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27.1.26

सुनार समाज की विरासत: इतिहास, गोत्र, कुलदेवी और परम्पराओं का उज्ज्वल अध्याय

                        

सुनार (स्वर्णकार) जाति की उत्पत्ति पौराणिक कथाओं के अनुसार त्रेता युग में हुई मानी जाती है। जनश्रुतियों के अनुसार, परशुराम के क्षत्रिय संहार से बचने के लिए दो राजपूत भाइयों को सारस्वत ब्राह्मणों ने शरण दी और मैढ़ बताकर उनकी जान बचाई। इन्हीं में से एक ने स्वर्ण आभूषण बनाने का काम अपनाया और सुनार कहलाए।
सुनार जाति की उत्पत्ति से संबंधित प्रमुख विवरण:उत्पत्ति का दावा: सुनार समाज मुख्य रूप से खुद को क्षत्रिय वंशज (राजपूत) मानता है, जो समय के साथ स्वर्ण आभूषण बनाने के पुश्तैनी व्यवसाय से जुड़े।
पौराणिक कथा: कथा के अनुसार, परशुराम के प्रकोप से बचने के लिए क्षत्रिय पहचान गुप्त रखकर एक भाई ने सुनार और दूसरे ने खत्री का काम किया।
शाखाएं और नाम: मैढ़, लाड, अहिर, पांचाल और टांक सुनार जाति की प्रमुख शाखाएं हैं, जिनमें मायर (Mair) राजपूत उपसमूह प्रमुख है।
क्षेत्रीय भिन्नता: ये मुख्य रूप से राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और अन्य उत्तर भारतीय राज्यों में पाए जाते हैं। इन्हें गुजरात-राजस्थान में 'सोनी' और अन्य स्थानों पर स्वर्णकार या साहूकार भी कहा जाता है।
धार्मिक मत: कुछ मान्यताएं इन्हें विश्वकर्मा जी की पांचवीं संतान 'दैवज्ञ' (स्वर्णकार) मानती हैं।
सुनार जाति आज भी स्वयं को क्षत्रिय (मैढ़ राजपूत) कहने में गर्व महसूस करती है और यह समाज परंपरागत रूप से स्वर्णकारों का रहा है। सुनार (स्वर्णकार) जाति का इतिहास प्राचीन भारत से जुड़ा है, जो पारंपरिक रूप से सोने-चांदी के आभूषण बनाने का पुश्तैनी कार्य करते आ रहे हैं। इन्हें भगवान विश्वकर्मा का वंशज माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, परशुराम के समय राजपूतों द्वारा आभूषण निर्माण कार्य अपनाने के कारण इन्हें "मैढ़ राजपूत" या वैश्य वर्ण के अंतर्गत भी माना गया है।
सुनार जाति के इतिहास के मुख्य बिंदु:उत्पत्ति और मान्यता: सुनार शब्द संस्कृत के 'स्वर्णकार' का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है सोने का काम करने वाला। कई मान्यताएं इन्हें राजर्षि अजमीढ़ का वंशज मानते हैं।
पौराणिक संबंध: परशुराम के क्षत्रिय विनाश काल में, जान बचाने के लिए राजपूत भाइयों ने आभूषण बनाने का कार्य शुरू किया, जो बाद में सुनार कहलाए।
वर्ण व्यवस्था:
इन्हें ऐतिहासिक रूप से वैश्य वर्ण में वर्गीकृत किया गया है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में इन्हें क्षत्रिय राजपूत के रूप में भी मान्यता है
मुख्य उप-जातियां: सुनार समाज में विभिन्न उप-समूह हैं, जैसे कि मैढ़ सुनार, देसवाली सुनार, और पंजाब में टैंक सुनार।
व्यापार और व्यवसाय: आभूषण बनाने के अलावा, यह समुदाय प्राचीन समय से ही कीमती धातुओं का व्यापार (साहूकारी) भी करता रहा है।
धार्मिक आस्था: यह समुदाय भगवान विश्वकर्मा को अपना मुख्य संरक्षक और शिल्पी देवता मानता है।
सुनार (स्वर्णकार) जाति की कुलदेवी उनके अलग-अलग उप-कुलों (गोत्रों) के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। चूँकि यह एक विस्तृत समाज है, इसलिए किसी एक देवी को पूरी जाति की इकलौती कुलदेवी कहना कठिन है।
विभिन्न गोत्रों द्वारा पूजी जाने वाली कुछ प्रमुख कुलदेवियाँ निम्नलिखित हैं:शाकम्भरी माता: सोनी या स्वर्णकार समाज के कई परिवारों में इन्हें कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।
अन्नपूर्णा माता: स्वर्णकार समाज के कई गोत्रों (जैसे: खराड़ा, गंगसिया आदि) की कुलदेवी माता अन्नपूर्णा हैं।
सती माता (बाण माता): श्रीमाली सोनी और कुछ अन्य उप-जातियों में सती माता या बाण माता को कुलदेवी माना जाता है।
मुठासीण माता: राजस्थान और मारोठ क्षेत्र के स्वर्णकार समाज में इनकी विशेष मान्यता है।
अन्य देवियाँ: गोत्र के अनुसार पण्डाय (पण्डवाय) माता, जमवाय माता, जालपा माता और कालिका माता की भी पूजा की जाती है।
सुनार समाज के आदि पुरुष महाराज अजमीढ़ देव माने जाते हैं, जो ब्रह्मा जी की 28वीं पीढ़ी में जन्मे एक चंद्रवंशी राजा थे।
सुनार समाज की परम्पराएं
सुनार (स्वर्णकार) जाति पारंपरिक रूप से सोने-चांदी के आभूषण बनाने का पुश्तैनी व्यवसाय करती है और मुख्य रूप से हिंदू धर्म का पालन करती है। वे खुद को क्षत्रिय वर्ण से जुड़ा मानते हैं और कुलदेवी/देवता की पूजा, विशेष रूप से नवरात्रों में, इनके प्रमुख धार्मिक रीति-रिवाज हैं। यह समाज धनतेरस और अक्षय तृतीया को अत्यंत शुभ मानता है।
प्रमुख परंपराएं और रीति-रिवाज:कुलदेवी पूजा: अधिकांश सुनार कुलों में कुलदेवी की पूजा अनिवार्य है। लाड सुनार इंगला या ज्वालामुखी की पूजा करते हैं।
धार्मिक विश्वास: ये भगवान विश्वकर्मा के वंशज माने जाते हैं और उन्हें अपना सर्वोच्च देवता मानते हैं।
पर्व: दक्कन के क्षेत्रों में काली माता को विशेष श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। वैश्य सुनार गोपाल कृष्ण की पूजा और गोकुलाष्टमी मनाते हैं।
विवाह और संस्कार: विवाह में आभूषणों का विशेष महत्व है। सुनारों को दैवज्ञ ब्राह्मण के रूप में भी कुछ क्षेत्रों में मान्यता प्राप्त है।
मृत्यु संस्कार: मृत्यु के दसवें दिन पिंड दान और भदर (केश-मुंडन) की परंपरा है, और 13वें दिन पगड़ी रस्म होती है।
पहनावा: राजस्थान में सुनार आंटे वाली और विशेष पाग/पगड़ी पहनते हैं।






क्षेत्र के आधार पर, यह समुदाय भारत, नेपाल और पाकिस्तान (दक्षिण एशिया) में पाया जाता है।