15.11.25

ऋषि दधीचि और राजा क्षुव की पौराणिक कथा, जब विष्णु से किया दधीचि ने युद्ध



           ऋषि  दधीचि और राजा क्षुव की पौराणिक कथा, जब विष्णु से किया दधीचि ने युद्ध
प्राचीन काल में, ऋषि दधीचि और राजा क्षुव के बीच गहरी मित्रता थी। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे और उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान होता रहता था। दधीचि एक विद्वान ब्राह्मण थे, जिनकी तपस्या और ज्ञान की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। दूसरी ओर, क्षुव एक शक्तिशाली क्षत्रिय राजा थे, जो अपने युद्ध कौशल और धर्मनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी मित्रता इतनी गहरी थी कि लोग उन्हें एक-दूसरे का पूरक मानते थे।
विवाद का आरंभ :
एक दिन, दोनों मित्रों के बीच एक गहन चर्चा शुरू हुई कि ब्राह्मण और क्षत्रिय में से कौन श्रेष्ठ है। दधीचि ने ब्राह्मणों की विद्या, तप और आध्यात्मिक शक्ति की प्रशंसा की, जबकि क्षुव ने क्षत्रियों के साहस, शौर्य और धर्मरक्षा के गुणों को सर्वोपरि बताया। दोनों अपने-अपने वर्ण के प्रति इतने अनुरक्त थे कि यह चर्चा धीरे-धीरे तीखी बहस में बदल गई। क्रोध में आकर, क्षुव ने इंद्र से उनका वज्र मांग लिया। यह वज्र विश्वकर्मा द्वारा सूर्य की अतिरिक्त ऊर्जा से निर्मित था और ब्रह्मांड की किसी भी वस्तु को नष्ट करने की शक्ति रखता था।
दधीचि की मृत्यु और पुर्नजन्म :
क्रोध में अंधे होकर, क्षुव ने दधीचि पर वज्र से प्रहार कर दिया। वज्र की प्रचंड शक्ति ने दधीचि के शरीर को भस्म कर दिया, और उनकी मृत्यु हो गई। क्षुव इस विजय से प्रसन्न होकर लौट गया, यह सोचकर कि क्षत्रिय ने ब्राह्मण को परास्त कर दिया। लेकिन असुरों के गुरु शुक्राचार्य, जिन्होंने भगवान शंकर की हजारों वर्षों की तपस्या कर मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की थी, को दधीचि की मृत्यु का समाचार मिला। वे तुरंत दधीचि के आश्रम पहुंचे और मृतसंजीवनी विद्या के द्वारा उनके शरीर में पुनः प्राण फूंक दिए।
जब दधीचि को होश आया, वे आश्चर्यचकित हुए और शुक्राचार्य से पूछा, यह चमत्कार कैसे संभव हुआ? शुक्राचार्य ने उत्तर दिया, महादेव की कृपा से कुछ भी असंभव नहीं। जैसे उन्होंने मार्कण्डेय को यमराज से बचाया, वैसे ही मुझे यह विद्या प्रदान की।
दधीचि की तपस्या और वरदान :
हालांकि दधीचि का शरीर पुनर्जनन हो गया, उनकी आत्मा अभी भी क्षुव के अपमान से व्यथित थी। शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में, उन्होंने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या शुरू की। वर्षों की कठिन तपस्या के बाद, भगवान शंकर प्रसन्न हुए और दधीचि को दर्शन दिए। दधीचि ने तीन वरदान मांगे।
पहला – मेरी हड्डियों को इंद्र के वज्र से भी अधिक शक्तिशाली बनाएं। 
दूसरा – कोई भी मेरी हत्या न कर सके।
 तीसरा -मैं कभी अपमानित न होऊं, जैसा क्षुव ने मुझे अपमानित किया। भगवान शंकर ने तीनों वरदान स्वीकार किए।
दधीचि का प्रतिशोध :
वरदानों से शक्तिशाली बने दधीचि, क्षुव के महल में पहुंचे और क्रोध में राजा को लात मारी। दधीचि को जीवित देखकर क्षुव स्तब्ध रह गया। उसने पुनः वज्र का प्रयोग किया, लेकिन इस बार वज्र का दधीचि पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। दधीचि ने हंसते हुए कहा, महादेव ने मुझे अजेय बना दिया है। अब कोई मुझे परास्त नहीं कर सकता।
भगवान विष्णु का हस्तक्षेप :
क्षुव ने भगवान विष्णु का आह्वान किया, यह सोचकर कि केवल वे ही दधीचि को रोक सकते हैं। लेकिन जब विष्णु को पता चला कि दधीचि को स्वयं भगवान शंकर ने वरदान दिया है, उन्होंने क्षुव को सलाह दी, ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों ही विश्व की व्यवस्था के लिए आवश्यक हैं। दोनों में कोई छोटा-बड़ा नहीं। युद्ध विराम करो।
लेकिन दधीचि ने अहंकारवश विष्णु की बात को ठुकरा दिया और कहा, महादेव के वरदान ने मुझे अजेय बना दिया है। मैं किसी से नहीं डरता।
विष्णु समझ गए कि दधीचि का अहंकार सृष्टि के लिए खतरा बन सकता है। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया, लेकिन वह भी दधीचि की त्वचा को खरोंच तक न सका। विष्णु ने एक के बाद एक कई दिव्यास्त्रों का उपयोग किया, परंतु सभी निष्फल रहे
दधीचि की शक्ति और विश्वरूप :
क्रोधित दधीचि ने एक मुट्ठी घास उठाई और उसे देवताओं की ओर फेंका। प्रत्येक घास का तिनका त्रिशूल में परिवर्तित हो गया, जो देवताओं को नष्ट करने को तत्पर था। विष्णु ने अपने कई रूप बनाए, लेकिन दधीचि ने उन्हें भी परास्त कर दिया। अंत में, विष्णु ने अपना विश्वरूप प्रकट किया, जिसमें समस्त ब्रह्मांड समाहित था। अनंत प्राणी, आयाम और संभावनाएं उस दृश्य में निहित थीं। सारा ब्रह्मांड उस दृश्य के सामने नतमस्तक हो गया, लेकिन दधीचि पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने कहा, प्रभु, यह आपकी माया है। यह मुझ पर हावी नहीं हो सकती।
ब्रह्मा का हस्तक्षेप और समाधान :
अंत में, ब्रह्मा प्रकट हुए और क्षुव को दधीचि से क्षमा मांगने को कहा। दधीचि ने क्षमा तो दे दी, लेकिन उन्होंने सभी देवताओं को शाप दिया, एक समय आएगा जब आपको भगवान शंकर के क्रोध का सामना करना पड़ेगा। यह कहकर दधीचि चले गए।
दधीचि की यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सृष्टि की व्यवस्था को बिगाड़ सकता है। ब्राह्मण और क्षत्रिय, दोनों ही समाज के लिए आवश्यक हैं, और उनकी एकता ही विश्व की उन्नति का आधार है। दधीचि का शाप देवताओं के कानों में गूंजता रहा, और वे सोच में पड़ गए कि आखिर ऐसा क्या होगा जो भगवान शंकर के क्रोध को भड़काएगा। यह रहस्य समय के गर्भ में छिपा रहा।
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दुर्योधन और पांच सोने के तीर:महाभारत की कहानी

 पौराणिक कथाओं  पर आधारित  कथाओं  के विडिओ  की शृंखला मे आज  की प्रस्तुति है -

दुर्योधन और पांच सोने के तीर




    महाभारत की कहानी दुर्योधन और पांच सोने के तीर एक शिक्षाप्रद कहानी है। महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म का युद्ध था। कृष्ण पांडवों के पक्ष से थे। परंतु, उन्होंने युद्ध में शस्त्र नही उठाने का निर्णय लिया था। वहीं श्रीकृष्ण की नारायणी सेना कौरवों की ओर से लड़ रही थी। युद्ध में कभी कौरवों का तो कभी पांडवों का पलड़ा भारी लगता। महाभारत के युद्ध में कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर श्रीकृष्ण ने प्रत्यक्ष रूप से शस्त्र नहीं उठाएं लेकिन अर्जुन का सारथी बनकर श्रीकृष्ण युद्ध भूमि में अर्जुन का मार्गदर्शन करते रहे। द्रौपदी के भाई, दृष्टद्युम्न पांडवों के सेनापति थे। वहीं, कौरवों के तरफ से गंगा पुत्र भीष्म सेनापति थे। उनके नेतृत्व में युद्ध लड़ा जा रहा था। कौरव दल पूर्ण बल से युद्ध करने के बाद भी पांच पांडव में से किसी का भी बाल भी बांका न कर पा रहा था।

दुर्योधन को हुआ भीष्म पितामह पर संदेह

कौरवों के प्रधान सेनापति भीष्म 10 दिनों तक पांडव सेना पर भारी पड़े थे। प्रतिदिन भीष्म हजारो सैनिकों को मार रहे थे। परंतु, दुर्योधन भीष्म पितामह पर कहीं न कहीं संदेह कर रहा था। उसे लग रहा था कि पितामह भीष्म जान बूझकर पांडवों का साथ देते हैं और उन्हें मारना नहीं चाहते। यही सोचकर एक रात दुर्योधन भीष्म से सीधे बात करने के लिए उनके पास शिविर में पंहुचा। जब दुर्योधन भीष्म के शिविर में पंहुचा तो देखा भीष्म चिंतनशील होकर शिविर में बैठे थे। यूं आधी रात को दुर्योधन को अपने शिविर में प्रवेश करते देख भीष्म हैरान हुए। उन्होंने दुर्योधन से शिविर में आने का कारण पूछा।

 पितामह भीष्म जान बूझकर पांडवों का साथ देते हैं और उन्हें मारना नहीं चाहते। यही सोचकर एक रात दुर्योधन भीष्म से सीधे बात करने के लिए उनके पास शिविर में पंहुचा। जब दुर्योधन भीष्म के शिविर में पंहुचा तो देखा भीष्म चिंतनशील होकर शिविर में बैठे थे। यूं आधी रात को दुर्योधन को अपने शिविर में प्रवेश करते देख भीष्म हैरान हुए। उन्होंने दुर्योधन से शिविर में आने का कारण पूछा।

भीष्म की कर्तव्यनिष्ठा पर उठे प्रश्न

दुर्योधन ने गुस्से में कहा “पितामह! आपके मोह पूर्ण अन्याय के कारण मैं आधी रात को आपके शिविर में आने के लिए विवश हुआ हूं। आप अगर पूरी कर्तव्यनिष्ठा और मोहरहित होकर पांडवों के साथ युद्ध करते, तो शायद मुझे यहां आने की आवश्यकता नहीं पड़ती। युद्ध शुरू हुए 10 दिन बीत चुके हैं लेकिन आप अभी तक पांडवों को पराजित नहीं कर पाए हैं। आप संसार को दिखाने के लिए युद्ध का अभिनय कर रहे हैं। आपको आज भी पांडवों से अति प्रेम करते है और आप मेरे सेनापति होते हुए भी पांडवों को युद्ध जीतते देखना चाहते हैं।” अपने बारे में दुर्योधन के मुख से ऐसी बात सुनकर पितामह भीष्म बहुत दुखी हुए।

पांडवों को मारने के लिए भीष्म  के पाँच सोने के तीर  

दुर्योधन के मुख से कटु वचन सुनकर भीष्म ने दुर्योधन से पूछा, “तुम क्या चाहते हो पुत्र दुर्योधन ?” दुर्योधन ने कहा, ” पांडवों की मृत्यु और इसके लिए आपको अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करना होगा।” पितामह भीष्म ने अपनी शस्त्र विद्या का प्रयोग करते हुए सोने के पांच अचूक तीर निकाले और इसे अभिमंत्रित करके बोले- “दुर्योधन! तुम व्यर्थ में संदेह करते हो। इन बाणों से कोई नहीं बच सकता। कल का दिन युद्ध का अंतिम दिन होगा। एक ही दिन में पांचों पांडवों को इन बाणों से समाप्त कर दूंगा। फिर पांडवों के मरते हुए युद्ध का परिणाम तुम्हारे पक्ष में होगा।” पितामह भीष्म की बात सुनकर दुर्योधन प्रसन्न हुआ लेकिन अगले ही क्षण उसके मन में पितामह भीष्म के प्रति संदेह उत्पन्न हो गया।

दुर्योधन की चालाकी 

कपटी दुर्योधन  भीष्म की बातों को सुनकर प्रसन्न तो हुआ। परंतु, अब दुर्योधन को भीष्म की बातों में भी छल-कपट दिखने लगे। दुर्योधन ने भीष्म से कहा- “पितामह! आपकी योजना बहुत अच्छी है। किन्तु, मुझे फिर भी संदेह हो रहा है कि आप इतनी जल्दी और आसानी से पांडवों को मारेंगे। हो सकता है आप मोहवश या प्रेमवश उन्हें ना मार पाएं। अतः आप इन बाणों को मुझे दे दें। मैं युद्ध भूमि में आपको ये पाँचों बाण दूंगा और आपको आपके कर्तव्य की याद दिलाऊंगा। तब आप पांडवों का वध मेरे सामने कीजियेगा।” दुर्योधन की बात सुनकर पितामह भीष्म ने पांचों अभिमंत्रित बाण दुर्योधन को दे दिए। दुर्योधन अपनी संभावित जीत पर बहुत खुश था। वह बाण लेकर अपने शिविर में चला गया।

पांडवों को जब पता चला

भीष्म के शिविर के पास पहरा दे रहे पांडवों के एक गुप्तचर ने सारी बातें सुन ली। उसने महाराज युधिष्ठिर को आकर सोने के बाण के बारे में सूचना दी। तब भगवान श्री कृष्ण भी वहीं थे। युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से कहा, “हे गोविंद! पितामह के इन तीरों के प्रतिकार हम कैसे करें?” इस बात को सुनकर श्रीकृष्ण युधिष्ठिर संग तुंरत ही अर्जुन के शिविर में पहुंचे और अर्जुन को पूरी घटना बताई। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि “पार्थ! तुम्हे दुर्योधन से उन पांचों बाणों को माँगना होगा।” श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन ने अचंभित हो कर पूछा, “दुर्योधन भला वो तीर मुझे क्यों देगा?” तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्मरण दिलाया कि, ‘एक बार अर्जुन ने दुर्योधन को यक्ष और गंधर्वो के हमले से बचाया था।’

अर्जुन पहुंचा दुर्योधन के पास

‘तब दुर्योधन ने प्रसन्न होकर अर्जुन से कहा था कि “वो कोई भी कीमती चीज दुर्योधन से मांग सकता है।” उस दिन अर्जुन ने बात को टालते हुए दुर्योधन से कुछ नहीं मांगा था। अब वो समय आ गया है।’ अर्जुन को श्रीकृष्ण की बात सुनकर सब स्मरण आ गया। युधिष्ठिर की आज्ञा से अर्जुन दुर्योधन के शिविर में पहुंचे। दुर्योधन अचानक अर्जुन को अपने शिविर में देखकर शशंकित हुआ। अपनी शंका को छुपाते हुए जोर जोर से हंसते हुए दुर्योधन ने अर्जुन से कहा, “आओ अर्जुन आओ! क्षमा मांगने आये हो क्या? तुम्हारे प्रिय पितामह ने जो तुम्हारी सेना के साथ किया उससे भयभीत हो क्या? इस रात्रि में आने का क्या कारण है? बताओ क्या सहायता मांगने आये हो?”

दुर्योधन का वचन 

अर्जुन ने कहा, “भ्राता दुर्योधन! प्राणिपाद! सही समझा अपने मैं आपसे याचना करने ही आया हूँ। परंतु, मेरे मांगने से पहले ही आप उसे देने के लिए विवश है।” दुर्योधन हंसता हुआ बोला, “मैं विवश हूँ अर्जुन? याचक विवश होता है, दाता नही। परंतु, कोई बात नही अबोध अर्जुन! तुम मांगो!” अर्जुन ने दुर्योधन से वह पांच बाण मांगे लेकिन दुर्योधन ने अर्जुन को मना कर दिया। तब अर्जुन ने दुर्योधन को क्षत्रिय धर्म स्मरण कराते हुए उस घटना को बताया। कैसे अपनी प्राण रक्षा के बदले दुर्योधन ने अर्जुन को कोई भी बहुमूल्य वस्तु देने का वचन दिया था? दुर्योधन ने अर्जुन से कहा, “तुम कुछ और मांग लो। मैं यह नही दे सकता।”

दुर्योधन का क्षत्रिय धर्म 

तब अर्जुन ने कहा, “यदि आप अपने वचन को पूरा नही करना चाहते, तो कोई बात नही भ्राता। अब आपके पास कुछ बहुमूल्य है भी तो नही जो मांगा जाए। सामर्थ्य के अभाव में आपको पितामह के बाणों की आवश्यकता भी है। ठीक है! मैं चलता हूँ।” अर्जुन के कटाक्षों से दुविधा में फंसे दुर्योधन ने कहा, “रुको अर्जुन! किसके पास सामर्थ्य नही है? हम सौ हैं। तुम पांच हो।” फिर, ना चाहते हुए भी दुर्योधन ने पांचों बाण  अर्जुन को दे दिए। अर्जुन उन दिव्य बाणों को प्राप्त कर अपने शिविर में आ गए। इस तरह भीष्म से बाण लेने की गलती दुर्योधन पर भारी बहुत पड़ी और पांडवों की मौत टल गई। महाभारत के युद्ध के अंत में पांडवों की जीत हुई|ऐसी ही शिक्षाप्रद पौराणिक कहानियाँ के विडिओ देखने के लिए हमारा चैनल सबस्क्राइब कीजिए .