21.1.20

कायस्थ समाज की कुलदेवियाँ:kayasth caste kuldevi


 

कायस्थ जाति का वर्णन चातुर्वर्ण व्यवस्था में नहीं आता है। इस कारण विभिन्न उच्च न्यायालयों ने इनको विभिन्न वर्णों में बताया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बंगाल के कायस्थों को शूद्र बतलाया तो पटना व इलाहाबाद के उच्च न्यायालयों ने इन्हें द्विजों में माना है। कायस्थ शब्द का उल्लेख विष्णु धर्म सूत्र में मिलता है। इसमें कहा गया है कि कायस्थ राजसभा में लेखन कार्य हेतु नियुक्त किये जाते थे। प्रारम्भ में कायस्थ व्यवसाय-प्रधान वर्ग था लेकिन बाद में कायस्थों का संगठन एक जाति के रूप में विकसित हो गया। कायस्थ वर्ग परम्परागत लिपिकों अथवा लेखकों का वर्ग था।
 जाति इतिहासकार डॉ . दयाराम आलोक के मतानुसार कायस्थ जाति अपनी वंशोत्पत्ति ब्रह्मा के पुत्र चित्रगुप्त से मानते हैं। चित्रगुप्त ने दो विवाह किए। प्रथम विवाह धर्मशर्मा ऋषि की पुत्री ऐरावती के साथ किया जिनसे चारु, सुचारु, चित्र, मतिमान, हिमवान, चित्रचारु, अरुण, जितेन्द्री नाम के आठ पुत्र हुए। दूसरा विवाह मनु की पुत्री दक्षिणा के साथ हुआ। दक्षिणा से भानू, विमान, बुद्धिमान, वीर्यमान नाम के चार पुत्र हुए। इन बारह पुत्रों के वंश में क्रम से 12 शाखायें कायस्थों की अलग-अलग क्षेत्रों में रहने से हो गई, जो इस प्रकार है- 
1. माथुर
 2. श्रीवास्तव 
3. सूर्यध्वज 
4. निगम 
5. भटनागर 
6. सक्सेना 
7. गौड़ 
8. अम्बष्ठ 
9. वाल्मिकी 
10. अष्टाना 
11. कुलश्रेष्ठ 
12. कर्ण ।
शाखाएं
नंदिनी-पुत्र

भानु
भानुप्रथम पुत्र श्री भानु कहलाये जिनका राशि नाम धर्मध्वज था| चित्रगुप्त जी ने श्रीभानु को श्रीवास (श्रीनगर) और कान्धार क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था| उनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री पद्मिनी से हुआ था उनके  देवदत्त और घनश्याम नामक दो पुत्रों हुए। देवदत्त को कश्मीर एवं घनश्याम को सिन्धु नदी के तट का राज्य मिला। श्रीवास्तव २ वर्गों में विभाजित हैं – खर एवं दूसर। इनके वंशज आगे चलकर कुछ विभागों में विभाजित हुए जिन्हें अल कहा जाता है। श्रीवास्तवों की अल इस प्रकार हैं – वर्मा, सिन्हा, अघोरी, पडे, पांडिया,रायजादा, कानूनगो, जगधारी, प्रधान, बोहर, रजा सुरजपुरा,तनद्वा, वैद्य, बरवारिया, चौधरी, रजा संडीला, देवगन, इत्यादि।
विभानूद्वितीय पुत्र विभानु हुए जिनका राशि नाम श्यामसुंदर था। इनका विवाह मालती से हुआ। चित्रगुप्त जी ने विभानु को काश्मीर के उत्तर क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। इन्होंने अपने नाना सूर्यदेव के नाम से अपने वंशजों के लिये सूर्यदेव का चिन्ह अपनी पताका पर लगाने का अधिकार एवं सूर्यध्वज नाम दिया। अंततः वह मगध में आकर बसे।
विश्वभानूतृतीय पुत्र विश्वभानु हुए जिनका राशि नाम दीनदयाल था और ये देवी शाकम्भरी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने उनको चित्रकूट और नर्मदा के समीप वाल्मीकि क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इनका विवाह नागकन्या देवी बिम्ववती से हुआ एवं इन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा भाग नर्मदा नदी के तट पर तपस्या करते हुए बिताया जहां तपस्या करते हुए उनका पूर्ण शरीर वाल्मीकि नामक लता से ढंक गया था, अतः इनके वंशज वाल्मीकि नाम से जाने गए और वल्लभपंथी बने। इनके पुत्र श्री चंद्रकांत गुजरात जाकर बसे तथा अन्य पुत्र अपने परिवारों के साथ उत्तर भारत में गंगा और हिमालय के समीप प्रवासित हुए। वर्तमान में इनके वंशज गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं , उनको “वल्लभी कायस्थ” भी कहा जाता है।
वीर्यभानूचौथे पुत्र वीर्यभानु का राशि नाम माधवराव था और इनका विवाह देवी सिंघध्वनि से हुआ था। ये देवी शाकम्भरी की पूजा किया करते थे। चित्रगुप्त जी ने वीर्यभानु को आदिस्थान (आधिस्थान या आधिष्ठान) क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। इनके वंशजों ने आधिष्ठान नाम से अष्ठाना नाम लिया एवं रामनगर (वाराणसी) के महाराज ने उन्हें अपने आठ रत्नों में स्थान दिया। वर्तमान में अष्ठाना उत्तर प्रदेश के कई जिले और बिहार के सारन, सिवान , चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी,दरभंगा और भागलपुर क्षेत्रों में रहते हैं। मध्य प्रदेश में भी उनकी संख्या है। ये ५ अल में विभाजित हैं।
ऐरावती-पुत्र
चारुऐरावती के प्रथम पुत्र का नाम चारु था एवं ये गुरु मथुरे के शिष्य थे तथा इनका राशि नाम धुरंधर था। इनका विवाह नागपुत्री पंकजाक्षी से हुआ एवं ये दुर्गा के भक्त थे। चित्रगुप्त जी ने चारू को मथुरा क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था अतः इनके वंशज माथुर नाम से जाने गये। तत्कालीन मथुरा राक्षसों के अधीन था और वे वेदों को नहीं मानते थे। चारु ने उनको हराकर मथुरा में राज्य स्थापित किया। तत्पश्चात् इन्होंने आर्यावर्त के अन्य भागों में भी अपने राज्य का विस्तार किया। माथुरों ने मथुरा पर राज्य करने वाले सूर्यवंशी राजाओं जैसे इक्ष्वाकु, रघु, दशरथ और राम के दरबार में भी कई महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण किये। वर्तमान माथुर ३ वर्गों में विभाजित हैं -देहलवी,खचौली एवं गुजरात के कच्छी एवं इनकी ८४ अल हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कटारिया, सहरिया, ककरानिया, दवारिया,दिल्वारिया, तावाकले, राजौरिया, नाग, गलगोटिया, सर्वारिया,रानोरिया इत्यादि। एक मान्यता अनुसार माथुरों ने पांड्या राज्य की स्थापना की जो की वर्तमान में मदुरै, त्रिनिवेल्ली जैसे क्षेत्रों में फैला था। माथुरों के दूत रोम के ऑगस्टस कैसर के दरबार में भी गए थे।
सुचारुद्वितीय पुत्र सुचारु गुरु वशिष्ठ के शिष्य थे और उनका राशि नाम धर्मदत्त था। ये देवी शाकम्बरी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने सुचारू को गौड़ देश में राज्य स्थापित करने भेजा था एवं इनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री देवी मंधिया से हुआ।इनके वंशज गौड़ कहलाये एवं ये ५ वर्गों में विभाजित हैं: – खरे, दुसरे, बंगाली, देहलवी, वदनयुनि। गौड़ कायस्थों को ३२ अल में बांटा गया है। गौड़ कायस्थों में महाभारत के भगदत्त और कलिंग के रुद्रदत्त राजा हुए थे। चित्रतृतीय पुत्र चित्र हुए जिन्हें चित्राख्य भी कहा जाता है, गुरू भट के शिष्य थे, अतः भटनागर कहलाये। इनका विवाह देवी भद्रकालिनी से हुआ था तथा ये देवी जयंती की अराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने चित्राक्ष को भट देश और मालवा में भट नदी के तट पर राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इन क्ष्त्रों के नाम भी इन्हिं के नाम पर पड़े हैं। इन्होंने चित्तौड़ एवं चित्रकूट की स्थापना की और वहीं बस गए।इनके वंशज भटनागर के नाम से जाने गए एवं ८४ अल में विभाजित हैं, इनकी कुछ अल इस प्रकार हैं- डसानिया, टकसालिया, भतनिया, कुचानिया, गुजरिया,बहलिवाल, महिवाल, सम्भाल्वेद, बरसानिया, कन्मौजिया इत्यादि| भटनागर उत्तर भारत में कायस्थों के बीच एक आम उपनाम है।
मतिभानचतुर्थ पुत्र मतिमान हुए जिन्हें हस्तीवर्ण भी कहा जाता है। इनका विवाह देवी कोकलेश से हुआ एवं ये देवी शाकम्भरी की पूजा करते थे। चित्रगुप्त जी ने मतिमान को शक् इलाके में राज्य स्थापित करने भेजा। उनके पुत्र महान योद्धा थे और उन्होंने आधुनिक काल के कान्धार और यूरेशिया भूखंडों पर अपना राज्य स्थापित किया। ये शक् थे और शक् साम्राज्य से थे तथा उनकी मित्रता सेन साम्राज्य से थी, तो उनके वंशज शकसेन या सक्सेना कहलाये। आधुनिक इरान का एक भाग उनके राज्य का हिस्सा था। वर्तमान में ये कन्नौज, पीलीभीत, बदायूं, फर्रुखाबाद, इटाह,इटावा, मैनपुरी, और अलीगढ में पाए जाते हैं| सक्सेना लोग खरे और दूसर में विभाजित हैं और इस समुदाय में १०६ अल हैं, जिनमें से कुछ अल इस प्रकार हैं- जोहरी, हजेला, अधोलिया, रायजादा, कोदेसिया, कानूनगो, बरतरिया, बिसारिया, प्रधान, कम्थानिया, दरबारी, रावत, सहरिया,दलेला, सोंरेक्षा, कमोजिया, अगोचिया, सिन्हा, मोरिया, इत्यादि|
हिमवान
पांचवें पुत्र हिमवान हुए जिनका राशि नाम सरंधर था उनका विवाह भुजंगाक्षी से हुआ। ये अम्बा माता की अराधना करते थे तथा चित्रगुप्त जी के अनुसार गिरनार और काठियवार के अम्बा-स्थान नामक क्षेत्र में बसने के कारण उनका नाम अम्बष्ट पड़ा। हिमवान के पांच पुत्र हुए: नागसेन, गयासेन, गयादत्त, रतनमूल और देवधर। ये पाँचों पुत्र विभिन्न स्थानों में जाकर बसे और इन स्थानों पर अपने वंश को आगे बढ़ाया। इनमें नागसेन के २४ अल, गयासेन के ३५ अल, गयादत्त के ८५ अल, रतनमूल के २५ अल तथा देवधर के २१ अल हैं। कालाम्तर में ये पंजाब में जाकर बसे जहाँ उनकी पराजय सिकंदर के सेनापति और उसके बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के हाथों हुई। मान्यता अनुसार अम्बष्ट कायस्थ बिजातीय विवाह की परंपरा का पालन करते हैं और इसके लिए “खास घर” प्रणाली का उपयोग करते हैं। इन घरों के नाम उपनाम के रूप में भी प्रयोग किये जाते हैं। ये “खास घर” वे हैं जिनसे मगध राज्य के उन गाँवों का नाम पता चलता है जहाँ मौर्यकाल में तक्षशिला से विस्थापित होने के उपरान्त अम्बष्ट आकर बसे थे। इनमें से कुछ घरों के नाम हैं- भीलवार, दुमरवे, बधियार, भरथुआर, निमइयार, जमुआर,कतरयार पर्वतियार, मंदिलवार, मैजोरवार, रुखइयार, मलदहियार,नंदकुलियार, गहिलवार, गयावार, बरियार, बरतियार, राजगृहार,देढ़गवे, कोचगवे, चारगवे, विरनवे, संदवार, पंचबरे, सकलदिहार,करपट्ने, पनपट्ने, हरघवे, महथा, जयपुरियार, आदि।
चित्रचारुछठवें पुत्र का नाम चित्रचारु था जिनका राशि नाम सुमंत था और उनका विवाह अशगंधमति से हुआ। ये देवी दुर्गा की अराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने चित्रचारू को महाकोशल और निगम क्षेत्र (सरयू नदी के तट पर) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। उनके वंशज वेदों और शास्त्रों की विधियों में पारंगत थे जिससे उनका नाम निगम पड़ा। वर्तमान में ये कानपुर, फतेहपुर, हमीरपुर, बंदा, जलाओं,महोबा में रहते हैं एवं ४३ अल में विभाजित हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कानूनगो, अकबरपुर, अकबराबादी, घताम्पुरी,चौधरी, कानूनगो बाधा, कानूनगो जयपुर, मुंशी इत्यादि।
चित्रचरणसातवें पुत्र चित्रचरण थे जिनका राशि नाम दामोदर था एवं उनका विवाह देवी कोकलसुता से हुआ। ये देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे और वैष्णव थे। चित्रगुप्त जी ने चित्रचरण को कर्ण क्षेत्र (वर्तमाआन कर्नाटक) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इनके वंशज कालांतर में उत्तरी राज्यों में प्रवासित हुए और वर्तमान में नेपाल, उड़ीसा एवं बिहार में पाए जाते हैं। ये बिहार में दो भागों में विभाजित है: गयावाल कर्ण – गया में बसे एवं मैथिल कर्ण जो मिथिला में जाकर बसे। इनमें दास, दत्त, देव, कण्ठ, निधि,मल्लिक, लाभ, चौधरी, रंग आदि पदवी प्रचलित हैं। मैथिल कर्ण कायस्थों की एक विशेषता उनकी पंजी पद्धति है, जो वंशावली अंकन की एक प्रणाली है। कर्ण ३६० अल में विभाजित हैं। इस विशाल संख्या का कारण वह कर्ण परिवार हैं जिन्होंने कई चरणों में दक्षिण भारत से उत्तर की ओर प्रवास किया। यह ध्यानयोग्य है कि इस समुदाय का महाभारत के कर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है।
चारुणअंतिम या आठवें पुत्र चारुण थे जो अतिन्द्रिय भी कहलाते थे। इनका राशि नाम सदानंद है और उन्होंने देवी मंजुभाषिणी से विवाह किया। ये देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने अतिन्द्रिय को कन्नौज क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था। अतियेंद्रिय चित्रगुप्त जी की बारह संतानों में से सर्वाधिक धर्मनिष्ठ और सन्यासी प्रवृत्ति वाले थे। इन्हें ‘धर्मात्मा’ और ‘पंडित’ नाम से भी जाना गया और स्वभाव से धुनी थे। इनके वंशज कुलश्रेष्ठ नाम से जाने गए तथा आधुनिक काल में ये मथुरा, आगरा, फर्रूखाबाद, एटा, इटावा और मैनपुरी में पाए जाते हैं | कुछ कुलश्रेष्ठ जो की माता नंदिनी के वंश से हैं, नंदीगांव – बंगाल में पाए जाते हैं |
राजस्थान में माथुर कायस्थ अधिक आबाद है। इन्हें पंचोली भी कहा जाता है। ‘कायस्थ जगत’ नामक पत्रिका में माथुर (कायस्थ) वर्ग की 84 शाखाओं का नामोल्लेख कुलदेवियों के साथ मिलता है, जो इस प्रकार है-



         Kuldevi List of Kayastha Samaj कायस्थ जाति के गोत्र एवं कुलदेवियां 


सं.कुलदेवीशाखाएं
1.
जीवण माताबनावरिया (झांमरिया), टाक, नाग, ताहानपुरा, गऊहेरा
2.
बटवासन मातासाढ़ मेहंता (भीवांणी), अतरोलिया, तनोलिया, टीकाधर
3.
मंगलविनायकीसहांरिया (मानक भण्डारी)
4.
पीपलासन मातानैपालिया (मुन्शी), घुरू, धूहू
5.
यमुना माताराजोरिया, कुस्या
6.
ककरासण माताएंदला (नारनोलिया)
7.
भांणभासकरछार छोलिया
8.
अंजनी माताशिकरवाल, सेवाल्या, विदेवा (बैद)
9.
कुलक्षामिणी मातानौहरिया (लवारिया)
10.
बीजाक्षण मातासांवलेरिया, कुलहल्या, जलेश्वरिया
11.
राजराजेश्वरी माताजोचबा
12.
श्रीगुगरासण मातासिरभी
13.
हुलहुल माताकामिया (गाडरिया), कटारमला, कौटेचा, गडनिया, सौभारिया, महाबनी, नाग पूजा हुसैनिया
14.
चामुण्डा माताचोबिसा (कोल्ली), जाजोरिया, मोहांणी, मगोडरिया,पासोदिया (पासीहया)
15.
आशापुरा माताककरानिया, गलगोटिया, दिल्लीवाल, करना, धनोरिया, गुवालैरिया, कीलटौल्या
16.
श्रीसाउलमातासीसोल्या (मनाजीतवाल), ध्रुबास
17.
श्रीपाण्डवराय मातानौसरिया (मेड़तवाल), बकनोलिया, भांडासरिया
18.
श्रीदेहुलमातातबकलिया
19.
श्री जगन्नामाताकुरसोल्या
20.
नारायणी मातावरणी (खोजा)
21.
कमलेश्वरी माताहेलकिया
22.
पुरसोत्मामातासिरोड़िया
23.
कमलासन मातासादकिया, छोलगुर
24.
महिषमर्दिनीमहिषासुरिया
25.
द्रावड़ी हीरायनकटारिया
26.
लक्ष्मीमाताकलोल्या, आंबला
27.
योगाशिणी माताचन्देरीवाल
28.
चण्डिका मातापत्थर चट्टा, छांगरिया
29.
जयन्ती मातामासी मुरदा
30.
सोनवाय माताअभीगत, टंकसाली
31.
कणवाय मातामाछर
32.
पाड़मुखी माताकबांणिया
33.
हर्षशीलि मातातैनगरा
34.
इंद्राशिणी माताधोलमुखा (गोड़ा)
35.
विश्वेश्वरी मातामथाया
36.
अम्बा माताधीपला
37.
ज्वालामुखी माताहोदकसिया
38.
शारदा माताबकनिया
39.
अर्बुदा माताकवड़ीपुरिया (बकहुपुरा)
40.
कुण्डासण मातासींमारा
41.
पाडाय मातामाखरपुरिया, पुनहारा
42.
हींगुलाद मातासरपारा
43.
प्राणेश्वरी मातालोहिया
44.
बेछराय मातासिणहारिया
45.
सांवली मातावरण्या (बरनोल्या)
46.
लक्ष्मीया हलड़आसौरिया (आसुरिय)
47.
पहाड़ाय माताफूलफगरसूहा (नोहगणा)

इसके अलावा भटनागर, सक्सेना और श्रीवास्तव की कुलदेवियों का भी उल्लेख मिलता है।
कायस्थ शाखागोत्रकुलदेवी
भटनागर
सठजयन्ती माता
सक्सेना
हंसशाकम्भरी माता
श्रीवास्तव
हर्षलक्ष्मी माता


जाति इतिहासविद डॉ.दयाराम आलोक के  मतानुसार नवरात्रि का उपवास आसोज एवं चैत्र के महीने में कायस्थ कुल के स्त्री एवं पुरुष सम्मिलित रूप से करते हैं। वे अपनी-अपनी कुलदेवियों की पूजा अर्चना दोनों प्रकार के भोज अर्पित कर करते हैं। वैसे हर माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को देवी की पूजा होती है। जो जीवण माता के रूप में मानी जाती है। कायस्थों के विभिन्न शाखाओं के वंशधारी वैवाहिक अवसरों पर भी कुलदेवी का मनन करते हैं। विवाह होने के उपरान्त नवदम्पत्ति को सबसे पहले कुलदेवी की जात देने ले जाया जाता है। जिससे उनका नव जीवन सफल और कठिनाइयों से मुक्त रहे।
कायस्थों की जोधपुर स्थित विभिन्न शाखाओं की कुलदेवियों में जीवणमाता मंदिर (मंडोर), बाला त्रिपुरा सुंदरी (नयाबास), राजराजेश्वरी माता (छीपाबाड़ी), मातेश्वरी श्री पाण्डवराय (फुलेराव), नायकी माता (अखेराज जी का तालाब) आदि के मन्दिर समाज में बड़े ही प्रसिद्ध हैं।

14.1.20

सुनार,स्वर्णकार समाज का इतिहास,गोत्र और कुलदेवी:sunar jati kuldevi



ऐसा लगता है कि कुछ लोगों को सुनार/स्वर्णकार समुदाय को लेकर कुछ चिंता है। जब तक आपके पास उचित शोध और डेटा न हो, तब तक आप समाज की स्थिति का अंदाजा नहीं लगा सकते। हाँ, ज़्यादातर राज्यों में सुनार OBC के अंतर्गत आता है, इसका मुख्य कारण आर्थिक गिरावट है, कुछ राज्यों में इसे सामान्य श्रेणी में भी रखा गया है, गोल्ड कंट्रोल एक्ट 1962 और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ है। समाज के अलग-अलग वर्गों/वर्ण के लोगों के इस पेशेवर समुदाय में शामिल होने के कारण सामाजिक स्थिति अलग-अलग होती है। इसमें उच्च मांग और मूल्य वाला पेशा शामिल है।
यदि आप वास्तव में स्थिति को समझना चाहते हैं तो सर्राफा बाजार में जाइए और गिनिए कि कितनी दुकानें व्यापारी समुदाय के अलावा अन्य लोगों ने ली हैं, विशेष रूप से 2,3 स्तरीय शहरों में।
यदि आप गांवों या शहरों में जाएंगे तो आप लोगों से पूछेंगे कि वे केवल आभूषण और धन उधार देने के लिए सुनार की दुकान के बारे में ही जानते हैं।
इस समुदाय में कई सेठ, साहूकार हैं जो ब्याज पर पैसा देते हैं और हर जगह खरीद-बिक्री में शामिल होते हैं। यहां तक ​​कि विभिन्न समूहों के बनिया और खत्री सुनार उत्तर भारत में शोरूम चलाने के बाद भी तीसरे स्थान पर हैं।
कायस्थ और ब्राह्मण इस व्यवसाय में बहुत ही असाधारण हैं, वह भी बहुत छोटे स्तर पर।
यदि आप केवल उन गरीब सुनारों को ही ध्यान में रख रहे हैं, जो अपनी निम्न आर्थिक स्थिति के कारण दूसरों की दुकानों पर काम करते हैं, तो ऐसा होगा कि आप मजदूर वर्ग और उच्च जाति समूह के अन्य छोटे सड़क विक्रेताओं को भी इसमें शामिल कर रहे हैं। वहां भी वे अपने कौशल के कारण बेहतर हैं, वे बेरोजगार नहीं हैं।
हां, इस समुदाय का शैक्षणिक रूप से पिछड़ा दर्जा है और यह पारंपरिक व्यवसाय पर केंद्रित है, लेकिन इस हिस्से में तेजी से सुधार हो रहा है।
सरकार को इस कला और लोगों की सुरक्षा और आसान सुविधाओं के लिए कदम उठाने की जरूरत है, क्योंकि यह कला विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है। जटिल नीतियों और सरकारी हितों की कमी के कारण लोग इस पेशे से पीड़ित हैं और इसे छोड़ रहे हैं।
इस समुदाय के लोग अब अन्य लाभदायक व्यवसायों में प्रवेश कर रहे हैं, शिक्षित हो रहे हैं, नौकरियां चुन रहे हैं, क्योंकि इसमें बड़ी मात्रा में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है।
उन्हें कभी भी अछूत नहीं माना गया और भारतीय राज्य के बहुसंख्यकों ने उन्हें ऊंची जाति का दर्जा दिया। फिर भी उनकी संपत्ति, रहन-सहन, आभूषण, पहनावा चर्चा का विषय बना हुआ है और दूसरों ने भी उन्हें अपनाया है।
और अगर आप महाराष्ट्र के ऐतिहासिक तथ्यों के बारे में बात करते हैं तो यह निश्चित बिंदु पर हो सकता है और एक और विचार यह था कि सुबह में सुनार को देखना पैसे की हानि की तरह था। जो लोग उच्च और अन्य ओबीसी जातियों के बीच एक दूसरे के लिए संकेत देते हैं।
नाना शंकर सेठ को मुंबई का निर्माता माना जाता है और महाराष्ट्र के इतिहास में सबसे बड़ा दानदाता स्वर्णकार समाज से ही था।
आज भी हम सोने के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं और यह सोना बनाने वाले के माध्यम से ही आता है। मध्य युग में यह सबसे धनी जाति थी, लेकिन सोने पर नियंत्रण अधिनियम और बिक्री और खरीद पर नियंत्रण के कारण वे बहुत प्रभावित हुए और उन्हें उन व्यापारी/दलाल समुदायों पर निर्भर होना पड़ा जो उस समय शैक्षिक रूप से आगे थे।
अब वे अच्छे अनुपात में सुधार कर रहे हैं और स्वर्ण आभूषणों के विनिर्माण और व्यापार में हॉलमार्क आदि जैसे बहुविध दायित्वों को पूरा कर रहे हैं।
और अलग-अलग वर्णों की स्थिति के पीछे तथ्य यह है कि कुछ स्थानों पर क्षत्रिय, वैश्य, ब्राह्मण, विश्वकर्मा या शुद्ध सुनार अलग-अलग मूल के हैं। यह मुसलमानों और अंग्रेजों के आक्रमण के कारण हुआ, जहाँ इन वर्णों के लोगों ने अच्छी आय या जीवनयापन के लिए इस पेशे को अपनाया। अतीत में उच्च स्थिति के केवल 2 मापदंड थे सोना और ज़मीन, इसलिए बहुत से लोग लाभ कमाने और आभूषण निर्माण व्यवसाय के लिए इस पेशे में प्रवेश कर रहे थे, जिस पर अतीत में सुनारों का एकाधिकार था।
उनके अपने कुल, गोत्र, आल्हा हैं जो अलग-अलग वर्ण व्यवस्था के उनके संबंध को दर्शाते हैं। वे तब तक आपस में विवाह नहीं करते जब तक कि उनका कोई खास समूह न हो।
न्यारिहा (जो वास्तव में सुनार की दुकानों पर बर्तन धोने का काम करते थे) का दर्जा निम्न था क्योंकि वे बड़े सुनारों के यहां नौकर थे और कुछ राज्यों में सुनार की अनुसूचित जाति की स्थिति का उपयोग करके उन्होंने कुछ मरम्मत का काम सीखा था।
लोगों को अपना समूह चुनने की स्वतंत्रता है और विचार के लिए उनकी तुलना की जाती है तथा एक लोकतांत्रिक निकाय है जो संवैधानिक अधिकारों के बावजूद लोगों के विश्वास, संस्कृति, संस्कार और रीति-रिवाजों के अधिकार को सुरक्षित रखता है, जहां सभी भारतीय समान हैं।

चन्द्रवंश में हस्ति नाम प्रतापी राजा की संतान विकुंठन के पुत्र महाराजा अजमीढ़ थे । उनकी माता का नाम रानी सुदेवा था। त्रेता युग में जब परशुराम्जी क्षत्रियों से कुपित होकर उनका संहार कर रहे थे ऐसे आपातकाल में वन स्थित ॠषि-मुनियों ने उन्हें शरण दी। तत्कालीन महाराज अजमीढ़जी क्षत्रियों की दयनीय दशा देखकर चिंतित रहने लगे। उन्हें स्वर्णकला का ज्ञान था, उन्होंने राज्य का कार्यभार युवराज संवरण को सौंपा व वानप्रस्थ आश्रम पहुंच आश्रम स्थापित किया व भयातुर क्षत्रियों को संरक्षण दिया। स्वर्णकारी की शिक्षा देकर सम्मान प्रदान किया। जनकपुरी में शिवधनुष भंग होने के अवसर पर रामजी से परशुरामजी का वार्तालाप होने पर क्षत्रियों के प्रति क्रोध शांत हुआ। जो क्षत्रिय स्वर्णकला में पारंगत हो चुके थे, उन्होंने इस स्वर्णकला को अपनाए रखा व पीढ़ी दर पीढ़ी उन्नत करते हुए सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाया। भौगोलिक स्थिति एवं क्षेत्रियता के कारण स्वर्णकार विभिन्न नामों से पुकारे जाते है।
1. देशवाली-मारवाड़ से बहुत वर्ष पहले दिल्ली एवं उत्तरप्रदेश में बसते है।
2. छेनगरिया
3. पछादे- मुख्यत: दिल्ली एवं उत्तरप्रदेश में निवास करते है। देशवालियों से रस्म रिवाज, खानपान न मिलने के कारण बेटी व्यवहार नहीं है।
4. निमाड़ी- मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में बसते हैं।
5. वनजारी- आंध्रप्रदेश एवं आसपास के क्षेत्रों में बसते हैं। ये लोग बन्जारों का काम करते हैं एवं उन्हीं के साथ घुमक्क्ड़ जीवन बिताते हैं।
6. पजाबी- हमारे इन बन्धुओं में पंजाब के पहरावे के अतिरिक्त कोई अन्तर नहीं है।
7. भागलपुरी- बिहार के भागलपुर क्षेत्र में निवास करते हैं।
8. मारवाड़ी- मारवाड़ (राजस्थान) से धीरे धीरे देश के विभिन्न प्रान्तों में जाकर बस गये हैं। अपने को मारवाड़ी ही कहते हैं।
9. ढ़ूढाडी- राजस्थान की जयपुर रियासत के निवासी।
10. शेखावटी- राजस्थान के बीकानेर से लगा क्षेत्र शेखावटी कहलाता है। यहां बसने वाले बन्धु शेखावटी कहलाते हैं।
11. मालवी- मारवाड़ तथा मेवाड़ से आकर मालवा में बस गये।
12. माहोर- मथुरा, आगरा, करोली आदि स्थानों पर इस नाम से सुनार बन्धु बसते हैं।
वे वैष्णव धर्म का पालन करते हैं, और उनमें से कई स्वामीनारायण संप्रदाय से संबंधित हैं।
 मैढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज श्री महाराजा अजमीढ़जी को अपना पितृ-पुरुष (आदि पुरुष) मानती है। वैसे ऐतिहासिक जानकारी जो विभिन्न रुपों में विभिन्न जगहों पर उपलब्ध हुई है उसके आधार पर  मैढ़ क्षत्रिय अपनी वंशबेल को भगवान विष्णु से जुड़ा हुआ पाते हैं। कहा गया है कि भगवान विष्णु के नाभि-कमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी से अत्री और अत्रीजी की शुभ दृष्टि से चंद्र-सोम हुए। चंद्रवंश की 28वीं पीढ़ी में अजमीढ़जी पैदा हुए। महाराजा अजमीढ़जी का जन्म त्रेतायुग के अन्त में हुआ था।  उनके दादा महाराजा श्रीहस्ति थे जिन्होंने प्रसिद्ध हस्तिनापुर बसाया था। महाराजा हस्ति के पुत्र विकुंठन एवं दशाह राजकुमारी महारानी सुदेवा के गर्भ से महाराजा अजमीढ़जी का जन्म हुआ। इनके अनेक भाईयों में से पुरुमीढ़ और द्विमीढ़ विशेष प्रसिद्ध हुए। द्विमीढ़जी के वंश में मर्णान, कृतिमान, सत्य और धृति आदि प्रसिद्ध राजा हुए। पुरुमीढ़जी के कोई संतान नहीं हुई। महाराज अजमीढ़ की दो रानियां थी सुमित और नलिनी। इनके चार पुत्र हुए बृहदिषु, ॠष, प्रियमेव और नील । इस प्रकार महाराजा अजमीढ़जी का वंश वृद्धिगत होता गया, अलग-अलग पुत्रों-पौत्र,प्रपोत्रों के नाम से गोत्र उपगोत्र चलते गये। हस्तिनापुर के अतिरिक्त अभी के अजमेर के आसपास का क्षेत्र मैढ़ावर्त के नाम से महाराजा अजमीढ़जी ने राज्य के रुप में स्थापित क्या और वहां और कल्याणकारी कार्य किये।

सुनार (वैकल्पिक सोनार या स्वर्णकार) भारत के स्वर्णकार समाज से सम्बन्धित जाति है जिनका मुख्य व्यवसाय स्वर्ण धातु से भाँति-भाँति के कलात्मक आभूषण बनाना, खेती करना तथा सात प्रकार के शुद्ध व्यापार करना है। यद्यपि यह समाज मुख्य रूप से हिन्दू को मानने वाला है लेकिन इस जाति का एक विशेष कुलपूजा स्थान है। सुनार अपने पूर्वजों के धार्मिक स्थान की कुलपूजा करते है। यह जाति हिन्दूस्तान की मूलनिवासी जाति है। मूलत: ये सभी क्षत्रिय वर्ण में आते हैं इसलिये ये क्षत्रिय सुनार भी कहलाते हैं। आज भी यह समाज इस जाति को क्षत्रिय सुनार कहने में गर्व महसूस करता हैं।

शब्द की व्युत्पत्ति

सुनार शब्द मूलत: संस्कृत भाषा के स्वर्णकार का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है स्वर्ण अथवा सोने की धातु या सोने जैसी फसल का उत्पादन करने वाला। यह क्षत्रिय जाति है जो अन्याय तथा अत्याचार के विरूद्ध लड़ती है। इस जाति में अनेक महापुरूषों ने जन्म लिया है। यह इतिहास की वीर तथा महान् जाति है।प्रारम्भ में निश्चित ही इस प्रकार की निर्माण कला के कुछ जानकार रहे होंगे जिन्हें वैदिक काल में स्वर्णकार कहा जाता होगा। बाद में पुश्त-दर-पुश्त यह काम करते हुए उनकी एक जाति ही बन गयी जो आम बोलचाल की भाषा में सुनार कहलायी। जैसे-जैसे युग बदला इस जाति के व्यवसाय को अन्य वर्ण के लोगों ने भी अपना लिया और वे भी स्वर्णकार हो गये। सुनार शाकाहारी,सुँदर,चरित्रवान,साहसी तथा पूरक शक्ति से सिद्ध होता है। जबकि स्वर्णकार दुर्भाग्यवश किसी अन्य जाति का भी हो सकता है। अन्य जाति का व्यक्ति सुनार जाति में उसी प्रकार पहचाना जाएगा जैसे हँसो में अन्य पक्षी पहचाना जाता है। गुणो से ही जाति की पहचान होती है। जाति से ही गुणो का परिचय मिलता है।

इतिहास

लोकमानस में प्रचलित जनश्रुति के अनुसार सुनार जाति के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है कि त्रेता युग में परशुराम ने जब एक-एक करके क्षत्रियों का विनाश करना प्रारम्भ कर दिया तो दो राजपूत भाइयों को एक सारस्वत ब्राह्मण ने बचा लिया और कुछ समय के लिए दोनों को मैढ़ बता दिया जिनमें से एक ने स्वर्ण धातु से आभूषण बनाने का काम सीख लिया और सुनार बन गया और दूसरा भाई खतरे को भाँप कर खत्री बन गया और आपस में रोटी बेटी का सम्बन्ध भी न रखा ताकि किसी को यह बात कानों-कान पता लग सके कि दोनों ही क्षत्रिय हैं।आज इन्हें मैढ़ राजपूत के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि ये वही राजपूत है जिन्होंने स्वर्ण आभूषणों का कार्य अपने पुश्तैनी धंधे के रूप में चुना है।
लेकिन आगे चलकर गाँव में रहने वाले कुछ सुनारों ने भी आभूषण बनाने का पुश्तैनी धन्धा छोड़ दिया और वे खेती करने लगे।

वर्ग-भेद

अन्य हिन्दू जातियों की तरह सुनारों में भी वर्ग-भेद पाया जाता है। इनमें अल्ल का रिवाज़ इतना प्राचीन है कि जिसकी कोई थाह नहीं।ये निम्न 3 वर्गों में विभाजित है,जैसे 4,13,और सवा लाख.  
 इनकी प्रमुख अल्लों के नाम भी विचित्र हैं जैसे ,परसेटहा, ग्वारे,भटेल,मदबरिया,महिलबार,नागवंशी,छिबहा, नरबरिया,अखिलहा,जडिया, सड़िया, धेबला पितरिया, बंगरमौआ, पलिया, झंकखर, भड़ेले, कदीमी, नेगपुरिया, सन्तानपुरिया, देखालन्तिया, मुण्डहा, भुइगइयाँ, समुहिया, चिल्लिया, कटारिया, नौबस्तवाल, व शाहपुरिया.सुरजनवार , खजवाणिया.डसाणिया,मायछ.लावट .कड़ैल.दैवाल.ढल्ला.कुकरा.डांवर.मौसूण.जौड़ा . जवडा. माहर. रोडा. बुटण.तित्तवारि.भदलिया. भोमा. अग्रोयाआदि-आदि। अल्ल का अर्थ निकास या जिस स्थान से इनके पुरखे निकल कर आये और दूसरी जगह जाकर बस गये थे आज तक ऐसा माना जाता है।

मैढ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज की कुलदेवियाँ,,,,कुलदेवी उपासक सामाजिक गोत्र,,,,
मैढ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज की कुलदेवियाँ
कुलदेवी उपासक सामाजिक गोत्र


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1. अन्नपूर्णा माता –
 खराड़ा, 
गंगसिया, 
चुवाणा, 
भढ़ाढरा, 
महीचाल,
रावणसेरा,
 रुगलेचा
2. अमणाय माता – 
कुझेरा, 
खीचाणा,
 लाखणिया, 
घोड़वाल, 
सरवाल, 
परवला

3. अम्बिका माता – 
कुचेवा, 

नाठीवाला
4. आसापुरा माता – 
अदहके, 
अत्रपुरा, 
कुडेरिया, 
खत्री आसापुरा, 
जालोतिया, 
टुकड़ा, 
ठीकरिया, 
तेहड़वा, जोहड़, 
नरवरिया,
 बड़बेचा, 
बाजरजुड़ा,
 सिंद,
 संभरवाल, 
मोडक़ा, 
मरान,
 भरीवाल,
 चौहान
5. कैवाय माता – 
कीटमणा, 
ढोलवा, 
बानरा, 
मसाणिया,

 सींठावत
6. कंकाली माता –
 अधेरे, 
कजलोया, 
डोलीवाल, 
बंहराण,
 भदलास

7. कालिका माता – 
ककराणा, 
कांटा,
 कुचवाल, 
केकाण, 
घोसलिया, 
छापरवाल,
 झोजा, 
डोरे, 
भीवां,
 मथुरिया,
 मुदाकलस

8. काली माता – 
बनाफरा

9. कोटासीण माता –
 गनीवाल,
 जांगड़ा,
  ढीया,
 बामलवा, 
संखवाया, 
सहदेवड़ा, 
संवरा

10. खींवजा माता –
 रावहेड़ा, 
हरसिया
11. चण्डी माता –
 जांगला, 
झुंडा, 
डीडवाण,
 रजवास,
 सूबा

12. चामुण्डा माता – 
उजीणा, 
जोड़ा, 
झाट, 
टांक, 
झींगा, 
कुचोरा, 
ढोमा,
तूणवार, 
धूपड़, 
बदलिया,
 बागा, 
भमेशा,
 मुलतान, 
लुद्र,
 गढ़वाल,
 गोगड़, 
चावड़ा, 
चांवडिया,
 जागलवा,
 झीगा, 
डांवर, 
सेडूंत
13. चक्रसीण माता – 
चतराणा, 
धरना, 
पंचमऊ, 
पातीघोष, 
मोडीवाल, 
सीडा
14. चिडाय माता –
 खीवाण जांटलीवाल, 
बडग़ोता, 
हरदेवाण
15. ज्वालामुखी माता –
 कड़ेल, 
खलबलिया, 
छापरड़ा,
 जलभटिया, 
देसवाल, 
बड़सोला,
 बाबेरवाल, 
मघरान, 
सतरावल,
 सत्रावला, 
सीगड़, 
सुरता,
 सेडा, 
हरमोरा

16. जमवाय माता –
 कछवाहा,
 कठातला, 
खंडारा,
 पाडीवाल,
बीजवा, 
सहीवाल, 
आमोरा, 
गधरावा, 
धूपा, 
रावठडिय़ा

17. जालपा माता – 
आगेचाल,
 कालबा, 
खेजड़वाल,
 गदवाहा, 
ठाकुर, 
बंसीवाल, 
बूट्टण, 
सणवाल
18. जीणमाता – 
तोषावड़, 
19. तुलजा माता –
 गजोरा, 
रुदकी

20. दधिमथी माता – 
अलदायण, 
अलवाण, 
अहिके,
उदावत,
 कटलस, 
कपूरे, 
करोबटन,
 कलनह,
 काछवा,
 कुक्कस,
 खोर, 
माहरीवाल
21. नवदुर्गा माता – 
टाकड़ा,
 नरवला, 
नाबला, 
भालस
22. नागणेचा माता – 
दगरवाल, 

 धुडिय़ा, 
सीहरा, 
सीरोटा
23. पण्डाय (पण्डवाय) माता – 
रगल,
 रुणवाल,
 पांडस

24. पद्मावती माता –
 कोरवा, 
जोखाटिया,
 बच्छस, 
बठोठा, 
लूमरा
25. पाढराय माता –
 अचला
26. पीपलाज माता – 
खजवानिया,
 परवाल,
 मुकारा
27. बीजासण माता – 
अदोक ,
 बीजासण, 
मंगला,
 मोडकड़ा, 
मोडाण, 
सेरने
28. भद्रकालिका माता – 
नारनोली
29. मुरटासीण माता –
 जाड़ा,
 ढल्ला,
 बनाथिया, 
मांडण, 
मौसूण, 
रोडा
30. लखसीण माता – 
अजवाल, 
अजोरा, 
अडानिया, 
छाहरावा,
 झुण्डवा, 
डीगडवाल,
 तेहड़ा, 
परवलिया, 
बगे, 
राजोरिया, 
लंकावाल, 
सही, 
सुकलास, 
हाबोरा
31. ललावती माता –
 कुकसा,
 खरगसा, 
खरा, 
पतरावल,
 भानु,
 सीडवा,
 हेर
32. सवकालिका माता – 
ढल्लीवाल,
 बामला,
 भंवर, 
रूडवाल, 
रोजीवाल, 
लदेरा, 
सकट
33. सम्भराय माता – 
अडवाल, 
खड़ानिया, 
खीपल,
 गुगरिया,
 तवरीलिया, 
दुरोलिया, 
पसगांगण, 
भमूरिया

34. संचाय माता –
 डोसाणा
35. सुदर्शनमाता – 
मलिंडा

यह विवरण विभिन्न समाजों की प्रतिनिधि संस्थाओं तथा लेखकों द्वारा संकलित एवं प्रकाशित सामग्री पर आधारित है। इसके बारे में प्रबुद्धजनों की सम्मति एवं सुझाव सादर आमन्त्रित हैं।

अग्रोया और कडेल – 

मैढ क्षत्रिय जाती मे कडेल गोत्र के सदस्य बहुसंख्य है बडवों (बहीभाटों) द्वारा पता चला है की तुंवर वंश के राजा शालिवाहन अनंगपाल के पुत्र विरहपाल के पुत्र भोज हुए । भोज को दो पुत्र हुए भावडाजी और वीरुजी । भावडाजी के वंशज अग्रोहा (जिला हिसार – हरीयाणा) मे देहली से आकर बसे, उनकी खांप का नाम उक्त ग्राम अग्रोहा के नाम पर अग्रोया पडा । इसलिए कडेल व अग्रोया, भावडाजी व वीरुजी की संतान होने के कारण भाई भाई है ।
वीरुजी के पुत्र किलणणी से कडेल खांप चली, यह परीवार बहुत बढा , अब समस्त भारत मे मैढ क्षत्रिय जाती मे कडेलों का बाहुल्य है । इन्होने अजमेर के निकट कडेल ग्राम बसाया, लेकीन अब वहां सारडीवाल गौत्र के मैढ बंधु है । मारवाड मे मुण्डवे के पास कडलाणी ग्राम है और मुण्डवे मे कडेलों का ही बाहुल्य है । मारवाड मुण्डवे के कडेल बंधु कहते है की कडलाणी ही कडेलों का उदगम स्थान है ।

कुल्थिया – 

लगभग 750 वर्ष पुर्व कोल्हपुर पाटण के राजा अणहन्तराम सांखला हुए, उनकी पांचवी पिढी मे कुल्थवाहन राजा हुए जिनकी सन्तान कुल्थिया कहलाई, नवाबी के समय यह लोग फतहपुर ( सीकर सेखावाटी ) मे बारुद बनाने का कार्य करता थे, करलाडी के ठाकुर के पास भी कुल्थिया खांप के व्यक्ति रहे वहाँ  भी वे बारुद बनाने का कार्य करते  थे 6 मे से 3 भाई रतनगढ, एक मण्डाणा,एक नोहर व एक सुजानगढ गये । लगभग 470 वर्ष पुर्व सुजानगढ वालों ने स्वर्णकारी का काम सीखा, जो भाई सुजानगढ गये उनका नाम कोटणसी था ।

जांगलवा – 

इनका निकास स्थान जांगलु बताया गया है, जांगलुदेश (बिकानेर) मे पंवारो का राज्य था. उसी पंवार वंश के सांखला शाखा ने जांगलु (बिकानेर) के नाम पर जांगलवा खांप बनी, कुल्थिया भी इसी परिवार की एक खांप है ।

जौडा –

इस खांप के दो नख है एक चौहान , दुसरा सोलंकी, मामा चौहान था और भांजा सोलंकी, चौहानो की कुलदावी चामुंडा और राजधानी सांभर थी, सोलंकीयों की माता ब्राम्हणी और राजधानी नानोर थी, अब चौहान जौडा और सोलंकी जौडा दोनो खांपो का एक नाम होने के कारण नखभेद भुलाकर एक खांप के रुप मे है । जौडो और जवडा एक ही है ।

तुहणगर – तुणगर – 

राजस्थान के करौली जिल्हे मे त्योहनगढ है उसी ग्राम के नाम पर त्योहनगढीया, त्योहनगर, तुणगर, कहलाए इस खांप के व्यक्ति त्योहनगढ से चलकर मांडुगढ बैराड होते हुए डेरा बसे, इस परीवार मे रतनजी डांवर की पुत्री नाली ब्याही थी जो अपने पती के स्वर्गवास हो जाने पर पाली (मारवाड) मे सती हो गई, अत: इनकी सती नाली, पाली मे पुजा जाती है और इनकी देवी चामुण्डा जो डॉंवरो की भी देवी है खण्डेले मे है ।< डॉँवर – मोयल वंशीय राजा माधवदानजी छापर चुरु (राजस्थान) के राजा थे, उनके पुत्रों ने सोने चांदी का काम सीखा, उनमे से छमरजी से छमा, छाजडजी से छपरडा, छापुजी से छपरवाल, छायडजी से छायरा, और छाहरना धर्मसी से धुपड और सबसे छोटे पुत्र डांवाजी से डॉंवर खांप चली । डावाजी छापर से खण्डेला मे बसे । खण्डेले मे डांवाजी के स्वाभिमानी पौत्र रामसिंहजी ने खण्डेले के राजा द्वारा अपनी माता को कहे गए अपशब्द सुनकर उस राजा का वध कर दिया और फिर अपनी सुरक्षा के लिए खण्डेला छोडकर रातों रात अपने परीवार सहीत बख्तावरपुरा (इस्लामपुर के निकट ग्राम मे ) जा बसे, जब खण्डेले पे नवाब ने चढाई की तब खण्डेले के युवराज ने श्री रामसिंहजी का पता लगाकर उनसे सहायता  मांगी, श्री रामसिंहजी ने अपने नौ पुत्रौं को खण्डेले के रक्षार्थ युध्द मे भेज दिये । युध्द समाप्ती पर वे खण्डेले से विदा लेकर पृथक पृथक स्थानों पर चले गये । कोइ इस्लामपुर (बगड रतन शहर ) कोई उदयपुर (चिराणा) कोई गुढा (महेन्द्र गढ) कोई खंडार मुन्दुयाड, गोआ (जि. नागौर ) आदी स्थानो पर गये । इस्लामपुर जानेवाले का परीवार फतहपुर (सीकर) और राजस्थान मारवाड मे भी खुब फला फुला, बादशाहपुर जानेवाले का परीवार भी बहुत बढा ।

सोनालिया (सोंधालिया) –

इनके पुरखों का नाम संधुजी था, उन्हों के नाम पर इस खांप का नाम सोंधालिया पडा, अब यह लोग अपने आप को सोनालिया भी कहते है । इनका निकास सांभर, वंश चौहान, देवी जीणमाता है . पिलानी और मण्डरेले मे इनके बहुत घर है ।

नारनौली – 

महाराजा अर्नगपाल सन 1186 से पहिले अपने दोहीते पृथ्वीराज चौहान (अजमेर) को राज काज सौंप कर तीर्थ यात्रा को गए, वापीस लौटने पर पृथ्वीराज ने अपने नाना को अपना राज नही संभालने दिया, फलत: वे पृथ्वीराज से दु:खी होकर अपने पुरोहीत के पास तोरा वाटो (जयपुर) गये फिर उन्होने पाटन (जिल्ह झालरा पाटन) पर शासन किया, उनके पुत्रों में से अनेको ने वहा स्वर्णकार्य सिखा, सुगन्ध नाम के उनके वंशज ने नारनोल मे निवास किया तब उनकी संतान नारनौली कहलाई, नारनौली खांपवाले अपने पुर्वज सुगन्ध के नाम पर अपने को सुगन्ध भी बतलाते है । इस खांप की पुत्र वधु मक्खनलालजी की पत्नी सावित्री खलबल्या कोटडी मे सती हुई ।

मौसुण –

जायल ( मारवाड) मे खींची राजपुतों का बाहुल्य था इस परीवार में गींदाजी नामक प्ररखा हुआ जिसके बारह पुत्रों ने पृथक – पृथक व्यवसाय अपनाये इनकी खांप मौसुण, मसावन, मसौन, व मसाण कहलाती है । इस खांप का पितृ श्रीधर पुरोहीत खांदल्या, डाढी मोडा, तथा ग्राम खाचरजी बावडी (जायल मारवाड ) है ।

बेनाथिया –

इनके पुर्वज भी जायल के ही खींची राज घराने के है, इनकी देवी मुरटासीण ( आसापुरा ) अग्नीवंश खींची चौहान है, प्रथम ग्राम जायल (नागौर) राजस्थान है । वहां वहां से संवत 1200 के पुर्व (पृथ्वीराज चौहान के शासन काल मे ) अजमेर आये , फिर ये अजमेर से मांडल, मांडल से कुसिथल गये, 1462 मे कुसिथल मे श्रवणजी बेनाथिया की पत्नी वीरांबाई मिरीण्डीया कुसिथल मे सती हुयी वहां आज भी सती की समाधी है । और उसी कुसीथल के निकट सुग्रीव ग्राम मे बेनाथियों के घर है । उसके पश्चात 1699 में केवलरामजी पुन: अजमेर आकर बस गये । बेनाथियों के अनेक परीवार अजमेर, माण्डल, उदयपुर, नाथद्वारा, चिताम्बा, प्रतापगढ, टोंक, टोडा, मुम्बई, इन्दोर, कोटा, बुंदी आदी स्थानोंपर है । इनके पुर्वज बिना हथियार (बना हथियार) से भी महान युध्द किये इसी कारण इनकी खांप बेनाथिया, बनाथिया, बिनाथिया हुई ।

सोलिवाल

राजा मलैसी कछवाहें के वंशजो ने भिन्न भिन्न काम करके उनमे रतनाजी के रंगलीजी ने सोने, चांदी का काम सिखा उनकी सन्तान सोलिवाल कहलाई । इनके परीवार मे एक बहु अजमेर मे सती हुयी, जिसकी समाधी आज भी अजमेर है ।

आगेचाल – 

ये चावल नख के है इनका निकास कोट करोड नामक उजडे हुए खेडे का है जो भिवानी के पास है ।
ढल्ला – ढल्ला, ढाबरवाल, ढोया, ढोलणा एक ही वंश जोइया क्षत्री नख के है। मारवाड जिला नागौर के भकरी ग्राम मे भी ढल्लों के कई परीवार है । पंजाब, हरीयाणा व दिल्ली में भी ढल्लों के अनेक परीवार है ।

महायछ – 

यह खांप भी कोट मरोड से निकली है, वैसे मारवाड व हाडोती मे और पंजाब, हरीयाणा, देहली में भी महायछ खांप वालों के परीवार है ।
स्वर्णकारों के गोत्र यह प्रमाणित करते हैं कि वे अमुक ऋषि के वंशज हैं और नुखें यह घोषित करती हैं कि अमुकस्थान, अमुक राजवंश गुरू या पुरोहित से सम्बद्धता है।
याने गोत्र वंश का सूचक है और नुख विशेष पहचान की|

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सभी जैन कुलदेवियों की सूची:Jain kuldevi

Dr.Dayaram Aalok Shamgarh donates sement benches to Hindu temples and Mukti Dham 



सभी जैन कुलदेवियों की सूची
लगभग समस्त जैन गोत्रो की कुलदेवियाँ होती है,यहां तक कि दिगम्बर जैनियो की कुलदेवियाँ होती है,पर जैन साधुओ द्वारा फैलाई गई विकृतियों के कारण वर्तमान पीढियां इस महत्वपूर्ण ज्ञान से वंचित हो गयी है,यहां तक कि इन धर्म गुरुओं के कारण जैनियो ने कुल गुरु(अपने वंश के कुलगुरुओ) को भी भुला दिया,जिसकी वजह से किसी2 परिवार में जीवनभर संघर्ष व कष्ट, और कहीं 2 युवा सदस्यों की अकाल मौतों को भी झेलना पड़ रहा है।
जैन गोत्रो की संख्या 3500 से भी अधिक बताई जाती है,जिनकी कुलदेवियों के विवरण उपलब्ध नही हो पा रहे है।संकलन भी बहुत दुष्कर कार्य है।
3500 में से 498 तो मूल ओसवाल जैनियो के है,जो राजस्थानी क्षत्रिय को जैन पंथ में दीक्षित कर जैन बनाया गया था।
*क्या करे*-
सबसे पहले अपनी सही कुलदेवी की खोज करे, इसके लिए आपके गोत्र/कुल/वंश के कुलगुरु जिन्हें भाट जी भी बोलते है,उनकी खोज करे, उनसे समस्त प्रकार की जानकारी,परंपरा आदि का ज्ञान हो जाएगा।उन्ही से स्थापना विधि,पूजा विधि भी मिल जाएगी।
यहां काफी कुलदेवियों की सूची जानकारी के लिए दी जा रही है,हालांकि ये सूची भी पूर्ण नही है।
1-श्री सच्चियाय माता
2-श्री अर्बुदा देवी या अधरदेवी
3-श्री अम्बा देवी या अम्बा जी
4-श्री आशापुरा देवी
5-श्री नागणेशी देवी
6-श्री सुसवाणी देवी
7-श्री बीस हत्थ देवी
8-श्री सुंधा देवी
9-श्री खीमज देवी
10-श्री बड़वासन देवी
11-श्री हिंगलाज देवी
12-श्री लोदर देवी
13-श्री भुवाल देवी
14-श्री लेकेक्षण देवी
15-श्री भवानी देवी
16-श्री बाणेश्वरी देवी
17-श्री केलपूज्य देवी
18-श्री झमकार देवी
19-श्री ब्रम्हाणी देवी
20-श्री नागदेवता व नागिन देवी
21-श्री रोहणी देवी
22-श्री बाण देवी
23-श्री गाजर देवी
24-श्री रुद्र देवी
25- श्री आशा देवी
26-श्री सुषमा देवी
27-श्री कुँवारीदेवी
28-श्री बीसल देवी
29-श्री मामरा देवी
30-श्री गंजेश्वरी देवी
31-श्री गोत्र देवी
32-श्री वाराही देवी
33-श्री काहनी देवी
34-श्री पदमावती देवी
35-श्री बाकलदेवी
36-श्री मुण्डारा देवी
37-श्री पाडल देवी
38-श्री पुनागर देवी
39-श्री पतंगा देवी
40-श्री जसवाय देवी
41-श्री चित्तोड़ी देवी
42-श्री मात्र देवी
43-श्री कुलेटी देवी
44-श्री शेषन देवी
45-श्री गाता देवी
46-श्री जीण चामुंडा देवी
47-श्री वीरवाडा देवी
48-श्री जमवाय देवी
49-श्री प्रेमीदेवी
50-श्री नारायण देवी
51-श्री सेढल देवी
52-श्री मोदरा देवी
53-श्री धना देवी
54-श्री नागोरी देवी
55-श्री निम्बज देवी
56-श्री डिडवाना देवी
57-श्री कंठन देवी
58-श्री डिदेसी देवी
59-श्री ललेची देवी
60-श्री चामुंडा देवी
61-श्री जीण देवी
62-श्री घुमडा चामुंडा या घुमडा देवी
63-श्री मादाजुन देवी
64-श्री खंडवा देवी
65-श्री कालन देवी
66-श्री मम्बा देवी
67-श्री शंखेश्वरी देवी
68-श्री किंचरिया देवी
69-श्री चौदरा देवी
70-श्री वारेसरी देवी
71-श्री साचौरी देवी
72-श्री मोदरा देवी
73-श्री सेतरावा दादी माँ
74-श्री करणी देवी
75- श्री माजी सा
76 - श्री जागरूप देवी (सती ),(ग्राम-सकोसाना,राजस्थान)
उक्त सभी देवियां विविध जैन गोत्रो की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित है। 


12.1.20

ओसवाल समाज की कुलदेवी-लिस्ट:Oswal samaj ki kuldevi




 
 जाति इतिहास लेखक डॉ.दयाराम आलोक की मान्यता है कि
कुलदेवी किसी कुल विशेष की ऐसी आराध्य देवी है, जो उसकी पहचान कराने वाली एक सांस्कृतिक इकाई है। कुल में कुल की देवी माता का विशेष महत्व होता है। सभी जातियों में हर कुल की अलग-अलग एक देवी होती है, जिसे कुलदेवी कहते हैं। कुल के पारिवारिक कार्यों उत्सवों एवं विविध संस्कारों शिशु के जन्म, मुण्डन, उपनयन, विवाह आदि के अवसर पर कुलदेवी का पूजन-अर्चन अनिवार्य रूप से किया जाता है। कुलदेवी की आराधना से उस कुल के वंशजों के घर में सुख, शान्ति व समृद्धि आती है। सभी तरह के विघ्नों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। कुल देवी के अशीर्वाद से वंश की वृद्धि होती है। आदि शक्ति स्वरूपा मां एक है पर उसके विविध रूप है और वह आदि शक्ति विविध रूपों में पूजित है। कुलदेवी के रूप में पौराणिक व स्थानीय लोक देवियों को विविध कुलों में कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। विविध क्षत्रिय राजवंशों की प्रमुख कुलदेवियां भी विभिन्न वर्गों में कुल देवी के रूप में स्वीकार्य की गयी हैं। प्रसन्नता की बात है कि तेजसिंह तरुण ने प्रस्तुत पुस्तक में ओसवाल गोत्र की कुलदेवियों के सम्बन्ध में जो जानकारी उपलब्ध करायी है वह ओसवाल गोत्र के लोगों के लिए निस्संदेह उपयोगी सिद्ध होगी और वे इससे अवश्य लाभान्वित होंगे।
ओसवाल समाज का प्राचीन नाम उपकेश है। उपकेश वंश के लिए उकेश व उएश शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। इनके स्थान का नाम उकेश था जो वर्तमान में ओसियां कहलाता है। ओसियां में रहने वाला जैन समाज ओसवाल कहलाता है।
भारतीय संस्कृति व समाज में कुलदेवी का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक समाज गोत्र के अनुसार अपनी कुलदेवी की पूजा व आराधना करता है। ओसवाल समाज में प्रारम्भ में 18 गोत्रों का निर्माण हुआ था। ये गोत्र इस प्रकार हैं
1. तातेड़, 2. बाफणा, 3. कर्नाट, 4. बलहारा, 5. मोराक्ष, 6. आईचनाक, 7. भूरी, 8. भटेवड़ा, 9. भादर, 10. कुलहट, 11. बिरहट, 12. संचेती, 13. श्रीश्रीमाल, 14. चींचट, 15. कूमट, 16. डीडू, 17. श्रेष्टी, 18. लघुश्रेष्टि आदि .ओसवाल समाज के उदय से अब तक कई गोत्रों का निर्माण हो चुका है। ओसवाल समाज के इन विभिन्न गोत्रों व उनकी कुलदेवियों का विवरण निम्नलिखित है। यदि इस लिस्ट में किसी गोत्र व कुलदेवी का नाम छूट गया हो तो कृपया कमेंट करके जानकारी दें –
हो तो कृपया कमेंट करके जानकारी दें –

ओसवाल समाज की निम्न गोत्र की 

कुलदेवी: अधर माता 

अरणोदा, अलंजडा, अलावत, अहकासा, आलावात, उपट, कक्का, कपासिया, करणिया, करणाणी, कायेल, काला परमार, कावा, कूंकड़, केनिया, केलण, कोकलिया, खीर, खुरदा, गडिय़ा, गपालिया, गांग, गादवाना, गांधी सहस्रगुणा, गिडिया, गेढवाड़, गोड, गोडवाल, गोडवालिया, गोडी, गोप, गोसलिया, गंग, गांगरिया, घुरिया, चापड़, चोभावत, चौहाणा, चौधानी, छाहड़, जपाला, जागा, झोडोलिया, टोगिया, टोडरवाल, डीडू, डोड, डांगी, थरावट, दरड़ा, दुगसा, दुगविया, दुधेडिय़ा, दुधोडिय़ा, देवानंद साका, देशलाणी, धाधु, धारिया वलाह,धुरिया, नपाणी, निवणिया, निवेणिया, पटवा गांग, परमार, पालावत, पूर्ण,बंब, बरड़, बरडिय़ा, बड़दिया, बड़ोदिया, बलदोटा, बाबेल, बीजल, बिसलाणी, बुरड़, बौरड़, बांभी, भड़, भाटिया, भाटी, भावराणी, भूवाणी, मरड़ोचा, मरूथलिया, मालदे, मुलाणी, मोहिवाल, मोनानी, वरदिया, वीजल, विरावत, सहस्त्रगुणा, सुघड़ा, हरिगा, हिराणी।

kuldevi अम्बा माता -upasak gotra-

 अजमेरा, अथगोता, अम्बागोत्र अम्बिका, आच्छा (बागरेेचा), उदेश, ऊपरगोठा,कछीनागड़ा, कडक़, कड़बड़ा, कबदी, कावेडिय़ा, कूकड़सांड, कोठिया, कोरा, खांपडिय़ा, खाबडिया, खारा, खारिवाल, गोतम गोता, गोपाल गोता, घरवेला, जागरवाल, जालोरा बागरेचा, जिरावला, जोगड़ेचा, जोधावत, सालेचा, झामड़, झावड़, टड्डा, ठाकुर, डागलिया, डोसी, ढड्ढा, ढेढिया, तिलोरा, तेलहरा, ददा, दट्टा, दातीवाडिय़ा, दिखल, दोषी, धरकट, धर्म, धोखा, नागदार सोलंक, नागसेठिया, नागौतरा, नाणगोता, निवाणी, नेनगोता, पामेचा, पाटणिया सालेचा, पिथलिया डोसी, पूनमिया सालेचा, पोलावट, पंचलोढा, फितुरिया, बग, बनावत, बडेरा, बागड़ेचा, बालुकिया, मांडोत, लुक्कड़, लुकद, सियाल, सबिया, संचेती, सालेचा, साव, सियाल सांड, सिरोहिया, सुभद्रा, सोनाड़ा, सोनी बागरेचा, सोलंकी लुंकड़, संघी बागरेचा, संघी मेहता, सांड, सालेचा, सुडाला, हरखावत पामेचा, हंस, श्रीपति।

कुलदेवी नागणेची माता  के अंतर्गत आने वाली गोत्र 

ईशपगोत्र
ऊहावता
ओटावत
खोखड़
गोगादे
गोलिया 
घाघरिया
घुलुंडिया
घियानछत्र
घिया गलुंडिया
घेमावत
घोघल
जोधा
धवेचा
धोधड़
नसोलिया नक्षत्र
पुष्करणा
मोहनोत
राठौड़
राणावत
रातड़िया
संघोई
हथुंडिया
हथुंडिया राठौड़ 

माता आशापूरा -उपासक   गोत्र 


अग्नीगोत्र, अरडक़, अलमेची, आईडी, आंचलिया, आपागोत, आयट, आबेड़ा,आशद, आशापुरा, ईसरा, कछोल, कटारिया, कणीवत, कपूर, कमाणी,कमेडिया, कयाणी, करणा, कवाड़, कागोत, कांठेड, काठेलवाल, कावलेचा, काशरिया, कूदणेचा, कूलामोर, कूकल, कूकूरोल कवाड़, कुवाडिया, कोंच, कोटेचा, कोंद, खखड़, खड़बड़, खटबड़, खटोल, खटोर, खाटेड, खांटोड, खाबिया, खुटोल, खेतलाणी, खेतसी दुग्गड़, गांधीराय, गांधी मेहता, गुजराणी, गेलड़ा, गोगड़ पीपाड़ा, गोंद, गोदा, गोरवाल, चहुआण, चंडालिया लूंगा, चापरवाल, चालूका, चिरडकिया,चीपा, चौहान, चौवडिय़ा, चिंप, छाजोड़, छावड़ा, जैसलमेरिया, जिन्नाणी, जिलाणी, टापडिय़ा, टिमरेचा, डफरिया, डागा, डीया, डोडियालेचा, ताला, तालेरा, तालेड़ा, तुला, तुंड, दुग्गड़, दुदचैना, देवड़ा, नारायण गौत्र, नाहटा कटारिया, पारखविंद, पावेचा कटारिया, पूजाणी, फलौदिया तुंड, बलिया, बलाहा, बाबेल, बाबेला, बालौत, बीहल, बेडा, बोलिया, बोकड़िया, भटावीर, भलभला, भालडिय़ा, भाभु, राजाणी, रामसेण, रायभंडारी, रिहड़, लेरखा, वागेटा, संकलेचा, संकवाल, सफला, सांचा संगी, सांचौरा, सामरिया, सुखलेचा, सुखाणी, सुगड़, सुगड़ा,, सेमरा, सोनगरा, संडासिया, सांडिया, सापद्राह, हरसोरा, हाडा कटारिया, हाला खंडी।

कुलदेवी बाण माता के अंतर्गत आने वाली गोत्र 

एणिया
कपोल
काकोल
काजोत
केलवा
खेतसी
नीसर
गहलोत
गुगलिया
गेलतर
गौत्तम
गोदारा
गोराणा
टिबानी
तिवड़किया
निसक
पीपाणा



कुलदेवी सच्चियाय माता के उपासकों की गोत्र 

सच्चियाय (संचाय) माता (Sachchiyay Mata) अछूणता-अघूणता,अटकलिया,अनबिंध (पारख), अब्बाणी, अभ्राणी, अरडक सोनी, आईचियाण, आकतरा, आच्छा (कर्णावट), आडेचा, आदित्यनाग, आभड़, आमड, आर्य, आववाडिया, आसाणी, इडलिया, इरोढा, इलदिया, इसराणी, ऊजोत, ऊएश, ऊकेश, ऊडक़ भूरि, उदेचा, उदावत, उणावत,
उधावत, ओस्तवाल, ओसवाला।
ककड़, ककोल, कजारा, कटारा, कर्पदशाखा, कठोतिया, कठोरिया, कान्यकुब्ज, कनौजिया, ककरेचा, कपूरिया, कमटिया, कर्पद, करचू, कर्णी, कर्णाट, करणोत, कर्णावट, करमोत, करवा, करेलिया, कलटोदी, कटरोही, काला, कवाडिय़ा, कस्तुरिया, काकेचा, कागड़ा, कागला, कांच, काजलिया, काजाणी, काटी, कातरेला, कानूंगा-भटनेरा, कापूरित, कावरिया, काविया, काम, कामसा, कामाणी, काला, कावडिय़ा, कावसा, काश्यप, कात्ररैला, कांकरिया, कांकरेचा, कागलोत, कांगसिया, कांच, किलोल, किस्तुरिया, कूकड़ (चौपड़ा), कूकम, कुचेरिया, कुंडिया, कूपावत, कूबडिय़ा, कूबडिय़ा आमड़, कूबडिय़ा बाफना, कूबेरिया,कूमट, कूमकूम, कुरकुचिया, कूरा, कूलधर, कूलधरा, कूलहट, कुशलोत, कूहाड़, कूकड़सांड, कूकड़ा, कूकूरोलचौपड़ा, कुंपावत, कुमटिया, केकडिय़ा, केदार, केदारा,केलाणी, केशरिया, केशरिया सामसुखा, कोकड़ा, कोटडिय़ा, कोटी, कोटीचा, कोटरिया, कोस्टागार, कोणेजा, कोनेरा, कोलोरा,कोसिया।
खरभंडारी, खजांची श्री श्रीमाल, खजांची चोराडिय़ा, खजांची लघुश्रेष्ठी, खंडेलवाल, खंडिया, खपाटिया, खरभंडारी, खारड़, खालिया, खेड़वाड़, खींचा, खीलोला, खुमणिया, खुमाणा, खेतपालिया, खोखरा, खोका, खोड़वाड़, खोडिया, खोडीवाल, खोना, खोपर।
गज्जा, गज्जा पटवा, गटाघट, गटिया, गड़वाणी, गणधर चौपड़ा, गणधर गांधी, गड़वाली, गरूड़, गलाणी, गलूंडिया, गसणिया, गहियाला, गागा, गादिया, गांधी संचेती, गांधी दुदिया, गांधी श्रेष्ठी, गांधी बाफना, गिंगा, गुजराणी नागड़ा, गुगलिया चोरडिय़ा, गुगलेचा, गुलगुलिया, गुडक़ा, गुणिया, गुमलेचा, गुंदिया, गहलोत, गोखरू, गोगड़भद्र, गोरीवाल, गोरेचा, गोलेछा, गोसलाणी, घरघटा, घीया गुगलिया, घुणिया, घेवरिया,
घोगड़, घोड़ावत, घंटेलिया।
चगलाणी, चतर, चतुर, चतुर मूथा, चन्द्रावत ,चपलोत, चमकिया, चम्म, चरड़, चवला, चवहेरा, चंद्रावत, चंडालेचा, चंदावत, चित्तोड़ा, चित्तोड़ा बलाह, चित्तोड़ा श्रेष्ठी, चित्तौड़ा गोलछा, चित्तौड़ा लघुश्रेष्ठी, चिंचट, चिचड़ा, चितोडिय़ा, चिपड़, चुंगा, चैनावत, चोखा, चौपड़ा कंकुं, चौपड़ा गणधर, चोमोला, चोरडिय़ा, चोरवाडिय़ा, चोरबेडिय़ा, चौववहेरा, चौमोला, चौसरिया, चौधरी तातेड़, चौधरी बाफना, चौधरी बलाह, चौधरी मोरख, चौधरी कुलहट, चौधरी वीरहट, चौधरी भूरी, चौधरी संचेती, चौधरी गुलेछा, चौधरी श्रेष्ठी,
चौधरी भद्र, चिंपड़।
छाछा, छाडौत, छगलाणी, छजलाणी, छजलाणी, छतीसा, छलाणी, छतरिया, छरिया, छाड़ोत, छालिया, छावत, छोरिया, जगावत, जडिय़ा, जमघोटा, जलघड़, जस्साणी, जागड़ा, जाटा, जाडेचा, जबक, जालोत, जालोरा कन्नोजिया, जालोरी कुलहट, जावलिया चौपड़ा, जिंद, जिंदल, जिनोत, जिमणिया भटनेेंरा,
जिमणिया चौरडिय़ा, जूनीवाल, जेनावत, जोखेला, जोगड़, जोटा, जोधावत श्रेष्ठी, जोहरी चोरडिय़ा, जोगड़ बाफना, जोगड़ा सिंघी, झाबक, झाटा।
टाटिया बाफना, टाटिया धारीवाल, टिकायत, टिकोरा, टोडियानी, टगा, टाकलिया, टांक, टिवाणी, टिहुयाण, डूंगराणी, ढाकलिया, ढाबरिया, ढेलडिया।
तप्तभट्ट, तरवेचा, तल्लाणी, तलोवड़ा,ताकलिया, तातेड़, तातहड़, तारावल, तुंड, तुलाहा, तुहियाण, तेजाणी संचेती, तेजाणी पारख, तोलिया, तोसटिया, तोडिय़ानी, तोलावत, तोलरिया, तोडिय़ान, तुलावत, थनावट, थम्बोरा, थामरेचा, थुला, दक, दफतरी-चोरडिय़ा, दफतरी बाफना, दस्सानी, दसोरा, दाखा, दातारा, दादलिया, दानेसरा,दालिया, दुद्धाणी, दुधिया, देदाणी, देपारा, देलणिया, देवराजोत, देवसयाणी,
देसरला, देशलहरा, दोलताणी, दोसाखा, धतुरिया, धनन्तरी, धंदाणी, धनेचा, धाकड़, धारीवाल, धातुरिया, धाधलिया, धानेवा, धाया, धापिया, धारिया, विरहट, धारोडिय़ा, धारोला, धावड़ा, धीरौत, धुगोता, धुपिया, धांधल।
नखरा, नंनक, नरसिंगा, नक्षत्रगोत्रा, नागडोला, नागड़ा, नागड़ा तातेड़, नागड़ा गुलेछा, नागर, नागौरी कुम्भट, नागौरी चोरडिय़ा, नागौरी श्रेष्ठी, नाचाणी, नाणीश, नाथावत, नानघाणी, नानेचा, नापड़ा, नामाणी, नार, नारेलिया, नावटा, नाबरिया, नावसरा, नाहटा बाफना, नाहरलाणी, निबोलिया, निलडिय़ा, निवाटा, निशानिया, नेरा, नोपता विरहट, नोपता गदेहिया, नोपोला, नांदेशा।
पंचाणीस, पंचवया, पंचीसा, पछोलिया, पटलिया, पटवा, बाफना, पटवा श्रेष्ठी, पटवा लघुश्रेष्ठी, पटवा कनौजिया, पटवा धारीवाल, पटवा गजा, पटवा वढेर, पटवारी, पटौत, पारडिय़ा, पहाडिय़ा, पाटणिया, पातावत, पानगडिया, पानौत, पारख अणविद, पालखिया, पाखा, पालगौता, पालकिया, पालावत, पाटणिया चोरडिय़ा, पाटणिया भद्र, पालणेचा, पाटोलिया, पाटौत, पारणिया, पालडिय़ा, पालणिया, पालणी, पालेचा, पिथलिया चौरडिय़ा, पुकारा, पुंगलिया, पुजारा, पूनमिया वीरहट, पूनोत गोधरा, पूरणिया, पैथाड़ी, पैपसरा, पैतिसा, पोखरणा, पौपाणी, पौपावत, पोलडिय़ा, पोसालिया, पंचविशा, पांचौरा, पांचौली, पंसारी,
पांचावत, पांडुगोता, फौफलिया, फूलगरा, बाघचार, बडज़ात्या, बपनाग, बड़बड़ा, बड़भट्टा, बच्छावत, वनावल, बनावत, बलवरा, बलिया, बलाई, बलोटा, बहुल, बहुफना, बाकुलिया, बांका, बागडिय़ा बाखेटा, बाखोटा, बाघमार, बाघ, बातोकड़ा, बादलिया, बादौला, बायना, बाफना, बापावत, बालड़ा, बाला, बालोटा, बालिया, बालौत, बाबरिया, बाहतिया, बिनायकिया, विषपहरा, बीजाणी, बीजोत, बुच्चा, बुच्चाणी, बूबकिया, बैगलिया, बैताला ,बैद, बैदमेहता, बौक, बोकडिय़ा, बौराना, बांदोलिया।
भक्कड़, भडग़तिया, भटारखिया, भटनेरा, भटनेरा चौधरी, भटेवरा, भद्र, भमराणी, भलगट, भलमेचा, भलल, भाद्रगोता, भानावत, भाभू पारख, भाभू बाफना, भाला, भावड़ा, भावसरा, भिन्नमाला कर्णावट, भिन्नमाला श्री श्रीमाल, भिणटिया, भिमावट, भुवाता, भूरंट, भूराश्रेष्ठी, भूरी, भूषण, भूरट, भूतिया, भूतेड़ा, भोजाणी, भोजावत, भोपावत, भोपाला, भंडलिया, भंडारा, भंडारी डीडू, भांडावत भद्र, भूगरवाल, मक्कड़, मखेलवाल, मखाणा, मकाणा, मगदिया, मच्छा, मणियार, मन्नी, मंदिरवाला, ममहिया, मरडिय़ा, मलेचा, मखाणी, मल्ल, मरुवा, मरोथिया, मसाडिय़ा कुल्हट, मसाणिया चोरडिय़ा, महतियाण, महाजन, महाजनिया, महिवाल, माडलिया, मांडोत, मादरेचा, मारू, मालखा, मालकस, मालतिया, माला, मालावत,
मालौत, माहलाणी, मीठा, मीणीयार, मीनाग्राह,मीनारा, मीठडिय़ा बाफना, मीठडिय़ा सोनी, मुकिम, मुगड़ी, मुमडिय़ा, मुर्गीपाल, मुर्दिया, मुसलिया, मेघाणी, मेड़तिया, मेहजावत, मोतिया विरहट, मोतिया संचेती, मोदी गणधर, मौरख, मोरचिया, मौराक्ष, मौल्लाणी, मंडोवरा, मंत्री, मांडलेचा मुगडिय़ा।
यौद्धा बाफना, यौद्धा डीडू, रणजीत, रणछोड़, रणधीरा बाफना, रणधीरा श्रेष्ठी, रणधीरोत, रणसोत, रणशौभा, रत्ताणी, रतनपुत्र, रतनपुरा बुच्चा, रतनसुरा, राक्यान, राकावाल, राखडिय़ा, राठी, राडा, राज बोहरा, राज कोष्ठागार, राज सदा, राजौत, राणौत, रामपुरिया, रामाणी, रायजादा, राय सोनी, राय चौरडिय़ा, राय तातेड़, राय सच्ची, रावत, रिहड़, रिकब, रूणवाल, रूपावत, रूपछरा, रूह, रेड़, रांका, लखावत, लघु कम्भट, लघु खंडेलवाल, लघु चमकिया, लघु चिंचट, लघु चुंगा, लघु नाहटा, लघु चौधरी, लघु पारख, लघु पोकरणा, लघु भूरट, लघु रांका, लघु राठी, लघु समदडिय़ा, लघु संचेती, लघु सुखा, लघु सोढ़ती, लघु संचेती, लघु हिंगण, लघु श्रेष्ठी, लहरिया, लाखाणी, लाडवा, लाडलखा, लाभाणी, लालन, लाला, लालौत, लाहौरा, लिंगा, लुटंकण, लुणा, लुणावत गधैया, लुणेचा, लेहरिया, लोकड़ी, वसहा वडेर, वद्र्धमान, वलाह, वर्षाणी, विद्याधर, विरहट, वितरागा, वैद्य, वैद्य गांधी, वैद्य मेहता।
शाह बोथरा, शुरुलिया, शिगाल, शूरमा, शूरवा, सेठ, सिसोदिया, संकवालेचा, श्रृंखला, सेखाणी, सगरावत, संचौपा, सदावत, सदाणी, सम्भूआता, सरा, सराफ चोरडिय़ा, सराफ नाबरिया, सलघणा, सहजाणी, सहलोत चौरडिय़ा, सहलोत बाफणा, साखेचा, साघाणी, साढा, साढेराव, सादावत, सानी,सामड़ा, समुरिया, सारूलिया, सालीपुरा, सावा, सावनसुखा, सामसुखा, सावरिया, साहिब गोता, साहिला, सिखरिया, सिंघी भूरी, सिंघी डीडू, सिंघी लघुश्रेष्ठी, सिंघी भद्र, सिंघूड़ा, सिपाणी, सिलरेचा, सुखिया, सुचली, सुधा, सुधेचा, सुरती, सुरपुरिया, सुराणिया, सुसाणी, सुरिया, सुखा, सेठिया रांका, सेठिया वैद्य, सेणा, सेमलाणी, सेवदिया, सेजावत, सोजतवाल, सोजतिया, सोढ़ाणी, सोबारा, सोजावत, सोनी चोरडिय़ा, सोनी संचेती, सोनी श्री श्रीमाल, सोनी बाफना, सोनी घर, सोनेचा, सुमारिया, सोसलाणी, संघवी, सांभर, सांभरिया, सिंघड़, सिहावट, सिहावत, श्रवणी, श्राफ, श्रीधर, श्रेष्ठी, हरसोत, हरिया, हाकड़ा, हाकम, हागा, हाडा लघुश्रेष्ठी, हाडेरा, हिरणा, हिराणी, हीरावत, हुकमिया, हूना, हुब्बड़, हुल्ला,हंसा, हिंगड़, हिंडिया।



हिंगलाज माता (Hinglaj Mata) के उपासक- गोत्र 

अघोडिय़ा, कीरी, कोकूपोत्रा, गाला,गंगवाल, घंदे,छछा, छोगाला, जाड़ेचा, जेजटोटिया, ठीकरिया, डोडेचा, भाखरिया, भुगड़ी, महीपाल, पुनहानी, मेहर, लूंग, लूंगावत, राणोत।..

कुलदेवी लोदरमाता (Lodar Mata)-उपासक गोत्र  

आघडिण,आघरिया,कछवाह,कांधल,जडिया तेलवाणी,पावेचा राखेचा, बद्धाणी, भूरा भंसाली, भंसाली, भंसाली खड़, भंसाली राय, भंसाली ईसरा, राखेचा,राय भंसाली,सोलंकी,सोलंकी सेठिया।

कुलदेवी ब्रह्माणी माता (Brahmani Mata) -उपासक गोत्र 

आडवाणी,ओडाणी,करड़, करोलीवाल, कलसोणिया, कांदली, गुर्जरगोता, गुर्जर, गेवाल, नागरिक, बैंगाणी, लुणिया।


कुलदेवी खींवज माता (Khimaj Mata) -उपासक गोत्र-

तलेसरा, पगारिया, मेड़तवाल, कास्टिया, गिरिया, चिरपुरा, चूड़ावत।


कुलदेवी गाजर(रोहिणी)माता-उपासक गोत्र-

करल, गगोलिया, गुंदेचा, डाबड़ा, बागाणी।

कुलदेवी केलपूज माता -

बंड, बरमेचा, बांठिया, मलावत, मोदी बरमेचा, ललवाणी, हरखावत बाठिया

कुलदेवी बीसहत्थ माता-उपासक गोत्र 

 कोचर,कोचरमूथा,जालोरी कोचर,जिवाणी,रूपाणी।


लेकेक्षण (लीकासण) माता (Likasan Mata) 

खमेसरा,खींवसरा।

भवानी माता (Bhawani Mata) -upasak gotra 
नाहर।
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