3.3.25

वैश्य जाती का गौरव शाली इतिहास |History of vaishya caste



vaishya saaamaj ke itihas ka video 
                                     


वैश्य हिंदू वर्ण व्यवस्था के चार वर्णों में से एक है। वैश्य हिन्दू जाति व्यवस्था के अंतर्गत वर्णाश्रम का तृतीय एवं महत्त्वपूर्ण स्तंभ है। इस समुदाय में प्रधान रूप से किसान, पशुपालक, और व्यापारी समुदाय शामिल हैं। संस्कृत मे विश् शब्द का तात्पर्य है प्रजा। प्राचीन काल में प्रजा (अर्थात समाज) को विश् नाम से संबोधित किया जाता था। इसके मुख्य संरक्षक को विशपति (यानि राजा) कहते थे,
 मनु के अनुसार चार प्रधान सामाजिक वर्ण शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मण थे, जिनमें सभ्यता के विकास के संग-संग नए व्यवसाय भी बाद में जुड़ते चले गए थे। 

व्युत्पत्ति

 मनुस्मृति के मुताबित वैश्यों की उत्पत्ति ब्रह्मा के उदर अर्थात पेट से हुई है। हालाकि कुछ अन्य विचारों के अनुसार ब्रह्मा से जन्मने वाले ब्राह्मण हुए और विष्णु भगवान से पैदा होने वाले वैश्य कहलाये और शंकर जी से   जिनकी उत्पत्ति हुई वो क्षत्रिय कहलाए. आज भी इसलिये ब्राह्मण  माँ सरस्वती (विद्या की देवी), वैश्य  माँ लक्ष्मी (धन की देवी), क्षत्रिय माँ दुर्गे (दुष्टों को विनाश करने वाली) को पूजते है।

वैश्य वर्ण का इतिहास

ज्यों-ज्यों क्षमता और सामर्थ्य बढ़ा, उसी के मुताबित नये किसान व्यवसायी समुदाय के पास शूद्रों की तुलना मे  ज्यादा साधन आते गये और वह एक ही जगह पर निवास कर सुखमय जीवन व्यतीत करने लगे। अब उनका प्रमुख उद्देश्य  ज्यादा सुख-सम्पदा एकत्रित करना था। इस व्यवसाय को संचालित करने हेतु व्यापारिक कौशल्या, सूझबूझ, व्यवहार-कुशलता, वाक्पटुता, परिवर्तनशीलता, खतरा अथवा जोखिम उठाने की क्षमता व साहस, धीरज, परिश्रम की जरुरत थी। जिन्होंने इस प्रकार की क्षमता हासिल कर ली थी, वह वैश्य वर्ग में शामिल हो गया। वैश्य कृषि-खेती, उत्पादक वितरण, पशुपालन और कृषि से जुडी औज़ारों व उपकरणों के संधारण (रखरखाव) तथा क्रय-विक्रय का व्यवसाय करने लगे। उनका जीवन शूद्र वर्ग के लोगो से अधिक आरामदायक हो गया और उन्होंने शूद्र जाति के लोगो को अनाज, कपड़ा, रहने का व्यवस्था आदि की जरुरी सुविधायें प्रदान कर अपनी मदद के लिये निजी अधिकार में रखना प्रारंभ कर दिया। 

बनिया के पूर्वज कौन थे?

बनियों का मानना ​​है कि इस समुदाय की उत्पत्ति 5000 साल पहले हुई थी, जब अग्रोहा, हरियाणा के पूर्वज महाराजा अग्रसेन (या उग्रसैन) ने वैश्य (हिंदू वर्ण व्यवस्था में तीसरा) समुदाय को 18 कुलों में विभाजित किया था।
वैश्य वर्ग को 'कोमाटी' या 'कोमाटिगा' भी कहा जाता है. उत्तर भारत में इन्हें 'बनिया' कहा जाता है. वहीं, दक्षिण भारत के व्यापारियों को चेट्टी या चेट्टियार कहा जाता है.
वैश्यों को पौराणिक राजा वैश्रवण के वंशज माना जाता है.
वैश्यों ने भारत के आर्थिक विकास में अहम भूमिका निभाई.
वैश्यों ने राज्य के प्रशासन में भी अहम भूमिका निभाई.
वैश्यों ने कर संग्रहकर्ता, लेखाकार, और अन्य प्रशासनिक पदों पर काम किया.
वैश्यों ने मुगल साम्राज्य के दौरान साहूकार, व्यापारी, और किसान के रूप में काम किया.
वैश्यों में कई लोग वित्त, आईटी, और विनिर्माण जैसे विभिन्न उद्योगों में लगे हुए हैं.

क्या बनिया वैश्य हैं?

बनिया शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर उत्तर और मध्य भारत में व्यापारिक जातियों के लिए किया जाता है और इन जातियों को वर्ण व्यवस्था में वैश्य का दर्जा दिया गया है.बनिया ( जिसे वानिया भी कहते हैं) शब्द संस्कृत के शब्द वणिज से लिया गया है, जिसका अर्थ है "व्यापारी।"
इस शब्द का इस्तेमाल भारत की पारंपरिक व्यापारिक या व्यवसायिक जातियों के सदस्यों की पहचान करने के लिए व्यापक रूप से किया जाता है। इस प्रकार, बनिया लोग साहूकार, व्यापारी और दुकानदार होते हैं।

वैश्य वर्ण के लोग कैसे होते हैं?

अपने दृष्टिकोण पर ईमानदारी से काम करते हुए, एक वैश्य खुद को क्षत्रिय या ब्राह्मण जैसी उच्च चेतना में बदल सकता है। वैश्य के मामले में, वे जो भी काम या पेशा करते हैं, उनका मुख्य लक्ष्य अपने और अपने परिवार के लिए धन और संपत्ति अर्जित करना होता है। 

बनिया जाति में कुल 56 उपजातियां हैं. 
इनमें से कुछ प्रमुख उपजातियां ये हैं:

अग्रवाल, गुप्ता, खंडेलवाल, माहेश्वरी, राजशाही, राघव, भाटी, जायसवाल, मेहता, केजरीवाल.
बनिया जाति के लोग मुख्य रूप से गुजरात और राजस्थान के रहने वाले हैं. इसके अलावा, ये लोग उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और अन्य उत्तरी राज्यों में भी रहते हैं.
बनिया जाति के लोग धार्मिक रूप से आम तौर पर जैन या हिंदू होते हैं. ये लोग औपचारिक शुद्धता का पालन करने में सख्त होते हैं.
बनिया जाति के लोग व्यापार, बैंकिंग, साहूकारी और वाणिज्यिक उद्यमों के मालिक होते हैं. ये लोग देश की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं.
बनिया जाति को हिंदू जाति व्यवस्था में तीसरे स्तर का दर्जा प्राप्त है. वे शूद्रों से ऊपर हैं, लेकिन ब्राह्मणों और क्षत्रियों से नीचे हैं.

बनिया और जैन में क्या अंतर है?

जैन का अर्थ है जैन धर्म को मानने वाला . बनिया शब्द संस्कृत के वणिक शब्द का अपभ्रंश या देशी रूप है जिसका अर्थ है वणिज या व्यापार करने वाला . बनिया लोग  सभी धर्मों में होते हैं

वैश्यों का गोत्र क्या है?

वैश्य समाज के लोगों के कई गोत्र होते हैं, जैसे कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ, और विश्वामित्र. गोत्र ऋषियों के संस्कृत नामों के समतुल्य होते हैं.

आर्य वैश्यों के 102 गोत्र हैं.

आर्य वैश्य अपने अनुष्ठानों के लिए 102 ऋषियों का अनुसरण करते थे.
सभी आर्य वैश्यों की पहचान और वर्गीकरण के लिए उपनाम गोत्र और ऋषि एक ही हैं.
भारत में गोत्र पद्धति के ज़रिए आपके वंश का पता चलता है. यह बहुत प्राचीन भारतीय पद्धति है..
वैश्य समाज के लोग पारंपरिक रूप से व्यापारी हैं.
वैश्य समाज के लोग व्यापार या अन्न से जुड़े काम करके लोगों का पेट भरते हैं.
उत्तर भारत में वैश्य समाज के लोगों को 'बनिया' कहा जाता है.
दक्षिण भारत में वैश्य समाज के लोगों को 'चेट्टी' या 'चेट्टियार' कहा जाता है.
महावर वैश्य समुदाय के लोगों को महाजन के नाम से भी जाना जाता है.
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वैश्य ,वणिक  जाति का   इतिहास 
 ध्यान देने योग्य और समझने वाली बात ये है कि एक ही कुल और  गोत्र का व्यक्ति ब्राह्मण हो सकता वैश्य भी हो सकता है, क्षत्रिय भी  और दलित भी हो सकता है ।  जहां तक सवाल वैश्यों का है तो यह मुख्‍यत: सूर्य और चंद्र वंशों के अलावा ऋषि वंश में विभाजित हैं। इनमें मुख्‍यत: महेश्‍वरी, अग्रवाल, गुप्ता, ओसवाल, पोरवाल, खंडेलवाल, सेठिया, सोनी, आदि का जिक्र होता है।
  महेश्वरी समाज का संबंध शिव के रूप महेश्वर से है। यह सभी क्षत्रिय कुल से हैं। शापग्रस्त 72 क्षत्रियों के नाम से ही महेश्वरी के कुल गोत्र का नाम चला। 
माहेश्वरियों के प्रमुख आठ गुरु हैं-
 1. पारीक, 2. दाधीच, 3.गुर्जर गौड़, 4.खंडेलवाल, 5.सिखवाल, 6.सारस्वत, 7.पालीवाल और 8.पुष्करणा। 
अग्रोहा : अग्रवाल समाज के संस्थापक महाराज अग्रसेन एक क्षत्रिय सूर्यवंशी राजा थे। अत: यह समाज भी सूर्यवंश से ही संबंध रखता है। वैवस्वत मनु से ही सूर्यवंश की स्थापना हुई थी। 
महाराजा अग्रसेन ने प्रजा की भलाई के लिए कार्य किया था। इनका जन्म द्वापर युग के अंतिम भाग में महाभारत काल में हुआ था। ये प्रतापनगर के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। वर्तमान 2025  के अनुसार उनका जन्म आज से करीब 5196  साल पहले हुआ था। अपने नए राज्य की स्थापना के लिए महाराज अग्रसेन ने अपनी रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेड़िए के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीर भूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास थी। उसका नाम अग्रोहा रखा गया।
 आज भी यह स्थान अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां महाराज अग्रसेन और मां वैष्णव देवी का भव्य मंदिर है। महाराज ने अपने राज्य को 18 गणों में विभाजित कर अपने 18 पुत्रों को सौंप उनके 18 गुरुओं के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना की थी। हर गोत्र अलग होने के बावजूद वे सब एक ही परिवार के अंग बने रहे। 
  पोरवाल समाज : माना जाता है कि राजा पुरु के वंशज पोरवाल कहलाए। राजा पुरु के चार भाई कुरु, यदु, अनु और द्रुहु थे। यह सभी अत्रिवंशी है क्योंकि राजा पुरु भी अत्रिवंशी थे। बीकानेर तथा जोधपुरा राज्य (प्राग्वाट प्रदेश) के उत्तरी भाग जिसमें नागौर आदि परगने हैं, जांगल प्रदेश कहलाता था।
 जांगल प्रदेश में पोरवालों का बहुत अधिक वर्चस्व था। विदेशी आक्रमणों से, अकाल, अनावृष्टि और प्लेग जैसी महामारियों के फैलने के कारण अपने बचाव के लिए एवं आजीविका हेतू जांगल प्रदेश से पलायन करना प्रारंभ कर दिया। अनेक पोरवाल अयोध्या और दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गए। मध्यकाल में राजा टोडरमल ने पोरवाज जाति के उत्थान और सहयोग के लिए बहुत सराहनीय कार्य किया था जिसके चलते पोरवालों में उनकी ‍कीर्ति है। दिल्ली में रहने वाले पोरवाल 'पुरवाल' कहलाए जबकि अयोध्या के आसपास रहने वाले 'पुरवार' कहलाए। इसी प्रकार सैकड़ों परिवार वर्तमान मध्यप्रदेश के दक्षिण-प्रश्चिम क्षेत्र (मालवांचल) में आकर बस गए। यहां ये पोरवाल व्यवसाय/ व्यापार और कृषि के आधार पर अलग-अलग समूहों में रहने लगे। इन समूह विशेष को एक समूह नाम (गौत्र) दिया जाने लगा और ये जांगल प्रदेश से आने वाले जांगडा पोरवाल कहलाए।
  मध्य प्रदेश  के रामपुरा के आसपास का क्षेत्र और पठार आमद कहलाता था। आमदगढ़ में रहने के कारण इस क्षेत्र के पोरवाल आज भी आमद पोरवाल कहलाते हैं। श्रीजांगडा पोरवाल समाज में उपनाम के रुप में लगाई जाने वाली 24 गोत्रें किसी न किसी कारण विशेष के द्वारा उत्पन्न हुई और प्रचलन में आ गई। 
  जांगलप्रदेश छोड़ने के पश्चात् पोरवाल समाज अपने-अपने समूहों में अपनी मानमर्यादा और कुल परम्परा की पहचान को बनाए रखने के लिए आगे चलकर गोत्र का उपयोग करने लगे। जैसे किसी समूह विशेष में जो पोरवाल लोग अगवानी करने लगे वे चौधरी नाम से सम्बोधित होने लगे। 
जो लोग हिसाब-किताब, लेखा-जोखा , आदि व्यावसायिक कार्यों में दक्ष थे वे मेहता कहलाए। 
यात्रा आदि सामूहिक भ्रमण, कार्यक्रमों के अवसर पर जो लोग अगुवाई करते और अपने संघ-साथियों की सुख-सुविधा का ध्यान रखते थे वे संघवी कहलाए। 
मुक्त हस्त से दान देने वाले दानगढ़ कहलाए। 
असामियों से लेन-देन करने वाले, धन उपार्जन और संचय में दक्ष परिवार सेठिया 
और धन वाले धनोतिया पुकारे जाने लगे। 
कलाकार्य में निपुण परिवार काला कहलाए, 
राजा पुरु के वंशज्पोरवाल 
और अर्थ व्यवस्थाओं को गोपनीय रखने वाले गुप्त या गुप्ता कहलाए।
 कुछ गौत्रें अपने निवास स्थान (मूल) के आधार पर बनी जैसे
 उदिया-अंतरवेदउदिया (यमुना तट पर), 
भैसरोड़गढ़ (भैसोदामण्डी) में रुकने वाले भैसोटा, 
मंडावल में मण्डवारिया,
 मजावद में मुजावदिया, 
मांदल में मांदलिया, 
नभेपुर के नभेपुरिया, आदि।
प्रत्येकगोत्र के अलग- अलग भेरुजी होते हैं। जिनकी स्थापना उनके पूर्वजों द्वारा कभी किसी सुविधाजनक स्थान पर की गई थी। 
दोसर समाज : ऋषि मरीचि के पुत्र कश्यप थे। डॉ. मोतीलाल भार्गव द्वारा लिखी पुस्तक 'हेमू और उसका युग' से पता चलता है कि दोसर वैश्य हरियाणा में दूसी गांव के मूल निवासी हैं, जो कि गुरुगांव जनपद के उपनगर रिवाड़ी के पास स्थित है।
 खंडेलवाल समाज : 
खंडेलवाल के आदिपुरुष हैं खाण्डल ऋषि। एक मान्यता के अनुसार खंडेला के सेठ धनपत के 4 पुत्र थे। 1.खंडू , 2.महेश, 3.सुंडा और 4. बीजा 
इनमें खंडू से खण्डेलवाल हुए, 
महेश से माहेश्वरी हुए 
सुंडा से सरावगी व 
बीजा से विजयवर्गी। 
खण्डेलवाल वैश्य के 72 गोत्र है। गोत्र की उत्पति के सम्बंध में यही धारणा है कि जैसे जैसे समाज में बढ़ोतरी हुई स्थान व्यवसाय, गुण विशेष के आधार पर गोत्र होते गए।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे।

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1.3.25

बलाई -मालवीय-मेहर जाति की जानकारी /History of Balai Caste

 



   बलाई जाति का इतिहास मुख्य रूप से बुनाई (बुुनकर) के पारंपरिक व्यवसाय से जुड़ा है और वे भारत के मध्य और उत्तरी राज्यों, विशेषकर मध्य प्रदेश और राजस्थान में पाए जाते हैं 
बलाई समाज के लोग हिंदू हैं.
बलाई समुदाय के लोग  विगत  वर्षों  मे  मालवीय अथवा मेहर सरनेम  से भी पुकारे जाने लगे हैं| 
वे माँ दुर्गा, माँ चामुंडा, और माँ कालरात्रि के भक्त हैं.
वे बाबा रामदेव जी को भी श्रद्धांजलि देते हैं.
कालरात्रि को अपनी कुलदेवी मानते हैं.
बलाई समाज के लोग पारंपरिक हिंदू त्योहार मनाते हैं जैसे होली, दिवाली, और नवरात्रि.
बलाई जाति के लोग कई गोत्रों में बंटे हैं, जैसे चौहान, राठौर, परिहार, परमार, सोलंकी, मरीचि, अत्रि, अगस्त, भारद्वाज, मतंग, धनेश्वर, महाचंद, जोगचंद, जोगपाल, मेघपाल, गर्वा, और जयपाल.
बलाई/बलाही/मैहर  जाति
 भारत के मध्य प्रदेश राजस्थान पंजाब दिल्ली और उत्तर प्रदेश राज्यों में पाई जाती है 
पौराणिक आख्यान- 
इस  जाती की अतीत में वणकर के रूप में उत्पत्ति हुई जिसे म्रकंड ऋषि का वंशज कहा जाता है ।।
म्रकंड ऋषि को आधुनिक बुनाई का जनक माना जाता है जो मारकंडे ऋषि के पिता भी थे जिनका मार्कंडेय पुराण में वर्णन किया है इनका जन्म भृगु ऋषि के काल में हुआ था ।।
 रेशम बुनकरों को ऋषि म्रकंड का वंशज माना जाता है ।
बलाई समाज के कुछ महापुरुषों के नाम ये रहे:
राजेंद्र मालवीय - अखिल भारतीय बलाई समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष
थावर गोबाजी - बलाई समाज के एक व्यक्ति जिसकी बेटी के विवाह के मौके पर आचार्य नानालाल महाराज ने कुव्यसन छोड़ने का संकल्प दिलाया था|
सीताराम, धूलजी, देवीलाल - बलाई समाज के वरिष्ठ लोग जिन्होंने आचार्य नानालाल महाराज की वाणी को अपने जीवन में अपनाया|
बलाई  समाज धर्म से हिंदू है उनकी कुलदेवी मां चामुंडा /कालरात्रि /महाकाली है |यह जाती अपनी इच्छा पूर्ति या सफलता हेतु अपनी कुलदेवी से मन्नते करती थी और मन्नत में पशु बलि भेड़ ,बकरी इत्यादि पशुओं की बलि देने को शुभ मानती थी यह जाती पारंपरिक रूप से मांसाहारी रही है और पशु बलि में विश्वास रखती है कुछ लोग धार्मिक होने के कारण पशु बलि के स्थान पर श्रीफल एवं पूजा पद्धति को सही मानता है| बलाई  समाज के कई पढ़े लिखे लोग अपने हिन्दू  धर्म को त्याग कर अन्य धर्म के अनुयाई बन गए हैं ।
बलाई समाज में आमतौर पर मुर्दे को जलाया (दाह संस्कार किया) जाता है, क्योंकि वे हिंदू धर्म की परंपराओं का पालन करते हैं, जिसमें दाह संस्कार ही प्रमुख अंत्येष्टि विधि है।
यह प्रथा अन्य हिंदू जातियों के समान है, जहाँ शव को श्मशान घाट ले जाया जाता है और चिता पर जलाया जाता है। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में स्थानीय या व्यक्तिगत मान्यताओं के आधार पर दफनाने की प्रथा भी हो सकती है, लेकिन मुख्य रूप से जलाने की ही परंपरा है।
राजस्थान में बहुतायत में मेघवाल जाति के लोग हैं जो अपने आप को बलाई नाम अंगीकार करते हैं राजस्थान में इन्हें मेघवंशी बलाई कहा जाता है 
बलाई जाति की उत्पत्ति कैसे हुई?
इसके बारे में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है; लेकिन राजपूताने (राजस्थान) में 19वीं शताब्दी के मध्य में बलाई शब्द का प्रचलन हो चुका था और 20 वीं शताब्दी में जनसंख्या रिपोर्ट्स में यह एक अलग समूह या जाति के रूप में दर्ज की जाने लगी थी। तब से बलाई जाति का अलग से अस्तित्व है।
बलाई समाज के गुरु कौन थे?
 बलाई समाज के गुरु बालक दास जी है जिनका जन्म 18 अगस्त 1805 ई को हुआ था और उनकी मृत्यु 28 मार्च 1860 ई को हुई थी
राधाकिशन मालवीय के पुत्र राजेंद्र मालवीय को अखिल भारतीय बलाई समाज का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
बलाई समाज के देवता कौन थे?
 बलाई समाज के आराध्य देवता दानवीर राजा बली  माने जाते हैं| 
उनकी मान्यताएं क्या हैं?
लगभग सभी बलाई हिंदू हैं। वे हिंदू देवताओं की पूजा और सेवा करते हैं। बलाई, मातृ-योद्धा देवी, दुर्गा की विशेष सेवा और ध्यान करते हैं। एक समय में, वे उनके लिए पशु बलि चढ़ाते थे। वे उनके मंदिरों में जाते हैं और उनके तीर्थस्थलों की यात्रा करते हैं। हिंदू ग्रंथों में कहा गया है कि सभी बुनकर आधुनिक बुनाई के जनक, ऋषि मृकंड के वंशज हैं।
 बलाई जाति के लोग अपने बच्चों का विवाह अपने गोत्र में नहीं करते । बलाई बुनकर जाति के लोग सुत लाकर के गांव देहात में कपड़ा बुनाई का कार्य करता था बलाई समाज का पारंपरिक व्यवसाय खेती/ पशुपालन/ बूनाई /चौकीदारी /चौबदारी /कोटवारी /सुरक्षा/ कृषि मजदूरी /लकड़ी की नक्काशी /कढ़ाई /सूती वस्त्र बुनना/राज मिस्त्री इत्यादि व्यवसाय करता है ।
 बलई/बलाई/बलाही/मैहर  यह शुद्र जाति मानी जाती है इस जाति पर बहुत अत्याचार हुए हैं इस जाति के लोगों से बेगारी /बेकारी के कार्य कराए जाते थे गांव में मजरो/टोलों में बलाई समुदाय के लोगों को गांव से बाहर पूर्व या पश्चिम में डेरों में निवास करना होता था इस जाति को छुआछूत अस्पृश्यता सामाजिक नीचता एवं घृणा की दृष्टि से देखा जाता था आर्थिक कमजोरी भुखमरी के कारण मृत पशुओं का मांस खाकर भी जीविका चलाते थे 
  राजा महाराजाओं के शासनकाल में इस जाति के लोगों को राजाओं के /गुप्तचर /सुरक्षा सैनिक/ करतब दिखाना/ मनोरंजन करना /आदि कार्य करवाए जाते थे खानाबदोश जिंदगी जीना होता था इस जाति की निर्धन गरीब बहन बेटियों महिलाओं के साथ अत्याचार किए जाते थे और उनसे देह व्यापार कराया जाता था ।।
विपरीत परिस्थितियों का सफर रहा है बलाही समाज का लेकिन बदलते परिवेश में  आज सामाजिक शैक्षणिक आर्थिक व्यवसायिक राजनेतिक प्रशासनिक सभी व्यवस्थाओं  और हर क्षेत्र में  इस जाती के लोग अग्रणी है 
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28.2.25

नायक जाति की उत्पत्ति और इतिहास /History Of Nayak Caste

 



नायक एक हिंदू जाति है जो भारत और पाकिस्तान में पाई जाती है. नायक समाज के बारे में ज़रूरी जानकारी इस प्रकार  है- 
नायक समाज की कुलदेवी "वन माता "है.
नायक समाज के आराध्य देव पाबूजी महाराज हैं.
नायक समाज के कुछ गोत्र हैं- साँखला, चाँवरिया, पँवार, लौहरा, सिसोदीया, सारासर, क्षेत्रपाल, अठवाल, बोहित, चण्डालिया, घौरण, आलसिका, बारवासिया, गरासिया, चारण, राड़ोदीया, डाबला, बगडीया, खारडु, डगला, भावरिया, हौबाणि.
नायक समाज के लोग भील जनजाति के बड़े उपजाति वर्ग से आते हैं.
नायक समाज के लोग भारत के शासक वर्ग के नज़दीक थे.
नायक समाज के लोग सेना में नायक और सेना नायक जैसे पद प्राप्त करने के कारण अपनी जनजाति में एक विशेष पहचान और रुतबा कायम किया.
नायक समाज के लोग अपनी जनजाति के समानांतर पूरे भारत में अपनी अलग पहचान रखते हैं.
नायक समाज के लोग अपने को भीलों का योद्धा और श्रेष्ठ वर्ग मानते हैं.
नायक समाज के लोग मुख्य रूप से हिन्दू धर्म का पालन करते हैं.
नायक जाति के लोग अपने को भीलों का योद्धा और श्रेष्ठ वर्ग मानते हैं.
रामदयाल मुंडा ने भी नायक जाति को आदिवासी समाज का सांस्कृतिक गुरु बताया था.
नायक जाति के लोग आधुनिक चिकित्सा देखभाल का मध्यम उपयोग करते हैं.
वे अभी भी अंधविश्वासों में विश्वास करते हैं और छोटी बीमारियों के लिए अपने भुवा (पवित्र विशेषज्ञ) के पास जाते हैं.
प्रजनन आयु की अधिकांश महिलाएँ नसबंदी करवा लेती हैं.
परिवार के आकार को सीमित करने के लिए स्वदेशी तरीकों का भी उपयोग करती हैं.
नायक जाति के कई प्रकार होते हैं, जैसे कि नायरा, नायक बढ़ा, नायक चोली वाला, नायक कापड़िया, नायक मोटा, लभाना, भोपा, बंजारा, तांडे, भील नाईक वगैरह.
नायक जाति के लोग राजपूत भी कहलाते थे.
नायक जाति के लोग युद्ध में सेना का संचालन करते थे.
नायक जाति के लोग गवर्नर के रूप में शासन करते थे.
नायक जाति के लोग वर्तमान में कृषि करते हैं और सरकारी-या प्राइवेट नौकरी करते हैं.


नायक समाज के कुल देवता कौन थे?

भगवान विष्णु की पूजा बाबा नायक के रूप में की जाती है। उन्हें तैली वैश्य व वणिक समुदाय का सृष्टिकर्ता माना जाता है।


नायक कौन सी जाति है?

कर्नाटक के मुस्लिम सिद्दी लोग नायक उपनाम का इस्तेमाल करते हैं जो उन्हें बीजापुर के राजाओं से उपाधि के रूप में मिला था। महाराष्ट्र में नायक और नाइक उपनाम का इस्तेमाल क्षत्रिय मराठा, सीकेपी, सारस्वत ब्राह्मण और देशस्थ ब्राह्मण समुदाय करते हैं।

प्रमुख नायक साम्राज्य

मदुरै नायक , 16वीं-18वीं सदी के तमिलनाडु के तेलुगु शासक। तंजावुर नायक , 16वीं-17वीं सदी के तंजावुर , तमिलनाडु के तेलुगु शासक। गिंगी (सेनजी) के नायक , 16वीं-17वीं सदी के तमिलनाडु के तेलुगु शासक, जो पहले विजयनगर साम्राज्य के गवर्नर थे।

नायक जाति के राजा कौन थे?

कृष्ण देव राय : नरसा नायक का पुत्र तालुव वंश का प्रथम शासक। मदुरै नायक राजवंश [[१]]) मदुरै नगर में केन्द्रित इस राजवंश ने १७७ वर्ष राज किया।

नायक कौन से वर्ग में आते हैं?

राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और भारत के अन्य राज्यों में नायक जाति को अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है और इसका उल्लेख अनुसूचित जनजाति सूची में भी है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल हैं।
  नायक के बीच कोई उपजातियां नहीं हैं, और अधिकांश संसा नायक एक ही कबीले, मालगट के हैं। इस बात के काफी प्रमाण हैं कि नायक जाति आदिवासी, पूर्व-आर्यन मूल की है। साधारण प्रेक्षक भी यह नोटिस करेगा कि नायक औसतन राजपूतों और अधिकांश अन्य स्थानीय जातियों की तुलना में सावले और अधिक गहरे रंग के होते हैं।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे।


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27.2.25

रैगर जाती की उत्पत्ति और इतिहास |History of Raigar

 



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रैगर (जिसे रायगर , रेगर , रायगढ़ , रानीगर और रेहगढ़ भी कहा जाता है, भारत का एक जाति समूह है। उन्हें कभी-कभी चमार जाति से जोड़ा जाता है लेकिन समाजशास्त्री बेला भाटिया उन्हें अलग मानती हैं। रैगर पंजाब , हरियाणा , गुजरात , हिमाचल प्रदेश और राजस्थान राज्यों में पाए जाते हैं।

रैगर समाज के बारे में जानकारी देते हुए, स्‍वामी आत्‍मारामजी के लेख में बताया गया है कि चित्तौड़गढ़ के युद्ध में रैगर क्षत्रियों ने हथियार लेकर हिस्सा लिया था. इससे पता चलता है कि रैगर समाज में क्षत्रिय संस्कार विद्यमान हैं. 

रैगर समाज की उत्पत्ति और इतिहास के बारे में जानकारीः

रैगर समाज के इतिहास के बारे में जानकारी के लिए, डॉ. पीएन रछौया की किताब 'रैगर जाति की उत्पत्ति व संपूर्ण इतिहास' का अध्ययन किया जा सकता है.

रैगर समाज को कभी-कभी चमार जाति से जोड़ा जाता है, लेकिन समाजशास्त्री बेला भाटिया उन्हें अलग मानती हैं.

रैगर समाज के लोग पंजाब, हरियाणा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, और राजस्थान में पाए जाते हैं.

राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में उन्हें रैगर के नाम से जाना जाता है.

रैगर समाज के इतिहास के बारे में जो भी लिखा गया है, उसमें ऐतिहासिक तथ्यों की खोज न कर मनगढ़त और काल्पनिक बातों का ज़्यादा ज़िक्र किया गया है.

रैगर समाज के इतिहास की रचना के लिए, ऐतिहासिक और भौगोलिक आधार पर सही प्रमाण दिए गए हैं.

रैगर समाज के इतिहास की रचना के लिए, राजस्थान सरकार के गजट का भी आधार लिया गया है.

‘रैगर’ शब्‍द की तरह रैगर जाति की उत्‍पत्ति के संबंध में भी विद्वानों के विभिन्‍न मत है । 

इस संबंध में इतिहास में उपलब्‍ध सामग्री के आधार पर हम यहां विचार करेंगे । खोज करने से पता चला कि चन्‍द्रवती के राज अग्रसेन के नाम पर आगरा और अग्रोहा नगर बसाये गए । अग्रोहा (पंजाब) पर राजा नन्‍दराज के समय सिकन्‍दर महान् ने आक्रमण किया था । मगर पूर्ण विजय प्राप्‍त नहीं कर सका । 

पं. ज्‍वाला प्रसाद ने अपनी पुस्‍तक ‘जाति भास्‍कर’ तथा रमेशचन्‍द्र गुणार्थी ने अपनी पुस्‍तक ‘राजस्‍थानी जातियों की खोज’ में लिखा है कि सम्‍वत् 1250 के लगभग शहाबुद्दीन गौरी ने अग्रोहा के राजा दिवाकर देव पर आक्रमण करके नगर को तहस-नहस कर दिया । राजा दिवाकर देव सपरिवार धर्म परिवर्तन कर जैनी हो गया । वहां के अग्रवाल जो सगरवंशी पुकारे जाते थे, वे भाग कर पंजाब के भटिण्‍डा और आस-पास के 22 गांवों – करटड़ी, खीबर, ज्ञानमण्‍ड, चंडुमण्‍ड, जगमोहनपुरा, टोपाटी, डमानु, ताला, दामनगढ़, धौलागढ़, नेनपाल, पीपलसार, फरदीना, बरबीना, भूदानी, मैनपाल, रतनासर, लुबान, सिंहगौड़, हरणोद, आवा और उदयसर आदि में आकर बस गए और अपने को रंगड़ राजपूत कहने लगे । 

जाति इतिहास विद  डॉ . दयाराम आलोक के अनुसार सन 1308  में फिरोजशाह तुगलक दिल्‍ली की गद्दी पर बैठा । उसने भटिण्‍डा पर आक्रमण किया और एक घण्‍टे में दस हजार हिन्‍दुओं को मौत के घाट उतारा । हिन्‍दुओं को गौ मांस खाने के को बाध्‍य किया गया । रंगड़ राजपूतों पर भी इसी तरह के भारी अत्‍याचार किए गए ।  इन्हीं रंगड़ राजपूतों को  ‘रैगर’ शब्‍द से सम्‍बोधित किया गया जो आज भी प्रचलित है ।  रैगर जाति की उत्‍पत्ति रंगड़ राजपूतों से हुई है और रैगर सगरवंशी है ।

श्री बजरंगलाल लोहिया ने अपनी पुस्‍तक ‘राजस्‍थान की जातियां’ में रेहगर (रैगर) नाम जाति की उत्‍पत्ति निम्‍नानुसार बताई है- ”मालवा प्रांत के मदूगढ़ स्‍थान में स्थित रैदास जाति के लोगों से रेहगर जाति के लोग अपनी जाति की उत्‍पत्ति बताते हैं । ……….. इस नाम की उत्‍पत्ति रैदास के नाम पर आश्रित है इसी नाम से जयपुर में विख्‍यात है । जोधपुर नगर में तथा मारवाड़ के अन्‍य भागों में यह लोग जटिये कहलाते हैं । संभवत: इसका कारण यह है कि जाटों के साथ रहने के कारण इनकी स्त्रियां जाट स्त्रियों के सद्दश्‍य वेश में रहने लगी है । पशुओं की खालों को रंगने के कारण बीकानेर में यह रंगिये कहलाते है । राजस्‍थान के रेहगर जनेऊ पहनते है और सात फेरों की प्रथा से विवाह करते हैं ।” श्री बजरंगलाल लोहिया का यह मत सही नहीं है, कपोल कल्पित है । रैगर जाति की उत्‍पत्ति रैदासजी के पैदा होने से 1400 वर्षों से भी अधिक पहले हो चुकी थी तथा रैदासजी जाति से चमार थे ।

जनगणना  राजस्थान  मारवाड़ सन् 1891 में रैगर या जटिया जाति की उत्‍पत्ति के संबंध में लिखा है कि ”रैदास के दो औरतें थी । एक की औलाद चमार रही और दूसरी की रैगर हुई । कोई यह भी कहते है कि भगत कहलाने से पहले रैदास चमार कहलाते थे 

तथा भगत कहलाने के पीछे की रैगर कहलाई ।

रैगर जाती को   जटिया कहे जाने की वजह यह है कि इनकी औरतें जाटनियों की तरह पॉंव में पीतल के पगरिये और घागरे की जगह धाबला पहनती है । जटियों को बीकानेर में रंगिये और मेवाड़ में बूला कहते है । रैगर वैष्‍णव धर्म रखते है । रैगर जनेउ पहिनते है तथा गंगाजी को अपने अरस-परस समझते है ।मरदुम शुमारी की इस रिपोर्ट में रैगर जाति की उत्‍पत्ति संबंधीत जो भी उल्‍लेख किया गया है वो बेवुनियाद और भ्रांतियां उत्‍पन्‍न करने वाला है । रैदासजी के एक ही औरत थी जिसका नाम लोना था तथा एक ही औलाद थी जिसका नाम विजयदास था ।

इस रिपोर्ट में रैगर जाति की उत्‍पत्ति के संबंध में लिखते समय इतिहास के तथ्‍यों को भी भुला दिया गया ।

श्री ओमदत्‍त शर्मा गौड़ ने अपनी पुस्‍तक ‘लुणिया जाति-निर्णय’ में लिखा है- कि ”लुणिया, लूनिया, नूनिया, नौनिया, नूनगर, शोरगर, नमकगर, रेहगर, खाखाल, खारौल, लवाणा, लबाणा, लबाजे, लवणिया, लोयाना, लोहाणे, लोयाणे, नूनारी, नूनेरा, आगरी आदि कई जातियॉं न होकर भारत वर्ष की प्रसिद्ध क्षत्रिय जाति के एक भेद के ही भिन्‍न-भिन्‍न नाम हैं, जो प्राचीन विपत्तियों के फलस्‍वरूप उद्योग-धन्‍धे अपना लेने तथा भिन्‍न-भिन्‍न जगहों में रहने व पुकारे जाने के कारण पड़ गए हैं ।” लेखक ने लूणिया जाति को सूर्यवंशी सिद्ध किया है । इस मत के अनुसार भी रेहगर (रैगर) क्षत्रिय हैं तथा सूर्यवंशी हैं ।

राजस्‍थान प्रान्‍तीय हिन्‍दू महासभा अजमेर ने कई प्रमाण देकर रैगरों की उत्‍पत्ति ‘गर’ क्षत्रियों से बताते हुए उनके साथ क्षत्रियों जैसा व्‍यवहार करने की अपील जारी की थी । यह अपील निम्‍नानुसार है- ”यह प्रमाणित किया जाता है कि शास्‍त्रों, इतिहास और प्राचीन ग्रन्‍थों के अनुशीलन से यह सिद्ध होता है कि यह रैगर जाति ‘गर’ क्षत्रियों से उत्‍पन्‍न हुई है । अत: सब हिन्‍दू (आर्य) नर-नारियों से निवेदन है कि वे इनके साथ क्षत्रियों के समान पूर्ण व्‍यवहार करें ।

” यह अपील साप्‍ताहिक ‘आवाज’ दिनांक 28 जुलाई, 1941, वर्ष 2 अंक 42 में जारी की गई थी । इसमें रैगर जाति की उत्‍पत्ति ‘गर’ क्षेत्रियों से मानी है ।

प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्‍द ओझा ने गर, गौर, गोरा तथा गौड़  को एक ही माना है और इतिहास से एक ही प्रमाणित किया है । गौड़ चन्‍द्रवंश की शाखा है । अत: गर क्षत्रिय चन्‍द्रवंशी हैं ज‍बकि 

इतिहास से यह प्रमाणित हो चुका है कि रैगर सूर्यवंशी  क्षत्रीय  हैं  । 

अत: गर क्षत्रियों से रैगर जाति की उत्‍पत्ति संबंधी यह मत सही नहीं है । रैगर गर क्षत्रिय नहीं है ।

रैगर जाति के संबंध में एक मत यह भी है कि कई स्‍वतन्‍त्र जातियों ने युद्ध में हारी हुई जातियों को अपने कार्य हेतु, अपने में मिला लिया । जैसे जटिया जाटों से ही संबंधित है । मगर यह मत सही नहीं है । जटिया रैगर का पर्यायवाची शब्‍द है तथा जटिया शब्‍द क्षेत्रीय प्रभावों से जुड़ गया है । रैगर जाति की उत्‍पत्ति रंगड़ राजपूतों से हुई है, जाटों से नहीं ।

पं. ज्‍वाला प्रसाद तथा रमेशचन्‍द्र गुणार्थी ने अपनी पुस्‍तकों में रैगर जाति की उत्‍पत्ति इतिहास के तथ्‍यों के आधार पर दी है । इन्‍होंने रैगर जाति की उत्‍पत्ति इतिहास के तथ्‍यों के आधार पर दी है । इन्‍होंने रैगर जाति की उत्‍पत्ति आज से लगभग 600 वर्ष पहले होना प्रमाणित किया है मगर यह तथ्‍य सही नहीं है ।

हुरड़ा का शिलालेख प्रकाश में आ चुका है । यह शिलालेख लगभग 1003 वर्ष प्राचीन है । इस शिलालेख से यह ठोस रूप से प्रमाणित होता है कि आज से 1003 वर्ष पूर्व भी यह जाति ‘रैगर’ नाम से पुकारी जाती थी तथा यह जाति आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व भी अस्‍तित्‍व में थी । 

सके अलावा फागी के बही भाटों की पोथियों में इस बात का विस्‍तृत उल्‍लेख है कि विश्‍व विख्‍यात तीर्थराज पुष्‍कर का प्रसिद्ध गऊघाट गुन्‍दी निवासी बद्री बाकोलिया ने सम्‍वत् 989 में बनवाया । इस तथ्‍य को अजमेर के न्‍यायालय ने भी माना है । गऊघाट का निर्माण आज से 1050 वर्ष पूर्व हुआ था । अत: यह जाति और गौत्र 1050 वर्ष पूर्व भी मोजूद थी ।

बही भाटों की पोथियों में रैगरों का विस्‍तृत और विश्‍वसनीय वर्णन है । इन सब तथ्‍यों को देखने यह प्रमाणिक रूप से कहा जा सकता है कि रैगर जाति हजारों वर्ष प्राचीन जाति है । शिलालेखों तथा बही भाटों की पोथियों को गलत नहीं माना जा सकता ।

यह तो निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि रैगर जाति की प्राचीनता हजारों वर्षों की है मगर पं. ज्‍वाला प्रसाद तथा रमेशचन्‍द्र गुणार्थी के मत से यह अवश्‍य प्रकट होता है कि इस जाति ने सम्‍वत् 1408 के बाद ही निम्‍न कर्म अपनाए यद्यपि इससे पहले भी यह जाति अस्‍तित्‍व में थी मगर इस जाति के कर्म उच्‍च थे । 

बही भाट स्‍वयं यह मानते हैं तथा उनकी पोथियों में स्‍पष्‍ट उल्‍लेख है कि इस जाति के कर्म पहले उच्‍च थे तथा कालांतर में किन्‍हीं परिस्थितियों के कारण निम्‍न कर्म अपना लिए । इन सब तथ्‍यों से ऐसा प्रकट होता है कि इस जाति ने आज से लगभग 600 वर्ष पूर्व निम्‍न कर्म अपनाए और इससे पहले अपने क्षत्रिय कर्म को ही अपनाए हुए थे । 

पं. ज्‍वाला प्रसाद तथा रमेशचन्‍द्र गुणार्थी का मत रैगर जाति की उत्‍पत्ति का नहीं बल्‍कि रैगर जाति के कर्म परिवर्तन का मत प्रतीत होता है । पं. ज्‍वाला प्रसाद तथा रमेशचन्‍द्र गुणार्थी ने सम्‍वत् 1250 तथा सम्‍वत् 1408 में हुए मुगल आक्रमणों का वर्णन दिया है उन पर दृष्टि डालें तो वह काल कर्म परिवर्तन का जेहाद छेड़ रखा था । उन परिस्थितियों में क्षत्रिय निम्‍न कर्म अपना कर या धर्म परिवर्तन कर ही जीवित रह सकते थे । अत: उस समय के हालात को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि वह काल कर्म और धर्म परिवर्तन का काल था । इसलिए यह ज्‍यादा उचित प्रतीत होता है कि इस काल में इन रैगर क्षत्रियों ने अपने क्षत्रिय कर्म बदल कर निम्‍न कर्म अपना लिए तभी से इन को निम्‍न जातियों में शुमार कर दिया गया ।

शूद्रों की उत्‍पत्ति के सम्‍बंध में खोज पर सर्वप्रथम शूद्रों के महान नायक डॉ. भीमराव अम्‍बेडकर ने कलम उठाई थी । उन्‍होंने 1947 में Who were the Sudras ग्रन्‍थ लिखा जिसमें अपने सम्‍पूर्ण जीवन के अनुभव एवं अध्‍ययन के आधार पर निष्‍कर्ष निकाला कि शूद्रों की उत्‍पत्ति आर्य क्षत्रियों के उस सूर्यवंशी वर्ग में से हुई है जिनका ब्राह्मणों ने वैमनस्य के कारण उपनयन संस्‍कार करने से करने से मनाही कर दी थी । महाभारत के शान्तिपर्व (बारह-60, 38-40) में वर्णन आया है कि पैजवन शूद्र राजा था और उसने यज्ञ करवाया था । ब्राह्मणों ने उसे उपनयन (यज्ञोपवित संस्‍कार) के अधिकार से वंचित कर दिया था ।

डॉ. अम्‍बेडकर द्वारा उपरोक्‍त पुस्‍तक लिखे जाने के बाद शूद्रों की उत्‍पत्ति के विषय में नई ऐतिहासिक खोजें हुई है । ‘सिंधु घाटी सभ्‍यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक ॽ’ के 

लेखक नवल वियोगी का मत है कि- ”शूद्रों की उत्‍पत्ति क्षत्रियों में से हुई मगर वे क्षत्रिय आर्य नहीं अनार्य थे । वे सिंधु घाटी के वीर शासक आयुद्ध जीवी वर्ग की संतान थे ।” रामशरण शर्मा ने अपने ग्रन्‍थ ‘शूद्रों का प्राचीन इतिहास’ तथा सुन्‍दरलाल सागर ने अपनी पुस्‍‍तक ‘द्रविड़ और द्रविड़ स्‍थान’ में शूद्रों की उत्‍पत्ति द्रविड़ों से मानी है जो सिंधु घाटी के सृजनकर्त्‍ता थे । 

वे अनार्य क्षत्रीय आयुद्धधारी, वीर योद्धा और बलवान थे । अत: अधिकांश विद्वान इस बात को मानते है कि शूद्र अनार्य (द्रविड़) क्षत्रीय थे । उनमें क्षत्रियों के गुण थे । इस आधार पर भी रैगरों की उत्‍पत्ति क्षत्रियों से ही प्रमाणित होती है ।

डॉ. अम्‍बेडकर ने शूद्रों की उत्‍पत्ति सूर्यवंशी क्षत्रियों से मानी है । इसलिए रैगर भी सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं । बही भाटों की पोथियों का उल्‍लेख किये बिना रैगर जाति की उत्‍पत्ति के संबंध में निष्‍कर्ष निकालना न्‍याय संगत नहीं है । इतिहास की पुस्‍तकों में रैगर जाति का कहीं भी उल्‍लेख नहीं है । रैगरों के बही भाटों की पोथियॉं ही एक मात्र ऐसे लिखित दस्‍तावेज हैं जिसमें इस जाति के बारे में सब कुछ तथा विस्‍तृत रूप से लिखा हुआ है । उन्‍हें समझने की आवश्‍यकता है । 

जब से बही भाटों ने पोथियॉं लिखनी शुरू की है त‍ब से आज दिन तक उनकी पोथियों में रैगरों के गोत्रों तथा वंशावलियों का विस्‍तृत वर्णन है । बही भाट रैगरों के कुल 356 गोत्र बताते हैं । प्रत्‍येक गोत्र का इतना विस्‍तृत वर्णन दिया हुआ है कि उसकी उत्‍पत्ति किस स्‍थान से तथा किस वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्‍य तथा शूद्र) से हुई । उस मूल वर्ण में रहते उनकी इष्‍ट देवी कौन थी, कौन सी पीढ़ि में निम्‍न कर्म अपनाये आदि उल्‍लेख है ।

बही भाटों से यदि यह पूछा जाय कि रैगर जाति की उत्‍पत्ति कब हुई तथा इसने निम्‍न कर्म कब अपनाए तो वे इसका जवाब नहीं दे सकते । इसका कारण यह है कि हर गोत्र की उत्‍पत्ति अलग-अलग समय और स्‍थान से हुई तथा अलग-अलग समय में कर्म परिर्वतन किये । रैगरों के तमाम गोत्रों का विस्‍तृत वर्णन उनकी पोथियों में मौजूद है । उन्‍हीं को समझ कर सही निष्‍कर्ष निकाला जा सकता है । अत: रैगर जाति की उत्‍पत्ति की सही जानकारी बही भाटों की पोथियों में ही मिल सकती है । मैंने (चन्‍दनमल नवल) उनकी बहियों से यह जानकारी लेने की कोशिश भी की मगर निम्‍न कारणों से यह जानकारी प्राप्‍त नहीं हो सकी ।

पहला कारण तो यह है कि रैगरों की तमाम 356 गोत्रों की जानकारी बही भाटों की एक पोथी में उपलब्‍ध नहीं है । इनकी पोथियॉं पीढ़ि दर पीढ़ि बढ़ती जाती है । आज एक बही भाट के पास एक गोत्र की पोथी है । वह जिस गोत्र को मांगता है उसी गोत्र की पोथी उसके पास है । इस तरह पूरे भारत में घूम कर सभी बही भाटों से जानकारी लेना किसी एक व्‍यक्ति के लिये संभव नहीं है । दूसरा कारण यह है कि बही भाट किसी एक व्‍यक्ति विशेष को गोत्रों की जानकारी देने को तैयार नहीं हैं । उनका कहना है कि रैगर जाति में कई ऐसे गोत्र है जो निम्‍न जातियों से आकर मिले हैं । उन गोत्रों की उत्‍पत्ति के सही कारण बताने पर यजमान नाराज होंगे जिसका सीधा असर हमारी रोजी-रोटी पर पड़ेगा । मगर वे इस बात के लिए तैयार है कि यदि अखिल भारतीय रैगर महासभा या प्रान्‍तीय रैगर महासभा आदेश दें तो पोथियों उनके सामने किसी भी समय पेशकर सकते है । 

रैगर जाति की उत्‍पत्ति का सही स्‍त्रोत बहीभाटों की पोथिया ही हैं

 अखिल भारतीय रैगर महासभा तथा प्रान्‍तीय रैगर महासभा जब महा सम्‍मेलनों पर लाखों रूपये खर्च कर सकती है तो इस महत्‍वपूर्ण काम को अविलम्‍ब प्राथमिकता के आधार पर हाथ में लेना चाहिये । 

इतिहास की किताबों में रैगर जाति की उत्‍पत्ति ढूंढना अंधेरे में हाथ मारने के समान है । रैगर जाति की उत्‍पत्ति की सही जानकारी बही भाटों की पोथियों में ही मिल सकती है ।

रैगरों में काफी लोग उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त कर सरकारी नौकरियों में उच्‍च पदों पर पहुँचे हैं । आज सरकारी सेवाओं में अखिल भारतीय एवम् प्रांतीय स्‍तर के सर्वेच्‍च पदों पर रैगर नियुक्‍त हैं और सफलतापूर्वक अपने दायित्‍वों को निभा रहे हैं ।

सूर्यवंशी रेगर समाज की कुलदेवी गंगा मैया है 

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