्र वंशी क्षत्रिय कुल में हुआ हैं। इसी चन्द्र वंश में कार्तवीर्य सहस्त्रबाहु हुये हैं। जिस चन्द्र वंश ने अपनी पताका पूरे संसार में फैलाई, वही चन्द्र वंश कालप्रेरित होकर आपस में लड़ भिड कर मिटने लगा। परशुराम द्वारा भी इस वंश को नष्ट करने का प्रयास किया गया। राज कुल में पले बढे कलवारो के सामने जीवन निर्वाह की समस्या खड़ी हो गई। अतः क्षत्रिय धर्म कर्म छोड़कर वैश्य कर्म अपना लिया, व्यवसाय करने के कारण वैश्य या बनिया कहलाने लगे, इनमे से अधिकतर शराब का व्यवसाय करने लगे।
कलवार शब्द की उत्पत्ति
मेदिनी कोष में कल्यपाल शब्द का ही अपभ्रंश कलवार है। पद्मभूषण डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक "अशोक का फूल" में लिखा हैं कि कलवार हैहय क्षत्रिय थे। सेना के लिए कलेऊ की व्यवस्था करते थे, इसीलिए, कालांतर में वैश्य कहलाये। क्षत्रियो के कलेवा में मादक द्रव्य भी होता था, इसी लिए ये मादक द्रव्यों का कारोबार करने लगे। 
श्री नारायण चन्द्र साहा की जाति विषयक खोज से यह सिद्ध होता हैं की कलवार उत्तम क्षत्रिय थे। जब गजनवी ने कन्नौज पर हमला किया तो उसका मुकाबला कालिंदी पार के कलवारों ने किया था, जिसके कारण इन्हें कलिंदिपाल भी बोलने लगे। इसी कलिंदिपाल का अपभ्रंश ही कलवार हैं। अनुसंधानों से पता चलता हैं कि कलवार जाति के तीन बड़े - बड़े हिस्से हुए हैं, वे हैं प्रथम पंजाब दिल्ली के खत्री, अरोरे कलवार यानि की कपूर, खन्ना, मल्होत्रा, मेहरा, सूरी, भाटिया , कोहली, खुराना, अरोरा ...... इत्यादि। दूसरा हैं राजपुताना के मारवाड़ी कलवार यानि अगरवाल, वर्णवाल, लोहिया ..... आदि। तीसरा हैं देशवाली कलवार जैसे अहलूवालिया, वालिया, बाथम, शिवहरे, माहुरी, शौन्द्रिक, साहा, गुप्ता, महाजन, कलाल, कराल, कर्णवाल, सोमवंशी, सूर्यवंशी, जैस्सार, जायसवाल, व्याहुत, चौधरी, प्रसाद, भगत ..... आदि।
     कश्मीर के कुछ कलवार बर्मन तथा कुछ शाही उपनाम धारण करते हैं। झारखण्ड के कलवार प्रसाद, साहा, चौधरी, सेठ, महाजन, जायसवाल, भगत, मंडल .... आदि प्रयोग करते हैं। नेपाल के कलवार शाह उपनाम का प्रयोग करते हैं। जैन पंथ वाले जैन कलवार कहलाये।
      ब्रह्ममा से भृगु, भृगु से शुक्र, शुक्र से अत्री ऋषि , अत्री से चन्द्र देव, चन्द्र से बुद्ध, बुद्ध से सम्राट पुरुरवा, पुरुरवा से सम्राट आयु, आयु से नहुष, नहुष से ययाति, ययाति से पुरु, पुरु से चेदी कल्यपाल, कलचुरी कलवार वंश चला जो की जायसवाल, कलवार, शौन्द्रिक, जैस्सार, व्याहुत कहलाये।
     इस प्रकार से हम देखते हैं की कलवार/ कलाल / कलार जाति की उत्पत्ति बहुत ही गौरव पूर्ण रही हैं। जिसका हमें सभी को गर्व करना चाहिए। यह समाज आज 356 उपनामों में विभक्त हो चुका है और सभी में रोटी बेटी का सम्बन्ध कायम होना चाहिए। यह उल्लेखनीय है कि हमारी आबादी लगभग 25 करोड़ हैं।भगवान् सहस्त्रबाहू की महिमा और कलार शब्द का अर्थ
      कलार शब्द का शाब्दिक अर्थ है मृत्यु का शत्रु, या काल का भी काल, अर्थात हैहय वंशियों को बाद में काल का काल की उपाधि दी जानें लगी जो शाब्दिक रूप में बिगड़ते हुए काल का काल से कल्लाल हुई और फिर कलाल और अब कलार हो गई.
    आज भगवान् सहस्त्रबाहू की जयंती सम्पूर्ण हिन्दू समाज मनाता है. भगवान् सहस्त्रबाहू को वैसे तो सम्पूर्ण सनातनी हिन्दू समाज अपना आराध्य और पूज्य मान कर इनकी जयंती पर इनका पूजन अर्चन करता है किन्तु हैहय कलार समाज इस दिवस को विशेष रूप से उत्सव-पर्व के रूप में मनाकर भगवान् सहस्र्त्रबाहू की आराधना करता है. भगवान् सहस्त्रबाहू के विषय में शास्त्रों और पुराणों में अनेकों कथाएं प्रचलित है. किंवदंती है कि, राजा सहस्त्रबाहू ने विकट संकल्प लेकर शिव तपस्या प्रारम्भ की थी एवं इस घोर तप के दौरान वे के प्रतिदिन अपनी एक भुजा काटकर भगवान भोले भंडारी को अर्पण करते थे इस तपस्या के फलस्वरूप भगवान् नीलकंठ ने सहस्त्रबाहू को अनेकों दिव्य, चमत्कारिक और शक्तिशाली वरदान दिए थे.
     हरिवंश पुराण के अनुसार महर्षि वैशम्पायन ने राजा भारत को उनके पूर्वजों का वंश वृत्त बताते हुए कहा कि राजा ययाति का एक अत्यंत तेजस्वी और बलशाली पुत्र हुआ था “यदु”. यदु के पांच पुत्र हुए जो सहस्त्रद, पयोद, क्रोस्टा, नील और अंजिक कहलाये. इनमें से प्रथम पुत्र प्रथम पुत्र सहस्त्रद के परम धार्मिक ३ पुत्र “हैहय”, हय तथा वेनुहय नाम के हुए थे. हैहय के ही प्रपोत्र राजा महिष्मान हुए जिन्होंने महिस्मती नाम की पुरी बसाई, इन्ही राजा महिष्मान के वशंज कृतवीर्य के पुत्र अर्जुन हुए जो सहस्त्रबाहू अर्थात सहस्त्रार्जुन नाम से विख्यात है. यही सहस्त्रबाहू सूर्य से दैदीप्यमान और दिव्य रथ पर चढ़कर सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत कर सप्तद्वीपेश्वर कहलाये और सम्पूर्ण विश्व में अधिष्ठित हुए. कहा जाता है कि सहस्त्र बाहू ने अत्रि पुत्र दत्तात्रेय की आराधना दस हजार वर्षो तक कर परम कठिन तपस्या की और कई दिव्य व चमत्कारिक वरदान प्राप्त किये.
    वीर राजा हैहय के प्रपौत्र महिष्मान ने महिस्मती नामक जो धर्म नगरी बसाई थी वह आज भी धर्मध्वजा को लहरा रही है एवं मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में महेश्वर के नाम से प्रसिद्द है. महेश्वर शहर मध्य प्रदेश के खरगोन जिलें में माँ नर्मदा के किनारें स्थित है. राजा सहस्त्रार्जुन या सहस्त्रबाहू जिन्होनें राजा रावण को पराजित कर उसका मान मर्दन कर दिया था उन्होंने इस महेश्वर नगर की स्थापना कर इसे अपनी राजधानी घोषित किया था. यही प्राचीन नगर महेश्वर आज भी मध्यप्रदेश में शिवनगरी के नाम से जाना जाता है और जिसे पवित्र नगरी का राजकीय सम्मान भी प्राप्त है, पूर्व में महान देवी अहिल्याबाई होल्कर की भी राजधानी रहा है. 
वास्तुकला और स्थापत्य कला के उच्च मान दंडों के अनुसार निर्मित यह नगर अपनें भव्य, विशाल और तंत्र-यंत्र पूर्ण किन्तु कलात्मक शिवमंदिरों और मनोरम घाटों के लिए विख्यात है. हैहय राजा महिस्मान द्वारा बसाई गई यह महेश्वर नगरी जहां कि आदिगुरु शंकराचार्य तथा पंडित मण्डन मिश्र का एतिहासिक, बहुचर्चित व प्रसिद्ध शास्त्रार्थ हुआ था आज भी अपनें पुरातात्विक धरोहरों और सांस्कृतिक व पौराणिक विरासतों को अपनें आप में समेटें हैहय राजाओं का इतिहास गान कर रही है और अपनें पौराणिक महत्व का बखान कर रही है.
भगवान् सहस्त्रबाहू के विषय में एक कथा यह भी प्रचलित है कि इन्ही राजा यदु से यदुवंश प्रचलित आ था, जिसमे आगे चलकर भगवन श्री कृष्णा ने जन्म लिया था. शास्त्रों में कहा गया है कि यदु के समकालीन ही भगवान् विष्णु एवं माँ लक्ष्मी के नियोग के फलस्वरूप एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ और भगवान् विष्णु ने इस बालक को भगवान् शंकर जी को सौप दिया. भगवान् शंकर जी ने इस बालक की उज्जवल भविष्य रेखाओ और तेजस्वी ललाट को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए, और उसकी भुजा पर अपने त्रिभुज से “एकाबीर हैहय” लिख दिया. इसी से बालक का नाम “हैहय” हुआ, जो आज भी एक कुल नाम या जाति के रूप में प्रचलित है. देवी भागवत में यह कथा अत्यंत विस्तार व यश-महिमा के साथ उल्लेखित है.
भगवान् सहस्त्रबाहू को आराध्य मानने वाले कलार या हैहय समाज की तेजस्विता, बल और शोर्य का वर्णन करते हुए किसी कवि ने इन समाज बंधुओं के विषय कहा है कि-
हैहय वंशी जगे तो, लाते है भयंकरता,
शिव साज तांडव सा, युद्ध में सजाते है।
शत्रु तन खाल खींचा, मांस को उलीच देत,
गीध, चील, कौए तृप्त , ‘प्रचंड’ हो जाते है।।
रुंड , मुंड, काट-काट , रक्त मज्जा मेदा युक्त,
अरि सब रुंध-रुंध, गार सी मचाते है।।
बढ़ाते शक्ति उर्बर, भावी संतान हेतु,
मातृ-ऋण उऋण कर, मुक्त हो जाते है।।
भगवान् सहस्त्रबाहू के वंशजों के जाति नाम या कुल नाम या गोत्र नाम “कलार” शब्द के विषय में जो एक भ्रान्ति प्रचलित है उसका भी स्पष्टीकरण आवश्यक हो जाता है. यह शब्द कलाल, कलार या कलवार एक स्थान विशेष या क्षेत्र विशेष का नाम है जो चंद्रवंशी (सोमवंशी) कलवार राजपूतों और राजस्थान के कलवार ठिकाना के ठाकुरों का निवास क्षेत्र रहा है. उल्लेखनीय है कि इतिहास कारों के अनुसार अखंड भारत के समय कलवार राजस्थान के अलावा पाकिस्तान और अज़रबैजान में कलाल; ईरान और ईराक में कलार; अफ़ग़ानिस्तान अल्जेरिया बहरीन बर्मा ईरान इराक सऊदी अरबिया टूनीसिया सिरिया में कलाट आदि शब्दों को भी आज के कलारी अथवा कलाली से ही सम्बंधित माना जाता है.
मध्यकालीन इतिहास के वृतांतों में कलाल शबद का प्रयोग पाकिस्तान के कलाल क्षेत्र में निवासरत जातियों के सम्बन्ध में किया जाता है. उस समय मुस्लिम आक्रमणों के चलते इन जातियों का जबरन धर्मांतरण भी हुआ जिनकी वंशज जातियां अब भी उस क्ष्रेत्र में निवासरत हैं जिसे कलाल क्षेत्र कहा जाता था.
कलार शब्द का शाब्दिक अर्थ है मृत्यु का शत्रु, या काल का भी काल, अर्थात हैहय वंशियों को बाद में काल का काल की उपाधि दी जानें लगी जो शाब्दिक रूप में बिगड़ते हुए काल का काल से कल्लाल हुई और फिर कलाल और अब कलार हो गई. ज्ञातव्य है कि भगवान शिव के कालांतक या मृत्युंजय स्वरूप को बाद में अपभ्रंश रूप में कलाल कहा जानें लगा. वस्तुतः भगवान् शिव के इसी कालांतक स्वरुप का अपभ्रंश शब्द ही है “कलार”. इस कलवार या कलाल या कलार जैसे भगवान् शंकर के नाम के पवित्र शब्द का शराब के व्यापारी के अर्थों या सामानार्थी शब्द के रूप में प्रयोग संभवतः इस समाज के शराब के व्यवसाय के कारण उपयोग किया जानें लगा जो कि घोर अनुचित है. भगवान् सहस्त्रबाहू के वंशज, पुरातन या मध्यकालीन युग में कलाल या कलार इस देश के बहुत से हिस्सों के शासक रहे और उन्होंने बड़ी ही बुद्धिमत्ता, वीरता से न्यायप्रिय शासन किया किन्तु कालांतर में ये मधु या शराब का व्यवसाय करनें लगे. यद्दपि आज के युग में यह समाज शराब के अतिरिक्त और भी कई प्रकार के प्रतिष्ठा पूर्ण व्यवसायों में संलग्न होकर राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहा है तथापि इस समाज की सामाजिक पहचान अब भी इस व्यवसाय से ही जुड़ी हुई है.
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30.12.17

महान संस्कृत कवि भर्तृहरि का जीवन परिचय:kavi bharathari jevan parichay




 

भर्तृहरि एक महान संस्कृत कवि थे। संस्कृत साहित्य के इतिहास में भर्तृहरि एक नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके शतकत्रय (नीतिशतक, शृंगारशतक, वैराग्यशतक) की उपदेशात्मक कहानियाँ भारतीय जनमानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक शतक में सौ-सौ श्लोक हैं। बाद में इन्होंने गुरु गोरखनाथ के शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया था इसलिये इनका एक लोकप्रचलित नाम बाबा भरथरी भी है।
जनश्रुति और परम्परा के अनुसार भर्तृहरि विक्रमसंवत् के प्रवर्तक सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के अग्रज माने जाते हैं। विक्रमसंवत् ईसवी सन् से 56 वर्ष पूर्व प्रारम्भ होता है, जो विक्रमादित्य के प्रौढ़ावस्था का समय रहा होगा। भर्तृहरि विक्रमादित्य के अग्रज थे, अतः इनका समय कुछ और पूर्व रहा होगा। विक्रमसंवत् के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन् 78 और कुछ लोग ईसवी सन् 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। ये दोनों मत भी अग्राह्य प्रतीत होते हैं। फारसी ग्रंथ कलितौ दिमनः में पंचतंत्र का एक पद्य शशिदिवाकर योर्ग्रहपीडनम्श का भाव उद्धृत है। पंचतंत्र में अनेक ग्रंथों के पद्यों का संकलन है। संभवतः पंचतंत्र में इसे नीतिशतक से ग्रहण किया गया होगा। फारसी ग्रंथ 571 ईसवी से 581 ई० के एक फारसी शासक के निमित्त निर्मित हुआ था। इसलिए राजा भर्तृहरि अनुमानतः 550 ई० से पूर्व हम लोगों के बीच आए थे। भर्तृहरि उज्जयिनी के राजा थे। ये विक्रमादित्य उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई थे। इनके पिता का नाम चन्द्रसेन था। पत्नी का नाम पिंगला था जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे। इन्होंने सुन्दर और रसपूर्ण भाषा में नीति, वैराग्य तथा शृंगार जैसे गूढ़ विषयों पर शतक-काव्य लिखे हैं। इस शतकत्रय के अतिरिक्त, वाक्यपदीय नामक एक उच्च श्रेणी का व्याकरण ग्रन्थ भी इनके नाम पर प्रसिद्ध है। कुछ लोग भट्टिकाव्य के रचयिता भट्टि से भी उनका एक्य मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि नाथपंथ के वैराग्य नामक उपपंथ के यह ही प्रवर्तक थे। चीनी यात्री इत्सिंग और ह्वेनसांग के अनुसार इन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। परंतु अन्य सूत्रों के अनुसार ये अद्वैत वेदान्ताचार्य थे। चीनी यात्री इत्सिंग के यात्रा विवरण से यह ज्ञात होता है कि 651 ईस्वी में भर्तृहरि नामक एक वैयाकरण की मृत्यु हुई थी। इस प्रकार इनका काल सातवीं शताब्दी का प्रतीत होता है, परन्तु भारतीय पुराणों में इनके सम्बन्ध में उल्लेख होने से संकेत मिलता है कि इत्सिंग द्वारा वर्णित भर्तृहरि कोई अन्य रहे होंगे। महाराज भर्तृहरि निःसन्देह विक्रमसंवत की पहली सदी से पूर्व में उपस्थित थे। वे उज्जैन के अधिपति थे। उनके पिता महाराज गन्धर्वसेन बहुत योग्य शासक थे। उनके दो विवाह हुए। पहले से विवाह से महाराज भर्तृहरि

और दूसरे से महाराज विक्रमादित्य हुए थे। पिता की मृत्यु के बाद भर्तृहरि ने राजकार्य संभाला। विक्रम के सबल कन्धों पर शासनभार देकर वह निश्चिन्त हो गए। उनका जीवन कुछ विलासी हो गया था। वह असाधारण कवि और राजनीतिज्ञ थे। इसके साथ ही संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होंने अपने पाण्डित्य और नीतिज्ञता और काव्य ज्ञान का सदुपयोग शृंगार और नीतिपूर्ण रचना से साहित्य संवर्धन में किया।
   एक बार राजा भर्तृहरि अपनी पत्नी पिंगला के साथ जंगल में शिकार खेलने के लिये गये हुए थे। वहाँ काफी समय तक भटकते रहने के बाद भी उन्हें कोई शिकार नहीं मिला। निराश पति-पत्नी जब घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें हिरनों का एक झुण्ड दिखाई दिया। जिसके आगे एक मृग चल रहा था।भर्तृहरि ने उस पर प्रहार करना चाहा तभी पिंगला ने उन्हें रोकते हुए अनुरोध किया कि महाराज, यह मृगराज ७ सौ हिरनियों का पति और पालनकर्ता है। इसलिये आप उसका शिकार न करें। भर्तृहरि ने पत्नी की बात नहीं मानी और हिरन को मार डाला जिससे वह मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा। प्राण छोड़ते-छोड़ते हिरन ने राजा भर्तृहरि से कहा-तुमने यह ठीक नहीं किया। अब जो मैं कहता हूँ उसका पालन करो। मेरी मृत्यु के बाद मेरे सींग श्रृंगीबाबा को, मेरे नेत्र चंचल नारी को, मेरी त्वचा साधु-संतों को, मेरे पैर भागने वाले चोरों को और मेरे शरीर की मिट्टी पापी राजा को दे दो। हिरन की करुणामयी बातें सुनकर भर्तृहरि का हृदय द्रवित हो उठा। हिरन का कलेवर घोड़े पर लाद कर वह मार्ग में चलने लगे।

रास्ते में उनकी मुलाकात बाबा गोरखनाथ से हुई। भर्तृहरि ने इस घटना से अवगत कराते हुए उनसे हिरन को जीवित करने की प्रार्थना की। इस पर बाबा गोरखनाथ ने कहा- मैं एक शर्त पर इसे जीवनदान दे सकता हूँ कि इसके जीवित हो जाने पर तुम्हें मेरा शिष्य बनना पड़ेगा। राजा ने गोरखनाथ की बात मान ली।
   भर्तृहरि ने वैराग्य क्यों ग्रहण किया यह बतलाने वाली अन्य किंवदन्तियां भी हैं जो उन्हें राजा तथा विक्रमादित्य का ज्येष्ठ भ्राता बतलाती हैं। इनके ग्रंथों से ज्ञात होता है कि इन्हें ऐसी प्रियतमा से निराशा हुई थी जिसे ये बहुत प्रेम करते थे। नीति-शतक के प्रारम्भिक श्लोक में भी निराश प्रेम की झलक मिलती है। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने प्रेम में धोखा खाने पर वैराग्य जीवन ग्रहण कर लिया था, जिसका विवरण इस प्रकार है। इस अनुश्रुति के अनुसार एक बार राजा भर्तृहरि के दरबार में एक साधु आया तथा राजा के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए उन्हें एक अमर फल प्रदान किया। इस फल को खाकर राजा या कोई भी व्यक्ति अमर को सकता था। राजा ने इस फल को अपनी प्रिय

रानी पिंगला को खाने के लिए दे दिया, किन्तु रानी ने उसे स्वयं न खाकर अपने एक प्रिय सेनानायक को दे दिया जिसका सम्बन्ध राजनर्तिकी से था। उसने भी फल को स्वयं न खाकर उसे उस राजनर्तिकी को दे दिया। इस प्रकार यह अमर फल राजनर्तिकी के पास पहुँच गया। फल को पाकर उस राजनर्तिकी ने इसे राजा को देने का विचार किया। वह राजदरबार में पहुँची तथा राजा को फल अर्पित कर दिया। रानी पिंगला को दिया हुआ फल राजनर्तिकी से पाकर राजा आश्चर्यचकित रह गये तथा इसे उसके पास पहुँचने का वृत्तान्त पूछा। राजनर्तिकी ने संक्षेप में राजा को सब कुछ बतला दिया। इस घटना का राजा के ऊपर अत्यन्त गहरा प्रभाव पड़ा तथा उन्होंने संसार की नश्वरता को जानकर संन्यास लेने का निश्चय कर लिया और अपने छोटे भाई विक्रम को राज्य का उत्तराधिकारी बनाकर वन में तपस्या करने चले गये। इनके तीनों ही शतक उत्कृष्टतम संस्कृत काव्य हैं। इनके अनेक पद्य व्यक्तिगत अनुभूति से अनुप्राणित हैं तथा उनमें आत्म-दर्शन का तत्त्व पूर्णरूपेण परिलक्षित होता है।
   अपने जीवन काल में उन्होंने शृंगार, नीति शास्त्रों की तो रचना की ही थी, अब उन्होंने वैराग्य शतक की रचना भी कर डाली और विषय वासनाओं की कटु आलोचना की। इन तीन काव्य शतकों के अलावा व्याकरण शास्त्र का परम प्रसिद्ध ग्रन्थ वाक्यपदीय भी उनके महान पाण्डित्य का परिचायक है। वह शब्द विद्या के मौलिक आचार्य थे। शब्द शास्त्र ब्रह्मा का साक्षात् रुप है। अतएव वे शिवभक्त होने के साथ-साथ ब्रह्म रूपी शब्दभक्त भी थे। शब्द ब्रह्म का ही अर्थ रुप नानात्मक जगत-विवर्त है। योगीजन शब्द ब्रह्म से तादात्म्य हो जाने को ही मोक्ष मानते हैं। भर्तृहरि शब्द ब्रह्म के योगी थे। उनका वैराग्य दर्शन परमात्मा के साक्षात्कार का पर्याय है। सह कारण है कि आज भी शब्दो की दुनिया के रचनाकार सदा के अमर हो जाते है। भर्तृहरि एक महान् संस्कृत कवि थे। संस्कृत साहित्य के इतिहास में भर्तृहरि एक नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं।

इनके शतकत्रय (नीतिशतक, शृंगारशतक, वैराग्यशतक ) की उपदेशात्मक कहानियां भारतीय जनमानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक शतक में सौ-सौ श्लोक हैं। बाद में इन्होंने गुरु गोरखनाथ का शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया था, इसलिए इनका एक लोक प्रचलित नाम बाबा गोपीचन्द भरथरी भी है। भर्तृहरि संस्कृत मुक्तक काव्य परम्परा के अग्रणी कवि हैं। इन्हीं तीन शतकों के कारण उन्हें एक सफल और उत्तम कवि माना जाता है। इनकी भाषा सरल, मनोरम, मधुर और प्रवाहमयी है। भावाभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि वह पाठक के हृदय और मन दोनों को प्रभावित करती है। उनके शतकों में छन्दों की विविधता है। भाव और विषय के अनुकूल छन्द का प्रयोग, विषय के अनुरुप उदाहरण आदि से उनकी सूक्तियां जन-जन में प्रचलित रही हैं और समय-समय पर जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा देती रही हैं।
    भर्तृहरि संस्कृत मुक्तककाव्य परम्परा के अग्रणी कवि हैं। इन्हीं तीन शतकों के कारण उन्हें एक सफल और उत्तम कवि माना जाता है। इनकी भाषा सरल, मनोरम, मधुर और प्रवाहमयी है। भावाभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि वह पाठक के हृदय और मन दोनों को प्रभावित करती है। उनके शतकों में छन्दों की विविधता है। भाव और विषय के अनुकूल छन्द का प्रयोग, विषय के अनुरुप उदाहरण आदि से उनकी सूक्तियाँ जन-जन में प्रचलित रही हैं और समय-समय पर जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा देती रही हैं।
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हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा-

विशिष्ट कवियों की चयनित कविताओं की सूची (लिंक्स)

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से -गोपालदास "नीरज"

वीरों का कैसा हो वसंत - सुभद्राकुमारी चौहान

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा-अल्लामा इकबाल

उन्हें मनाने दो दीवाली-- डॉ॰दयाराम आलोक

जब तक धरती पर अंधकार - डॉ॰दयाराम आलोक

जब दीप जले आना जब शाम ढले आना - रविन्द्र जैन

सुमन कैसे सौरभीले: डॉ॰दयाराम आलोक

वह देश कौन सा है - रामनरेश त्रिपाठी

किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की रामबाण औषधि

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ -महादेवी वर्मा

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल - महादेवी वर्मा

प्रणय-गीत- डॉ॰दयाराम आलोक

गांधी की गीता - शैल चतुर्वेदी

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार -शिवमंगलसिंह सुमन

सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक

जंगल गाथा -अशोक चक्रधर

मेमने ने देखे जब गैया के आंसू - अशोक चक्रधर

सूरदास के पद

रात और प्रभात.-डॉ॰दयाराम आलोक

घाघ कवि के दोहे -घाघ

मुझको भी राधा बना ले नंदलाल - बालकवि बैरागी

बादल राग -सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

आओ आज करें अभिनंदन.- डॉ॰दयाराम आलोक