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7.10.26
Jat History | जाटों की उत्पत्ति कैसे हुई? | Origin of Jats | Jat Ka Itihas
एक सवाल।
भारत में एक ऐसी कौम है, जिसे मुगल कभी हरा नहीं पाए।
अंग्रेजों ने जिसके किले को 'लोहागढ़' कहा, क्योंकि वो लोहा था, जीता नहीं जा सका।
वो कौम है - जाट।
लेकिन जाट कौन हैं?
क्या वो भारत के मूल निवासी हैं?
या वो 2000 साल पहले मध्य एशिया से आए हुए Scythian योद्धा हैं, जिन्हें इतिहास में शक कहा गया?
और एक किसान, हल चलाने वाला... वो राजा कैसे बन गया? भरतपुर जैसा अजेय राज्य कैसे बना दिया?
आज इस वीडियो में हम जाटों की उत्पत्ति का पूरा सच, दो हजार साल का इतिहास, डीएनए से लेकर दस्तावेजों तक, बिना किसी मिलावट के जानेंगे।
वीडियो को अंत तक देखना, क्योंकि आखिर में मैं बताऊंगा कि जाट, राजपूत, गुर्जर और अहीर का आपस में क्या खून का रिश्ता है।
चलिए शुरू करते हैं।
नमस्कार, मैं हूँ डॉक्टर दयाराम आलोक और आप देख रहे हैं "ज्ञानोदय" चैनल
अगर आप जाट समुदाय से हैं, तो इस वीडियो पर गर्व होगा।
और अगर आप इतिहास में रुचि रखते हैं, तो ये वीडियो आपकी आँखें खोल देगा।
जाटों का इतिहास समझने के लिए हमें तीन शब्द समझने होंगे।
एक - उत्पत्ति। दो - विद्रोह। तीन - राज्य।
सबसे पहले बात उत्पत्ति की।
उत्पत्ति के दो बड़े सिद्धांत
इतिहासकारों में जाटों की उत्पत्ति को लेकर दो सबसे बड़े सिद्धांत हैं।
पहला सिद्धांत - वैदिक और Indo-Aryan सिद्धांत।
कुछ विद्वान मानते हैं कि जाट शब्द 'ज्ञात' से बना है। ज्ञात का मतलब होता है - जाना पहचाना, प्रतिष्ठित लोग।
ऋग्वेद में 'जट' और 'जटा' जैसे शब्द मिलते हैं। कई इतिहासकार जाटों को वैदिक काल के किसान और पशुपालक समुदाय से जोड़ते हैं, जो पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिंधु और सरस्वती नदी के किनारे बसते थे।
उनका कहना है कि जाट इसी धरती के मूल किसान हैं, जिन्होंने हल चलाना और पशुपालन सबसे पहले शुरू किया।
दूसरा सिद्धांत - Indo-Scythian / शक सिद्धांत - जो सबसे ज्यादा माना जाता है।
दूसरा और ज्यादा मान्य सिद्धांत कहता है कि जाटों का संबंध शक, जिन्हें Scythian कहा जाता है, उनसे है।
इतिहास के दस्तावेज क्या कहते हैं, सुनिए।
राजस्थान सरकार के फाउंडेशन के रिकॉर्ड और राज-रस जैसे इतिहास के स्रोतों के अनुसार, भरतपुर पर राज करने वाला सिंसिनवार गोत्र एक Indo-Scythian tribal community था, जो लगभग 100 ईस्वी में भारत आया था।
इसी तरह के कई ब्रिटिश और भारतीय इतिहासकार, जैसे कि बेनी और लीड्स, लिखते हैं - "भरतपुर और धौलपुर जैसे कुछ राजस्थान के राज्य जाटों द्वारा शासित थे, जिन्हें कुछ अधिकारी, राजपूतों की तरह ही, मध्य एशियाई आक्रमणकारियों यानी Scythians की संतान मानते हैं।"
इसका मतलब क्या हुआ?
लगभग 2000 साल पहले मध्य एशिया के घास के मैदानों से शक और कुषाण नाम के घुड़सवार योद्धा भारत आए। वो पंजाब से लेकर राजस्थान तक फैल गए। धीरे-धीरे उन्होंने खेती शुरू की, यहाँ की भाषा अपनाई, और वो जाट कहलाए।
इसीलिए आप देखते हैं कि जाटों के कई गोत्र, जैसे मान, भुल्लर, औलख, आज भी मध्य एशिया में मिलते हैं।
तो सच क्या है? सच ये है कि जाट न तो पूरी तरह से विदेशी हैं, न पूरी तरह से एक जगह के। वो एक मिश्रण हैं - बाहर से आए वीर योद्धाओं और भारत के मूल किसानों का संगम। इसीलिए उनमें किसानी की सादगी और सैनिक की बहादुरी, दोनों हैं।
मुगलों के खिलाफ पहला विद्रोह
अब आते हैं दूसरे पड़ाव पर - विद्रोह।
17वीं सदी। भारत में औरंगजेब का राज है। जजिया कर, मंदिरों को तोड़ना और किसानों पर भारी लगान।
तब मथुरा के पास एक छोटा सा गाँव था - सिंसिनी। वहाँ के जमींदार थे गोकुला जाट।
गोकुला ने पहली बार मुगलों को कहा - नहीं, हम लगान नहीं देंगे।
1669 में गोकुला जाट ने 20 हजार किसानों को इकट्ठा किया और मुगल फौजदार अब्द-उन-नबी को हरा दिया, मार दिया। ये मुगल साम्राज्य के खिलाफ पहला बड़ा किसान विद्रोह था।
औरंगजेब खुद दिल्ली से सेना लेकर आया। गोकुला को पकड़ा गया, आगरा में शहीद किया गया। लेकिन चिंगारी बुझी नहीं, आग बन गई।
गोकुला के बाद आए राजाराम जाट।
राजाराम ने वो किया, जिसकी हिम्मत कोई नहीं करता था। उन्होंने सिकंदरा में अकबर के मकबरे को खोदकर, मुगलों को संदेश दिया कि किसान अब जाग गया है।
राजाराम के भतीजे थे - चूड़ामन जाट। चूड़ामन ने मुगल और जयपुर की लड़ाई का फायदा उठाकर थून में अपना पहला छोटा सा किला बनाया।
यहीं से भरतपुर राज्य की नींव पड़ी।
महाराजा सूरजमल - जाटों का स्वर्णिम युग
और अब कहानी में एंट्री होती है इतिहास के सबसे महान जाट शासक की - महाराजा सूरजमल।
अगर जाट इतिहास का कोई सूर्य है, तो वो सूरजमल हैं।
जन्म - 13 फरवरी 1707। पिता - राजा बदन सिंह।
बदन सिंह ने 1733 में भरतपुर शहर की स्थापना की। लेकिन उसे अजेय बनाया उनके बेटे सूरजमल ने।
सूरजमल ने क्या किया?
लोहागढ़ किला बनाया। मिट्टी का किला। अंग्रेजों ने 13 बार हमला किया, तोपें दागीं, लेकिन मिट्टी तोप के गोले को निगल जाती थी। इसीलिए ये भारत का एकमात्र ऐसा किला है जो कभी किसी युद्ध में हारा नहीं।
सबसे बड़ी विजय। सूरजमल ने मुगलों को, मराठों को, जयपुर के कछवाहों को और रोहिल्लाओं को हराया। एक समय पर उनका राज्य आगरा, मथुरा, धौलपुर, हाथरस, अलीगढ़ से लेकर दिल्ली के पास तक फैला था।
कूटनीति। उन्हें 'जाटों का प्लेटो' कहा जाता था। प्लेटो मतलब ज्ञानी। वो सिर्फ योद्धा नहीं, बहुत बड़े राजनीतिज्ञ थे।
1763 में हिंडौन के युद्ध में लड़ते हुए सूरजमल की मृत्यु हुई।
उनके बाद उनके बेटे जवाहर सिंह और रणजीत सिंह ने राज संभाला। रणजीत सिंह ने 1805 में अंग्रेज जनरल लेक को लोहागढ़ में हराया था। ये अंग्रेजों की भारत में सबसे शर्मनाक हारों में से एक थी।
जाट संस्कृति - क्यों अलग हैं जाट?
जाटों को समझना है तो उनकी तीन चीजें समझनी होंगी।
पहला - गोत्र और खाप।
जाटों में 3000 से ज्यादा गोत्र हैं। सिनसिनवार, मान, सिहाग, ढाका, बेनीवाल, मलिक। गोत्र ही उनका इतिहास है। एक ही गोत्र में शादी नहीं होती। और खाप पंचायत, जो गांव के बुजुर्गों की पंचायत है, वो आज भी सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा मंच है।
दूसरा - किसानी और स्वाभिमान।
जाट के लिए जमीन माँ है। आपने कहावत सुनी होगी - 'जाट मरा तब जानिए जब तेरहवीं हो जाए।' मतलब जाट कभी हार नहीं मानता।
तीसरा - राजपूत, गुर्जर, अहीर से संबंध।
अब वो सवाल जिसका जवाब मैंने शुरू में देने को कहा था।
7वीं सदी के बाद जब गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य टूटा, तब कई किसान योद्धा समुदायों से नए राजा निकले। जो राजा बन गया, वो राजपूत कहलाया। इसीलिए कई इतिहासकार कहते हैं कि राजपूत, जाट, गुर्जर और अहीर - इन सबकी जड़ें एक ही हैं, बस काम के आधार पर पहचान अलग-अलग हो गई।
तो दोस्तों, ये था जाटों का इतिहास।
एक किसान से, विद्रोही से, और विद्रोही से अजेय राजा बनने का सफर।
जाटों की उत्पत्ति चाहे शक से हुई हो या वैदिक किसानों से, लेकिन उनकी पहचान बनी है उनकी मेहनत, उनकी ईमानदारी और कभी न झुकने वाले स्वभाव से।
अगर आप जाट हैं, तो कमेंट में अपने गोत्र का नाम और 'जय महाराजा सूरजमल' जरूर लिखें।
और अगर आप चाहते हैं कि मैं अगला वीडियो गुर्जर इतिहास पर बनाऊं या यादव / अहीर इतिहास पर, तो कमेंट में बताओ।
वीडियो पसंद आया हो तो लाइक करो, शेयर करो और [चैनल का नाम] को सब्सक्राइब करो, क्योंकि यहाँ हम जातियों का इतिहास बिना किसी नफरत के, सिर्फ सच्चे तथ्यों के साथ बताते हैं।
जय हिंद।
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Dr.Dayaram Aalok M.A.,Ayurved Ratna,D.I.Hom(London), Blog Writer,caste historian,Poet(kavitalok.blogspot.com),Social worker(damodarjagat.blogspot.com),Herbalist(remedyherb.blogspot.com,healinathome.blogspot.com),Used to organize Mass marriage programs for Darji Community. founder and president Damodar Darji Mahasangh
मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या होता है? Garud Puran Ke Anusar 24 Ghante Ka Sach!
मृत्यु के ठीक 1 सेकंड बाद... क्या होता है?
क्या आपने कभी सोचा है... जब डॉक्टर कह देता है... He is no more...
उसके बाद... अगले 24 घंटे में... आपकी आत्मा कहाँ जाती है?
गरुड़ पुराण कहता है... मरने के बाद आत्मा... 3 दिन तक... अपने ही घर में रहती है।
वो आपको देखती है... वो सुनती है... वो रोने की आवाज सुनती है...
लेकिन आप उसे नहीं देख पाते।
आज मैं आपको डराने नहीं आया... आज मैं आपको गरुड़ पुराण के 3 सबसे बड़े सत्य बताऊंगा... जो हर हिंदू को मरने से पहले जानने चाहिए।
अगर आपने ये 3 सत्य जान लिए... तो आपको मृत्यु से कभी डर नहीं लगेगा।
वीडियो को अंत तक देखना, क्योंकि अंत में मैं बताऊंगा... गरुड़ पुराण के अनुसार वो कौन सा एक दान है... जो मृत्यु के बाद आत्मा को सबसे पहले मुक्ति देता है।
नमस्कार। मैं हूँ doctor dayaram alok
अगर आप सनातन धर्म, गरुड़ पुराण और जीवन-मृत्यु के रहस्य में विश्वास रखते हैं... तो इस वीडियो को अभी Like करके चैनल को Subscribe कर लीजिए।
क्योंकि इस चैनल पर हम अफवाह नहीं... शास्त्रों की बात बताते हैं।
कमेंट में लिखिए - "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" - ताकि इस ज्ञान का फल आपको मिले।
चलिए, गरुड़ पुराण के उस पन्ने को खोलते हैं... जो मृत्यु के बाद पढ़ा जाता है... पर जीते जी सबको पढ़ना चाहिए।
गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु ने गरुड़ जी को बताया है।
जब मनुष्य की मृत्यु होती है... तो दो यमदूत आते हैं।
कैसे दिखते हैं यमदूत?
गरुड़ पुराण कहता है... पापी आत्मा के लिए... यमदूत बहुत भयंकर होते हैं... काले, बड़ी-बड़ी आँखों वाले, नाखून बड़े-बड़े।
और पुण्य आत्मा के लिए... वही यमदूत... सुंदर, दिव्य रूप में आते हैं।
जैसे ही प्राण निकलते हैं... आत्मा... शरीर को ऊपर से देखती है।
वो देखती है... उसका अपना शरीर पड़ा है... परिवार रो रहा है।
वो उन्हें छूना चाहती है... बोलना चाहती है... पर कोई सुनता नहीं।
गरुड़ पुराण कहता है - पहले 10 दिन तक... आत्मा... अपने घर के आस-पास ही भटकती है।
इसीलिए... 10 दिन तक पिंड दान दिया जाता है।
हर दिन का पिंड... आत्मा के एक नए शरीर का निर्माण करता है।
पहले दिन - सिर बनता है।
दूसरे दिन - गर्दन और कंधे।
तीसरे दिन - हृदय।
और दसवें दिन तक... एक सूक्ष्म शरीर... तैयार हो जाता है... जिसे यातना शरीर कहते हैं।
इसी शरीर से आत्मा यमलोक की यात्रा करती है।
अब सवाल है... यात्रा कितनी लंबी है?
यमलोक का रास्ता
गरुड़ पुराण में लिखा है... यमलोक का रास्ता... 86,000 योजन लंबा है। यानी लगभग... 10 लाख किलोमीटर।
और इस रास्ते पर... न धूप से बचने को छाया है... न खाने को अन्न।
इस रास्ते पर 16 नगर पड़ते हैं।
जैसे - सौम्यपुर, गंधर्वपुर, शैलागम, क्रौंचपुर... और अंत में आता है यमपुरी।
अच्छी आत्मा को ये रास्ता... 3-4 दिन में... विमान से पार करा दिया जाता है।
लेकिन पापी आत्मा को... इस रास्ते पर... 1 साल तक... चलना पड़ता है। घसीटते हुए।
और इसी एक साल को... हम एक वर्ष की बरसी कहते हैं।
अब सबसे महत्वपूर्ण बात...
रास्ते में आत्मा को क्या-क्या झेलना पड़ता है?
गरुड़ पुराण कहता है... रास्ते में वैतरणी नदी आती है।
वैतरणी नदी... खून और मवाद से भरी हुई है।
पापी आत्मा उसमें डूबती है... और पुण्य आत्मा को... गाय की पूंछ पकड़ कर... पार करा दिया जाता है।
इसीलिए... जीते जी... गौदान को... सबसे बड़ा दान कहा गया है।
सबसे बड़े पाप जो नहीं करने चाहिए]
गरुड़ पुराण में 3 पापों को सबसे बड़ा बताया गया है... जिनकी सजा यमलोक में सबसे ज्यादा है।
पहला पाप... कृतघ्नता... यानी एहसान फरामोश होना।
जिसने आपके साथ अच्छा किया... उसी को धोखा देना।
दूसरा पाप... गुरु, माता-पिता और पत्नी का अपमान... गरुड़ पुराण कहता है... जो व्यक्ति इनका दिल दुखाता है... उसे यमलोक में... सबसे पहले... लोहे की गरम सलाखों पर चलना पड़ता है।
तीसरा पाप... और सबसे बड़ा... दूसरों का हक मारना... किसी गरीब की जमीन, किसी का पैसा, किसी का हक... अगर आपने धोखे से लिया... तो गरुड़ पुराण कहता है... आपको अगले जन्म में... उसी घर में... नौकर बन कर... उसी कर्ज को चुकाना पड़ता है।
अब आप सोच रहे होंगे... तो फिर मुक्ति कैसे मिलेगी?
मुक्ति का उपाय
भगवान विष्णु ने गरुड़ पुराण में 3 उपाय बताए हैं... जो जीते जी करने से... मृत्यु आसान हो जाती है।
उपाय 1 - नाम जप। हर दिन... 10 मिनट... भगवान विष्णु का नाम। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ये नाम... वैतरणी नदी में... नाव बन जाता है।
उपाय 2 - अन्न दान। गरुड़ पुराण कहता है... भूखे को भोजन कराना... 100 यज्ञों के बराबर है। क्योंकि भूखा... सिर्फ शरीर से नहीं... आत्मा से आशीर्वाद देता है।
उपाय 3 - और सबसे बड़ा... तुलसी और गीता का ज्ञान। जिस घर में रोज गीता का एक श्लोक पढ़ा जाता है... उस घर में यमदूत प्रवेश नहीं करते... वहां खुद विष्णु के दूत आते हैं।
और अंत में... वो एक दान... जिसका मैंने शुरू में वादा किया था...
वो है... मृत्यु से पहले... क्षमा दान।
जिसने आपको दुख दिया... उसे क्षमा कर दो।
जिसका आपने दिल दुखाया... उससे क्षमा मांग लो।
क्योंकि गरुड़ पुराण कहता है... क्षमा से बड़ा... कोई पिंड दान नहीं।
तो आज से... डरना बंद... और जीना शुरू।
क्योंकि मृत्यु... अंत नहीं है... ये एक नए सफर की शुरुआत है।
अगर इस वीडियो ने आपके दिल को छुआ... तो इसे अपने परिवार में... उस व्यक्ति को जरूर भेजिए... जो मृत्यु से डरता है।
कमेंट में लिखिए... आपको गरुड़ पुराण की किस बात ने सबसे ज्यादा हिला दिया?
मैं मिलता हूँ... अगले वीडियो में... एक और गहरे सत्य के साथ।
तब तक के लिए... अपने कर्म अच्छे रखिए... क्योंकि यही आपके साथ जाएगा।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
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3.10.26
बर्बरीक ही खाटू श्याम है? महाभारत का सबसे शक्तिशाली योद्धा | Barbarik Khatu Shyam Full Stor
बर्बरीक ही खाटू श्याम है? महाभारत का सबसे शक्तिशाली योद्धा | Barbarik Khatu Shyam Full Story
सोचिए... महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला है। एक तरफ 11 अक्षौहिणी सेना, दूसरी तरफ 7 अक्षौहिणी। करोड़ों योद्धा। भीष्म, द्रोण, कर्ण, अर्जुन जैसे महारथी।
तभी युद्धभूमि में एक लड़का आता है। उम्र सिर्फ 16-17 साल। अकेला। उसके पास सिर्फ 3 बाण हैं।
और वो कहता है - "मैं अकेला ही इस पूरे युद्ध को एक दिन में खत्म कर सकता हूँ।"
हाँ, एक दिन में।
कृष्ण ने उसे देखा और कहा - "अगर ये युद्ध में लड़ा, तो कोई नहीं बचेगा।"
और फिर कृष्ण ने उससे उसका शीश मांग लिया।
कौन था वो बालक? जिसके 3 बाणों से खुद महादेव भी नहीं बच सकते थे? और वही बालक आज राजस्थान के खाटू में श्याम बाबा के नाम से क्यों पूजा जाता है?
अगर आपने आज तक बर्बरीक की सच्ची कहानी नहीं सुनी, तो आज आपका रोंगटे खड़े हो जाएंगे। वीडियो को अंत तक देखिए, क्योंकि आखिर में मैं आपको बताऊंगा वो एक वरदान जिसके कारण बर्बरीक को हारे का सहारा कहा जाता है।
जय श्री श्याम लिखकर वीडियो शुरू करते हैं।
नमस्कार, मैं Dr.Aalok और आप देख रहे हैं gyanoday channel
महाभारत की हर कहानी में हम भीम को सबसे बलशाली, अर्जुन को सबसे बड़ा धनुर्धर, और कर्ण को सबसे बड़ा दानी कहते हैं। लेकिन महाभारत का एक ऐसा योद्धा था, जो इन सब से ऊपर था।
बर्बरीक।
बर्बरीक कौन था?
बर्बरीक भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या मौरवी का पुत्र था। यानी भीम का पौत्र। बचपन से ही उसने घोर तपस्या की। उसकी माँ ने उसे युद्ध कला सिखाई, तो वहीं भगवान श्रीकृष्ण ने उसे... नहीं, कृष्ण ने नहीं, उसकी आराधना से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा ने उसे 3 दिव्य बाण दिए। और भगवान शिव ने उसे एक ऐसा धनुष दिया जिसका कोई तोड़ नहीं।
इन 3 बाणों में क्या शक्ति थी?
पहला बाण - जिसे मारना है, उसको चिन्हित कर देता है।
दूसरा बाण - जिसे नहीं मारना है, उसको अलग कर देता है।
तीसरा बाण - चिन्हित किए हुए सभी लक्ष्यों को नष्ट कर देता है। और फिर तरकश में वापस आ जाता है।
मतलब, अगर बर्बरीक एक बार बाण चला दे, तो पूरी सृष्टि में जिसे वो चाहे, मार सकता है।
और यहीं से कहानी शुरू होती है।
[PART 3: बर्बरीक की प्रतिज्ञा - 3:00 से 5:30]
जब बर्बरीक को पता चला कि कुरुक्षेत्र में धर्म-अधर्म का महायुद्ध होने वाला है, तो वो अपनी माँ से आज्ञा लेकर युद्ध देखने निकला।
माँ ने एक ही बात कही - "बेटा, हमेशा हारने वाले का साथ देना। यही तुम्हारा धर्म है।"
बर्बरीक ने कहा - "ठीक है माँ, मैं वचन देता हूँ, जो पक्ष हारेगा, मैं उसी की तरफ से लड़ूंगा।"
ये छोटा सा वचन... यही वचन महाभारत का पूरा इतिहास बदलने वाला था।
अब जरा सोचिए, अगर बर्बरीक हारने वाले का साथ देगा, तो क्या होगा?
पहले कौरव हार रहे होंगे, तो वो कौरवों की तरफ जाएगा। कौरव शक्तिशाली हो जाएंगे, पांडव हारने लगेंगे। फिर वो पांडवों की तरफ आ जाएगा। फिर पांडव शक्तिशाली, कौरव कमजोर। वो फिर कौरवों की तरफ।
मतलब युद्ध कभी खत्म ही नहीं होगा। अंत में बचेगा सिर्फ एक - बर्बरीक।
और यही बात श्रीकृष्ण समझ गए थे।
: कृष्ण और बर्बरीक की पहली मुलाकात
कुरुक्षेत्र के रास्ते में, कृष्ण एक ब्राह्मण के वेश में बर्बरीक से मिले।
कृष्ण ने पूछा - "बेटा, तुम अकेले युद्ध में जा रहे हो?"
बर्बरीक ने हँसते हुए कहा - "मुझे सेना की जरूरत नहीं, मेरे 3 बाण ही काफी हैं।"
ब्राह्मण हँसा - "3 बाणों से युद्ध? एक दिन में? मजाक करते हो।"
बर्बरीक को क्रोध आया। उसने कहा - "आपको विश्वास नहीं? तो परीक्षा ले लीजिए। वो सामने पीपल का पेड़ देख रहे हैं? उसके सारे पत्ते मैं एक बाण से छेद दूंगा।"
कृष्ण ने मन ही मन में एक पत्ता अपने पैर के नीचे छुपा लिया।
बर्बरीक ने पहला बाण छोड़ा। बाण ने पेड़ के सारे पत्तों को चिन्हित किया। दूसरा बाण... और देखते ही देखते पेड़ के सारे पत्ते छेद हो गए।
फिर तीसरा बाण कृष्ण के पैर के चारों ओर घूमने लगा।
कृष्ण चौंक गए। बर्बरीक ने कहा - "हे ब्राह्मण देवता, पैर हटाइए, उसके नीचे एक पत्ता है, मेरा बाण उसे भी छेदेगा।"
उस दिन कृष्ण समझ गए कि ये बालक कोई साधारण नहीं है। ये स्वयं महादेव का अंश है।
तब कृष्ण ने अपने विराट रूप में आकर पूछा - "तुम्हें दान में क्या चाहिए?"
बर्बरीक ने कहा - "आप जो मांगेंगे, मैं दूंगा।"
कृष्ण ने कहा - "मुझे तुम्हारा शीश चाहिए।"
शीश दान !
यहाँ पर कहानी सबसे ज्यादा भावुक होती है।
बर्बरीक एक क्षण के लिए चौंका, फिर समझ गया कि सामने स्वयं श्रीकृष्ण हैं।
उसने कहा - "प्रभु, मैं अपना शीश देने को तैयार हूँ, पर मेरी एक इच्छा है। मुझे महाभारत का पूरा युद्ध देखना है।"
कृष्ण ने तथास्तु कहा।
बर्बरीक ने खुद अपने हाथों से अपना शीश काटकर कृष्ण को दान दे दिया।
कृष्ण ने उस शीश को अमृत से सींचकर कुरुक्षेत्र की सबसे ऊँची पहाड़ी पर रख दिया, जहाँ से वो पूरा 18 दिन का युद्ध देख सके।
और इसीलिए बर्बरीक को शीश का दानी कहा जाता है। जिसने अपना शीश दान कर दिया।
दोस्तों, यहाँ तक कहानी सुनकर अगर आपके भी रोंगटे खड़े हो गए हैं, तो एक लाइक तो बनता है। और कमेंट में दिल से लिखिए - जय श्री श्याम।
क्योंकि अब जो मैं बताने वाला हूँ, वो इस कहानी का सबसे बड़ा रहस्य है।
युद्ध समाप्त हुआ। पांडव जीत गए, पर आपस में लड़ने लगे कि युद्ध किसने जिताया। अर्जुन कहे मैं, भीम कहे मैं।
तब कृष्ण ने कहा - "इसका निर्णय बर्बरीक का शीश करेगा, क्योंकि उसने पूरा युद्ध देखा है।"
बर्बरीक के शीश ने कहा - "मैंने तो सिर्फ एक ही चीज देखी। हर जगह, हर योद्धा में, हर अस्त्र में, सिर्फ श्रीकृष्ण ही लड़ रहे थे। युद्ध करवाने वाले भी कृष्ण, और युद्ध करने वाले भी कृष्ण।"
यह सुनकर सभी पांडवों का अहंकार टूट गया।
तब कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया।
कृष्ण ने कहा - "हे बर्बरीक, तुमने कलयुग में मेरे नाम से पूजे जाओगे। जो हारा हुआ, जो दुखी, जो तुम्हारे दर पर आएगा, तुम उसका सहारा बनोगे। तुम हारे के सहारे कहलाओगे। और तुम्हारा एक नाम मेरे नाम पर - श्याम - होगा। क्योंकि तुम्हारा रंग भी मेरे जैसा ही श्याम है।"
और कृष्ण ने उसके शीश को खाटू नगर में दफना दिया, जहाँ आज राजस्थान के सीकर जिले में खाटू श्याम जी का भव्य मंदिर है।
कहते हैं, एक बार खाटू में बाढ़ आई, तो वो शीश बहता हुआ मिला। तब वहाँ के राजा रूपसिंह चौहान को स्वप्न आया और उन्होंने वहाँ मंदिर बनवाया।
इसीलिए बर्बरीक ही खाटू श्याम है।
तो दोस्तों, ये थी महाभारत के सबसे शक्तिशाली योद्धा बर्बरीक की कहानी। जिसके पास पूरी दुनिया को एक बाण में खत्म करने की ताकत थी, पर उसने धर्म के लिए अपना शीश दे दिया।
आज भी जब कोई हार जाता है, जब दुनिया उसका साथ छोड़ देती है, तो खाटू श्याम जी कहते हैं - "तू मेरे पास आ, मैं हारे का सहारा हूँ।"
आपको ये कहानी कैसी लगी? कमेंट में जरूर बताइए।
और अगर आप चाहते हैं कि मैं अगली बार - अश्वत्थामा आज कहाँ है? या कर्ण की आखिरी रात की कहानी पर वीडियो बनाऊं, तो कमेंट में उसका नाम लिखिए।
इस वीडियो को अपने उन 3 दोस्तों के साथ शेयर करिए जो श्याम बाबा के भक्त हैं।
चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन दबाना मत भूलिए, क्योंकि मैं हर हफ्ते महाभारत की ऐसी ही एक अनसुनी कहानी लाता हूँ।
जय श्री कृष्ण, जय श्री श्याम।
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30.9.26
महाराजा यदु से श्रीकृष्ण तक, अहीर से यादव कैसे बने, यादवों के 18 गोत्रों का सच
महाराजा यदु से श्रीकृष्ण तक, अहीर से यादव कैसे बने, यादवों के 18 गोत्रों का सच
"आपने सुना होगा कि कृष्ण जी अहीर थे... किसी ने कहा यादव थे... और अंग्रेजों की किताबों में लिखा है कि अहीर तो सिर्फ ग्वाले थे।
तो सच क्या है? क्या अहीर और यादव अलग हैं?
महाराजा यदु, जिनके नाम पर पूरे यादव वंश का नाम पड़ा, उन्हें उनके ही पिता ययाति ने श्राप क्यों दिया था?
और आज जिन 18 गोत्रों पर यादव समाज बंटा है, उन 18 गोत्रों का कनेक्शन सीधे द्वारका के यदुवंशियों से कैसे है?
आज इस एक वीडियो में हम ऋग्वेद से लेकर भागवत पुराण तक, और अंग्रेजों के Census से लेकर 2024 की DNA रिपोर्ट तक, सारे सबूत खोल देंगे। आखिर तक देखना, क्योंकि आखिर में मैं बताऊंगा वो एक गोत्र जो आज भी अपने आप को श्रीकृष्ण का सगा वंशज मानता है।"
नमस्कार, मैं हूँ डॉ . दयाराम आलोक और आप देख रहे हैं ज्ञानोदय चैनल
दोस्तों, भारत में यादव समाज की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ से ज्यादा है, जो इसे भारत की सबसे बड़ी OBC जातियों में से एक बनाती है। बिहार से लेकर हरियाणा तक, राजनीति से लेकर सेना तक, हर जगह यादवों का दबदबा है।
लेकिन जब इतिहास की बात आती है तो 3 अलग-अलग कहानियाँ सुनाई देती हैं। पहली, पौराणिक। दूसरी, अंग्रेजों वाली। और तीसरी, आज की राजनीति वाली।
आज हम बिना किसी पक्षपात के, सिर्फ ग्रंथों और शिलालेखों के आधार पर बात करेंगे। तो वीडियो को अभी लाइक कर दीजिए, क्योंकि यह रिसर्च आपको कहीं और नहीं मिलेगी, और ऐसे ही अनसुने इतिहास के लिए चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन दबा दीजिए।
महाराजा यदु की उत्पत्ति - श्रापित राजकुमार से यदुवंश की शुरुआत
कहानी शुरू होती है चंद्रवंश से।
ब्रह्मा जी से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा। पुरुरवा वही राजा हैं जिन्होंने प्रयाग में पहला साम्राज्य बसाया। उनकी कई पीढ़ियों बाद आए राजा नहुष, और नहुष के पुत्र हुए महाराजा ययाति।
ययाति चक्रवर्ती सम्राट थे। उनके दो पत्नियाँ थीं - देवयानी और शर्मिष्ठा। देवयानी से दो पुत्र हुए - यदु और तुर्वसु। शर्मिष्ठा से तीन पुत्र हुए - द्रुह्यु, अनु और पुरु।
अब यहाँ ट्विस्ट आता है। ययाति ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से वादा किया था कि वो दूसरा विवाह नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने शर्मिष्ठा से विवाह कर लिया। जब देवयानी को पता चला तो उन्होंने अपने पिता शुक्राचार्य को बताया। शुक्राचार्य ने क्रोध में ययाति को श्राप दिया - "तुम असमय ही बूढ़े हो जाओगे।"
ययाति बूढ़े हो गए। उन्होंने अपने पुत्रों से कहा - "अपनी जवानी मुझे दे दो, ताकि मैं कुछ साल और भोग कर सकूँ।" बड़े पुत्र यदु ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा - "पिताजी, भोग से कभी तृप्ति नहीं मिलती, जैसे घी डालने से आग नहीं बुझती।"
ययाति क्रोधित हो गए। उन्होंने यदु को श्राप दिया - "मैं तुम्हें राज्य के उत्तराधिकार से वंचित करता हूँ। तुम्हारे वंश में कोई भी राजा चक्रवर्ती सम्राट नहीं बनेगा, लेकिन तुम्हारे वंश में स्वयं भगवान विष्णु अवतार लेंगे।"
यही श्राप वरदान बन गया। सबसे छोटे पुत्र पुरु ने अपनी जवानी दे दी, और वो चंद्रवंश के मुख्य राजा बने, उन्हीं के वंश में आगे चलकर कौरव-पांडव हुए। और यदु, जिन्हें राज्य से निकाला गया, उन्होंने नर्मदा और चंबल के बीच अपना नया राज्य बसाया। उसी से बना - यदुवंश।
तो पहली बात क्लियर - यदु क्षत्रिय थे, चंद्रवंशी क्षत्रिय। ऋग्वेद में भी 'यदु' नाम एक शक्तिशाली जन का नाम है।
यदु के 5 पुत्रों का वर्णन भागवत पुराण में है - सहस्त्रजित, क्रोष्टु, नल, नहुष और पुरुजित। इन्हीं से यादवों की अलग-अलग शाखाएं बनीं। क्रोष्टु के वंश में आगे चलकर हुए वृष्णि, और वृष्णि के वंश में हुए श्रीकृष्ण।
श्रीकृष्ण तक का सफर - अहीर कैसे जुड़ा
अब सवाल है - कृष्ण को अहीर क्यों कहा जाता है?
जब कंस को आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र उसे मारेगा, तो उसने वसुदेव-देवकी को कारागार में डाल दिया। वसुदेव यदुवंशी थे। लेकिन कृष्ण का जन्म होते ही वसुदेव उन्हें गोकुल में नंद बाबा के यहाँ ले गए।
नंद बाबा कौन थे? भागवत पुराण, स्कंध 10 में साफ लिखा है - नंद महाराज गोपों और अहीरों के अधिपति थे। गोकुल, वृंदावन, बरसाना में उस समय अहीर समाज रहता था, जिनका मुख्य व्यवसाय गौ-पालन था।
संस्कृत में अहीर शब्द का संधि-विच्छेद है - अहि + ईर। अहि मतलब सर्प, ईर मतलब मारने वाला। कालिया नाग को मारने वाले कृष्ण के वंशज होने से भी ये नाम पड़ा, ऐसा कुछ विद्वान मानते हैं। दूसरा अर्थ है - 'अभि + ईर' - मतलब चारों तरफ से रक्षा करने वाला, जो गायों की रक्षा करे।
तो श्रीकृष्ण जन्म से यदुवंशी क्षत्रिय थे, लेकिन कर्म और पालन-पोषण से अहीर-गोप कहलाए। इसलिए महाभारत में अर्जुन उन्हें कई बार 'गोविंद' - गायों के रक्षक - कहते हैं।
जब कृष्ण ने मथुरा छोड़कर द्वारका बसाई, तो पूरे यदुवंश - वृष्णि, अंधक, भोजक, सात्वत - सब द्वारका चले गए। द्वारका के डूबने के बाद यदुवंश बिखर गया। महाभारत के मौसल पर्व में लिखा है कि यदुवंशी आपस में लड़कर नष्ट हो गए और बचे हुए लोग अलग-अलग दिशाओं में चले गए।
यही बिखरा हुआ यदुवंश आगे चलकर अलग-अलग नामों से जाना गया - जादौन, भाटी, जाडेजा, चूड़ासमा, अहीर, ग्वाला, गोप।
अहीर से यादव कैसे बना? - अंग्रेजों का खेल
यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मुगल काल और उससे पहले तक दस्तावेजों में आपको 'यादव' शब्द बहुत कम मिलेगा। आपको मिलेगा - अहीर, गोप, ग्वाला, आभीर।
आभीर शब्द सबसे पुराना है। महाभारत में आभीरों का जिक्र है। ईसा से 150 साल पहले पतंजलि ने भी आभीर का जिक्र किया है। 10वीं सदी के शिलालेखों में अहीर राजाओं को 'आभीर' कहा गया है।
तो फिर यादव शब्द कब वापस आया?
1920 के दशक में। उत्तर प्रदेश, बिहार में आर्य समाज के प्रभाव से, और एक बड़े नेता की वजह से - राव बहादुर बलदेव सिंह जी। उन्होंने 1910 में 'यादव महासभा' बनाई और नारा दिया - "अहीर, ग्वाला, गोप सब एक हैं, हम सब यदु के वंशज हैं, इसलिए हम यादव हैं।"
अंग्रेजों ने 1901, 1911, 1921 की जनगणना में अहीरों को ग्वाला, दूध बेचने वाली जाति में गिना था। इससे बचने के लिए और क्षत्रिय पहचान को वापस पाने के लिए, पूरे अहीर समाज ने अपने आप को 'यादव' लिखना शुरू कर दिया। 1931 की जनगणना तक आते-आते 90% अहीरों ने अपना टाइटल यादव लिख दिया।
तो अहीर से यादव बनना जाति बदलना नहीं था, बल्कि अपनी पुरानी वैदिक पहचान को वापस पाना था। इसलिए आज आप किसी के आधार कार्ड पर अहीर और किसी पर यादव देख सकते हैं - दोनों एक ही हैं।
18 गोत्रों का सच -
कई जगह 18 गोत्र, कई जगह 20 गोत्र बताए जाते हैं। हम सबसे प्रमाणित लिस्ट की बात करेंगे जो भागवत पुराण और कौटिल्य के अर्थशास्त्र से मिलती है।
यादवों के गोत्र असल में ऋषियों पर नहीं, बल्कि यदु के पुत्रों और द्वारका के गणों पर आधारित हैं। मुख्य 18 गोत्र ये हैं:
1. अत्री गोत्र - ये सबसे सम्मानित माना जाता है, नंद बाबा इसी गोत्र से थे।
2. भरद्वाज / भारद्वाज -
3. दधिक्रत / दधीच -
4. गौतम -
5. वत्स / बच्छ - ये उत्तर प्रदेश में बहुत ज्यादा है।
6. कौशिक -
7. वशिष्ठ -
8. कश्यप - कृष्ण के गुरु सांदीपनि इसी गोत्र से थे।
9. बाण / अफरिया - हरियाणा के राव तुलाराम इसी गोत्र से थे।
10. नंदवंशी -
11. यदुवंशी - जो सीधे अपने आप को कृष्ण का वंशज मानते हैं, जादौन राजपूत भी इसी में आते हैं।
12. कृष्णौत - बिहार में सबसे ज्यादा।
13. मजरौठ -
14. गोवल / ग्वालवंशी -
15. भाटी / भट्टी - जैसलमेर के राजा भाटी यादव थे।
16. जादौन / जाधव - महाराष्ट्र के जाधव और करौली के जादौन एक ही हैं।
17. बनाफर - आल्हा-ऊदल बनाफर यादव थे।
18. ठेठवार / ठाकुरिया -
याद रखिए, गोत्र का मतलब होता है कि आप एक ही पूर्वज के वंशज हैं, इसलिए एक ही गोत्र में विवाह नहीं होता। हरियाणा में आज भी अफरिया गोत्र के लोग अपने आप को रेवाड़ी के अहीरवाल का असली वारिस मानते हैं।
इन 18 गोत्रों के अलावा भी क्षेत्र के हिसाब से उप-गोत्र बन गए, जैसे - लोरिया, बऊरिया, दहिया। इसलिए कई जगह 52 गोत्र तक गिने जाते हैं, लेकिन मूल जड़ यही 18 हैं।
तो दोस्तों निष्कर्ष क्या निकला?महाराजा यदु चंद्रवंशी क्षत्रिय थे, उन्हें राज्य से निकाला गया तो उन्होंने अपना यदुवंश बसाया।
श्रीकृष्ण उसी यदुवंश में वृष्णि शाखा में पैदा हुए, लेकिन गोकुल में अहीरों के बीच पले-बढ़े इसलिए अहीर और यादव दोनों कहलाए।
अहीर, गोप, आभीर, ग्वाला - ये व्यवसायिक नाम थे, यादव वंशिक नाम है। 1920 में समाज ने फिर से यादव नाम अपनाया।
18 गोत्र कोई काल्पनिक लिस्ट नहीं है, ये द्वारका के 18 गणों से बनी है जो द्वारका डूबने के बाद भारत में फैल गए।
अगर आपको अपना इतिहास पता होना गर्व की बात लगती है तो कमेंट में अपना गोत्र और जिला जरूर लिखें - जय यदुवंश, जय श्रीकृष्ण।
मैं अगले वीडियो में बताऊंगा - "राव तुलाराम ने अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में पहला यादव युद्ध कैसे लड़ा था और दिल्ली को कैसे घेरा था?" वो कहानी किसी किताब में नहीं है।
तो उस वीडियो को मिस ना करने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन को ALL पर सेट कर दीजिए।
वीडियो को अपने सभी यादव भाईयों तक शेयर कर दीजिए। धन्यवाद।
"आपने सुना होगा कि कृष्ण जी अहीर थे... किसी ने कहा यादव थे... और अंग्रेजों की किताबों में लिखा है कि अहीर तो सिर्फ ग्वाले थे।
तो सच क्या है? क्या अहीर और यादव अलग हैं?
महाराजा यदु, जिनके नाम पर पूरे यादव वंश का नाम पड़ा, उन्हें उनके ही पिता ययाति ने श्राप क्यों दिया था?
और आज जिन 18 गोत्रों पर यादव समाज बंटा है, उन 18 गोत्रों का कनेक्शन सीधे द्वारका के यदुवंशियों से कैसे है?
आज इस एक वीडियो में हम ऋग्वेद से लेकर भागवत पुराण तक, और अंग्रेजों के Census से लेकर 2024 की DNA रिपोर्ट तक, सारे सबूत खोल देंगे। आखिर तक देखना, क्योंकि आखिर में मैं बताऊंगा वो एक गोत्र जो आज भी अपने आप को श्रीकृष्ण का सगा वंशज मानता है।"
नमस्कार, मैं हूँ डॉ . दयाराम आलोक और आप देख रहे हैं ज्ञानोदय चैनल
दोस्तों, भारत में यादव समाज की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ से ज्यादा है, जो इसे भारत की सबसे बड़ी OBC जातियों में से एक बनाती है। बिहार से लेकर हरियाणा तक, राजनीति से लेकर सेना तक, हर जगह यादवों का दबदबा है।
लेकिन जब इतिहास की बात आती है तो 3 अलग-अलग कहानियाँ सुनाई देती हैं। पहली, पौराणिक। दूसरी, अंग्रेजों वाली। और तीसरी, आज की राजनीति वाली।
आज हम बिना किसी पक्षपात के, सिर्फ ग्रंथों और शिलालेखों के आधार पर बात करेंगे। तो वीडियो को अभी लाइक कर दीजिए, क्योंकि यह रिसर्च आपको कहीं और नहीं मिलेगी, और ऐसे ही अनसुने इतिहास के लिए चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन दबा दीजिए।
महाराजा यदु की उत्पत्ति - श्रापित राजकुमार से यदुवंश की शुरुआत
कहानी शुरू होती है चंद्रवंश से।
ब्रह्मा जी से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा। पुरुरवा वही राजा हैं जिन्होंने प्रयाग में पहला साम्राज्य बसाया। उनकी कई पीढ़ियों बाद आए राजा नहुष, और नहुष के पुत्र हुए महाराजा ययाति।
ययाति चक्रवर्ती सम्राट थे। उनके दो पत्नियाँ थीं - देवयानी और शर्मिष्ठा। देवयानी से दो पुत्र हुए - यदु और तुर्वसु। शर्मिष्ठा से तीन पुत्र हुए - द्रुह्यु, अनु और पुरु।
अब यहाँ ट्विस्ट आता है। ययाति ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से वादा किया था कि वो दूसरा विवाह नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने शर्मिष्ठा से विवाह कर लिया। जब देवयानी को पता चला तो उन्होंने अपने पिता शुक्राचार्य को बताया। शुक्राचार्य ने क्रोध में ययाति को श्राप दिया - "तुम असमय ही बूढ़े हो जाओगे।"
ययाति बूढ़े हो गए। उन्होंने अपने पुत्रों से कहा - "अपनी जवानी मुझे दे दो, ताकि मैं कुछ साल और भोग कर सकूँ।" बड़े पुत्र यदु ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा - "पिताजी, भोग से कभी तृप्ति नहीं मिलती, जैसे घी डालने से आग नहीं बुझती।"
ययाति क्रोधित हो गए। उन्होंने यदु को श्राप दिया - "मैं तुम्हें राज्य के उत्तराधिकार से वंचित करता हूँ। तुम्हारे वंश में कोई भी राजा चक्रवर्ती सम्राट नहीं बनेगा, लेकिन तुम्हारे वंश में स्वयं भगवान विष्णु अवतार लेंगे।"
यही श्राप वरदान बन गया। सबसे छोटे पुत्र पुरु ने अपनी जवानी दे दी, और वो चंद्रवंश के मुख्य राजा बने, उन्हीं के वंश में आगे चलकर कौरव-पांडव हुए। और यदु, जिन्हें राज्य से निकाला गया, उन्होंने नर्मदा और चंबल के बीच अपना नया राज्य बसाया। उसी से बना - यदुवंश।
तो पहली बात क्लियर - यदु क्षत्रिय थे, चंद्रवंशी क्षत्रिय। ऋग्वेद में भी 'यदु' नाम एक शक्तिशाली जन का नाम है।
यदु के 5 पुत्रों का वर्णन भागवत पुराण में है - सहस्त्रजित, क्रोष्टु, नल, नहुष और पुरुजित। इन्हीं से यादवों की अलग-अलग शाखाएं बनीं। क्रोष्टु के वंश में आगे चलकर हुए वृष्णि, और वृष्णि के वंश में हुए श्रीकृष्ण।
श्रीकृष्ण तक का सफर - अहीर कैसे जुड़ा
अब सवाल है - कृष्ण को अहीर क्यों कहा जाता है?
जब कंस को आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र उसे मारेगा, तो उसने वसुदेव-देवकी को कारागार में डाल दिया। वसुदेव यदुवंशी थे। लेकिन कृष्ण का जन्म होते ही वसुदेव उन्हें गोकुल में नंद बाबा के यहाँ ले गए।
नंद बाबा कौन थे? भागवत पुराण, स्कंध 10 में साफ लिखा है - नंद महाराज गोपों और अहीरों के अधिपति थे। गोकुल, वृंदावन, बरसाना में उस समय अहीर समाज रहता था, जिनका मुख्य व्यवसाय गौ-पालन था।
संस्कृत में अहीर शब्द का संधि-विच्छेद है - अहि + ईर। अहि मतलब सर्प, ईर मतलब मारने वाला। कालिया नाग को मारने वाले कृष्ण के वंशज होने से भी ये नाम पड़ा, ऐसा कुछ विद्वान मानते हैं। दूसरा अर्थ है - 'अभि + ईर' - मतलब चारों तरफ से रक्षा करने वाला, जो गायों की रक्षा करे।
तो श्रीकृष्ण जन्म से यदुवंशी क्षत्रिय थे, लेकिन कर्म और पालन-पोषण से अहीर-गोप कहलाए। इसलिए महाभारत में अर्जुन उन्हें कई बार 'गोविंद' - गायों के रक्षक - कहते हैं।
जब कृष्ण ने मथुरा छोड़कर द्वारका बसाई, तो पूरे यदुवंश - वृष्णि, अंधक, भोजक, सात्वत - सब द्वारका चले गए। द्वारका के डूबने के बाद यदुवंश बिखर गया। महाभारत के मौसल पर्व में लिखा है कि यदुवंशी आपस में लड़कर नष्ट हो गए और बचे हुए लोग अलग-अलग दिशाओं में चले गए।
यही बिखरा हुआ यदुवंश आगे चलकर अलग-अलग नामों से जाना गया - जादौन, भाटी, जाडेजा, चूड़ासमा, अहीर, ग्वाला, गोप।
अहीर से यादव कैसे बना? - अंग्रेजों का खेल
यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मुगल काल और उससे पहले तक दस्तावेजों में आपको 'यादव' शब्द बहुत कम मिलेगा। आपको मिलेगा - अहीर, गोप, ग्वाला, आभीर।
आभीर शब्द सबसे पुराना है। महाभारत में आभीरों का जिक्र है। ईसा से 150 साल पहले पतंजलि ने भी आभीर का जिक्र किया है। 10वीं सदी के शिलालेखों में अहीर राजाओं को 'आभीर' कहा गया है।
तो फिर यादव शब्द कब वापस आया?
1920 के दशक में। उत्तर प्रदेश, बिहार में आर्य समाज के प्रभाव से, और एक बड़े नेता की वजह से - राव बहादुर बलदेव सिंह जी। उन्होंने 1910 में 'यादव महासभा' बनाई और नारा दिया - "अहीर, ग्वाला, गोप सब एक हैं, हम सब यदु के वंशज हैं, इसलिए हम यादव हैं।"
अंग्रेजों ने 1901, 1911, 1921 की जनगणना में अहीरों को ग्वाला, दूध बेचने वाली जाति में गिना था। इससे बचने के लिए और क्षत्रिय पहचान को वापस पाने के लिए, पूरे अहीर समाज ने अपने आप को 'यादव' लिखना शुरू कर दिया। 1931 की जनगणना तक आते-आते 90% अहीरों ने अपना टाइटल यादव लिख दिया।
तो अहीर से यादव बनना जाति बदलना नहीं था, बल्कि अपनी पुरानी वैदिक पहचान को वापस पाना था। इसलिए आज आप किसी के आधार कार्ड पर अहीर और किसी पर यादव देख सकते हैं - दोनों एक ही हैं।
18 गोत्रों का सच -
कई जगह 18 गोत्र, कई जगह 20 गोत्र बताए जाते हैं। हम सबसे प्रमाणित लिस्ट की बात करेंगे जो भागवत पुराण और कौटिल्य के अर्थशास्त्र से मिलती है।
यादवों के गोत्र असल में ऋषियों पर नहीं, बल्कि यदु के पुत्रों और द्वारका के गणों पर आधारित हैं। मुख्य 18 गोत्र ये हैं:
1. अत्री गोत्र - ये सबसे सम्मानित माना जाता है, नंद बाबा इसी गोत्र से थे।
2. भरद्वाज / भारद्वाज -
3. दधिक्रत / दधीच -
4. गौतम -
5. वत्स / बच्छ - ये उत्तर प्रदेश में बहुत ज्यादा है।
6. कौशिक -
7. वशिष्ठ -
8. कश्यप - कृष्ण के गुरु सांदीपनि इसी गोत्र से थे।
9. बाण / अफरिया - हरियाणा के राव तुलाराम इसी गोत्र से थे।
10. नंदवंशी -
11. यदुवंशी - जो सीधे अपने आप को कृष्ण का वंशज मानते हैं, जादौन राजपूत भी इसी में आते हैं।
12. कृष्णौत - बिहार में सबसे ज्यादा।
13. मजरौठ -
14. गोवल / ग्वालवंशी -
15. भाटी / भट्टी - जैसलमेर के राजा भाटी यादव थे।
16. जादौन / जाधव - महाराष्ट्र के जाधव और करौली के जादौन एक ही हैं।
17. बनाफर - आल्हा-ऊदल बनाफर यादव थे।
18. ठेठवार / ठाकुरिया -
याद रखिए, गोत्र का मतलब होता है कि आप एक ही पूर्वज के वंशज हैं, इसलिए एक ही गोत्र में विवाह नहीं होता। हरियाणा में आज भी अफरिया गोत्र के लोग अपने आप को रेवाड़ी के अहीरवाल का असली वारिस मानते हैं।
इन 18 गोत्रों के अलावा भी क्षेत्र के हिसाब से उप-गोत्र बन गए, जैसे - लोरिया, बऊरिया, दहिया। इसलिए कई जगह 52 गोत्र तक गिने जाते हैं, लेकिन मूल जड़ यही 18 हैं।
तो दोस्तों निष्कर्ष क्या निकला?महाराजा यदु चंद्रवंशी क्षत्रिय थे, उन्हें राज्य से निकाला गया तो उन्होंने अपना यदुवंश बसाया।
श्रीकृष्ण उसी यदुवंश में वृष्णि शाखा में पैदा हुए, लेकिन गोकुल में अहीरों के बीच पले-बढ़े इसलिए अहीर और यादव दोनों कहलाए।
अहीर, गोप, आभीर, ग्वाला - ये व्यवसायिक नाम थे, यादव वंशिक नाम है। 1920 में समाज ने फिर से यादव नाम अपनाया।
18 गोत्र कोई काल्पनिक लिस्ट नहीं है, ये द्वारका के 18 गणों से बनी है जो द्वारका डूबने के बाद भारत में फैल गए।
अगर आपको अपना इतिहास पता होना गर्व की बात लगती है तो कमेंट में अपना गोत्र और जिला जरूर लिखें - जय यदुवंश, जय श्रीकृष्ण।
मैं अगले वीडियो में बताऊंगा - "राव तुलाराम ने अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में पहला यादव युद्ध कैसे लड़ा था और दिल्ली को कैसे घेरा था?" वो कहानी किसी किताब में नहीं है।
तो उस वीडियो को मिस ना करने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन को ALL पर सेट कर दीजिए।
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23.9.26
नाथ समाज का रहस्यमय इतिहास - कौन हैं नाथ? कहाँ से हुई उत्पत्ति?
नाथ समाज - योगियों का वो पंथ जिसने इतिहास बदल दिया सोचिए... एक ऐसा पंथ, जिसके योगियों के सामने बड़े-बड़े राजा झुक जाते थे।
एक ऐसा समाज, जिसने भारत को योग दिया, हठयोग दिया... और जिसकी धूनी आज भी पूरे भारत में जल रही है।
ये कहानी है उस समाज की, जो शिव से शुरू होता है... और आज आपके और हमारे बीच मौजूद है।
नमस्कार, आज हम बात करेंगे नाथ समाज के उस विस्मृत इतिहास की, जो किताबों में नहीं मिलेगा।
अगर आप नाथ समाज से हैं, तो ये वीडियो आपके रोंगटे खड़े कर देगा। और अगर नहीं हैं, तो आप भारत के सबसे शक्तिशाली योगी पंथ को जान जाएंगे।
वीडियो को अंत तक देखिए, क्योंकि अंत में मैं बताऊंगा नाथ समाज के 12 पंथ कौन से हैं और आपका गोत्र किस पंथ से जुड़ा है।
नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका हमारे चैनल पर।
दोस्तों, जब हम भारतीय इतिहास पढ़ते हैं, तो हमे मुगल, राजपूत, मराठा... इन सबका इतिहास मिल जाता है। लेकिन एक समाज ऐसा है जिसने तलवार से नहीं, बल्कि योग और भभूत से इस देश पर राज किया है। वो है नाथ समाज।
आम भाषा में हम इन्हें जोगी, नाथ जोगी, या सिर्फ नाथ समाज कहते हैं।
तो सवाल उठता है... आखिर नाथ समाज की उत्पत्ति कहाँ से हुई? क्या ये कोई जाति है, या एक योग परम्परा?
उत्पत्ति का रहस्य - शिव से शुरूआत
नाथ शब्द का अर्थ ही बहुत गहरा है। नाथ का मतलब होता है - स्वामी, रक्षक, या जो खुद मोक्ष का मार्ग जानता हो।
नाथ पंथ की उत्पत्ति किसी इंसान से नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव से मानी जाती है। इसीलिए इन्हें शैव पंथ का सबसे प्राचीन और प्रमुख पंथ कहा जाता है।
कहा जाता है कि सबसे पहले भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का ज्ञान दिया। ये ज्ञान था - अमर कथा। उसी अमर कथा को एक मछली ने सुन लिया। वही मछली आगे चलकर मत्स्येंद्रनाथ बनी।
मत्स्येंद्रनाथ... नाथ पंथ के प्रथम नाथ, आदिनाथ के बाद।
इतिहासकारों के अनुसार नाथ पंथ का व्यवस्थित रूप 9वीं से 12वीं शताब्दी के बीच आया। ये वो समय था जब भारत में बौद्ध धर्म का पतन हो रहा था और कई तांत्रिक पंथ बिखर रहे थे। ऐसे समय में मत्स्येंद्रनाथ जी ने बिखरी हुई योग परम्पराओं को एक सूत्र में पिरोया।
और उनके शिष्य ने इस पंथ को अमर कर दिया। वो शिष्य थे - गुरु गोरक्षनाथ जी।
यहाँ एक बात समझिए, अगर गोरक्षनाथ जी नहीं होते तो आज जो योग पूरी दुनिया कर रही है, वो योग होता ही नहीं। जी हाँ, आज जिम में, अमेरिका में, यूरोप में जो योगा मैट बिछाकर योग किया जाता है, उसका असली जनक नाथ पंथ ही है। कैसे? वो आगे बताऊंगा।
गोरखनाथ जी - जिन्होंने इतिहास बदल दिया
गोरखनाथ जी का जन्म कहाँ हुआ, इसे लेकर मतभेद हैं। कोई पंजाब कहता है, कोई पूर्वी भारत। लेकिन उनका कार्यक्षेत्र पूरा भारतवर्ष रहा।
गोरखनाथ जी ने क्या किया? उन्होंने दो महान काम किये।
पहला - उन्होंने हठयोग को जन्म दिया। हठ मतलब - ह और ठ। ह मतलब सूर्य, ठ मतलब चंद्रमा। शरीर के अंदर सूर्य और चंद्र नाड़ियों को संतुलित करने की विद्या। आज की भाषा में कहें तो Body और Mind को साधने की सबसे वैज्ञानिक पद्धति। गोरक्ष संहिता, गोरक्ष शतक, सिद्ध सिद्धांत पद्धति जैसे ग्रंथ आज भी योग का आधार हैं।
दूसरा - उन्होंने नाथ समाज को संगठित किया। उन्होंने पूरे भारत में घूम-घूम कर 12 पंथों की स्थापना की।
और यहीं से नाथ समाज एक पंथ से एक विशाल समाज बन गया।
नाथ समाज के 12 पंथ और 18 वर्ण
दोस्तों, नाथ समाज कोई एक जाति नहीं है। ये एक विशाल वटवृक्ष है।
गोरखनाथ जी ने जिन 12 पंथों की स्थापना की, उनके नाम हैं:१. सत्यनाथी पंथ,२ . धर्मनाथीपंथ,३ . रामपंथ,४ . नाटेश्वरीपंथ,५. कंथड़पंथ,६. कपि लानी पंथ,७. वैराग्य पंथ,८. माननाथी पंथ,९. आई पंथ,१०.पागल पंथ,११. ध्वज पंथ,१२. गंगानाथी पंथ
हर पंथ का अपना अलग कार्य, अपनी अलग पहचान थी। कोई धूनी रमाता था, कोई राजाओं को उपदेश देता था, कोई आयुर्वेद का ज्ञाता था।
और 9 नाथ और 84 सिद्ध... ये इस परम्परा के स्तंभ हैं। 9 नाथों में गोरक्षनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, जालंधरनाथ, कानिफनाथ जैसे महान योगी आते हैं।
इतिहास कैसे बदला?
अब आते हैं हमारे टाइटल पर - इतिहास कैसे बदला?
योग क्रांति: नाथ योगियों ने योग को गुफाओं से निकालकर आम आदमी तक पहुंचाया। उन्होंने कहा - हर इंसान योगी बन सकता है।
राजनीतिक शक्ति: आप जानकर हैरान होंगे, नेपाल का राजवंश खुद को गोरखनाथ जी का वंशज मानता था। जोधपुर, बीकानेर जैसे कई राज्यों के राजगुरु नाथ जोगी ही होते थे। राजा युद्ध पर जाता था तो नाथ योगी की भभूत लेकर जाता था।
सामाजिक क्रांति: नाथ पंथ ने जात-पात को कभी नहीं माना। उनका एक ही नारा था - "अलख निरंजन"। मतलब, जो दिखता नहीं, वही सत्य है। उनके यहाँ हर जाति, हर धर्म के लोग दीक्षित हो सकते थे। ये उस समय की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांति थी।
साहित्य और भाषा: गोरखनाथ जी हिंदी साहित्य के पहले बड़े कवि माने जाते हैं। उन्होंने संस्कृत को छोड़कर आम जन की भाषा में उपदेश दिए।
दोस्तों, अगर आप यहाँ तक आ गए हैं, तो आपको ये इतिहास गर्व महसूस करा रहा होगा। तो इस गर्व को कमेंट में जरूर दिखाइए। कमेंट में लिखिए - "आदेश आदेश, जय बाबा गोरखनाथ" या "हर हर महादेव"
और हाँ, इस चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लीजिये, क्योंकि हम ऐसे ही विस्मृत इतिहास आपके सामने लाते रहेंगे।
नाथ समाज का वर्तमान
समय बदला, मुगल आए, अंग्रेज आए। नाथ समाज जो कभी राजगुरु था, धीरे-धीरे घुमंतू और अलख जगाने वाला समाज बन गया। आज नाथ समाज भारत, नेपाल, पाकिस्तान तक फैला हुआ है।
आज भी आप देखेंगे, नाथ समाज के लोग कान में कुंडल पहनते हैं - इसे दर्शन या मुद्रा कहते हैं। गले में काली ऊन का जनेऊ - जिसे सेली कहते हैं। हाथ में चिमटा, और कंधे पर झोली। ये सिर्फ वेश नहीं, ये एक पूरी योग परम्परा है।
आज नाथ समाज OBC में आता है और अपने हक और इतिहास को फिर से पहचान रहा है।
तो दोस्तों, नाथ समाज कोई साधारण समाज नहीं है। ये शिव की परम्परा है, योग की परम्परा है, त्याग की परम्परा है।
ये वो पंथ है जिसने सिखाया - भटको मत, अपने अंदर ही ईश्वर को खोजो।
मुझे उम्मीद है आज आपको नाथ समाज के गौरवशाली इतिहास के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला होगा।
इस वीडियो को अपने हर नाथ भाई तक शेयर जरूर करें। ताकि हर नाथ युवा को अपने इतिहास पर गर्व हो।
वीडियो को लाइक करें,
फिर मिलेंगे एक और गौरवशाली इतिहास के साथ। तब तक के लिए...
आदेश! आदेश! अलख निरंजन!
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1.9.26
स्वामी विवेकानंद: Ek Sant, Ek Soch, Ek Kranti

एक सवाल।
एक ऐसा भारतीय संन्यासी, जिसके पास पहनने को दो जोड़ी भगवा वस्त्र भी नहीं थे...
जेब में एक रुपया नहीं था...
वो अमेरिका गया, और पूरे अमेरिका को 3 मिनट में अपना बना लिया?
11 सितंबर 1893। शिकागो।
जब उसने सिर्फ पाँच शब्द कहे - "My Sisters and Brothers of America" - मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों...
तो सात हजार लोगों का पूरा हॉल 2 मिनट तक खड़ा होकर तालियाँ बजाता रहा।
वो संत कौन था? वो विचार क्या था? जिसने एक युग बदल दिया?
आज की इस वीडियो में हम बात करेंगे - एक संत, एक विचार, एक युग - स्वामी विवेकानंद की।
अंत तक देखिएगा, क्योंकि अंत में मैं आपको बताऊंगा, विवेकानंद का वो एक मंत्र, जो आज आपके जीवन की सारी निराशा को खत्म कर सकता है।
शुरू करते हैं।
जन्म - नरेंद्र से विवेकानंद बनने से पहले
हुए]
12 जनवरी 1863। कोलकाता।
मकर संक्रांति का दिन था।
विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी के घर एक बालक का जन्म हुआ। नाम रखा गया - नरेंद्रनाथ दत्त।
बचपन से ही बहुत नटखट। बहुत जिज्ञासु।
माँ ने नाम रखा था वीरेश्वर। यानी शिव का अंश। और सच में, उसमें शिव जैसा ही तेज था।
कहते हैं, बचपन में नरेंद्र को कोई भी चीज़ बिना तर्क के स्वीकार नहीं थी।
एक बार पिता ने पूछा - "तुम दूसरों का जूठा क्यों नहीं खाते?"
तो नरेंद्र ने कहा - "अगर मैं सब में एक ही ईश्वर को देखता हूँ, तो ऊंच-नीच कैसी?"
सोचिए, 8-10 साल का बच्चा इतनी बड़ी बात कह रहा है।
स्कूल में वो बहुत होशियार था। दर्शन, इतिहास, संगीत, सब में अव्वल।
पर उसके मन में एक ही सवाल घूमता था - क्या भगवान है? क्या किसी ने भगवान को देखा है?
इस एक सवाल ने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी।
वो ब्रह्म समाज में गया। कई संतों से मिला। हर किसी से एक ही सवाल पूछा - "क्या आपने ईश्वर को देखा है?"
सबने कहा - "हमने सुना है, पढ़ा है।"
लेकिन किसी ने नहीं कहा - "हाँ, मैंने देखा है।"
फिर एक दिन... उसकी मुलाकात हुई एक ऐसे व्यक्ति से, जो बंगाल के एक छोटे से मंदिर में पुजारी था।
नाम था - रामकृष्ण परमहंस।
नरेंद्र ने वही सवाल पूछा - "क्या आपने ईश्वर को देखा है?"
रामकृष्ण ने हंसते हुए कहा - "हाँ। मैं ईश्वर को वैसे ही देखता हूँ, जैसे तुम्हें देख रहा हूँ। बल्कि उससे भी ज्यादा स्पष्ट।"
बस। नरेंद्र को उसका गुरु मिल गया था।
गुरु-शिष्य का वो अलौकिक बंधन
रामकृष्ण परमहंस अनपढ़ थे। लेकिन ज्ञान का सागर थे।
और नरेंद्र... तर्क करने वाला, अंग्रेजी पढ़ा-लिखा, नास्तिकता की ओर झुका हुआ युवक।
यह मिलन अजीब था। लेकिन यही मिलन भारत का भविष्य बदलने वाला था।
रामकृष्ण ने नरेंद्र को सिखाया - "खाली पेट धर्म नहीं होता।"
उन्होंने कहा - "जहाँ जीव है, वहीं शिव है। मानव की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।"
नरेंद्र पहले मजाक उड़ाता था। कहता था - "ये काली-काली क्या है? पत्थर की पूजा?"
लेकिन रामकृष्ण ने उसे अनुभव करवाया। समाधि का अनुभव।
1886 में रामकृष्ण का देहांत हो गया। जाते-जाते उन्होंने अपनी सारी शक्तियाँ नरेंद्र को दे दीं।
उन्होंने कहा था - "नरेन, तू पूरी दुनिया को हिलाएगा।"
गुरु के जाने के बाद नरेंद्र टूट गया। घर में गरीबी थी। पिता का देहांत हो चुका था। नौकरी नहीं थी।
लेकिन उसने संन्यास ले लिया।
अपने 7-8 गुरु-भाइयों के साथ वराहनगर में एक टूटे-फूटे मकान में मठ शुरू किया।
और यहीं उसका नाम पड़ा - स्वामी विवेकानंद।
विवेक... यानी विवेक बुद्धि। आनंद... यानी जो हमेशा आनंद में रहे।
भारत भ्रमण - असली भारत को देखना
1888 से 1893 तक। लगभग 5 साल।
विवेकानंद ने पैदल पूरे भारत की यात्रा की। कन्याकुमारी से हिमालय तक।
राजा के महल में भी रहे, और गरीब की झोपड़ी में भी।
और यहीं उन्होंने असली भारत को देखा।
एक तरफ वेदों का ज्ञान... दूसरी तरफ भूख से मरता हुआ किसान।
एक तरफ मंदिरों में सोना... दूसरी तरफ छुआछूत और जातिवाद।
वो रो पड़े। उन्होंने कहा - "मैंने भगवान को हर जगह खोजा, लेकिन भारत के गरीबों में ही मुझे भगवान दिखा।"
कन्याकुमारी में... समुद्र के बीच एक चट्टान पर...
उन्होंने 3 दिन और 3 रात बिना खाए-पिए ध्यान किया।
वहीं उन्हें भारत के भविष्य का रास्ता दिखा।
उन्होंने तय किया - भारत को जगाना होगा। लेकिन धर्म के साथ-साथ रोटी भी देनी होगी।
और इसी उद्देश्य से वो अमेरिका जाने के लिए निकले।
: शिकागो धर्म संसद - जब विश्व ने भारत को सुना
यह कहानी हर भारतीय को पता होनी चाहिए।
1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में विश्व धर्म संसद हो रही थी।
दुनिया भर के धर्म-गुरु आए थे।
विवेकानंद के पास न तो निमंत्रण था, न पैसे।
बड़ी मुश्किल से वो पहुंचे।
पहले दिन उन्हें बोलने का मौका नहीं मिला।
दूसरे दिन... दोपहर बाद... जब सब थक चुके थे...
तब आयोजकों ने कहा - "अब भारत के एक संन्यासी बोलेंगे।"
विवेकानंद मंच पर आए। भगवा पगड़ी। तेजस्वी चेहरा।
उन्होंने शुरू किया - "Sisters and Brothers of America..."
और क्या हुआ, आप जानते हैं। 7000 लोग खड़े हो गए। तालियों की गड़गड़ाहट 2 मिनट तक नहीं रुकी।
फिर उन्होंने जो भाषण दिया, वो इतिहास बन गया।
उन्होंने कहा - "मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से आता हूँ, जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति सिखाई है।"
"हम सिर्फ सहिष्णुता में विश्वास नहीं करते, हम सभी धर्मों को सच्चा मानते हैं।"
"जैसे अलग-अलग नदियां अलग-अलग रास्तों से बहकर अंत में समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे ही अलग-अलग धर्म अलग-अलग रास्ते से अंत में एक ही ईश्वर तक पहुंचते हैं।"
उस दिन... उस एक भाषण ने... पूरे विश्व में भारत की छवि बदल दी।
जिस भारत को अंग्रेज सपेरों और भूखे लोगों का देश कहते थे... उसी भारत को अब विश्व गुरु के रूप में देखा जाने लगा।
अमेरिका के अखबारों ने लिखा - "यह आदमी तो ईसाई पादरियों से भी बड़ा ईसाई है।"
विवेकानंद 4 साल तक अमेरिका और यूरोप में रहे। उन्होंने वेदांत का प्रचार किया।
: एक विचार जिसने युग बनाया
विवेकानंद का विचार क्या था? सिर्फ पूजा-पाठ?
बिल्कुल नहीं।
उनका पहला विचार था - "उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।"
यह सिर्फ युवाओं के लिए नहीं था। यह सोए हुए भारत के लिए था।
दूसरा विचार - "तुममें अनंत शक्ति है। तुम ही ईश्वर हो। अपने आप को कमजोर मत समझो।"
वो कहते थे - "All power is within you. You can do anything and everything."
तीसरा विचार - दरिद्र-नारायण की सेवा।
उन्होंने कहा - "अगर तुम ईश्वर को खोजना चाहते हो, तो मंदिर की मूर्ति में नहीं, गरीब के चेहरे में खोजो।"
इसी विचार से उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की - 1 मई 1897 को।
और इसी संदर्भ में मुझे एक बहुत सुंदर बात याद आती है।
जैसा कि आध्यात्मवेत्ता डॉ. दयाराम आलोक जी कहते हैं -
"विवेकानंद ने अध्यात्म को हिमालय की गुफाओं से निकालकर गरीब की झोपड़ी और युवा के हृदय में प्रतिष्ठित कर दिया। उन्होंने बताया कि ध्यान केवल आंखें बंद करना नहीं, बल्कि आंखें खोलकर दूसरों का दुख देखना भी है।"
कितनी गहरी बात है। यही तो विवेकानंद का सार है।
PART 6: अंतिम दिन और आज की प्रासंगिकता
विवेकानंद ज्यादा दिन जीवित नहीं रहे।
सिर्फ 39 साल 5 महीने और 24 दिन।
4 जुलाई 1902। बेलूर मठ।
सुबह उन्होंने ध्यान किया। शिष्यों को पढ़ाया। दोपहर में थोड़ा विश्राम किया।
शाम को 9 बजकर 10 मिनट पर... ध्यान करते-करते... उन्होंने महासमाधि ले ली।
डॉक्टरों ने कहा - दिल का दौरा। लेकिन उनके शिष्यों ने कहा - उन्होंने अपनी इच्छा से शरीर छोड़ा। क्योंकि उनका काम पूरा हो गया था।
आज 2026 में... 120 साल बाद भी... विवेकानंद क्यों प्रासंगिक हैं?
क्योंकि आज भी युवा निराश है। उसे नौकरी नहीं मिल रही। उसे दिशा नहीं मिल रही।
आज भी हम धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं।
और विवेकानंद कहते हैं - "तुम मत डरो। डर ही मृत्यु है।"
"एक विचार लो। उस विचार को अपना जीवन बना लो। उसी के बारे में सोचो, उसी का सपना देखो। वही तुम्हें सफल बनाएगा।"
क्या यह बात आज के स्टार्टअप युग के लिए, आज के विद्यार्थियों के लिए प्रासंगिक नहीं है?
बिल्कुल है।
तो दोस्तों, यह थी कहानी - एक संत, एक विचार, एक युग की।
एक ऐसे लड़के की जो भगवान को खोजने निकला था और पूरी दुनिया को भारत का दर्शन दे गया।
मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ - आज इस वीडियो से आपने क्या सीखा?
क्या आप भी अपने अंदर की अनंत शक्ति को पहचानेंगे?
अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो... तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर कीजिए।
क्योंकि आपका एक लाइक, इस महान विचार को एक और युवा तक पहुंचा सकता है।
और हाँ... कमेंट में जरूर लिखिए - "उठो, जागो" - ताकि मुझे पता चले कि आप अंत तक मेरे साथ थे।
मैं ऐसे ही भारत के महान संतों और विचारों पर वीडियो लाता रहता हूँ। तो चैनल को सब्सक्राइब करना मत भूलिएगा। बेल आइकन दबा दीजिए।
अगली बार हम बात करेंगे - स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण के उन 5 वाक्यों पर, जो आपकी सोच बदल देंगे।
तब तक के लिए... अपने आप पर विश्वास रखिए। आप में ही ब्रह्मांड की सारी शक्तियां हैं।
जय हिंद। जय विवेकानंद।
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30.8.26
"एक राजा जो प्रजा के दिल में बसता है - छत्रपती शिवाजी महाराज

सोचिए... एक ऐसा राजा, जिसके पास सोने का सिंहासन था, पर वो जमीन पर बैठकर किसान से बात करता था।
एक ऐसा राजा, जिसकी सेना दुश्मन से लड़ती थी, पर कभी किसी खेत की एक फसल तक नहीं उजाड़ती थी।
एक ऐसा राजा, जो आज से 350 साल पहले चला गया... पर आज भी हर महाराष्ट्रियन के घर में, हर भारतीय के दिल में जिंदा है।
वो कोई कहानी का किरदार नहीं है। वो हैं... हिन्दवी स्वराज्य के संस्थापक... जाणता राजा... छत्रपती शिवाजी महाराज।
और आज हम जानेंगे कि आखिर क्यों, एक राजा... प्रजा के दिल का राजा बन गया।
नमस्कार! स्वराज्य के इस पावन इतिहास में आपका स्वागत है।
छत्रपती शिवाजी महाराज का नाम सुनते ही हमारे मन में एक तस्वीर आती है। घोड़े पर सवार, हाथ में तलवार, भगवा ध्वज लहराता हुआ एक योद्धा।
लेकिन क्या शिवाजी महाराज सिर्फ एक योद्धा थे? क्या वो सिर्फ एक कुशल सेनापति थे?
नहीं।
अगर वो सिर्फ योद्धा होते, तो इतिहास में कई योद्धा आए और चले गए, उन्हें भुला दिया जाता। शिवाजी महाराज को भुलाया नहीं जा सका, क्योंकि वो एक योद्धा से बढ़कर एक विचार थे। एक व्यवस्था थे। एक भरोसा थे।
आज इस वीडियो में हम उनके जीवन परिचय को सिर्फ तारीखों में नहीं, बल्कि उनके उन फैसलों में देखेंगे, जिन्होंने उन्हें प्रजा के दिल में बसाया।
जन्म और संस्कार - जिजाबाई की भूमिका
कहानी शुरू होती है 19 फरवरी 1630 से। जगह... पुणे के पास शिवनेरी किला।
पिता शाहजी भोसले, जो बीजापुर सल्तनत के एक पराक्रमी सरदार थे। और माता... राजमाता जिजाबाई।
और यहीं पर पहला रहस्य छिपा है। शिवाजी को राजा शाहजी ने नहीं, जिजाबाई ने बनाया।
जब शाहजी बीजापुर की राजनीति में व्यस्त थे, तब जिजाबाई ने अकेले ही पुणे की जहागीर संभाली। उन्होंने ही शिवबा को रामायण, महाभारत, और महाभारत के वीरों की कहानियां सुनाईं।
उन्होंने अपने बेटे को सिखाया... बेटा, सोने की चम्मच से नहीं, मिट्टी से प्यार करना सीखो। इस मिट्टी पर जो रहता है, वही तुम्हारा अपना है।
गुरु दादोजी कोंडदेव ने उन्हें युद्धनीति, घुड़सवारी, तलवारबाजी और राजनीति सिखाई। पर जिजाबाई ने उन्हें एक मंत्र दिया... रयतेचा राजा हो। प्रजा का राजा बनो।
सिर्फ 15 साल की उम्र में, 1645 में, शिवाजी ने रोहिडेश्वर के मंदिर में अपने मावलों के साथ मिलकर हिन्दवी स्वराज्य की शपथ ली। ये शपथ किसी सिंहासन के लिए नहीं थी। ये शपथ थी, इस मिट्टी पर रहने वाले हर गरीब, हर किसान, हर महिला के स्वाभिमान के लिए।
एक अलग तरह का राजा
उस समय का भारत देखिए। चारों तरफ सल्तनतें थीं। मुगल, आदिलशाही, कुतुबशाही। हर जगह एक ही नियम था। राजा... प्रजा से कर वसूलता है। और प्रजा... राजा से डरती है।
शिवाजी महाराज ने इस नियम को ही पलट दिया।
उनके राज्य में दो सबसे बड़े नियम थे।
पहला नियम... औरत की इज्जत।
एक प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। जब कल्याण के सूबेदार की बहू को मराठा सैनिक सम्मान के साथ शिवाजी के सामने लाए, तो सोचा कि राजा खुश होगा। शिवाजी महाराज ने उस महिला को अपनी माँ कहकर संबोधित किया और पूरे सम्मान के साथ, वस्त्र और आभूषण देकर वापस भेज दिया। और अपने सैनिकों को कड़ा संदेश दिया... पराई स्त्री माता समान है। जो इस नियम को तोड़ेगा, उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।
दूसरा नियम... किसान की फसल।
उस दौर में सेनाएं जहां से गुजरती थीं, फसलों को रौंद देती थीं। शिवाजी महाराज का स्पष्ट आदेश था... किसी भी मावले को, किसी भी सैनिक को, किसान की फसल को हाथ लगाने का अधिकार नहीं है। अगर सेना को अनाज चाहिए, तो बाकायदा कीमत देकर खरीदा जाएगा। अगर कोई सैनिक जबरदस्ती करेगा, तो उसे सजा मिलेगी।
इसी कारण, किसान उन्हें राजा नहीं, अपना भाई, अपना बेटा मानते थे। जब शिवाजी की सेना आती थी, तो गाँव के लोग डरकर भागते नहीं थे, बल्कि आरती लेकर स्वागत करते थे। यही वो कारण था, जो उन्हें प्रजा के दिल में बसाता था।
इस विषय पर एक बहुत गहरी बात कही गई है।
जाने माने इतिहासवेत्ता डॉ. दयाराम आलोक लिखते हैं ----- "छत्रपती शिवाजी महाराज का स्वराज्य, तलवार से जीता गया प्रदेश नहीं था, बल्कि विश्वास से जीता गया हृदयों का साम्राज्य था। उन्होंने किले तो जीते ही, पर उससे पहले उन्होंने लोगों का भरोसा जीता। इसीलिए उनका राज्य नक्शे पर नहीं, लोगों के मन में बसता था।"
कितनी सटीक बात है। उन्होंने हृदयों का साम्राज्य जीता।
युद्धनीति नहीं, बुद्धिनीति - गनिमी कावा]
अब बात करते हैं उनकी वीरता की। शिवाजी के पास कभी मुगलों जैसी बड़ी सेना नहीं थी। औरंगजेब के पास लाखों सैनिक थे। शिवाजी के पास कुछ हजार मावले थे।
तो वो जीते कैसे?
उन्होंने गनिमी कावा... यानी गुरिल्ला युद्ध पद्धति का उपयोग किया। वो जानते थे कि ताकतवर दुश्मन को उसकी ताकत से नहीं, उसकी कमजोरी से हराया जाता है।
सह्याद्री के पहाड़, घने जंगल, और किले... यही उनकी सेना थी।
अफजल खान का वध... 1659। आदिलशाह ने अपने सबसे क्रूर सरदार अफजल खान को भेजा। उसने कहा... मैं शिवाजी को जिंदा या मुर्दा लेकर आऊंगा। वो प्रतापगढ़ आया। शिवाजी जानते थे कि खुली लड़ाई में वो नहीं जीत सकते। उन्होंने कूटनीति का सहारा लिया। मुलाकात का नाटक किया। और जब अफजल खान ने धोखे से वार किया, तो शिवाजी ने बाघनख से उसका वध कर दिया। ये सिर्फ ताकत नहीं, बुद्धि की जीत थी।
फिर आगरा से पलायन... 1666। औरंगजेब ने उन्हें कैद कर लिया। दुनिया ने सोचा, अब स्वराज्य खत्म। पर शिवाजी मिठाई के टोकरों में छिपकर अपने बेटे संभाजी के साथ निकल गए। ये दुनिया के इतिहास के सबसे साहसिक पलायनों में से एक है।
और फिर... शाइस्ता खान पर हमला। 1663 में। शाइस्ता खान पुणे में उसी लाल महल में रुका था, जहाँ शिवाजी का बचपन बीता था। रात के अंधेरे में, सिर्फ 400 चुनिंदा मावलों के साथ शिवाजी ने हमला किया। शाइस्ता खान अपनी तीन उंगलियां गंवाकर भाग गया।
इन घटनाओं ने एक संदेश दिया... ये राजा हार मानने वाला नहीं है। ये अपने लोगों के लिए कुछ भी कर सकता है।
राज्याभिषेक और प्रशासन - एक आदर्श शासक]
6 जून 1674। रायगढ़ किला।
उस दिन सिर्फ एक राजा का राज्याभिषेक नहीं हो रहा था। उस दिन सदियों की गुलामी के बाद, इस मिट्टी के एक बेटे ने खुद को छत्रपती घोषित किया। काशी के विद्वान गागा भट्ट ने उनका राज्याभिषेक किया।
लेकिन राज्याभिषेक के बाद उन्होंने क्या किया? उन्होंने सोने-चांदी के महल नहीं बनवाए। उन्होंने अष्टप्रधान मंडल बनाया। यानी आठ मंत्रियों की एक परिषद। पेशवा, अमात्य, सचिव... हर विभाग का एक विशेषज्ञ। ये आज की कैबिनेट सिस्टम जैसा ही था।
उन्होंने पहली बार नौसेना... भारतीय नौसेना की नींव रखी। उन्हें भारतीय नौसेना का जनक कहा जाता है। उन्होंने सिंधुदुर्ग और विजयदुर्ग जैसे समुद्री किले बनवाए। क्योंकि वो जानते थे, जो समुद्र पर राज करेगा, वही भारत पर राज करेगा।
उनका प्रशासन... कर प्रणाली बहुत ही न्यायपूर्ण थी। उन्होंने जमींदारी प्रथा को खत्म किया। सीधे किसानों से कर लिया जाता था। और अकाल के समय कर माफ भी कर दिया जाता था।
3 अप्रैल 1680 को, 50 साल की उम्र में, रायगढ़ में शिवाजी महाराज ने देह त्याग दी।
शरीर चला गया। पर विचार नहीं गया।
आज भी, जब कोई नेता, कोई अधिकारी, कोई युवा, ईमानदारी और न्याय की बात करता है, तो उसे शिवाजी महाराज का उदाहरण दिया जाता है।
क्यों? क्योंकि उन्होंने हमें सिखाया कि राजा होना... ताकत का प्रतीक नहीं है। राजा होना... जिम्मेदारी का प्रतीक है।
एक राजा... जो प्रजा के दिल में बसता है... वो कभी मरता नहीं है।
अगर आपको ये कहानी, स्वराज्य की ये गाथा, दिल को छू गई हो, तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर कीजिए।
कमेंट में... जय भवानी, जय शिवाजी... जरूर लिखिए, ताकि ये स्वराज्य की गर्जना हर कोने तक पहुंचे।
और ऐसे ही, हमारे भारत के वीरों की अनसुनी और सच्ची कहानियों के लिए, इस चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन दबा दीजिए।
मैं मिलता हूँ आपसे अगले वीडियो में, एक और ऐसे ही जाणता राजा की कहानी के साथ।
जय हिन्द। जय महाराष्ट्र।
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Chhatrapati Shivaji Maharaj,
Ek Raja Jo Praja Ke Dil Me Basta Hai,
Janta Raja,
Shivaji Maharaj Jivan Parichay
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28.8.26
वो कभी झुका नहीं - Ek Yoddha, Ek Itihas, Maharana Pratap

सोचिए...
एक राजा... जिसके पास न महल था... न सेना थी... न खजाना था...
फिर भी... हिंदुस्तान के सबसे ताकतवर बादशाह अकबर ने उसे कभी हरा नहीं पाया!
घास की रोटी खाई... जंगलों में सोया...
लेकिन... मेवाड़ की मिट्टी का सौदा नहीं किया।
मैं बात कर रहा हूँ... मेवाड़ के शेर... वीर शिरोमणि... महाराणा प्रताप की...
जो कभी झुका नहीं... और कभी रुका नहीं।
नमस्कार, मैं हूँ डॉ . दयाराम आलोक और आप देख रहे हैं gyanoday
आज की कहानी है... स्वाभिमान की... शौर्य की... और एक ऐसे योद्धा की... जिसने इतिहास को बता दिया... कि जीत तलवार से नहीं... हौसले से मिलती है।
जन्म और संकल्प
9 मई 1540... मेवाड़ के कुम्भलगढ़ किले में... महाराणा उदय सिंह के घर जन्म हुआ... प्रताप का।
बचपन से ही... निडर... घुड़सवारी में माहिर... और तलवार का धनी।
1572 में... जब वो मेवाड़ के राजा बने... तब सामने थी... अकबर की विशाल सल्तनत।
अकबर का प्रस्ताव था - संधि कर लो... मेरा आधिपत्य स्वीकार कर लो... सुख से रहो।
पर प्रताप का जवाब था - मेवाड़ स्वतंत्र था... है... और रहेगा।
हल्दीघाटी का युद्ध - [यहाँ आपका कोट शामिल है]
और फिर आया... 18 जून 1576 का वो दिन... हल्दीघाटी का युद्ध।
एक तरफ... अकबर की 80 हजार की सेना... मानसिंह के नेतृत्व में...
दूसरी तरफ... महाराणा प्रताप के सिर्फ 20 हजार वीर।
यहीं पर इतिहास ने... चेतक का बलिदान देखा।
जैसा कि भारतीय इतिहास के जानकार डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार --- "हल्दीघाटी का युद्ध केवल दो सेनाओं का युद्ध नहीं था, यह दो विचारधाराओं का युद्ध था। एक तरफ साम्राज्यवाद था, दूसरी तरफ स्वाभिमान। महाराणा प्रताप भले ही रणभूमि से हटे, पर वे हारे नहीं। उन्होंने अकबर की अधीनता को कभी स्वीकार नहीं किया, यही उनकी सबसे बड़ी जीत थी।"
सच है... युद्ध अनिर्णायक रहा... पर अकबर मेवाड़ को कभी जीत नहीं पाया।
संघर्ष के दिन
युद्ध के बाद... प्रताप ने जंगल-जंगल भटकना स्वीकार किया...
उनके परिवार ने घास की रोटियां खाईं... पर कभी... अकबर के सामने सिर नहीं झुकाया।
कहते हैं... एक बार... उनकी बेटी के हाथ से घास की रोटी... जंगली बिल्ली छीन ले गई... और वो रो पड़ी...
यह सुनकर प्रताप का दिल पसीज गया... उन्होंने अकबर को पत्र लिखने का सोचा... पर तभी... पृथ्वीराज राठौड़ का पत्र आया... "क्षत्रिय का धर्म समझौता नहीं... संघर्ष है।"
और प्रताप फिर उठ खड़े हुए।
उन्होंने... भामाशाह के सहयोग से... फिर से सेना बनाई... और मेवाड़ के एक-एक किले को... वापस जीत लिया... चित्तौड़ को छोड़कर।
6. OUTRO - प्रेरणा
19 जनवरी 1597... एक शिकार दुर्घटना में... ये महान योद्धा... हमें छोड़कर चला गया...
पर वो हमें एक संदेश दे गया...
कि... सुविधाएं छोड़ना आसान है... पर स्वाभिमान छोड़ना... मृत्यु के समान है।
वो कभी झुका नहीं... क्योंकि उसके लिए देश पहले था...
वो कभी रुका नहीं... क्योंकि उसका लक्ष्य स्वतंत्रता था।
अगर आपको लगता है... कि महाराणा प्रताप की ये कहानी... हर भारतीय युवा तक पहुँचनी चाहिए...
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जय मेवाड़... जय महाराणा प्रताप!
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Dr.Dayaram Aalok M.A.,Ayurved Ratna,D.I.Hom(London), Blog Writer,caste historian,Poet(kavitalok.blogspot.com),Social worker(damodarjagat.blogspot.com),Herbalist(remedyherb.blogspot.com,healinathome.blogspot.com),Used to organize Mass marriage programs for Darji Community. founder and president Damodar Darji Mahasangh
वो एक प्रतिज्ञा - Bhishma Pitamah Ki Kahani Jo Har Kisi Ko Rula Degi
भीष्म पितामह की दर्दनाक कथा
क्या कोई प्रतिज्ञा इतनी भारी हो सकती है कि उसकी कीमत पूरे साम्राज्य को अपने खून से चुकानी पड़े? क्या कोई इंसान इतना शक्तिशाली हो सकता है कि साक्षात मृत्यु भी उसकी अनुमति के बिना उसे छू न सके, लेकिन फिर भी वो इतिहास का सबसे लाचार और बेबस इंसान बनकर जिए? महाभारत के युद्ध में अर्जुन के गांडीव से छूटे तीर जब एक-एक करके देवव्रत के सीने में समा रहे थे और जब उनका पूरा शरीर तीरों की शैया पर टिक गया, तब उनके मन में क्या चल रहा था? क्या उन्हें अपनी उस प्रतिज्ञा पर पछतावा हो रहा था जिसने हस्तिनापुर के सिंहासन को सुरक्षित करने के बजाय, उसे हमेशा के लिए श्मशान बना दिया? आज हम गंगापुत्र भीष्म की उसी दर्दनाक और विचलित कर देने वाली महागाथा को जानेंगे, जहाँ एक बेटा अपने पिता की खुशी के लिए अपना सर्वस्व दान कर देता है, लेकिन नियति उस दान के बदले में उसे इतिहास का सबसे बड़ा खलनायक या सबसे बेबस गवाह बना देती है।
इस कहानी की शुरुआत होती है हस्तिनापुर के प्रतापी राजा शांतनु से, जो एक दिन गंगा के किनारे टहल रहे थे और उनकी नजर साक्षात नदी सूक्त की देवी गंगा पर पड़ी। शांतनु उनके रूप पर मोहित हो गए और विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा ने विवाह तो स्वीकार किया, लेकिन एक भयानक शर्त रखी कि राजा कभी उनके किसी काम पर सवाल नहीं उठाएंगे, जिस दिन सवाल उठाया, गंगा उन्हें छोड़कर चली जाएगी। प्यार में डूबे शांतनु ने शर्त मान ली। इसके बाद जो हुआ, उसने शांतनु के कलेजे को चीर कर रख दिया। गंगा के गर्भ से जो भी संतान जनमती, गंगा उसे अपने ही हाथों नदी की तेज धार में बहा देती। एक-एक करके सात बेटों को गंगा ने नदी में विसर्जित कर दिया और राजा शांतनु अपने वचन में बंधे होने के कारण कुछ न बोल सके। लेकिन जब आठवां बेटा हुआ और गंगा उसे भी नदी में बहाने चली, तो शांतनु का सब्र टूट गया। उन्होंने गंगा का हाथ पकड़ लिया और कहा कि तुम कैसी मां हो जो अपनी ही संतानों की हत्या कर रही हो? शांतनु के इस सवाल के साथ ही गंगा की शर्त टूट गई। गंगा ने मुस्कुराकर कहा कि राजन, ये आठों वसु थे जिन्हें वसिष्ठ ऋषि का श्राप था, मैंने सात को जल्दी मुक्त कर दिया, लेकिन इस आठवें को मैं अपने साथ ले जा रही हूँ, इसे मैं पालकर तुम्हें वापस सौंप दूंगी। यही आठवां पुत्र देवव्रत बना, जिसे हम भीष्म के नाम से जानते हैं।
देवव्रत को साक्षात भगवान परशुराम ने अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी और देवगुरु बृहस्पति ने उन्हें राजनीति और वेदों का ज्ञान दिया। जब देवव्रत सर्वगुण संपन्न होकर हस्तिनापुर लौटे, तो राजा शांतनु की खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने तुरंत देवव्रत को युवराज घोषित कर दिया। पूरा हस्तिनापुर अपने नए होने वाले राजा की योग्यता देखकर झूम रहा था। लेकिन नियति ने हस्तिनापुर के भाग्य में कुछ और ही लिखा था। एक दिन राजा शांतनु यमुना नदी के तट पर घूम रहे थे, जहाँ उनकी नजर केवटराज की अत्यंत सुंदर पुत्री सत्यवती पर पड़ी। शांतनु एक बार फिर प्रेम के जाल में बंध गए और उन्होंने केवटराज से सत्यवती का हाथ मांग लिया। लेकिन केवटराज एक चतुर और दूरदर्शी व्यक्ति थे। उन्होंने राजा के सामने एक ऐसी शर्त रख दी जिसने शांतनु के पैरों तले से जमीन खिसका दी। केवटराज ने कहा कि राजा शांतनु, मुझे आपकी रानी बनने में अपनी बेटी की कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मेरी एक शर्त है कि आपकी मृत्यु के बाद हस्तिनापुर के सिंहासन पर मेरी बेटी सत्यवती की संतान ही बैठेगी, आपका बड़ा बेटा देवव्रत नहीं। शांतनु देवव्रत से अगाध प्रेम करते थे और वे जानते थे कि देवव्रत जैसा योग्य राजा हस्तिनापुर को कभी नहीं मिल सकता। उन्होंने केवटराज की इस अनुचित मांग को ठुकरा दिया और उदास मन से महल लौट आए।
राजा शांतनु अंदर ही अंदर घुटने लगे। वे न तो सत्यवती को भूल पा रहे थे और न ही अपने प्रिय पुत्र देवव्रत के साथ अन्याय कर पा रहे थे। उनकी यह उदासी और गिरता स्वास्थ्य देवव्रत से छुपा न रहा। देवव्रत ने राजा के सारथी से सारी बात उगलवा ली और बिना किसी को बताए, वे सीधे केवटराज के पास पहुंच गए। देवव्रत ने केवटराज से कहा कि हे केवटराज, आप अपनी पुत्री का विवाह मेरे पिता से कर दीजिए, मैं स्वतः ही हस्तिनापुर के सिंहासन का त्याग करता हूँ और प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं कभी राजा नहीं बनूँगा। केवटराज ने देवव्रत की इस उदारता को देखा, लेकिन वे फिर भी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने देवव्रत से एक और तीखा सवाल किया कि कुमार, आप तो महान हैं, आपने सिंहासन छोड़ दिया, लेकिन कल को जब आपकी संतानें होंगी, तो वे बहुत शक्तिशाली होंगी। क्या इस बात की गारंटी है कि आपके पुत्र मेरी बेटी के पुत्रों से सिंहासन नहीं छीनेंगे? तब क्या होगा? केवटराज का यह सवाल सुनते ही देवव्रत के भीतर का क्षत्रिय और एक समर्पित पुत्र जाग उठा। उन्होंने आकाश की तरफ देखा और पंचभूतों को गवाह मानकर एक ऐसी भीषण प्रतिज्ञा ली जिसकी गूंज आज हजारों साल बाद भी सुनाई देती है। देवव्रत ने कहा कि हे केवटराज, मैं आज इस भरी सभा में यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा, मैं कभी विवाह नहीं करूँगा और मेरी कोई संतान नहीं होगी। इस भयानक प्रतिज्ञा को सुनते ही देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और चारों तरफ एक ही आवाज गूंज उठी—भीष्म! भीष्म! यानी जिसने इतनी कठिन और भीषण प्रतिज्ञा ली हो।
जब शांतनु को इस बात का पता चला, तो वे रो पड़े। उन्होंने अपने पुत्र के इस महान त्याग को देखकर भावुक होकर उन्हें एक वरदान दिया—इच्छा मृत्यु का वरदान। शांतनु ने कहा कि पुत्र देवव्रत, तुमने मेरे लिए अपना पूरा जीवन, अपना सुख और अपना वंश दांव पर लगा दिया, इसलिए जब तक तुम खुद नहीं चाहोगे, मृत्यु तुम्हारे पास फटक भी नहीं सकेगी। लेकिन यहाँ पर इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना शुरू होती है। पौराणिक कथाओं के जानकार डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार, भीष्म की यह प्रतिज्ञा केवल एक पुत्र का अपने पिता के प्रति प्रेम नहीं थी, बल्कि हस्तिनापुर के भविष्य को अंधकार में धकेलने वाली एक ऐसी भूल थी जिसने कुरुवंश को अंतहीन विवादों में फंसा दिया। डॉ. दयाराम आलोक का मानना है कि यदि भीष्म ने वह प्रतिज्ञा न की होती, तो हस्तिनापुर को एक न्यायप्रिय और शक्तिशाली राजा मिलता, साम्राज्य कभी कमजोर हाथों में न जाता और न ही महाभारत का वह विनाशकारी युद्ध होता जिसने लाखों महिलाओं को विधवा और पूरे भारतवर्ष को अनाथ कर दिया। भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा से अपने पिता को तो सुखी कर दिया, लेकिन उन्होंने राज्य के प्रति अपने राजधर्म को भुला दिया।
इसके बाद शांतनु और सत्यवती का विवाह हुआ। उनके दो पुत्र हुए—चित्रांगद और विचित्रवीर्य। लेकिन नियति का खेल देखिए, राजा शांतनु की मृत्यु के कुछ समय बाद ही चित्रांगद एक गंधर्व युद्ध में मारे गए। अब सिंहासन पर विचित्रवीर्य को बैठाया गया, जो स्वभाव से बहुत कमजोर और विलासी थे। जब विचित्रवीर्य के विवाह की उम्र आई, तो भीष्म को पता चला कि काशीराज की तीन पुत्रियों—अंबा, अंबिका और अंबालिका का स्वयंवर हो रहा है। भीष्म हस्तिनापुर के साम्राज्य को सुरक्षित और शक्तिशाली बनाए रखने के लिए अकेले ही काशी पहुंच गए। उन्होंने वहाँ मौजूद सभी राजाओं को युद्ध में परास्त कर दिया और तीनों राजकुमारियों का बलपूर्वक हरण करके हस्तिनापुर ले आए। भीष्म को लगा कि उन्होंने अपने भाई के लिए बहुत बड़ा काम किया है, लेकिन यहीं से उनके जीवन का पहला बड़ा श्राप और दर्द शुरू हुआ। जब महल में विवाह की तैयारियां हो रही थीं, तब बड़ी राजकुमारी अंबा भीष्म के पास आई और रोते हुए कहा कि हे गांगेय, मैं मन ही मन शाल्व देश के राजा को अपना पति मान चुकी हूँ और वे भी मुझसे प्रेम करते हैं, आप मुझे बलपूर्वक यहाँ ले आए, लेकिन मेरा मन उनके पास ही है। भीष्म जो धर्म के ज्ञाता थे, उन्होंने अंबा की बात का सम्मान किया और उन्हें पूरे सम्मान के साथ राजा शाल्व के पास भेज दिया।
लेकिन दर्द की दास्तान यहाँ खत्म नहीं हुई। जब अंबा राजा शाल्व के पास पहुँची, तो शाल्व ने उसे अपनाने से साफ मना कर दिया। शाल्व ने कहा कि जिसे भीष्म ने युद्ध में जीतकर अपने रथ पर बैठाया हो, उसे मैं अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। तुम वापस भीष्म के पास जाओ। अंबा असहाय होकर वापस हस्तिनापुर भीष्म के पास आई और उसने भीष्म से कहा कि अब मेरा कोई आसरा नहीं है, इसलिए आप ही मुझसे विवाह कीजिए। लेकिन भीष्म अपनी भीषण प्रतिज्ञा से बंधे हुए थे। उन्होंने कहा कि हे देवी, मैं चाहकर भी तुमसे विवाह नहीं कर सकता क्योंकि मैंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है। अंबा ने भीष्म से बहुत मिन्नतें कीं, रोई-चिल्लाई, लेकिन भीष्म टस से मस नहीं हुए। क्रोध और अपमान की आग में जलती हुई अंबा ने भीष्म को श्राप दिया कि भीष्म, तुम्हारी इस प्रतिज्ञा के कारण आज मेरा जीवन नष्ट हो गया है, मेरा यह अपमान ही तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा। मैं अगले जन्म में लौटकर आऊँगी और तुम्हारी मौत का जरिया बनूँगी। यही अंबा अगले जन्म में राजा द्रुपद के यहाँ शिखंडी के रूप में पैदा हुई, जो महाभारत के युद्ध में भीष्म की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बना।
समय बीतता गया और भीष्म के जीवन का दर्द गहराता गया। विचित्रवीर्य की भी बिना किसी संतान के असमय मृत्यु हो गई। अब सत्यवती के सामने संकट था कि कुरुवंश का नाम कैसे आगे बढ़े? सत्यवती ने गिड़गिड़ाते हुए भीष्म से कहा कि पुत्र भीष्म, अब तुम अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दो और कुरुवंश को बचाने के लिए विवाह कर लो या नियोग प्रथा से संतान उत्पन्न करो। लेकिन भीष्म ने कहा कि माता, सूरज अपनी रोशनी छोड़ सकता है, धरती अपना धैर्य छोड़ सकती है, लेकिन भीष्म अपनी प्रतिज्ञा कभी नहीं तोड़ सकता। अंततः महर्षि वेदव्यास के आशीर्वाद से अंबिका और अंबालिका से धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म हुआ। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे और पांडु अस्वस्थ। भीष्म ने इन दोनों बच्चों को पाला-पोषा, उन्हें बड़ा किया और हस्तिनापुर को संभाला। भीष्म अब राजा नहीं थे, वे केवल सिंहासन के संरक्षक थे। वे एक ऐसी प्रतिज्ञा के पिंजरे में बंद हो चुके थे जहाँ से वे कुरुवंश को बिखरते हुए देख तो सकते थे, लेकिन अपनी शर्तों के कारण उसे रोक नहीं पा रहे थे।
जब कुरुवंश की अगली पीढ़ी यानी कौरव और पांडव बड़े हुए, तो भीष्म का दर्द और बढ़ गया। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र यानी कौरव, विशेषकर दुर्योधन, बचपन से ही ईर्ष्या और अहंकार से भरे हुए थे। भीष्म दोनों पक्षों से प्यार करते थे, लेकिन दुर्योधन हमेशा भीष्म पर यह आरोप लगाता था कि वे पांडवों का पक्ष लेते हैं। भीष्म जो पूरे आर्यावर्त के सबसे शक्तिशाली योद्धा थे, अपने ही घर में रोज अपमानित हो रहे थे। वे देख रहे थे कि कैसे दुर्योधन और शकुनि मिलकर पांडवों के खिलाफ षड्यंत्र रच रहे हैं। लाक्षागृह की घटना हो या पांडवों को जुए में हराने की साजिश, भीष्म सब कुछ जानते हुए भी असहाय थे। क्यों? क्योंकि उनकी प्रतिज्ञा ने उनके हाथ बांध दिए थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जो भी हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठेगा, वे उसके प्रति वफादार रहेंगे और उसकी आज्ञा का पालन करेंगे। सिंहासन पर धृतराष्ट्र बैठे थे, जो अपने पुत्र दुर्योधन के मोह में अंधे थे। इसलिए दुर्योधन जो भी पाप करता, भीष्म उसे राजधर्म की दुहाई देकर रोकने की कोशिश तो करते, लेकिन जब दुर्योधन उनकी बात नहीं मानता, तो भीष्म सिर झुकाकर बैठ जाते।
भीष्म के जीवन का सबसे काला और सबसे दर्दनाक अध्याय तब आया, जब हस्तिनापुर की भरी सभा में कुरुवंश की कुलवधू द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था। दुशासन द्रौपदी के बाल पकड़कर उसे खींचते हुए ला रहा था, शकुनि हंस रहा था, दुर्योधन अपनी जांघ ठोक रहा था, और द्रौपदी रोते हुए, चिल्लाते हुए कुरुवंश के सबसे बड़े बुजुर्ग भीष्म पितामह की तरफ देखकर न्याय की भीख मांग रही थी। द्रौपदी ने भीष्म से पूछा कि हे पितामह, आप तो धर्म के प्रतीक हैं, शास्त्रों के ज्ञाता हैं, मुझे बताइए कि क्या धर्मराज युधिष्ठिर खुद को हारने के बाद मुझे दांव पर लगा सकते थे? क्या इस तरह एक स्त्री का अपमान कुरुसभा की परंपरा है? उस समय भीष्म पितामह ने अपना सिर नीचे झुका लिया। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकला। उन्होंने केवल इतना कहा कि हे पुत्री, धर्म की गति बहुत सूक्ष्म है, मैं इस समय असमर्थ हूँ। इतिहास ने भीष्म को उस दिन कभी माफ नहीं किया। भीष्म की वह चुप्पी उनके जीवन का सबसे बड़ा पाप बन गई। साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने बाद में भीष्म से कहा था कि पितामह, जिस सभा में स्त्री का अपमान हो रहा हो, और वहाँ बैठा कोई ज्ञानी व्यक्ति यदि अपनी प्रतिज्ञा या नियमों की दुहाई देकर चुप रहे, तो वह भी उस पाप का बराबर का भागीदार बन जाता है। भीष्म का वह मौन कुरुवंश के विनाश का डेथ वारंट था।
और अंततः वह घड़ी आ ही गई जिसका डर सबको था—महाभारत का युद्ध। एक तरफ धर्म के प्रतीक पांडव थे जिनके साथ साक्षात नारायण यानी श्रीकृष्ण थे, और दूसरी तरफ अधर्म के प्रतीक कौरव थे। भीष्म पितामह जानते थे कि कौरव अधर्म पर हैं और उनका विनाश निश्चित है, लेकिन कुरु सिंहासन के प्रति अपनी वफादारी की प्रतिज्ञा के कारण उन्हें कौरवों की तरफ से लड़ना पड़ा। युद्ध की शुरुआत से पहले जब अर्जुन और युधिष्ठिर पितामह के पैर छूकर आशीर्वाद लेने आए, तो भीष्म की आंखों में आंसू थे। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि पुत्र, मेरा शरीर कौरवों के अन्न से पला है, इसलिए मैं लड़ूँगा तो उनकी तरफ से, लेकिन मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है कि विजय तुम्हारी ही हो। सोचिए, उस योद्धा की मानसिक स्थिति क्या रही होगी जिसे पता है कि वह जिसके लिए लड़ रहा है वह गलत है, और वह जिन्हें मार रहा है वे उसके अपने पोते हैं जिन्हें उसने अपनी गोद में खिलाया था।
युद्ध के पहले दस दिनों तक भीष्म ने पांडव सेना में कोहराम मचा दिया। कोई भी योद्धा उनके सामने टिक नहीं पा रहा था। दुर्योधन ने फिर भी भीष्म पर ताना मारा कि पितामह आप जानबूझकर पांडवों को नहीं मार रहे हैं क्योंकि आप उनसे प्यार करते हैं। इस अपमान से दुखी होकर भीष्म ने प्रतिज्ञा की कि कल या तो मैं अर्जुन का वध कर दूँगा या श्रीकृष्ण को शस्त्र उठाने पर मजबूर कर दूँगा, जिन्होंने युद्ध में हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा की है। अगले दिन भीष्म ने ऐसा भयंकर युद्ध किया कि अर्जुन के रथ के घोड़े घायल हो गए और अर्जुन असहाय हो गए। अपने भक्त अर्जुन के प्राण संकट में देखकर भगवान श्रीकृष्ण अपना आपा खो बैठे। वे रथ का एक पहिया उठाकर भीष्म की तरफ दौड़े। भीष्म ने जब भगवान को अपनी तरफ आते देखा, तो उन्होंने अपने धनुष-बाण रख दिए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। भीष्म ने कहा कि आइए प्रभु, यदि आपके हाथों मेरी मृत्यु होती है, तो मुझसे ज्यादा भाग्यशाली इस संसार में कोई नहीं होगा। श्रीकृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी, लेकिन भीष्म की इच्छा पूरी कर दी।
पांडव समझ गए थे कि जब तक भीष्म पितामह के हाथ में धनुष है, तब तक युद्ध जीतना नामुमकिन है। तब श्रीकृष्ण के इशारे पर युधिष्ठिर खुद भीष्म के पास पहुंचे और उनसे उनकी मृत्यु का उपाय पूछा। भीष्म ने मुस्कुराते हुए कहा कि पुत्र, मैं किसी भी ऐसे व्यक्ति पर शस्त्र नहीं उठाता जो कभी स्त्री रहा हो या जिसका व्यवहार स्त्री जैसा हो। तुम कल युद्ध में अर्जुन के रथ के आगे शिखंडी को खड़ा कर देना। अगले दिन कुरुक्षेत्र के मैदान में वही हुआ। अंबा का अगला जन्म, यानी शिखंडी, अर्जुन के रथ के आगे आकर खड़ा हो गया। जैसे ही भीष्म ने शिखंडी को देखा, उन्होंने अंबा के उस श्राप को याद किया और अपना धनुष नीचे रख दिया। भीष्म ने अस्त्र त्याग दिए थे, लेकिन अर्जुन के पास अब कोई चारा नहीं था। श्रीकृष्ण के आदेश पर अर्जुन ने शिखंडी के पीछे से भीष्म पर तीरों की बौछार कर दी। सैकड़ों तीर भीष्म के सीने और पूरे शरीर के पार हो गए। महाबली भीष्म रथ से नीचे गिर पड़े। लेकिन उनका शरीर जमीन पर नहीं गिरा। उनके शरीर में इतने तीर धंसे हुए थे कि तीरों का एक बेड यानी सरशैया बन गई।
जब पितामह भीष्म गिरे, तो कौरव और पांडव दोनों पक्षों के योद्धा युद्ध रोककर उनके पास दौड़ पड़े। भीष्म का सिर नीचे लटक रहा था। उन्होंने कहा कि मुझे सिर टिकाने के लिए तकिया चाहिए। दुर्योधन दौड़कर रेशमी तकिए ले आया, लेकिन भीष्म ने मुस्कुराकर मना कर दिया। उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा। अर्जुन ने रोते हुए गांडीव से तीन बाण धरती में मारे, जिससे एक सुंदर तीरों का सिरहाना बन गया जिस पर भीष्म ने अपना सिर टिकाया। फिर पितामह ने कहा कि मुझे प्यास लगी है। दुर्योधन ने सोने के कलश में पानी मंगवाया, लेकिन भीष्म ने उसे भी मना कर दिया। अर्जुन ने फिर एक बाण धरती में मारा और वहाँ से गंगा की एक तेज धारा फूटी जो सीधे भीष्म पितामह के मुख में गई। अपनी मां गंगा के पानी को पीकर भीष्म तृप्त हो गए।
लेकिन भीष्म ने उस समय अपने प्राण नहीं त्यागे। सूर्य उस समय दक्षिणायन में था, और शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन में प्राण त्यागने पर मोक्ष नहीं मिलता। भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान था, इसलिए उन्होंने तय किया कि जब तक सूर्य उत्तरायण में नहीं आ जाता, वे इसी सरशैया पर लेटे रहेंगे और तड़पते रहेंगे। पूरे ५८ दिनों तक भीष्म पितामह उस भयानक दर्द को सहते हुए तीरों की शैया पर लेटे रहे। उस दौरान पांडव रोज उनके पास आते थे और भीष्म ने युधिष्ठिर को राजधर्म, मोक्षधर्म और दानधर्म का जो उपदेश दिया, उसे आज हम 'भीष्म गीता' या महाभारत के शांति पर्व के रूप में जानते हैं। मृत्यु के ठीक पहले जब श्रीकृष्ण उनके पास आए, तो भीष्म ने उनसे एक सवाल पूछा कि हे अच्युत, मैंने अपने जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया, फिर मुझे यह तीरों की शैया पर तड़पने की इतनी भयानक सजा क्यों मिल रही है? तब श्रीकृष्ण ने उन्हें उनके पिछले जन्मों का याद दिलाया कि पितामह, आज से १०१ जन्म पहले आपने एक अनजाने में एक टिड्डे की पीठ में कांटा चुभाया था, उसी कर्म का फल आज आपको भुगतना पड़ रहा है। कर्म का चक्र किसी को नहीं छोड़ता, चाहे वह स्वयं भीष्म पितामह ही क्यों न हों।
अंततः माघ महीने की शुक्ल अष्टमी को जब सूर्य उत्तरायण हुआ, भीष्म पितामह ने अपनी आंखें बंद कीं और अपने प्राण त्याग दिए। उनके जाते ही कुरुवंश का सबसे मजबूत स्तंभ ढह गया। गंगापुत्र भीष्म की यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अगर उसका विवेक उसकी प्रतिज्ञाओं या नियमों का गुलाम बन जाता है, तो वह समाज का कल्याण नहीं कर सकता। भीष्म ने प्रतिज्ञा निभाई, लेकिन धर्म हार गया। उन्होंने अपने पिता को सुख दिया, लेकिन पूरे वंश को उजाड़ दिया।
मित्रों, भीष्म पितामह की इस दर्दनाक गाथा पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि भीष्म को द्रौपदी के चीरहरण के समय अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर दुर्योधन को दंड देना चाहिए था? क्या उनका मौन ही कुरुवंश के विनाश का असली कारण था? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। अगर आपको यह वीडियो ज्ञानवर्धक और भावुक लगी हो, तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर करें और अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें। ऐसी ही और भी पौराणिक और ऐतिहासिक गाथाओं को गहराई से जानने के लिए हमारे चैनल को अभी सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन दबाना न भूलें ताकि आने वाली कोई भी वीडियो आपसे मिस न हो। मिलते हैं आपसे अगले वीडियो में, तब तक के लिए जय श्रीकृष्ण!
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25.8.26
एक सोच, एक संघर्ष, एक सफलता - Dr. Dayaram Alok biography
एक सुई... एक धागा... और एक साधारण दर्जी परिवार में जन्मा बच्चा---क्या आप सोच सकते हैं... कि वही बच्चा एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी दर्जी समाज की वेबसाइट बनाएगा? जिसकी वेबसाइट के 8 लाख से ज्यादा पाठक होंगे? जिसके द्वारा खींचे गए 5000 से ज्यादा फोटो आज इंटरनेट पर दर्जी समाज की पहचान बने होंगे?
नमस्कार।
मैं हूँ डॉ. दयाराम आलोक
और आज मैं आपको सुना रहा हूँ... मेरी अपनी कहानी... सुई से शिखर तक की कहानी। ये कहानी सिर्फ मेरी नहीं है। ये कहानी है हर उस दर्जी भाई की... जिसने कभी सोचा था कि हम छोटा काम करते हैं। नहीं। हम छोटा काम नहीं करते। हम समाज को कपड़े पहनाते हैं... समाज को इज्जत पहनाते हैं।
तो अंत तक बने रहिए... क्योंकि इस वीडियो के आखिर में मैं आपको बताऊंगा... कि सिर्फ 1 महीना 8 दिन में... मंदिर का प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठा आयोजन कैसे हो गया था... वो भी तब जब मेरी उम्र सिर्फ 25 साल थी।
मेरा जन्म... 11 अगस्त 1940 को हुआ था।
स्थान... शामगढ़। मध्य प्रदेश का एक छोटा सा कस्बा। शामगढ़ आज मंदसौर जिले में है।
मेरे पिताजी का नाम... श्री पूरालाल जी राठौर । माताजी का नाम... श्रीमती गंगा बाई।
हम दर्जी थे। हमारा परिवार... राठौर दर्जी परिवार। हमारा काम था... रेडीमेड वस्त्र बनाकर बेचना। आज जैसे शोरूम होते हैं, वैसा कुछ नहीं था। हाथ से सिलाई... हाथ से कटाई।
हमारे परिवार में... 6 भाई और 3 बहनें। कुल 9 भाई-बहन और माता-पिता। 11 लोगों का परिवार। आप सोच सकते हैं... आर्थिक हालात कैसे होंगे। साधारण... बहुत साधारण। कभी-कभी तो ऐसा लगता था... कि दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष है।
लेकिन मेरे पिताजी... पूरालाल जी... उन्होंने एक बात सिखाई। बेटा... काम कोई छोटा नहीं होता। सुई भी... अगर सही हाथ में हो... तो इतिहास सिल देती है।
मैंने... उसी सुई के साये में... पढ़ाई शुरू की।
हाईस्कूल की परीक्षा... मैंने प्रथम श्रेणी में पास की। उस जमाने में... 1950 के दशक में... दर्जी परिवार के बच्चे का प्रथम श्रेणी में पास होना... बहुत बड़ी बात थी। लोग कहते थे... अरे दर्जी का लड़का पढ़ेगा? लेकिन मैंने करके दिखाया।
शिक्षा से नौकरी तक - अध्यापक से डॉक्टर]
और यहीं से मेरी जिंदगी ने पहली करवट ली।
1961 में... मेरी नियुक्ति शासकीय सेवा में... अध्यापक के पद पर हुई। मैं शिक्षक बन गया। जिस घर में... कपड़े सीए जाते थे... उसी घर का लड़का... अब बच्चों को अक्षर सिखा रहा था।
शिक्षक बनने के बाद भी ... मैंने पढ़ाई नहीं छोड़ी।
1969 में... मैंने राजनीति विज्ञान से एम.ए. किया।
लेकिन मेरे मन में... एक और दर्द था। हमारे समाज में... बीमारी... गरीब लोग... डॉक्टर के पास नहीं जा पाते थे। तो मैंने... आयुर्वेद रत्न की उपाधि ली। होम्योपैथी पढ़ी। D.I.Hom London... लंदन से होम्योपैथी की उपाधि अर्जित की।
लोग मुझे मास्टर साहब कहते थे... कोई वैद्य जी कहता था... कोई कवि कहता था।
और मैं... सब सुनता था... क्योंकि मुझे लगता था... ज्ञान... जितना बाँटो... उतना बढ़ता है।
मैंने 1996 तक... 35 साल तक... शिक्षक के रूप में सेवा की। और प्रधानाध्यापक के पद से सेवानिवृत्त हुआ।
महासंघ का जन्म
अब आती है... मेरे जीवन की सबसे बड़ी घटना।
तारीख थी... 14 जून 1965।
मेरी उम्र... सिर्फ 24 साल... 25वां साल शुरू हुआ था।
मैंने देखा... हमारे दर्जी समाज में... शादियों में... मौत में... फिजूलखर्ची बहुत होती है। कर्ज ले लेकर... दिखावा किया जाता है। समाज बिखरा हुआ है। कोई संगठन नहीं।
तो मैंने सोचा... क्यों न... युवाओं को जोड़ा जाए।
महासंघ का जन्म - 14 जून 1965]और यहीं से मेरी जिंदगी ने पहली करवट ली।
1961 में... मेरी नियुक्ति शासकीय सेवा में... अध्यापक के पद पर हुई। मैं शिक्षक बन गया। जिस घर में... कपड़े सीए जाते थे... उसी घर का लड़का... अब बच्चों को अक्षर सिखा रहा था।
शिक्षक बनने के बाद भी ... मैंने पढ़ाई नहीं छोड़ी।
1969 में... मैंने राजनीति विज्ञान से एम.ए. किया।
लेकिन मेरे मन में... एक और दर्द था। हमारे समाज में... बीमारी... गरीब लोग... डॉक्टर के पास नहीं जा पाते थे। तो मैंने... आयुर्वेद रत्न की उपाधि ली। होम्योपैथी पढ़ी। D.I.Hom London... लंदन से होम्योपैथी की उपाधि अर्जित की।
लोग मुझे मास्टर साहब कहते थे... कोई वैद्य जी कहता था... कोई कवि कहता था।
और मैं... सब सुनता था... क्योंकि मुझे लगता था... ज्ञान... जितना बाँटो... उतना बढ़ता है।
मैंने 1996 तक... 35 साल तक... शिक्षक के रूप में सेवा की। और प्रधानाध्यापक के पद से सेवानिवृत्त हुआ।
महासंघ का जन्म
अब आती है... मेरे जीवन की सबसे बड़ी घटना।
तारीख थी... 14 जून 1965।
मेरी उम्र... सिर्फ 24 साल... 25वां साल शुरू हुआ था।
मैंने देखा... हमारे दर्जी समाज में... शादियों में... मौत में... फिजूलखर्ची बहुत होती है। कर्ज ले लेकर... दिखावा किया जाता है। समाज बिखरा हुआ है। कोई संगठन नहीं।
तो मैंने सोचा... क्यों न... युवाओं को जोड़ा जाए।
अब आती है... मेरे जीवन की सबसे बड़ी घटना।
तारीख थी... 14 जून 1965।
मेरी उम्र... सिर्फ 24 साल... 25वां साल शुरू हुआ था।
मैंने देखा... हमारे दर्जी समाज में... शादियों में... मौत में... फिजूलखर्ची बहुत होती है। कर्ज ले लेकर... दिखावा किया जाता है। समाज बिखरा हुआ है। कोई संगठन नहीं।
तो मैंने सोचा... क्यों न... युवाओं को जोड़ा जाए।
और 14 जून 1965 को... शामगढ़ में... मेरे ही घर पर... यानी पूरालाल जी राठौर के निवास पर... हमने एक बैठक बुलाई।
नाम रखा... "दामोदर दर्जी युवक संघ"
उस पहली बैठक में... 134 दर्जी बंधु आए। 134... सोचिए... 1965 में... बिना मोबाइल... बिना इंटरनेट... 134 लोग एक आवाज पर आ गए।
उसी दिन... पहली कार्यकारिणी बनी।
अध्यक्ष बने... श्री रामचन्द्र जी सिसोदिया।
संचालक... की जिम्मेदारी... मुझे दी गई... श्री दयाराम जी आलोक को।
और कोषाध्यक्ष बने... श्री सीताराम जी संतोषी।
हमने सदस्यता अभियान चलाया... 50 नये पैसे... यानी आधा रुपया... में सदस्य बनाना शुरू किया। सैकड़ों सदस्य बने।
मैंने उसी साल... 1965 में ही... महासंघ का संविधान लिपिबद्ध किया। हाथ से लिखा था मैंने। बाद में... डॉ. लक्ष्मीनारायण जी अलौकिक ने उसमें संशोधन किए... और रसायन प्रेस, दिल्ली से छपवाकर... पूरे देश में प्रचारित किया।
वही छोटा सा युवक संघ... धीरे-धीरे... बढ़ते-बढ़ते... "अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ" बन गया। जो आज पूरे भारत में... दर्जी समाज की आवाज है।
और गर्व की बात - गांधी जयंती 2 अक्टूबर 2023 को दामोदर दर्जी महासंघ के पुनर्गठन के अंतर्गत मुझे अध्यक्ष और श्री रमेश चंद्र जी राठौर आशुतोष को महाप्रबंधक मनोनीत करते हुए नवीन कार्यकारिणी का गठन किया गया। यानी 58 साल बाद भी... वो बीज... जो 1965 में बोया था... आज वटवृक्ष बना हुआ है।
सामूहिक विवाह - एक क्रांति
शादियाँ... हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या थीं।
दहेज... दिखावा... कर्ज।
तो मैंने 1981 में... एक फैसला लिया
मध्य प्रदेश के रामपुरा नगर में... दर्जी समाज का पहला सामूहिक विवाह सम्मेलन आयोजित किया।
1981 में... सामूहिक विवाह का नाम भी लोग नहीं जानते थे। लोगों ने कहा... ये कैसे होगा? लेकिन हमने करके दिखाया।
और एक नहीं... 2 नहीं... मैंने दर्जी कन्याओं के लिए 9 सामूहिक विवाह आयोजित किए हैं। और एक तो... निज वित्त पोषित... यानी अपने खुद के खर्चे से... निशुल्क सामूहिक विवाह।
इससे... सैकड़ों परिवार... कर्ज से बचे। बेटियों की शादी... सम्मान से हुई।
डग मंदिर का चमत्कार
अब वो कहानी... जिसका मैंने शुरू में वादा किया था।
डग... राजस्थान का एक स्थान है। वहाँ... दर्जी समाज का मंदिर है।
डग के दर्जी बंधुओं ने... मुझ पर विश्वास किया। मेरी कार्यक्षमता पर विश्वास करके... उन्होंने मंदिर के उद्यापन जैसा महत्वपूर्ण कार्य... मुझे सौंपा।
मेरी उम्र... सिर्फ 25 वर्ष।
लोगों ने कहा... इतना बड़ा काम?... इतना पैसा कहाँ से आएगा?
लेकिन... प्रभु की अदृश्य अनुकंपा देखिए... सिर्फ 1 माह 8 दिन की छोटी सी अवधि में... मंदिर के उद्यापन हेतु पर्याप्त धन संग्रहित हो गया।
हमने एक-एक घर जाकर... चंदा एकत्रित किया। और सारी राशि... डग मंदिर के कोषाध्यक्ष... श्री कन्हैयालाल जी पँवार के सुपुर्द कर दी।
और 23 जून 1966 को... डग स्थित दर्जी मंदिर का उद्यापन... बड़े धूमधाम से हुआ। ये मेरे जीवन की... सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों की पहली कड़ी थी।
शादियाँ... हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या थीं।
दहेज... दिखावा... कर्ज।
तो मैंने 1981 में... एक फैसला लिया
मध्य प्रदेश के रामपुरा नगर में... दर्जी समाज का पहला सामूहिक विवाह सम्मेलन आयोजित किया।
1981 में... सामूहिक विवाह का नाम भी लोग नहीं जानते थे। लोगों ने कहा... ये कैसे होगा? लेकिन हमने करके दिखाया।
और एक नहीं... 2 नहीं... मैंने दर्जी कन्याओं के लिए 9 सामूहिक विवाह आयोजित किए हैं। और एक तो... निज वित्त पोषित... यानी अपने खुद के खर्चे से... निशुल्क सामूहिक विवाह।
इससे... सैकड़ों परिवार... कर्ज से बचे। बेटियों की शादी... सम्मान से हुई।
डग मंदिर का चमत्कार
अब वो कहानी... जिसका मैंने शुरू में वादा किया था।
डग... राजस्थान का एक स्थान है। वहाँ... दर्जी समाज का मंदिर है।
डग के दर्जी बंधुओं ने... मुझ पर विश्वास किया। मेरी कार्यक्षमता पर विश्वास करके... उन्होंने मंदिर के उद्यापन जैसा महत्वपूर्ण कार्य... मुझे सौंपा।
मेरी उम्र... सिर्फ 25 वर्ष।
लोगों ने कहा... इतना बड़ा काम?... इतना पैसा कहाँ से आएगा?
लेकिन... प्रभु की अदृश्य अनुकंपा देखिए... सिर्फ 1 माह 8 दिन की छोटी सी अवधि में... मंदिर के उद्यापन हेतु पर्याप्त धन संग्रहित हो गया।
हमने एक-एक घर जाकर... चंदा एकत्रित किया। और सारी राशि... डग मंदिर के कोषाध्यक्ष... श्री कन्हैयालाल जी पँवार के सुपुर्द कर दी।
और 23 जून 1966 को... डग स्थित दर्जी मंदिर का उद्यापन... बड़े धूमधाम से हुआ। ये मेरे जीवन की... सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों की पहली कड़ी थी।
आध्यात्मिक दान पथ -
धर्म-आध्यात्म और लोकहित से प्रेरित होकर मैंने मध्य प्रदेश और राजस्थान के 150+ मंदिरों और मुक्तिधाम, गौशालाओं, विद्यालयों में... लोगों की बैठक सुविधा के लिए... सैकड़ों सीमेंट की लाल रंग की बेंचें भेंट कीं... और नकद दान भी दिया।
मैं मानता हूँ -
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
धन की तीन गति होती हैं - दान, भोग और नाश। जो न देता है, न भोगता है, उसका धन नष्ट हो जाता है।
धर्म-आध्यात्म और लोकहित से प्रेरित होकर मैंने मध्य प्रदेश और राजस्थान के 150+ मंदिरों और मुक्तिधाम, गौशालाओं, विद्यालयों में... लोगों की बैठक सुविधा के लिए... सैकड़ों सीमेंट की लाल रंग की बेंचें भेंट कीं... और नकद दान भी दिया।
मैं मानता हूँ -
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
धन की तीन गति होती हैं - दान, भोग और नाश। जो न देता है, न भोगता है, उसका धन नष्ट हो जाता है।
डिजिटल युग का दर्जी
अब आते हैं... आज के युग पर।
पिछले 20 वर्षों से... मैं एक काम कर रहा हूँ। जो शायद ही कोई करता है।
मैं... जहाँ भी सामाजिक रीति-रस्म होती है... शादी... सम्मेलन... मंदिर उद्यापन... मैं जाता हूँ... और दर्जी बंधुओं के फोटो लेता हूँ।
मेरा उद्देश्य... सिर्फ फोटो लेना नहीं है। मेरा उद्देश्य है... हमारे समाज का इतिहास बचाना।
आज... लगभग 5 हजार से ज्यादा दर्जी समाज के फोटो... इंटरनेट पर मौजूद हैं। जो मैंने अपलोड किए हैं।
और 15 हजार दर्जी बंधुओं का... एक वंशवृक्ष... Family Tree... मैंने बनाया है। पारिवारिक जानकारी संग्रहित करके। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी... जाने... कि हम कौन हैं।
और इसी से जन्म हुआ... मेरी वेबसाइट का।
वेबसाइट का नाम है... "दर्जी समाज संदेश"
Address है... damodarjagat.blogspot.com
ये... दामोदर दर्जी समाज की सामाजिक गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करती है। और गर्व के साथ कहता हूँ... ये दुनिया की दर्जी समाज की सबसे बड़ी वेबसाइट है।
इसमें 500 से ज्यादा लेख हैं। और 8 लाख से अधिक पाठक... विश्वभर में फैले हुए हैं।
इसी तरह... मेरी दूसरी वेबसाइट है... healininathome.blogspot.com... जहाँ मेरे हजारों चिकित्सा लेख प्रकाशित होते हैं... और दुनिया भर में लाखों पाठक हैं। मेरे लेख... मशहूर मासिक पत्रिका कादंबिनी में भी प्रकाशित हुए हैं।
मैं कवि भी हूँ... मेरी 150 काव्य कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं।
1996 में सेवानिवृत्ति के बाद... मैंने भाजपा की सदस्यता ली। और पार्टी में... अध्यक्ष नगर भाजपा बोलिया, जिला महामंत्री अध्यापक प्रकोष्ठ जिला मंदसौर, और सहसंयोजक जिला स्वास्थ्य प्रकोष्ठ जैसे पदों पर सेवा की।
तो ये थी... मेरी कहानी... सुई से शिखर तक।
एक दर्जी का बेटा... जो मास्टर बना... फिर समाज सेवक... फिर लेखक... और आज... 87 साल की उम्र में भी... आपके सामने... कैमरे के सामने... अपनी कहानी सुना रहा है।
क्यों?
क्योंकि मैं चाहता हूँ... कि हमारा समाज... संगठित रहे।
अगर आप इस वीडियो को यहाँ तक देख रहे हैं... तो आप भी मेरे परिवार का हिस्सा हैं।
मैं आपसे तीन निवेदन करता हूँ।
पहला... इस वीडियो को LIKE कीजिए... क्योंकि ये Like मेरे लिए नहीं... हमारे दर्जी समाज की एकता के लिए है।
दूसरा... इस वीडियो को SHARE कीजिए... हर दर्जी बंधु तक... ताकि उन्हें भी पता चले... कि हमारा इतिहास कितना गौरवशाली है।
और तीसरा... COMMENT में लिखिए... जय दामोदर... और अपना शहर का नाम... मुझे पता तो चले... कि मेरा ये संदेश... देश के किस कोने तक पहुंचा है।
और हाँ... मेरी वेबसाइट... damodarjagat.blogspot.com को जरूर देखिए... और चैनल को SUBSCRIBE करना मत भूलिए... ताकि अगली बार... जब मैं कोई नया वंशवृक्ष या नया इतिहास लेकर आऊं... तो सबसे पहले आप तक पहुंचे।
आपका अपना...
डॉ. दयाराम आलोक
अब आते हैं... आज के युग पर।
पिछले 20 वर्षों से... मैं एक काम कर रहा हूँ। जो शायद ही कोई करता है।
मैं... जहाँ भी सामाजिक रीति-रस्म होती है... शादी... सम्मेलन... मंदिर उद्यापन... मैं जाता हूँ... और दर्जी बंधुओं के फोटो लेता हूँ।
मेरा उद्देश्य... सिर्फ फोटो लेना नहीं है। मेरा उद्देश्य है... हमारे समाज का इतिहास बचाना।
आज... लगभग 5 हजार से ज्यादा दर्जी समाज के फोटो... इंटरनेट पर मौजूद हैं। जो मैंने अपलोड किए हैं।
और 15 हजार दर्जी बंधुओं का... एक वंशवृक्ष... Family Tree... मैंने बनाया है। पारिवारिक जानकारी संग्रहित करके। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी... जाने... कि हम कौन हैं।
और इसी से जन्म हुआ... मेरी वेबसाइट का।
वेबसाइट का नाम है... "दर्जी समाज संदेश"
Address है... damodarjagat.blogspot.com
ये... दामोदर दर्जी समाज की सामाजिक गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करती है। और गर्व के साथ कहता हूँ... ये दुनिया की दर्जी समाज की सबसे बड़ी वेबसाइट है।
इसमें 500 से ज्यादा लेख हैं। और 8 लाख से अधिक पाठक... विश्वभर में फैले हुए हैं।
इसी तरह... मेरी दूसरी वेबसाइट है... healininathome.blogspot.com... जहाँ मेरे हजारों चिकित्सा लेख प्रकाशित होते हैं... और दुनिया भर में लाखों पाठक हैं। मेरे लेख... मशहूर मासिक पत्रिका कादंबिनी में भी प्रकाशित हुए हैं।
मैं कवि भी हूँ... मेरी 150 काव्य कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं।
1996 में सेवानिवृत्ति के बाद... मैंने भाजपा की सदस्यता ली। और पार्टी में... अध्यक्ष नगर भाजपा बोलिया, जिला महामंत्री अध्यापक प्रकोष्ठ जिला मंदसौर, और सहसंयोजक जिला स्वास्थ्य प्रकोष्ठ जैसे पदों पर सेवा की।
तो ये थी... मेरी कहानी... सुई से शिखर तक।
एक दर्जी का बेटा... जो मास्टर बना... फिर समाज सेवक... फिर लेखक... और आज... 87 साल की उम्र में भी... आपके सामने... कैमरे के सामने... अपनी कहानी सुना रहा है।
क्यों?
क्योंकि मैं चाहता हूँ... कि हमारा समाज... संगठित रहे।
अगर आप इस वीडियो को यहाँ तक देख रहे हैं... तो आप भी मेरे परिवार का हिस्सा हैं।
मैं आपसे तीन निवेदन करता हूँ।
पहला... इस वीडियो को LIKE कीजिए... क्योंकि ये Like मेरे लिए नहीं... हमारे दर्जी समाज की एकता के लिए है।
दूसरा... इस वीडियो को SHARE कीजिए... हर दर्जी बंधु तक... ताकि उन्हें भी पता चले... कि हमारा इतिहास कितना गौरवशाली है।
और तीसरा... COMMENT में लिखिए... जय दामोदर... और अपना शहर का नाम... मुझे पता तो चले... कि मेरा ये संदेश... देश के किस कोने तक पहुंचा है।
और हाँ... मेरी वेबसाइट... damodarjagat.blogspot.com को जरूर देखिए... और चैनल को SUBSCRIBE करना मत भूलिए... ताकि अगली बार... जब मैं कोई नया वंशवृक्ष या नया इतिहास लेकर आऊं... तो सबसे पहले आप तक पहुंचे।
आपका अपना...
डॉ. दयाराम आलोक
संस्थापक अध्यक्ष , दामोदर दरजी महासंघ
जय दामोदर... जय दर्जी समाज।
जय दामोदर... जय दर्जी समाज।
Dr.Dayaram Aalok M.A.,Ayurved Ratna,D.I.Hom(London), Blog Writer,caste historian,Poet(kavitalok.blogspot.com),Social worker(damodarjagat.blogspot.com),Herbalist(remedyherb.blogspot.com,healinathome.blogspot.com),Used to organize Mass marriage programs for Darji Community. founder and president Damodar Darji Mahasangh
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