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15.1.26

बंजारा की गाथा पुरानी, उत्पत्ति में छिपी कहानी। इतिहास के पन्नों पर उजियारा, परम्पराओं का अमूल्य सहारा


बंजारा मानवों का ऐसा समुदाय है जो एक ही स्थान पर बसकर जीवन-यापन करने के बजाय एक स्थान से दूसरे स्थान पर निरन्तर भ्रमनशील रहता है। इनकी संख्या 1901 ई. की भारतीय जनगणना में 7,65,861 थी। इनका व्यवसाय रेलवे के चलने से कम हो गया है और अब ये मिश्रित जाति हो गये हैं। ये लोग अपना जन्म सम्बन्ध उत्तर भारत के ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय वर्ण से जोड़ते हैं। दक्षिण में आज भी ये अपने प्राचीन विश्वासों एवं रिवाजों पर चलते देखे जाते हैं, जो द्रविड़वर्ग से मिलते-जुलते हैं।
बंजारों का धर्म जादूगरी है और ये गुरु को मानते हैं। इनका पुरोहित भगत कहलाता है। सभी बीमारियों का कारण इनमें भूत-प्रेत की बाधा, जादू-टोना आदि माना जाता है। इनके देवी-देवताओं की लम्बी तालिका में प्रथम स्थान मरियाई या महाकाली का है (मातृदेवी का विकराल रूप)। यह देवी भगत के शरीर में उतरती है और फिर वह चमत्कार दिखा सकता है। अन्य हैं- गुरु नानक, बालाजी या कृष्ण का
बालरूप, तुलजा भवानी (दक्षिण भारत की प्रसिद्ध तुलजापुर की भवानी माता), शिव भैया, सती, मिट्ठू भूकिया आदि।
मध्य भारत के बंजारों में एक विचित्र वृषपूजा का भी प्रचार है। इस जन्तु को 'हतादिया' (अवध्य) तथा बालाजी का सेवक मानकर पूजते हैं, क्योंकि बैलों का कारवाँ ही इनके व्यवसाय का मुख्य सहारा होता है। लाख-लाख बैलों की पीठ पर बोरियाँ लादकर चलने वाले 'लक्खी बंजारे' कहलाते थे। छत्तीसगढ़ के बंजारे 'बंजारा' देवी की पूजा करते हैं, जो इस जाति की मातृशक्ति की द्योतक हैं। सामान्यता ये लोग हिन्दुओं के सभी देवताओं की आराधना करते हैं। बंजारा जाति का इतिहास एक घुमंतू व्यापारी समुदाय का है, जो मूल रूप से राजस्थान से जुड़ा है और अनाज, नमक जैसे सामानों के व्यापार के लिए बैलगाड़ियों पर पूरे भारत में घूमते थे, इन्हें 'लक्खी बंजारे' भी कहा जाता था; इनका इतिहास वीरता, त्याग और बलिदान से भरा है, और इन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें मल्लुकी दास जैसी वीरांगनाएँ शामिल हैं, हालांकि ब्रिटिश काल में इन्हें आपराधिक जनजाति भी कहा गया, लेकिन ये आज भी अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा (गोर-बोली), और कला (कशिदाकारी) को सहेजने का प्रयास कर रहे हैं।
व्यापारिक योगदान:
ब्रिटिश काल से पहले, बंजारा लोग भारत की "लाइफलाइन" माने जाते थे। वे हजारों बैलों के काफिले (टांडा) के साथ नमक, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाते थे। मुगल काल और उससे पहले के युद्धों में सेनाओं को रसद (भोजन और सामान) पहुँचाने का मुख्य कार्य बंजारों द्वारा ही किया जाता था।उत्पत्ति और पहचान नाम: '
बंजारा' नाम फ़ारसी शब्द 'बेरिनजी अरिंद' (चावल के व्यापारी) और संस्कृत के 'बणिज' से आया है, जबकि 'लखमी' (लवणी) से 'लम्बाडी' नाम भी जुड़ा है, जो नमक ढोने से संबंधित है।
मूल:
यह समुदाय राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र से जुड़ा है और राजपूत वंश से अपना संबंध मानते हैं, हालांकि इनकी उत्पत्ति पौराणिक पात्रों से भी जोड़ी जाती है। बंजारा समुदाय मुख्यतः राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, और आंध्र प्रदेश में निवास करती है।
ऐतिहासिक भूमिका
व्यापार:
ये सदियों से अनाज, नमक, लकड़ी और अन्य आवश्यक वस्तुओं के प्रमुख व्यापारी थे, जो अपनी बैलगाड़ियों (कारवां) के माध्यम से व्यापार करते थे।
स्वतंत्रता संग्राम:
बंजारा समाज ने स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया; मल्लुकी दास जैसी महिलाओं ने लोगों को एकजुट किया और संघर्ष किया।
ब्रिटिश काल:
ब्रिटिश शासन ने इन्हें 'आपराधिक जनजाति' का दर्जा दिया, जिससे उनकी प्रतिष्ठा पर असर पड़ा, लेकिन स्वतंत्रता के बाद यह दर्जा खत्म कर दिया गया और इन्हें 'विमुक्त जनजाति' (Denotified Tribes) में शामिल किया गया।




सांस्कृतिक पहचान:
बंजारा अपनी विशिष्ट वेशभूषा, विशेषकर महिलाओं के रंगीन पारंपरिक कपड़ों और भारी गहनों के लिए प्रसिद्ध हैं।
प्रमुख परंपराएं और रीति-रिवाज:
भाषा और साहित्य:
गौर बोली बोलते हैं, जिसकी कोई लिपि नहीं है, इसलिए इतिहास गीतों और कहानियों के माध्यम से मौखिक रूप से प्रसारित होता है।
सामाजिक व्यवस्था:
टांडा: 
बंजारों के पारंपरिक निवास स्थान, जो उनके सामाजिक ढांचे की मूल इकाई हैं।
कुल-गोत्र: 
सनातन समाज के अन्य अंगों की तरह बंजारा समाज में भी कुल-गोत्र परंपरा पाई जाती है।
मुखिया: 
समुदाय का मुखिया (तांडा प्रमुख) और उसके निर्णय महत्वपूर्ण होते हैं, जिसमें पैतृक संपत्ति का बराबर बंटवारा होता है।
धार्मिक मान्यताएं:
प्रकृति पूजक, मातृदेवी (मां दुर्गा) और पितृ (पूर्वज) पूजक रहे हैं, और संत सेवालाल उनके पूजनीय संत हैं।
कला और संस्कृति:
कशीदाकारी (एम्ब्रॉयडरी): 
संदूर लम्बानी कढ़ाई विश्व प्रसिद्ध है और जीआई टैग प्राप्त है।
नृत्य: 
घूमर, अग्नि नृत्य और चरी नृत्य प्रमुख हैं, जिसमें ढोल और लोकगीतों पर नृत्य किया जाता है।
वेशभूषा: 
महिलाएं पारंपरिक रूप से रंगीन घाघरा, चोली और भारी गहने पहनती हैं, जो उनकी सुंदरता और कला का प्रतीक है।
विवाह और संस्कार:
पारंपरिक शादियां रस्मों, लोकगीतों और नाच-गाने से भरपूर होती हैं, जिसमें भांग और शराब का भी प्रचलन होता है।
सगाई (गुलपान) और विवाह के अपने विशिष्ट रीति-रिवाज हैं, जिसमें दुल्हन पक्ष को वधू मूल्य (bride price) देने की परंपरा भी थी, जो अब बदल रही है।
त्योहार:
दशहरा, दिवाली, होली मनाते हैं, और 8 अप्रैल को 'विश्व बंजारा दिवस' मनाते हैं।
वर्तमान स्थिति
आधुनिक परिवहन के कारण इनका पारंपरिक व्यवसाय कम हो गया, जिससे ये कृषि और अन्य व्यवसायों की ओर मुड़े। मध्यभारत के बनजारा समुदाय ने कुछ वर्षों से कंबल और अन्य वस्तुए बेचने का व्यवसाय अपना लिया है और पूरे भारत मे अपना व्यवसाय विस्तारित कर लिया है।
आज भी ये अपनी पहचान और संस्कृति को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं, और 8 अप्रैल को विश्व बंजारा दिवस मनाया जाता है।
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