27.4.17

आत्मविश्वास बढ़ाने वाले चमत्कारी उपाय:Miraculous measures to increase confidence





आत्मविश्वास बढ़ाने के वास्तु शास्त्र से सम्बंधित उपाय :
* अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए आप हमेशा पूर्व दिशा की तरफ मुहं करके ही खाना खाए.

* अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए आप सुबह जल्दी उठ कर उगते सूर्य पर कम से कम 5 मिनट तक ध्यान करे.
*आप रोज़ सुबह जल्दी उठ कर उगते सूर्य के सामने सूर्य के बारह नामो को जपे, इससे सूर्य देव खुश होते है और आप पर अपनी कृपा दृष्टी बनाये रखते है.
* आप रोज़ सुबह गायत्री मंत्र का भी उच्चारण करे इससे आपका मन शांत होगा और धीरे धीरे आपका आत्मविश्वास भी बढ़ने लगेगा
* आप अपने दाये हाथ की अंगुली में सोने से बनी अंगूठी पहने.
* आप सूरजमुखी के फूल को पूर्व दिशा में रखे, इससे आपके आत्मविश्वास मे बढ़ोतरी होती है.
आप अपने आत्मविश्वास को बढ़ने के लिए वास्तु शास्त्र के अलावा कुछ मनोवैज्ञानिक उपायों को भी अपना सकते है क्योकि अगर आपका मन ठीक होता है तो आपके चेहरे पर चमक आती है और आप अपने जीवन की हर कठिन चुनोतियो को भी हँसते हुए पार कर लेते हो. अपने आत्मविश्वास को बढ़ने के लिए आप इन मनोवैज्ञानिक उपायों को अपना सकते है –
· आपको हर बात को उसके उचित अर्थ के साथ देखना चाहिए और उसके यथार्थ को समझने की कोशिश करनी चाहिए.
· साथ ही आपको अपनी क्षमताओ पर भी पूर्ण विश्वास होना चाहिए.
· अगर आपके जीवन में कुछ उतार चढाव की परिस्तिथियाँ आती है तो आपको उस समय संयम से काम लेना चाहिए और हमेशा आशावादी रहना चाहिए.
आपको अपने आपको इस तरह तैयार करना चाहिए कि आप अपने कार्यो में असफलता पाने के बाद भी उम्मीद न छोड़ो और पुनः प्रयास करने लगो.
· आपको अपने निर्णयों पर भी पूरा भरोसा होना चाहिए, नाकि आप किसी की बातो को सुन कर अपने निर्णय को बदल दो.
· अगर आपको लगता है कि आप आपको दिए गए कार्यो को कर सकते हो तो आप खुद ही पहल करके उन कार्यो की जिम्मेदारियों को ले और उनमे सफलता प्राप्त करके दिखाए.
· आप किसी भी चीज़ को अत्यधिक निजी रूप से और अत्यधिक गंभीरता से न ले क्योकि किसी भी चीज़ की अति अच्छी नही होती.
· आप अपने बारे में अच्छा सोचे और साथ ही अपने साथियो के बारे में भी अच्छा सोचे और उनकी मदद करके उनको खुशियाँ दें.
· एक आत्मविश्वास से भरा इंसान हमेशा जिज्ञासा से भरा होता है तो आप भी अपने अंदर की जिज्ञासा को बढाइये.
· आप कभी भी अपनी सफलताओ पर घमंड ना करे बल्कि अपनी सफलताओ से प्रेरित होकर अपने भविष्य के लिए और लक्ष्य बनाये.

मंदिर जाने के चमत्कार!




मंदिर जाने से होने वाले चमत्कार या वे कारण जिनकी वजह से हमें भी रोज़ मंदिर जाना चाहिए
मंदिर शब्द दो शब्दों (मन + दर) से मिल कर बना है अथार्त हमारे मन का दरवाजा. जहाँ हमारे मन को शांति की अनुभूति होती है और हमे आध्यात्म का अहसास होता है. ऐसी जगह पर जाने के लिए वैसे तो हमे किसी कारण या चमत्कार की जरूरत नही होनी चाहिए किन्तु कहा जाता है कि मानव अपने हर काम को किसी न किसी स्वार्थ के कारण ही करता है तो हम आपको मंदिर जाने से होने वाले चमत्कारों से आज परिचित करना चाहेंगे.

मंदिर में स्थापित भगवान की मूर्ति ही मनुष्य के आस्था और विश्वास का केंद्र होती है. मंदिर की वजह से ही हमारे मन में आस्था का विकास होता है और मंदिर ही हमारे धर्म का प्रतिनिधितव भी करता है. आपने इस बात को महसूस किया होगा कि जब भी आप किसी मंदिर के सामने से गुजरते है तो आपका सिर अपने आप ही आस्था से भगवान के मंदिर के सामने नतमस्तक / झुक हो जाता है. हम सब मंदिर में अपने भगवान के प्रति प्यार, आस्था और अपनी कुछ इच्छाओ की पूर्ति के लिए जाते है लेकिन इनके साथ साथ मंदिर जाने के ओर भी कई लाभ आपको मिलते है. वे सभी चमत्कारिक लाभ निम्नलिखित है.
· जैसाकि हमने आपको ऊपर बताया था कि मंदिर मन का द्वार होता है तो मंदिर एक ऐसा है जहाँ हमारे मन को सुख और शांति का आभास होता है.
· मंदिर एक ऐसी जगह है जहाँ आप अपने अंदर एक नयी शक्ति को अनुभव कर सकते है.
· जहाँ जाने से हमारे मन – मस्तिष्क प्रफ्फुलित हो जाता है और हमे आतंरिक सुख मिलता है.
· जहाँ जाने से आपका पूरा शरीर उत्साह से और उमंग से भर जाता है.
· मंदिर में मंत्रो का उच्चारण होता रहता है तो मंत्रो का मीठा स्वर, घंटे – घड़ियाल, शंख और नगाडो की मीठी ध्वनियाँ सुन कर आपके मन को भी अच्छा लगता है.
मंदिर और मंदिर में होने वाली हर घटना के पीछे एक वज्ञानिक कारण होता है. यहाँ तक मंदिर का निर्माण भी पूरी वज्ञानिक विधि के अनुसार ही किया जाता है, मंदिर का निर्माण वास्तु शास्त्र को भी ध्यान में रख कर किया जाता है और इसे पुरे वास्तुशिल्प के हिसाब से बनाया जाता है, जिससे मंदिर में हमेशा शांति और दिव्यता उत्तपन होती रहे. मंदिर के गुम्बद के शिखर के केंद्र बिंदु के बिलकुल ठीक नीचे ही मूर्ति की स्थापना की जाती है, ऐसा ध्वनि सिद्धांत को ध्यान में रख कर किया जाता है, जिससे जब भी मंदिर में मंत्रोचारण किया जाये तो मंत्रो का स्वर और अन्य ध्वनियाँ गुम्बद में गूंजती रहे और वहां उपस्थित सभी लोग इससे प्रभावित हो सके.मूर्ति का और गुम्बद का केंद्र एक ही होता है जिससे मूर्ति में निरंतर उर्जा प्रवाहित होती रहती है और हम भी जब मूर्ति के सामने अपने शीश को झुकाते है, मूर्ति में भगवान के चरणों को स्पर्श करते है और भगवान के सामने नतमस्तक होते है तो वो उर्जा हमारे शरीर में भी प्रवाहित हो जाती है. ये उर्जा हमारे शरीर में भी शक्ति, उत्त्साह भर देती है. मंदिर से हमारे मन, शरीर और आत्मा को पवित्रता मिलती है और हमे शुद्ध करती है जिसकी वजह से हमारे अन्दर का दिखावा खत्म हो जाता है और हम अंदर और बाहर इसी तरह की शुद्धता का आभास होता है. मंदिर में बजने वाले शंख और घंटो की धवानिया वहन के वातावरण को भी शुद्ध करती है और वातावरण में से कीटाणुओं को भी खत्म करती है. मंदिर में घंटे का भी अपना ही एक महत्व है हम जब भी किसी के घर में प्रवेश करते है तो पहले रिंग बजाते है इसी तरह हम जब मंदिर में जाते है तो घंटा बजा कर ही प्रवेश करना चाहिए जिससे हमारे शिष्टाचार का पता चलता है. घंटे का एक और महत्व है कि ये देव भूमि को जाग्रत करता है जिससे हमारी हर प्रार्थना सुनी जा सके. घंटे और घड़ियाल की ध्वनि काफी दूर तक सुनी देती है और मंदिर के आसपास के सारे वातावरण को शुद्ध कर सके और जिससे लोगो को ये भी पता चल जाता है कि आगे मंदिर है.
मंदिर में जिस देवता या भगवान की मूर्ति की स्थापना होती है उनके प्रति हमारी आस्था और हमारा विश्वास होता है और जब भी हम उस मूर्ति के सामने नतमस्तक होते है तो हम अपने आप को एकाग्र पाते है और हमारी यही एकाग्रता हमे हमारे भगवान के साथ जोडती है और उस वक़्त हम अपने भीतर भी ईश्वर की उपस्तिथि को अनुभव करते है. यही एकाग्रता हमे चिंतन में भी सहायक होती है और चिंतन मनन से हमे हमारी हर समस्या का समाधान भी जल्दी प्राप्त हो जाता है. मंदिर जाने से हम मंदिर में स्थापित देवताओ के सामने नतमस्तक होते है जो एक योग का भी हिस्सा होता है तो हम अनजाने में ही प्रतिदिन एक योग को भी कर लेते है. इससे हमारे शारीरिक, मानशिक तनाव से भी मुक्ति मिलती है साथ ही हमारा आलस भी दूर हो जाता है. मंदिर में एक प्रथा परिक्रमा की भी होती है जिसमे आपको पैदल चलना पड़ता है. और आप तो जानते ही है कि यह भी एक प्रकार का व्यायाम है. हमे परिक्रमा नंगे पैरो से करनी होती है और एक शोध में पता चला है कि नंगे पैरो से मंदिर में जाने से पगतलो में एक्यूप्रेशर भी होता है. ये हमारे शरीर के कई अहम बिन्दुओ पर अनुकूल दबाव डालते है. जिससे हमारे स्वास्थ्य में भी लाभ मिलता है.
मंदिर को वज्ञानिक शाला के रूप में बनाने के पीछे हमारे पूर्वजो का और ऋषि – मुनियों का यही लक्ष्य था कि हम प्रतिदिन सुबह अपने कामो पर जाने से पहले मंदिर जाकर सकारात्मक उर्जा को ले सके और शाम को जब हम अपने घर थक कर आते है तो उस वक़्त भी हम मंदिरों से उर्जा को ले कर अपने कर्तव्यों का पालन सफलतापूर्वक कर सके.
इस तरह हमे पता चलता है कि मंदिर सिर्फ हमारी आस्था और हमारे विश्वास का ही केंद्र नही है बल्कि मंदिर हमारी सोच, हमारे विचार, हमारे व्यवहार, हमारे कर्तव्यो, हमारे स्वाथ्य का भी केंद्र है. तो हमे प्रतिदिन मंदिर जरुर जाना चाहिए ताकि आप मंदिर से होने वाले चमत्कारिक और आध्यत्मिक लाभों का फ़ायदा उठा पाए. 









18.4.17

जानिए ,भारत में कहां हुआ था हनुमानजी का जन्म ?





हम में से बहुत कम लोग जानते हैं कि हनुमानजी का जन्म भारत में कहां हुआ था। हनुमानजी की माता का नाम अंजना है इसीलिए उन्हें आंजनेय भी कहा जाता है। उनके पिता का नाम केसरी है इसीलिए उन्हें केसरीनंदन भी कहा जाता है। केसरी को कपिराज भी कहा जाता था, क्योंकि वे कपिक्षेत्र के राजा थे। अब सवाल यह उठता है कि यह कपि क्षे‍त्र भारत में कहां स्थित है? इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं।
हनुमानजी का जन्म कल्पभेद से कई विद्वान चैत्र सुद 1 मघा नक्षत्र को मानते हैं। कोई कार्तिक वद 14, कोई कार्तिक सुद 15 को मानते हैं। कुछ चैत्र माह की पूर्णिमा को उनके जन्म का समय मानते हैं और कुछ कार्तिक, कृष्ण चतुर्दशी की महानिशाको, लेकिन ज्यादातर जगह चैत्र माह की पूर्णिमा को मान्यता मिली हुई है।
हनुमानजीकी जन्मतिथि को लेकर मतभेद हैं। कुछ हनुमान जन्मोत्सव की तिथि कार्तिक कृष्णचतुर्दशी मानते हैं तो कुछ चैत्र शुक्ल पूर्णिमा। इस विषय में ग्रंथों में दोनों के ही उल्लेख मिलते हैं, किंतु इनके कारणों में भिन्नता है। वास्तव में पहला जन्मदिवस है और दूसरा विजय अभिनन्दन महोत्सव।
1. डांग जिला का अंजनी पर्वत : कुछ विद्वान मानते हैं कि नवसारी (गुजरात) स्थित डांग जिला पूर्व काल में दंडकारण्य प्रदेश के रूप में पहचाना जाता था। इस दंडकारण्य में राम ने अपने जीवन के 10 वर्ष गुजारे थे।डांग जिला आदिवासियों का क्षेत्र है। आजकल यहां ईसाई मिशनरी सक्रिय है। हालांकि आदिवासियों के प्रमुख देव राम हैं। आदिवासी मानते हैं कि भगवान राम वनवास के दौरान पंचवटी की ओर जाते समय डांग प्रदेश से गुजरे थे। डांग जिले के सुबिर के पास भगवान राम और लक्ष्मण को शबरी माता ने बेर खिलाए थे। शबरी भील समाज से थी। आज यह स्थल शबरी धाम नाम से जाना जाता है।
शबरीधाम से लगभग 7 किमी की दूरी पर पूर्णा नदी पर स्थित पंपा सरोवर है। यहीं मातंग ऋषिका आश्रम था। डांग जिले के आदिवासियों की सबसे प्रबल मान्यता यह भी है कि डांग जिले के अंजना पर्वत में स्थित अंजनी गुफा में ही हनुमानजीका जन्म हुआ था।

कैथल का अंजनी मंदिर : कैथल हरियाणा प्रान्त का एक शहर है। इसकी सीमा करनाल, कुरुक्षेत्र, जिंद, और पंजाब के पटियाला जिले से मिली हुई है। इसे वानर राज हनुमान का जन्म स्थान माना जाता है।   इसका प्राचीन नाम था कपिस्थल। कपिस्थल कुरू साम्राज्य का एक प्रमुख भाग था। आधुनिक कैथल पहले करनाल जिले का भाग था।  
पुराणों के अनुसार इसे वानरराज हनुमान का जन्म स्थान माना जाता है। कपि के राजा होने के कारण हनुमानजी के पिता को कपिराज कहा जाता था।  कैथल में पर्यटक ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं से जुड़े अवशेष भी देखे जा सकते हैं। इसके अलावा यहां पर हनुमानजी की माता अंजनी का एक प्राचीन मंदिर भी और अजान किला भी।   








22.3.17

1000 साल में पूरे आर्यावर्त का इस्लामीकरण क्यों नहीं हो पाया



1000 साल में पूरे आर्यावर्त का इस्लामीकरण क्यों नहीं हो पाया??

1000 साल में पूरे आर्यावर्त का इस्लामीकरण क्यों नहीं हो पाया|एक कुतर्क आखिर हिन्दू 1000 सालों तक हुए इस्लामी हमलों में कैसे सुरक्षित बचा ?
इस्लाम की आंधी जिसने आधे एशिया को अरबी मजहब का गुलाम बना दिया यहाँ से आगे क्यों नहीं बढ़ पाया
इन्टरनेट पर मुस्लिम ये बात बहुत कहते हैं जो कि कुछ कुतर्की मुस्लिम विद्वानों की सोच का नतीजा है जो वो इस्लामी शासनकाल के खून और लाशों के ढेर को छुपाने , गैर मुस्लिम के ऊपर किये गए अत्याचारों को झूठा साबित करने , मंदिरों की लूट और कत्लेआम को राजनीतिकरण से जोड़ कर , इस्लाम को शान्ति का मजहब साबित करने और खुद को पाक साफ़ साबित करने के लिए करते हैं |वैसे तो बहुत से देश में इस्लामीकरण और उसके बाद हुए कत्लेआम की निशानियाँ भी शेष नहीं है पर फिर भी बहुत सी सभ्यताएं इतना सब होने के बाद भी सर उठा के खड़ी हुई हैं इनमे तत्कालीन पारस यूरोप का एक बड़ा हिस्सा और भारत प्रमुख हैं |जहाँ पारस आज बहुत हद तक इस्लामीकरण की चपेट में है पर आज से कुछ साल पहले वहां की संस्कृति भारत की तरह विकसित थी इतिहास में नजर डालने पे पता चलता है की भारत के राजाओं में राजनीतिक एवं पारिवारिक सम्बन्ध थे |
   आखिर 1000 साल में पूरे आर्यावर्त का इस्लामीकरण क्यों नहीं हो पाया जबकि मुस्लिम शासक पूरी ताकत से मंदिरों को तोड़ के मस्जिदे बनवा रहे थे लूट रहे थे धार्मिक स्थानों पे कब्रिस्तान बसाए जा रहे थे , हिन्दुओं को मारा जा रहा था और महिलाओं से ज्यादतियां हो रही थी फिर भी मुस्लिम विचारक इस बात से परेशान हो जाते हैं आखिर इतने सब के बाद भी ये हिन्दू बच कैसे गया आज भी मुस्लिम सिर्फ ३० % हो पाए जब बांग्लादेशियों को भी बसा लिया |
1 – हिन्दूवीरों की तलवारें
तलवारें जो सदा मलेक्षों के खून की प्यासी रहीं जिन्होंने अपने जीते जी मुस्लिम आक्रान्ताओं को अपने राज्यों में घुसने नहीं दिया डेक्कन वीर शिवाजी और मराठा राजाओं ने 1670 से औरंगजेब की सेनाओं को हराते हुए कुछ ही वर्षों में पुरे मुग़ल साम्राज्य को उखाड़ फेका और 1818 तक राज्य किया उन्होंने हिन्दुकुश पर्वत के आखिरी छोर अफगानिस्तान तक भगवा झंडे गाड दिए |
राजस्थान में राजपूतों और महाराणा प्रताप जैसे वीरों ने कभी मलेचों को टिकने ही नहीं दिया |
    भरतपुर और मथुरा में जाट वीरों ने दुशमनो को मार मार के भगाया , वीरदुर्गादास राठौर जैसे राजाओं ने , बुंदेलखंड के वीर छत्रसाल, विजयगढ़ के राजा कृष्णदेव ने इस्लामी शासन जड़ो को कभी उत्तर भारत में मजबूत नहीं होने दिया हिन्दू समाज के लिए हमेशा ऐसे राज्य उपलब्ध थे जहाँ वो सुरक्षित थे |
दूसरी तरफ सिख गुरुओं ने बंदा बैरागी हरी सिंह नलवा और महराजा रणजीत सिंह ने भी अपने अपने छेत्रों में मुस्लिम आक्रांताओ की इट से इट बजा दी |
कुल मिलाके जितनी तेजी से मुस्लिम शासक सत्ता में आये उतनी ही तेजी से सम्पूर्ण भारत में शुर वीरों ने उनसे अपनी तलवारें भी तेज की |
2 – हिन्दुओं में मलेक्षों के प्रति नफरत –
हिन्दुओं के कत्लेआम , औरतों ( विधवा , शादीशुदा , या नाबालिग लड़कियों ) के प्रति होने वाले मुस्लिम सेनाओं और राजाओं के व्यभिचारो , बलात धर्मान्तरण , मंदिरों की लूट और तोड़फोड़ , मंदिरों में गाये की हत्या , धार्मिक स्थलों को तोड़ फोड़ के मस्जिद और कब्रिस्तान बनाने की वजह से समस्त हिन्दू समाज में मलेक्षों के प्रति नफरत थी भले ही बलात धर्मान्तरित किसी एक ही परिवार के लोग होते थे पर वे सभी सामजिक रूप से समाज से निष्काषित ही थे जिस कारण समाज में एक भावना काम कर रही थी और लोग अत्याचारों को सहते हुए भी धर्मान्तरित नहीं हुए |
मुख्य आजीविका का साधन कृषि था और पूरे देश की जमीनें खाली जब कही मुस्लिम शासन पहुचता था हिन्दू समाज वो क्षेत्र ही छोड़ देते थे और नए स्थानों पे बस के नारकीय जीवन से बच जाते थे और अपनी और अपने घर वालों की इज्जत आबरू और धर्म की रक्षा कर लेते थे | ऐसा सदियों से हो रहा था तो ये कोई नई बात नहीं थी मुस्लिम शासन काल से पहले भी जब कोइ राजा युद्ध हार जाता था तो या तो वो किसी मित्र राज्य में शरण लेता था मंत्रियों के साथ या बंदी बना लिया जाता था पर जो मुस्लिम सेनाये करती थी वो कोई नहीं क्योंकि मुस्लिम सेनाओ को हिन्दू लड़कियों को अपने हरम में भरने की आदत थी तो यही था जो वो कर सकते थे |
उदाहरण के लिए जब गुजरात में मुस्लिम शासन आया तो सौराष्ट्र के भगेल राजा रावल चले गए |
उत्तर भारत के झांसी चले गए |
जब शिवाजी का शासन आया तो बहुत से ब्राह्मण वहां चले गए |
ये सरल तरीका था की शिकार ही वहां से हट जाए जहाँ शिकारी पहुचे और इस्लामी शासन में अशक्त छोटे राज्यों की प्रजा के द्वारा अपनाया गया | हिन्दुओं ने लगातार प्रवास का नुकसान स्वीकार किया पर इस्लाम में परिवर्तन नहीं किया |
3 – जजिया –



हिन्दुओं ने मुस्लिम शासकों के द्वारा लगाया गया घ्रणित शरिया टैक्स जजिया स्वीकार किया और पर जनेऊ को नहीं छोड़ा | उच्च कुलीन हिन्दुओं और राजाओं को इस्लाम में परिवर्तन के लिए पैसे / पोस्ट / मुस्लिम महिलाओं ( हरम की ) का भी प्रोत्साहन दिया गया पर शहद ही किसी ने इन प्रस्तावों को स्वीकार किया सभी ने घ्रणित इस्लामी टैक्स को भुगतान किया पर हिन्दू धर्म को नहीं छोड़ा | तलवार को छोड़ कर हुए इन धृष्ट विचारों के युद्ध में भी समाज ने न झुकते हुए पूरी क्षमता से खुद को बचाए रक्खा | अकबर के नवरतन आदि इन्ही चालों का हिस्सा थे हिन्दुओं को आकर्षित करने के लिए |
4 – भक्ति आन्दोलन –
हिंदूइस्म को समेट के रखने में संतो का अविश्वसनीय योगदान रहा धर्मान्तरित हिन्दुओं एवं दुखी हिन्दू समाज को अलग अलग संतों ने श्रेष्टतम हिन्दू धर्म का सन्देश देते हुए उन्हें आपस में जोड़े रक्खा ये भक्ति आन्दोलन का ही असर था की कुछ पीढ़ी पूर्व धर्मान्तरित हुए हिन्दू तो क्या जन्मजात अरबी मुस्लिम भी हिंदूइस्म में खिचे चले आये |
रसखान और औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसा बेगम और भतीजी ताज बेगम महान कृष्ण भक्त हुई जिन्होंने हिन्दुइज्म में न आ पाने के बाद भी भक्तिरस से हिन्दू या मुसलमान क्या सम्पूर्ण आर्यावर्त को तृप्त कर दिया |
ये सब संभव हुआ भक्ति आन्दोलन के कारण |
भक्ति आन्दोलन के द्वारा हिन्दू धर्म ने इस्लाम के प्रचार, जोर-जबरजस्ती एवं राजनैतिक हस्तक्षेप का कड़ा मुकाबला किया। इसका बहुत हद तक इस्लामी विचारधाराओं पे असर पड़ा जिसके बचाव के लिए सूफीवाद का जाल फेका गया जिसे हम आज भी पीर फ़कीर कब्र और साईं के रूप में देख रहे हैं |
भक्ति आन्दोलन बहुत कम समय में पूरे दक्षिणी एशिया (भारतीय उपमहाद्वीप) में फैला तथा लम्बे काल तक चला।
इसमें समाज के सभी वर्गों (निम्न जातियाँ, उच्च जातियाँ, स्त्री-पुरुष, सनातनी, सिख, मुसलमान आदि) का प्रतिनिधित्व रहा।
5 – शुद्धि आन्दोलन –
शुद्धि आन्दोलन का उद्देश्य बलात धर्मान्तरित लोगों को वापस हिन्दू धर्म में लाना था दयांनंद द्वारा चलाये गये ‘शुद्धि आन्दोलन’ के अन्तर्गत उन लोगों को पुनः हिन्दू धर्म में आने का मौका मिला जिन्होने किसी कारणवश इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। एनी बेसेंट ने कहा था कि स्वामी दयानन्द ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होने कहा कि
“ ‘भारत भारतीयों के लिए है। “
शुद्धि आन्दोलन ने कुछ ही समय में लाखों बलात धर्मान्तरित मुसलमानों को स्वधर्म में वापसी करवाई |
6 – मुस्लिम शासकों के अरबी शौक –
अधिकतर मुस्लिम शासक अरबी मरदाना बीमारियों से पीड़ित थे | बाबर जहाँ समलैंगिक और नशेडी था वही शाहजहाँ जहाँगीर अकबर आदि अपने हरम भरने में व्यस्त थे | शाहजहाँ शराब में डूबा रहता था |
7 – इस्लाम का नैतिक रूप से आर्य विरुद्ध होना –
इस्लामी आचरण नैतिक रूप से उसकी शिक्षाओ के कारण वेद विरुद्ध था तो किसी भी आर्य के मन में वो कैसे घुसता ? अधिकतर मुसलमान मांसाहारी और कब पूजक हो जाते थे उन्हें नहाने और शरीर की शुद्धता से कोई मतलब नहीं था जबकि हिन्दू सुबह शाम नहाते थे , मॉस , शराब और बहुविवाह आदि प्रथाएं मुस्लिमो में थी तो जो भी मुसलमान था उसका समाज सिर्फ उतना ही था जहाँ वो है अन्य समाज से वो पूर्णतया निष्काषित था इसीलिए उस समय के समाज ने भी मलेक्ष जैसे शब्द का इस्तेमाल मुसलमानों के लिए किया था |
अंत में अरबों को शारीरिक विजय तो अवश्य प्राप्त हुई, परन्तु धार्मिक रूप में हिन्दू धर्म के युक्ति-युक्त सिद्धान्तों के सामने इस्लाम को पराजय प्राप्त हुई। इसी सत्य को मौलाना अल्ताफ हुसैन हालीजी ने इन शब्दों में स्वीकार किया है-
वह दीने हिजाजीका बेबाक बेड़ा।

https://pparihar.com/ से साभार 

27.1.17

ओशो रजनीश की नजर में रावण:




छठवां प्रश्न :
ओशो, कहा जाता है कि रावण भी ब्रह्मज्ञानी था। क्या रावण भी रावण उसकी मर्जी से नहीं था? क्या रामलीला सच में ही राम की लीला थी?
ओशो- निश्चित ही, रावण ब्रह्मज्ञानी था और रावण के साथ बहुत अनाचार हुआ है और दक्षिण में जो आज रावण के प्रति फिर से समादर का भाव पैदा हो रहा है, वह अगर ठीक रास्ता ले ले तो अतीत में हमने जो भूल की है, उसका सुधार हो सकता है। लेकिन वह भी गलत रास्ता लेता मालूम पड़ रहा है दक्षिण का आंदोलन। वे रावण को तो आदर देना शुरू कर रहे हैं, राम को अनादर देना शुरू कर रहे हैं। आदमी की मूढ़ता का अंत नहीं है, वह अतियों पर डोलता है। वह कभी संतुलित तो हो ही नहीं सकता। यहां तुम रावण को जलाते रहे हो, वहां अब उन्होंने राम को जलाना शुरू किया है। तुमने एक भूल की थी, अब वे दूसरी भूल कर रहे हैं।
रावण ब्रह्मज्ञानी था। यह भी परमात्मा की मर्जी थी कि वह यह पार्ट अदा करे। उसने यह भली तरह अदा किया। और कहते हैं, जब राम के बाण से वह मरा तो उसने कहा कि मेरी जन्मों-जन्मों की आकांक्षा पूरी हुई कि राम केहाथों मारा जाऊं, इससे बड़ी और कोई आकांक्षा हो भी नहीं सकती, क्योंकि जो राम के हाथ मारा गया, वह सीधा मोक्ष चला जाता है।

    गुरु के हाथ जो मारा गया, वह और कहां जाएगा? और जैसे पांडवों को कहा है कृष्ण ने कि मरते हुए भीष्म से जाकर धर्म की शिक्षा ले लो, वैसे ही राम ने लक्ष्मण को भेजा है रावण के पास कि वह मर न जाए, वह परम ज्ञानी है,उससे कुछ ज्ञान के सूत्र ले आ। उस बहती गंगा से थोड़ा तू भी पानी पी ले। लेकिन कठिनाई क्या है? कठिनाई हमारी यह है कि हमारी समझ चुनाव की है। अगर हम राम को चुनते हैं, तो रावण दुश्मन हो गया। अगर हम रावण को चुनते हैं, तो राम दुश्मन हो गए। और दोनों को तो हम चुन नहीं सकते, क्योंकि हमको लगता है, दोनों तो बड़े विरोधी हैं, इनको हम कैसे चुनें! 
और जो दोनों को चुन ले, वही रामलीला का सार समझा, क्योंकि रामलीला अकेली राम की लीला नहीं है, रावण के बिना हो भी नहीं सकती। थोड़ा रावण को हटा लो रामलीला से, फिर रामलीला बिलकुल ठप हो जाएगी, वहीं गिर जाएगी। सब सहारे उखड़ जाएंगे। राम खड़े न हो सकेंगे बिना रावण के। राम को रावण का सहारा है। प्रकाश हो नहीं सकता बिना अंधेरे के। अंधेरा प्रकाश को बड़ा सहारा है। जीवन हो नहीं सकता बिना मृत्यु के। मृत्यु के हाथों पर ही जीवन टिका है। जीवन विपरीत में से चल रहा है।
     राम और रावण, मृत्यु और जीवन, दोनों विरोध वस्तुत: विरोधी नहीं हैं, सहयोगी हैं। और जिसने ऐसा देखा, उसी ने समझा कि रामलीला का अर्थ क्या है। तब विरोध नाटक रह जाता है। तब भीतर कोई वैमनस्य नहीं है। न तो राम के मन में कोई वैमनस्य है, न रावण के मन में कोई वैमनस्य है। और इसीलिए तो हमने इस कथा को धार्मिक कहा है। अगर वैमनस्य हो तो कथा नहीं रही, इतिहास हो गया।
इस फर्क को भी ठीक से समझ लो। पुराण और इतिहास का यही फर्क है। इतिहास साधारण आदमियों की जीवन घटनाएं हैं। वहां संघर्ष है, विरोध है, वैमनस्य है, दुश्मनी है। पुराण! पुराण नाटक है, लीला है। वहां वास्तविक नहीं है वैमनस्य; दिखावा है, खेल है। जो मिला है अभिनय, उसे पूरा करना है।
     कथा यह है कि वाल्मीकि ने राम के होने के पहले ही रामायण लिखी। अब जब लिख ही दी थी, तो फिर राम को पूरा करना पड़ा। कर भी क्या सकते थे। जब वाल्मीकि जैसा आदमी लिख दे, तो तुम करोगे क्या! फिर उसको पूरा करना ही पड़ा। यह बड़ी मीठी बात है। दृष्टा कह देते हैं, फिर उसे पूरा करना पड़ता है। इसका अर्थ कुल इतना ही है, जैसे कि नाटक की कथा तो पहले ही लिखी होती है, फिर कथा को पूरा करते हैं नाटक में।नाटक में कथा पैदा नहीं होती। कथा पहले पैदा होती है, फिर कथा के अनुसार नाटक चलता है।क्या किसको कहना है, सब तय होता है। जीवन का सारा खेल तय है। क्या होना है, तय है। तुम नाहक ही अपना बोझ उठाए चल रहे हो। अगर तुम समझ लो कि सिर्फ नाटक है जीवन, तो तुम्हारा जीवन रामलीला हो गया, तुम पुराण-पुरुष हो गए, फिर तुम्हारा इतिहास से कोई नाता न रहा। फिर तुम इस भ्रांति में नहीं हो कि तुम कर रहे हो। फिर तुम जानते हो कि जो उसने कहा है, हो रहा है। हम उसकी मर्जी पूरी कर रहे हैं। अगर वह रावण बनने को कहे, तो ठीक। रावण को तुम मार तो नहीं डालते! जो आदमी रावण का पार्ट करता है          रामलीला में, उसको तुम मार तो नहीं डालते कि इसने रावण का पार्ट किया है, इसको मार डालो। जैसे ही मंच के बाहर आया, बात खत्म हो गई। अगर उसने पार्ट अच्छा किया, तो उसे भी तगमे देते हो।
   असली सवाल पार्ट अच्छा करने का है। राम का हो कि रावण का, यह बात अर्थपूर्ण नहीं है। ढंग से पूरा किया जाए, कुशलता से पूरा किया जाए। अभिनय पूरा-पूरा हो, तो तुम पुराण-पुरुष हो गए।लड़ो बिना वैमनस्य के, संघर्ष करो बिना किसी अपने मन के; जहां जीवन ले जाए बहो। तब तुम्हारे जीवन में लीला आ गई। लीला आते ही निर्भार हो जाता है मन। लीला आते ही चित्त की सब उलझनें कट जाती हैं। जब खेल ही है तो चिंता क्या रही! फिर एक सपना हो जाता है।
    इसी अर्थ में हमने संसार को माया कहा है। माया का अर्थ इतना ही है कि तुम माया की तरह इसे लेना। अगर तुम इसे माया की तरह ले सको, तो भीतर तुम ब्रह्म को खोज लोगे। अगर तुमने इसे सत्य की तरह लिया, तो तुम भीतर के ब्रह्म को गंवा दोगे।
-ओशो (गीता दर्शन : भाग-8, प्रवचन- 211/06) 
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18.1.17

क्या पूरब पश्चिम एक होँगे?ओशो विज़न




मैं हमेशा ऐसा अनुभव क्यों करता हूं, जैसे कि मेरा एक हिस्सा दूसरे हिस्से के विरुद्ध लड़ रहा है?
मनुष्य का इतिहास एक अत्यंत दुखद घटना रहा है, और इसके दुखद होने का कारण समझना बहुत कठिन नहीं है। उसे खोजने के लिए तुम्हें ज्यादा दूर जाना न पड़ेगा, वह प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद है।
मनुष्य के पूरे अतीत ने मनुष्य में एक विभाजन पैदा कर दिया है, हर आदमी के भीतर निरंतर एक शीत युद्ध चल रहा है। यदि तुम्हें बेचैनी का अनुभव होता है, तो उसका कारण व्यक्तिगत नहीं है। तुम्हारी बीमारी सामाजिक है। और जिस चालाकी से भरी तरकीब का उपयोग किया गया है, वह है: तुम्हें दुश्मनों के दो खेमों में बांटना-भौतिकवादी और अध्यात्मवादी, जोरबा और बुद्ध।
वस्तुतः तुम बंटे हुए नहीं हो। वास्तविकता यह है कि तुम अखंड हो - एक स्वर में, एक लय में आबद्ध। लेकिन तुम्हारे मन में यह संस्कार गहरा बैठा है कि तुम एक नहीं हो, अखंड नहीं हो, पूर्ण नहीं हो। तुम्हें अपने शरीर के खिलाफ लड़ना होगा। यदि आध्यात्मिक होना चाहते हो तो तुम्हें अपने शरीर को हर संभव तरीके से जीतना पड़ेगा, उसे हराना पड़ेगा, उसे सताना और नष्ट करना पड़ेगा।
पूरी दुनिया में यह धारणा स्वीकृत रही है। विभिन्न धर्मों में, विभिन्न संस्कृतियों में उसके रंग-रूप भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, किंतु आधारभूत सिद्धांत वही है-मनुष्य को विभाजित करो, उसमें संघर्ष पैदा करो, जिससे एक हिस्सा श्रेष्ठ अनुभव करने लगे, पवित्र बन जाए, पुण्यात्मा बन जाए, और दूसरे हिस्से की पापी की तरह निंदा करना शुरू कर दे।
मगर कठिनाई यह है कि तुम एक हो, तुम्हें खंडित करने का कोई उपाय नहीं है। हर विभाजन तुम में दुख पैदा करने वाला है। विभाजन का अर्थ होगा कि तुम्हारी आत्मा का आधा भाग, दूसरे आधे भाग से लड़ रहा है। और यदि तुम स्वयं के भीतर लड़ रहे हो, तो कैसे विश्राम को उपलब्ध होओगे?
पूरी की पूरी मनुष्यता अब तक स्किजोफ्रेनिक ढंग से, खंडित-मानसिकता में जीती रही है। प्रत्येक व्यक्ति टुकड़ों में, खंडों में तोड़ दिया गया है। तुम्हारे धर्म, तुम्हारे दर्शनशास्त्र, तुम्हारे सिद्धांत, घाव भरने वाले नहीं, वरन घाव करने के साधन रहे हैं-वे अंतर्युद्ध और संघर्ष के कारण रहे हैं। तुम खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते रहे हो। तुम्हारा दायां हाथ, बाएं हाथ को चोट पहुंचाता है, बायां हाथ, दाएं हाथ को घायल करता है, और अंतत: तुम्हारे दोनों हाथ लहूलुहान हो जाते हैं।
पश्चिम ने चार्वाक को चुना, जोरबा को चुना। विक्षिप्तता से बचने का दूसरा रास्ता न था-एक हिस्से को पूर्णतः नष्ट करना पड़ा । पश्चिम ने मनुष्य के आंतरिक सत्य को, उसकी चेतना को अस्वीकार कर दिया-आदमी केवल शरीर है, कहीं कोई आत्मा नहीं है-खाओ, पीओ, और मौज करो, बस यही एकमात्र धर्म है। यह मन की शांति पाने का एक उपाय था, संघर्ष से बाहर आने का, एक निर्णय और निष्कर्ष पर पहुंचने का-क्योंकि यह स्वीकृत हो गया कि तुम एक हो-केवल पदार्थ, केवल शरीर।
ऊपर-ऊपर से देखो तो ऐसा लगता है कि पूरब और पश्चिम अलग-अलग चीजें कर रहे हैं, किंतु गहराई से समझो तो वे एक ही चीज कर रहे हैं। सचाई यह है कि वे एक होने का बौद्धिक रूप से प्रयास कर रहे हैं। क्योंकि "दो' होने का मतलब है निरंतर बेचैनी में, सतत संघर्ष में होना; इससे बेहतर है कि "दूसरे' का ख्याल ही भूल जाओ।
इसी संदर्भ में तुम्हें यह स्मरण दिलाना महत्वपूर्ण होगा कि आधुनिक विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि पदार्थ का होना एक भ्रम है। पदार्थ का अस्तित्व नहीं है, वह केवल दिखाई देता है। वे इस निष्पत्ति पर एक बिलकुल भिन्न मार्ग से पहुंचे हैं-पदार्थ का सूक्ष्म अन्वेषण करते हुए उन्होंने पाया कि जैसे-जैसे पदार्थ में गहरे जाते हैं, वैसे-वैसे उसकी भौतिकता; उसका पदार्थ-पन कम से कम होता जाता है, और परमाणु के बाद एक ऐसा बिंदु आता है जहां कोई पदार्थ नहीं बचता, सिर्फ इलेक्ट्रॉन रह जाते हैं, जो विद्युत कण हैं, वे पदार्थ नहीं, सिर्फ ऊर्जा तरंगें हैं।
पश्चिमी प्रतिभा को केवल पदार्थ के साथ काम करने की छूट थी। पूरब में प्रतिभा के लिए पहली चुनौती थी-अंतर्यात्रा। सिर्फ द्वितीय श्रेणी के लोगों ने, मध्यम कोटि के लोगों ने बाहरी सांसारिक चीजों के लिए श्रम किया। जो वास्तव में बुद्धिमान थे, उन्होंने सदा ध्यान की दिशा में गति की।
धीरे-धीरे दूरी बढ़ती गई। पश्चिम भौतिकवादी हो गया-इसकी पूरी जिम्मेवारी ईसाई चर्च की है, और पूर्वीय मनुष्यता अधिक से अधिक अध्यात्मवादी हो गई। प्रत्येक व्यक्ति में जो विभाजन, जो विखंडन किया गया था; वही विस्तृत पैमाने पर पूरब और पश्चिम का विभाजन बन गया।
एक महान कवि ने लिखा है: "पूरब" पूरब है; और "पश्चिम" पश्चिम है; और दोनों कभी नहीं मिलेंगे। और इस कवि रुडयार्ड किपलिंग की पूरब में अत्यधिक रुचि थी। वह कई वर्षों तक भारत में रहा-वह सरकारी नौकरी में था। पर इस भेद को देख कर-कि संपूर्ण पूर्वीय चेतना भीतर गति करती है, और पश्चिमी चेतना बहिर्मुखी है...वे कैसे मिल सकते हैं?
मेरा पूरा काम रुडयार्ड किपलिंग को गलत सिद्ध करना है। मैं कहना चाहूंगा कि न पश्चिम पश्चिम है; न पूरब पूरब है-वे दोनों पहले से ही मिले हुए हैं। न कोई पूरब है, न कोई पश्चिम है। उनके दृष्टिकोण बहुत भिन्न रहे लेकिन वे समझे जा सकते हैं।

मेरी दृष्टि यह है, मेरा सारा प्रयास यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक सेतु निर्मित हो, ताकि तुम एक हो जाओ, पूर्ण हो जाओ। देह से दुश्मनी न करो, वह तुम्हारा घर है। अपनी आत्मा से शत्रुता न साधो, क्योंकि बिना चेतना के हो सकता है तुम्हारा घर खूब सजा-धजा हो, पर वह खाली मकान होगा - बिना मालिक के - सूना। शरीर और आत्मा जब साथ-साथ हों, तो एक सौंदर्य पैदा होता है-एक पूर्ण जीवन! एक भरा-पूरा जीवन!! 
प्रतीक रूप में मैंने शरीर के लिए जोरबा को और आत्मा के लिए बुद्ध को चुना है। चाहे मैं जोरबा के विषय में कहूं, या बुद्ध के बारे में बोलूं, मेरे प्रत्येक वक्तव्य में वे दोनों ही स्वतः समाहित हो जाते हैं, क्योंकि मेरे लिए वे अभिन्न हैं। यह सिर्फ बल देने की बात है कि किस पर ज्यादा जोर देना है।
जोरबा केवल शुरुआत है। यदि तुम अपने जोरबा को पूर्णरूपेण अभिव्यक्त होने की स्वीकृति देते हो, तो तुम्हें कुछ बेहतर, कुछ उच्चतर, कुछ महत्तर सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। वह मात्र वैचारिक चिंतन से पैदा नहीं हो सकता, वह तुम्हारे अनुभव से जन्मेगा-क्योंकि वे छोटे-छोटे, क्षुद्र अनुभव उकताने वाले हो जाएंगे। गौतम बुद्ध स्वयं इसीलिए बुद्ध हो पाए, क्योंकि वे जोरबा की जिंदगी खूब अच्छी तरह जी चुके थे। पूरब ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उनतीस वर्षों तक बुद्ध इस तरह जीए, जैसा कोई जोरबा कभी न जीया होगा।
गौतम बुद्ध के पिता ने पूरे राज्य की सारी सुंदर लड़कियों को एकत्रित करके बुद्ध के भोग-विलास की व्यवस्था की थी। उन्होंने भिन्न-भिन्न ऋतुओं के लिए, अलग-अलग जगहों पर तीन शानदार महल बनवाए। उनके पास सुंदर बाग-बगीचे और झीलें थीं। बुद्ध का पूरा जीवन सुख-सुविधा संपन्न था, शुद्ध भोग-विलास था! पर उससे वे उकता गए, और यह प्रश्न उनके मन में महत्वपूर्ण होने लगा कि क्या यही सब कुछ है? फिर मैं कल के लिए क्यों जीए जा रहा हूं। जीवन का कुछ अर्थ, कुछ और अभिप्राय होना चाहिए, अन्यथा जीवन सारहीन है।
बुद्धत्व की खोज प्रारंभ होती है-जोरबा को भरपूर जी लेने से। हर आदमी बुद्ध नहीं हो पाता, उसका मूल कारण है कि जोरबा अनजीया रह जाता है। मेरा तर्क देखते हो न! मैं कहता हूं कि जोरबा को जी भर के, पूर्णता से जी लो, तो तुम स्वाभाविक ढंग से

बुद्ध के जीवन में प्रवेश कर जाओगे।अपने शरीर का सुख लो, अपने पार्थिव अस्तित्व को भोगो, इसमें कोई पाप नहीं है। इसके पर्दे में, इसके पीछे छिपा है तुम्हारा आध्यात्मिक विकास, तुम्हारा आत्मिक आनंद! जब तुम भौतिक सुखों से थक जाओगे, केवल तब तुम पूछोगे, "क्या इसके अतिरिक्त कुछ और भी है?" स्मरण रहे, यह प्रश्न मात्र बुद्धिगत नहीं हो सकता, इसे अस्तित्वगत होना पड़ेगा। "क्या कुछ और भी है?" जब यह प्रश्न अस्तित्वगत होगा, तभी तुम अपने भीतर वह "कुछ और" उपलब्ध कर पाओगे।
वस्तुतः वह सुख ही है जो तुम्हें इस आनंद तक ले आया है। जोरबा और बुद्ध के बीच में कोई संघर्ष नहीं है, कोई झगड़ा नहीं है। जोरबा तीर का निशान है, एक संकेत है - यदि तुम उस दिशा में ठीक से अनुसरण करो, तो बुद्ध तक पहुंच जाओगे।निश्चित ही बहुत कुछ और भी है। जोरबा तो केवल शुरुआत है। एक बार बुद्धत्व की ज्योति जल जाए, जागरण की आभा तुम्हारी आत्मा पर फैल जाए, तब तुम जानोगे कि सांसारिक सुख छाया भी न था... वहां इतना अधिक आनंद है, परमानंद! लेकिन वह आनंद सुख के: विपरीत नहीं है
ओशो,
बियांड एनलाइटनमेंट, #7