14.9.17

मैढ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज की कुलदेवियाँ





कुलदेवी  
                            उपासक सामाजिक गोत्र


1. अन्नपूर्णा माता  - खराड़ा, गंगसिया, चुवाणा, भढ़ाढरा, महीचाल,रावणसेरा, रुगलेचा।


2. अमणाय माता  - कुझेरा, खीचाणा, लाखणिया, घोड़वाल, सरवाल, परवला।

3. अम्बिका माता  -  कुचेवा, नाठीवाला।


4. आसापुरी माता  -  अदहके, अत्रपुरा, कुडेरिया, खत्री आसापुरा, जालोतिया, टुकड़ा, ठीकरिया, तेहड़वा, जोहड़, नरवरिया, बड़बेचा,  बाजरजुड़ा, सिंद, संभरवाल, मोडक़ा, मरान, भरीवाल,  चौहान।

5. कैवाय माता   - कीटमणा, ढोलवा, बानरा, मसाणिया, सींठावत।

6. कंकाली माता  - अधेरे, कजलोया, डोलीवाल, बंहराण, भदलास।


7. कालिका माता  - ककराणा, कांटा, कुचवाल, केकाण, घोसलिया, छापरवाल, झोजा, डोरे, भीवां, मथुरिया, मुदाकलस।

8. काली माता   - बनाफरा

9. कोटासीण माता  -  गनीवाल, जांगड़ा, ढीया, बामलवा, संखवाया, सहदेवड़ा, संवरा।

10. खींवजा माता  -  रावहेड़ा, हरसिया।

11. चण्डी माता   -  जांगला, झुंडा, डीडवाण, रजवास, सूबा।

12. चामुण्डा माता  - उजीणा, जोड़ा, झाट, टांक, झींगा, कुचोरा, ढोमा, तूणवार, धूपड़, बदलिया, बागा, भमेशा, मुलतान, लुद्र, गढ़वाल, गोगड़, चावड़ा, चांवडिया, जागलवा, झीगा, डांवर, सेडूंत।

13. चक्रसीण माता  - चतराणा, धरना, पंचमऊ, पातीघोष, मोडीवाल, सीडा।

14. चिडाय माता  - खीवाण जांटलीवाल, बडग़ोता, हरदेवाण।

15. ज्वालामुखी माता  -  कड़ेल, खलबलिया, छापरड़ा, जलभटिया, देसवाल, बड़सोला, बाबेरवाल, मघरान, सतरावल, सत्रावला, सीगड़, सुरता, सेडा, हरमोरा।

16. जमवाय माता  - कछवाहा, कठातला, खंडारा, पाडीवाल,बीजवा, सहीवाल, आमोरा, गधरावा,  धूपा, रावठडिय़ा।

17. जालपा माता  -  आगेचाल, कालबा, खेजड़वाल, गदवाहा, ठाकुर, बंसीवाल, बूट्टण, सणवाल।

18. जीणमाता   - तोषावड़, ।

19. तुलजा माता   -  गजोरा, रुदकी।

20. दधिमथी माता  -  अलदायण, अलवाण, अहिके,उदावत, कटलस, कपूरे, करोबटन,       कलनह, काछवा, कुक्कस, खोर, माहरीवाल।

21. नवदुर्गा माता  -  टाकड़ा, नरवला, नाबला, भालस।

22. नागणेचा माता  -  दगरवाल, देसा, धुडिय़ा, सीहरा, सीरोटा।

23. पण्डाय (पण्डवाय) माता -  रगल, रुणवाल, पांडस।

24. पद्मावती माता  -  कोरवा, जोखाटिया, बच्छस, बठोठा, लूमरा।

25. पाढराय माता  -  अचला।

26. पीपलाज माता  -  खजवानिया, परवाल, मुकारा।

27. बीजासण माता  -  अदोक , बीजासण, मंगला, मोडकड़ा, मोडाण, सेरने।

28. भद्रकालिका माता  -  नारनोली।

29. मुरटासीण माता  -  जाड़ा, ढल्ला, बनाथिया, मांडण, मौसूण, रोडा।

30. लखसीण माता  -  अजवाल, अजोरा, अडानिया, छाहरावा, झुण्डवा, डीगडवाल, तेहड़ा, परवलिया, बगे, राजोरिया, लंकावाल, सही,    सुकलास, हाबोरा।

31. ललावती माता  -  कुकसा, खरगसा, खरा, पतरावल, भानु, सीडवा, हेर।

32. सवकालिका माता  -  ढल्लीवाल, बामला, भंवर, रूडवाल, रोजीवाल, लदेरा, सकट।

33. सम्भराय माता  -  अडवाल, खड़ानिया, खीपल, गुगरिया, तवरीलिया, दुरोलिया, पसगांगण, भमूरिया।

34.  संचाय माता  -  डोसाणा।

35. सुदर्शनमाता   - मलिंडा।

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13.9.17

सभी राजपूत कुल की कुलदेवी की सूची


List Of The Kuldevi Of Rajputs (सभी वंश की कुलदेवी)

राजपूतो को तीन वंशो में बांटा गया है सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, अग्निवंशी | इन तीनो में से प्रतियेक वंश वापस अलग अलग शाखा, वंश और कुल में बांटे गए है | कुल किसी भी राजपूत वंश की प्राथमिक पहचान होती है | प्रत्येक  कुल की रक्षा उनके परिवार के देवता या कुलदेवी करती है | नीचे अलग अलग कुल व उनकी कुलदेवी का नाम दिया गया है |
S. No.   Vansh   KuldeviS. No.   Vansh   Kuldevi
1.  राठौड़  नागणेचिया2.  गहलोत  बाणेश्वरी माता
3.  कछवाहा  जमवाय माता4.  दहिया  कैवाय माता
5.  गोहिल  बाणेश्वरी माता6.  चौहान  आशापूर्णा माता
7.  बुन्देला  अन्नपूर्णा माता8.  भारदाज  शारदा माता
9.  चंदेल  मेंनिया माता10.  नेवतनी  अम्बिका भवानी
11. शेखावत जमवाय माता12.  चुड़ासमा  अम्बा भवानी माता
13.  बड़गूजर  कालिका(महालक्ष्मी)माँ14.  निकुम्भ  कालिका माता
15.  भाटी स्वांगिया माता16.  उदमतिया  कालिका माता
17.  उज्जेनिया  कालिका माता18.  दोगाई  कालिका(सोखा)माता
19.  धाकर  कालिका माता20.  गर्गवंश  कालिका माता
21.  परमार  सच्चियाय माता22.  पड़िहार  चामुण्डा माता
23.  सोलंकी  खीवज माता24.  इन्दा  चामुण्डा माता
25.  जेठंवा  चामुण्डा माता26.  चावड़ा  चामुण्डा माता
27.  गोतम  चामुण्डा माता28.  यादव  योगेश्वरी माता
29.  कौशिक  योगेश्वरी माता30.  परिहार  योगेश्वरी माता
31.  बिलादरिया  योगेश्वरी माता32.  तंवर  चिलाय माता
33.  हैध्य  विन्ध्यवासिनि माता34.  कलचूरी  विन्धावासिनि माता
35.  सेंगर  विन्धावासिनि माता36.  भॉसले  जगदम्बा माता
37.  दाहिमा  दधिमति माता38.  रावत  चण्डी माता
39.  लोह थम्ब  चण्डी माता40.  काकतिय  चण्डी माता
41.  लोहतमी  चण्डी माता42.  कणड़वार  चण्डी माता
43.  केलवाडा  नंदी माता44.  हुल  बाण माता
45.  बनाफर  शारदा माता46.  झाला  शक्ति माता
47.  सोमवंश  महालक्ष्मी माता48.  जाडेजा  आशपुरा माता
49.  वाघेला  अम्बाजी माता50.  सिंघेल  पंखनी माता
51.  निशान  भगवती दुर्गा माता52.  बैस  कालका माता
53.  गोंड़  महाकाली माता54.  देवल  सुंधा माता
55.  खंगार  गजानन माता56.  चंद्रवंशी  गायत्री माता
57.  पुरु  महालक्ष्मी माता58.  जादोन  कैला देवी (करोली )
59.  छोकर  चन्डी केलावती माता60.  नाग  विजवासिन माता
61.  लोहतमी  चण्डी माता62.  चंदोसिया  दुर्गा माता
63.  सरनिहा  दुर्गा माता64.  सीकरवाल  दुर्गा माता
65.  किनवार  दुर्गा माता66.  दीक्षित  दुर्गा माता
67.  काकन  दुर्गा माता68.  तिलोर  दुर्गा माता
69.  विसेन  दुर्गा माता70.  निमीवंश  दुर्गा माता
71. निमुडी  प्रभावती माता72. नकुम  वेरीनाग बाई
73. वाला  गात्रद माता74. स्वाति  कालिका माता
75. राउलजी क्षेमकल्याणी माता
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12.9.17

देवल , प्रतिहार ,परिहार वंश की कुलदेवी का वर्णन



                         
 

इन्दा शाखा प्रतिहार ( पडिहार , परिहार राजपूत ) ये श्री चामुण्डा देवी जी को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते है तथा वरदेवी के रूप में गाजन माता को भी पूजते है , तथा देवल शाखा प्रतिहार ( पडिहार ,परिहार राजपूत ) ये सुंधा माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते है ,
पुराणो से ग्यात होता है कि भगवती दुर्गा का सातवा अवतार कालिका है , इसने दैत्य शुम्भ , निशुम्भ , और सेनापती चण्ड , मुण्ड का नाश किया था , तब से श्री कालिका जी चामुण्डा देवी जी के नाम से प्रसिद्द हुई , इसी लिये माँ श्री चामुण्डा देवी जी को आरण्यवासिनी , गाजन माता तथा अम्बरोहिया , भी कहा जाता है , पडिहार नाहडराव गाजन माता के परम भक्त थे , वही इनके वंशज पडिहार खाखू कुलदेवी के रूप में श्री चामुण्डा देवी जी की आराधना करते थे , प्रतिहार ,पडिहार , परिहार राजपूत वंशजो का श्री चामुण्डा देवी जी के साथ सम्बंधो का सर्वप्रथम सटीक पडिहार खाखू से मिलता है , पडिहार खाखू श्री चामुण्डा देवी जी की पूजा अर्चना करने चामुण्डा गॉव आते जाते थे , जो कि जोधपुर से ३० कि. मी. की दूरी पर स्थित है , घटियाला जहॉ पडिहार खाखू का निवास स्थान था , जो चामुण्डा गॉव से ४ कि. मी. की दूरी पर है ,श्री चामुण्डा देवी का मंदिर चामुण्डा गॉव में ऊँची पहाडी पर स्थित है , जिसका मुख घटियाला की ओर है , ऐसी मान्यता है कि देवी जी पडिहार खाखू जी के शरीर पर आती थी , 

** श्री चामुण्डा देवी जी ( गढ जोधपुर ) **
जोधपुर राज्य के संस्थापक राव जोधा के पितामाह राव चुण्डा जी का सम्बंध भी माता चामुण्डा देवी जी से रहा था , सलोडी से महज 5 कि. मी. की दूरी पर चामुण्डा गॉव है , वहा पर राव चुण्डा जी देवी के दर्शनार्थ आते रहते थे , वह भी देवी के परम भक्त थे , ऐसी मान्यता है कि एक बार राव चुण्डा जी गहरी नींद में सो रहे थे तभी रात में देवी जी ने स्वप्न में कहा कि सुबह घोडो का काफिला वाडी से होकर निकलेगा , घोडो कि पीठ पर सोने की ईंटे लदी होगीं वह तेरे भाग्य में ही है , सुबह ऐसा ही हुआ खजाना एवं घोडे मिल जाने के कारण उनकी शक्ति में बढोत्तरी हुई , आगे चलकर इन्दा उगमसी की पौत्री का विवाह राव चुण्डा जी के साथ हो जाने पर उसे मण्डौर का किला दहेज के रूप में मिला था , इसके पश्चात राव चुण्डा जी ने अपनी ईष्टदेवी श्री चामुण्डा देवी जी का मंदिर भी बनवाया था , यहा यह तथ्य उल्लेखनीय है कि देवी कि प्रतिष्ठा तो पडिहारो के समय हो चुकी थी , अनंतर राव चुण्डा जी ने उस स्थान पर मंदिर निर्माण करवाया था मंदिर के पास वि. सं. १४५१ का लेख भी मिलता है ।
अत: राव जोधा के समय पडिहारों की कुलदेवी श्री माँ चामुण्डा देवी जी की मूर्ति जो कि मंडौर के किले में भी स्थित थी , उसे जोधपुर के किले में स्थापित करबाई थी , राव जोधा जी तो जोधपुर बसाकर और मेहरानगढ जैसा दुर्ग बनाकर अमर हो गये परंतु मारवाड की रक्षा करने वाली परिहारों की कुलदेवी श्री चामुण्डा देवी जी को अपनी ईष्टदेवी के रूप में स्वीकार कर संपूर्ण सुरक्षा का भार माँ चामुण्डा देवी जी को सौप गये , राव जोधा ने वि. सं. १५१७ ( ई. १४६० ) में मण्डौर से श्री चामुण्डा देवी जी की मूर्ति को मंगवा कर जोधपुर के किले में स्थापित किया ,
श्री चामुण्डा महारानी जी मूलत: प्रतिहारों की कुलदेवी थी राठौरों की कुलदेवी श्री नागणेच्या माता जी है , और राव जोधा जी ने श्री चामुण्डा देवी जी को अपनी ईष्टदेवी के रूप में स्वीकार करके जोधपुर के किले में स्थापित किया था , ।।

** देवल ( प्रतिहार , परिहार ) वंश **
सुंधा माता जी का प्राचीन पावन तीर्थ राजिस्थान प्रदेश के जालौर जिले की भीनमाल तहसील की जसवंतपुरा पंचायत समिती में आये हुये सुंधा पर्वत पर है , वह भी भीनमाल से २४ मील रानीवाडा से १४ मील और जसवंतपुरा से ८ मील दूर है । सुंधा पर्वत की रमणीक एवं सुरम्य घाटी में सांगी नदी से लगभग ४०-४५ फीट ऊँची एक प्राचीन सुरंग से जुडी गुफा में अषटेश्वरी माँ चामुण्डा देवी जी का पुनीत धाम युगो युगो से सुसोभित है , इस सुगंध गिरी अथवा सौगंधिक पर्वत के नाम से लोक में " सुंधा माता " के नाम से विख्यात है , जिनको देवल प्रतिहार अपनी कुलदेवी के रूप में पूजा अर्चना करते है ।।
वंश - अग्निवंश
गोत्र - कपिल
कुलदेवी - चामुण्डा देवी ( सुंधा माता)
वरदेवी - गाजन माता
कुलदेव - विष्णु 
भगवान