3.12.19

सिख धर्म की जानकारी :Sikh dharm ki jankari




दुनियाभर में कई धर्म और जाति के लोग जाते है। सभी धर्म अपनी खास मान्यताओं और रिवाजों के लिए अपनी एक अलग पहचान रखते है। ऐसा ही एक धर्म है सिख धर्म। बाकी धर्मों में जहाँ लोगों के अलग-अलग सरनेम लगाए जाते है वहीं पर केवल सिख धर्म ही एक ऐसा धर्म है जहां सरनेम की जगह पुरुषों के नाम के साथ 'सिंह' लगाया जाता है, तो महिलाओं के नाम के साथ 'कौर' लगाने का रिवाज है। क्या आप जानना चाहेंगे कि ऐसा कब से शुरू हुआ।
हालांकि सिख धर्म में प्रारम्भ में ये रिवाज नहीं था, बल्कि बाद में इसे शुरू किया गया था। सिख धर्म के अनुसार ऐसा माना गया है कि सन् 1699 के आसपास भारतीय समाज में जाति प्रथा का इस कदर बोलबाला था कि ये एक-दूसरे के लिए अभिशाप बन गया था। जातिवाद की वजह से सिखों के दसवें गुरु 'गुरु गोविन्द सिंह' काफी चिंतित रहा करते थे। वे चाहते थे कि ऐसा कोई रास्ता निकले और किसी भी प्रकार से यह कुप्रथा समाप्त हो जाए। इसलिए उन्होंने 1699 में वैशाखी का पर्व मनाया।
 उस दिन उन्होंने अपने सभी अनुयायियों को एक ही सरनेम रखने का आदेश दिया, ताकि इससे किसी की जाति का पता ना चले और जातिप्रथा पर लगाम लग सके। इसलिए गुरु गोविन्द सिंह ने पुरुषों को 'सिंह' और महिलाओं को 'कौर' सरनेम से नवाजा। कहा जाता है कि तभी सिख धर्म को मानने वाले पुरुष अपने नाम के साथ सिंह और महिलाएं अपने नाम के साथ कौर लगाती है। इतना ही नहीं सिंह और कौर सरनेम लगाने का भी एक खास अर्थ भी होता है। सिंह और कौर में सिंह का आशय होता है 'शेर' तो कौर का आशय होता है 'राजकुमारी'।गुरु गोविन्द सिंह जी चाहते थे कि उनके अनुयायी सिर्फ एक धर्म के नाम से जाने जाये ना कि अलग-अलग जाति से। इसलिए आप देखंगे कि सिख धर्म में जातिप्रथा ना के बराबर है लेकिन बाकी धर्म जैसे कि हिन्दू और मुस्लिम में जातिप्रथा की स्थिति काफी भयावह है।बेशक़ गुरु साहेबान (सिख गुरु) ने हिन्दू समाज की सबसे बड़ी लाहनत, जाति पाति प्रणाली का, सिद्धांत और अमल के स्तर पर ज़ोरदार खंडन करते हुए, सिख समाज में इसकी पूरी तरह से मनाही कर दी थी। गुरु काल के बाद धीरे धीरे सिखी के बुनियादी सिद्धांत कमज़ोर पड़ने शुरू हो गए। जिन हिंदूवादी अभ्यासों का गुरु साहेबान ने खंडन किया था, उन्होंने सिख धर्म और समाज को फिर से अपने क़ातिलाना शिकंजे में ले लिया। हिन्दूवाद के दुष्प्रभावों का सबसे गाढ़ा इज़हार सिख पंथ में जात पात प्रणाली की फिर से अमल के रूप में हुआ। ऐसे अनेक ऐतिहासिक प्रमाण और हवाले मिलते हैं जो उनीसवीं सदी तक सिख पंथ के फिर से जात-पात प्रबंध की मुकम्मल जकड़ में आ जाने की पुष्टि करते हैं।
 उनीसवीं सदी के दुसरे अर्ध दौरान बेशक़ सिंह सभा लहर द्वारा आरंभ सुधारमुखी गतिविधियों ने सिख समाज को हिंदूवादी प्रभावों से मुक्त करने में कुछ काबिले-तारीफ़ सफलताएं हांसिल की। लेकिन जात-पात का कोढ़ सिख समाज में इस कदर फ़ैल चुका था कि 'सिंघ सभा लहर' के आगूओं की इंक़लाबी कोशिशों के बावजूद सिख पंथ इस नामुराद रोग के असरों से मुक्त न हो सका। फिर भी सिंह सभा लहर द्वारा सिखी के मूल सिद्धान्तों और मौलिक परम्पराओं की फिर से स्थापति के लिए चलाई वैचारिक मुहीम का इतना असर ज़रूर हुआ कि पंथ के रौशन ख्याल हिस्सों में जात-पात को ख़त्म करने ले लिए न्या जोश और उत्साह पैदा हो गया और उन्होंने सिख समाज को इस हिंदूवादी लाहनत से जुदा करने के लिए तीखी वैचारिक मुहीम शुरू कर दी। नतीजतन, सिख पंथ में जात-पात की खुली तारीफ करने वाले तत्व, खासतौर पर सिखी में, ब्राह्मणवादी खोट मिलाने वाला मुख्य वाहक बना। महंत-पुजारी 'परिवार' सिखी सुधार लहर के हमले की सीधी मार तले आ गया और सिख पंथ के धार्मिक केंद्रों और अभ्यासों में जात-पातिए भेदभाव का खुला प्रदर्शन पहले जितना आम नहीं रहा। पर जहाँ तक आम सामाजिक जीवन का संबंध है, वहां जात पातिए भेदभाव और बाँट-अलगता जैसे की तैसी बरकरार रही। खासतौर पर ग्रामीण समाज में कथित ऊँची जात वर्गों के 'नीच' और 'अछूत' समझे जाते वर्गों के प्रति जातिय अभिमानी तरीकों और बर्ताव में कोई कमी नहीं आई।
 सच यह था कि सिख पंथ में से ब्राह्मण वर्ग जिस्मानी तौर पर भले ही गायब हो चुका था लेकिन सोच के स्तर पर वह सिख समाज में ज्यों का त्यों हाज़िर-नाज़िर था। रोज़मर्रा ज़िन्दगी में जात पातिए भेदभाव और विरोध-अलगता के हिसाब से हिन्दू और सिख समाज में कोई मूलभूत अंतर नहीं रहा। हाँ, गुरु साहेबान की इंक़लाबी विचारधारा की प्रेरणा और प्रभाव तले सिख लहर द्वारा अपने आरंभिक दौर में पूरे किये इंक़लाबी कार्यों की बदौलत सिख समाज में जात पातिए दर्जाबंदी की बुन-बनावट में ज़रूर बड़ा बदलाव आ गया था। जहाँ हिन्दू समाज में ब्राह्मण वर्ग का समाजी दर्जा सब से ऊँचा माना जाता है, वहां सिख समाज में धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में ब्राह्मण वर्ग के प्रभुत्व को पूरी तरह से नकारा है।लेकिन समय पड़ने से जैसे ही सिख समाज फिर से जात पातिए प्रणाली की जकड़ में आ गया तो वह वर्ग जिन्होंने खालसा पंथ के इंक़लाबी दौर में ज़्यादा गतिशील भूमिका निभाने का नाम कमाया था और जिन्हें रिवायती हिन्दू जात पातिए दर्जाबंदी में ब्राह्मण वर्ग से एक या दो दर्ज नीचे समझा जाता था, वह सिख समाज में ऊँचा सामाजिक दर्जा हासिल कर गए। इस तरह, ग्रामीण सिख समाज में जट्ट वर्ग ने और शहरी सिख समाज में खत्री-अरोड़ा वर्ग ने 'सवर्ण जातियों' वाला सामाजिक रुतबा हासिल कर लिया जबकि जात पात की जकड़ में आये वर्गों का पहले वाला दर्जा ही बरक़रार रहा। 'पछड़ी' समझी जाने वाली और अन्य जातियों के सामाजिक दर्जे में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। इस सामाजिक यथार्थ की राजनीतिक क्षेत्र में परछाईं पड़नी स्वाभाविक थी। ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्र में यह बात ज़्यादा चुभनिए रूप में सामने आई।
 गाँव की ग्रामीण ज़िन्दगी की सामाजिक एवं आर्थिक हक़ीक़त यह है कि ग्रामीण दलित वर्ग ज़मीन जायदाद से वंचित, सामाजिक तौर पर सबसे ज़्यादा लताड़ा हुआ, तीखी आर्थिक लूट-खसोट और चुभनिए सामाजिक ज़बर और दबाव का शिकार है। उसकी ज़िन्दगी में हिन्दू सवर्ण जातियों का बहुत सीधा दख़ल नहीं। खेती में मेहनत मज़दूरी करते और ग्रांव में आम जीवन बसर करते उसका ज़्यादातर सीधा वास्ता जट्ट से ही पड़ता है। इस तरह आर्थिक लूट-खसोट और सामाजिक ज़बर, दोनों ही पक्षों से उसका तुरंत विरोध जट्ट किसान से ही है। इस में सीधे रूप में हिन्दू सवर्ण जातियां कहीं भी नहीं आतीं (सिवा ग्रामीण बनिए के, जो दलित वर्ग की आर्थिक मजबूरियों का फायदा उठा के सूदखोरी आदि के ज़रिये उसकी आर्थिक लूट-खसोट में सहभागी बनता है). सो, यह सामाजिक आर्थिक फैक्टर ग्रामीण दलित वर्ग को राजनीतिक तौर पर अकाली दल जिसे कि ग्रामीण क्षेत्र में जट्ट किसानों की राजनीतिक जमात के रूप में ही पहचाना जाता है, के विरोध की तरफ धकेलते हैं। दूसरी तरफ, समूचे भारत में दलित वर्ग, जैसे पंजाब का दलित भाईचारा, भी कोंग्रेस पार्टी को अपना हितैषी पक्ष के रूप में देखता है। उसकी यह धारणा कई पक्षों के मिलेजुले प्रभाव का नतीजा है।
 सब से बड़ी बात यह है कि मोहन दास कर्मचंद गाँधी ने आज के इतिहास में छुआछूत विरुद्ध तीखी लड़ाई शुरू करने और भारत में युगों युगों से मानवीय हक़ों से वंचित किये हुए कर्मों के मारे करोड़ों जनों को भारतीय समाज और राज्य में बराबरी के मानवीय अधिकार उपलब्ध कराने का 'पूण्य' कमा के दलित वर्गों के सर पर अहसानों का कर्ज़ चढ़ा दिया कि कोंग्रेसी लीडर पचास सालों तक निरंतर इस कर्ज़े का सूद वसूल करते आ रहे हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ से दलित वर्ग को सरकारी नौकरियों से ले कर चुने हुए महकमों तक आरक्षण की सहूलियत और ऐसी ही और रियायतें देने से इस वर्ग की कांग्रेस पार्टी से सांझ और पक्की हो गई। इस के उलट, सिंह सभा लहर द्वारा शुरू सिखी सुधार लहर का यश घट जाने के बाद सिख लीडरों ने जात पात के खात्मे के कार्य को लगभग नज़रअंदाज़ ही कर दिया। भारत की आज़ादी के संग्राम के दौरान सिख लीडरों की तरफ से दलित वर्ग के हितों की पैरवी की शायद ही कोई उत्साहित उदहारण मिलती हो। आज़ादी के बाद बेशक़ अकाली लीडरों ने कांग्रेस पार्टी की दलित वर्ग को रिजर्वेशन देने जैसी नीतियों का खुल्लम-खुल्ला विरोध तो नहीं किया पर सिख समाज के अंदर ही कथित उच्च जातियां की इस मसले पर असली भावनाएं कभी भी गुप्त नहीं रहीं। उनकी जात-पातिए भड़ास अक्सर तहज़ीब की हदें पर पार करतीं और दलित संवेदना को रह रह कर घायल करती रहीं। इस से दलित वर्ग, डर और असुरक्षा की भावना से, कांग्रेस पार्टी का और ज़्यादा आसरा क़ुबूल करने की और धकेला जाता रहा।
1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद अकाली दल को राजनीतिक सत्ता की और बढ़ता देखके पंजाब का दलित वर्ग, ख़ास तौर पर इसके भीतरी ग़ैर-सिख हिस्से अपने आप को खतरे के मुहँ में आया महसूस करने लगे। इसी दौरान आर्थिक तौर पर ज़्यादा मालामाल और राजनीतिक तौर पर अधिक बलशाली हुए धनाढ्य किसान वर्ग में अहंकार का पारा ओर ऊँचा चढ़ चला और 'हरे इंक़लाब' के आरंभिक वर्षों दौरान गाँवों में जट्टों द्वारा दलितों की नाकाबंदी की घटनाएं आम हो गईं। इस तरह पंजाब के ग्रामीण क्षेत्र में जाति-पाति की लकीरों पर राजनीतिक धड़ेबंदी का रुझान और बल पकड़ गया जो अकाली दल के लिए एक बेहद घाटे वाली और कांग्रेस पार्टी के लिए बड़े राजनीतिक फायदे वाली बात थी।
 इसलिए, पंजाब में राजनीतिक सत्ता के ऊपर काबिज़ होने के लिए अपने सामाजिक आधार को ज़्यादा खुला करना और अपनी राजनीतिक हिमायत के घेरे को और ज़्यादा वर्गों तक फैलाना अकाली दल की यकदम राजनीतिक ज़रुरत थी। इसके लिए सचेतन सुघड़ रणनीति घड़ने और फिर उसका दृढ़तापूर्वक पालन और पैरवी करने का काम अकाली लीडरशिप का सब से अहम और तुरंत सरोकार वाला काम बनना चाहिए था। सचेत स्तर पर रणनीति घड़ने का मतलब था कि सिख धर्म के बुनियादी सिद्धांतों को मद्देनज़र रखते हुए अकाली दल के दूरअंदेशी उद्देश्यों और तुरंत करने वाले कार्यों में जंचने वाला तालमेल बिठाया जाता और सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए राजनीतिक दावपेंचों के मामले में उपयुक्त लचक लाकर राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का आकर्षक मॉडल ले करके आया जाता। ऐसा करने से पहले सबसे पहले ज़रुरत (और शर्त) यह थी कि सिख राजनीति के सामने इस गंभीर चुनौती को सचेतन क़ुबूल किया जाता और पैदा हुए नए हालातों और समस्याओं के सामने अकाली राजनीति की दरुस्त मार्ग-दिशा तय करने के लिए बौद्धिक स्तर पर गहरे एवं गंभीर यतन किये जाते।
 लेकिन अकाली लीडरशिप या सिख बुद्धिजीवियों के स्तर पर ऐसा कोई सचेतन यतन किया हुआ नज़र नहीं आता। इस महत्वपूर्ण मसले के बारे में अकाली दल या उसके अंदर गंभीर विचार -चर्चा छूने और विचार मंथन के ज़रिये सही निर्णय पर पहुँचने का, किसी भी तरफ से, कोई संजीदा कोशिश नहीं हुई। लेकिन समस्या क्योंकि ख़्याली नहीं बल्कि हक़ीक़त में थी और राजनीति की ज़रूरतें इसके तुरंत हल की मांग करती थीं, इस लिए इसे बिना गहरी सोच-विचार के, मौके पर जैसे और जो ठीक लगा वैसे हल कर लेने की अटकलपच्चू (random) पहुँच अपना ली गई। गहरी और गंभीर मसलों के प्रति अपनाई ऐसी बेकायदा पहुँच पर विवेक के मुक़ाबले अंतरप्रेरणा (instinct and/ or intuition) का तत्व ज़्यादा हावी हो गुज़रता है और फैसले लेते समय अक्सर दूरगामी उद्देश्यों और निशानों के मुक़ाबले सामने पड़े मतलब ज़्यादा वज़नदार हो जाते हैं। अकाली दल के मामले में ठीक यही बात हुई।
 पंजाब में कांग्रेस पार्टी सिख पंथ की अव्वल दुश्मन और अकाली दल की मुख्य विरोधी है। सही अर्थों में बात करनी हो तो पंजाब में सिख पंथ की असली दुश्मन ताक़त आर्य समाजी वर्ग था जो पंजाब के लगभग समूचे हिन्दू भाईचार को अपनी सांप्रदायिक विचारधारा मिलावटीपन चढ़ाने और अपनी सांप्रदायिक चालबाज़ी के गिर्द लामबंद करने में कमाल की हद तक सफल हो गया था। दरअसल पंजाब में कांग्रेस पार्टी आर्य समाज के एक राजनितिक विंग विचर रही रही। पंजाबी हिंदू वर्ग की असली वचनबद्धता आर्य समाजी विचारधारा से है और कांग्रेस पार्टी उसके लिए एक 'फ्रंट जत्थेबंदी' से ज़्यादा और कोई अहमियद नहीं रखती। पंजाब के हिंदू वर्ग और कांग्रेस पार्टी के आपसी संबंधों को समझने के लिए यह तथ्य बहुत ही महत्वपूर्ण है।
 यह कहना कि कांग्रेस पार्टी पंजाब के हिंदू वर्ग को बरगला रही है या अपने संकुचित राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर रही थी या है, सच्चाई को बिगड़े हुए रूप में देखना है। सिख पंथ के संबंध में पंजाबी हिंदू तबके और कांग्रेसी लीडरशिप की बुनियादी पहुँच में कोई टकराव नहीं। दोनों ही हिंदू मत को एक बानगी मानके चलते हैं। दोनों ही सिख धर्म को हिन्दू समाज में जज़्ब कर लेने के सांझे उदेश्य पर पहरा देते हैं। सो, इस दृष्टि से दोनों ही सिख कौम के प्रति बराबर दुर्भावना रखते हैं। भारत की आज़ादी की लड़ाई के दौरान पंजाबी हिंदू वर्ग के बड़े हिस्से राजनीतिक तौर पर कांग्रेस पार्टी से जुड़े होने के बावजूद गाँधी की विचारधारा से आर्य समाजी विचारधारा के ज़्यादा प्रभाव तले थे। लाल लाजपत राय से लेकर जगत नारायण तक, सभी आर्य समाजी 'परिवार' की सोच पर सांप्रदायिकता का एक-सामान गाढ़ा रंग चढ़ रखा था। भारत के बंटवारे से पहले सांप्रदायिकता की यह धारा मुख्य रूप से मुस्लिम भाईचारे के खिलाफ इंगित रही। वैसे बीच-मध्य जब भी सिख पंथ ने हिंदू वर्ग से अपनी अलग पहचान जतलाने की कोशिशें की तो उसे तुरंत ही आर्य समाजी वर्ग के क्रोध का सामना करना पड़ा।
 भारत की आज़ादी के बाद पंजाब में मुस्लिम फैक्टर नदारद हो जाने से इस सांप्रदायिक धारा का सारा कहर सिख कौम पर टूट पड़ा। भारतीय सरकार की बागडोर कांग्रेस पार्टी के हाथों में आ जाने से पंजाबी हिन्दू वर्ग, अपने सांप्रदायिक उद्देश्यों और हितों को पूरा करने के लिए, कांग्रेस पार्टी का और भी ज़्यादा जोशीला हिमायती बन गया। उधर कांग्रेसी शासकों को भी पंजाब में सिख कौम के संबंध में अपने फिरकापरस्त मंसूबों को अंजाम देने के लिए पंजाब के हिन्दू वर्ग के सहयोग और हिमायत की भारी ज़रुरत थी। विचारधारक समरसता के साथ ही यह एक परस्पर उदेश्य था जो पंजाबी हिंदू वर्ग और कांग्रेस पार्टी में मजबूत संयोग-कड़ी बना हुआ था।
पंजाबी हिंदू वर्ग कांग्रेस पार्टी से एक तरफ से थोड़ी लाभकारी पोज़िशन में था। उस की सारी जान कांग्रेस पार्टी की मुट्ठी में नहीं थी। कांग्रेस पार्टी के पंजाबी हिंदू वर्ग की उम्मीदें और मांगों पर पूरा न उतर सकने की सूरत में, उसके लिए कांग्रेस का पल्ला छोड़ किसी अन्य राजनीतिक पाले में चले जाने का रास्ता खुला था। इसके विपरीत पंजाब में कांग्रेस पार्टी के लिए हिन्दू वर्ग की बाजू छोड़ के ज़िंदा रह पाना मुमकिन नहीं था। सिख कौम को ग़ुलाम बना के रखने और अकाली दल को राज्यसत्ता से पर रखने के लिए कांग्रेस शासकों को पंजाब के हिन्दू वर्ग का सहयोग हासिल करना निहायत ज़रूरी था। हिन्दू वर्ग के इलावा कांग्रेस पार्टी का पंजाब में सामाजिक तौर पर पछड़े वर्गों में भी मजबूत आधार था। इस तरह इन वर्गों की मिश्रित हिमायत के साथी ही कांग्रेस पार्टी अकाली दल को राज्यसत्ता से परे रखने के उदेश्य में सफल रही थी। सो अकाली दल के सामने कांग्रेस पार्टी की इस राजनीतिक किलेबंदी में दरार डालने की राजनीतिक चुनौती थी। केवल ऐसा करके ही वह अपने लिए राज्यसत्ता तक पहुँचने का रास्ता समतल कर सकता था।

 पंजाब ऐसा प्रांत है जहां दलितों की आबादी सबसे ज्यादा है- करीब 29 प्रतिशत। ये हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई धर्म में बंटे हुए हैं। लेकिन इतनी आबादी वाले दलितों की खेतिहर जमीन में हिस्सेदारी केवल 2.5 फीसदी है। दूसरी ओर राज्य की कुल 64 फीसदी सिख आबादी में जाट सिख करीब 32 फीसदी हैं, लेकिन उनके पास 80 फीसदी उपजाऊ जमीनें हैं। भूमि वितरण का यह असंतुलन राजनीति और धार्मिक संगठनों में भी दिखता है, जहां ज्यादातर बड़े पद जाट सिखों के पास हैं। वैसे तो सिख धर्म में जाति व्यवस्था के लिए कोई जगह नहीं है और हिंदू वर्णव्यवस्था के उलट वहां सभी की समानता की बात कही गई है। इसके बावजूद भूमि, संख्यात्मक बहुलता और परंपरागत रौबदाब के चलते जाति की चेतना ने गहराई से जड़ें जमाई हुई हैं। खास बात यह है कि पंजाब में व्यापार और साहूकारी से जुड़े रहे खत्रियों के अलावा सभी जातियां हिंदू धर्म व्यवस्था में निम्न जातियां मानी गई हैं, पर कृषि से जुड़े सभी महत्वपूर्ण संसाधनों पर कब्जा कर स्थानीय संस्कृति व राजनीति में उन्होंने ऊंची जाति का दर्जा हासिल कर लिया है। जातिगत चेतना का असर इतना व्यापक है कि विभिन्न सिख जातियों में आपस में विवाह भी नहीं होता। जाट, खत्री और रामगढ़िया सिखों को प्रभुत्वशाली जाति माना जाता है जो मजहबी, रामदसिया और रंगरेता सिखों को अपने से नीचे समझते हैं। जाट सिख व दलित सिखों के बीच टकराव में ही डेरा विवाद की वजहें छिपी हैं।
 पंजाब में करीब नौ हजार सिख व गैर सिख डेरे हैं। गैर सिख डेरों से ज्यादातर दलित समझे जाने वाले अनुयायी हैं और बताया जाता है कि डेरा सच्चा सौदा के 70 फीसदी अनुयायी सिख और गैर सिख दलित व अन्य निम्न जातियों से हैं। डेरों की ओर निम्न जातियों के झुकाव को जाट सिखों के दबदबे वाले गुरुद्वारों से अलग एक 'वैकल्पिक आध्यात्मिक-धार्मिक स्थान' की तलाश के रूप में देखा जाता है। विदेशों में बसे कई दलित परिवारों से इन डेरों को मदद मिलती है और दलित पहचान को उभारने में ये डेरे अपना योगदान देते हैं। इससे सिख संगठनों में इन डेरों के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है। गांवों में जाट सिखों और दलितों के बीच टकराव बढ़े हैं और दलितों के बहिष्कार की अपीलें भी जारी होती है। 1920 के दशक के मंगूराम के आदिधर्म आंदोलन व आम्बेडकरवाद के असर ने भी पंजाबी दलितों में संसाधनों में हिस्सेदारी की चेतना को बढ़ाया है। इसके अलावा हरित क्रांति ने भी खेत मजदूरी को बढ़ाने और सम्मान की मांगों को उभारने में योगदान दिया है। दलितों को गुरुद्वारों की राजनीति में भी गैरबराबरी का अहसास होता है, इसलिए कई गांवों में अगर वे गुरुद्वारों की प्रबंधन कमिटी में जाट सिखों के दबदबे को चुनौती दे रहे हैं तो कई जगह उन्होंने अपने अलग गुरुद्वारे बना लिए हैं। पंजाबी समाज की बनावट का अध्ययन कर रहे कई रिसर्चरों ने पाया है कि राज्य के करीब 12 हजार गांवों में से 10 हजार में दलितों ने अपने अलग गुरुद्वारे निमिर्त कर लिए हैं। हाल के बरसों में हुई कई और घटनाएं भी जाट-दलित टकराव को सामने लाती हैं। 2003 में जालंधर के तल्हण गांव में दलितों ने स्थानीय गुरुद्वारे की प्रबंधन कमिटी में अपने प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग की थी जिसे ठुकरा दिया गया। इसके बाद दोनों पक्ष उग्र हो उठे और कई दिनों तक हिंसा जारी रही। इस घटना ने एक बार फिर सिर्फ राजनीति ही नहीं बल्कि धार्मिक संगठनों के अंदर की राजनीति में भी समान भागीदारी की दलितों की मांग को प्रमुखता से उभारा था। इसके अलावा मेहम की घटना भी काफी चर्चा में रही जहां बाबा खजान सिंह उदासी के डेरे को गांव के अल्पसंख्यक लेकिन शक्तिशाली जाट सिखों ने जबरन अपने नियंत्रण में ले लिया था और वहां सिख-खालसा प्रतीकों की स्थापना कर दी थी। बाद में दलित सिखों के प्रचंड विरोध के बाद विवाद के हल के लिए डेरे की प्रबंधन कमिटी के संचालन के लिए सरकार ने एक अधिकारी नियुक्त कर दिया। डेरा सच्चा सौदा मामले में भड़की हिंसा में भी जाट सिखों के राजनीतिक दबदबे को स्थापित करने का मकसद था, क्योंकि ये डेरे पंजाब की शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी और अकाल तख्त की राजनीति को भी चुनौती देते हैं। इनमें 'गॉडमैन' पनपने के कारण कई विवाद भी खड़े होते हैं, डेरों के कामकाज पर गंभीर सवाल लगते रहे हैं, लेकिन हाशिए पर रहने वाले निम्न जाति के लोग इन्हें सम्मान व प्रतिष्ठा हासिल करने के साधन के रूप में भी देखते हैं।

अवतारवाद और पैगम्बरवाद का खंडन-

सिखमत में हर जीव को अवतार कहा गया है। हर जीव उस निरंकार की अंश है। संसार में कोई भी पंची, पशु, पेड़, इतियादी अवतार हैं। मानुष की योनी में जीव अपना ज्ञान पूरा करने के लिए अवतरित हुआ है। व्यक्ति की पूजा सिख धर्म में नहीं है "मानुख कि टेक बिरथी सब जानत, देने, को एके भगवान"। तमाम अवतार एक निरंकार की शर्त पर पूरे नहीं उतरते कोई भी अजूनी नहीं है। यही कारण है की सिख किसी को परमेशर के रूप में नहीं मानते। हाँ अगर कोई अवतार गुरमत का उपदेस करता है तो सिख उस उपदेश के साथ ज़रूर जुड़े रहते हैं। जैसा की कृष्ण ने गीता में कहा है की आत्मा मरती नहीं और जीव हत्या कुछ नहीं होती, इस बात से तो सिखमत सहमत है लेकिन आगे कृष्ण ने कहा है की कर्म ही धर्म है जिस से सिख धर्म सहमत नहीं।
पैग़म्बर वो है जो निरंकार का सन्देश अथवा ज्ञान आम लोकई में बांटे। जैसा की इस्लाम में कहा है की मुहम्मद आखरी पैगम्बर है सिखों में कहा गया है कि "हर जुग जुग भक्त उपाया"। भक्त समे दर समे पैदा होते हैं और निरंकार का सन्देश लोगों तक पहुंचाते हैं। सिखमत "ला इलाहा इल्ल अल्लाह (अल्लाह् के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है )" से सहमत है लेकिन सिर्फ़ मुहम्मद ही रसूल अल्लाह है इस बात से सहमत नहीं। अर्जुन देव जी कहते हैं "धुर की बानी आई, तिन सगली चिंत मिटाई", अर्थात मुझे धुर से वाणी आई है और मेरी सगल चिंताएं मिट गई हैं किओंकी जिसकी ताक में मैं बैठा था मुझे वो मिल गया है।

धार्मिक ग्रंथ-

मूल रूप में भक्तो अवम सत्गुरुओं की वाणी का संग्रेह जो सतगुरु अर्जुन देव जी ने किया था जिसे आदि ग्रंथ कहा जाता है सिखों के धार्मिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्ध है | यह ग्रंथ ३६ भक्तों का सचा उपदेश है और आश्चर्यजनक बात ये है की ३६ भक्तों ने निरंकार को सम दृष्टि में व्याख्यान किया है | किसी शब्द में कोई भिन्नता नहीं है | सिख आदि ग्रंथ के साथ साथ दसम ग्रंथ, जो की सतगुरु गोबिंद सिंह जी की वाणी का संग्रेह है को भी मानते हैं | यह ग्रंथ खालसे के अधीन है | पर मूल रूप में आदि ग्रंथ का ज्ञान लेना ही सिखों के लिए सर्वोप्रिया है |
यही नहीं सिख हर उस ग्रंथ को सम्मान देते हैं, जिसमे गुरमत का उपदेश है |
आदि ग्रंथ

गुरु ग्रंथ साहिब

आदि ग्रंथ या आदि गुरु ग्रंथ या गुरु ग्रंथ साहिब या आदि गुरु दरबार या पोथी साहिब, गुरु अर्जुन देव दवारा संगृहित एक धार्मिक ग्रंथ है जिसमे ३६ भक्तों के आत्मिक जीवन के अनुभव दर्ज हैं | आदि ग्रंथ इस लिए कहा जाता है क्योंकि इसमें "आदि" का ज्ञान भरपूर है | जप बनी के मुताबिक "सच" ही आदि है | इसका ज्ञान करवाने वाले ग्रंथ को आदि ग्रंथ कहते हैं | इसके हवाले स्वयम आदि ग्रंथ के भीतर हैं | हलाकि विदवान तबका कहता है क्योंकि ये ग्रंथ में गुरु तेग बहादुर जी की बनी नहीं थी इस लिए यह आदि ग्रंथ है और सतगुरु गोबिंद सिंह जी ने ९वें महले की बनी चढ़ाई इस लिए इस आदि ग्रंथ की जगंह गुरु ग्रंथ कहा जाने लगा |
भक्तो एवं सत्गुरुओं की वाणी पोथिओं के रूप में सतगुरु अर्जुन देव जी के समय मोजूद थीं | भाई गुरदास जी ने यह ग्रंथ लिखा और सतगुरु अर्जुन देव जी दिशा निर्धारक बने | उन्हों ने अपनी वाणी भी ग्रंथ में दर्ज की | यह ग्रंथ की कई नकले भी तैयार हुई |
आदि ग्रंथ के १४३० पन्ने खालसा दवारा मानकित किए गए |
दसम ग्रंथ
दसम ग्रन्थ, सिखों का धर्मग्रन्थ है जो सतगुर गोबिंद सिंह जी की पवित्र वाणी एवं रचनाओ का संग्रह है।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवनकाल में अनेक रचनाएँ की जिनकी छोटी छोटी पोथियाँ बना दीं। उन की मौत के बाद उन की धर्म पत्नी माता सुन्दरी की आज्ञा से भाई मनी सिंह खालसा और अन्य खालसा भाइयों ने गुरु गोबिंद सिंह जी की सारी रचनाओ को इकठा किया और एक जिल्द में चढ़ा दिया जिसे आज "दसम ग्रन्थ" कहा जाता है। सीधे शब्दों में कहा जाये तो गुरु गोबिंद सिंह जी ने रचना की और खालसे ने सम्पादना की। दसम ग्रन्थ का सत्कार सारी सिख कौम करती है।
दसम ग्रंथ की वानियाँ जैसे की जाप साहिब, तव परसाद सवैये और चोपाई साहिब सिखों के रोजाना सजदा, नितनेम, का हिस्सा है और यह वानियाँ खंडे बाटे की पहोल, जिस को आम भाषा में अमृत छकना कहते हैं, को बनाते वक्त पढ़ी जाती हैं। तखत हजूर साहिब, तखत पटना साहिब और निहंग सिंह के गुरुद्वारों में दसम ग्रन्थ का गुरु ग्रन्थ साहिब के साथ परकाश होता हैं और रोज़ हुकाम्नामे भी लिया जाता है।
अन्य ग्रन्थ
सरब्लोह ग्रन्थ ओर भाई गुरदास की वारें शंका ग्रस्त रचनाए हैं | हलाकि खालसा महिमा सर्ब्लोह ग्रन्थ में सुसजित है जो सतगुरु गोबिंद सिंह की प्रमाणित रचना है, बाकी स्र्ब्लोह ग्रन्थ में कर्म कांड, व्यक्ति पूजा इतियादी विशे मोजूद हैं जो सिखों के बुनयादी उसूलों के खिलाफ हैं | भाई गुरदास की वारों में मूर्ती पूजा, कर्म सिधांत आदिक गुरमत विरुद्ध शब्द दर्ज हैं
सिख धर्म का इतिहास के लिए कोई भी इतिहासिक स्रोत को पूरी तरंह से प्र्पख नहीं मन जाता | श्री गुर सोभा ही ऐसा ग्रन्थ मन गया है जो गोबिंद सिंह के निकटवर्ती सिख द्वारा लिखा गया है लेकिन इसमें तारीखें नहीं दी गई हैं | सिखों के और भी इतिहासक ग्रन्थ हैं जैसे की श्री गुर परताप सूरज ग्रन्थ, गुर्बिलास पातशाही १०, श्री गुर सोभा, मन्हीमा परकाश एवं पंथ परकाश, जनमसखियाँ इतियादी | श्री गुर परताप सूरज ग्रन्थ की व्याख्या गुरद्वारों में होती है | कभी गुर्बिलास पातशाही १० की होती थी | १७५० के बाद ज्यादातर इतिहास लिखे गए हैं | इतिहास लिखने वाले विद्वान ज्यादातर सनातनी थे जिस कारण कुछ इतिहासिक पुस्तकों में सतगुरु एवं भक्त चमत्कारी दिखाए हैं जो की गुरमत फलसफे के मुताबिक ठीक नहीं है | गुरु नानक का हवा में उड़ना, मगरमच की सवारी करना, माता गंगा का बाबा बुड्ढा द्वारा गर्ब्वती करना इतियादी घटनाए जम्सखिओं और गुर्बिलास में सुसजित हैं और बाद वाले इतिहासकारों ने इन्ही बातों के ऊपर श्र्धवास मसाला लगा कर लिखा हुआ है | किसी सतगुर एवं भक्त ने अपना संसारी इतिहास नहीं लिखा | सतगुरु गोबिंद सिंह ने भी जितना लिखा है वह संक्षेप और टूक परमाण जितना लिखा है | सिख धर्म इतिहास को इतना महत्व नहीं देता, जो इतिहास गुरबानी समझने के काम आए उतना ही सिख के लिए ज़रूरी है |




30.10.19

मुसलमानों में भी होती हैं जातियां,क्या है मुस्लिम जाति व्यवस्था?:musalman samaj me jatiyan


कई जानकारों ने भारत में ऊंची जाति के मुसलमानों को चार प्रमुख समूहों में बांटा था जो कि सैयद, शेख, मुग़ल और पठान के नाम से जाने जाते हैं.
यह सच है कि इस्लाम में किसी भी जातिगत भेदभाव के लिए जगह नहीं. हालांकि हिंदुस्तानी मुसलमानों में जाति व्यवस्था देखने को मिलती है. मगर आमतौर पर बड़ी राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों की जातीय व्यवस्था, फिरक़े और दूसरे समूहों की राजनीति को कहने-सुनने से कतराती रही हैं. मुसलमानों में जाति व्यवस्था का मामला साल 1936 में ही अंग्रेजों के सामने आ गया था, इसके बाद से लगातार काका कालेकर समिति, मंडल कमीशन और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी इस पर तफसील से चर्चा की गई है.
बता दें कि मुसलमानों की जाति व्यवस्था पर 1960 में ग़ौस अंसारी ने 'मुस्लिम सोशल डिवीजन इन इंडिया' नाम की एक किताब लिखी थी. इसमें ग़ौस ने उत्तर भारत में मुसलमानों को चार प्रमुख समूहों में बांटा था- सैयद, शेख, मुग़ल और पठान. हालांकि मुसलमानों ने भी हिंदू जाति व्यवस्था की तरह ही एक सिस्टम अपना लिया जो तीन स्तरों पर काम करता है:



कौन हैं अशराफ, अजलाफ और अरजाल?
इस व्यवस्था में सैयद ख़ुद को इसमें सबसे ऊपर रखते हैं और ख़ुद को पैग़ंबर मोहम्मद साहब के खानदान से जुड़ा बताते हैं. दूसरे नंबर पर हैं शेख, जो ख़ुद को पैग़ंबर मोहम्मद के क़बीले 'क़ुरैश' से संबंधित बताते हैं. इनमें सिद्दीक़ी, फारुख़ी और अब्बास कुलनाम नाम इस्तेमाल करने वाले लोग हैं. तीसरे पर मुग़ल हैं, जो बाबर के नेतृत्व में भारत आए थे. चौथे नंबर पर पठान हैं जो पश्तो बोलते हैं और फिलहाल पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के पख़्तूनखा इलाक़े से माने जाते हैं. बहरहाल. इसके अलावा हिंदुओं की तरह ही एक जातीय व्यवस्था भी है, जहां अशराफ, अजलाफ और अरजाल नाम की तीन श्रेणियां हैं.
1. अशराफ़: ख़ुद को भारत के बाहर की नस्लों जैसे अफगान, अरब, पर्शियन या तुर्क बताने वाले
मुग़ल, पठान, सैयद, शेख
2. भारतीय ऊंची जातियों से कन्वर्ट:
मुस्लिम राजपूत
3. अजलाफ: भारतीय गैर-सवर्ण जातियों से कन्वर्ट
दर्जी, धोबी, धुनिया, गद्दी, फाकिर, हज्जाम (नाई), जुलाहा, कबाड़िया, कुम्हार, कंजरा, मिरासी, मनिहार, तेली
4. अरजाल: भारतीय दलित जातियों से कन्वर्ट
हलालखोर, भंगी, हसनती, लाल बेगी, मेहतर, नट, गधेरी





ग़ौस अंसारी के अलावा इम्तियाज़ अहमद ने भी 1978 में 'कास्ट एंड सोशल स्टार्टिफिकेशन अमंग द मुस्लिम्स' में बताया था कि कैसे इस्लाम क़ुबूल करने के बावजूद हिंदू जातीय संरचना ज्यों के त्यों मुस्लिम समाज में भी जगह पा गई.
सोशियोलॉजिस्ट एमएन श्रीनिवासन भी मानते हैं कि भारत या दक्षिण एशिया में मौजूद जाति व्यवस्था इतनी मज़बूत थी कि कई बाहर से आए धर्मों ने इसे न चाहते हुए भी अपना लिया. हिंदू धर्म से इस्लाम में आने वाले सामान्य जीवन में इस जाति व्यवस्था के इतने आदी थे तो मुसलमान होने के बाद भी इन्हें इस सिस्टम को मानते रहने में दिक्कत महसूस नहीं हुई.




कई जातियां जैसे- आतिशबाज़, बढ़ई, भांड, भातिहारा, भिश्ती, धोबी, मनिहार, दर्जी हिंदुओं और मुसलमानों में एक जैसी हैं. ग़ौस ने बताया कि सैयद और शेख आमतौर सबसे ऊपर माने जाते हैं और धर्म से जुड़े कामों की ज़िम्मेदारी भी इनकी ही होती है. मुग़लों और पठानों को क़रीब-क़रीब हिंदुओं की क्षत्रिय जातियों की तरह ही समझा जाता रहा है. इसके अलावा ग़ौस ने ओबीसी मुस्लिम और दलित मुस्लिम को - क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट और नॉन-क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट में बांटा है. क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट में हिंदुओं की ओबीसी जातियों से आए लोग हैं जबकि नॉन-क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट में दलित जातियों से मुस्लिम समाज में आए लोग हैं. हालांकि दलित मुसलमानों को अभी भी एससी रिजर्वेशन हासिल नहीं हो पाया है.
दलित मुस्लिमों को ओबीसी रिज़र्वेशन क्यों ?
एससी कमीशन के सदस्य योगेंद्र पासवान इसकी तस्दीक करते हैं कि फिलहाल दलित मुसलमानों को रिजर्वेशन हासिल नहीं है. हालांकि ऐसी 30 जातियों को ओबीसी रिज़र्वेशन का फ़ायदा ज़रूर मिलता है. बता दें कि ब्रिटिश राज में ही मुस्लिम दलितों को हिंदू दलितों की तरह सरकारी योजनाओं में प्रोत्साहन और रिज़र्वेशन देने जैसी बहस शुरू हो गई थी. सच्चर कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक़ 1936 में जब अंग्रेजों के सामने ये मामला गया तो एक इंपीरियल ऑर्डर के तहत सिख, बौद्ध, मुस्लिम और ईसाई दलितों को बतौर दलित मान्यता दी गई लेकिन इन्हें हिंदू दलितों को मिलने वाले फ़ायदों से महरूम कर दिया गया. 1950 में आज़ाद भारत के संविधान में भी व्यवस्था यही रही. हालांकि 1956 में सिख दलितों और 1990 में नव-बौद्धों को दलितों में शामिल तो कर लिया गया पर मुस्लिम दलित जातियों को मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद ओबीसी लिस्ट में ही जगह मिल पाई.



काका कालेलकर कमीशन (1955) ने क्या कहा ?
इस कमीशन ने 2399 पिछड़ी जातियों की एक लिस्ट बनाई थी जिनमें से 837 जातियों को 'अति पिछड़ा' की श्रेणी में रखा गया था. कमीशन ने पिछड़ी जातियों की इस सूची में न सिर्फ़ हिंदू ओबीसी बल्कि मुस्लिम ओबीसी जातियों को भी जगह दी थी. कमीशन ने इन जातियों को पिछड़ा तो माना, लेकिन मुसलमानों और ईसाइयों में मौजूद इन जातियों के साथ जातिगत भेदभाव होता है, इसे मानने से इनकार कर दिया था. कमीशन ने माना कि पिछड़ापन है लेकिन ये भी कहा कि जाति आधारित क़ानूनी व्यवस्था या ऐसी कोई सिफ़ारिश इन धर्मों में भी इस 'अनहेल्दी प्रैक्टिस' को बढ़ावा दे सकती है.
मंडल कमीशन (1980) ने क्या कहा ?
इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में देश की 3743 जातियों को ओबीसी लिस्ट में शामिल किया था. कमीशन ने माना कि जातिगत भेदभाव सिर्फ़ हिंदुओं तक सीमित नहीं बल्कि मुस्लिम, सिख और ईसाइयों में भी है. कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में 82 मुस्लिम जातियों को ओबीसी में जगह दी थी. दलितों से जो मुसलमान बने उन्हें 'अरजाल' और ओबीसी जातियों से मुसलमान बने लोगों को 'अजलाफ' की श्रेणी में रखा गया था. हालांकि कमीशन ने सिफारिश की कि 'अरजाल' को एससी कैटेगरी में फ़ायदा मिलना चाहिए. साथ ही इन्हें एमबीसी (मोस्ट बैकवर्ड कास्ट) कैटेगरी में शामिल कर दिया. इसी के बाद से मुस्लिम जातियों को ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलने लगा. बाद में सच्चर कमेटी रिपोर्ट में भी माना गया कि मुस्लिम ओबीसी में ग़रीबी सबसे ज़्यादा है. सोशल इंडीकेटर्स जैसे कुपोषण, हाउसहोल्ड और सामजिक पिछड़ेपन के मामले में भी मुस्लिम ओबीसी की हालत देश में हिंदू दलितों से भी बदतर है.
ओबीसी-दलित मुस्लिम नुकसान में
युसूफ कहते हैं कि पसमांदा मुसलमान तो लगातार एक चक्रव्यूह में फंसा है. लगातार 'इस्लाम खतरे में' रहता है जिसके बदले ओबीसी-दलित मुसलमानों को अपने मुद्दों पर बोलने से रोका जाता रहा है. हिंदू दलितों को जब आबादी के हिसाब से रिजर्वेशन मिला है तो मुस्लिमों को इससे महरूम क्यों रखा जा रहा है. अभी कुछ सालों से 'हिंदू' भी खतरे में हैं तो मुसलमानों से उम्मीद की जाती है कि वो एकजुट रहें और इसी नाम पर मुस्लिम समाज का पिछड़ा तबका लगातार ठगा जाता है. जबकि सच तो ये है कि मुस्लिम भी अन्य समुदायों की तरह वोट करते हैं और 2014 में यूपी में एक भी सीट न आना ये साबित करता है.
ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के एमए खालिद कहते हैं, '2019 में मुस्लिमों को अपनी स्ट्रैटिजी बदलनी होगी और अपने विकल्प खुले रखने होंगे.' बता दें कि 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने अपनी रणनीति में सिर्फ जीतने वाले उम्मीदवारों को टिकट देने और मुस्लिम वोटों को बांटने का फैसला किया था. बीजेपी की रिकॉर्ड जीत ने मुसलमानों को टिकट देने वाली पार्टियों का सूपड़ा साफ़ कर दिया. ऐसे में मुस्लिम सांसदों की संख्या लगातार कम होते जाने के पीछे ठोस वजह गैर-बीजेपी पार्टियों की मुस्लिमों को लेकर सीमित सोच का नतीजा है.
Disclaimer: इस  content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे
*****************


26.10.19

मीणा जाति समाज की जानकारी और गौत्रानुसार कुलदेवी:Meena caste history




मीणा इतिहास एक परिचय..
मीणा जाति मूल रूप से भारत के राजस्थान राज्य में निवास करने वाली एक जऩजाति है। मीणा जाति भारतवर्ष की प्राचीनतम पांच सबसे बडी जनजातियों में से एक मानी जाती है ।

*वेद पुराणों के अनुसार मीणा जाति मत्स्य  भगवान की वंशज है। पुराणों के अनुसार चैत्र शुक्ला तृतीया को कृतमाला नदी के जल से मत्स्य भगवान प्रकट हुए थे। इस दिन को मीणा समाज जहां एक ओर मत्स्य जयन्ती के रूप में मनाया जाता है वहीं दूसरी ओर इसी दिन संम्पूर्ण राजस्थान में गणगौर का त्योहार बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है।*
मीणा जाति का गणचिह्न मीन (मछली) था। मछली को संस्कृत में मत्स्य कहा जाता है। प्राचीनकाल में मीणा जाति के राजाओं के हाथ में वज्र तथा ध्वजाओं में मत्स्य का चिह्न अंकित होता था, इसी कारण से प्राचीनकाल में मीणा जाति को मत्स्य माना गया।
प्राचीन ग्रंथों में मत्स्य जनपद का स्पष्ट उल्लेख है जिसकी राजधानी विराट नगर थी, जो अब जयपुर वैराठ है। इस मस्त्य जनपद में अलवर, भरतपुर एवं जयपुर के आस-पास का क्षेत्र शामिल था। आज भी मीणा लोग इसी क्षेत्र में बहुत अधिक संख्या में रहते हैं।
मीणा जाति के भाटों के अनुसार मीणा जाति में 12 पाल, 32 तड़ एवं 5248 गौत्र हैं। मूलतः मीना एक सत्तारूढ़ [जाति] थे, और मत्स्य, यानी, राजस्थान या मत्स्य संघ के शासक थे, लेकिन उनका पतन स्य्न्थिअन् साथ आत्मघात से शुरू हुआ और पूरा जब ब्रिटिश सरकार ने उन्हें राजपूतों के साथ मिलकर "आपराधिक जाति" में डाल दिया था। यह कार्रवाई, राजस्थान में राजपूत राज्य के साथ उनके गठबंधन के समर्थन में लिया गया निर्णय थी |
राजा आम्बेर (जयपुर) सहित राजस्थान के प्रमुख भागों के प्रारंभिक शासक थे। पुस्तक 'संस्कृति और भारतीय जातियों की एकता में कहा गया है कि मीणा  राजपूतों के समान एक क्षत्रिय जाति के रूप में मानी जाती हे परंतु इतिहास में उल्लेख बहुत कम किया गया हैै।
प्राचीन समय में राजस्थान मे मीणा  वंश के राजाओ का शासन था। मीणा राज्य मछली (राज्य) कहा जाता था। संस्कृत में मत्स्य राज्य का ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है| बाद में भील और मीना, विदेशी लोगों से जो कि सिंध्, हेप्थलिते या अन्य मध्य एशियाई गुटों के साथ आये थे, से मिश्रित हुए।
 जाति इतिहासकार डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार  मीणा  मुख्य रूप से मीन भगवान और  शिव की पुजा करते हैं। मीणाओ मे कई अन्य हिंदू जातिओं की तुलना में महिलाओं के लिए बेहतर अधिकार रहे हैं। विधवाओं और तलाकशुदा का पुनर्विवाह एक आम बात है और इसे अच्छी तरह से  समाज में स्वीकार कर लिया  गया है। इस तरह के अभ्यास वैदिक सभ्यता का हिस्सा हैं।
आक्रमण के वर्षों के दौरान, और १८६८ के भयंकर अकाल में तबाही  के तनाव के तहत कई  समुह बने। एक परिणाम के रूप मे भूखे परिवारों को जाति और ईमानदारी का संदेह का परित्याग करने के लिए पशु चोरी और उन्हें खाने के लिए मजबूर होना पडा।.
*विषय सूची*
1 वर्ग
2 मीणा जाति के प्रमुख राज्य निम्नलिखित थे
3 मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख किले
4 मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख बाबड़ियां
5 मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख मंदिर :
*१-मीणा जाति प्रमुख रूप से निम्न वर्गों में बंटी हुई है..*
:-जमींदार या पुरानावासी मीणा :-
जमींदार या पुरानावासी मीणा वे हैं जो प्रायः खेती एवं पशुपालन का कार्य बर्षों से करते आ रहे हैं। ये लोग राजस्थान के सवाईमाधोपुर, करौली,दौसा व जयपुर जिले में सर्वाधिक हैं|
*-:चौकीदार या नयाबासी मीणा :-*
चौकीदार या नयाबासी मीणा वे मीणा हैं जो अपनी स्वछंद प्रकृति के कारण चौकीदारी का कार्य करते थे। इनके पास जमींने नहीं थीं, इस कारण जहां इच्छा हुई वहीं बस गए। उक्त कारणों से इन्हें नयाबासी भी कहा जाता है। ये लोग सीकर, झुंझुनू, एवं जयपुर जिले में सर्वाधिक संख्या में हैं।
-:प्रतिहार या पडिहार मीणा :-
इस वर्ग के मीणा टोंक, भीलवाड़ा, तथा बूंदी जिले में बहुतायत में पाये जाते हैं। प्रतिहार का शाब्दिक अर्थ उलट का प्रहार करना होता है। ये लोग छापामार युद्ध कौशल में चतुर थे इसलिये प्रतिहार कहलाये।
-:रावत मीणा :-
रावत मीणा अजमेर, मारवाड़ में निवास करते हैं। रावत एक उपाधी थी जो बहादुरी के लिये दी जाती थी!
-:भील मीणा :-
ये लोग सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं चित्तोड़गढ़ जिले में प्रमुख रूप से निवास करते हैं।
२-मीणा जाति के प्रमुख राज्य :-
खोहगंग का चांदा राजवंश,
मांच का सीहरा राजवंश,
गैटोर तथा झोटवाड़ा के नाँढला राजवंश,
आमेर का सूसावत राजवंश,
नायला का राव बखो [beeko] देवड़वाल (द॓रवाल) राजवंश,
नहाण का गोमलाडू राजवंश,
रणथम्भौर का टाटू राजवंश,
नाँढ़ला का राजवंश,
बूंदी का उषारा एवम् मोटिश राजवंश,
मेवाड़ का मीणा राजवंश,
माथासुला ओर नरेठका ब्याड्वाल
झान्कड़ी अंगारी (थानागाजी) का सौगन मीना राजवंश!
*प्रचीनकाल में मीणा जाति का राज्य राजस्थान में चारों ओर फ़ैला हुआ था!*
३-मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख किले :-
तारागढ़ का किला बूंदी,
आमागढ़ का किला,
हथरोई का किला,
खोह का किला,
जमवारामगढ़ का किला,
४-मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख बाबड़ियां:-
भुली बाबड़ी ग्राम सरजोली,
मीन भग्वान राणी जी की बावड़ी बूंदी बावदी, सरिस्का, अल्वर
पन्ना मीणा की बाबड़ी, आमेर
खोहगंग की बाबड़ी,जयपुर
मीणा राजा चन्द की आभानेरी चाँद बावड़ी
५-मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख मंदिर :-
दांत माता का मंदिर, जमवारामगढ़- सीहरा मीणाओं की कुल देवी,
शिव मंदिर, नई का नाथ, बांसखो,जयपुर
बांकी माता का मंदिर, रायसर,जयपुर-ब्याडवाल मीणाओं की कुलदेवी,
बाई का मंदिर, बड़ी चौपड़, जयपुर
आशावरी माता का मंदिर, चूलगिरी की पहाड़ी की तलहटी में, पुराना घाट, खाँनिया सरकारी स्कूल के पिछे , जयपुर - नाँढला (बडगोती) मीणा समाज की कुलदेवी,
ज्वालादेवी का मंदिर, जोबनेर, जयपुर टोडा महादेव का मंदिर, टोडामीणा, जमवारामगढ़, जयपुर
सेवड माता का मंदिर, मीन भगवान का मंदिर, मलारना चौड़,सवाई माधोपुर (राजस्थान) मीन भगवान का मंदिर, चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर (राजस्थान)
मीन भगवान का मंदिर, खुर्रा, लालसोट, दौसा (राजस्थान)
इतिहास प्रसिद्द पूरात्वविद स्पेन निवासी फादर हेरास ने 1940- 1957 तक सिन्धु सभ्यता पर खोज व शोद्द कार्य किया 1957 में उनके शोद्द पत्र मोहन जोदड़ो के लोग व भूमि शोद्द पत्र संख्या-4 में लिखा है* मोहन जोदड़ो सभ्यता के समय यह प्रदेश चार भागो में विभक्त था जिनमे एक प्रदेश मीनाद था जिसे संस्कृत साहित्य में मत्स्य नाम दिया गया और साथ ही यह भी लिखा की *मीना (मीणा) आर्यों और द्रविड़ो से पूर्व बसा मूल आदिवासी समुदाय था जो ऋग्वेद काल के मत्स्यो के पूर्वज है जिसका गण चिह्न मछली (मीन) था*
इस *मीना समुदाय का प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद में किया गया है वहा लिखा है ये लोग बड़े वीर पराक्रमी और शूरवीर है* पर आर्य राजा सुदास के शत्रु है इसका ही उल्लेख डिस्ट्रिक गजेटियर बूंदी 1964 के पृष्ट -29 पर भी किया गया है; *हरमनगाइस ने अपनी पुस्तक द आर्ट एण्ड आर्चिटेक्चर ऑफ़ बीकानेर के पृष्ट -98 पर  एक इतिहासकार  ने मीणा समुदाय की प्राचीनता का उल्लेख करते हुए लिखा है की मीना आदिवासी लोग मत्स्य लोगो के वंसज है जो आर्यों की और से लडे राजा सुदास से पराजित हुए और महाभारत के युद्द में मत्स्य जनपद के शासक के रूप में शामिल हुई | महाभारत युद्द में हुई क्षति से ये बिखर गए छोटे छोटे अनेक राज्य अस्तित्व में आ गए जिनमे इनका पूर्व का कर्द राज्य गढ़ मोरा महाभारत काल में जिसका शासक ताम्र ध्वज थे मोरी वंश प्रसिद्द हुवा जिसका राजस्थान में अंतिम शासक चित्तोड़ के मान मोर हुए जिसे बाप्पा रावल ने मारकर गुहिलोतो का राज्य स्थापित किया जो आगे जाकर सिसोदिया कहलाया |

मीणा जाति का इतिहास विडिओ -



मोरी (मोर्य) साम्राज्य के अंत और गुप्त  साम्राज्य  के समय अनेक छोटे छोटे राज्य हो गए मेर, मेव और मीना कबीलाई मेवासो के रूप में अस्तित्व में आये .उत्तर से आने वाली आक्रमण करी जातियों ने इनको काफी क्षति पहुचाई .शेष बचे गणराज्यो को समुद्रगुप्त ने कर्द राज्य बनाया उस समय मेरवाडा में मेर मेवाड़ में मेव और ढूढाड में मीना काबिज थे हर्ष वर्धन के समय उसके अधीन रहे |
हर्ष वर्धन के अंत के बाद पुन जोर पकड़ा | कई राज्य बने कमजोर थे उन्होंने ताकत अर्जित करी | *वरदराज विष्णु को हीदा मीणा लाया था दक्षिण से आमेर रोड पर परसराम द्वारा के पिछवाड़े की डूंगरी पर विराजमान वरदराज विष्णु की एतिहासिक मूर्ति को साहसी सैनिक हीदा मीणा दक्षिण के कांचीपुरम से लाया था। मूर्ति लाने पर मीणा सरदार हीदा के सम्मान में सवाई जयसिंह ने रामगंज चौपड़ से सूरजपोल बाजार के परकोटे में एक छोटी मोरी का नाम हीदा की मोरी रखा। उस मोरी को तोड़ अब चौड़ा मार्ग बना दिया लेकिन लोगों के बीच यह जगह हीदा की मोरी के नाम से मशहूर है।
देवर्षि श्री कृष्णभट्ट ने ईश्वर विलास महाकाव्य में लिखा है, कि *कलयुग के अंतिम अश्वमेध यज्ञ* केलिए जयपुर आए वेदज्ञाता रामचन्द्र द्रविड़, सोमयज्ञ प्रमुखा व्यास शर्मा, मैसूर के हरिकृष्ण शर्मा, यज्ञकर व गुणकर आदि विद्वानों ने महाराजा को सलाह दी थी कि कांचीपुरम में आदिकालीन विरदराज विष्णु की मूर्ति के बिना यज्ञ नहीं हो सकता हैं। यह भी कहा गया कि द्वापर में धर्मराज युधिष्ठर इन्हीं विरदराज की पूजा करते था। जयसिंह ने कांचीपुरम के राजा से इस मूर्ति को मांगा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। तब जयसिंह ने साहसी हीदा को कांचीपुरम से मूर्ति जयपुर लाने का काम सौंपा। हीदा ने कांचीपुरम में मंदिर के सेवक माधवन को विश्वास में लेकर मूर्ति लाने की योजना बना ली। कांचीपुरम में विरद विष्णु की रथयात्रा निकली तब हीदा ने सैनिकों के साथ यात्रा पर हमला बोला और विष्णु की मूर्ति जयपुर ले आया। इसके साथ आया माधवन बाद में माधवदास के नाम से मंदिर का महंत बना।
अष्टधातु की बनी सवा फीट ऊंची विष्णु की मूर्ति के बाहर गण्शोमध्ययुगीन इतिहास प्राचीन समय मे मीणा राजा आलन सिंह ने, एक असहाय राजपूत माँ और उसके बच्चे को उसके दा बच्चे, ढोलाराय को दिल्ली भेजा, मीणा राज्य का प्रतिनिधित करने के लिए। राजपूत ने इस् एहसान के लिए आभार मे राजपूत सणयन्त्रकारिओ ने दीवाली पर पुरखो को पानी देते समय निहत्थे मीनाओ पर हमला करके मीनाओ की लाशे बिछा दि, उस समय मीना पित्र तर्पन रस्में कर रहे थे मीनाओ को उस् समय निहत्था होना होता था। जलाशयों को"जो मीनाऔ के मृत शरीर के साथ भर गये। ] और इस प्रकार कछवाहा राजपूतों ने खोगओन्ग पर विजय प्राप्त की थी, सबसे कायर हर्कत और राजस्थान के इतिहास में शर्मनाक।
एम्बर के कछवाहा राजपूत शासक भारमल हमेशा नह्न मीना राज्य पर हमला करता था, लेकिन बहादुर बड़ा मीणा के खिलाफ सफल नहीं हो सका। अकबर ने राव बड़ा मीना को कहा था,अपनी बेटी कि शादी उससे करने के लिए। बाद में भारमल ने अपनी बेटी जोधा की शादी अकबर से कर दि। तब अकबर और भारमल की संयुक्त सेना ने बड़ा हमला किया और मीना राज्य को नस्त कर दिया। मीनाओ का खजाना अकबर और भारमल के बीच साझा किया गया था। भारमल ने एम्बर के पास जयगढ़ किले में खजाना रखा ।
-:कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:-
कर्नल जेम्स- टॉड के अनुसार कुम्भलमेर से अजमेर तक की पर्वतीय श्रृंखला के अरावली अंश परिक्षेत्र को मेरवाड़ा कहते है । मेर+ वाड़ा अर्थात मेरों का रहने का स्थान । कतिपय इतिहासकारों की राय है कि " मेर " शब्द से मेरवाड़ा बना है ।
यहां यह भी सवाल खड़ा होता है कि क्या मेर ही रावत है? कई इतिहासकारो का कहना है किसी समय यहां विभिन्न समुदायो के समीकरण से बने  'रावत' समुदाय का बाहुल्य रहा है जो आज भी है । रावत एक उपाधी है जो बहादुर लोगो को दी जाती थी! कहा यह भी जाता है कि यह समुदाय परिस्थितियों और समय के थपेड़ों से संघर्ष करते  कतिपय झुंझारू समुदायों से बना एक समीकरण है ।
सुरेन्द्र अंचल अजमेर का मानना है कि रावत ही मीणा है या यो कह लें कि मीणाओ मे से ही रावत वर्ग है । रावत और राजपूतो में परस्पर विवाह सम्बन्ध के उदाहरण मुश्किल से हि मिल पाए । जबकि रावतों और मीणाओ के विवाह होने के अनेक उदाहरण आज भी है ।
श्री प्रकाश चन्द्र मेहता ने अपनी पुस्तक " आदिवासी संस्कृति व प्रथाएं के पृष्ठ 201 पर लिखा है कि मेवात मे मेव मीणा व मेरवाड़ा में मेर मीणाओं का वर्चस्व था।
महाभारत के काल का मत्स्य संघ की प्रशासनिक व्यवस्था लौकतान्त्रिक थी जो मौर्यकाल में छिन्न- भिन्न हो गयी और इनके छोटे-छोटे गण ही आटविक (मेवासा ) राज्य बन गये । चन्द्रगुप्त मोर्य के पिता इनमे से ही थे । समुद्रगुप्त की इलाहाबाद की प्रशस्ति मे आ...टविक ( मेवासे ) को विजित करने का उल्लेख मिलता है राजस्थान व गुजरात के आटविक राज्य मीना और भीलो के ही थे इस प्रकार वर्तमान ढूंढाड़ प्रदेश के मीना राज्य इसी प्रकार के विकसित आटविक राज्य थे ।
वर्तमान हनुमानगढ़ के सुनाम कस्बे में मीनाओं के आबाद होने का उल्लेख आया है कि *सुल्तान मोहम्मद तुगलक ने सुनाम व समाना के विद्रोही जाट व मीनाओ के संगठन ' मण्डल ' को नष्ट करके मुखियाओ को दिल्ली ले जाकर मुसलमान बना दिया ( E.H.I, इलियट भाग- 3, पार्ट- 1 पेज 245 ) इसी पुस्तक में अबोहर में मीनाओ के होने का उल्लेख है (पे 275 बही) इससे स्पष्ट है कि मीना प्राचीनकाल से सरस्वती के अपत्यकाओ में गंगा नगर हनुमानगढ़ एवं अबोहर- फाजिल्का मे आबाद थे ।
रावत एक उपाधि थी जो महान वीर योध्दाओ को मिलती थी जो सम्मान सूचक मानी जाती थी मुस्लिम आक्रमणो के समय इनमे से काफी लोगों को मुस्लिम बनाया गया अतः मेर मेरात मेहर मुसमानो मे भी है
17 जनवरी 1917 में मेरात और रावत सरदारो की राजगढ़ ( अजमेर ) में महाराजा उम्मेद सिह शाहपूरा भीलवाड़ा और श्री गोपाल सिह खरवा की सभा मेँ सभी लोगो ने मेर मेरात मेहर की जगह रावत सरनेम  याने  टाइटल  धारण किया । इसके प्रमाण के रूप में 1891 से 1921 तक के जनसंख्या आकड़े देखे जा सकते है 31 वर्षो मे मेरो की संख्या में 72% की कमी आई है वही रावतो की संख्या में 72% की बढोत्तर हुई है । गिरावट का कारण मेरो का रावत नाम धारण कर लेना है ।
सिन्धुघाटी के प्राचीनतम निवासी मीणाओ का अपनी शाखा मेर, महर के निकट सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हुए कहा जा सकता है कि -- *सौराष्ट्र (गुजरात ) के पश्चिमी काठियावाड़ के जेठवा राजवंश का राजचिन्ह मछली के तौर पर अनेक पूजा स्थल " भूमिलिका " पर आज भी देखा जा सकता है इतिहासकार जेठवा लोगो को मेर( महर, रावत) समुदाय का माना जाता है जेठवा मेरों की एक राजवंशीय शाखा थी जिसके हाथ में राजसत्ता होती थी
(I.A 20 1886 पेज नः 361) कर्नल टॉड ने मेरों को मीणा समुदाय का एक भाग माना है |आज भी पोरबन्दर काठियावाड़ के महर समाज के लोग उक्त प्राचीन राजवंश के वंशज मानते है अतः हो ना हो गुजरात का महर समाज भी मीणा समाज का ही हिस्सा है ।
फादर हैरास एवं सेठना ने सुमेरियन शहरों में सभ्यता का प्रका फैलाने वाले सैन्धव प्रदेश के मीना लोगो को मानते है । इस प्राचीन आदिम निवासियों की सामुद्रिक दक्षता देखकर मछलि ध्वजधारी लोगों को नवांगुतक द्रविड़ो ने मीना या मीन नाम दिया* मीलनू नाम से मेलुहा का समीकरण उचित जान पड़ता है मि *स्टीफन ने गुजरात के कच्छ के मालिया को मीनाओ से सम्बन्धीत बताया है दूसरी ओर गुजरात के महर भी वहां से सम्बन्ध जोड़ते है । कुछ महर समाज के लोग अपने आपको हिमालय का मूल मानते है उसका सम्बन्ध भी मीनाओ से है हिमाचल में मेन(मीना) लोगो का राज्य था । स्कन्द में शिव को मीनाओ का राजा मीनेश कहा गया है ।
हैरास सिन्धुघाटी लिपी को प्रोटो द्रविड़ियन माना है उनके अनुसार भारत का नाम मौहनजोदड़ो के समय सिद था इस सिद देश के चार भाग थे जिनमें एक मीनाद अर्थात मत्स्य देश था । फाद हैरास ने एक मोहर पर मीना जाती का नाम भी खोज निकाला । उनके अनुसार मोहनजोदड़ो में राजतंत्र व्यवस्था थी । एक राजा का नाम " मीना " भी मुहर पर फादर हैरास द्वारा पढ़ा गया ( डॉ॰ करमाकर पेज न॰ 6) अतः कहा जा सकता है कि मीना जाति का इतिहास बहुत प्राचीन है इस विशाल समुदाय ने देश के विशाल क्षेत्र पर शासन किया और इससे कई जातियो की उत्पत्ती हुई और इस समुदाय के अनेक टूकड़े हुए जो किसी न किसी नाम से आज भी मौजुद है ।
आज भी 10-11 हजार मीणा लोग फौज में है *बुदी का उमर गांव पूरे देश मे एक अकेला मीणो का गांव है जिसमें 7000 की जनसंख्या मे से 2500 फौजी है* टोंक बूंन्दी जालौर सिरोही मे से मीणा लोग बड़ी संख्या मे फौज मे है। उमर गांव के लोगो ने प्रथम व द्वीतिय विश्व युध्द लड़कर शहीद हुए थे *शिवगंज के नाथा व राजा राम मीणा को उनकी वीरता पर उस समय का परमवीर चक्र जिसे विक्टोरिया चक्र कहते थे मिला था जो उनके वंशजो के पास है । आजादी के समय भारत में तीन मीणा बटालियने थी पर दूर्भावनावश खत्म कर दी गई थी!
तूंगा (बस्सी) के पास जयपुर नरेश प्रतापसिंह और माधजी सिन्धिया मराठा के बीच 1787 मे जो स्मरणिय युध्द हुआ उसमें प्रमुख भूमिका मीणो की रही जिसमे मराठे इतिहास मे पहली बार जयपुर के राजाओ से प्राजित हुए थे वो भी मीणाओ के कारण इस युध्द में राव चतुर और पेमाजी की वीरता प्रशंसनीय रही । उन्होने चार हजार मराठो को परास्त कर मीणाओ ने अपना नाम अमर कर दिया । तूँगा के पास अजित खेड़ा पर जयराम का बास के वीरो ने मराठो को हराया इसके बदले जयराम का बास की जमीन व जयपुर खजाने मे पद दिया गया ।
सम्माननीय वीर इमानदार कर्तव्यनिष्ठ मीणा बंधुवर, आपसे मेरा व्यक्तिगत आग्रह है कि आप समाज हित में जनजाति की लड़ाई व अशिक्षा दूर करने के लिए अभियान के तहत छात्रावासो के निर्माण कार्यो मैं सहयोग अवश्य करें, इस हेतु किसी अन्य बंधुवर का इंतजार नहीं करें, (क्योंकि कोई अन्य व्यक्ति आपसे कहेगा या आपके पास आएगा इसका इंतजार किया तो कोई भी सामाजिक कार्य नहीं हो सकता है) !
अतः आप सहयोग करें एवं अपने बंधुओं से सहयोग कराएं तो ही यह सामाजिक कार्य संभव है !
आपको ईश्वर ने किसी महान उद्देश्य से मानव जीवन देकर अन्य करोड़ो जीव-जंतुओं से श्रेष्ठ बनाकर यह अपेक्षा की है कि आप अन्य सभी के हितों की रक्षा करेंगे और मानवता अर्थात समाज सेवा को सर्वोपरि स्थान देंगे।
राजस्थान के मीणा समाज में कुल मिलाकर 5248 गोत है, उनमें से कुछ गोत / surnames
A
Auraj औराज
Aamroo आमरू

B
Beflawat बैफ़लावत
Bagdi बागड़ी
Bagodiya बागोडिया
Bagranya बगरान्या
Bainada बैनाडा
Bajota बजोटा
Bakala बाकला
Barwal बारवाल
Bargoti बड़गोती
Barld बल्ड़
Basanwal बासनवाल
Byadwal ब्याडवाल
Bhodna भोदना
Bhorawat भौरावत or bhorayat भौरायत
Banskhowa बांसखोवा
Bhakand भाकंड
Bandwal बान्डवाल
Bamnawat बामनावत
Bankliya बांकलिया
Buriya बूरियाल
Benade बेनाडे
Bhabhla भाभला
Bhonda भोन्डा
Bohra / bahure बोहरा / बहुरे
Balot बालोत
Bunas बूनस
Buriya बूरिया
Banskho बांसखो
Beelwal बीलवाल
Bail बेल
Bundas बूंदस
Besar बेसर
Bhaskar भास्कर
Bhabhrya भाभर्या

C
cholak छोलक
chedwal छेड़वाल
chandwal छान्डवाल
chanda चांदा
chawal छावल
chhanwal छानवाल
channavat छन्नावत
chirawat छिरावत
chitach छिताच
chhapola छापोला
charnawat चर्नावत
charawadiya चारावंड्या
choriya छोरिया
charawat छरावत
chandwara चंन्दवारा
chandadiya चंदाड्या
chaudhari चौधरी
chetriya चेत्रीया
chorasya चोरस्या
chandrawat चंन्द्रावत
choolwal चुलवाल
chorawat छोरावत
chookleda चोकलेडा
chungada चुंगडा

D
dagal डागल
dhyawana ध्यावणा
dewana देवणा
devadwal देवदवाल
dovwal डोबवाल
domala डुमाला
domela डुमेला
dewanda देवंदा
dhanawat धनावत
dundya दुन्ध्या
dhankariya ढाकर्या
dudawat दुडावत
didawat दिदावत
dedwal डेडवाल
dakriya डाकर्या
dadarwal डाडरवाल
dechalwal डेचरवाल
damachya दमाच्या
dondaga दोन्डगा
duwanya दुवाण्या
dugarwal डुगरवाल
donawat दोनावत
dhaigal डहंगळ
dechalwal डेचरवाल
dhawaniya धावण्या
dhurwal धुरवाल
dhakal डाकल
damriya दामर्या
dussawat दुसावत
dheerawat धिरावत
dawer डावर

F
faneta फानेटा
farwa फार्वा

G
gohli गोसली
gomladoo गोमलाडू
gothwal गोठवाल
gunawat घुनावत
ghusinga घुसिंगा
gahlot गहलोत
goliya गोलिया
Golwal गोलवाल
govli गवली
goyali गोयली
gorwad गोरवाड
ghumariya घुमार्या
ghusrawat घुस्रावत
goththulगोठल
ghodeta घोडटा
gorni घोर्णी

H
hazari हजारी
hatwal हटवाल
hadchoor हाडचोर

J
Jundia जून्दिया
jaif जैफ
jhirval झिरवाल
jagarwal जगरवाल
jeejarh जिजर्ह
joharwal जोहरवाल
jharwal झारवाल
jhamuhre झामूर्हे
jakhiwal जखिवाल
jareda जारेडा
jorwad जोरवाड
jorwal / jarwal जोरवाल / जारवाल
jorawat जुरावत
jurdiya जुर्डीया
junwal / jonwal जुनवाल / जोनवाल
jendera जेन्डेरा
jalodiya जलोड्या
jhajhra झाझरा
janera जानेरा

K
kanwat कांवत
kankas कांकस
khoda खोड़ा
kholwal खोलवाल
kotwadya कोटवाड्या
kunwaliya कुनवालिया
khokaar खोक्कर
kahite काहीटे
khora खोरा
khata खाटा
kakroda काकरोडा
kawadiya कवाडीया
kathumariya कठूमार्या
kankarwal काकरवाल
kanwatiya कन्वाट्या
kantiya कान्तिया
kokra कोकरा
kotwar कोटवार
kotwadiya कोटवाड्या
kotwada कोटवाडा
kotwal कोटवाल
kalot कलोत
kumrawat कुमरावत
kudaliya कुडालिया
kajodiya कजोडीया
katrawat कतरावत
khorwal खोरवाल
khani खाणी
khatla खाटला
kunjlot कुंजलोत
kotawariya कोटवारिया
kanriwal कनरीवाल
kanetiya कानेटीया
kuwal कुवल
kiwad किवड
kanet कानेत
kawaliya कवाल्या
khandal खंडल
khokhalwar खोकरवार
Khaneda खानेडा

L
lotan लोटण
lalsotya लालसोट्या
luckwads लुकवाड
lukwal लकवाल
lodhwal लोदवाल
lookhdiya लुखडिया
lakhnauta लखनौटा
luhar meena लुहार मीणा
lakhnawat लखनावत

M
mandar मंदार
myal म्याळ
mehar मेहर
marmat मरमट
machya मच्या
motis मोटीस
mewal मेवाळ
mimrot मिमरोट
mandawat मंडावत
madhaiya मांधिया
manatwal मनतवाल
mainawat मैनावत
mandal मांडल
mandar मंदार
marag मारग
mothiya मोठ्या
mothu मोठू
morajhwal मोर्झवाल
morjal मोर्झाल
marwadiya मारवाड़्या
mohsal मोहसल
moja मोझा
mohnot मोहनोत
muradiya मुर्हाड्या
mandiya मांड्या

N
naurawat नौरावत
nareda नार्हेडा
nandla नांढला
naananiya नानानिया
neemrot निमरोट
naglod नागलोद
nimroth निमरोठ
naugara नौगरा
nakwal नकवाल
neemwal निमवाल
nathawat नाथावत
newla नेवला
nai meena नाई मीणा / नाईमण्या
neemawat निमावत

P
pawadi पबड़ी
pokhriya पोखरिया
perwa पेरवा
perwal पेरवाल
poonjlot पुंजलोत
panwar पंवार
parihar परिहार
pakar पाकळ
pratihar प्रतिहार
pyara प्यारा
parala पारला
purawat पुरावत

R
rajalwal राजलवाल
rankala रांकळा
rajarwal राजरवाल
Reknot रेकनोत
rodiya रोडीया

S
susawat सुसावत
sattawan सत्तावन
sawara सवारा
singhal सिंघल
sirra सिर्हा
sonet सोनेत
singhalwal सिंघलवाल
seeswal सिसवाल
sogan सोगण
sewariya सेवरिया
sapawat सपावत
sulaniya सुलाण्या
siwal सिवल
soorwal सुरवाल
simal सिमल
sandoora संदुरा
seelwar सिलवार
shahar सहर
saharia सहारीया
seenam सिनम
Sisodiya सीसोदिया 
Sastiya साष्टीया

T
tatu टाटू
thanwal थानवाल
thahgal थंघल
thoorwar थोरवार
teelan तिलान
tatar तातर
tatwara टटवारा
tatunya तटाण्या
tamri तामरी
tazi ताजी

U
ussara उषारा

Z
zurawat झुरावत

मीणा जाती की गौत्रानुसार कुलदेवी 
गोत्र- बैफलावत,
कुलदेवी :- पालीमाता पीठ नांगल (लालसोट) दौसा ।

गोत्र - छाण्डवाल
कुलदेवी: पपलाज माता लालसोट को भी मानते है ।

गोत्र - महर,
कुलदेवी - घटवासन माता, स्थान:- गुढा चन्द्रजी तह॰ टोडाभीभ करौली ।

गोत्र -जगरवाल
कुलदेवी - अरहाई माता

गोत्र - टाटू
कुलदेवी- बरवासन स्थान:- सपोटरा करौली

गोत्र- चांदा
कुलदेवी - बाण माता(आसावरी) स्थान:- खो गंग (खो नागोरियान झालाना पहाड़ी) जयपुर

गोत्र - माणतवाल
कुलदेवी - जीणमाता(जयंति देवी) स्थान:- हर्ष पहाड़ी (रेवासा) दाता रामगढ़ सीकर

गौत्र - बारवाल(बारवाड़)
कुलदेवी - चौथ माता, स्थान :- चौथ का बरवाड़ा सवाई माधोपुर

गोत्र - मरमट
कुलदेवी - दुगाय (दुर्गामाता) माता स्थान :- गुढ़ा बरथल तह॰ निवाई जि॰ टौंक । मलारना चौड़ बौली सवाई माधोपुर में भी है ।
गोत्र - जोरवाल जारवाळ
कुलदेवी - ब्रह्माणी माता (प्याली माता) स्थान :-आमेर पहाड़ी जयपुर,पल्लु(हनुमान गढ़), मण्डावरी दौसा ।
गौत्र - ब्याडवाल, गोमलाडू
कुलदेवी - बांकी माता, स्थान :- माताशुला रायसर तह॰ जमुवारामगढ़ जयपुर
गोत्र - नायी मीना (नायमण्या), ककरोड़ा
कुलदेवी - नारायणी माता स्थान:- बरवा की पहाड़ी नारायणी धाम तह॰ राजगढ़ अलवर
गोत्र - सुसावत
कुलदेवी - अम्बा माता स्थान:-आमेर पहाड़ी जयपुर
गोत्र - बैन्दाड़ा
कुलदेवी - आशोजाई माता (चंड माता) स्थान :- चतरपुरा तह॰ सांभरलेक जयपुर
गोत्र- खोडा
कुलदेवी - सेवाद माता village chitanu, tehsil amer, distt.l Jaipur
गोत्र :- उषहारा(उसारा)
कुलदेवी :- बीजासण माता, स्थान :- बीजासण पहाड़ी तह॰ इन्द्रगढ़ जिला बुंदी
गोत्र - चरणावत
कुलदेवी - कैला माता स्थान - कैला पहाड़ी तह॰ सपोटरा करौली । अब कैला माता को टाटू आदि अन्य गोत्र भी मानने लग गये ।
jef - badhasan mata alwar ko mante hai...
गोत्र - शहर, सहरिया
कुलदेवी - गुमानो माता, स्थान - इन्दौर मध्यप्रदेश
गोत्र - मांदड़
कुलदेवी - खुर्रा माता स्थान - गांव खुर्रा मण्डावरी लालसोट दौसा
गौत्र - डोबवाल,
कुलदेवी - खलकाई माता, स्थान - गांव डोब तह॰ लालसोट जि॰ दौसा ।
गोत्र - कटारा
कुलदेवी - धराल माता, स्थान - गांव निठारा की पाल त॰ सराड़ा जि॰ उदयपुर ।
गौत्र - पारगी, नटरावत, टौरा, मन्दलावत, चरणावत
कुलदेवी - काली माता (कालका), स्थान - निठाऊवा (बांसवाड़ा), कालीसिंध के किनारे (पीपलदा), दिगोद कोटा ।
गौत्र - हरमोर(कलासुआ)
कुलदेवी - जावर माता, स्थान - जावर माइन्स उदयपुर ।
गौत्र - घुणावत,
कुलदेवी - लाखोड माता, स्थान - गांव पीलोदा तह॰ गंगापुर सीटी जि॰ सवाई माधोपुर ।
गोत्र - गोली
कुलदेवी - चामुंडा देवी village tigriya, bamanavash

गौत्र - मेवाल
कुलदेवी - मैणसी (आसावरी) स्थान - कूकस खोरा मेवाल दिल्ली रोड़ आमेर जयपुर । पहले अनासन देवी को भी पूजा था ।
गोत्र - करेलवाल
कुलदेवी - ईट माता, स्थान - बुढ़ादित दिगोद कोटा ।
गोत्र - कोटवार ,कोटवाल,कोटवाड़, घुणावत
कुलदेवी - मोरा माता (चन्द्रगुप्त मौर्य की मा का नाम मोरा था) स्थान -रायसाना गढ़मोरा करौली, गांव घुमणा के घुणावतो ने भी मोरा माता का मंदिर बना रखा है वैसे उनकी कुलदेवी लहकोड़ माता है अतः तरूण जी आप वहां जाए और माता का दर्शन करें आपके गोत्र का बड़ा गांव बिलौना कला लालसोट रोड़ और कमालपुरा जो गढ़मोरा के पास है ये काफी बड़े गांव है यहां से आपको और जानकारी मिल सकती है । घुणावत बाद में लहकोड़ माता गांव पीलेदा त॰ गंगापुर सीटी सवाई माधोपुर को भी मानने लग गये ।
गोत्र - सिहरा
कुलदेवी - दन्त माता
गोत्र - मंडाल, मान्ड्या
कुलदेवी - जुग्निया माता
स्थान :- मंडलगढ, भिलवाडा
गोत्र - जार्हेडा
कुलदेवी - बिर्ताई माता
प्रमुख गोत्रो के धराड़ी कुल वृक्ष
[आदिवासी मीणा गोत्र] [निर्धारित कुल वृक्ष]

बैफ्लावत,
महर,
झरवाल,
ध्यावना,
सुलानिया,
खोड़ा,
टाटू,
बडगोती,
जाल,
सिहरा,
सेहरा,
सिरा,
सीमल
बैनाडा,
चिता(कुदाल्या),
मानतवल,
वनवाल,
छान्दवाल
== पीपल
सुसावत(खरगोश का शिकार नहीं करते),
सत्तावन
खेजड़ा,
गोमलाडू,
नीमवाल,
करेलवाल,
ढूंचा/दमाच्या आशापाला
== (अशोक)
ब्याडवाल,
केमर
मरमट,
झाऊ,
डोबवाल,
सरस,
मीमरोट,
कदम,
बासंवाल,
मंद्लावत
== बड़
जिन्देडा,
चांदा
केम/गांदल,
देवाना/देवंदा/देवन्द
केर
कटारा,
पारगी,
हरमोर,
खराड़ी,
डामोर,
बांसखोवा,
बांस
मोरडा/मोर,
मौर्य,
ताजी
मोर (पक्षी)
Disclaimer: इस  content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे

*********************