7.1.26

"हर बात पर क्रोध! शिव के अंशावतार ऋषि दुर्वासा की अद्भुत कथा"




दुर्वासा ऋषि, अत्रि और अनुसूया के पुत्र और भगवान शिव के अंश अवतार थे, जो अपने प्रचंड क्रोध और शक्तिशाली शापों के लिए जाने जाते थे, जिनके कई प्रसिद्ध कथाएँ हैं, जैसे शकुंतला को शाप देना कि उनके पति उन्हें भूल जाएंगे, और इंद्र को श्रीहीन होने का श्राप, और राजा अंबरीश से उनके अहंकार के कारण हुए विवाद की कहानी, जो उनकी तपस्या और शक्ति के साथ-साथ उनके उग्र स्वभाव को दर्शाती हैं।
जन्म और स्वभाव:
जन्म: माना जाता है कि उनका जन्म भगवान शिव के क्रोध से हुआ था, इसलिए वे शिव के अवतार माने जाते हैं।
क्रोध और शक्ति: वे अत्यंत ज्ञानी और तपस्वी थे, लेकिन उनका क्रोध भी उतना ही तीव्र था; उनके शाप कभी व्यर्थ नहीं जाते थे।
प्रसिद्ध कथाएँ:
शकुंतला और राजा दुष्यंत: उन्होंने शकुंतला को शाप दिया कि जिस राजा से उनका प्रेम हुआ, वह उन्हें भूल जाएगा, जो बाद में सच साबित हुआ।
इंद्र को शाप: इंद्र द्वारा दिए गए फूलों की माला को हाथी द्वारा फेंकने पर, दुर्वासा ने इंद्र को श्रीहीन होने और राज्य नष्ट होने का श्राप दिया।
राजा अंबरीश की कथा: राजा अंबरीश ने व्रत के पारण के समय ऋषि को भोजन कराने में देरी की, जिससे क्रोधित होकर दुर्वासा ने उन्हें शाप दिया, लेकिन अंबरीश की भक्ति के कारण अंततः सुदर्शन चक्र ने दुर्वासा का पीछा किया और वे क्षमा याचना करने पर मजबूर हुए।
यदुवंश का नाश: 
महाभारत काल में, दुर्वासा के क्रोध के कारण ही यदुवंश का अंत हुआ, जिससे कृष्ण के वंश का पतन हुआ।
महत्व:
वे वेदों और ऋचाओं के रचयिता भी माने जाते हैं।
उनकी कथाएँ हमें अहंकार, क्रोध और सच्ची भक्ति के महत्व सिखाती हैं, क्योंकि वे देवताओं और मनुष्यों, दोनों को अपने क्रोध से प्रभावित कर सकते थे।

क्रोध की ज्वाला से जन्मा वो ऋषि, जिसने जन्म देने वाले महादेव को भी नहीं बख्शा, दे दिया शाप
Rishi Durvasa: 
भगवान शिव को त्रिदेवों में से एक माना जाता है, जो सृष्टि के विनाशक हैं. उन्हें महादेव, भोलेनाथ, नटराज और कई अन्य नामों से भी जाना जाता है. भगवान शिव को शांत और उग्र दोनों रूपों में पूजा जाता है. आज (25 फरवरी) महाशिवरात्रि का शुभ दिन है. महाशिवरात्रि को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का दिन माना जाता है. महाशिवरात्रि पर कथा एक ऐसे ऋषि की, जिनका जन्म स्वयं भगवान शिव के क्रोध की अग्नि से हुआ. ये थे ऋषि दुर्वासा, जो अपने उग्र स्वभाव और क्रोध के लिए जाने जाते थे



मान्यता है कि जब भगवान शिव ने अपने क्रोध को शांत करने के लिए उसे अग्नि के रूप में प्रकट किया, तो उसी अग्नि से दुर्वासा ऋषि का जन्म हुआ. दुर्वासा ऋषि की तपस्या और ज्ञान असीम थे, लेकिन उनका क्रोध भी उतना ही प्रचंड था. वे अक्सर अपने क्रोध के कारण लोगों को शाप देते थे, और उनके शाप कभी व्यर्थ नहीं जाते थे. एक बार किसी कारणवश, दुर्वासा ऋषि ने स्वयं भगवान शिव को भी शाप दे दिया था. जिस ऋषि का जन्म भगवान शिव के गुस्से से हुआ.
हमारे पुराणों में इसे लेकर काफी रोचक कहानी है. इससे जिन ऋषि दुर्वासा का जन्म हुआ, वो खुद अपने गुस्से के लिए विख्यात रहे. क्योंकि चूंकि ऋषि दुर्वासा शिव के गुस्से की वजह से पैदा हुए थे, इसलिए उन्हें शिव जी का रूप भी माना जाता है. वो खुद शिव के बहुत बड़े भक्त थे. ऋषि दुर्वासा शिव के पुत्र थे, लेकिन उनसे अलग भी थे. भगवान् शिव को मनाना जितना आसान था, ऋषि दुर्वासा को मनाना और खुश करना उतना ही कठिन. हालांकि दोनों का गुस्सा एक जैसा था.
भगवान शिव को भी अपनी गलती का अहसास हुआ. उन्होंने तय किया कि वो अपने गुस्से को ऋषि अत्री की पत्नी अनसुइया के अंदर संचित कर देंगे. देवी अनसुइया के अंदर भगवान शिव के इस भाग से एक बच्चे का जन्म होता है, जिसका नाम दुर्वासा होता है. शिव के गुस्से से जन्मे ऋषि दुर्वासा का स्वभाव उन्ही की तरह बहुत गुस्से वाला और चिड़चिड़ा था.
एक और कथा के अनुसार महर्षि अत्री और उनकी पत्नी अनसुइया की कोई संतान नहीं थी. तब ब्रह्मा जी के कहने पर संतान प्राप्ति के लिए दोनों ने ऋक्षकुल पर्वत पर त्रिदेव की कड़ी तपस्या की. उससे खुश होकर तीनों भगवान उनके सामने आए और उन्हें वरदान दिया कि वो खुद उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे. तब फिर ब्रह्मा जी के रूप में सोम, विष्णु जी के रूप में दत्त और शिव जी के रूप में दुर्वासा का जन्म हुआ.
कालिदास द्वारा लिखित अभिज्ञान शाकुन्तलम् के अनुसार ऋषि दुर्वासा जब शकुंतला के पास पहुंचे तो उन्होंने उन्हें अपने प्रेमी दुष्यंत के खयालों में खोया हुआ पाया. इससे गुस्सा होकर ऋषि ने उन्हें श्राप दिया कि उनका प्रेमी उन्हें भूल जाएगा. इससे शकुंतला की चेतना टूटती है और वो ऋषि से माफी मांगती हैं. तब ऋषि श्राप को थोड़ा कम करते हुए कहते है कि दुष्यंत उन्हें तब पहचानेगा जब वो अपनी दी हुई अंगूठी देखेगा. ऋषि दुर्वासा ने जैसा कहा वैसा ही हुआ. शकुंतला और दुष्यंत के बेटे भरत के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा.
महाभारत में ऐसी बहुत सी कथाएं हैं, जहां ऋषि दुर्वासा से लोगों ने वरदान मांगा. उन्होंने प्रसन्न होकर ऐसा किया भी. कुंती और दुर्वासा से जुड़ी भी एक कहानी है. कुंती जवान थीं, राजा कुंतीभोज ने उन्हें गोद लिया हुआ था. दुर्वासा उनके यहां मेहमान बनकर आए. कुंती ने ऋषि की खूब सेवा की. ऋषि दुर्वासा खुश हुए. जाते वक्त अथर्ववेद मंत्र के बारे में बताया, जिससे कुंती अपने मनचाहे देव से प्रार्थना कर संतान प्राप्त कर सकती थीं. बाद में कुंती ने कई देवों का आह्वान कर उनसे संतान प्राप्ति की
भगवान कृष्ण को भी ऋषि दुर्वासा ने श्राप दिया था जिसके कारण उनकी मृत्यु हुई थी. कुल मिलाकर उनके गुस्से से कोई नहीं बच सका. आमतौर पर लोग उनसे बचकर ही रहते थे कि कहीं उनका सामना ऋषि दुर्वासा से हो ना जाए. क्योंकि उन्हें आशंका रहती थी कि पता नहीं ऋषि दुर्वासा किस बात पर खफा हो जाएं और श्राप दे डालें. क्रोध के साथ-साथ, वे एक महान ज्ञानी और तपस्वी भी थे. उन्होंने कई महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथों की रचना की.
ऋषि दुर्वासा की मृत्यु तपस्या के दौरान स्वयं अपने क्रोध के कारण हुई, जब उन्होंने भगवान शिव के अंश होने के बावजूद अपने ही बनाए हुए एक शक्तिशाली demon (असुर) को नष्ट करने के लिए सुदर्शन चक्र का आह्वान किया, जिससे स्वयं उन्हें ही कष्ट हुआ और अंततः वे समाधिस्थ हो गए, लेकिन कई कथाओं के अनुसार, उन्होंने अपने क्रोध से अपनी पत्नी कंदली और इंद्र को श्राप दिया और बाद में श्रीकृष्ण की मृत्यु का कारण बने श्राप से जुड़े होने के कारण, उनका अंत तपस्या और मोक्ष के माध्यम से हुआ, जहां उन्होंने अपने शरीर का त्याग किया.