23.8.21

कुर्मी जाती का इतिहास :kurmi jati ka itihas



 कुर्मी एक अति प्राचीन जाति है । दरअसल यह सभी भारतीय जातियों की जननी है उसी तरह जैसे संस्कृत को सभी भारतीय भाषाओं की जननी कहा गया है । कुरमी समुदाय आदिकाल से चला आ रहा वह कृषक समाज है , जो भिन्न - भिन्न दौर से गुजरता हुआ , काल - चक्र के अनगिनत उतार - चढ़ाव देखता हुआ तथा परिस्थितियों से अनवरत जूझता रहा । इन आदि कृषकों ने क्षत्रित्व / राजसी जीवन प्रणाली तजकर अपने कुटुम्ब परिवारों के साथ ग्राम बसाकर एक स्थान पर जम कर रहना प्रारम्भ किये । इन परिवारों को कुटुम्ब कहा जाता था और परिवार के सदस्यों की जाति - बोधक संज्ञा कुटुम्बिन बन गयी । कालान्तर में कुनबी समुदाय देश में अन्यान्य क्षेत्रों में जहाँ अन्य लोग बसे , पहुंचे व कृषि कार्य को अपनाये रखा और स्थानान्तरण के कारण भाषा भेद से प्रभावित होकर उनका जाति - बोधक नाम कूर्मि , कुर्मी , कुरमी , कुनवी , कण्वी , कणयी , कुरमी , कुलमी , कुलवी , कुम्मा , कावू , कूर्मा , कोमरी , आदि होता चला गया । वर्तमान कुरमी और कुनवी शब्द प्राचीन कुटम्बिन शब्द के अपभ्रंश है । हिन्दी भाषी क्षेत्र के प्रमुख कुर्मी कुल : - चन्देल , चन्द्रनाहुँ , धमैला , अवधिया , पाटनवार , कोचैसा , मनवा , दिल्लीवार , बैसवार , गंगवार , तेलंग , घोड़चढ़े , दोजवार , क्षत्रिय , सवान , सोनवान , सैंभवार , कनुक , कटियार , रमैया , गौहाई , समसवार , जयसवार , बड़गैहा , सिंगरौल , गभेल , गहवई , तिरहुती , चन्द्रौल , कनौजिया , राजवाड़े , सराठे , श्रेष्ठी , मतालिया , देशहा , कुड़मी , मधुरवार , बड़वार , शंखवार , टिंडवार ,  गौर , उसरेटे , सिंगौर , सनोढ़िया , निरंजन , कैवर्त , अथरिया , खरेविन्द , गुजराती , यदुवंशी , पटेल , ठाकुर , राठौर , परिहार , गहरवार , शिरंगा , चन्द्रा इत्यादि है । कृषि के आविष्कार के साथ ही कुटुम्ब या परिवार नामक संस्था का आविर्भाव और विकास हुआ ; जो आज भी सामाजिक जीवन की महत्वपूर्ण इकाई के रूप में स्थापित है । कुटुम्ब के सदस्य को कुटुम्बिक कहा जाता था । धीरे - धीरे बोलचाल की भाषा में जिस प्रकार ब्राम्हण से बाभन , बम्भन , बरहमन आदि शब्द बनते गये , लक्ष्मण से लखन , स्वर्णकार से सोनार , कुम्भकार से कुम्हार शब्द बन गये वैसे ही लोक चलन में कुटुम्बी का टु गायब हो गया और कुम्बी , कुरमी , कुणबी , कणवी आदि शब्द चलन में आने लगे । व्याकरण सम्मत में बोले तो कुटुम्बिक तत्सम शब्द है ; जिसका अपभ्रंश रूप अर्थात् तत्भव शब्द कुम्बी , कुरमी , कुणबी , कणवी है । कुटुम्ब को कुल भी कहा जाता था । कुल से कुलम्बी , कुलवदी , कुलमी , कुरमी , कूर्मा , कापू . कम्मा , कूर्मि क्षत्रिय आदि शब्द भारत के विभिन्न क्षेत्रों / भागों में उच्चारण और योग भेद से चलित होते गये । कृर्मि जाति का इतिहास उतना ही पुरातन है , जितना कि मानव जाति । महाभारत , आदिपर्व 65 / 11 में " कश्यपातु तु इमा प्रजाः । " अर्थात कूर्म कश्यप मानव जाति का आदि पुरूष था । सम्पूर्ण प्रजाएँ कूर्म कश्यप से ही उत्पन्न कहा गया है । अत : कूर्म कश्यप को सम्पूर्ण मानव जाति का पूर्वज माना गया है । संसार की सारी ही जातियाँ कूर्म - कश्यप से उत्पन्न हुई हैं , परन्तु वे देश काल और परिस्थितियों के कारण अपने मूल पुरूष को भूल गये हैं । लेकिन कूर्मि जाति , आज भी अपने आदि पुरूष को गौरव के साथ नाम धारण करके उसकी कीर्ति को अमर किये हुए हैं । कूर्म कश्यप की सन्तान उस आदि पूर्वज के नाम पर स्वयं को कूर्मि , कुर्मी , कर्मवंशी , कण्वी , कश्यप , कश्यपगोत्री , कापु , कापेचार , कुड़मी आदि मानते और कहते हैं । सृष्टि के आदिकाल में “ कूर्म कश्यप " ने सृष्टि प्रारम्भ किया और तमसावृत वाष्पी वातारण में अभेद्य अंधकार और अपार तरल सलिल के भीतर प्रविष्ठ हो उत्पत्ति के उपयुक्त उपादानों को संग्लन किया , जिससे क्रमशः पृथ्वी का ठोस रूप में प्रादुर्भाव हुआ और उस पर प्रजोत्पत्ति हुई । कूर्म कश्यप की संतानों ने अपने जनक से पूछा कि वे पृथ्वी पर किस नाम से जाने जायेंगे और उनका क्या काम होगा । कूर्म कश्यप ने अपनी संतानों को पृथ्वी रमण करने और दोहन करने का काम सौंपा और कहा कि चूँकि तुम्हारा काम पृथ्वी पर रमण करने का है , इसलिए तुम कूर्मि नाम से जाने और पहचाने जाओगे । ' कू ' का अर्थ पृथ्वी होता है और ' रमी का अर्थ रमण करने वाला अर्थात पृथ्वी पर रमण करने वाला ही कूर्मि , कुर्मी या कुरमी , कुलमी कहलाता है । कूर्म अर्थात पृथ्वीदाता , भूमिपुत्र जिसका कर्म ( क्षेत्र ) भूमि हो , कृषि हो - कृषक कहलाता है । ्याकरण की दृष्टि से कूर्म शब्द में इनि ( इन् ) प्रत्यय लगाने से कृर्मिन शब्द बनता है । कर्मिनसे प्रथम विभक्ति के एक वचन में पुल्लिंग ' कर्मि " कर्मी ' शब्द बनता है , जो अत्यन्त प्राचीन शब्द है । कर्म शब्द का अर्थ स्वर्ग , पृथ्वी , रस और प्राण इत्यादि होता है । जो अत्यन्त प्राचीन शब्द है । कूर्म शब्द का अर्थ स्वर्ग , पृथ्वी , रस और प्राण इत्यादि होता है । अत : कूर्मि शब्द का अर्थ हुआ अत्यन्त पराक्रमी , तेजस्वी , प्राणवान , बलवान , पृथ्वीपति ( भूपति या राजा ) । स्पष्ट है कि ये सभी गुण एक क्षत्रिय के हैं , जिसकी प्राचीनता का प्रमाण वेद और पुराणों में भी अनेक मन्त्रों से मिलता है । कर्मि इन्द्रवाची है । कर्म , कश्यप और ब्रह्म तीनों एक ही है , और वे ही सष्टि के मल निर्मात हैं । वेदशास्त्रों के अनुसार कूर्म का अर्थ सूर्य , इन्द्र तथा कश्यप होता है । कूर्मि शब्द का अवतरण कूर्म शब्द से हुआ है । अत : कूर्म , कश्यप और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है और वे ही मानव जाति के आदि पुरूष थे । शतपथ ब्राम्हण 7 / 5 / 1 / 5 में भी कहा गया है कि - " स यत्कर्मो नाम एतदै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत यदसृजत । करोतंद्यद करोत्तस्मात्कूर्मः कश्ययो वै कूर्मस्तस्मादाहुः सर्वाःप्रजा : काश्यप्य इति । " अर्थात् " उस सृष्टिकर्ता का नाम कूर्म है । कूर्म का रूप धारण करके ही प्रजापति ने सम्पूर्ण प्रजाओं का सृजन किया । सृष्टि का सृजन करने के कारण ही उसे कूर्म कहा जाता है । कश्यप ही कूर्म हैं । इ ी कारण समस्त प्रजाएँ कश्यप अर्थात् कश्यप से उत्पन्न कही जाती है । " ऋग्वेद8 / 16 / 8 में कहा गया है कि " सस्तोभ्यः सहव्य सत्व : सत्वा । तुविकूर्मि : एकश्चित् सत्रभिभूति ॥ " अर्थात् “ महान कूर्मि कर्मयोगी है और वह स्तुति सत्कार तथा आह्वान के योग्य होता है , वह सत्य स्वरूप और महाबली होता है । वह अकेले भी विघ्न बाधाओं और शत्रु समूहों से कभी पराजित नहीं होता - सदा विजयी होता है । कर्मि प्रागैतिहासिक काल से है , तब तक तो वर्ण - व्यवस्था अनुसार समाज का विभाजन भी नहीं हुआ था , तब समाज में समता थी । कूर्मियों का अतीत प्रागवैदिक काल से , वैदिक काल और उससे पीछे इधर बौद्ध काल तक बड़ा उत्कृष्ट तथा शानदार रहा है । बौद्धकालीन भारत को पुनः सनातनी ढाँचे nindra Rise मद कूर्मि चेत सरोजनी नायडू कभि छत्रपति शिवाजी महाराज 13 फरवरी 1879 जान । ७करकटी 1630 112949 निर्वाण अप्रैल 1680 कूर्मियों की दिशा , दशातर विक्रम संवत् 2075 शक संवत् 1940 फरवरी कूर्मि समाज के संबंध में महत्वपूर्ण इम्पीरियल गजेटियर आफ इण्डिया ( एडीशन ) वाल्यूम 16 अनुसार - महाराष्ट्र मराठों का देश है जिनकी जनसंग समुदाय से उत्पन्न जनों के लिए रक्षित है , जो युद्ध प्रिय , परिश्रमी एवं बलवान होते हैं । एक बार जिनका भारत में आ में हैं । जो कुनवी ( कुरुवंशीय ) नाम से विख्यात है ।में बदलने में सामाजिक आपाधापी मची , जिस बहुत से जातियों को कट्टर पुरोहितवाद का कोप भाजन बनना पड़ा । ऐसे लोगों को किसी काल में समाज का सर्वेसर्वा बनाने का कार्य किया गया , जिन्होंने ब्राम्हणों को श्रेष्ठ माना और उनके अच्छे , बुरे आदेशों का पालन करते रहे । मध्यकालीन भारत में विशेष रूप से राजपूतों की मदद से ब्राम्हणों ने वैमनस्य तथा स्वार्थवश उनके वर्चस्व को अस्वीकार्य करने वाली अनेक जातियों को वर्णच्युत तक करने का कुत्सित प्रयास किया , जिसमें उन्हें अच्छी सफलता भी मिली । इसी काल में अन्य प्राचीन क्षत्रिय जातियों के साथ ही कूर्मियों के संबंध में भी अनेक भ्रान्तियाँ फैलाई गई । जिस समय संसार की अन्य जातियाँ सभ्यता की प्राचीन अवस्था में थी , उस समय भारत में कुर्मि क्षत्रिय महान साम्राज्यों के स्वामी थे तथा वे कला और साहित्य के संरक्षक थे । विश्व में ऐसी कोई भी अन्य जाति नहीं , जिसने इतने लम्बे समय से क्षत्रिय धर्म का मनसा , वाचा और कर्मणा पालन करता आ रहा हो । लेकिन सभी क्षत्रिय कूर्मि नहीं हैं , जबकि सभी कूर्मि जाति के लोग नि : सन्देह क्षत्रिय हैं । कर्मि मूल क्षत्रिय जाति है जो वैदिक काल से ही कर्मि जाति को स्थिर जीवी में परिणित किया है । लोग देश , काल और परिस्थितियों के कारण अपने मूल पुरूष कूर्म कश्यप को छोड़ते चले गये हैं । लेकिन कृर्मि या कूर्मी जाति के लोग आज भी अपने आदि पुरूष को गौरव के साथ धारण करके उसकी कीर्ति को अमर किये हुए हैं । कूर्म - कश्यप की कीर्ति महान गोत्र प्रवर्तक के रूप में भी अमर है । महाभारत , शाति - पर्व 296 / 17 , " मूल गोत्राणि चत्वरी सकुत्पन्ननि भारत । अंगिरा कश्यपश्चैव वसिष्ठो भूगरेव च । । " के अनुसार आरम्भ में अंगिरा , कश्यप , वशिष्ठ और भृगु नामक चार ऋषि ही कूल गोत्र प्रवर्तक थे , और - शेष गोत्रों के प्रवर्तक बाद में हुए । कश्यप चूँकि मानव जाति के आदि पुरूष थे , अत : जिस व्यक्ति को अपने गोत्र का ज्ञान नहीं होता वह भी बिना किसी संकोच के कश्यप को ही अपना गोत्र प्रवर्तक मानकर कश्यप गोत्र रख लेता है , क्योंकि कश्यप  सभी के पूर्वज हैं । आज भी कश्यप गोत्र सर्वाधिक लोकप्रिय और बड़ा है । उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अति प्राचीन काल में उसी महान कूर्म कश्यप के वंशज कूर्मवंशी कहलाए । अत : कूर्मि निःसन्देह क्षत्रिय हैं । कूर्मि शब्द का अपभ्रंश कालान्तर एवं स्थानांतरण द्वारा कुर्मी , कुरमी , कुण्वी , कनवी , कुडमी , कालवी आदि होता गया । कूर्मि शब्द का अस्तित्व वेद और पुराणों में अनेक मन्त्रों में मिलता है । देवराज इन्द्र को तुवि कूर्मि अथवा महान कूर्मि वेद के अनेक मंन्त्रों में कहा गया है । कृर्मि ऋषि तथा इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी भी वेद के अनेक मन्त्रों की दृष्टा एवं प्रकटकर्ता रही है । सूर्यवंश या कूर्मवंश ही प्रमुख क्षत्रिय वंश है । समूचे भारत में इसके अनेक कुल और वंश आज कूर्मि जाति के कुलों और वंशों के रूप में मिलते हैं । कालान्तर में किसी प्रसिद्ध राजा या ऋषि आदि के नाम पर भी कुछ कूर्मि लोग अपनी वंश परम्परा मानते हैं ; किन्तु समस्त कूर्मि जाति का उद्भव मुख्य रूप से कूर्मवंश या सूर्यवंश से होने के कारण कूर्मि जाति अपने को कूर्मवंशी कहती है । जिस प्रकार कुरू के वंशज कौरव , पाण्डु के वंशज पाण्डव तथा यदु के वंशज यादव कहलाये , उसी प्रकार महर्षि कूर्म के वंशज कौर्मि के नाम से विख्यात हुए । वर्तमान समय में कूर्मि , कुटुम्बी , कुनबी , कुलंबी आदि उसी के ही अपभ्रंश रूप हैं । महर्षि कूर्म के वंशज कूर्मवंशीय क्षत्रिय के नाम से जाने जाते हैं । बाम्बे गजेटियर बेलगाम जिल्द - 21 के अनुसार कुनबी ( कुर्मी ) लोगों के कुल सम्बन्धी नाम 292 हैं । सम्पूर्ण संख्या में से 102 की उत्पत्ति चन्द्र वंश से , 78 की उत्पत्ति सूर्य वंश से तथा 81 की उत्पत्ति ब्रम्ह वंश से मानी जाती है । शेष 31 कुलों के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उनका सम्बन्ध विविध वंशों से है । महर्षि पंतजलि ने व्याकरण महाभाष्य ( 1 . 1 . 1 ) में ' गो ' शब्द का उदाहरण देकर बतलाया है कि किस प्रकार एक मूल शब्द अपभ्रंश के कारण अनेक रूप धारण कर लेता है । मूलतः यह कृर्मि क्षत्रिय जाति उस सभ्यता की जनक है ; जिसने कृषि का आविष्कार करके उसकी गति की और आर्यो को यायावर ( घुमक्कड़ ) जीवन की अवस्था से स्थिर जीवन शैली वाली श्रेष्ठ और सुसंस्कृत जाति के रूप में परिणित किया । आर्यों के पूज्यतम देवराज इन्द्र थे , जिन्हें अनेक वैदिक मंत्रों में ' तुवि कूर्मि ' अर्थात महान पराक्रमी कर्मयोगी कहा गया है ( ऋवेद , 3 . 10 . 3 ) । कूर्मि का शाब्दिक अर्थ है - कर्मशील , पराक्रमी । तुवि कूर्मि का अर्थ है - अत्यन्त कार्यकुशल ,महान पराक्रमी , महान कर्मयोगी । महान कूर्मि कर्मयोगी है और वह स्तुति , सत्कार तथा आह्वान के योग्य है । वह सत्यस्वरूप और महाबली है । वह अकेले भी विघ्नबाधाओं और शत्रुसमूहों से कभी भी पराजित नहीं होता , सदैव विजयी होता है ( अवेद , 8 . 16 . 8 ) । वैदिक कालीन सुप्रसिद्ध मनीषी महर्षि कूर्म की वंशधर कूर्मवंशी क्षत्रिय जाति भारत की ही नहीं अपितु विश्व की प्राचीनतम विशुद्ध क्षत्रिय जाति है । कुरमी का शाब्दिक अर्थ भी सार्थक है । कु अर्थात पृथ्वी , रमी अर्थात रमी हुई या संलग्न । कुरमी अर्थात वह व्यक्ति या जाति जिसका कर्मक्षेत्र भूमि ऐतिहासिक प्रमाणों से यह तथ्य उजागर होता है कि कूर्मि जाति के पूर्वज उच्च कोटि के विशुद्ध पराक्रमी तथा शूरवीर क्षत्रिय थे । कूर्मि जाति विशुद्ध क्षत्रिय वर्ण की है , इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । कूर्मि जाति के आदि पूर्वज महर्षि कूर्म क्षत्रिय थे । अत : उनके वंशजों का क्षत्रित्व स्वयं सिद्ध है ( लघु नारदीय उपपुराण , चन्द्रवंशीय राजर्षि वर्णन , श्लोक 41 और 56 ) । यह अप्रतीम , अद्वितीय एवं वज्रबाहु महान कूर्मि सनातन काल से जगत को जीवनोपयोगी पदार्थ निश्चित तथा निर्बाध रूप से प्रदान करता आ रहा है ( ऋवेद , 8 . 2 . 31 ) । कूर्मि का जीवन कर्मशीलता , साहस , संग्राम , संघर्ष , आशा , उत्साह , उमंग तथा उल्लास का होता है । वह साहस के साथ संकटों का सामना करता है । वह संसार में परिस्थितियों का कभी दास नहीं बनता , अपितु उनका स्वामी बनकर जीवन को ज्योतिर्मय बना लेने में समर्थ होता है । वह मंगलमयी , आशामयी , उदात्त भावनाओं का केन्द्र है । वह अपने चारों ओर , न केवल अपनी जाति में , न केवल अपने देश या राष्ट्र में , न केवल पृथ्वी पर , अपितु समस्त विश्व में सुख , शान्ति , सौमनस्य , सौहार्द तथा प्रकाश का साम्राज्य चाहता है । उसका दृष्टिकोण अत्यधिक विशाल होता है ( ऋवेद , 6 . 52 . 5 ) .बृहत् हिन्दी कोश ( सम्पादक कालिका प्रसाद , ज्ञानमण्डल , वाराणसी , पृष्ठ - 303 ) में कूर्म शब्द के अर्थ हैं - कूर्म - विष्णु के दस अवतारों में से दूसरा कच्छपावतार , कूर्मक्षेत्र - एक हिन्दू तीर्थ , कूर्म पुराण - 18 पुराणों में से एक , जिसमें कूर्मावतार की कथा है । कूर्म कश्यप चूंकि प्रजापालक और सृष्टा थे , अत : उन्हें प्रजापति भी कहा गया है ( शतपथ ब्राम्हण , 7 . 5 . 1 . 5 ) । कूर्म शब्द इतना व्यापक हुआ कि आकाश और पृथ्वी का नाम ही कूर्म पड़ गया ( यजुर्वेद , 24 . 34 और शतपथ ब्राम्हण , 7 . 5 . 1 . 5 ) । कूर्मि - कु अर्थात पृथ्वी और उर्मि अर्थात गोद । इस प्रकार कूर्मि शब्द से तात्पर्य है पृथ्वी की गोद में पलने वाला या पृथ्वीपुत्र । कहा भी गया है - भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ । कूरम - कु अर्थात पृथ्वी और रम अर्थात पति या बल्लभ । अत : करम शब्द का अर्थ है भूपति या पृथ्वीपति जो कि क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है । कहा गया है - क्षेत्रात रमेत सः क्षत्रियः । इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका ( चौदहवां संस्करण , 1768 ई . जिल्द - 13 , पृष्ठ - 517 ) में कुनबी जाति के बारे में कहा गया है - कुनबी , महान हिन्दू कृषक जाति है , जो मुख्यत : पश्चिमी भारत में पायी जाती है । यह मद्रास के तेलगू प्रदेश के कापू , बेलगाम के कुलबी , दक्षिण के कुलम्बी , दक्षिणी कोकण के कुलवदी , गुजरात के कणबी तथा भडोच के पाटीदारों के समरूप है । कुनबियों में विधवा पुनर्विवाह तथा बहुपत्नी प्रथा को सामाजिक स्वीकृति है ; किन्तु बहुपत्नी प्रथा बहुत कम व्यवहार में है । वर्षाऋतु के मध्य में मनाया जाने वाला ' पोला ' कूर्मियों का प्रमुख त्योहार है । इसमें वे हल बैलों का जुलुस निकालते हैं । नृवंशीय दृष्टि से महरट्टा ( मराठा ) तथा कृषिकर्मी कुनबी समान हैं । दोनों में ही विशिष्ट मौलिक पैतृक गुण हैं । कुनबी ( गृहस्थ वैदिकोत्तर संस्कृत कुटुम्बिक ; जो आदिम शब्द का संस्कृत रूप हो सकता है ) पश्चिमी भारत की महान कृषक जाति है । उत्तर में , जहाँ गंगा के अगल - बगल तथा उसके दक्षिण में यह जाति अधिक संख्या में है , वहाँ पर कुनबी नाम कुरमी हो जाता है । वेदों के भाष्यकाराचार्य कूर्म ' तथा ' कूर्मि ' शब्दों की व्याकरण सम्मत व्याख्या करते हुए लिखते हैं - कूर्म : ( रसो वीर्य तेजो वा ) अस्ति अस्य इति कूर्मी अर्थात रसवान , वीर्यवान , तेजवान कूर्मी । जिसके पास जीवनरस , वीर्यबल तथा तेजस्विता रहती है , वही कूर्मि है । कूर्मः ( प्रप्राणी बलं क्षत्रं राष्ट्र वा ) अस्ति अस्य इति कूर्मी अर्थात प्राणवान , बलवान , क्षत्रिय ( क्षत्रपति ) , राष्ट्री ( राष्ट्रपति ) कूर्मी । जिसके अधिपत्य में प्रप्राण , बल , क्षत्र ( क्षत्रियत्व अथवा राष्ट्रपतित्व ) है , वही कूर्मि है । कूर्मः ( भारतवर्ष देशो ) अस्ति अस्य इति कूर्मी अर्थात कूर्म नामक भारतवर्ष जिसके आधिपत्य में है , वही कूर्मि है । _ _ _ _ कर्मशीलता और दूरदर्शिता के बल पर ही परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना की , इसलिए उसे ' कूर्म ' और ' कश्यप ' कहा जाता है । कूर्म ' का शाब्दिक अर्थ कर्मशील ' और ' कश्यप का शाब्दिक अर्थ ' दृष्टा ' है । कर्म और ज्ञान दोनों की समन्वित शक्तियों के बल पर अभी भी सृष्टि का विकास हो रहा है । सृष्टिकर्ता को कूर्म कहा जाता है क्योंकि उसमें श्रेष्ठ कर्मशीलता और पराक्रम है । साथ ही वह महान ज्ञानी , सर्वदृष्टा और सूक्ष्मदर्शी है , इसलिए उसे कश्यप भी कहा जाता है । इस प्रकार कूर्म और कश्यप दोनों एक ही शक्ति के दो पहलू हैं । कश्यप ही कर्म है और परमेश्वर का ही नाम कश्यप है ( ऋवेदादि भाष्य भूमिका , पृष्ठ - 315 ) । _ _ कश्यप , पश्यक अर्थात सर्वद्रष्टा होता है क्योंकि वह सब कुछ सूक्ष्मता के साथ देख लेता है ( तैत्तिरीय अरण्यक , 1 . 8 . 8 ) । उस सृष्टिकर्ता का नाम कूर्म है । कूर्म का रूप धारण करके ही प्रजापति ने सम्पूर्ण प्रजाओं का सृजन किया । सृष्टि का सृजन करने के कारण ही उसे कूर्म कहा जाता है । कश्यप ही कूर्म है । इसी कारण समस्त प्रजाएँ काश्यप्य अर्थात कश्यप से उत्पन्न कही जाती है ( शतपथ ब्राम्हण , 7 . 5 . 1 . 5 ) सृष्टि और प्रजा का पालनकर्ता होने के कारण ही कूर्म को प्रजापति कहा गया है । कूर्म के अत्यन्त तेजस्वी होने के कारण उस आदित्य अर्थात सूर्य भी कहा गया है ( शतपथ ब्राम्हण , 7 . 5 . 1 . 6 ) । कूर्म - कश्यप , मानव जाति का आदि पुरूष था । सम्पूर्ण प्रजाएँ कूर्म - कश्यप से ही उत्पन्न हुई ( महाभारत , आदिपर्व , 65 . 11 ) । यजुर्वेद में भी उसे प्रजापति और आदित्य दोनों कहा गया है ( यजुर्वेद , 13 . 30 का महीधर भाष्य ) । राजर्षि कूर्म सुप्रसिद्ध वैदिक ऋषि गृत्समद के पुत्र थे ( ऋवेद , 1 . 27 ) । अति प्राचीन काल में उसी महान ऋषि कूर्म के वंशज कूर्मवंशी कहलाये । चूंकि कूर्म और सूर्य अर्थात आदित्य एक हैं इसलिए उन्हें सूर्यवंशी भी कहा जाता है । संसार की सारी जातियाँ कूर्म - कश्यप से उत्पन्न हुई हैं ; परन्तु वे अपने मूल पुरूष को भूल गईं हैं । महान गोत्र प्रवर्तक के रूप में कूर्म कश्यप की कीर्ति अमर है । .' सयः स कूर्मोऽसौस आदित्यः ' के अनुसार आदित्य ( सूर्य ) का नाम कूर्म है । अत : सूर्यवंश , कूर्मवंश का ही नामान्तरण है । उपरोक्त वंश संरचना से स्पष्ट है कि वैवस्वत मन्वन्तर के आद्य त्रेता युग के प्रारम्भ में मारीचि कश्यप हुए हैं ( वायु पुराण , 6 . 43 ) । सम्पूर्ण मानव जाति के आदि पुरूष कूर्म कश्यप अत्यन्त पुरातन काल में विद्यमान थे । महर्षि कश्यप की पत्नी मनुर्भरतवंश के 45वीं पीढ़ी में उत्तानपाद शाखा के प्रजापति दक्ष की पुत्री अदिति थी ( बृहद्वेता , 3 . 57 ) । इनसे 12 आदित्यों का जन्म हुआ । सबसे बड़े आदित्य वरूण तथा सबसे छोटे आदित्य विवस्वान ( सूर्य ) थे । इन्हीं विवस्वान या सूर्य से सूर्यवंश चला । विवस्वान के पुत्र मनु , वैवस्वत मनु जिनका मन्वन्तर चल रहा है . . . . . विभिन्न पुराण , ग्रंथ , साहित्य , दस्तावेज में कर्मियों के ऐतिहासिक प्रमाण रामायण काल में कूर्म , कूर्मि - इन्दतु मम दीस्य , मनोभूयः प्रकर्षति । यदि हास्य प्रिया ख्यातुन कूर्मि सदृशं प्रियम् । । रामभक्त हनुमान के लिए भी कूर्मि शब्द विशेषण के रूप में वाल्मीकी रामायण में मिलता है । श्री राम कहते हैं कि मुझ दीन का मन फिर हनुमान की ओर आकर्षित होता है , क्योंकि प्रिय हित करने वाले हनुमान कूर्मि समान प्रिय मुझे और कोई नही है । वाल्मीकी ऋषि ने यहाँ हनुमान को महावीर तथा अन्य गुणों को ध्यान रखकर कूर्मि विशेषण से संबोधित किया है । हरिवंशपुराण हरिवंश पुराण के अध्याय 53 श्लोक 6 / 7 में रूक्मिनी के स्वयंवर में अतिबलशाली योद्धा के लिए महाकर्म कहा गया हैजरासंधः सुनीथश्च , दन्त वार्यवान साल्व सौभपतिश्चैव । महाकूर्मश्च पार्थिक , कथकैशिक मुख्याश्च , नृपाः प्रवरवंशजा । । अर्थात् जरासंध , सुनीथ , पराक्रमी दन्तवक्र , साल्व , सौभपति , राजा महाकूर्म ( मरूत , कुन्ति , भोज ) और श्रेष्ठ वंशोत्पन्न कथ तथा कैशिक आदि राजेमहाराजे रूक्मिनी के स्वयंवर में शामिल हए । मार्कण्डेयपुराण मार्कण्डेय पुराण के 57 / 50 में पुलिन्द तथा सुमीन देशों के पश्चात् कुरूमी ( कुरूमिन ) देश का उल्लेख किया गया है पुलिन्दाश्च सुमीनाश्च रूपया : स्वापदै सह । तथा कुरूमिनश्चैव सर्व चैव कठाक्षराः । इस श्लोक में प्रयुक्त कुरूमिन शब्द भी कृर्मियों की प्राचीनता का साक्ष्य प्रस्तुत करता है । कूर्मावतार भगवान विष्णु के दशावतारों में प्रथम मत्स्यावतार और दूसरा कूर्मावतार कहा गया है । कूर्म भगवान का अवतार उत्तराखंड में हुआ था , इसी से वह भूभाग पुराणों में कूमांचल कहलाया । आजकल इसे कुमाऊँ कहा जाता है । जिस स्थान पर कूर्म भगवान अवतरित हुए थे , उस स्थान का नाम चम्पावत है । वहाँ पर कूर्म भगवान का भी मंदिर है जिसमें उनके चरण चिन्ह शिला पर अंकित है । राजतरंगिनी एवं नीलमत पुराण में उल्लेख है कि कश्मीर की भूमि पहले जलमग्न थी । ऋषि कश्यप ( कूर्म ) ने उस जल को सोख लिया था । पं भगवदत्त कृत भारतवर्ष का इतिहास ' द्वितीय संस्करण 1946 पृ . 44 अनुसार कश्यप और कूर्म एक ही शक्ति के द्योतक हैं । अर्थात् दोनों भिन्न रूप में न होकर एक रूपा है - कश्यपो वै कूर्म ( श . ब्रा . 7 / 7 / 1 / 5 ) | सागर मंथन के अवसर पर कूर्म - कच्छप का रूप धारण करके जगत का कल्याण व रक्षा करने वाले विष्णु भगवान को इसी कारण ' आदि कूर्म ' विशेषण से संबोधित किया जाता है । अनन्तो वासुकि : शेषो कराहो धरणीधरः । पयः क्षीर विवेकाढ्यो हंसो हैमगिरि स्थितः । । हयग्रीवो विशालाक्षो हयकर्णो हमाकृतिः । मन्थनो रलहारी चंकूर्मोधर धराधरः । । - विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र भार्गव उपपुराण उत्तरार्द्ध सूर्यवंशीय राजर्षि वर्णन अध्याय 15 में अंकित कृर्मि संज्ञां लभन्ते ते क्षत्रियाः कर्म संज्ञका : वंशजा : । भूमिधारण कर्तारस्तुवि कूर्मि यथा दिवि । । भार्गव उपपुराण उत्तरार्द्ध सूर्यवंशीय राजर्षि वर्णन अध्याय 15 श्लोक 25 , 26 , 27 में वर्णन है वीतहव्यो नृपः कौर्मः सूर्यवंशस्य भूषणः । तत्पन्यां गृत्समदोऽभूह ह्याम्बिकायां महाबलः । । तत्पुत्रोनामतः कूर्मो राजर्षि प्रवरःशुभः । मंत्र दृष्टा सदाचारः क्षात्रधर्मपरायणः । । तत्पुत्रा विष्णुसेनांद्या : कूर्मवंश विवर्धनाः । तत्पुत्रैश्च प्रपोत्रैश्च व्याप्तं पण्डलम् । । _ _ _ अर्थात् कूर्मवंश में उत्पन्न सूर्यवंश की शोभा बढ़ाने वाला वीतहव्य नामक राजा हुआ । उनकी पत्नी अम्बिका से महाबली गृत्समद उत्पन्न हुए । उनके पुत्र कूर्म नामक अति श्रेष्ठ राजर्षि हुए । वे क्षात्र धर्मपरायण , सदाचारी और मंत्रदृष्टा हुए । कूर्म वंश की समृद्धि करने वाले विष्णु सेना आदि अनेक पुत्र हुए । उनके पुत्रों और प्रपौत्रों से भू - मण्डल भर गया । शतपथ ब्राह्मण प्राणो वै कूर्मो ! कूर्म को प्राण कहा गया है । इसी ब्राह्मण ग्रंथ में आगे प्राणो वै क्षत्रम् ! प्राण क्षेत्र के वाचक रूप में प्रयुक्त है । पन : इसी ग्रंथ में - प्राणो वै बलम् ! प्राण , बल का वाचक है । " सयःस कूर्मो वयं सौ आदित्यः " " वृषा वैकूर्मो योषा साढ़ ' । तदानुसार कूर्म , आदित्य सूर्य और वृषा यानी इन्द्र के नाम हैं । " द्यावा पृथ्वीयो ही कूर्म : " यानि स्वर्ग ( यौ ) और पृथ्वी का नाम कूर्म है । अब प्रश्न - कूर्म शब्द से कूर्मि कैसे संबंधित है ? स्व . देवी प्रसाद सिंह चौधरी द्वारा रचित छत्र प्रभाकर से निम्न समाधान कूर्मि शब्द में तदस्यास्ति इति मतुप् अर्थ में संज्ञायांमन्माभ्याम् ( पाणि नी 5 / 2 / 137 ) द्वारा इनी ( इन ) प्रत्यय लगाने से कूर्मिन शब्द बनता है । फिर सौच ( पाणिनी 6 / 4 / 13 ) हलढ्याभ्यो ,दीर्घात्सुतिस्य पृक्तं हल् ( पा . 8 / 1 / 68 ) और न लोप : प्रातिपदिक कांतस्य ( प्रा . 8 / 2 / 17 ) द्वारा कूर्मिन से प्रथमा विभक्ति के एक वचन में कूर्मि शब्द सिद्ध होता है । उक्त विवेचना के उपरांत लेखक द्वारा निम्न निर्णय दर्शित है - कूर्म : ( द्यौ स्वर्गों वा ) अस्तस्य कूर्म : दिवस्पति : इन्द्र । । कूर्मि : ( पृथ्वी ) अस्तस्य कूर्मि - पृथ्वीपतिः | Lord of the earth king | कूर्म : ( रसोविर्यवा ) अस्तस्य कृर्मि - रसवान , वीर्यवान | Spints , Vigorous | कूर्म : ( प्राणोबलं छत्रं वा ) अस्तस्य कूर्मि - प्राणवान , बलवान , क्षत्रिय , स्ट्रांग , स्टाऊट । कूर्मि ( प्रतिपादिक कूर्मिन ) अति प्राचीन शब्द है और वेद में क्षत्रिय राज इन्द्र की संज्ञा में प्रयुक्त पाया जाता है ।
जाति भेद और छुआछूत की मार से बचनेके लिए 1909 में चुनार (उत्तर प्रदेश) महासभा में कुर्मी के साथ क्षत्रिय शब्द जोडा गया . जब कि पहले जाति का नाम ऐसा नहीं था कुर्मी जाति का प्राचीन नाम शायद कुडमी(कुलमी) था उत्तर-प्रदेश मध्य -प्रदेश में इसकी भनक मिलती है झारखंड क्षेत्र में इनकी मातृ भाषा कुड़माली में इस जाति का नाम कुड़मी है. इग्लिश में ड़ के लिए कोई अक्षर नहीं है. इसलिए अंग्रेजी मे इस जाति का नाम KURMI लिखा गया और भारतीय इसे कूर्मि पढ़ने लगे. वेद पुराण शास्त्र का तुवि कूर्मि(ईन्द्र) , कूर्म कश्यप , कूर्म कृषि से समानता होने से कुरिमी इनकी वंशज और क्षत्रिय मानना शुरू किया और अपने पूर्व पुरुष की महतो उपाधि को छोड़कर सिंह, वर्मा, पटेल आदि उपाधि धारण किया ताकि शूद्र वर्ण से छुटकारा मिले . क्षत्रिय के ढेर सारे गौत्र में से इनको सिर्फ कश्यप गोत्र मिला. हिन्दुओं में सगोत्र विवाह वर्जित है, मात्र कुर्मियों में एक कश्यप गोत्र में विवाह चालू है. इसीलिए झारखण्डी कुड़मी (कुर्मी) अपने टोटेमिक वंश को छोड़ते नहीं . हैं .
शिवाजी :- शिवाजी1627-1687) छत्रपति महाराज थे तो उनके वंशज कुनबी कूर्मिक्षत्रिय हैं
शिवाजी अपने अदम्य पुरुषार्थ से महाराजा तो बन गए , परन्तु राजा मानने में द्विजाति सवर्णों में शंका थी, क्योंकि उनका जनेऊ नहीं हुआ था. क्षत्रियों का का जनेऊ संस्कार और राज्याभिषेक होता  था . मराठा चितपावन ब्राह्मणें ने शिवाजी को शूद्र कुुनबी किसान का वशज माना और क्षत्रिय वर्ण का संस्कार न देने का फैसला किया .
मनुस्मृति के ये दो द्रष्टव्य विधान ;-
शूद्राय मतिं ददयाग्रोच्छिष्ट न हविष्कृतम
न च अस्य उपदिश : धर्म न चास्य व्रतमासिशेत(४/८०)
शूद्र को ग्यान हविष, धर्मवाणी व्रत (जनेऊ संस्कार) नहीं देना चाहिए
योद्दयस्य धर्ममाचष्टे यशेयदिशाति व्रतम
सोs संवृतं नाक तम: सह तनैव मज्जति (४/८१)
जो इस (शूद्र) को धर्म -उपदेश, व्रतसंस्कार देगा , वह (पुरोहित) उस शूद्र के साथ असंवृत नरक दंड भोगेगा.
शिवाजी को धर्न के अनुसार राजा बनाने के लिए उनके एक कायस्थ मंत्री बालाजी अबजी वाराणसी के एक पतित पंडित गागाभट्ट को तीन लाख रुपए देकर अभिषेक के लिए राजी कराया उसने प्रमाण दिया कि शिवाजी चित्तोर के सिसौदिया राजपूत राणाप्रताप के वंशज हैं यानी जन्म से वह क्षत्रिय कुल से हैं , शूद्र कुल से नहीं हैं तो ब्रत,अभिषेक का कोई पाबंदी नहीं
अत: शिवाजी का व्रतऔर अभिषेक ४७ वर्ष की आयु में हुआ ,किन्तु वाद में गागाभट्ट के सहयोग से बनायी गई वंशावली झूठी निकली , क्योंकि शिवाजी और राणाप्रताप के गोत्र इतिहासकारों ने अलग -अलग प्रमाणित
किए हैं.
छत्रपति शाहूजी महाराज(१८७४-१९२२)
१८९९ में ब्राह्मण को दान करते वक्त देखा कि वह बिना स्नान किए आया था. शाहूजी महाराज ने पूछा तो उसने बताया कि शद्र राजा से दान लेने में नहाना जरूरी नहीं . शाहू जी बोले वे शिवाजी के वंशज क्षत्रिय हैं उसने कहा शिवाजी एक शूद्र कुनबी किसान का बेटा अक्षत्रिय राजा था ब्राह्मण समाज और शंकराचार्य की मान्यता बिना किसी को क्षत्रिय नहीं माना जाएगा
राजाजी सदमा से उठे और देखा कि उनके ७१ पदाधिकारियों में से ६१ ब्राह्मण थे १९०२ में उन्होंने अब्राह्मण के लिए ५० प्रतिशत आरक्षण दिया अपने कोल्हापुर राज्य में इसलिए उन्हें आरक्षण का जनक कहा जाता है.उन्होंने जनेऊ छोडा़,व्रत संस्कार छोड दिया. मठकी संपत्ति जप्त कर साधारण वर्गों की शिक्षा में विनीयोग किया तिलक की पत्रिका केशरी ने उन्हें हिन्दू विरोधी बताया उनको मारने के लिए उनकी कार पर बम फेका गया ,पर वे बच गए.
अखिल भारतीय कूर्मि क्षत्रिय महासभा के १९१९ के अधिवेशन में उनको सभापति बनाकर राजर्षि उपाधि दिया गया . क्या उनको ब्राह्मण पदोन्नति मिला ?
अरविंद स्वामी विवेकानंद आदि महामनिषियों को भी शूद्र संतान कहा गया . उनको ब्राह्मण पदोन्नति नहीं मिली.
अभी मातृभूमि की रक्षा के लिए शहीद हो जीने वाले जवानों को हिन्दूधर्म  क्षत्रिय की मान्यता नहीं दे रहा है.
उत्तर भारत में एक कहावत प्रचलित है :-
भले जात कुनबीन कि खुरपि हाथ!
खेत निरावे अपने पी के साथ !
कुर्मी (कुनबी ) औरतों का अपने पति  के साथ खेत में काम करना एक आम बात है. इस किसान जाति में कभी राजा , महाराजा हुए होंगे , कोई सिपाई सैनिक होंगे , आम कुर्मी तो किसान ही है. इन्हें  ब्राह्मण समाज या शंकराचार्य ने क्षत्रिय की मान्यता नहीं दी है. 
इसी कूर्म वंश में छत्रपति शिवाजी महाराज, छत्रपति संभाजी महाराज, राजा मिहिरभोज, राजा चोलम प्रथम जैसे वीरो ने जन्म लिया।विश्व की प्राचीनतम पुस्तक वेदों में भी कूर्म वंश का उल्लेख मिलता है जोकि कुर्मी समाज की प्राचीनता को रेखांकित करता  है।
  पूरा दक्षिण-एशिया कूर्म वंश के राज के अंदर रह चुका हैं।  राजा चोलम प्रथम व राजेन्द्र चोल जैसे कुर्मी वीरो ने दक्षिण-पूर्व देशों के ऊपर भी विजय प्राप्त की और भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म का प्रचार किया
जिसका अंश आज भी मलेशिया, थाईलैंड जैसे कई अन्य दक्षिण-पूर्वी देशों में दिखाई देती है।भारतीय संस्कृति व कला में कुर्मियों का एक बड़ा योगदान है

पूरे विश्व मे कुर्मियों की आबादी 33 करोड़ है जो कि अमेरिका की जनसंख्या से भी ज़्यादा है। प्राचीनकाल से ही कुर्मी वंश ने आर्यावर्त की सीमाओं की रक्षा की ही और आज भी कर रहे है।
भारत के 29 राज्यो में से 6 राज्यो के मुख्यमंत्री कुर्मी समाज से हैं (गोवा, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़)।
क्षेत्र के हिसाब से कुर्मी समाज के अनेको नाम है जैसे मराठा, पटेल, पाटीदार, गूर्जर, मलिंगा, कम्मा, कापू, वोकलिंग, कुडुम्बर, कलबी, कुनबी, कुड़मी, कंबोज ।
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28.7.21

कुलदेवी और देवताओं के बारे में ऐसी जानकारी जो आप नहीं जानते होंगे

                                                   
                                                             

                                           
राठौड़ कुल की कुलदेवी नागणेचिया माताजी

                                            
 भारत में कई समाज या जाति के कुलदेवी और देवता होते हैं। इसके अलावा पितृदेव भी होते हैं। भारतीय लोग हजारों वर्षों से अपने कुलदेवी और देवता की पूजा करते आ रहे हैं। कुलदेवी और देवता को पूजने के पीछे एक गहरा रहस्य है, जो बहुत कम लोग जानते होंगे। आओ जानते हैं कि सभी के कुलदेवी-देवता अलग क्यों होते हैं और उन्हें क्यों पूजना जरूरी होता है?
जन्म, विवाह आदि मांगलिक कार्यों में कुलदेवी या देवताओं के स्थान पर जाकर उनकी पूजा की जाती है या उनके नाम से स्तुति की जाती है। इसके अलावा एक ऐसा भी दिन होता है जबकि संबंधित कुल के लोग अपने देवी और देवता के स्थान पर इकट्ठा होते हैं। जिन लोगों को अपने कुलदेवी और देवता के बारे में नहीं मालूम है या जो भूल गए हैं, वे अपने कुल की शाखा और जड़ों से कट गए हैं।
सवाल यह है कि कुल देवता और कुलदेवी सभी के अलग-अलग क्यों होते हैं? इसका उत्तर यह है कि कुल अलग है, तो स्वाभाविक है कि कुलदेवी-देवता भी-अलग अलग ही होंगे। दरअसल, हजारों वर्षों से अपने कुल को संगठित करने और उसके इतिहास को संरक्षित करने के लिए ही कुलदेवी और देवताओं को एक निश्‍चित स्थान पर नियुक्त किया जाता था। वह स्थान उस वंश या कुल के लोगों का मूल स्थान होता था।
मान लो कोई व्यक्ति गुजरात में रहता है लेकिन उसके कुलदेवी और देवता राजस्थान के किसी स्थान पर हैं। यदि उस व्यक्ति को यह मालूम है कि मेरे कुलदेवी और देवता उक्त स्थान पर हैं, तो वह वहां जाकर अपने कुल के लोगों से मिल सकता है। वहां हजारों लोग किसी खास दिन इकट्ठा होते हैं। इसका मतलब है कि वे हजारों लोग आप ही के कुल के हैं। हालांकि कुछ स्‍थान इतने प्रसिद्ध हो गए हैं कि वहां दूसरे कुल के लोग भी दर्शन करने आते हैं।
उदाहरणार्थ आपके परदादा के परदादा ने किसी दौर में कहीं से किसी भी कारणवश पलायन करके जब किसी दूसरी जगह रैन-बसेरा बसाया होगा तो निश्चित ही उन्होंने वहां पर एक छोटा सा मंदिर बनाया होगा, जहां पर आपके कुलदेवी और देवता की मूर्तियां रखी होंगी। सभी उस मंदिर से जुड़े रहकर यह जानते थे कि हमारे कुल का मूल क्या है?


यह उस दौर की बात है, जब लोगों को आक्रांताओं से बचने के लिए एक शहर से दूसरे शहर या एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन करना होता था। ऐसे में वे अपने साथ अपने कुल और जाति के लोगों को संगठित और बचाए रखने के लिए वे एक जगह ऐसा मंदिर बनाते थे, जहां पर कि उनके कुल के बिखरे हुए लोग इकट्टा हो सकें।
पहले यह होता था कि मंदिर से जुड़े व्यक्ति के पास एक बड़ी-सी पोथी होती थी जिसमें वह उन लोगों के नाम, पते और गोत्र दर्ज करता था, जो आकर दर्ज करवाते थे। इस तरह एक ही कुल के लोगों का एक डाटा तैयार हो जाता था। यह कार्य वैसा ही था, जैसा कि गंगा किनारे बैठा तीर्थ पुरोहित या पंडे आपके कुल और गोत्र का नाम दर्ज करते हैं। आपको अपने परदादा के परदादा का नाम नहीं मालूम होगा लेकिन उन तीर्थ पुरोहित के पास आपके पूर्वजों के नाम लिखे होते हैं।
इसी तरह कुलदेवी और देवता आपको आपके पूर्वजों से ही नहीं जोड़ते बल्कि वह वर्तमान में जिंदा आपके कुल खानदान के हजारों अनजान लोगों से भी मिलने का जरिया भी बनते हैं। इसीलिए कुलदेवी और कुल देवता को पूजने का महत्व है। इससे आप अपने वंशवृक्ष से जुड़े रहते हैं और यदि यह सत्य है कि आत्मा होती है और पूर्वज होते हैं, तो वे भी आपको कहीं से देख रहे होते हैं। उन्हें यह देखकर अच्‍छा लगता है और वे आपको ढेर सारे आशीर्वाद देते हैं।
अब फिर से समझें कि प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी देवी, देवता या ऋषि के वंशज से संबंधित है। उसके गोत्र से यह पता चलता है कि वह किस वंश से संबधित है। मान लीजिए किसी व्यक्ति का गोत्र भारद्वाज है तो वह भारद्वाज ऋषि की संतान है। कालांतर में भारद्वाज के कुल में ही आगे चलकर कोई व्यक्ति हुआ और उसने अपने नाम से कुल चलाया, तो उस कुल को उस नाम से लोग जानने लगे। इस तरह हमें भारद्वाज गोत्र के लोग सभी जाति और समाज में मिल जाएंगे।
 हर जाति वर्ग, किसी न किसी ऋषि की संतान है और उन मूल ऋषि से उत्पन्न संतान के लिए वे ऋषि या ऋषि पत्नी कुलदेव व कुलदेवी के रूप में पूज्य हैं। इसके अलावा किसी कुल के पूर्वजों के खानदान के वरिष्ठों ने अपने लिए उपयुक्त कुल देवता अथवा कुलदेवी का चुनाव कर उन्हें पूजित करना शुरू किया और उसके लिए एक निश्चित जगह एक मंदिर बनवाया ताकि एक आध्यात्मिक और पारलौकिक शक्ति से उनका कुल जुड़ा रहे और वहां से उसकी रक्षा होती रहे।
 जाति इतिहास लेखक डॉ .दयाराम आलोक के अनुसार कुलदेवी या देवता कुल या वंश के रक्षक देवी-देवता होते हैं। ये घर-परिवार या वंश-परंपरा के प्रथम पूज्य तथा मूल अधिकारी देव होते हैं। इनकी गणना हमारे घर के बुजुर्ग सदस्यों जैसी होती है। अत: प्रत्येक कार्य में इन्हें याद करना जरूरी होता है। इनका प्रभाव इतना महत्वपूर्ण होता है कि यदि ये रुष्ट हो जाएं तो हनुमानजी के अलावा अन्य कोई देवी या देवता इनके दुष्प्रभाव या हानि को कम नहीं कर सकता या रोक नहीं लगा सकता। इसे यूं समझें कि यदि घर का मुखिया पिताजी या माताजी आपसे नाराज हों, तो पड़ोस के या बाहर का कोई भी आपके भले के लिए आपके घर में प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि वे 'बाहरी' होते हैं। 
गीता में इस संबंध में विस्तार से उल्लेख मिलता है कि कुल का नाश कैसा होता है?
ऐसे अनेक परिवार हैं जिन्हें अपने कुलदेवी या देवता के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है। ऐसा इसलिए कि उन्होंने कुलदेवी या देवताओं के स्थान पर जाना ही नहीं छोड़ा बल्कि उनकी पूजा भी बंद कर दी है। लेकिन उनके पूर्वज और उनके देवता उन्हें बराबर देख रहे होते हैं। यदि किसी को अपने कुलदेवी और देवताओं के बारे में नहीं मालूम है, तो उन्हें अपने बड़े-बुजुर्गों, रिश्तेदारों या पंडितों से पूछकर इसकी जानकारी लेना चाहिए। यह जानने की कोशिश करना चाहिए कि झडूला, मुंडन संकार आपके गोत्र परंपरानुसार कहां होता है या 'जात' कहां दी जाती है। यह भी कि विवाह के बाद एक अंतिम फेरा (5, 6, 7वां) कहां होता है?
कहते हैं कि कालांतर में परिवारों के एक स्थान से दूसरे स्थानों पर स्थानांतरित होने, धर्म परिवर्तन करने, आक्रांताओं के भय से विस्थापित होने, जानकार व्यक्ति के असमय मृत होने, संस्कारों का क्षय होने, विजातीयता पनपने, पाश्चात्य मानसिकता के पनपने और नए विचारों के संतों की संगत के ज्ञानभ्रम में उलझकर लोग अपने कुल खानदान के कुलदेवी और देवताओं को भूलकर अपने वंश का इतिहास भी भूल गए हैं। खासकर यह प्रवृत्ति शहरों में देखने को ज्यादा मिलती है।
ऐसा भी देखने में आया है कि कुल देवी-देवता की पूजा छोड़ने के बाद कुछ वर्षों तक तो कोई खास परिवर्तन नहीं होता, लेकिन जब देवताओं का सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में घटनाओं और दुर्घटनाओं का दौर शुरू हो जाता है, उन्नति रुकने लगती है, गृहकलह, उपद्रव व अशांति आदि शुरू हो जाती हैं। आगे वंश नहीं चल पाता है। पिताद्रोही होकर व्यक्ति अपने वंश को नष्ट कर लेता है!
समस्त ब्रह्माण्ड जिससे चालयमान है वह है शिव , और जो स्वयं शिव को चालयमान बनाती है वह है उनकी शक्ति, आदिशक्ति । बिना आदिशक्ति के शिव भी अचल है। वह शक्ति ही है जो शिव परिपूर्ण करती है । यह आदिशक्ति भिन्न भिन्न रूपों में ब्रह्माण्ड की समस्त सजीव और निर्जीव वस्तुओं में विद्यमान है। यही शक्ति देवताओं में, असुरों में , यक्षों में , मनुष्यों में, वनस्पतियों में, जल में थल में , संसार के प्रत्येक पदार्थ में भिन्न भिन्न मात्रा में उपस्थित है। और देवताओं की शक्ति को हम उन देवो के नामों से जानते है जैसे – महेश्वर की शक्ति माहेश्वरी , विष्णु की शक्ति वैष्णवी , ब्रह्मा की शक्ति ब्रह्माणी , इंद्र की इंद्राणी , कुमार कार्तिकेय की कौमारी , इसी प्रकार हम देवों की शक्तियों को उन्ही के नाम से पूजते हैं।
कुल देवता या देवी हमारे वह सुरक्षा आवरण हैं जो किसी भी बाहरी बाधा, नकारात्मक ऊर्जा के परिवार में अथवा व्यक्ति पर प्रवेश से पहले सर्वप्रथम उससे संघर्ष करते हैं और उसे रोकते हैं, यह पारिवारिक संस्कारो और नैतिक आचरण के प्रति भी समय समय पर सचेत करते रहते हैं, यही किसी भी ईष्ट की आराधना करे वह उस ईष्ट तक नहीं पहुँचता, क्योकि सेतु कार्य करना बंद कर देता है, बाहरी बाधाये,अभिचार आदि, नकारात्मक ऊर्जा बिना बाधा व्यक्ति तक पहुँचने लगती है, कभी कभी व्यक्ति या परिवारों द्वारा दी जा रही ईष्ट की पूजा कोई अन्य बाहरी वायव्य शक्ति लेने लगती है, अर्थात पूजा न ईष्ट तक जाती है न उसका लाभ मिलता है, ऐसा कुलदेवता की निर्लिप्तता अथवा उनके कम सशक्त होने से होता है।

कुलदेवी कभी भी अपने उपासकों का अनिष्ट नहीं करती

कुलदेवियों की पूजा ना करने पर उत्पन्न बाधाओं का कारण कुलदेवी नहीं अपितु हमारे सुरक्षा चक्र का टूटना है। देवी अथवा देवता तब शक्ति संपन्न होते हैं जब हम समय-समय पर उन्हें हवियाँ प्रदान करते हैं व नियमित रूप से उनकी उपासना करते हैं। जब हम इनकी उपासना बंद कर देते हैं तब कुलदेवी तब कुछ वर्षों तक तो कोई प्रभाव ज्ञात नहीं होता, किन्तु उसके बाद जब सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में दुर्घटनाओं, नकारात्मकता ऊर्जा “वायव्य” बाधाओं का बेरोक-टोक प्रवेश शुरू हो जाता है, उन्नति रुकने लगती है, पीढ़िया अपेक्षित उन्नति नहीं कर पाती, संस्कारों का भय, नैतिक पतन, कलह, उपद्रव, अशांति शुरू हो जाती हैं, व्यक्ति कारण खोजने का प्रयास करता है कारण जल्दी नहीं पता चलता क्योंकि व्यक्ति की ग्रह स्थितियों से इनका बहुत मतलब नहीं होता है, अतः ज्योतिष आदि से इन्हें पकड़ना मुश्किल होता है, भाग्य कुछ कहता है और व्यक्ति के साथ कुछ और घटता है। कुलदेवता या देवी सम्बन्धित व्यक्ति के पारिवारिक संस्कारों के प्रति संवेदनशील होते हैं और पूजा पद्धति, उलटफेर, विधर्मीय क्रियाओं अथवा पूजाओं से रुष्ट हो सकते हैं, सामान्यतया इनकी पूजा वर्ष में एक बार अथवा दो बार निश्चित समय पर होती है।
यदि अपने कुलदेवता के स्थान पर किसी अन्य देवता का नामजप किया जाए, तो केवल उस देवता द्वारा प्रतिनिधित्व किए जानेवाले तत्त्वों का संवर्धन होगा किन्तु वह आध्यात्मिक उन्नति में प्रभावी रूप से सहायक नहीं होगा । जिस प्रकार माता-पिता से भिन्न व्यक्ति हम पर माता-पिता के समान कृपा नहीं करता उसी प्रकार अन्य देवता हम पर कृपा तो करते हैं किन्तु वह कृपा केवल उन्हीं तत्त्वों की होगी जिनका वह देवता प्रतिनिधि है। अतएव यह अपने कुलदेवता के नामजप की भांति अथवा जन्मगत धर्मानुसार देवता के नामजप की भांति प्रभावी नहीं होता । अतः किसी अन्य देवता अथवा अपने इष्ट देव की उपासना करना गलत नहीं है। परंतु इसके लिए हमें हमारी कुलदेवी की उपेक्षा नहीं करना चाहिये और नियमित रूप से पूर्ण श्रद्धा से कुलदेवी की उपासना अवश्य करते रहना चाहिए और हर समय इनका ध्यान करना चाहिए। यदि आप नहीं जानते कि आपकी कुलदेवी कौन है तो पूजा के लिए यह विधि कर सकते हैं "जिन्हें कुलदेवी की जानकारी नहीं है उनके लिए पूजा विधि"।
ऐसे लोगों के लिए हम एक पूजा-साधना प्रस्तुत कर रहे हैं। जिसके माध्यम से आप अपनी कुलदेवी की कमी को पूरा कर सकते हैं और एक सुरक्षा चक्र का निर्माण आपके परिवार के आसपास हो जाएगा | घर में क्लेश, बार-बार होने वाली बिमारियों, उन्नति में होने बलि बाधाओं इत्यादि सभी समस्याओ के लिये कुलदेवी /कुल देवता साधना ही सर्वश्रेष्ठसाधना है। चूंकि अधिकतर कुलदेवता /कुलदेवी शिव कुल से सम्बंधित होते हैं ,अतः इस पूजा साधना में इसी प्रकार की ऊर्जा को दृष्टिगत रखते हुए साधना पद्धती अपनाई गयी है |

सामग्री :-

४ पानी वाले नारियल,लाल वस्त्र ,१० सुपारिया ,८ या १६ शृंगार कि वस्तुये ,पान के १० पत्ते , घी का दीपक,कुंकुम ,हल्दी ,सिंदूर ,मौली ,पांच प्रकार कि मिठाई ,पूरी ,हलवा ,खीर ,भिगोया चना ,बताशा ,कपूर ,जनेऊ ,पंचमेवा ।

साधना विधि :-

सर्वप्रथम एक लकड़ी के बाजोट या चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं |उस पर चार जगह रोली और हल्दी के मिश्रण से अष्टदल कमल बनाएं |अब उत्तर की ओर किनारे के अष्टदल पर सफ़ेद अक्षत बिछाएं उसके बाद दक्षिण की ओर क्रमशः पीला ,सिन्दूरी और लाल रंग से रंग हुआ चावल बिछाएं |चार नारियल में मौली लपेटें |एक नारियल को एक तरफ किनारे सफ़ेद चावल के अष्टदल पर स्थापित करें |अब तीन नारियल में से एक नारियल को पूर्ण सिंदूर से रंग दे दूसरे को हल्दी और तीसरे नारियल को कुंकुम से,फिर ३ नारियल को मौली बांधे |इस तीन नारियल को पहले वाले नारियल के बायीं और क्रमशः अष्टदल पर स्थापित करें |प्रथम बिना रंगे नारियल के सामने एक पान का पत्ता और अन्य तीन नारियल के सामने तीन तीन पान के पत्ते रखें ,इस प्रकार कुल १० पान के पत्ते रखे जायेंगे |अब सभी पत्तों पर एक एक सिक्का रखें ,फिर सिक्कों पर एक एक सुपारियाँ रखें |प्रथम नारियल के सामने के एक पत्ते पर की सुपारी पर मौली लपेट कर रखें इस प्रकार की सुपारी दिखती रहे ,यह आपके कुल देवता होंगे ऐसी भावना रखें |अन्य तीन नारियल और उनके सामने के ९ पत्तों पर आपकी कुल देवी की स्थापना है | इनके सामने की सुपारियों को पूरी तरह मौली से लपेट दें |अब इनके सामने एक दीपक स्थापित कर दीजिये |
अब गुरुपूजन और गणपति पूजन संपन्न कीजिये | अब सभी नारियल और सुपारियों की चावल, कुंकुम, हल्दी ,सिंदूर, जल ,पुष्प, धुप और दीप से पूजा कीजिये | जहा सिन्दूर वाला नारियल है वहां सिर्फ सिंदूर ही चढ़े बाकि हल्दी कुंकुम नहीं |जहाँ कुमकुम से रंग नारियल है वहां सिर्फ कुमकुम चढ़े सिन्दूर नहीं |बिना रंगे नारियल पर सिन्दूर न चढ़ाएं ,हल्दी -रोली चढ़ा सकते हैं ,यहाँ जनेऊ चढ़ाएं ,जबकि अन्य जगह जनेऊ न चढ़ाए | इस प्रकार से पूजा करनी है | अब पांच प्रकार की मिठाई इनके सामने अर्पित करें | घर में बनी पूरी -हलवा -खीर इन्हें अर्पित करें |चना ,बताशा केवल रंगे नारियल के सामने अर्थात देवी को चढ़ाएं और आरती करें |साधना समाप्ति के बाद प्रसाद परिवार मे ही बाटना है,श्रृंगार पूजा मे कुलदेवी कि उपस्थिति कि भावना करते हुये श्रृंगार सामग्री तीन रंगे हुए नारियल के सामने चढा दे और माँ को स्वीकार करने की विनती कीजिये ।
इसके बाद हाथ जोड़कर इनसे अपने परिवार से हुई भूलों आदि के लिए क्षमा मांगें और प्राथना करें की हे प्रभु ,हे देवी ,हे मेरे कुलदेवता या कुल देवी आप जो भी हों हम आपको भूल चुके हैं ,किन्तु हम पुनः आपको आमंत्रित कर रहे हैं और पूजा दे रहें हैं आप इसे स्वीकार करें | हमारे कुल -परिवार की रक्षा करें |हम स्थान ,समय ,पद्धति आदि भूल चुके हैं ,अतः जितना समझ आता है उस अनुसार आपको पूजा प्रदान कर रहे हैं ,इसे स्वीकार कर हमारे कुल पर कृपा करें |
यह पूजा नवरात्र की सप्तमी -अष्टमी और नवमी तीन तिथियों में करें |इन तीन दिनों तक रोज इन्हें पूजा दें ,जबकि स्थापना एक ही दिन होगी | प्रतिदिन आरती करें ,प्रसाद घर में ही वितरित करें ,बाहरी को न दें |सामान्यतय पारंपरिक रूप से कुलदेवता /कुलदेवी की पूजा में घर की कुँवारी कन्याओं को शामिल नहीं किया जाता और उन्हें दीपक देखने तक की मनाही होती है ,किन्तु इस पद्धति में जबकि पूजा तीन दिन चलेगी कन्याएं शामिल हो सकती हैं ,अथवा इस हेतु अपने कुलगुरु अथवा किसी विद्वान् से सलाह लेना बेहतर होगा |कन्या अपने ससुराल जाकर वहां की रीती का पालन करे |इस पूजा में चाहें तो दुर्गा अथवा काली का मंत्र जप भी कर सकते हैं ,किन्तु साथ में तब शिव मंत्र का जप भी अवश्य करें | वैसे यह आवश्यक नहीं है ,क्योकि सभी लोग पढ़े लिखे हों और सही ढंग से मंत्र जप कर सकें यह जरुरी नहीं |
साधना समाप्ति के बाद सपरिवार आरती करे | इसके बाद क्षमा प्राथना करें |तत्पश्चात कुलदेवता /कुलदेवी से प्राथना करें की आप हमारे कुल की रक्षा करें हम अगले वर्ष पुनः आपको पूजा देंगे ,हमारी और परिवार की गलतियों को क्षमा करें हम आपके बच्चे हैं |तीन दिन की साधना /पूजा पूर्ण होने पर प्रथम बिना रंगे नारियल के सामने के सिक्के सुपारी को जनेऊ समेत किसी डिब्बी में सुरक्षित रख ले |तीन रंगे नारियल के सामने की नौ सुपारियों में से बीच वाली एक सुपारी और सिक्के को अलग डिब्बी में सुरक्षित करें ,जिस पर लिख लें कुलदेवी |अगले साल यही रखे जायेंगे कुलदेवी /कुलदेवता के स्थान पर |अन्य वस्तुओं में से सिक्के और पैसे रुपये किसी सात्विक ब्राह्मण को दान कर दें |प्रसाद घर वालों में बाँट दें तथा अन्य सामग्रियां बहते जल अथवा जलाशय में प्रवाहित कर दें |
अगर आप इतना कर्मकाण्ड न कर सकें तो अपनी कुलदेवी के मंदिर मे जाकर श्रद्धाभाव से नारियल चढ़ाकर अगरबत्ती लगा दें |कुलदेवी प्रसन्न रहेगी|

कुलदेवी की पहचान कैसे करें?

अगर आपको अपनी कुलदेवी  की जानकारी  कोशिश करने के बाद भी  प्राप्त  न हो तो 





आप के परिवार में जो भी महिला ज्ञानवृद्धा और वयोवृद्धा हो ,समझो वही आपकी कुलदेवी है । उन्हीं जीवित देवी की सेवा सुश्रुषा करके ज्ञान और आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए ।


कुलदेवी की जानकारी 
राठोड ---नागणेचिया  माता ---नगाणा  धाम 
जाट ---राजेश्वरी----भरतपुर 
सिसौदिया --बाणेशवरी  माता----चित्तौड़ गढ़ 
चौहान ---आशापुरा माता ,शाकंभरी ---जयपुर 
प्रतिहार ,पड़िहार ----चामुंडा माता  ----जोधपुर 
परमार ---अर्बुदया माता ---सिरोही 
कंजर ----चौथ माता --- माधोपुर 
नाई-----नारायणी----अलवर 
ब्राह्मण----दधिमाता ---


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25.6.21

खाती जाति का इतिहास:khati jati ka itihas





 चंद्रवंशी खाती समाज श्री पुत्र सहस्त्रबाहु के पुत्र है । समाज के इष्टदेव भगवान जगदीश है , कुलदेवी महागौरी अष्टमी है , कुलदेव भैरव देव और आराध्या देव भोले शंकर है । खाती समाज भगवान परशुराम जी के आशीर्वाद से उत्त्पन्न जाती है .।इस जाती के लोग सुन्दर और गोर वर्ण अर्थात ‘गोरे ’आते है । क्षत्रिय खाती समाज जम्मू कश्मीर के अभेपुर और नभेपुर के मूल निवासी है आज भी चंद्रवंशी लोग हिमालय क्षेत्र में केसर की खेती करते है । समाज के लिए दोहे प्रसिद्द है ”उत्तर देसी पटक मूलः ,नभर नाभयपुर रे ,चन्द्रवंश सेवा करी ,शंकर सदा सहाय” और ”चंद्रवंशम गोकुलनंदम जयति ”भगवान जगदीश के लिए ।
समाज १२०० वर्ष पहले से ही कश्मीर से पलायन करने लग गया था और भारत के अन्य राज्यों में बसने लग गया था । समकालीन राजा के आदेश से समाज को राज छोड़ना पड़ा था। खाती समाज के लोग बहुत ही धनि और संपन्न थे , उच्च शिक्षा को महत्व दिया जाता था ।
  जाति इतिहासविद डॉ. दयाराम आलोक के मतानुसार जम्मू कश्मीर के अलाउद्दीन ख़िलजी ने १३०५ में मालवा और मध्य भारत में विजय प्राप्त की |  चन्द्रवंशी खाती समाज के सैनिक भी सैना का संचालन करते थे विजय से खुश होकर ख़िलजी ने समाज को मालवा पर राज करने को कहा परन्तु समाज के वरिष्ठ लोगो ने सोच विचार कर जमींदारी और खेती करने का निश्चय किया. इस तरह कश्मीर से आने के बाद ३५ वर्ष तक समाज मांडवगढ़ में रहा इसके बाद आगे बढ़कर महेश्वर जिसे महिष्मति पूरी कहते थे वहां आकर रहने लगे महेश्वर चंद्रवंशी खाती समाज के पूर्वज सहस्त्रार्जुन की राजधानी था आज भी महेश्वर में सहस्त्रबाहु का विशाल मंदिर बना है जिसका सञ्चालन कलचुरि समाज करता है।
४५ वर्षो तक रहने के बाद वहाँ से इंदौर, उज्जैन, देवास, धार, रतलाम, सीहोर, भोपाल , सांवेर आदि जिलो में बसते चले गए और खाती पटेल कहलाये । मालवा में खाती समाज के पूर्वजो ने ४४४ गाँव बसाये जिनकी पटेली की दसियाते भी उनके नाम रही।
खाती समाज का गौरव पूर्ण इतिहास रहा है । समाज के कुल १०५ गोत्र है जिसमे से ८४ गोत्र मध्यप्रदेश में है और मध्यप्रदेश के १६ जिलो में है और १२५० गाँवों में निवास करते है । मध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में चंद्रवंशी खाती समाज के इष्ट देव जगदीश का भव्य प्राचीन मंदिर है जहा हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितिय को भगवान की रथयात्रा निकलती है समाज जन और भक्तजन अपने हाथो से रथ खींचकर भगवान को नगर भ्रमण करवाते है |
चन्द्रवंश या सोमवंश के राजा कीर्तिवीर्य बहुत ही धर्मात्मा हुआ करते थे । उनके पुत्र का नाम सहस्त्रबाहु या सहस्त्रार्जुन रखा गया, सोमवंश के वंशज थे इसलिए राजवंशी खत्री कहलाए ।सहस्त्रार्जुन ने नावों खंडो का राज्य पाने के लिए भगवान रूद्र दत्त का ताप किया और ५०० युगों तक तप किया इस से प्रभावित होकर भगवान शंकर ने उन्हें १ हज़ार भुजा और ५०० मस्तक दिए । उसके बाद उनका सहस्त्रबाहु अर्थात सौ भुजा वाला नाम पड़ा । महेश्वर समाज के पूर्वज सहस्त्रार्जुन की राजधानी रहा जहा ८५००० सालो तक राज्य किया । महेश्वर के निकट सहस्त्रार्जुन ने नर्मदा नदी को अपनी हज़ार भुजाओं के बल से रोकना चाहा परन्तु माँ नर्मदे उसकी हज़ार भुजाओं को चीरती हुई आगे निकल गई इसलिए उस स्थान को सहस्त्रधारा के नाम से जाना जाने लगा जहा आज भी १००० धाराएं अलग अलग दिखाई देती है ।
सहस्त्रार्जुन के लिए दोहा प्रसिद्द है
”नानूनम कीर्तिविरस्य गतिम् यास्यन्ति पार्थिवः ! यज्ञेर्दानैस्तपोभिर्वा प्रश्रयेण श्रुतेन च !
अर्थात सहस्त्रबाहु की बराबरी यज्ञ, दान, तप, विनय और विद्या में आज तक कोई राजा नहीं कर सका ।
एक दिन देवो पर विजय प्राप्त करने के बाद विश्व विजेता रावण ने अर्जुन पर आक्रमण कर दिया परन्तु सहस्त्रार्जुन ने रावण को बंधी बना लिया और रावण द्वारा क्षमा मांगने पर महीनो बाद छोड़ा फिर भगवान नारायण विष्णु के छटवे अंश ने परशुराम जी का अवतार धारण किया और सहस्त्रबाहु का घमंड चूर किया । इस युद्ध स्थल में १०५ पुत्रों को उनकी माता लेकर कुलगुरु की शरण में गई । राजा श्री जनक राय जी ने रक्षा का वचन दिया और १०५ भाइयों को क्षत्रिय से खत्री कहकर अपने पास रख लिया और ब्राह्मण वर्ण अपना कर सत्य सनातन धर्म पर चलने का वादा किया । १०५ भाइयों के नाम से उनका वंश चला और खाती समाज के १०५ गोत्र हुए | चन्द्रवंश की १०५ शाखाये पुरे भारत में राजवंशी खत्री भी कहलाते है । देश में समाज की जनसँख्या २ करोड़ से अधिक मप्र में जनसँख्या । ५० लाख भारत के राज्यों में ।
समाज दिल्ही, हरयाणा, पंजाब, जम्मू कश्मीर, राजस्थान,उत्तर प्रदेश,हिमाचल प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम आदि ….
विदेशो में समाज नेपाल, तजफिस्टन, चिली, अमेरिका, फ्रांस, कनाडा और थाईलैंड में है । चंद्रवंशी क्षत्रिय खाती समाज के इष्टदेव भगवान जगन्नाथ है।जो साधना के देदीप्यमान नक्षत्र है जिनका सत्संग और दर्शन तो दूर नाम मात्र से ही जीवन सफल हो जाता है।
हिन्दू धर्म के चारधाम में एक धाम जगन्नाथपुरी उड़ीसा में है और खाती समाज का भव्य पुरातन व बहुत ही सुन्दर मंदिर पतित पावनि माँ क्षिप्रा के तट पर है । भगवान महाकाल की नगरी अवंतिकापुरी उज्जैन देश की केवल एक मात्र नगरी है जहा संस्कार और संस्कृति का प्रवाह सालभर होता रहता है।यह पर डग डग पर धर्म और पग पग पर संस्कृति मौजूद है ।
 खाती समाज का एक महापर्व भगवान जगदीश की रथयात्रा है इस अवसर पर समाज के इष्टदेव भगवान जगन्नाथ पालकी रथ पर विराजते है और नगर भ्रमण करते है ।हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल २ को निकलती है ।इस दिन उज्जैन जगन्नाथपुरी सा दिखाई पड़ता है । भगवान जगन्नाथ भाई बलभद्र , बहिन सुभद्रा की मूर्तियों का आकर्षक श्रृंगार किया जाता है और मंदिर की विद्युत सज्जा की जाती है ।
लाखो हज़ारो भक्तजन भगवान के रथ को खींचकर धन्य मानते है । इस पर्व को लेकर समाज में बहुत उत्साह रहता है भक्तो का सैलाब धार्मिक राजधानी की और बढ़ता है।
इस अवसर पर मंदिर में रातभर विभिन्न मंडलियों द्वारा भजन किये जाते है । रथ के साथ बैंडबाजे ऊंट, हाथी, घोड़े, ढोलक की ताल, अखाड़े,डीजे, झांकिया रथयात्रा की शोभा बढाती है और इस तरह भगवान की शाही यात्रा उज्जैन घूमकर पुनः मंदिर पहुचती है मंदिर में सामूहिक भोज भंडारा भी खाती समाज द्वारा किया जाता है जो भगवान का प्रसाद माना जाता है फिर महा आरती के साथ पुनः भगवान मंदिर में विराजते है कहते है इस दिन भगवान् अपनी प्रजा को देखने के लिए मंदिर से निकलते है जो भी भक्त भगवान् तक नहीं पहुंच सका भगवान खुद उसे दर्शन देने निकलते है ।
महाभारत का युद्ध के बाद भगवान कृष्ण अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ रथ में बैठकर द्वारिका पूरी जाते है और गोपिया उनके रथ को खींचती है ।
जगन्नाथ पूरी में भगवान के रथ को राजा सोने की झाड़ू से रथ को भखरते अर्थात सफाई करते थे उस समय केवल नेपाल के और पूरी के राजा जो की चंद्रवंशी थे वे ही केवल मंदिर की मूर्तियों को छू सकते थे क्योंकि वे चन्द्र कुल अर्थात चन्द्रवंश से थे ।
खाती समाज की कुलदेवी महागौरी है जो दुर्गाजी का आठवा रूप है ।इसे समाज की शक्ति उपासना का पर्व माना जाता है ।महिनो पहले से ही गौरी माँ की पूजन की तैयारिया शुरू हो जाती है । देश विदेश से लोग अष्टमी पूजन के लिए घर आ जाते है इस उत्सव को विशेष महत्व दिया जाता है भगवान वेदव्यास जी ने कहा है की ”है माता तू स्मरण मंत्र से ही भयो का विनाश कर देती है। ” माता महागौरी की पूजा गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेध से की जाती है ममता, समता और क्षमता की त्रिवेणी का नाम माँ है | पुत्र कुपुत्र हो सकता है माता कुमाता नहीं पूजा के अंत में क्षमा मांगी जाती है।
Disclaimer: इस  content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे.
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आदिवासी समाज का इतिहास और संस्कृति:adiwasi samaj itihas









आदिवासी शब्द का सामान्यतः अनुवाद ' स्वदेशी लोग ' या 'मूल निवासी' होता है, और इसका शाब्दिक अर्थ है 'आदि या आरंभिक समय', और 'वासी या निवासी'।आदिवासी समाज की पहचान उनकी भाषा, संस्कृति, और त्योहारों से होती है.
आदिवासी समाज के लोग प्रकृति के सभी घटकों को पूजते हैं.
आदिवासी समाज के लोग जल-जंगल के बेहद करीब होते हैं.
आदिवासी समाज के लोग खेती-किसानी से जुड़े होते हैं.आदिवासी समाज के लोग अपने लिए अलग से धार्मिक कोड (सरना कोड या आदिवासी धर्म कोड) की मांग करते हैं.
आदिवासी समाज के लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं को सुरक्षित रखने के लिए चाहते हैं.
आदिवासी समाज के लोगों के अधिकारों को राष्ट्रीय कानून, सन्धियों और अंतर्राष्ट्रीय कानून में रेखांकित किया गया है.
आदिवासी समाज के लोग प्रकृति-पूजक हैं.
आदिवासी समाज के लोग वन, पर्वत, नदियों एवं सूर्य की आराधना करते हैं.
आदिवासी समाज के लोग अपनी कई मूलभूत सुविधाएं जंगलों से प्राप्त करते हैं.
आदिवासी समाज के लोग सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर प्रकृति से गहरे जुड़े होते हैं.
आदिवासी समाज के लोगों के पास लोकगीतों की धरोहर है.

भारत में आदिवासियों का धर्म क्या है?

कई आदिवासी लोग जीववादी हैं, कई लोग सरना धर्म का पालन करते हैं जो प्रकृति में प्रकट होने वाली सर्वोच्च आत्मा के प्रति श्रद्धा पर आधारित है और कई आदिवासी लोगों की पहचान का केंद्र है





 
  भारत की जनसंख्या का 8.6% (10 करोड़) जितना एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है। पुरातन लेखों में आदिवासियों को अत्विका और वनवासी भी कहा गया है (संस्कृत ग्रंथों में)। संविधान में आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति पद का उपयोग किया गया है। भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, बोडो, भील, खासी, सहरिया, गरासिया, संथाल, मीणा, उरांव, परधान, बिरहोर, पारधी, आंध, टाकणकार आदि हैं।
 
 आमतौर पर आदिवासियों को भारत में जनजातीय लोगों के रूप में जाना जाता है। आदिवासी मुख्य रूप से भारतीय राज्यों उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक है जबकि भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों में यह बहुसंख्यक हैं, जैसे मिजोरम। भारत सरकार ने इन्हें भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में ” अनुसूचित जनजातियों ” के रूप में मान्यता दी है। 
 जाति इतिहासविद डॉ.दयाराम आलोक के मतानुसार आदिवासियों का अपना धर्म है। ये प्रकृति पूजक हैं और जंगल, पहाड़, नदियों एवं सूर्य की आराधना करते हैं। आधुनिक काल में जबरन बाह्य संपर्क में आने के फलस्वरूप इन्होंने हिंदू, ईसाई एवं इस्लाम धर्म को भी अपनाया है। अंग्रेजी राज के दौरान बड़ी संख्या में ये ईसाई बने तो आजादी के बाद इनके हिूंदकरण का प्रयास तेजी से हुआ है। परंतु आज ये स्वयं की धार्मिक पहचान के लिए संगठित हो रहे हैं और भारत सरकार से जनगणना में अपने लिए अलग से धार्मिक कोड की मांग कर रहे हैं।
आदिवासी कौन जाति में आते हैं?
भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए 'अनुसूचित जनजाति' पद का उपयोग किया गया है। भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में मीणा ,भील मीणा,गोंड, हल्बा ,मुण्डा, ,खड़िया, बोडो, कोल, भील,नायक, सहरिया, संथाल ,भूमिज, हो, उरांव, बिरहोर, पारधी, असुर, भिलाला,आदि हैं। भारत में आदिवासियों को प्रायः 'जनजातीय लोग' के रूप में जाना जाता है।
आदिवासियों का अपना धर्म है, जिसे सरना धर्म कहते हैं. यह धर्म प्रकृति की पूजा पर आधारित है. सरना धर्म को 'आदि धर्म' भी कहा जाता है. आदिवासी समुदाय के कई लोग इस धर्म को मानते हैं. हालांकि, कई आदिवासी हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, और इस्लाम धर्म को भी मानते हैं.

आदिवासी की कुल देवी कौन है 

सात माता को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं आदिवासी
   ग्राम टेमरिया में तालाब के पास घने जंगल के बीच वीरान क्षेत्र में विराजित सात माता का यह क्षेत्र अतिप्राचीन है। आदिवासी समाज के लोग सात माता को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। जंगल में सागवान वृक्षों के बीच विराजित माता का यह क्षेत्र दर्शनीय व पूजनीय है।
आदिवासियों का भगवान कौन है?

बाघेशुर - मध्य भारत की जनजातियों के बाघ देवता
'बाघेशुर' का अर्थ है बाघ देवता, जिसे मध्य भारत की जनजातियाँ, खास तौर पर बैगा लोग पूजते हैं
 

आदिवासी का पूर्वज कौन था?

यह प्रत्येक समुदाय अपनी अलग धार्मिक विशेषताओं के आधार पर निर्धारित करता है। आदिवासी हिन्दू है इसलिए उनके भी गोत्र है और यह गोत्र ही उनके पूर्वज के नाम है । देवादिदेव महादेव और मां काली तो उनके आराध्य देवी देवता हैं ।

महाभारत में आदिवासी कौन थे?

महाभारत में जनजातीय पात्र का उदाहरण है एकलव्य. निषाद राजकुमार एकलव्य अपनी मेहनत से बना धनुषधारी है, जो कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा से प्रेरणा लेकर अभ्यास करता है. द्रोणाचार्य उससे गुरु दक्षिणा के रूप में उससे उसका दाहिना अंगूठा मांग लेते हैं, इसके बावजूद वह उन्हें पूरा सम्मान देता है.

आदिवासी का गुरु कौन है ?

कौन थे गोविंद गुरु (Govind Guru Banjara)
इस इलाके में भील, बंजारा और आदिवासी समुदाय के दूसरे लोग गोविंद गुरु को अपना सबसे बड़ा आराध्य मानते हैं. 20 दिसंबर 1858 को राजस्थान के डूंगरपुर के बासिया गांव में जन्मे गोविंद गुरु का पूरा नाम गोविंद गिरी था.

क्या आदिवासी हिन्दू हैं?

 भारत के सभी मूल या स्वदेशी धर्म मोटे तौर पर हिंदू धर्म के अंतर्गत आते हैं , क्योंकि संविधान केवल वैदिक धर्मों को हिंदू धर्म के रूप में वर्गीकृत नहीं करता है, जैसा कि बोलचाल के मानदंड में उपयोग किया जाता है।
क्या कृष्ण आदिवासी देवता थे?
यादवों के देवता माने जाने वाले आदिवासी नायक और धार्मिक नेता कृष्ण की पूजा ने पंचरात्र और उससे पहले भागवत धर्म के रूप में सांप्रदायिक रूप ले लिया। यह परंपरा बाद में नारायण की परंपरा में विलीन हो गई। गोपाल कृष्ण के चरित्र को अक्सर गैर-वैदिक माना जाता है।
गोंड जनजाति के मुख्य देवी-देवताओं में बूड़ादेव, दुल्लादेव, घनश्यामदेव, बूड़ापेन (सूर्य), और भीवासू शामिल हैं. इनके अलावा, फसल, शिकार, बीमारियों, और वर्षा से जुड़े भी कई देवी-देवता हैं. 
गोंड जनजाति के लोग बहुत धार्मिक हैं.
वे कई शगुनों और मिथकों में भी विश्वास करते हैं.
गोंड जनजाति के लोग पूर्वजों की पूजा करते हैं.
गोंड जनजाति के लोग मृत्यु के बाद के जीवन और देवताओं को खुश करने के लिए पौधों और जानवरों की बलि देते हैं.
गोंड जनजाति के लोग भगवान हवा, पानी, और ज़मीन को नियंत्रित करने वाले मानते हैं.
गोंड जनजाति के लोग बारादेव (जिनके अन्य नाम भगवान, श्री शंभु महादेव और पर्सा पेन हैं) की पूजा करते हैं.
गोंड जनजाति के लोग भूत-प्रेत और जादू-टोने में काफ़ी विश्वास करते हैं. 

मावली माता गोंड आदिवासियों की प्रमुख मात्र देवी है। इस देवी का वर्तमान निवास स्थान मावली पठार में है। आदिवासियों का विश्वास है कि मावली माता दंतेश्वरी देवी की बुआ लगती हैं और इस कारण उनका स्थान है दंतेश्वरी देवी के ऊपर है

आदिवासी समाज में कितने सरनेम होते हैं?

आदिवासी समाज में कई सरनेम होते हैं, क्योंकि इसमें कई जनजातियां हैं. इनमें से कुछ प्रमुख जनजातियां हैं - गोंड, मुंडा, खड़िया, उरांव, संथाल, भील, कोल, बोडो, सहरिया, भूमिज, हो, पारधी, असुर, भिलाला.

आदिवासी समाज में गोत्रों की भी व्यवस्था है. गोत्रों के बारे में ज़्यादा जानकारीः

मुंडा जाति के लोग बाहर शादी के लिए कई छोटे वर्गों में बंटे होते हैं, जिन्हें किली कहते हैं.

किली की उत्पत्ति किसी प्राकृतिक पदार्थ से हुई है, जैसे कोई जानवर, पक्षी, जलचर, थलचर, या पौधा.

गोंड समाज पांच प्रमुख गोत्रों में बंटा है - छिदैया, नेताम, मरकाम, मरई, और पोर्ते.

हर गोत्र के गोंडों का परघनियां परधान उन्हीं के गोत्र का होना चाहिए.

टोटम को मानने वाले समूह को 'गोत्र' कहा जाता है.

'मिंज़' एक गोत्र है जिसका टोटम डुंगडुँगिया मछली है.

'लकड़ा' गोत्र का टोटम बाघ है.

'पन्ना' गोत्र का टोटम लोहा है.

'तिग्गा' का टोटम बंदर है.

क्या शिव आदिवासी थे?

भगवान शिव को आदिदेव, आदिनाथ और आदियोगी कहा जाता है। आदि का अर्थ सबसे प्राचीन प्रारंभिक, प्रथम और आदिम। शिव आदिवासियों के देवता हैं। शिव खुद ही एक आदिवासी थे।

आदिवासी का मसीहा कौन हैं ?

''आदिवासियों के मसीहा'' नाम से चर्चित, वनवासी संघ के स्थापना करने वाले और एकी आन्दोलन चलाकर आदिवासियों, किसानों और कामगारों को सामन्ती अत्याचारों के खिलाफ एकजूट करने वाले मातीलाल तेजावत 1886 ई. में झाड़ोल, उदयपुर के कोल्यारी में जन्मे थे।

आदिवासी में सबसे ऊंची जाति कौन सी है?
दक्षिण क्षेत्र की प्रमुख जनजाति गोंड है। जनसंख्या की दृष्टि से यह सबसे बड़ा आदिवासी समूह 
Disclaimer: इस  content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे

24.6.21

ढोली(दमामी,नगारची ,बारेठ)) जाती का इतिहास:Dholi Caste

वीडिओ 



ढोली समुदाय खुद को गंधर्व देव की सन्तान मानते हैं. राजा-महाराजाओं के काल में युद्ध के दौरान रणभेरी बजाने वालों के तौर पर ये जाति अस्तित्व में आई और ढोल बजाने की वजह से इन्हें ढोली कहा जाने लगा|
दमामी समाज की उत्पति – यह जाति शुद्ध क्षत्रिय है जो तीन प्रकार से बनी है
1. प्रसन्नतापूर्वक
2,इनका राज्य छीन कर जबरदस्ती बनाये हुये ।
3,कुछ आपत्तिवश इनमे मिले हुये ।
 किन्तु अधिकांश खांपे इस समाज में वे है, जिनको भिन्न भिन्न राजाओं ने अपने भाईयों में से तथा संबंधित  राजपूतों में से जो रणकुशल नायक थे, चुन चुन कर बनाई है यह समाज राजस्थान में क्षेत्र अनुसार कई नामो से पुकारी जाती है । जैसे नगारची ,राणा ,बारोट और दमामी। 
 इस जाति का इतिहास भी सिवाय राजपूतों के संसार में कोई और नहीं जानता और न कोई धार्मिक पुस्तक में ही इनका उल्लेख है । इसका एकमात्र कारण यह है कि यह जाति प्राचीन नहीं बल्कि अर्वाचिन है । यह नई न्यात अर्थात् नवीन जाति कहलाती है किन्तु दुर्भाग्यवश राजपूतों की स्वार्थमयी विचित्र नीति ने और द्वेषियों के विरोध ने इनको इतना गिराया है कि आज आम जनता में इनकी प्रतिष्ठा  पहिले की तरह नहीं रही |
 इस जाति के लोगों को  बारहठ  भी कहते है । जिसका अर्थ द्वार पर हठ करने वाला है । रणधवल (दमामी-नगारची) समाज की प्राचीन उपाधि बारहठ ही है मगर संवत 1808 में जोधपुर महाराज बख्तसिंह जी ने यह पदवी चारण समाज को देदी । इसी कारण मारवाड़ में बारेठ चारण कहलाते है |शेष मेवाड़ ,हाड़ोती आदि स्थानों  में लोग  नगारची जाति को ही बारहठ कहते आ रहे है । सोलंकी और गौड़ क्षत्रियों के यहां पोलपात नगारची जाति को ही बारहठ  कहते है जो   दमामी राजपूत जाति ही है
राजपूताने में क्षत्रियों का कोई ऐसा छोटे से छोटा भी ठिकाना नहीं है जहां पर दमामी कौम के  एक दो घर नहीं हों  और इन लोगो के गुजारे के लिए माफ़ी की जमीन और राज्य में तथा प्रजा में लगाने नहीं हो । चारण जाति के लोग  खास खास ठिकानों में ही है । जिससे भी स्पष्ट सिद्ध है कि राजपूत जाति के वास्तविक पोलपात दमामी ही है 
डांगी- राव डांगी जी के वंशज ढोली कहलाये। राव डांगी जी के पास किसी प्रकार कि भूमी नहीँ थी व ईसने डूमन या ढोली जाती की लङकी से शादी की । उसकी सन्तान कही ढोली तो कहीँ डांगी नाम से बसते है। राव डांगी जी के वंशज ढोली कहलाये।
डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार, ढोली जाति की उत्पत्ति डांगी जाति से नहीं हुई है, बल्कि यह एक अलग जाति है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। ढोली जाति के लोग ढोल और नगाड़े बजाने का काम करते थे, इसलिए उन्हें ढोली या नगारसी कहा जाता था।डांगी जाति के एक व्यक्ति ने ढोली जाति की लड़की से शादी की, जिससे उनका वंश राजपूत से अलग हो गया और ढोली वंश बन गया। इस प्रकार, डांगी के वंशज राजपूतों से अलग हो गए, लेकिन उनके रिश्ते और नाते अभी भी बने रहे।उनके अनुसार, राजस्थान में राठौड़ राजपूतों के साथ-साथ ढोली जाति भी फैल गई। यह सिलसिला आज तक कायम है।यह जानकारी डॉ. दयाराम आलोक के शोध और अध्ययन पर आधारित है, जो जाति इतिहास के क्षेत्र में एक प्रमुख विद्वान हैं|
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23.6.21

जाट जाति की उत्पत्ति का इतिहास:Jat jati ka itihas





जाट जाति वर्तमान समय की सबसे प्रतिष्ठित जातियों में से एक मानी जाती है। जाट क्षत्रिय समुदाय के अभिन्न अंग माने जाते हैं, इनका विस्तार भारत में मुख्यत: "पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि भारत के पठार इलाकों मैं है।
 पंजाब में जट्ट (Jatt) एवं अन्य राज्यों में इन्हें जाट (Jaat) नाम से संबोधित किया जाता है। जाट समाज के लोग आज के आधुनिक युग में  भी अपनी पुरानी परंपराओं से जुड़े हुए हैं, इस जाति की सामाजिक संरचना बेजोड़ है। जाट समाज की गोत्र और खाप  व्यवस्था प्राचीन समय की मानी जाती है।
जाट समाज की उत्पत्ति के विषय में कई मान्यताएं हैं  एक प्राचीन मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि राजसूय यज्ञ के बाद युधिष्ठिर को 'जेष्ठ' कहा गया और बाद में युधिष्ठिर की संतान को 'जेठर' शब्द से संबोधित किया जाने लगा, जैसे जैसे समय बीतता गया 'जेठर'  को कालांतर मे जाट नाम से संबोधित किया जाने लगा। इस मान्यता के अनुसार जाट समाज की उत्पत्ति युधिष्ठिर से मानी जाती है।
  इसके अलावा एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव शंकर से जाट समुदाय की उत्पत्ति को जोड़कर देखा जाता है, इस मान्यता के पीछे एक दिलचस्प कहानी है, यह कहानी 'देवसंहिता' नामक पुस्तक में उल्लेखित है। इस कहानी के अनुसार शिव के ससुर राजा दक्ष ने हरिद्वार के पास 'कनखल' में एक यज्ञ का आयोजन किया था। इस यज्ञ में सभी देवी देवताओं को बुलाया गया लेकिन भगवान शिव और शिव की पत्नी 'सती' को कोई निमंत्रण प्राप्त नहीं हुआ।
 जब सती को पिता के द्वारा यज्ञ के बारे में खबर प्राप्त हुई तो शिव से अपने पिता के यज्ञ कार्यक्रम में जाने की आज्ञा मांगी। शिव ने उन्हें यह कहकर आज्ञा दे दी कि - "तुम उनकी पुत्री हो और तुम्हे अपने घर बिना निमंत्रण के भी जा सकती हो" शिव से अनुमति लेकर सती अपने पिता के द्वारा आयोजित यज्ञ कार्यक्रम में जा पहुंची, लेकिन वहां सती को अपमानित किया गया एवं शिव के बारे में भी बुरा भला कहा गया। इसी बात पर क्रोधित होकर सती ने हवन कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया।
 जब इस बात का पता भगवान शिव को चला तो वह क्रोधित हो उठे और अपनी जटाओं से वीरभद्र नामक गण उत्पन्न किया | वीरभद्र यज्ञ आयोजित किए जाने वाले स्थान पर जाकर नरसंहार करता है, तथा शिव के ससुर दक्ष का सर काट देता है। इस नरसंहार को रोकने के लिए भगवान विष्णु, ब्रह्मा और सभी देवी देवता शिव से राजा दक्ष को माफ करने की याचना करते हैं। सभी देवी देवताओं की विनती के बाद भगवान शिव शांत हो जाते हैं और राजा दक्ष को पुनर्जीवित कर देते हैं।
इस कथा के अंतर्गत जो  वीरभद्र नामक किरदार है, उसे जाट समाज का पूर्वज माना जाता है।  
 जाट भारत की पुरानी जातियों में से एक है, विभिन्न इतिहासकारों का जाटो की उत्पत्ति की लेकर अलग-अलग मत है। कई इतिहासकारों का मानना है कि जाट शब्द की उत्पति महाराज युधिष्ठिर से हुई, उन्हें श्री कृष्ण द्वारा ज्येष्ठ से सम्बोधित किया गया, उन्हीं के वंशज ज्येष्ठ और फिर अपभ्रंश से जाट कहलाये।
  जाटों ने कभी ब्राह्मणवाद को स्वीकार नहीं किया। जाट समाज के लोग अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं, जिसे भंडारा कहा जाता है। इस जाति के लोग भगवान कृष्ण को अपना पूर्वज मानते हैं, लेकिन इस बात का प्रमाण किसी भी ग्रंथ में देखने को नहीं मिलता है। लेकिन मुख्यत: मूल रूप से इस जाति के लोग भारतीय हैं।
 जाटों की वर्तमान स्थिति  पहले से बेहतर है, ज्यादातर जाट मुख्य रूप से खेती करते हैं। इस जाति के लोग मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।  जाट समाज के लोगों की आर्थिक Growth Rate अन्य जातियों के मुकाबले बेहतर है।
जाटों की जनसंख्या 21वीं सदी के पूर्वार्द्ध में, पंजाब की कुल जनसंख्या का 20 प्रतिशत जाट थी, लगभग 10 प्रतिशत जनसंख्या ब्लोचिस्तान, राजस्थान और दिल्ली तथा 2 से 5 प्रतिशत जनसंख्या सिन्ध, उत्तर-पश्चिम सीमान्त और उत्तर प्रदेश में रहती थी। पाकिस्तान के 40 लाख जाट मुस्लिम हैं; भारत के लगभग 60 लाख जाट दो अलग जातियों के रूप में विभाजित हैं: एक सिख जो मुख्यतः पंजाब केन्द्रित हैं तथा अन्य हिन्दू हैं।
इतिहास के महान जाट
महाराजा रणजीत सिंह
महाराजा सूरजमल
तेजाजी
महाराजा जवाहर सिंह
  जाति इतिहासविद  डॉ . दयाराम आलोक के मतानुसार 17वीं शताब्दी के अंत और 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में जाटों ने मुगल साम्राज्य के खिलाफ हथियार उठाए| हिंदू जाट राज्य महाराजा सूरजमल के अधीन अपने चरम पर पहुंच गया 20वीं शताब्दी तक पंजाब पश्चिम उत्तर प्रदेश राजस्थान हरियाणा और दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में जमींदार जाट एक प्रभावशाली समूह बन गए इन वर्षों में कई जाटों ने शहरी नौकरियों के पक्ष में कृषि को छोड़ दिया और उच्च सामाजिक स्थिति का दावा करने के लिए अपनी प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का उपयोग किया

आजादी में योगदान और जाट -

कई इतिहासकार 1857 की क्रांति को स्वतंत्रता संग्राम नहीं मानते हैं। वीर सावरकर ने 1857 की क्रांति को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानते हुए पुस्तक लिखी जिसमें लिखा कि क्रांति की शुरुआत 10 मई को मेरठ से शुरु हुई, किन्तु जाट बाहुल्य इस क्षेत्र के जाटो का नाम नहीं लिखे जाने से स्वतंत्रता संग्राम में अपनी मजबूती खो बैठे। क्रांति महज रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, टीपू सुल्तान के इर्द-गिर्द घूमती रहीं तो वही मेरठ से महज मंगल पांडे के इर्द-गिर्द ही रह गई|
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