21.10.17

लंकापति रावण ने राजा बलि से राम के खिलाफ युद्ध में सहायता क्यों मांगी?


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यह घटना राम-रावण युद्ध के समय की है। इस युद्ध में एक ऐसा भी वक़्त आया जब बेहद शक्तिशाली एवं बलशाली राजा ‘रावण’ भी खुद को कमज़ोर महसूस करने लगा। युद्ध का आगाज़ हो चुका था और एक के बाद एक लंकेश रावण के राक्षस सैनिक मारे जा रहे थे। दूसरी ओर श्रीराम की वानर सेना का नुकसान भी हो रहा था। लेकिन कोई भी परिणाम सामने नहीं आ रहा था।
रावण के कई महान योद्धा मारे जा चुके थे। अब उसे अपनी हार समीप आते हुई दिखाई दे रही थी। लेकिन तभी उसने मन ही मन अहंकार की भावना व्यक्त करते हुए सोचा, “अरे! मैं तो लोकेश्वर हूं। मुझे कोई कैसे हानि पहुंचा सकता है। सभी देव मुझसे भयभीत होते हैं तथा एक दास की भांति मेरी आज्ञा का पालन करते हैं।“
“फिर मुझे कैसे कोई मार सकता है? किसी भी देवता एवं प्राणी में इतनी शक्ति नहीं जो लंकेश्वर का विनाश करने की क्षमता रखता हो।“ अपना सीना चौड़ा करते हुए रावण के मन से निकले यह विचार उसे कुछ सांत्वना देने में सफल हुए। लेकिन अगले ही पल उसे फिर एक चिंता सताने लगी।
उसने सोचा कि यदि किसी कारण से उसे कोई पराजित करने की हालत में पहुंच जाए, तो वह खुद को बचाने के लिए क्या करेगा। उसने सोचा कि ऐसी अवस्था में तो उसे किसी शक्तिशाली राजा की आवश्यकता पड़ेगी। एक ऐसा राजा जो हर क्षेत्र में मजबूत हो तथा उसे सहारा देने की क्षमता रखता हो।
लेकिन ऐसा राजा मिलेगा कहां”, परेशान रावण ने खुद से सवाल किया। वह सोचने लगा कि उसे कोई ऐसा राजा ही सहारा दे सकता है जो उससे भी अधिक बलवान हो। लेकिन दूसरे ही पल उसे यह अहसास हुआ कि समस्त संसार में उससे अधिक बलवान कोई भी नहीं है। ना तो देवों में इतनी ताकत है और ना ही किसी अन्य प्राणी में। अब रावण को किसी ऐसे राजा की तलाश थी जो उससे भी अधिक तेजस्वी हो। तभी उसे ‘राजा बलि ’ का ख्याल आया।
वह सोचने लगा कि राजा बलि ही एकमात्र ऐसे महाराज हैं जिनकी शक्तियों के आगे सब व्यर्थ हैं। वह शूरवीर हैं तथा केवल वही हैं जो रावण को सहारा देने की क्षमता रखते हैं। रावण की तरह ही राजा बलि भी एक राक्षस परिवार से सम्बन्धित थे।
इसीलिए रावण का उनसे जाकर मदद मांगना उसे युक्तियुक्त लगा। लेकिन महाराज बलि का नाम मुख पर आते ही रावण को याद आया कि वे तो इस वक्त ‘सुताल ग्रह’ पर निवास कर रहे होंगे। और यदि वह उनसे मिलना चाहता है तो उसे स्वयं वहां जाना होगा। अगले ही पल रावण ने वहां जाने का फैसला कर लिया।
सुताल लोक पहुंचते ही रावण ने प्रवेशद्वार पर भगवान विष्णु के अवतार ‘वामनदेव’ को महाराज बलि के द्वार रक्षक के रूप में पाया। वामनदेव को देख रावण समझ गया कि हो ना हो वामनदेव उसे भीतर जाकर महाराज बलि से मिलने से जरूर रोकेंगे। इसीलिए उसने उन्हें नजरअंदाज करते हुए अंदर दाखिल होने का प्रयास किया, लेकिन वह असफल हुआ।
जैसे ही रावण ने आगे बढ़ने की कोशिश की तो वामनदेव द्वारा दरवाज़े के आगे गदा रखते हुए ‘ना’ का स्वर निकाला गया। जिसका अर्थ था कि उसे भीतर जाने की आज्ञा प्रदान नहीं की जाएगी। अब रावण समझ गया था कि वामनदेव के रहते हुए वह भीतर जाने का प्रयास भी करे तो व्यर्थ जाएगा। इसीलिए उसने एक सूक्ष्म रूप धारण किया, जिस वजह से कोई भी उसे देख नहीं सकता था।
उसने सोचा कि ऐसा करने से वह द्वार के बीचो-बीच बने छोटे से मार्ग से भीतर चला जाएगा। लेकिन रावण इस बात से अनजान था कि वह कितना भी प्रयास कर ले, वामनदेव की दृष्टि से नहीं बच सकता। वामनदेव ने रावण के सामने उसकी सूक्ष्म अवस्था से खुद को अनजान होने का नाटक किया, जिसका फायदा उठाकर रावण करीब-करीब द्वार के निकट आ गया था कि तभी वामनदेव का पांव रावण के ऊपर पड़ गया। रावण चिल्ला रहा था, उसे कहीं से भी सांस नहीं मिल रही थी। उसके श्वास खत्म हो रहे थे।
लेकिन यहां पर रावण चिल्ला रहा था और किसी प्रकार से बाहर निकलना चाहता था। अब वामनदेव समझ गए थे कि रावण का दंड पूरा हो चुका है इसीलिए उन्होंने रावण को छोड़ दिया और भीतर जाने दिया। भीतर पहुंचते ही रावण अपने पूर्ण स्वरूप में आ गया और बाहर जो कुछ ही हुआ उसे भुलाते हुए महाराज बलि को प्रणाम किया और बोला, “महाराज की जय हो! मैं यहां आपके समक्ष एक निवेदन लेकर आया हूं।“
रावण को देख राजा बलि कुछ चकित हुए लेकिन फिर उससे उसके आने का कारण पूछा तो वह बोला, “महाराज। इस पूरे विश्व में ऐसा कोई नहीं जो त्रिलोकेश्वर रावण की रक्षा कर सके। केवल आप ही मेरी सहायता कर सकते हैं।“ राजा बलि रावण की बात ध्यान से सुन ही रहे थे कि बीच में बोले, “एक बात बताओ। तुम भीतर कैसे आए? क्या तुम्हे द्वार पर वामनदेव ने नहीं रोका?
“नहीं, वामनदेव में इतना साहस कहां कि वो मुझे रोक सके”, अहंकारी रावण ने जवाब दिया। लेकिन राजा बलि बोले, “नहीं लंकेश्वर! वामनदेव ने तुम्हें रोका था लेकिन फिर तुम्हारी कराह सुनकर दयावान होकर उसने तुम्हें भीतर आने दिया।“
यह सुन रावन अपना क्रोध रोक ना सका और बोला, “दया? वो भी मुझ पर महाराज? समस्त संसार में ऐसा कोई नहीं है जो मुझ जैसे सर्वोच्च देव पर दयावान होने का साहस कर सके।“ रावण के मुख से सर्वोच्च देव नामावली सुनते ही राजा उठ खड़े हुए और बोले, “क्या कहा तुमने? सर्वोच्च देव! किसने कहां तुमसे कि तुम सर्वोच्च देवता हो। और ऐसा कौन सा सर्वोच्च देवता है जो मुझसे मदद मांगने आया है। यदि तुम मुझसे मदद चाहते हो तो सर्वोच्च देव तो मैं ही हुआ।“
रावण अब कुछ लज्जित महसूस करने लगा लेकिन उसने राजा बलि से अनुरोध किया कि कृपा करके वे उसकी मदद करें। तब राजा बलि ने आंखें बंद की और ध्यान लगाया। उन्होंने बंद आंखों से देखा कि दशरथ पुत्र श्रीराम अपनी पत्नी सीता को रावण के चंगुल से आज़ाद करने के लिए उससे युद्ध लड़ने आए हैं। और इसी वजह से रावण उनके पास मदद की गुहार लेकर आया है। राजा ने आंखें खोली और रावण से कहा, “रावण! तुम श्रीराम की पत्नी सीता को छोड़ दो। यही तुम्हारे लिए उचित होगा।“
इस पर रावण को क्रोध आया और वह बोला, “नहीं! मैं नहीं छोड़ूंगा। कोई मेरा क्या नुकसान कर लेगा। और मैं क्यों सीता को छोड़ दूं? उसे आज़ाद कराने के लिए कुछ वानर ही तो आए हैं। मैं उन सबका विनाश कर दूंगा।“ रावण की मूर्खता पर हंसते हुए राजा बलि बोले, “कुछ वानर? यह वही वानर हैं जिसमें से केवल एक ने ही तुम्हारी लंका नगरी अपनी पूंछ के सहारे भस्म कर दी। दूसरे वानर का तुम पांव का अंगूठा तक ना हिला सके। और तीसरा वानर भी तुम्हारा काफी नुकसान कर गया। और तुम कहते हो कुछ वानर? सुनो रावण, यह वानर तो अभी केवल संदेश लेकर तुम्हारे पास आए थे, सोचो अगर ये युद्ध के मकसद से आते तो तुम्हारा क्या हश्र होता!”
“इससे भी बड़ी बात यह है कि तुम्हारा अपना अनुज, विभीषण भी श्रीराम के हित में युद्ध लड़ रहा है। वह तुम्हारे घर का भेदी बनकर तुम्हारे विरुद्ध खड़ा है। इस प्रकार से तुम कभी युद्ध जीत नहीं पाओगे। इसीलिए सीता को श्रीराम को वापस करना ही तुम्हारी भलाई है”। लेकिन रावण मानने के लिए तैयार ही नहीं था जिस पर राजा बलि ने उसकी मदद करने का फैसला किया लेकिन एक शर्त पर।
वह उसे एक खुले मैदान में ले गया जहां एक विशाल पहाड़ था। यह पहाड़ सोने तथा हीरे से भरा था। पहाड़ को देखते ही रावण की आंखें चौंधिया गईं और वह बोला, “अत्यंत सुंदर। महाराज, आपको यह भव्य पर्वत किसने दिया? यह तो सोने से बना हुआ है जिस पर हीरे जड़े हुए हैं।“
रावण के प्रश्न के उत्तर में राजा बलि ने उससे कहा कि यह उन्हें किसने दिया इससे उसे कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए। वह बस अपने बल से इस विशाल पहाड़ को उठाकर दिखाए। यदि वह ऐसा कर लेता है तो राजा उसे युद्ध में जीतने के लिए मदद करेंगे। खुद को बेहद शक्तिशाली मानने वाला रावण आगे बढ़ा और उसने पर्वत उठाने का साहस किया लेकिन पर्वत उठा सकना तो दूर रावण उसे हिलाने में भी असमर्थ रहा।
इस पर राजा बलि ने रावण को पर्वत छोड़ पीछे आने को कहा और आग्रह किया कि वह पर्वत को ध्यान से देखकर बताए कि वह कैसा लगता है। तब रावण बोला कि यह तो किसी के कानों की बाली (या झुमका) के प्रकार का लगता है जो सोने से बनी है और उस पर हीरे जड़े हुए हैं।
“बिल्कुल सही कहा तुमने। वास्तव में यह बाली हिरण्यरकश्यप की थी। भगवान नृसिंह से युद्ध करते हुए उनकी यह बाली स्वर्गलोक से धरती पर आ गिरी थी। उस जन्म में तुम ही हिरण्यहकश्यप थे। यह तुम्हारी ही बाली थी जिसे तुम पहनते थे और देखो आज तुम इसे उठा भी नहीं पा रहे हो”, रावण को असलियत से रूबरू कराते हुए राजा बलि बोले।
वे आगे बोले, “इससे तुम अनुमान लगा सकते हो कि तुम्हारी ताकत कितनी कम हो गई है। उस जन्म में नृसिंह भगवान विष्णु के रूप थे और आज भी विष्णुजी के ही रूप श्रीराम तुम्हारा वध करने आए हैं, और उनसे तुम्हें कोई नहीं बचा सकता।“ इस प्रकार से राजा बलि ने रावण को चेतावनी तो दी लेकिन वह कुछ भी समझ ना सका और चुपचाप वहां से वापस चला गया।
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17.10.17

गायत्री उत्पत्ति की कथा





पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्री वह शक्ति केन्द्र है जिसके अंतर्गत विश्व के सभी दैविक, दैहिक, भौतिक छोटे-बड़े शक्ति तत्व अपनी-अपनी क्षमता और सीमा के अनुसार संसार के विभिन्न कार्यों का सम्पादन करते हैं। इन्हीं का नाम देवता है। ये ईश्वरीय सत्ता के अंतर्गत उसी के अंश रूपी इकाइयाँ हैं जो सृष्टि संचालन के विशाल कार्यक्रम में अपना सहभागिता करते रहते हैं। जिस प्रकार एक शासन-तंत्र के अंतर्गत अनेकों अधिकारी अपनी-अपनी जिम्मेदारी निबाहते हुए सरकार का कार्य संचालन करते हैं, जिस प्रकार एक मशीन के अनेकों पुर्जे अपने-अपने स्थान पर अपने-अपने क्रिया कलापों को जारी रखते हुए उस मशीन की प्रक्रिया सफल बनाते हैं, उसी प्रकार यह देव तत्व भी ईश्वरीय सृष्टि व्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की विधि -व्यवस्था का सम्पादन करते हैं।
गायत्री एक सरकार एवं मशीन के सदृश है जिसके अंग प्रत्यंगों के रूप में सभी देवता गुँथे हुए हैं। गायत्री के तीन अक्षर सत, रज, तम, तीन तत्वों के प्रतीक हैं। इन्हीं को स्थिति के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, महेश-सरस्वती, लक्ष्मी, काली कहते हैं। इन्हीं तीन श्रेणियों में विश्व की सभी स्थूल एवं सूक्ष्म शक्तियों की गणना होती हैं। जितनी भी शुभ-अशुभ, उपयोगी ,अनुपयोगी, शान्ति-अशाँति की प्रक्रियाएं दृष्टिगोचर होती हैं वे इन्हीं सत, रज, तम तत्वों के अंतर्गत हैं और यह तीन तत्व गायत्री के तीन चरण हैं। इस प्रकार समस्त शक्ति तत्वों का मूल आधार गायत्री ही ठहरती है।
ब्रह्मा, इस विशाल सृष्टि का मूल कारण तो अवश्य है पर स्वभावतः साक्षी दृष्टा के रूप में स्थित रहता हुआ स्वयं अपने आप में निष्क्रिय है। उसकी ‘गतिशीलता’ ही वह तत्व है जिसके द्वारा जगत के स्थूल और सूक्ष्म विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न होते हैं। इस गतिशीलता को ही प्रकृति, माया, चेतना, ब्रह्मपत्नी आदि नामों से पुकारा गया है। यही गायत्री है।
परमात्मा की कार्यकर्त्री देव शक्ति
सृष्टि का आरम्भ करते हुए परमात्मा ने अपने भीतर से जो शक्ति तत्व प्रादुर्भूत किया और सृष्टि संचालन की सार व्यवस्था उसे सौंप कर स्वयं निश्चित हो गया। इस प्रकार वह ब्रह्म निर्लिप्त, निरधिष्ठ, निरवद्य एवं अव्यय बना रहा और संसार का सारा कार्य उस प्रादुर्भूत शक्ति तत्व के द्वारा संचालित होने लगा। इस रहस्य का उद्घाटन 
वृहवृचोपनिषद के एक   श्लोक  में होता है जिसका भावार्थ है 

सृष्टि के आरम्भ में वह एक ही देवी शक्ति थी। उसी ने यह ब्रह्माण्ड बनाया। उसी से ब्रह्मा उपजे। उसी ने विष्णु, रुद्र उत्पन्न किये। सब कुछ उसी से उत्पन्न हुआ। ऐसी है वह पराशक्ति।
निर्दोषो निरधिष्ठेयो निरवद्यसनातनः।
सर्वकार्यकरी साहं विष्णोरव्यय रुपिणः॥
-लक्ष्मीतंत्र
वह ब्रह्म तो निर्दोष, निरधिष्ठ, निरवद्य, सनातन अव्यय है। उनकी सर्व कार्यकारिणी शक्ति तो मैं ही हूँ।
इस महाशक्ति की सर्व व्यापकता का, सभी पदार्थों की अधिष्ठात्री विभूति, एवं सभी हलचल की मूल प्रेरिका होने का वर्णन अनेक ग्रन्थों में मिलता है। देखिए-
स्वं भूमि सर्व भूतानाँ प्राणः प्राणवताँ तथा। धीः श्रीः कान्तिः क्षमा शान्ति श्रद्धा मेधा धृतिः स्मृतिः स्व मुद्गीथेऽघ्धं मात्रासि गायत्री व्याहृति स्तथा। -
देवी. भा. 1-5
तुम्हीं सब प्राणियों को धारण करने वाली भूमि हो। प्राणवानों में प्राण हो। तुम्हीं धी, श्री, कान्ति, क्षमा, शान्ति, श्रद्धा, मेधा, घृति, स्मृति हो तुम ही ओंकार की अर्धयात्रा उद्गीथ हो, तुम ही गायत्री व्याहृति हो।
पूषार्यम मरुत्वाँश्च ऋषयोऽपि मुनीश्वराः। पितरोनागयक्षाश्च् गन्धर्वाप्सरसा गणाः॥
ऋगयजु सामवेदाश्च अथर्वांिगरसानि च।
त्वमेव पञ्च भूतानि तत्वानि जगदीश्वरि॥
ब्राह्यी सरस्वती सन्ध्या तुरीया त्वं महेश्वरी।
त्वमेव सर्व शास्त्राणि त्वमेव सर्व संहिता।
पुराणानि च तंत्राणि महागम मतानि च॥
तत्सद् ब्रह्म स्वरूपा त्वं किञ्चित्सद सदात्मिका। परात्वरेशी गायत्री नमस्ते मातरम्यिके॥
-वशिष्ठ संहिता
पूषा, अर्यमा, मरुत, ऋषि, मुनीश्वर, पितर, नाग, यज्ञ, गंधर्व, अप्सरा, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, अंगिरस, पंचभूत, ब्राह्मी, सरस्वती एवं संध्या -हे महेश्वरी तुम ही हो। सर्व शास्त्र, संहिता, पुराण, तंत्र, आगम, निगम तथा और भी जो कुछ इस संसार में है सो हे ब्रह्मरूपिणी, पराशक्ति गायत्री तुम ही हो। हे माता तुम्हें प्रणाम है।
आदित्य देवा गन्धर्वा मनुष्याः पितरो सुराः तेषाँ सर्व भूतानाँ माता मेदिनी माता मही सावित्री गायत्री जगत्युर्वी पृथ्वी बहुला विद्या भूता।
-नारायणोपनिषद्
अर्थात्-देव, गंधर्व, मनुष्य, पितर, असुर इनका मूल कारण अदिति अविनाशी तत्व है। वह अदिति सब भूतों की माता मोदिनी और माता सही है। उसी विशाल गायत्री के गर्भ में विश्व के सम्पूर्ण प्राणी निवास करते हैं।
परमात्मास्तु या लोके ब्रह्मशक्ति र्विराजते।
सूक्ष्मा च सात्विकी चैव गायत्री त्यमिधीयते।
अर्थात्- सब लोकों में विद्यमान जो सर्वव्यापक परमात्मा की शक्ति है वह अत्यन्त सूक्ष्म एवं सतोगुणी प्रकृति में निवास करती है। यह चेतन शक्ति गायत्री ही हैं।
अहं रुद्रोभिर्वसुभिञ्चराम्यहमादित्यैरुत विश्व देवैः। अहं मित्रावरुणोभाविभर्ग्य हमिन्द्राग्नी अहिमश्वि नोभा।
- ऋग्वेद 8।7।11
मैं ही रुद्र, वसु, आदित्य और विश्वेदेवों में विचरण करती हूँ। मैं ही मित्र, वरुण, इन्द्र, अग्नि और अश्विनी कुमारों का रूप धारण करती हूँ।
मया से अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणितिय ई श्रृणोत्युक्तम्। अमन्त वो माँ त उप क्षियन्ति श्रधि श्रुत श्रद्धि वं ते वदामि।
यह विश्व मुझ से ही जीवित है। मेरे द्वारा ही उसे अन्न मिलता है। मेरी शक्ति से ही वह बोलता और सुनता है। जो मेरी उपेक्षा करता है वह नष्ट हो जाता है। श्रद्धावानों, सुनो। यह सब मैं तुम्हारे ही कल्याण के लिए कहती हूँ।
विभूतियों का भण्डागार
इस महाशक्ति का विस्तार अत्यन्त व्यापक है जब समस्त सृष्टि की अगणित प्रक्रियाओं का संचालन उसी के द्वारा होता है तो कितने प्रकार की शक्तियाँ उसके अंतर्गत काम करती होंगी, इसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है। पर मनुष्य सीमित है। उसकी आवश्यकतायें एवं आशंकायें भी सीमित हैं, जिन वस्तुओं को प्राप्त करके उसका व्यक्तित्व निखर उठता है एवं मन उल्लसित हो जाता है वे विभूतियाँ भी सीमित हैं। यह सीमित वस्तुएं गायत्री का एक बहुत छोटा अंशमात्र है। मनुष्यों में जो कुछ प्रशंसनीय एवं आकर्षक विशेषतायें दिखाई पड़ती है उन सबको उस महाशक्ति को छोटा सा प्रसाद हो समझना चाहिए। मानव शरीर में वह शक्ति किन प्रमुख रूपों में अधिष्ठित है इसका परिचय देते हुए माता स्वयं कहती है :-
अहं बुद्धि रहं श्रीश्च् धृतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा।
श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा॥
कान्तिः शान्तिः पिपासा च निद्रा तन्द्रा जरा जरा। 

विद्याविद्या स्पृहा वाँछा शक्ति श्चाशक्ति रेवच॥
वसा मज्जा च त्वक चाहं दृष्टिर्वागनृता ऋता।
परामध्या च पश्यन्ती नाडयेऽहं विविधाश्च् याः॥
किं नाहं पश्य संसारे मद्वियुक्तं किमस्ति हि।
सर्वमेवाहभित्येव निश्च्यं विद्धि पद्मज।
मैं क्या नहीं हूँ? इस संसार में मेरे सिवाय और कुछ नहीं है। बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शाँति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वांछा, शक्ति, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि, असत और संत वाणी, परा, मध्यमा, पश्यन्ती, नाड़ी संस्थान आदि निश्चय ही सब कुछ मैं हूँ।
अहमेक स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः। यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृर्षिं तं सुमेधा।
मैं तत्वज्ञान का उपदेश करती हूँ। मैं जिसे चाहती हूँ उसे समुन्नत करती हूँ, उसे सुबुद्धि देती हूँ ऋषि बनाती हूँ और ब्रह्मपद प्रदान करती हूँ।
रहस्यों का जानना आवश्यक है
गायत्री तत्व के सूक्ष्म रहस्यों को जानने के उपरान्त ही उसकी उपासना वास्तविक रूप में होना संभव है। उसके मर्म विज्ञान को समझो बिना साधारण रीति से जो उपासना क्रम चलाया जाता है, उसका परिणाम तो होता है पर उसकी मात्रा स्वल्प ही होती है। उपासना का समुचित सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए इस विज्ञान के रहस्यों को समझना और उनका अनुशीलन करना आवश्यक है। मनुष्य की आत्मा पर चढ़े हुए मल, विक्षेप आवरणों को हटाने के लिए जैसी तीव्र साधना एवं गहन निष्ठा की आवश्यकता है उसको उपलब्ध करने के गायत्री के तत्वज्ञान को समझना चाहिए।
शतपथ ब्राह्मण में एक आख्यायिका आती है जिसमें यह बताने का प्रयत्न किया गया है कि पुरोहित गायत्री के मर्म से वंचित रहने के कारण साधारण उपासना करते रहने पर भी समुचित परिणाम प्राप्त न कर सका। आख्यायिका इस प्रकार है :-
एतर्द्धव तज्जनको द्यैदेही बुडिल माश्वतं राश्वि भुवाच यन्नु हो तदगायत्री विदव्रू था ऽअथकथœहस्ती भूतोव्वह सीति मुखंहास्या सम्राशन विवाञ्चकरेति हो वाच। तस्या ऽग्निरेव मुखं यदि हवाऽअपि वह्विवाग्ना वभ्यादघति सर्वमेव तत्सन्द हत्येव वœ है वैव विद्यद्यपि वह्विव सर्व मेव सत्संरसा शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः संभवति। -शतपथ
अर्थात्-”राजा जनक का पूर्व जन्म का पुरोहित बुडिल अनुचित दान लेने के पाप से मर कर हाथी बन गया। किन्तु राजा जनक ने विज्ञान तप किया और उसके फल से वह पुनः राजा हुआ। राजा ने हाथी को उसके पूर्व जन्म का स्मरण दिलाते हुए कहा-आप तो पूर्व जन्म में कहा करते थे कि मैं गायत्री का ज्ञाता हूँ। फिर अब हाथी बन कर क्यों बोझ ढोते हो? हाथी ने कहा मैं पूर्व जन्म में गायत्री का मुख नहीं समझ पाया था इसीलिये मेरे पाप नष्ट न हो सके।”
“गायत्री का प्रधान अंग मुख अग्नि ही है जैसे जो ईंधन डाले जाते हैं उन्हें अग्नि भस्म कर देती है वैसे ही गायत्री का मुख जानने वाले आत्मा अग्नि मुख होकर पापों से छुटकारा प्राप्त कर अजर अमर हो जाता है।”
गायत्री के जिस मुख को ऊपर की पंक्तियों में वर्णन है वह उसका प्रवेश द्वार-आरम्भिक ज्ञान है। जिस प्रकार भोजन को पेट में पहुँचाने के लिए मुख ही उसका प्रारम्भिक प्रवेश द्वार होता है उसी प्रकार उपासना का मुख यह है कि उपास्य के बारे में आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया जाय? यह ज्ञान ग्रन्थों के स्वाध्याय द्वारा एवं उस विद्या के विशेषज्ञों के सत्संग से जाना जा सकता है। यह दोनों ही माध्यम प्रत्येक सच्चे जिज्ञासु को अनिवार्यतः अपनाने चाहिए।
गायत्री ज्ञान-विज्ञान की महत्ता बताते हुए उपनिषद्कार ने बताया है कि ज्ञानपूर्वक की हुई उपासना से आत्मा में सन्निहित दिव्य तत्वों का विकास होता है और इस जीवन तथा संसार में जो कुछ प्राप्त होने योग्य है वह सभी कुछ उसे प्राप्त हो जाता है।
यो ह वा एवं चित् स ब्रह्म वित्पुण्याँ च कीर्ति लभते सुरभींश्च् गन्वान्। सोऽपहत पाप्मानन्ताँ श्रिय मश्नुतेय एवं वेद, यश्चौवं विद्वानेवमेत वेदानाँ मातरं सावित्री सम्पदभुपनिषद मुपास्त इति ब्राह्मणम्।
- गायत्री उपनिषद्
जो इस प्रकार वेदमाता गायत्री को जान लेता है वह ब्रह्मवित्, पुण्य, कीर्ति एवं दिव्य गन्धों को प्राप्त करता है और निष्पाप होकर श्रेय का अधिकारी बनता है
तीन चरणों की अनन्त सामर्थ्य
गायत्री को त्रिपदा कहा गया है, उसके तीन चरण हैं। इनमें से प्रत्येक चरण तीन लोकान्तरों तक फैला हुआ है। उसके माध्यम से आत्मा की गति केवल इसी लोक तक सीमित नहीं रहती वरन् वह अन्य लोकों तक अपना क्षेत्र विस्तृत कर सकता है और वहाँ उपलब्ध साधनों से लाभान्वित हो सकता है।
भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टा व क्षराण्यष्टाक्षर हवा एवं गायत्र्यै पद मेतदुहैवास्या एतत्सयावेदतेषु लोकेषु तावद्धि जर्यात योऽस्याएतदेवं पदं वेद।
वृहदारण्यक 5।14।1
भूमि, अन्तरिक्ष, द्यौ ये तीनों गायत्री के प्रथम पाद के आठ अक्षरों के बराबर हैं। जो गायत्री के इस प्रथम पाद को जान लेता है सो तीनों लोकों को जीत लेता है।
जिस प्रकार बाह्य जगत में अनेकों लोक हैं उसी प्रकार इस शरीर के भीतर भी सप्त प्राण, षट्चक्र ग्रन्थियाँ, उपत्यिकाएं मौजूद हैं। साधारण मनुष्यों में यह प्रसुप्त अवस्था में अज्ञात पड़े रहते हैं, पर जब गायत्री उपासना द्वारा जागृत आत्मा इन अविज्ञात शक्ति केन्द्रों को झकझोरता है तो वे भी जागृत हो जाती हैं और उनके भीतर जो आश्चर्यजनक तत्व भरे पड़े हैं वे स्पष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार वैज्ञानिक लोग, इस ब्रह्माण्ड में बाह्य जगत में व्याप्त अनेक शक्तियों को ढूँढ़ते और उनका उपयोग करते हैं उसी प्रकार आत्म विज्ञानी साधक पिण्ड में देह में अंतर्जगत में सन्निहित तत्वों का साक्षात्कार करके उनकी दिव्य शक्तियों से लाभान्वित होते हैं। आत्म-दर्शन ब्रह्म साक्षात्कार एवं स्वर्ग लोक की प्राप्ति उनके लिए सरल हो जाती है। इस मार्ग में सफलता प्राप्त करने वाले अपनी परम्परा को आगे जारी रखने वाले कोई तेजस्वी उत्तराधिकारी भी अपने पीछे के लिए छोड़ जाते हैं।
तेवाएते पञ्च ब्रह्म पुरुषा स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपालस्य एतानेकं पञ्च ब्रह्म पुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाल वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्ग लोकम्। - छांदोग्य. 3।13।6
हृदय चैतन्य ज्योति गायत्री रूप ब्रह्म के प्राप्ति स्थान के प्राण, व्यान, अपान, समान, उदान ये पाँच द्वारपाल हैं। इनको वश में करे। जिससे हृदय स्थित गायत्री स्वरूप ब्रह्मा की प्राप्ति हो। इस प्रकार उपासना करने वाला स्वर्ग लोक को प्राप्त होता है और उसके कुल में वीर पुत्र या शिष्य उत्पन्न होता है
गायत्री का व्याख्या विस्तार
गायत्री महामंत्र के 24 अक्षरों में इतना ज्ञान विज्ञान भरा हुआ है कि उसका अन्वेषण करने से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। ब्रह्माजी ने गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप चार मुखों से चार वेदों का वर्णन किया। महर्षि वाल्मीक ने अपनी वाल्मीक रामायण की रचना करते हुए एक-एक हजार श्लोकों के बाद क्रमशः गायत्री के एक-एक अक्षर से आरम्भ होने वाले श्लोक बनाये। इस प्रकार वाल्मीक रामायण में प्रत्येक एक हजार श्लोकों के बाद गायत्री के एक अक्षर का सम्पुट लगा हुआ है। महर्षि वाल्मीक गायत्री के महत्व को जानते थे उन्होंने अपने महाकाव्य में इस प्रकार का सम्पुट लगाकर अपने ग्रन्थ की महत्ता में और भी अधिक अभिवृद्धि कर ली।
श्रीमद्भागवत पुराण की भी गायत्री महामन्त्र की व्याख्या स्वरूप ही रचना हुई। श्रीहरि टीका में इस रहस्य को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है।
सत्यं परं धीमहि-तं धीमहि इति गायत्र्या प्रारम्भेण गायत्र्याख्या ब्रह्मविद्या रूपभेत्पुराण इति। - श्री धरी
वेद व्यास जी ने गायत्री प्रतिपाद्य सत्यं परं धीमहि तत्व में ही भागवत का प्रारम्भ मूल है। गायत्री के ही दो अक्षरों की व्याख्या में एक-एक स्कंध बनाकर 12 स्कंध पूरे किये हैं।
देवी भागवत पुराण के संबंध में भी यही मान्यता है कि उसकी रचना गायत्री मंत्र के अक्षरों में निहित तत्वों का उद्घाटन करने के लिए ही की गई है। मत्स्य पुराण में इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख है।
यत्राधिकृत्य गायत्रीं वर्ण्यन्ते धर्म विस्तरः। वृत्रासुरवधोपेतं तद् भागवत मुच्यते।
मत्स्य पुराण 53। 20
जिसमें गायत्री के माध्यम से धर्म का विस्तारपूर्वक वर्णन है। जिसमें वृत्तासुर वध का वृत्तांत है, वह भागवत ही कही जाती है।
देवी भागवत पुराण का आरम्भ गायत्री के रहस्योद्घान के रूप में ही होता है
ॐ सर्व चैतन्य रूपाँ तामाद्याँ विद्याँ च धीमहि। बुद्धिर्योनः प्रचोदयात्।
-देवी भागवत
जो आदि अन्त रहित, सर्व चैतन्य स्वरूप वाली, ब्रह्म विद्या स्वरूपिणी आदि शक्ति है उसका हम ध्यान करते हैं। वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।
देवी भागवत, बारहवें स्कंध के अन्त में समाप्ति का श्लोक भी गायत्री तत्व के संपुट के साथ पूर्ण हुआ है।
सच्चिदानन्द रूपाँ ताँ गायत्री प्रतिपिदताम्।
नमामि ह्नीं मयीं देवी धियो योनः प्रचोदयात्।
उन ह्नीं मयी सच्चिदानन्द स्वरूपा गायत्री शक्ति को प्रणाम है। वे हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।
चारों वेद, वाल्मीक रामायण, श्रीमद्भागवत देवी भागवत ही नहीं न जाने कितने बड़े ज्ञान के भण्डार का प्रणयन-गायत्री के आधार पर हुआ वस्तुतः भारतीय धर्म को सारा ज्ञान-विज्ञान गायत्री रूपी सूर्य के सामने छोटे बड़े ग्रह उपग्रहों के रूप में भ्रमण करता है।
मंगलमयी मधु विद्या
वृहदारण्यक उपनिषद् में जिस मधु विद्या का विस्तारपूर्वक वर्णन कि या गया है उसका सम्बन्ध गायत्री से ही है। जिस प्रकार पारस मणि के स्पर्श से लोहे के टुकड़ों का ढेर भी सोना हो जाता है। उसी प्रकार इस संसार की अनेकों कड़ुई, कुरूप, कष्टदायक, प्रतिकूल वस्तुएँ तथा परिस्थितियों की उसके लिये मधुर, सौंदर्ययुक्त, सुखदायक व अनुकूल बन जाती है।
गायत्री के तीनों चरण समस्त सृष्टि को अपने लिए आनन्दपूर्ण मधुमय बना देने की शक्ति से परिपूर्ण है। नदियों को जल पूर्ण, समुद्र को रत्न पूर्ण और औषधि वनस्पतियों को जीवनी शक्ति से परिपूर्ण गायत्री का प्रथम चरण बनाता है। रात्रि और दिन किसी प्रकृति विपरीतता से तूफान, भूचाल अतिवृष्टि शीतोष्ण की अधिकता जैसी विकृतियों से बचकर हितकर वातावरण से आनन्दमय से पृथ्वी के परमाणु पर्याप्त मात्रा में अन्न, धातु, खनिज, रस, रत्न आदि प्रदान करते रहें तथा द्युलोक की मंगलमयी किरणें पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहें ऐसी शक्ति गायत्री के दूसरे चरण में है। गायत्री का तीसरा चरण सूर्य की उत्पादक प्रेरक एवं विकासोन्मुख शक्तियों को नियंत्रित एवं आवश्यक मात्रा में पृथ्वी पर आह्वान करता है। न तो सूर्य की शक्ति किरणें पृथ्वी पर इतनी अधिक आयें कि ताप से जीवन रस जले और न उसकी इतनी न्यूनता हो कि विकास क्रम में बाधा पड़े। चूंकि वनस्पतियाँ जीव जन्तु एवं जड़-चेतन सभी अपना जीवन तत्व सूर्य से प्राप्त करते हैं। मानव प्राणी की चेतना एवं विशेष प्राण क्षमता भी सूर्य पर ही अवलम्बित है। इस विश्व प्रसविता-सविता पर गायत्री का तीसरा चरण नियंत्रण स्थापित करता है, इसलिये सृष्टि के समस्त संतुलन को गायत्री शक्ति के आधार पर स्थिर रख सकना संभव हो सकता है।
गायत्री में आध्यात्म तत्व तो प्रधान-रूप से है ही, वह आत्मबल और अंतर्जगत की अगणित सूक्ष्म शक्तियों को विकसित करके मनुष्य को इस पृथ्वी तल को देवता तो बना ही सकता है, साथ ही स्थूल सृष्टि में काम करने वाली सभी भौतिक शक्तियों पर भी उसका नियंत्रण है। इस विकास को प्राचीन काल में जब आत्मदर्शी लोग जानते थे तब वे इस संसार की ही नहीं अन्य लोकों की स्थिति भी शान्तिमय, मधुरिमा से पूर्ण बनाये रख सकने में समर्थ थे। भारतवर्ष का यही महान विज्ञान किसी समय उसे अत्याधिक ऊँची सम्मानास्पद स्थिति में रखे हुए था। आज इसी को खोकर हम मणिहीन सर्प की तरह दीन-हीन एवं परमुखापेक्षी बने हुए है। गायत्री में सन्निहित मधु विद्या का उपनिषदों का वर्णन इस प्रकार है :-
तत्सवितुर्वरेण्यम्। मधु वाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः। भूः स्वाहा भर्गो देवस्य धीमहि। मधुनक्त मतोषसो मधुमत्यार्थिव रजः। मधुद्यौरस्तु नः पिता। भुवः स्वाहा। धियो योनः प्रचोदयात्। मधु मान्नो वनस्पतिमधु मा œ अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः। स्वः स्वाहा। सर्वाश्च मधुमती रहभेवेद œ सर्वभूयाँसं भूर्भुवः स्वः स्वाहा।
-वृहदारण्यक 6। 3 । 6
-(तत्सवितुर्वरेण्यं) मधुर वायु चले, नदी और समुद्र रसमय होकर रहें। औषधियाँ हमारे लिये सुखदायक हों।
-(भर्गो देवस्य धीमहि) रात्रि और दिन हमारे लिये सुखकारी हों, पृथ्वी की रज हमारे लिये मंगलमय हो। भू-लोक हमें सुख प्रदान करे।
-(धियो योनः प्रचोदयात्) वनस्पतियाँ हमारे लिए रसमयी हो। सूर्य हमारे लिये सुखप्रद हो। उसकी रश्मियाँ हमारे लिये कल्याणकारी हों। सब हमारे लिये सुखप्रद हों। मैं सबके लिए मधुर बन जाऊँ।
अंतर्जगत के गुप्त तत्व
मनुष्य के अंतर्जगत में तो विलक्षण शक्तियाँ भरी हुई है, उनका जागरण भी गायत्री महामंत्र द्वारा ही संभव है। इस महामंत्र का एक-एक अक्षर शक्ति बीज है। इन शक्ति बीजों के स्पर्श से शरीर में अवस्थित प्रधान षटचक्रों एवं अठारह उपचक्रों का इस प्रकार कुल 24 चक्रों का जागरण गायत्री उपासना से होता है। इन रत्न भण्डार सरीखे चक्र उपचक्रों में से प्रत्येक में ये शक्तियाँ और सिद्धियाँ भरी हुई हैं जिन्हें प्राचीन काल में ऋषि मुनि प्राप्त करके अपने को ईश्वरीय तत्वों का अधिकारी-उत्तराधिकारी बनाये हुए थे। इसका प्रमाण इस प्रकार मिलता है :-
चतुर्विशाँक्षरी विद्या पर तत्व विनिर्मिता।
तत्कारात् यातकार पर्यन्त शब्द ब्रह्मत्वरूपिणी।
-गायत्री तत्र
अर्थात्-’तत्’ शब्द से लेकर प्रचोदयात् शब्द पर्यन्त 24 अक्षरों वाली गायत्री पर तत्व अर्थात् पराविद्या से ओत-प्रोत है।
गायत्री के 24 अक्षरों में से प्रत्येक अक्षर शरीर में काम करने वाले प्रधान तत्वों में से एक-एक का प्रतिनिधि है। महामंत्र के 24 अक्षर किन-किन 24 महातत्त्वों से संबंधित है इसका वर्णन निम्न प्रमाण में देखिये :-
कर्मन्द्रियाणि पंचैव पंच बुद्धीन्द्रियाणि च।

पंच पंचेन्द्रियार्थश्य भूतानाँचैव पंचकम्॥ मनोबुद्धिस्तथात्माच अव्यक्तं च यदुत्तमम्। चतुविशत्यथैतानि गायत्र्या अक्षराणितु।
-योगी याज्ञवलक्य
अर्थात्- पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच तत्व, पाँच तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, आत्मा तथा परमात्मा यह चौबीस शक्तियाँ गायत्री के चौबीस अक्षरों में समाई हुई है।
यद्यपि यह शक्ति निराकार है, फिर भी उससे सम्बन्ध स्थापित करने आकर्षित करने अपने अन्दर धारण करने के लिये जो उपासना की जाती है वह निराकार रूप में संभव नहीं इसलिये उसके रूप की कल्पना करनी पड़ती है।
अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य निगुर्णस्य गुणात्मनः।
उपासकानाँ सिद्धयथं ब्रह्मणों रूप कल्पना।
ब्रह्म अचिन्त्य, अप्रमेय, निर्गुण, गुणात्मा है उसका चिन्तन ध्यान संभव नहीं, इसलिए उपासकों की सफलता के लिये रूप कल्पना की गई।
परमात्मा तथा उसकी इस प्रधान शक्ति को लिंग भेद में विभाजित नहीं किया जा सकता। वह नर है न नारी परन्तु इतना अवश्य है कि उसे जिस रूप में जिस भाव से माना जाय उसी के अनुरूप वह सामने उपस्थित होते हैं। भक्त की भावना के ढाँचे में वह महाशक्ति भी मिट्टी की तरह आसानी से बदल जाती है और तदनुसार अपने आस्तित्व का परिचय देती है। भगवान को भक्त अपनी अभिरुचि के अनुसार माता, पिता, बन्धु, सखा, पति, पुत्र आदि जो चाहे सो मान सकता है और उसी के अनुसार उनको प्रत्युत्तर देते अनुभव कर सकता है।
इस संसार में माता का स्नेह एवं वात्सल्य सबसे उत्कृष्ट होता है इसलिए अन्य सम्बन्ध स्थापित करने की अपेक्षा उस ईश्वरीय सत्ता को माता के भाव से मानना मातृ संबंध स्थापित करना, अधिक उत्तम है। इस मान्यता के कारण वह शक्ति भी माता के अनुरूप स्नेह एवं वात्सल्यता के साथ हमारे सामने आ उपस्थित होती है। भगवान को माता के रूप में प्राप्त करना भक्त के लिए सबसे अधिक आनन्ददायक सौभाग्य हो सकता है। इसलिए गायत्री को माता के रूप में माना गया है और उसी रूप में उसकी पूजा होती है।
गायत्री माता को नारी रूप में देखने की प्रतिक्रिया होती है नारी मात्र को गायत्री माता का स्वरूप समझना। स्त्री जाति में मातृ भावना की स्थापना होकर साधक जब गायत्री की छवि को एक युवा नारी के रूप में सामने रखकर उसके चरणों पर अपना शुद्ध मातृ भाव समर्पित करता है तो यही अभ्यास धीरे ही दृढ़ होता हुआ इस स्थिति को जा पहुँचता है कि कोई स्त्री चाहे वह रूपवती या तरुणी ही क्यों न हो गायत्री माता की प्रतीक ही दिखाई पड़ने लगती है। यह मातृ बुद्धि प्राप्त होना एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक सफलता है।
नारी के प्रति पूज्य भावना
गायत्री उपासना से नारी मात्र के प्रति पवित्र भाव बढ़ते हैं और उसके प्रति श्रेष्ठ व्यवहार करने की इच्छा स्वभावतः होती है। ऐसी भावना वाले व्यक्ति नारी सम्मान के-नारी पूजा के-प्रबल समर्थक होते हैं। यह समर्थन समाज में सुख शान्ति एवं प्रगति के लिए नितान्त आवश्यक है। शास्त्रों में भी इसका समर्थन है :-
जगदन्वम्वामयं पश्य स्त्रीमात्रमविशेषतः।
नारी मात्र की जगदम्बा का स्तरूप माने।
स्त्रीणाँ निन्दाँ प्रहारंच कौटिल्यंचाप्रियं बचः।
आत्मनो हितमान्विच्छन्देवी भक्तो विवर्जयेत्॥
अपना कल्याण चाहने वाला माता का उपासक स्त्रियों की निन्दा न करे, न उन्हें मारे, न उनसे छल करे। न उनका जी दुखाये।
यत्रनारयस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्र नार्यो न पूज्यन्ते श्मशानं तन्नवै गृहम्।
जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ नारी का तिरस्कार होता है, वह घर निश्चय ही श्मशान है।
गायत्री उपासक की नारी जाति के प्रति, गायत्री माता की ही भावना रहती है, उन्हें वह परम पूज्य दृष्टि में देखता है ऐसी स्थिति में वासनात्मक कुविचार तो उसके पास तक नहीं फटकते :-
विद्या समस्तास्तवदेविभेदाः
स्त्रिय समस्तासक लाजगस्तु।
त्वैयकया पूरितमम्वयैतत्
कास्ते स्तुतिः स्तव्यपराषरोक्तिः
इस संसार में सम्पूर्ण परा अपरा विद्याएं आपका ही भेद है। मेरे संसार की समस्त नारियाँ आपका ही रूप है।
पिता से माता अधिक उदार
भक्त की कोमल भावनाएं तो यहाँ तक मानती है कि न्यायकारी पिता यदि हमारे किन्हीं अपराधों से कुपित होकर दंड व्यवस्था करेंगे तो माता अपनी करुणा से द्रवित होकर उस दण्ड में बचा लेंगी। बचा ही नहीं लेंगी वरन् परमपिता को धमका भी देंगी कि ‘मेरे भक्त को दुख क्यों देते हैं संसार में पूर्ण निर्दोष कौन है? जब सभी दोषी हैं, जब आप सभी पर दया करते हैं, उदारता और क्षमा का व्यवहार करते हैं तो मेरे भक्तों के प्रति वैसा उदार व्यवहार क्यों न करोगे? भक्त मानता है कि जब माता इस प्रकार अपना पक्ष लेगी तो फिर उनको सिफारिश पर पिता को झुकना ही पड़ेगा। इन भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति देखिये :-
पितेवत्वत्प्रेयाञ्जननि परिपूर्णागसिजने।
हितस्त्रोती वृत्या भवति च कदाचित्कलुषधीः।
किमेतन्नार्दोषः व इहजगतीति त्वमुचितैः।
रुपायै र्विस्मार्य स्वजनयसि माता तदसिनः।
-पराशर भट्ट
परम पिता परमात्मा जब अपराधी जीव पर पिता के समान कुपित हो जाते हैं तब आप ही उन्हें समझाती हो कि ‘यह क्या करते हो? इस संसार में पूर्ण निर्दोष कौन है’ उनका क्रोध शान्त कर आप ही उनमें दया उपजाती हैं। इसलिये आप ही हमारी दयामयी माता हैं।
परम पिता से महिमामयी माता अधिक उदार अधिक करुणापूर्ण अधिक वात्सल्य युक्त हैं, इसका एक उदाहरण कवि ने रामचन्द्र और जानकी की तुलना का बहुत ही सुन्दर किया है।
मातर्मैथिलि राक्षसी स्त्वयि तदैवार्द्रापराधास्त्वया।
रक्षन्त्या पवनात्माजल्लघु तरा रामस्व गोष्ठी कृता।
काकं तेच विभीषणं शरणभित्युक्ति क्षमौ रक्षतः।
सा न स्सान्द्र महागस सुखयतु क्षान्तिस्तवा कस्मिकी।
रामचन्द्रजी ने, शरण आने पर ही काक और विभीषण की रक्षा की। इसमें उनका क्या बड़ा गौरव है। जानकी जी की महानता देखो, उनने अपराध करने वाली राक्षसियों को बिना कोई प्रार्थना किये ही दण्ड देने को उद्यत हनुमान जी से छुड़ा दिया। जानकी जी की करुणा रामचन्द्रजी की अपेक्षा कहीं बड़ी है।
यह तो हुई भक्त की भावना और कवि की अनुभूति। पर तत्वतः भी गायत्री उपासना माता की गोद का सेवन करने और उसकी पयपान करने के समान सब प्रकार मंगलमय ही है।
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महाभारत:द्रौपदी की कथा




अग्निकुंड से हुआ था द्रोपदी का जन्म:
महाभारत ग्रंथ के अनुसार एक बार राजा द्रुपद ने कौरवो और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य का अपमान कर दिया था। गुरु द्रोणाचार्य इस अपमान को भूल नहीं पाए। इसलिए जब पण्डवों और कौरवों ने शिक्षा समाप्ति के पश्चात गुरु द्रोणाचार्य से गुरु दक्षिणा माँगने को कहा तो उन्होंने उनसे गुरु दक्षिणा में राजा द्रुपद को बंदी बनाकर अपने समक्ष प्रस्तुत करने को कहाँ। पहले कौरव राजा द्रुपद को बंदी बनाने गए पर वो द्रुपद से हार गए। कौरवों के पराजित होने के बाद पांडव गए और उन्होंने द्रुपद को बंदी बनाकर द्रोणाचार्य के समक्ष प्रस्तुत किया। द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला लेते हुए द्रुपद का आधा राज्य स्वयं के पास रख लिया और शेष राज्य द्रुपद को देकर उसे रिहा कर दिया।
गुरु द्रोण से पराजित होने के उपरान्त महाराज द्रुपद अत्यन्त लज्जित हुये और उन्हें किसी प्रकार से नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे। इसी चिन्ता में एक बार वे घूमते हुये कल्याणी नगरी के ब्राह्मणों की बस्ती में जा पहुँचे। वहाँ उनकी भेंट याज तथा उपयाज नामक महान कर्मकाण्डी ब्राह्मण भाइयों से हुई। राजा द्रुपद ने उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न कर लिया एवं उनसे द्रोणाचार्य के मारने का उपाय पूछा। उनके पूछने पर बड़े भाई याज ने कहा, “इसके लिये आप एक विशाल यज्ञ का आयोजन करके अग्निदेव को प्रसन्न कीजिये जिससे कि वे आपको वे महान बलशाली पुत्र का वरदान दे देंगे।” महाराज ने याज और उपयाज से उनके कहे अनुसार यज्ञ करवाया। उनके यज्ञ से प्रसन्न हो कर अग्निदेव ने उन्हें एक ऐसा पुत्र दिया जो सम्पूर्ण आयुध एवं कवच कुण्डल से युक्त था। उसके पश्चात् उस यज्ञ कुण्ड से एक कन्या उत्पन्न हुई जिसके नेत्र खिले हुये कमल के समान देदीप्यमान थे, भौहें चन्द्रमा के समान वक्र थीं तथा उसका वर्ण श्यामल था। उसके उत्पन्न होते ही एक आकाशवाणी हुई कि इस बालिका का जन्म क्षत्रियों के सँहार और कौरवों के विनाश के हेतु हुआ है। बालक का नाम धृष्टद्युम्न एवं बालिका का नाम कृष्णा रखा गया जो की राजा द्रुपद की बेटी होने के कारण द्रौपदी कहलाई।

शिवजी के वरदान के कारण मिले पांच पति :

द्रौपदी पूर्व जन्म में एक बड़े ऋषि की गुणवान कन्या थी। वह रूपवती, गुणवती और सदाचारिणी थी, लेकिन पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण किसी ने उसे पत्नी रूप में स्वीकार नहीं किया। इससे दुखी होकर वह तपस्या करने लगी। उसकी उग्र तपस्या के कारण भगवान शिव प्रसन्न हए और उन्होंने द्रौपदी से कहा तू मनचाहा वरदान मांग ले। इस पर द्रौपदी इतनी प्रसन्न हो गई कि उसने बार-बार कहा मैं सर्वगुणयुक्त पति चाहती हूं। भगवान शंकर ने कहा तूने मनचाहा पति पाने के लिए मुझसे पांच बार प्रार्थना की है। इसलिए तुझे दुसरे जन्म में एक नहीं पांच पति मिलेंगे। तब द्रौपदी ने कहा मैं तो आपकी कृपा से एक ही पति चाहती हूं। इस पर शिवजी ने कहा मेरा वरदान व्यर्थ नहीं जा सकता है। इसलिए तुझे पांच पति ही प्राप्त होंगे।
द्रौपदी से पांचाली बनने की कहानी :
महाभारत की अन्य पौराणिक कहानियाँ :-

कुंती तथा पांडवों ने द्रौपदी के स्वयंवर के विषय में सुना तो वे लोग भी सम्मिलित होने के लिए धौम्य को अपना पुरोहित बनाकर पांचाल देश पहुंचे। कौरवों से छुपने के लिए उन्होंने ब्राह्मण वेश धारण कर रखा था तथा एक कुम्हार की कुटिया में रहने लगे। राजा द्रुपद द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ करना चाहते थे। लाक्षागृह की घटना सुनने के बाद भी उन्हें यह विश्वास नहीं होता था कि पांडवों का निधन हो गया है, अत: द्रौपदी के स्वयंवर के लिए उन्होंने यह शर्त रखी कि निरंतर घूमते हुए यंत्र के छिद्र में से जो भी वीर निश्चित धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाकर दिये गये पांच बाणों से, छिद्र के ऊपर लगे, लक्ष्य को भेद देगा, उसी के साथ द्रौपदी का विवाह कर दिया जायेगा। ब्राह्मणवेश में पांडव भी स्वयंवर-स्थल पर पहुंचे। कौरव आदि अनेक राजा तथा राजकुमार तो धनुष की प्रत्यंचा के धक्के से भूमिसात हो गये। कर्ण ने धनुष पर बाण चढ़ा तो लिया किंतु द्रौपदी ने सूत-पुत्र से विवाह करना नहीं चाहा, अत: लक्ष्य भेदने का प्रश्न ही नहीं उठा। अर्जुन ने छद्मवेश में पहुंचकर लक्ष्य भेद दिया तथा द्रौपदी को प्राप्त कर लिया। कृष्ण उसे देखते ही पहचान गये। शेष उपस्थित व्यक्तियों में यह विवाद का विषय बन गया कि ब्राह्मण को कन्या क्यों दी गयी है। अर्जुन तथा भीम के रण-कौशल तथा कृष्ण की नीति से शांति स्थापित हुई तथा अर्जुन और भीम द्रौपदी को लेकर डेरे पर पहुंचे। उनके यह कहने पर कि वे लोग भिक्षा लाये हैं, उन्हें बिना देखे ही कुंती ने कुटिया के अंदर से कहा कि सभी मिलकर उसे ग्रहण करो। पुत्रवधू को देखकर अपने वचनों को सत्य रखने के लिए कुंती ने पांचों पांडवों को द्रौपदी से विवाह करने के लिए कहा। द्रौपदी का भाई धृष्टद्युम्न उन लोगों के पीछे-पीछे छुपकर आया था। वह यह तो नहीं जान पाया कि वे सब कौन हैं, पर स्थान का पता चलाकर पिता की प्रेरणा से उसने उन सबको अपने घर पर भोजन के लिए आमन्त्रित किया। द्रुपद को यह जानकर कि वे पांडव हैं, बहुत प्रसन्नता हुई, किंतु यह सुनकर विचित्र लगा कि वे पांचों द्रौपदी से विवाह करने जा रहे हैं। तभी व्यास मुनि ने अचानक प्रकट होकर एकांत में द्रुपद को उन छहों के पूर्वजन्म की कथा सुनायी कि- एक वार रुद्र ने पांच इन्द्रों को उनके दुरभिमान स्वरूप यह शाप दिया था कि वे मानव-रूप धारण करेंगे। उनके पिता क्रमश: धर्म, वायु, इन्द्र तथा अश्विनीकुमार (द्वय) होंगे। भूलोक पर उनका विवाह स्वर्गलोक की लक्ष्मी के मानवी रूप से होगा। वह मानवी द्रौपदी है तथा वे पांचों इन्द्र पांडव हैं। व्यास मुनि के व्यवस्था देने पर द्रौपदी का विवाह क्रमश: पांचों पांडवों से कर दिया गया। इस तरह से पांचो पांडवो से विवाह करके द्रौपदी पांचाली कहलाई।
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16.10.17

अहीर(यादव) जाती का इतिहास

अहीर ,यादव जाति का इतिहास वीडिओ 







 अहीर प्रमुखतः एक हिन्दू भारतीय जाति समूह है,जिसके सदस्यों को यादव समुदाय के नाम से भी पहचाना जाता है तथा अहीर व यादव या राव साहब शब्दों को एक दूसरे का पर्यायवाची समझा जाता है। अहीरों को एक जाति, वर्ण, आदिम जाति या नस्ल के रूप मे वर्णित किया जाता है, जिन्होने भारत व नेपाल के कई हिस्सों पर राज किया है|

डॉ. दयाराम आलोक जी के अनुसार अहीर जाति का इतिहास और महत्त्व:

अहीर जाति की विशेषताएं:

1. पशुपालक जाति
2. उत्तरी और मध्य भारतीय क्षेत्र में फैली हुई
3. संस्कृत साहित्य में उल्लिखित आभीर के समकक्ष माने जाते हैं
4. महाभारत में बार-बार उल्लेख आया है
5. कृष्ण को गोपालक या गोपाल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई

अहीर जाति के संबंध:

1. जाटों का रक्त सम्बन्ध
2. सामाजिक सम्बन्ध मराठों और गूजरों जैसा निकटतम
3. यादव प्राय: 'अहीर' शब्द से भी नामांकित होते हैं

अहीर जाति की उत्पत्ति:

1. आभीर जाति से संबद्ध रहे होंगे
2. अहीरक अर्थात आहि तथा हरि अर्थात नाग एवं हाथी के सदृश अर्थात् कृष्ण वर्णी
3. अहि अर्थात सांप तथा हम अर्थात घोड़े अर्थात काले तथा तेज शक्तिशाली जाति
यह जानकारी अहीर जाति के इतिहास और महत्त्व को समझने में मदद करती है। डॉ. दयाराम आलोक जी का शोध कार्य इस जाति के बारे में जानने के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है|
यदि इन्हें अभीर जाति से संबंधित किया जाये तो ये विदेशी ठहरते हैं।
 श्रीकृष्ण को जाट और गूजर दोनों ही पूर्व-पुरुष मानते हैं। यद्यपि अहीरों में परस्पर कुछ ऐसी दुर्भावनाएं उत्पन्न हो गई हैं कि वे स्वयं एक शाख वाले, दूसरी शाख वालों को, अपने से हीन समझते हैं। लेकिन जाटों का सभी अहीरों के साथ चाहे वे अपने लिए यादव, गोप, नंद, आभीर कहें, एक-सा व्यवहार है। जैसे खान-पान में जाट और गूजरों में कोई भेद नहीं, वैसे ही अहीर और जाटों में भी कोई भेद नहीं।

 इतिहास में इनके रहने का भी स्थान निकट-निकट बतलाया गया है। भारत से बाहर भी जहां कहीं जाटों का अस्तित्व पाया जाता है, वहीं अहीरों की बस्तियां भी मिलती हैं। चीन में जहां जाट को 'यूची' नाम से याद किया गया है, वहीं अहीरों को 'शू' नाम से पुकारा गया है।
ईरान में जाटाली प्रदेश के निकट ही अहीरों की बस्तियां भी पाई जाती हैं। भारत की मौजूदा आर्य क्षत्रिय जातियों में अहीर सबसे पुराने क्षत्रिय हैं। जब तक जाट, राजपूत, गूजर और मराठा नामों की सृष्टि भी नहीं हुई थी, अहीरों का अभ्युदय हो चुका था।
ब्रज में अहीरों की एक शाखा गोपों का कृष्ण-काल में जो राष्ट्र था, वह प्रजातंत्र प्रणाली द्वारा शासित 'गोपराष्ट्र' के नाम से जाना जाता था।
नन्द, जिनके कि यहां श्रीकृष्ण का पालन-पोषण हुआ था या तो अहीर थे या जाट। अरबी यात्री अलबरूनी ने नन्द को जाट ही लिखा है। कुछ भी बात हो, लेकिन इससे यह सिद्ध होता है कि जाट और अहीरों के पुरखे किसी एक ही वंशावली  के हैं।
तमिल भाषा के एक- दो विद्वानों को छोडकर शेष सभी भारतीय विद्वान इस बात से सहमत हैं कि अहीर शब्द संस्कृत के आभीर शब्द का तद्भव रूप है। आभीर (हिंदी अहीर) एक घुमक्कड़ जाति थी जो शकों की भांति बाहर से हिंदुस्तान में आई।
आभीरों को म्लेच्छ देश में निवास करने के कारण अन्य स्थानीय आदिम जातियों के साथ म्लेच्छों की कोटि में रखा जाता था तथा वृत्य क्षत्रिय कहा जाता था। महाभारत में भी युद्धप्रिय, घुमक्कड़, गोपाल अभीरों का उल्लेख मिलता है।आभीरों का उल्लेख अनेक शिलालेखों में पाया जाता है। शक राजाओं की सेनाओं में ये लोग सेनापति के पद पर नियुक्त थे। आभीर राजा ईश्वरसेन का उल्लेख नासिक के एक शिलालेख में मिलता है। ईस्वी सन्‌ की चौथी शताब्दी तक अभीरों का राज्य रहा। अंततोगत्वा कुछ अभीर राजपूत जाति में अंतर्मुक्त हुये व कुछ अहीर कहलाए, जिन्हें राजपूतों सा ही योद्धा माना गया।
आजकल की अहीर जाति ही प्राचीन काल के आभीर हैं।सौराष्ट्र के क्षत्रप शिलालेखों में भी प्रायः आभीरों का वर्णन मिलता है। पुराणों व बृहतसंहिता के अनुसार समुद्रगुप्त काल में भी दक्षिण में आभीरों का निवास था। उसके बाद यह जाति भारत के अन्य हिस्सों में भी बस गयी। मध्य प्रदेश के अहिरवाड़ा को भी आभीरों ने संभवतः बाद में ही विकसित किया। राजस्थान में आभीरों के निवास का प्रमाण जोधपुर शिलालेख (संवत 918) में मिलता है, जिसके अनुसार आभीर अपने हिंसक दुराचरण के कारण निकटवर्ती इलाकों के निवासियों के लिए आतंक बने हुये थे।
यद्यपि पुराणों में वर्णित अभीरों की विस्तृत संप्रभुता 6ठवीं शताब्दी तक नहीं टिक सकी, परंतु बाद के समय में भी आभीर राजकुमारों का वर्णन मिलता है, हेमचन्द्र के "दयाश्रय काव्य" में जूनागढ़ के निकट वनथली के चूड़ासम राजकुमार गृहरिपु को यादव व आभीर कहा गया है। भाटों की श्रुतियों व लोक कथाओं में आज भी चूड़ासम "अहीर राणा" कहे जाते हैं। अंबेरी के शिलालेख में सिंघण के ब्राह्मण सेनापति खोलेश्वर द्वारा आभीर राजा के विनाश का वर्णन तथा खानदेश में पाये गए गवली (ग्वाला) राज के प्राचीन अवशेष जिन्हें पुरातात्विक रूप से देवगिरि के यादवों के शासन काल का माना गया है, यह सभी प्रमाण इस तथ्य को बल देते हैं कि आभीर यादवों से संबन्धित थे। आज तक अहीरों में यदुवंशी अहीर नामक उप जाति का पाया जाना भी इसकी पुष्टि करता है
अहीरों की ऐतिहासिक उत्पत्ति को लेकर विभिन्न इतिहासकर एकमत नहीं हैं। परंतु महाभारत या श्री मदभागवत गीता के युग मे भी यादवों के अस्तित्व की अनुभूति होती है तथा उस युग मे भी इन्हें आभीर,अहीर, गोप या ग्वाला ही कहा जाता था। कुछ विद्वान इन्हे भारत मे आर्यों से पहले आया हुआ बताते हैं, परंतु शारीरिक गठन के अनुसार इन्हें आर्य माना जाता है। पौराणिक दृष्टि से, अहीर या आभीर यदुवंशी राजा आहुक के वंशज है। शक्ति संगम तंत्र मे उल्लेख मिलता है कि राजा ययाति के दो पत्नियाँ थीं-देवयानी व शर्मिष्ठा। देवयानी से यदु व तुर्वशू नामक पुत्र हुये। यदु के वंशज यादव कहलाए। यदुवंशीय भीम सात्वत के वृष्णि आदि चार पुत्र हुये व इन्हीं  की कई पीढ़ियों बाद राजा आहुक हुये, जिनके वंशज आभीर या अहीर कहलाए।
“ आहुक वंशात समुद्भूता आभीरा इति प्रकीर्तिता। (शक्ति संगम तंत्र, पृष्ठ 1
इस पंक्ति से स्पष्ट होता है कि यादव व आभीर मूलतः एक ही वंश के क्षत्रिय थे तथा "हरिवंश पुराण" मे भी इस तथ्य की पुष्टि होती है।
भागवत में भी वसुदेव ने आभीर पति नन्द को अपना भाई कहकर संबोधित किया है व श्रीक़ृष्ण ने नन्द को मथुरा से विदा करते समय गोकुलवासियों को संदेश देते हुये उपनन्द, वृषभान आदि अहीरों को अपना सजातीय कह कर संबोधित किया है। वर्तमान अहीर भी स्वयं को यदुवंशी आहुक की संतान मानते हैं।
 ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, अहीरों ने 108 A॰D॰ मे मध्य भारत मे स्थित 'अहीर बाटक नगर' या 'अहीरोरा' व उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले मे अहिरवाड़ा की नीव रखी थी। रुद्रमूर्ति नामक अहीर अहिरवाड़ा का सेनापति था जो कालांतर मे राजा बना। माधुरीपुत्र, ईश्वरसेन व शिवदत्त इस बंश के मशहूर राजा हुये, जो बाद मे यादव राजपूतो मे सम्मिलित हो गये।
कोफ (कोफ 1990,73-74) के अनुसार - अहीर प्राचीन गोपालक परंपरा वाली कृषक जाति है जिन्होने अपने पारंपरिक मूल्यों को सदा राजपूत प्रथा के अनुरूप व्यक्त किया परंतु उपलब्धियों के मुक़ाबले वंशावली को ज्यादा महत्व मिलने के कारण उन्हे "कल्पित या स्वघोषित राजपूत" ही माना गया।थापर के अनुसार पूर्व कालीन इतिहास में 10वीं शताब्दी तक प्रतिहार शिलालेखों में अहीर-आभीर समुदाय को पश्चिम भारत के लिए "एक संकट जिसका निराकरण आवश्यक है" बताया गया।
मेगास्थनीज के वृतांत व महाभारत के विस्तृत अध्ययन के बाद रूबेन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि " भगवान कृष्ण एक गोपालक नायक थे तथा गोपालकों की जाति अहीर ही कृष्ण के असली वंशज हैं, न कि कोई और राजवंश।
वर्गीकरण
प्रमुख रूप से अहीरो के तीन सामाजिक वर्ग है- यदुवंशी, नंदवंशी व ग्वालवंशी। इनमे वंशोत्पत्ति को लेकर बिभाजन है। यदुवंशी स्वयं को राजा नन्द का वंशज बताते है व ग्वालवंशी प्रभु कृष्ण के ग्वाल सखाओ से संबन्धित बताए जाते है।एक अन्य दंतकथा के अनुसार भगवान कृष्ण जब असुरो का वध करने निकलते है तब माता यशोदा उन्हे टोकती है, उत्तर देते देते कृष्ण अपने बाल मित्रो सहित यमुना नदी पार कर जाते है। कृष्ण के साथ असुर वध हेतु यमुना पार जाने वाले यह बालसखा कालांतर मे अहीर नंदवंशी कहलाए। आधुनिक साक्ष्यों व इतिहासकारों के अनुसार नंदवंशी व यदुवंशी मौलिक रूप से समानार्थी है, क्योंकि ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार यदु नरेश वासुदेव तथा नन्द बाबा निकट संबंधी या कुटुंबीजन थे व यदुवंशी थे। नन्द की स्वयं की कोई संतान नहीं थी अतः यदु राजकुमार कृष्ण ही नंदवश के पूर्वज हुये।

अहीरों का बहू संख्यक कृषक संवर्ग स्वयं को ग्वाल अहीरों से श्रेष्ठ व जाट, राजपूत, गुर्जर आदि कृषक वर्गों के बराबर का मानता है। ग्वाल अहीरों का प्रमुख व्यवसाय पशुपालन व दुग्ध-व्यापार है तथा यह वर्ग उत्तर प्रदेश की सीमाओं व हरियाणा के फ़रीदाबाद व गुड़गाँव जनपदों में पाया जाता है। प्रारम्भ में तीव्र रहा यह विभेद अब कम हो चला है।बनारस के ग्वाल अहीरों को 'सरदार' उपनाम से संबोधित किया जाता है।
 मानव वैज्ञानिक कुमार सुरेश सिंह के अनुसार, अहीर समुदाय लगभग 64 बहिर्विवाही उपकुलों मे विभाजित है। कुछ उपकुल इस प्रकार है- जग्दोलिया, चित्तोसिया, सुनारिया, विछवाल, जाजम, ढडवाल, खैरवाल, डीवा, मोटन, फूडोतिया, कोसलिया, खतोड़िया, भकुलान, भाकरिया, अफरेया, काकलीय, टाटला, जाजड़िया, दोधड़, निर्वाण, सतोरिया, लोचुगा, चौरा, कसेरा, लांबा, खोड़ा, खापरीय, टीकला तथा खोसिया। प्रत्येक कुल का एक कुलदेवता है। मजबूत विरासत व मूल रूप से सैन्य पृष्ठभूमि से बाद मे कृषक चरवाहा बनी अहीर जाति स्वयं को सामाजिक पदानुक्रम मे ब्राह्मण व राजपूतो से निकटतम  व जाटो के बराबर का मानती है। अन्य जातियाँ भी इन्हे महत्वपूर्ण समुदाय का मानती है।

योद्धा जाति के रूप में

अहीर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से एक लड़ाकू जाति है। 1920 मे ब्रिटिश शासन ने अहीरों को एक "कृषक जाति" के रूप मे वर्गीकृत किया था जो कि उस काल  में "लड़ाकू जाति" का पर्याय थी। वे 1898 से सेना में भर्ती होते रहे थे। तब ब्रिटिश सरकार ने अहीरों की चार कंपनियाँ बनायीं थी, इनमें से दो 95वीं रसेल इंफेंटरी में थीं। 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान 13 कुमायूं रेजीमेंट की अहीर कंपनी द्वारा रेजंगला का मोर्चा भारतीय मीडिया में सराहनीय रहा है। वे भारतीय सेना की राजपूत रेजीमेंट में भी भागीदार हैं। भारतीय हथियार बंद सेना में आज तक बख्तरबंद कोरों व तोपखानों में अहीरों की एकल टुकड़ियाँ विद्यमान हैं|
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15.10.17

आंजणा जाति की जानकारी:Anjana Choudhary




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Anjana Samaj History (आंजना समाज इतिहास


आँजणा समाज, चौधरी, पटेल, कलबी या पाटीदार समाज के नाम से भी जाना जाता है। आँजणा समाज की कुल २३२ गोत्रे हैं ।जिसमे अटीस ओड,आकोलिया, फेड़, फुवा,फांदजी, खरसान, भुतादिया, , वागडा, फरेन, जेगोडा, मुंजी, गौज, जुआ लोह, इटार, धुजिया, केरोट, रातडा, भटौज, वगेरह समाविष्ट हैं । 

आँजणा कि उत्पति के बारे में विविध मंतव्य/दंत्तकथाये प्रचलित हैं। जैसे भाट चारण के चोपडे में आँजणा समाज के उत्पति के साथ सह्स्त्राजुन के आठ पुत्रो कि बात जोड़ ली है । जब परशुराम शत्रुओं का संहार करने निकले तब सहस्त्रार्जुन के पास गए । युद्घ में सहस्त्रार्जुन और उनके ९२ पुत्रो की मृत्यु हो गयी ।आठ पुत्र युद्ध भूमि  छोड के आबू पर माँ अर्बुदा की शरण में आये ।अर्बुदा देवी ने उनको रक्षण दिया । भविष्य मे  कभी  शस्त्र धारण न करने की   शर्त पर परशुराम ने उनको जीवनदान दिया ।उन आठ पुत्रो मैं से दो राजस्थान मे रहे  ।उन्होंने भरतपुर मैं राज्य की स्थापना की उनके वंशज  जाट से पहचाने गए । बाकि के छह पुत्र आबू मैं ही रह गए वो पाहता अंजन  कहलाए और उसके बाद मैं उस शब्द का अपभ्रंश होकर  आँजणा नाम से पहचाने गए ।

सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम  की पुत्री अंजना बाई ने आबू पर्वत पर अन्जनगढ़ बसाया और वहां रहनेवाले आँजणा कहलाये ।सन ९५३ में भीनमाल मैं विदेशियों  का आक्रमण हुआ, तब कितने ही गुजर भीनमाल छोड़कर अन्यत्र गए । उस वक्त आँजणा पटिदारो के लगभग २००० परिवार भीनमाल से निकल कर  आबू पर्वत की तलेटी मैं आकर चम्पावती नगरी मे रहने लगे । वहां से  बनासकांठा ,साबरकांठा ,मेहसाना और गांधीनगर जिले मे फैल गए 

सिद्धराज जयसिंह ने  मालवा के राजा यशोवर्मा को हराकर कैद करके पटना में लकडी के पिंजरे मे बंद करके घुमाया था।बाद मे  उत्तर गुजरात से बहुत से आँजणा परिवार मालवा के उज्जैन प्रदेश के आस -पास बस  गए  । वो  मोर, आकोलिया , वगदा ,वजगंथ जैसे  सरनेम  से जाने जाते हैं ।आँजणा समाज का इतिहास राजा महाराजाओं  जैसा लिखित नहीं हैं ।धरती और माटी के साथ जुडी हुई इस जाती के बारे मैं कोई शिलालेख  नहीं है।

इस समाज के लोग मुख्य रूप से राजस्थान , गुजरात,मध्य प्रदेश ( मेवाड़ एवं मारवाङ क्षेत्र ) में रहते हैं ।आँजणा समाज का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन है। आँजणा समाज बहुत तेजी से प्रगति कर रहा है समाज के लोग सेवा क्षेत्र और व्यापार की ओर बढ रहे हैं।इस समय समाज के बहुत से लोग,महानगरों और अन्य छोटे - बड़े शहरों मे कारखानें और दुकानें चला रहे है।आँजणा समाज के बहुत से लोग सरकारी एवं निजी सेवा क्षेत्र में विभिन्न पदों पर जैसे इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, प्रोफेसर और प्रशासनिक सेवाओं  में हैं।

आँजणा समाज में कई सामाजिक,धार्मिक और राजनीतिक नेताओं ने जन्म लिया है।अठारहवीं सदी में महान संत श्री राजाराम जी महाराज ने आँजणा समाज में जन्म लिया ।उन्होंने समाज में अन्याय ( ठाकुरों और राजाओं द्वारा ) और सामाजिक कुरितियों के खिलाफ जागरूकता पैदा की।उन्होंने समाज में शिक्षा के महत्व पर भी जोर दिया। आँजणा समाज की सनातन( हिन्दू ) धर्म में मान्यता है।आँजणा समाज में अलग अलग समय पर महान संतों एवं विचारकों ने जन्म लिया हैं।इन संतो एवं विचारकों ने देश के विभिन्न हिस्सों में कई मंदिरों एवं मठों का निर्माण भी करवाया।राजस्थान में जोधपुर जिले की लूणी तहसील में शिकारपुरा नामक गाँव में एक मठ ( आश्रम )का भी निर्माण करवाया।यही आश्रम आज श्री शिकारपुरा आश्रम के नाम से प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है ।

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हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा-

विशिष्ट कवियों की चयनित कविताओं की सूची (लिंक्स)

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से -गोपालदास "नीरज"

वीरों का कैसा हो वसंत - सुभद्राकुमारी चौहान

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा-अल्लामा इकबाल

उन्हें मनाने दो दीवाली-- डॉ॰दयाराम आलोक

जब तक धरती पर अंधकार - डॉ॰दयाराम आलोक

जब दीप जले आना जब शाम ढले आना - रविन्द्र जैन

सुमन कैसे सौरभीले: डॉ॰दयाराम आलोक

वह देश कौन सा है - रामनरेश त्रिपाठी

किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की रामबाण औषधि

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ -महादेवी वर्मा

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल - महादेवी वर्मा

प्रणय-गीत- डॉ॰दयाराम आलोक

गांधी की गीता - शैल चतुर्वेदी

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार -शिवमंगलसिंह सुमन

सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक

जंगल गाथा -अशोक चक्रधर

मेमने ने देखे जब गैया के आंसू - अशोक चक्रधर

सूरदास के पद

रात और प्रभात.-डॉ॰दयाराम आलोक

घाघ कवि के दोहे -घाघ

मुझको भी राधा बना ले नंदलाल - बालकवि बैरागी

बादल राग -सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

आओ आज करें अभिनंदन.- डॉ॰दयाराम आलोक


11.10.17

सम्पूर्ण महाभारत कथा (Complete Mahabharata story)





महाभारत हिंदू संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर है। शास्त्रों में इसे पांचवां वेद भी कहा गया है। इसके रचयिता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं। महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में स्वयं कहा है- यन्नेहास्ति न कुत्रचित्। अर्थात जिस विषय की चर्चा इस ग्रंथ में नहीं की गई है, उसकी चर्चा अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। श्रीमद्भागवतगीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है।

परिचय
महाभारत की रचना महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने की है, लेकिन इसका लेखन भगवान श्रीगणेश ने किया है। इस ग्रंथ में चंद्रवंश का वर्णन है। महाभारत में न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या तथा धर्मशास्त्र का भी विस्तार से वर्णन किया गया हैं। यह महाकाव्य ‘जय’, ‘भारत’ और ‘महाभारत’ इन तीन नामों से प्रसिद्ध है।
इस ग्रंथ में कुल मिलाकर एक लाख श्लोक हैं, इसलिए इसे शतसाहस्त्री संहिता भी कहा जाता है। यह ग्रंथ स्मृति वर्ग में आता है। इसमें कुल 18 पर्व हैं जो इस प्रकार हैं- आदिपर्व, सभा पर्व, वनपर्व, विराट पर्व, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशासन पर्व, आश्वमेधिक पर्व, आश्रमवासिक पर्व, मौसल पर्व, महाप्रास्थनिक पर्व व स्वर्गारोहण पर्व। आइए इस लेख में हम इन 18 पर्वों के माध्यम से जानते है सम्पूर्ण महाभारत।
1. आदिपर्व
चंद्रवंश में शांतनु नाम के प्रतापी राजा हुए। शांतनु का विवाह देवी गंगा से हुआ। शांतनु व गंगा के पुत्र देवव्रत (भीष्म) हुए। अपने पिता की प्रसन्नता के लिए देवव्रत ने उनका विवाह सत्यवती से करवा दिया और स्वयं आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा कर ली। देवव्रत की इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही उन्हें भीष्म कहा गया। शांतनु को सत्यवती से दो पुत्र हुए- चित्रांगद व विचित्रवीर्य। राजा शांतनु की मृत्यु के बाद चित्रांगद राजा बने। चित्रांगद के बाद विचित्रवीर्य गद्दी पर बैठे। विचित्रवीर्य का विवाह अंबिका एवं अंबालिका से हुआ। अंबिका से धृतराष्ट्र तथा अंबालिका से पांडु पैदा हुए। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, इसलिए पांडु को राजगद्दी पर बिठाया गया।
धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से तथा पांडु का विवाह कुंती व माद्री से हुआ। धृतराष्ट्र से गांधारी को सौ पुत्र हुए। इनमें सबसे बड़ा दुर्योधन था। पांडु को कुंती से युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा माद्री से नकुल व सहदेव नामक पुत्र हुए। असमय पांडु की मृत्यु होने पर धृतराष्ट्र को राजा बनाया गया। कौरव (धृतराष्ट्र के पुत्र) तथा पांडव (पांडु के पुत्र) को द्रोणाचार्य ने शस्त्र विद्या सिखाई। एक बार जब सभी राजकुमार शस्त्र विद्या का प्रदर्शन कर रहे थे, तब कर्ण (यह कुंती का सबसे बड़ा पुत्र था, जिसे कुंती ने पैदा होते ही नदी में बहा दिया था।) ने अर्जुन से प्रतिस्पर्धा करनी चाही, लेकिन सूतपुत्र होने के कारण उसे मौका नहीं दिया गया। तब दुर्योधन ने उसे अंगदेश का राजा बना दिया।
एक बार दुर्योधन ने पांडवों को समाप्त करने के उद्देश्य से लाक्षागृह का निर्माण करवाया। दुर्योधन ने षड्यंत्रपूर्वक पांडवों को वहां भेज दिया। रात के समय दुर्योधन ने लाक्षागृह में आग लगवा दी, लेकिन पांडव वहां से बच निकले। जब पांडव जंगल में आराम कर रहे थे, तब हिंडिब नामक राक्षस उन्हें खाने के लिए आया, लेकिन भीम ने उसका वध कर दिया। हिंडिब की बहन हिडिंबा भीम पर मोहित हो गई। भीम ने उसके साथ विवाह किया। हिडिंबा को भीम से घटोत्कच नामक पुत्र हुआ। एक बार पांडव घूमते-घूमते पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर में गए। यहां अर्जुन ने स्वयंवर जीत कर द्रौपदी का वरण किया। जब अर्जुन द्रौपदी को अपनी माता कुंती के पास ले गए तो उन्होंने बिना देखे ही कह दिया कि पांचों भाई आपस में बांट लो। तब श्रीकृष्ण ने कहने पर पांचों भाइयों ने द्रौपदी से विवाह किया।
जब भीष्म, विदुर आदि को पता चला कि पांडव जीवित हैं तो उन्हें वापस हस्तिनापुर बुलाया गया। यहां आकर पांडवों ने अपना अलग राज्य बसाया, जिसका नाम इंद्रप्रस्थ रखा। एक बार नियम भंग होने के कारण अर्जुन को 12 वर्ष के वनवास पर जाना पड़ा।
वनवास के दौरान अर्जुन ने नागकन्या उलूपी, मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा व श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह किया। अर्जुन को सुभद्रा से अभिमन्यु तथा द्रौपदी से पांडवों को पांच पुत्र हुए। वनवास पूर्ण कर अर्जुन जब पुन: इंद्रप्रस्थ पहुंचे तो सभी बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन व श्रीकृष्ण के कहने पर ही मयासुर नामक दैत्य ने इंद्रप्रस्थ में एक सुंदर सभा भवन का निर्माण किया।
2. सभा पर्व
मयासुर द्वारा निर्मित सभा भवन बहुत ही सुंदर व विचित्र था। एक बार नारद मुनि युधिष्ठिर के पास आए और उन्हें राजसूय यज्ञ करने की सलाह दी। युधिष्ठिर ने ऐसा ही किया। भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव चारों दिशाओं में गए तथा सभी राजाओं को युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया। इसके बाद युधिष्ठिर ने समारोह पूर्वक राजसूय यज्ञ किया। इस समारोह में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध कर दिया। युधिष्ठिर का ऐश्वर्य देखकर दुर्योधन के मन में ईष्र्या होने लगी। दुर्योधन ने पांडवों का राज-पाठ हथियाने के उद्देश्य से उन्हें हस्तिनापुर जुआ खेलने के लिए बुलाया।
पांडव जुए में अपना राज-पाठ व धन आदि सबकुछ हार गए। इसके बाद युधिष्ठिर स्वयं के साथ अपने भाइयों व द्रौपदी को भी हार गए। भरी सभा में दु:शासन द्रौपदी को बालों से पकड़कर लाया और उसके वस्त्र खींचने लगा। किंतु श्रीकृष्ण की कृपा से द्रौपदी की लाज बच गई। द्रौपदी का अपमान देख भीम ने दु:शासन के हाथ उखाड़ कर उसका खून पीने और दुर्योधन की जंघा तोडऩे की प्रतिज्ञा की। यह देख धृतराष्ट्र डर गए और उन्होंने पांडवों को कौरवों के दासत्व से मुक्त कर दिया। इसके बाद धृतराष्ट्र ने पांडवों को उनका राज-पाठ भी लौटा दिया।
इसके बाद दुर्योधन ने पांडवों को दोबारा जुआ खेलने के लिए बुलाया। इस बार शर्त रखी कि जो जुए में हारेगा, वह अपने भाइयों के साथ तेरह वर्ष वन में बिताएगा, जिसमें अंतिम वर्ष अज्ञातवास होगा। इस बार भी दुर्योधन की ओर से शकुनि ने पासा फेंका तथा युधिष्ठिर को हरा दिया। शर्त के अनुसार पांडव तेरह वर्ष वनवास जाने के लिए विवश हुए और राज्य भी उनके हाथ से चला गया।
3. वन पर्व
जुए की शर्त के अनुसार युधिष्ठिर को अपने भाइयों के साथ बारह वर्ष का वनवास तथा एक वर्ष के अज्ञातवास पर जाना पड़ा। पांडव वन में अपना जीवन बिताने लगे। वन में ही व्यासजी पांडवों से मिले तथा अर्जुन को दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए कहा। अर्जुन ने भगवान शिव से पाशुपास्त्र तथा अन्य देवताओं से भी दिव्यास्त्र प्राप्त किए। इसके लिए अर्जुन स्वर्ग भी गए। यहां किसी बात पर क्रोधित होकर उर्वशी नामक अप्सरा ने अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप दे दिया।
तब इंद्र ने कहा कि अज्ञातवास के समय यह श्राप तुम्हारे लिए वरदान साबित होगा। इधर युधिष्ठिर आदि पांडव तीर्थयात्रा करते हुए बदरिका आश्रम आकर रहने लगे। यहीं गंधमादन पर्वत पर भीम की भेंट हनुमानजी से हुई। हनुमानजी ने प्रसन्न होकर भीम को वरदान दिया कि युद्ध के समय वे अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठकर शत्रुओं को डराएंगे।
कुछ दिनों बाद अर्जुन स्वर्ग से लौट आए। एक दिन जब द्रौपदी आश्रम में अकेली थी, तब राजा जयद्रथ (दुर्योधन की बहन दु:शला का पति) उसे बलपूर्वक उठा ले गया। पांडवों को जब पता चला तो उन्होंने उसे पकड़ लिया। जयद्रथ को दंड देने के लिए भीम ने उसका सिर मूंड दिया व पांच चोटियां रख कर छोड़ दिया।
एक बार यमराज ने पांडवों की परीक्षा ली। यमराज ने यक्ष बन कर भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव से अपने प्रश्नों के उत्तर जानने चाहे, लेकिन अभिमान वश इनमें से किसी ने भी यमराज के प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए। जिसके कारण यमराज ने इन सभी को मृतप्राय: कर दिया। अंत में युधिष्ठिर ने यमराज के सभी प्रश्नों के उत्तर दिए। प्रसन्न होकर यमराज ने सभी को पुनर्जीवित कर दिया।
4. विराट पर्व
12 वर्ष के वनवास के बाद पांडवों ने अज्ञातवास बिताने के लिए विराट नगर में रहने की योजना बनाई। सबसे पहले पांडवों ने अपने शस्त्र नगर के बाहर एक विशाल वृक्ष पर छिपा दिए। युधिष्ठिर राजा विराट के सभासद बन गए। भीम रसोइए के रूप में विराट नगर में रहने लगे। नकुल घोड़ों को देख-रेख करने लगे तथा सहदेव गायों की। अर्जुन बृहन्नला बनकर राजा विराट की पुत्री उत्तरा को नृत्य की शिक्षा देने लगे। द्रौपदी दासी बनकर राजा विराट की पत्नी की सेवा करने लगी।
राजा विराट का साला कीचक द्रौपदी का रूप देखकर उस पर मोहित हो गया और उसके साथ दुराचार करना चाहा। प्रतिशोध स्वरूप भीम ने षड्यंत्रपूर्वक उसका वध कर दिया। एक बार कौरवों ने विराट नगर पर हमले की योजना बनाई। पहले त्रिगर्तदेश के राजा सुशर्मा ने विराट नगर पर हमला किया। राजा विराट जब उससे युद्ध करने चला गया, उसी समय कौरवों ने भी विराट नगर पर हमला कर दिया। तब राजा विराट का पुत्र उत्तर बृहन्नला (अर्जुन) को सारथी बनाकर युद्ध करने आया।
उत्तर ने जब कौरवों की सेना देखी तो वह डर कर भागने लगा। उस समय अर्जुन ने उसे सारथी बनाया और स्वयं युद्ध किया। देखते ही देखते अर्जुन ने कौरवों को हरा दिया। तब तक पांडवों का अज्ञातवास समाप्त हो चुका था। अगले दिन सभी पांडव अपने वास्तविक स्वरूप में राजा विराट से मिले। पांडवों से मिलकर राजा विराट बहुत प्रसन्न हुए। राजा विराट ने अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से करवा दिया।
5. उद्योग पर्व
अज्ञातवास के बाद जब पांडव अपने वास्तविक स्वरूप में आए तो श्रीकृष्ण आदि सभी ने मिलकर ये निर्णय लिया कि शर्त के अनुसार अब कौरवों का पांडवों का राज्य लौटा देना चाहिए। तब पांडवों ने अपना एक दूत हस्तिनापुर भेजा, लेकिन दुर्योधन ने राज्य देने से इनकार कर दिया। भीष्म, द्रोणाचार्य आदि ने भी दुर्योधन को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह नहीं माना।
तब पांडवों ने श्रीकृष्ण को अपना दूत बना कर भेजा, लेकिन दुर्योधन ने उनका भी अपमान कर दिया। जब कौरव व पांडवों में युद्ध होना तय हो गया तब पांडवों ने अपने सेनापति धृष्टद्युम्न (द्रौपदी का भाई) को बनाया। दुर्योधन ने अपना सेनापति पितामह भीष्म को नियुक्त किया। कौरव व पांडवों की सेनाएं कुरुक्षेत्र में आ गईं।
भीष्म पितामह ने दुर्योधन को बताया कि पांडवों की सेना में शिखंडी नाम का जो योद्धा है वह जन्म के समय एक स्त्री था इसलिए मैं उसके साथ युद्ध नहीं करूंगा। तब भीष्म पितामह ने ये भी बताया कि शिखंडी पूर्व जन्म में अंबा नामक राजकुमारी थी, जिसे मैं बलपूर्वक हर लाया था। उसी ने बदला लेने के उद्देश्य से पुन: जन्म लिया है।
6. भीष्म पर्व
जब युद्ध प्रारंभ होने वाला था, उस समय शत्रुओं के दल में अपने परिजनों को देखकर अर्जुन हताश हो गए। तब श्रीकृष्ण ने उसे गीता का उपदेश दिया और अपना धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। देखते-ही देखते कौरव व पांडवों में घमासान युद्ध छिड़ गया। भीष्म लगातार 9 दिनों तक पांडव सेना का संहार करते रहे।
तब श्रीकृष्ण ने पांडवों से कहा कि भीष्म की मृत्यु असंभव है इसलिए उन्हें युद्ध से हटाने का उपाय वे स्वयं ही बता सकते हैं। पांडवों के पूछने पर भीष्म ने बताया कि शिखंडी अगर मुझसे युद्ध करने आया तो मैं उस पर शस्त्र नहीं चलाऊंगा।
दसवें दिन के युद्ध में शिखंडी पांडवों की ओर से भीष्म पितामह के सामने आकर डट गया, जिसे देखते ही भीष्म ने अपने अस्त्रों का त्याग कर दिया। श्रीकृष्ण के कहने पर शिखंडी की आड़ लेकर अर्जुन ने अपने बाणों से भीष्म को घायल कर दिया।
अत्यधिक घायल होने के कारण भीष्म अपने रथ से नीचे गिर पड़े। शरीर में धंसे तीर ही उनके लिए शय्या बन गए। जब भीष्म ने देखा कि इस समय सूर्य दक्षिणायन है तो उन्हें प्राण नहीं त्यागे और तीरों की शय्या पर ही सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करने लगे।
7. द्रोण पर्व
भीष्म पितामह के बाद दुर्योधन ने द्रोणाचार्य को अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया। द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को जीवित पकडऩे के योजना बनाई। इसके लिए द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की और अर्जुन को युद्धभूमि से दूर ले गए। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह में घुस गया और वीरतापूर्वक लड़ते-लड़ते मृत्यु को प्राप्त हुआ।
तब यह बात अर्जुन को पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और उसने जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा की क्योंकि जयद्रथ ने अभिमन्यु के चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद उसका मार्ग बंद कर दिया था। युद्ध के चौदहवें दिन अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करते हुए जयद्रथ का वध कर दिया। भीम का पुत्र घटोत्कच भी अपनी माया से युद्ध करते हुए कौरवों का विनाश करने लगा। जब दुर्योधन ने देखा कि यदि घटोत्कच को रोका न गया तो ये आज ही कौरव सेना को हरा देगा, तब उसने कर्ण से उसे रोकने के लिए कहा।
कर्ण ने अपनी दिव्य शक्ति, जो उसने अर्जुन के वध के लिए बचा रखी थी, का प्रहार घटोत्कच पर कर उसका वध कर दिया। युद्ध के पंद्रहवें दिन धृष्टद्युम्न ने षड्यंत्रपूर्वक द्रोणाचार्य का वध कर दिया। जब यह बात अश्वत्थामा को पता चली तो उसने नारायण अस्त्र का प्रहार किया, लेकिन श्रीकृष्ण के कारण पांडव बच गए।
8. कर्ण पर्व
द्रोणाचार्य के बाद दुर्योधन ने कर्ण को सेनापति बनाया। दो दिनों तक कर्ण ने पराक्रमपूर्वक पांडवों की सेना का विनाश किया। सत्रहवे दिन कर्ण राजा शल्य को अपना सारथि बना कर युद्ध करने आया। कर्ण जब अर्जुन से युद्ध कर रहा था उस समय भीम कौरव सेना का नाश कर रहा था। भीम ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए दु:शासन के दोनों हाथ उखाड़ दिए।
यह देख कर्ण ने युधिष्ठिर को घायल कर दिया। जब यह बात अर्जुन को पता चली तो वह कर्ण से युद्ध करने आए। अर्जुन और कर्ण के बीच भयंकर युद्ध होने लगा। तभी अचानक कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया। जब कर्ण अपने रथ का पहिया जमीन से निकालने के लिए उतरे, उसी समय अर्जुन ने उनका वध कर दिया।
9. शल्य पर्व
कर्ण की मृत्यु के बाद कृपाचार्य ने दुर्योधन को पांडवों से संधि करने के लिए समझाया, लेकिन वह नहीं माना। अगले दिन दुर्योधन ने राजा शल्य को सेनापति बनाया। राजा शल्य सेनापति बनते ही पांडवों की सेना पर टूट पड़े। यह युद्ध का 18वां दिन था। राजा शल्य ने युधिष्ठिर को बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में युधिष्ठिर ने राजा शल्य का वध कर दिया।
यह देख कौरव सेना भागने लगी। उसी समय सहदेव ने शकुनि तथा उसके पुत्र उलूक का वध कर दिया। यह देख दुर्योधन रणभूमि से भाग कर दूर एक सरोवर में जाकर छिप गया। पांडवों को जब पता चला कि दुर्योधन सरोवर में छिपा है तो उन्होंने जाकर उसे युद्ध के लिए ललकारा। दुर्योधन और भीम में भयंकर युद्ध हुआ। अंत में भीम ने दुर्योधन को पराजित कर दिया और मरणासन्न अवस्था में छोड़कर वहां से चले गए।
उस समय कौरवों के केवल तीन ही महारथी बचे थे-अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा। संध्या के समय जब उन्हें पता चला कि दुर्योधन मरणासन्न अवस्था में सरोवर के किनारे पड़े हैं, तो वे तीनों वहां पहुंचे। दुर्योधन उन्हें देखकर अपने अपमान से क्षुब्ध होकर विलाप कर रहा था। अश्वत्थामा ने प्रतिज्ञा की कि मैं चाहे जैसे भी हो, पांडवों का वध अवश्य करूंगा। दुर्योधन ने वहीं अश्वत्थामा को सेनापति बना दिया।
10. सौप्तिक पर्व
अश्वत्थामा, कृपाचार्य व कृतवर्मा रात के अंधेरे में पांडवों के शिविर में गए, लेकिन उन्हें ये नहीं पता था कि उस समय पांडव अपने शिविर में नहीं हैं। रात में उचित अवसर देखकर अश्वत्थामा हाथ में तलवार लेकर पांडवों के शिविर में घुस गया, उसने कृतवर्मा और कृपाचार्य से कहा कि यदि कोई शिविर से जीवित निकले तो तुम उसका वध कर देना। अश्वत्थामा ने धृष्टद्युम्न, शिखंडी, उत्तमौजा आदि वीरों के साथ द्रौपदी के पांचों पुत्रों का भी वध कर दिया और शिविर में आग लगा दी।
जब यह बात अश्वत्थामा ने जाकर दुर्योधन को बताई तो वह उसके मन को शांति मिली और तभी उसके प्राण पखेरु उड़ गए। इस प्रकार दुर्योधन का अंत हो गया। जब पांडवों को पता चला कि अश्वत्थामा ने छल पूर्वक सोते हुए हमारे पुत्रों व परिजनों का वध कर दिया है तो उन्हें बहुत क्रोध आया। पांडव अश्वत्थामा को ढूंढने निकल पड़े। अश्वत्थामा को ढूंढते-ढूंढते पांडव महर्षि व्यास के आश्रम तक आ गए। तभी उन्हें यहां अश्वत्थामा दिखाई दिया। पांडवों को आता देख अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।
उससे बचने के लिए अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र चलाया। दोनों अस्त्रों को टकराव से सृष्टि का नाश होने लगा। तभी महर्षि वेदव्यास ने अर्जुन और अश्वत्थामा को अपने-अपने शस्त्र लौटाने के लिए कहा। अर्जुन ने ऐसा ही किया किंतु अश्वत्थामा को अस्त्र लौटाने का विद्या नहीं आती थी। तब उसने अपने अस्त्र की दिशा बदल कर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी। ताकि पांडवों के वंश का नाश हो जाए। तब श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को सदियों तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया और उसके मस्तक की मणि निकाल ली।
11. स्त्री पर्व
जब कौरवों की हार और दुर्योधन की मृत्यु के बारे में धृतराष्ट्र, गांधारी आदि को पता चला तो हस्तिनापुर के महल में शोक छा गया। युद्ध में मृत्यु को प्राप्त वीरों की पत्नियां बिलख-बिलख कर रोने लगी। विदुर तथा संजय ने राजा धृतराष्ट्र को सांत्वना दी। अपने पुत्रों का संहार देखकर धृतराष्ट्र बेहोश हो गए। तब महर्षि वेदव्यास ने आकर उन्हें समझाया और सांत्वना प्रदान की। विदुरजी के कहने पर धृतराष्ट्र, गांधारी आदि कुरुकुल की स्त्रियां कुरुक्षेत्र चली गईं।
कुरुक्षेत्र में आकर श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र को समझाया तथा पांडव भी उनसे मिलने आए। धृतराष्ट्र ने कहा कि वह भीम को गले लगाना चाहते हैं जिसने अकेले ही मेरे पुत्रों को मार दिया। श्रीकृष्ण ने समझ लिया कि धृतराष्ट्र के मन में भीम के प्रति द्वेष है। इसलिए उन्होंने पहले ही भीम की लोहे की मूर्ति सामने खड़ी कर दी। धृतराष्ट्र ने उस मूर्ति को हृदय से लगाया तथा इतनी ज़ोर से दबाया कि वह चूर्ण हो गई। धृतराष्ट्र भीम को मरा समझकर रोने लगे, तब श्रीकृष्ण ने कहा कि वह भीम नहीं था, भीम की मूर्ति थी। यह जानकर धृतराष्ट्र बड़े लज्जित हुए।
श्रीकृष्ण पांडवों के साथ गांधारी के पास पहुंचे। वह दुर्योधन के शव से लिपट-लिपट कर रो रही थी। गांधारी ने श्रीकृष्ण को शाप दिया कि जिस तरह तुमने हमारे वंश का नाश कराया है, उसी तरह तुम्हारा भी परिवार नष्ट हो जाएगा। धृतराष्ट्र की आज्ञा से कौरव तथा पांडव वंश के सभी मृतकों का दाह-संस्कार कराया।
12. शान्ति पर्व
मृतकों का अंतिम संस्कार करने के बाद युधिष्ठिर आदि सभी एक महीने तक गंगा तट पर ही रुके। इसके बाद सर्वसम्मति से युधिष्ठिर का राज्याभिषेक किया गया।
राज्याभिषेक होने के बाद युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को अलग-अलग दायित्व दिए तथा विदुर, संजय और युयुत्सु को धृतराष्ट्र की सेवा में रहने के लिए कहा। इसके बाद श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह के पास ले गए। यहां भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर के धर्म, राजनीति, राजकार्य व धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि जुड़े अनेक प्रश्नों के उत्तर दिए।
13. अनुशासन पर्व
इस पर्व में भी भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को न्यायपूर्वक शासन करने का उपदेश दिया। सूर्य के उत्तरायण होने के बाद भीष्म अपनी इच्छा से मृत्यु का वरण करते हैं। पांडव पूरे विधि-विधान से भीष्म पितामह का अंतिम संस्कार करते हैं पुन: हस्तिनापुर लौट आते हैं।
14. आश्वमेधिक पर्वपितामह भीष्म की मृत्यु से युधिष्ठिर जब बहुत व्याकुल हो गए, तब महर्षि वेदव्यास युधिष्ठिर को अश्वमेध यज्ञ करने की सलाह देते हैं। तब युधिष्ठिर कहते हैं कि इस समय यज्ञ के लिए मेरे पास पर्याप्त धन नहीं है, तब महर्षि वेदव्यास ने बताया कि सत्ययुग में राजा मरुत्त थे। उनका धन आज भी हिमालय पर रखा है, यदि तुम वह धन ले आओ तो अश्वमेध यज्ञ कर सकते हो।
युधिष्ठिर ऐसा ही करने का निर्णय करते हैं। शुभ मुहूर्त देखकर युधिष्ठिर अपने भाइयों व सेना के साथ राजा मरुत्त का धन लेने हिमालय जाते हैं। जब पांडव धन ला रहे होते हैं, उसी समय अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा एक मृत शिशु को जन्म देती है। जब यह बात श्रीकृष्ण को पता चलती है तो वह उस मृत शिशु को जीवित कर देते हैं। श्रीकृष्ण उस बालक का नाम परीक्षित रखते हैं।
जब पांडव धन लेकर लौटते हैं और उन्हें परीक्षित के जन्म का समाचार मिलता है तो वे बहुत प्रसन्न होते हैं। इसके बाद राजा युधिष्ठिर समारोहपूर्वक अश्वमेध यज्ञ प्रारंभ करते हैं। युधिष्ठिर अर्जुन को यज्ञ के घोड़े का रक्षक नियुक्त करते हैं। अंत में बिना किसी रूकावट के राजा युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ पूर्ण होता है।
15. आश्रमवासिक पर्व
लगभग 15 वर्षों तक युधिष्ठिर के साथ रहने के बाद धृतराष्ट्र के मन में वैराग्य की उत्पत्ति होती है। तब धृतराष्ट्र के साथ गांधारी, कुंती, विदुर व संजय भी वन में तप करने चले जाते हैं। वन में रहते हुए धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती घोर तप करते हैं और विदुर तथा संजय इनकी सेवा करते थे। बहुत समय बीतने पर राजा युधिष्ठिर सपरिवार धृतराष्ट्र, गांधारी व अपनी माता कुंती से मिलने आते हैं। उसी समय वहां महर्षि वेदव्यास भी आते हैं। महर्षि वेदव्यास अपने तपोबल से एक रात के लिए युद्ध में मारे गए सभी वीरों को जीवित करते हैं।
रात भर अपने परिजनों के साथ रहकर वे सभी पुन: अपने-अपने लोकों में लौट जाते हैं। कुछ दिन वन में रहकर युधिष्ठिर आदि सभी पुन: हस्तिनापुर लौट आते हैं। इस घटना के करीब दो वर्ष बाद नारद मुनि युधिष्ठिर के पास आते हैं और बताते हैं कि धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती की मृत्यु जंगल में लगी आग के कारण हो गई है। यह सुनकर पांडवों को बहुत दुख होता है और वे धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती की आत्मशांति के लिए तर्पण आदि करते हैं।
16. मौसल पर्व
एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व आदि ऋषि द्वारिका आते हैं। वहां श्रीकृष्ण के पुत्र व अन्य युवक उनका अपमान कर देते हैं। क्रोधित होकर मुनि यदुवंशियों का नाश होने का श्राप देते हैं। एक दिन जब सभी यदुवंशी प्रभास क्षेत्र में एकत्रित होते हैं, तब वहां वे आपस में ही लड़कर मर जाते हैं। बलराम भी योगबल से अपना शरीर त्याग देते हैं। तब श्रीकृष्ण वन में एक पेड़ के नीचे बैठे होते हैं, तब एक शिकारी उनके पैर पर बाण चला देता है, जिससे श्रीकृष्ण भी शरीर त्याग कर स्वधाम चले जाते हैं।

जब यह बात अर्जुन को पता चलती है तो वह द्वारिका आते हैं और यदुवंशियों के परिवार को अपने साथ हस्तिनापुर ले जाते हैं। मार्ग में उन पर लुटेरे हमला कर देते हैं और बहुत सा धन व स्त्रियों को अपने साथ ले जाते हैं। यह देखकर अर्जुन बहुत लज्जित होते हैं। जब अर्जुन ये बात जाकर महर्षि वेदव्यास को बताते हैं तो वे पांडवों को परलोक यात्रा पर जाने के लिए कहते हैं।
17. महाप्रास्थानिक पर्व
श्रीकृष्ण की मृत्यु के बाद पांडव भी अत्यंत उदासीन रहने लगे तथा उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने हिमालय की यात्रा करने का निश्चय किया। अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को राजगद्दी सौंपकर युधिष्ठिर अपने चारों भाइयों और द्रौपदी के साथ चले गए तथा हिमालय पहुंचे। उनके साथ एक कुत्ता भी था। कुछ दूर चलने पर द्रौपदी गिर पड़ी। इसके बाद नकुल, सहदेव, अर्जुन व भीम भी गिर गए। युधिष्ठिर तथा वह कुत्ता आगे बढ़ते रहे।
युधिष्ठिर थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि स्वयं देवराज इंद्र अपने रथ पर सवार होकर युधिष्ठिर को सशरीर स्वर्ग ले जाने आए। तब युधिष्ठिर ने कहा कि यह कुत्ता भी मेरे साथ यहां तक आया है। इसलिए यह भी मेरे साथ स्वर्ग जाएगा। देवराज इंद्र कुत्ते को अपने साथ ले जाने को तैयार नहीं हुए तो युधिष्ठिर ने भी स्वर्ग जाने से इनकार कर दिया। युधिष्ठिर को अपने धर्म में स्थित देख वह यमराज अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए (कुत्ते के रूप में यमराज ही युधिष्ठिर के साथ थे)। इस प्रकार देवराज इंद्र युधिष्ठिर को सशरीर स्वर्ग ले गए।
18. स्वर्गारोहण पर्व
देवराज इंद्र युधिष्ठिर को स्वर्ग ले गए, तब वहां उन्हें दुर्योधन तो दिखाई दिया, लेकिन अपने भाई नजर नहीं आए। तब युधिष्ठिर ने इंद्र से कहा कि मैं वहीं जाना चाहता हूं, जहां मेरे भाई हैं। तब इंद्र ने उन्हें एक बहुत ही दुर्गम स्थान पर भेज दिया। वहां जाकर युधिष्ठिर ने देखा कि भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव व द्रौपदी वहां नरक में हैं तो उन्होंने भी उसी स्थान पर रहने का निश्चय किया। तभी वहां देवराज इंद्र आते हैं और बताते हैं कि तुमने अश्वत्थामा के मरने की बात कहकर छल से द्रोणाचार्य को उनके पुत्र की मृत्यु का विश्वास दिलाया था।
इसी के परिणाम स्वरूप तुम्हें भी छल से ही कुछ देर नरक देखना पड़ा। इसके बाद युधिष्ठिर देवराज इंद्र के कहने पर गंगा नदी में स्नान कर, अपना शरीर त्यागते हैं और इसके बाद उस स्थान पर जाते हैं, जहां उनके चारों भाई, कर्ण, भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रौपदी आदि आनंदपूर्वक विराजमान थे (वह भगवान का परमधाम था)। युधिष्ठिर को वहां भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन होते हैं। इस प्रकार महाभारत कथा का अंत होता है।
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