14.1.20

सुनार,स्वर्णकार समाज का इतिहास,गोत्र और कुलदेवी:sunar jati kuldevi



ऐसा लगता है कि कुछ लोगों को सुनार/स्वर्णकार समुदाय को लेकर कुछ चिंता है। जब तक आपके पास उचित शोध और डेटा न हो, तब तक आप समाज की स्थिति का अंदाजा नहीं लगा सकते। हाँ, ज़्यादातर राज्यों में सुनार OBC के अंतर्गत आता है, इसका मुख्य कारण आर्थिक गिरावट है, कुछ राज्यों में इसे सामान्य श्रेणी में भी रखा गया है, गोल्ड कंट्रोल एक्ट 1962 और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ है। समाज के अलग-अलग वर्गों/वर्ण के लोगों के इस पेशेवर समुदाय में शामिल होने के कारण सामाजिक स्थिति अलग-अलग होती है। इसमें उच्च मांग और मूल्य वाला पेशा शामिल है।
यदि आप वास्तव में स्थिति को समझना चाहते हैं तो सर्राफा बाजार में जाइए और गिनिए कि कितनी दुकानें व्यापारी समुदाय के अलावा अन्य लोगों ने ली हैं, विशेष रूप से 2,3 स्तरीय शहरों में।
यदि आप गांवों या शहरों में जाएंगे तो आप लोगों से पूछेंगे कि वे केवल आभूषण और धन उधार देने के लिए सुनार की दुकान के बारे में ही जानते हैं।
इस समुदाय में कई सेठ, साहूकार हैं जो ब्याज पर पैसा देते हैं और हर जगह खरीद-बिक्री में शामिल होते हैं। यहां तक ​​कि विभिन्न समूहों के बनिया और खत्री सुनार उत्तर भारत में शोरूम चलाने के बाद भी तीसरे स्थान पर हैं।
कायस्थ और ब्राह्मण इस व्यवसाय में बहुत ही असाधारण हैं, वह भी बहुत छोटे स्तर पर।
यदि आप केवल उन गरीब सुनारों को ही ध्यान में रख रहे हैं, जो अपनी निम्न आर्थिक स्थिति के कारण दूसरों की दुकानों पर काम करते हैं, तो ऐसा होगा कि आप मजदूर वर्ग और उच्च जाति समूह के अन्य छोटे सड़क विक्रेताओं को भी इसमें शामिल कर रहे हैं। वहां भी वे अपने कौशल के कारण बेहतर हैं, वे बेरोजगार नहीं हैं।
हां, इस समुदाय का शैक्षणिक रूप से पिछड़ा दर्जा है और यह पारंपरिक व्यवसाय पर केंद्रित है, लेकिन इस हिस्से में तेजी से सुधार हो रहा है।
सरकार को इस कला और लोगों की सुरक्षा और आसान सुविधाओं के लिए कदम उठाने की जरूरत है, क्योंकि यह कला विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है। जटिल नीतियों और सरकारी हितों की कमी के कारण लोग इस पेशे से पीड़ित हैं और इसे छोड़ रहे हैं।
इस समुदाय के लोग अब अन्य लाभदायक व्यवसायों में प्रवेश कर रहे हैं, शिक्षित हो रहे हैं, नौकरियां चुन रहे हैं, क्योंकि इसमें बड़ी मात्रा में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है।
उन्हें कभी भी अछूत नहीं माना गया और भारतीय राज्य के बहुसंख्यकों ने उन्हें ऊंची जाति का दर्जा दिया। फिर भी उनकी संपत्ति, रहन-सहन, आभूषण, पहनावा चर्चा का विषय बना हुआ है और दूसरों ने भी उन्हें अपनाया है।
और अगर आप महाराष्ट्र के ऐतिहासिक तथ्यों के बारे में बात करते हैं तो यह निश्चित बिंदु पर हो सकता है और एक और विचार यह था कि सुबह में सुनार को देखना पैसे की हानि की तरह था। जो लोग उच्च और अन्य ओबीसी जातियों के बीच एक दूसरे के लिए संकेत देते हैं।
नाना शंकर सेठ को मुंबई का निर्माता माना जाता है और महाराष्ट्र के इतिहास में सबसे बड़ा दानदाता स्वर्णकार समाज से ही था।
आज भी हम सोने के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं और यह सोना बनाने वाले के माध्यम से ही आता है। मध्य युग में यह सबसे धनी जाति थी, लेकिन सोने पर नियंत्रण अधिनियम और बिक्री और खरीद पर नियंत्रण के कारण वे बहुत प्रभावित हुए और उन्हें उन व्यापारी/दलाल समुदायों पर निर्भर होना पड़ा जो उस समय शैक्षिक रूप से आगे थे।
अब वे अच्छे अनुपात में सुधार कर रहे हैं और स्वर्ण आभूषणों के विनिर्माण और व्यापार में हॉलमार्क आदि जैसे बहुविध दायित्वों को पूरा कर रहे हैं।
और अलग-अलग वर्णों की स्थिति के पीछे तथ्य यह है कि कुछ स्थानों पर क्षत्रिय, वैश्य, ब्राह्मण, विश्वकर्मा या शुद्ध सुनार अलग-अलग मूल के हैं। यह मुसलमानों और अंग्रेजों के आक्रमण के कारण हुआ, जहाँ इन वर्णों के लोगों ने अच्छी आय या जीवनयापन के लिए इस पेशे को अपनाया। अतीत में उच्च स्थिति के केवल 2 मापदंड थे सोना और ज़मीन, इसलिए बहुत से लोग लाभ कमाने और आभूषण निर्माण व्यवसाय के लिए इस पेशे में प्रवेश कर रहे थे, जिस पर अतीत में सुनारों का एकाधिकार था।
उनके अपने कुल, गोत्र, आल्हा हैं जो अलग-अलग वर्ण व्यवस्था के उनके संबंध को दर्शाते हैं। वे तब तक आपस में विवाह नहीं करते जब तक कि उनका कोई खास समूह न हो।
न्यारिहा (जो वास्तव में सुनार की दुकानों पर बर्तन धोने का काम करते थे) का दर्जा निम्न था क्योंकि वे बड़े सुनारों के यहां नौकर थे और कुछ राज्यों में सुनार की अनुसूचित जाति की स्थिति का उपयोग करके उन्होंने कुछ मरम्मत का काम सीखा था।
लोगों को अपना समूह चुनने की स्वतंत्रता है और विचार के लिए उनकी तुलना की जाती है तथा एक लोकतांत्रिक निकाय है जो संवैधानिक अधिकारों के बावजूद लोगों के विश्वास, संस्कृति, संस्कार और रीति-रिवाजों के अधिकार को सुरक्षित रखता है, जहां सभी भारतीय समान हैं।

चन्द्रवंश में हस्ति नाम प्रतापी राजा की संतान विकुंठन के पुत्र महाराजा अजमीढ़ थे । उनकी माता का नाम रानी सुदेवा था। त्रेता युग में जब परशुराम्जी क्षत्रियों से कुपित होकर उनका संहार कर रहे थे ऐसे आपातकाल में वन स्थित ॠषि-मुनियों ने उन्हें शरण दी। तत्कालीन महाराज अजमीढ़जी क्षत्रियों की दयनीय दशा देखकर चिंतित रहने लगे। उन्हें स्वर्णकला का ज्ञान था, उन्होंने राज्य का कार्यभार युवराज संवरण को सौंपा व वानप्रस्थ आश्रम पहुंच आश्रम स्थापित किया व भयातुर क्षत्रियों को संरक्षण दिया। स्वर्णकारी की शिक्षा देकर सम्मान प्रदान किया। जनकपुरी में शिवधनुष भंग होने के अवसर पर रामजी से परशुरामजी का वार्तालाप होने पर क्षत्रियों के प्रति क्रोध शांत हुआ। जो क्षत्रिय स्वर्णकला में पारंगत हो चुके थे, उन्होंने इस स्वर्णकला को अपनाए रखा व पीढ़ी दर पीढ़ी उन्नत करते हुए सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाया। भौगोलिक स्थिति एवं क्षेत्रियता के कारण स्वर्णकार विभिन्न नामों से पुकारे जाते है।
1. देशवाली-मारवाड़ से बहुत वर्ष पहले दिल्ली एवं उत्तरप्रदेश में बसते है।
2. छेनगरिया
3. पछादे- मुख्यत: दिल्ली एवं उत्तरप्रदेश में निवास करते है। देशवालियों से रस्म रिवाज, खानपान न मिलने के कारण बेटी व्यवहार नहीं है।
4. निमाड़ी- मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में बसते हैं।
5. वनजारी- आंध्रप्रदेश एवं आसपास के क्षेत्रों में बसते हैं। ये लोग बन्जारों का काम करते हैं एवं उन्हीं के साथ घुमक्क्ड़ जीवन बिताते हैं।
6. पजाबी- हमारे इन बन्धुओं में पंजाब के पहरावे के अतिरिक्त कोई अन्तर नहीं है।
7. भागलपुरी- बिहार के भागलपुर क्षेत्र में निवास करते हैं।
8. मारवाड़ी- मारवाड़ (राजस्थान) से धीरे धीरे देश के विभिन्न प्रान्तों में जाकर बस गये हैं। अपने को मारवाड़ी ही कहते हैं।
9. ढ़ूढाडी- राजस्थान की जयपुर रियासत के निवासी।
10. शेखावटी- राजस्थान के बीकानेर से लगा क्षेत्र शेखावटी कहलाता है। यहां बसने वाले बन्धु शेखावटी कहलाते हैं।
11. मालवी- मारवाड़ तथा मेवाड़ से आकर मालवा में बस गये।
12. माहोर- मथुरा, आगरा, करोली आदि स्थानों पर इस नाम से सुनार बन्धु बसते हैं।
वे वैष्णव धर्म का पालन करते हैं, और उनमें से कई स्वामीनारायण संप्रदाय से संबंधित हैं।
 मैढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज श्री महाराजा अजमीढ़जी को अपना पितृ-पुरुष (आदि पुरुष) मानती है। वैसे ऐतिहासिक जानकारी जो विभिन्न रुपों में विभिन्न जगहों पर उपलब्ध हुई है उसके आधार पर  मैढ़ क्षत्रिय अपनी वंशबेल को भगवान विष्णु से जुड़ा हुआ पाते हैं। कहा गया है कि भगवान विष्णु के नाभि-कमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी से अत्री और अत्रीजी की शुभ दृष्टि से चंद्र-सोम हुए। चंद्रवंश की 28वीं पीढ़ी में अजमीढ़जी पैदा हुए। महाराजा अजमीढ़जी का जन्म त्रेतायुग के अन्त में हुआ था।  उनके दादा महाराजा श्रीहस्ति थे जिन्होंने प्रसिद्ध हस्तिनापुर बसाया था। महाराजा हस्ति के पुत्र विकुंठन एवं दशाह राजकुमारी महारानी सुदेवा के गर्भ से महाराजा अजमीढ़जी का जन्म हुआ। इनके अनेक भाईयों में से पुरुमीढ़ और द्विमीढ़ विशेष प्रसिद्ध हुए। द्विमीढ़जी के वंश में मर्णान, कृतिमान, सत्य और धृति आदि प्रसिद्ध राजा हुए। पुरुमीढ़जी के कोई संतान नहीं हुई। महाराज अजमीढ़ की दो रानियां थी सुमित और नलिनी। इनके चार पुत्र हुए बृहदिषु, ॠष, प्रियमेव और नील । इस प्रकार महाराजा अजमीढ़जी का वंश वृद्धिगत होता गया, अलग-अलग पुत्रों-पौत्र,प्रपोत्रों के नाम से गोत्र उपगोत्र चलते गये। हस्तिनापुर के अतिरिक्त अभी के अजमेर के आसपास का क्षेत्र मैढ़ावर्त के नाम से महाराजा अजमीढ़जी ने राज्य के रुप में स्थापित क्या और वहां और कल्याणकारी कार्य किये।

सुनार (वैकल्पिक सोनार या स्वर्णकार) भारत के स्वर्णकार समाज से सम्बन्धित जाति है जिनका मुख्य व्यवसाय स्वर्ण धातु से भाँति-भाँति के कलात्मक आभूषण बनाना, खेती करना तथा सात प्रकार के शुद्ध व्यापार करना है। यद्यपि यह समाज मुख्य रूप से हिन्दू को मानने वाला है लेकिन इस जाति का एक विशेष कुलपूजा स्थान है। सुनार अपने पूर्वजों के धार्मिक स्थान की कुलपूजा करते है। यह जाति हिन्दूस्तान की मूलनिवासी जाति है। मूलत: ये सभी क्षत्रिय वर्ण में आते हैं इसलिये ये क्षत्रिय सुनार भी कहलाते हैं। आज भी यह समाज इस जाति को क्षत्रिय सुनार कहने में गर्व महसूस करता हैं।

शब्द की व्युत्पत्ति

सुनार शब्द मूलत: संस्कृत भाषा के स्वर्णकार का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है स्वर्ण अथवा सोने की धातु या सोने जैसी फसल का उत्पादन करने वाला। यह क्षत्रिय जाति है जो अन्याय तथा अत्याचार के विरूद्ध लड़ती है। इस जाति में अनेक महापुरूषों ने जन्म लिया है। यह इतिहास की वीर तथा महान् जाति है।प्रारम्भ में निश्चित ही इस प्रकार की निर्माण कला के कुछ जानकार रहे होंगे जिन्हें वैदिक काल में स्वर्णकार कहा जाता होगा। बाद में पुश्त-दर-पुश्त यह काम करते हुए उनकी एक जाति ही बन गयी जो आम बोलचाल की भाषा में सुनार कहलायी। जैसे-जैसे युग बदला इस जाति के व्यवसाय को अन्य वर्ण के लोगों ने भी अपना लिया और वे भी स्वर्णकार हो गये। सुनार शाकाहारी,सुँदर,चरित्रवान,साहसी तथा पूरक शक्ति से सिद्ध होता है। जबकि स्वर्णकार दुर्भाग्यवश किसी अन्य जाति का भी हो सकता है। अन्य जाति का व्यक्ति सुनार जाति में उसी प्रकार पहचाना जाएगा जैसे हँसो में अन्य पक्षी पहचाना जाता है। गुणो से ही जाति की पहचान होती है। जाति से ही गुणो का परिचय मिलता है।

इतिहास

लोकमानस में प्रचलित जनश्रुति के अनुसार सुनार जाति के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है कि त्रेता युग में परशुराम ने जब एक-एक करके क्षत्रियों का विनाश करना प्रारम्भ कर दिया तो दो राजपूत भाइयों को एक सारस्वत ब्राह्मण ने बचा लिया और कुछ समय के लिए दोनों को मैढ़ बता दिया जिनमें से एक ने स्वर्ण धातु से आभूषण बनाने का काम सीख लिया और सुनार बन गया और दूसरा भाई खतरे को भाँप कर खत्री बन गया और आपस में रोटी बेटी का सम्बन्ध भी न रखा ताकि किसी को यह बात कानों-कान पता लग सके कि दोनों ही क्षत्रिय हैं।आज इन्हें मैढ़ राजपूत के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि ये वही राजपूत है जिन्होंने स्वर्ण आभूषणों का कार्य अपने पुश्तैनी धंधे के रूप में चुना है।
लेकिन आगे चलकर गाँव में रहने वाले कुछ सुनारों ने भी आभूषण बनाने का पुश्तैनी धन्धा छोड़ दिया और वे खेती करने लगे।

वर्ग-भेद

अन्य हिन्दू जातियों की तरह सुनारों में भी वर्ग-भेद पाया जाता है। इनमें अल्ल का रिवाज़ इतना प्राचीन है कि जिसकी कोई थाह नहीं।ये निम्न 3 वर्गों में विभाजित है,जैसे 4,13,और सवा लाख.  
 इनकी प्रमुख अल्लों के नाम भी विचित्र हैं जैसे ,परसेटहा, ग्वारे,भटेल,मदबरिया,महिलबार,नागवंशी,छिबहा, नरबरिया,अखिलहा,जडिया, सड़िया, धेबला पितरिया, बंगरमौआ, पलिया, झंकखर, भड़ेले, कदीमी, नेगपुरिया, सन्तानपुरिया, देखालन्तिया, मुण्डहा, भुइगइयाँ, समुहिया, चिल्लिया, कटारिया, नौबस्तवाल, व शाहपुरिया.सुरजनवार , खजवाणिया.डसाणिया,मायछ.लावट .कड़ैल.दैवाल.ढल्ला.कुकरा.डांवर.मौसूण.जौड़ा . जवडा. माहर. रोडा. बुटण.तित्तवारि.भदलिया. भोमा. अग्रोयाआदि-आदि। अल्ल का अर्थ निकास या जिस स्थान से इनके पुरखे निकल कर आये और दूसरी जगह जाकर बस गये थे आज तक ऐसा माना जाता है।

मैढ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज की कुलदेवियाँ,,,,कुलदेवी उपासक सामाजिक गोत्र,,,,
मैढ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज की कुलदेवियाँ
कुलदेवी उपासक सामाजिक गोत्र


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1. अन्नपूर्णा माता –
 खराड़ा, 
गंगसिया, 
चुवाणा, 
भढ़ाढरा, 
महीचाल,
रावणसेरा,
 रुगलेचा
2. अमणाय माता – 
कुझेरा, 
खीचाणा,
 लाखणिया, 
घोड़वाल, 
सरवाल, 
परवला

3. अम्बिका माता – 
कुचेवा, 

नाठीवाला
4. आसापुरा माता – 
अदहके, 
अत्रपुरा, 
कुडेरिया, 
खत्री आसापुरा, 
जालोतिया, 
टुकड़ा, 
ठीकरिया, 
तेहड़वा, जोहड़, 
नरवरिया,
 बड़बेचा, 
बाजरजुड़ा,
 सिंद,
 संभरवाल, 
मोडक़ा, 
मरान,
 भरीवाल,
 चौहान
5. कैवाय माता – 
कीटमणा, 
ढोलवा, 
बानरा, 
मसाणिया,

 सींठावत
6. कंकाली माता –
 अधेरे, 
कजलोया, 
डोलीवाल, 
बंहराण,
 भदलास

7. कालिका माता – 
ककराणा, 
कांटा,
 कुचवाल, 
केकाण, 
घोसलिया, 
छापरवाल,
 झोजा, 
डोरे, 
भीवां,
 मथुरिया,
 मुदाकलस

8. काली माता – 
बनाफरा

9. कोटासीण माता –
 गनीवाल,
 जांगड़ा,
  ढीया,
 बामलवा, 
संखवाया, 
सहदेवड़ा, 
संवरा

10. खींवजा माता –
 रावहेड़ा, 
हरसिया
11. चण्डी माता –
 जांगला, 
झुंडा, 
डीडवाण,
 रजवास,
 सूबा

12. चामुण्डा माता – 
उजीणा, 
जोड़ा, 
झाट, 
टांक, 
झींगा, 
कुचोरा, 
ढोमा,
तूणवार, 
धूपड़, 
बदलिया,
 बागा, 
भमेशा,
 मुलतान, 
लुद्र,
 गढ़वाल,
 गोगड़, 
चावड़ा, 
चांवडिया,
 जागलवा,
 झीगा, 
डांवर, 
सेडूंत
13. चक्रसीण माता – 
चतराणा, 
धरना, 
पंचमऊ, 
पातीघोष, 
मोडीवाल, 
सीडा
14. चिडाय माता –
 खीवाण जांटलीवाल, 
बडग़ोता, 
हरदेवाण
15. ज्वालामुखी माता –
 कड़ेल, 
खलबलिया, 
छापरड़ा,
 जलभटिया, 
देसवाल, 
बड़सोला,
 बाबेरवाल, 
मघरान, 
सतरावल,
 सत्रावला, 
सीगड़, 
सुरता,
 सेडा, 
हरमोरा

16. जमवाय माता –
 कछवाहा,
 कठातला, 
खंडारा,
 पाडीवाल,
बीजवा, 
सहीवाल, 
आमोरा, 
गधरावा, 
धूपा, 
रावठडिय़ा

17. जालपा माता – 
आगेचाल,
 कालबा, 
खेजड़वाल,
 गदवाहा, 
ठाकुर, 
बंसीवाल, 
बूट्टण, 
सणवाल
18. जीणमाता – 
तोषावड़, 
19. तुलजा माता –
 गजोरा, 
रुदकी

20. दधिमथी माता – 
अलदायण, 
अलवाण, 
अहिके,
उदावत,
 कटलस, 
कपूरे, 
करोबटन,
 कलनह,
 काछवा,
 कुक्कस,
 खोर, 
माहरीवाल
21. नवदुर्गा माता – 
टाकड़ा,
 नरवला, 
नाबला, 
भालस
22. नागणेचा माता – 
दगरवाल, 

 धुडिय़ा, 
सीहरा, 
सीरोटा
23. पण्डाय (पण्डवाय) माता – 
रगल,
 रुणवाल,
 पांडस

24. पद्मावती माता –
 कोरवा, 
जोखाटिया,
 बच्छस, 
बठोठा, 
लूमरा
25. पाढराय माता –
 अचला
26. पीपलाज माता – 
खजवानिया,
 परवाल,
 मुकारा
27. बीजासण माता – 
अदोक ,
 बीजासण, 
मंगला,
 मोडकड़ा, 
मोडाण, 
सेरने
28. भद्रकालिका माता – 
नारनोली
29. मुरटासीण माता –
 जाड़ा,
 ढल्ला,
 बनाथिया, 
मांडण, 
मौसूण, 
रोडा
30. लखसीण माता – 
अजवाल, 
अजोरा, 
अडानिया, 
छाहरावा,
 झुण्डवा, 
डीगडवाल,
 तेहड़ा, 
परवलिया, 
बगे, 
राजोरिया, 
लंकावाल, 
सही, 
सुकलास, 
हाबोरा
31. ललावती माता –
 कुकसा,
 खरगसा, 
खरा, 
पतरावल,
 भानु,
 सीडवा,
 हेर
32. सवकालिका माता – 
ढल्लीवाल,
 बामला,
 भंवर, 
रूडवाल, 
रोजीवाल, 
लदेरा, 
सकट
33. सम्भराय माता – 
अडवाल, 
खड़ानिया, 
खीपल,
 गुगरिया,
 तवरीलिया, 
दुरोलिया, 
पसगांगण, 
भमूरिया

34. संचाय माता –
 डोसाणा
35. सुदर्शनमाता – 
मलिंडा

यह विवरण विभिन्न समाजों की प्रतिनिधि संस्थाओं तथा लेखकों द्वारा संकलित एवं प्रकाशित सामग्री पर आधारित है। इसके बारे में प्रबुद्धजनों की सम्मति एवं सुझाव सादर आमन्त्रित हैं।

अग्रोया और कडेल – 

मैढ क्षत्रिय जाती मे कडेल गोत्र के सदस्य बहुसंख्य है बडवों (बहीभाटों) द्वारा पता चला है की तुंवर वंश के राजा शालिवाहन अनंगपाल के पुत्र विरहपाल के पुत्र भोज हुए । भोज को दो पुत्र हुए भावडाजी और वीरुजी । भावडाजी के वंशज अग्रोहा (जिला हिसार – हरीयाणा) मे देहली से आकर बसे, उनकी खांप का नाम उक्त ग्राम अग्रोहा के नाम पर अग्रोया पडा । इसलिए कडेल व अग्रोया, भावडाजी व वीरुजी की संतान होने के कारण भाई भाई है ।
वीरुजी के पुत्र किलणणी से कडेल खांप चली, यह परीवार बहुत बढा , अब समस्त भारत मे मैढ क्षत्रिय जाती मे कडेलों का बाहुल्य है । इन्होने अजमेर के निकट कडेल ग्राम बसाया, लेकीन अब वहां सारडीवाल गौत्र के मैढ बंधु है । मारवाड मे मुण्डवे के पास कडलाणी ग्राम है और मुण्डवे मे कडेलों का ही बाहुल्य है । मारवाड मुण्डवे के कडेल बंधु कहते है की कडलाणी ही कडेलों का उदगम स्थान है ।

कुल्थिया – 

लगभग 750 वर्ष पुर्व कोल्हपुर पाटण के राजा अणहन्तराम सांखला हुए, उनकी पांचवी पिढी मे कुल्थवाहन राजा हुए जिनकी सन्तान कुल्थिया कहलाई, नवाबी के समय यह लोग फतहपुर ( सीकर सेखावाटी ) मे बारुद बनाने का कार्य करता थे, करलाडी के ठाकुर के पास भी कुल्थिया खांप के व्यक्ति रहे वहाँ  भी वे बारुद बनाने का कार्य करते  थे 6 मे से 3 भाई रतनगढ, एक मण्डाणा,एक नोहर व एक सुजानगढ गये । लगभग 470 वर्ष पुर्व सुजानगढ वालों ने स्वर्णकारी का काम सीखा, जो भाई सुजानगढ गये उनका नाम कोटणसी था ।

जांगलवा – 

इनका निकास स्थान जांगलु बताया गया है, जांगलुदेश (बिकानेर) मे पंवारो का राज्य था. उसी पंवार वंश के सांखला शाखा ने जांगलु (बिकानेर) के नाम पर जांगलवा खांप बनी, कुल्थिया भी इसी परिवार की एक खांप है ।

जौडा –

इस खांप के दो नख है एक चौहान , दुसरा सोलंकी, मामा चौहान था और भांजा सोलंकी, चौहानो की कुलदावी चामुंडा और राजधानी सांभर थी, सोलंकीयों की माता ब्राम्हणी और राजधानी नानोर थी, अब चौहान जौडा और सोलंकी जौडा दोनो खांपो का एक नाम होने के कारण नखभेद भुलाकर एक खांप के रुप मे है । जौडो और जवडा एक ही है ।

तुहणगर – तुणगर – 

राजस्थान के करौली जिल्हे मे त्योहनगढ है उसी ग्राम के नाम पर त्योहनगढीया, त्योहनगर, तुणगर, कहलाए इस खांप के व्यक्ति त्योहनगढ से चलकर मांडुगढ बैराड होते हुए डेरा बसे, इस परीवार मे रतनजी डांवर की पुत्री नाली ब्याही थी जो अपने पती के स्वर्गवास हो जाने पर पाली (मारवाड) मे सती हो गई, अत: इनकी सती नाली, पाली मे पुजा जाती है और इनकी देवी चामुण्डा जो डॉंवरो की भी देवी है खण्डेले मे है ।< डॉँवर – मोयल वंशीय राजा माधवदानजी छापर चुरु (राजस्थान) के राजा थे, उनके पुत्रों ने सोने चांदी का काम सीखा, उनमे से छमरजी से छमा, छाजडजी से छपरडा, छापुजी से छपरवाल, छायडजी से छायरा, और छाहरना धर्मसी से धुपड और सबसे छोटे पुत्र डांवाजी से डॉंवर खांप चली । डावाजी छापर से खण्डेला मे बसे । खण्डेले मे डांवाजी के स्वाभिमानी पौत्र रामसिंहजी ने खण्डेले के राजा द्वारा अपनी माता को कहे गए अपशब्द सुनकर उस राजा का वध कर दिया और फिर अपनी सुरक्षा के लिए खण्डेला छोडकर रातों रात अपने परीवार सहीत बख्तावरपुरा (इस्लामपुर के निकट ग्राम मे ) जा बसे, जब खण्डेले पे नवाब ने चढाई की तब खण्डेले के युवराज ने श्री रामसिंहजी का पता लगाकर उनसे सहायता  मांगी, श्री रामसिंहजी ने अपने नौ पुत्रौं को खण्डेले के रक्षार्थ युध्द मे भेज दिये । युध्द समाप्ती पर वे खण्डेले से विदा लेकर पृथक पृथक स्थानों पर चले गये । कोइ इस्लामपुर (बगड रतन शहर ) कोई उदयपुर (चिराणा) कोई गुढा (महेन्द्र गढ) कोई खंडार मुन्दुयाड, गोआ (जि. नागौर ) आदी स्थानो पर गये । इस्लामपुर जानेवाले का परीवार फतहपुर (सीकर) और राजस्थान मारवाड मे भी खुब फला फुला, बादशाहपुर जानेवाले का परीवार भी बहुत बढा ।

सोनालिया (सोंधालिया) –

इनके पुरखों का नाम संधुजी था, उन्हों के नाम पर इस खांप का नाम सोंधालिया पडा, अब यह लोग अपने आप को सोनालिया भी कहते है । इनका निकास सांभर, वंश चौहान, देवी जीणमाता है . पिलानी और मण्डरेले मे इनके बहुत घर है ।

नारनौली – 

महाराजा अर्नगपाल सन 1186 से पहिले अपने दोहीते पृथ्वीराज चौहान (अजमेर) को राज काज सौंप कर तीर्थ यात्रा को गए, वापीस लौटने पर पृथ्वीराज ने अपने नाना को अपना राज नही संभालने दिया, फलत: वे पृथ्वीराज से दु:खी होकर अपने पुरोहीत के पास तोरा वाटो (जयपुर) गये फिर उन्होने पाटन (जिल्ह झालरा पाटन) पर शासन किया, उनके पुत्रों में से अनेको ने वहा स्वर्णकार्य सिखा, सुगन्ध नाम के उनके वंशज ने नारनोल मे निवास किया तब उनकी संतान नारनौली कहलाई, नारनौली खांपवाले अपने पुर्वज सुगन्ध के नाम पर अपने को सुगन्ध भी बतलाते है । इस खांप की पुत्र वधु मक्खनलालजी की पत्नी सावित्री खलबल्या कोटडी मे सती हुई ।

मौसुण –

जायल ( मारवाड) मे खींची राजपुतों का बाहुल्य था इस परीवार में गींदाजी नामक प्ररखा हुआ जिसके बारह पुत्रों ने पृथक – पृथक व्यवसाय अपनाये इनकी खांप मौसुण, मसावन, मसौन, व मसाण कहलाती है । इस खांप का पितृ श्रीधर पुरोहीत खांदल्या, डाढी मोडा, तथा ग्राम खाचरजी बावडी (जायल मारवाड ) है ।

बेनाथिया –

इनके पुर्वज भी जायल के ही खींची राज घराने के है, इनकी देवी मुरटासीण ( आसापुरा ) अग्नीवंश खींची चौहान है, प्रथम ग्राम जायल (नागौर) राजस्थान है । वहां वहां से संवत 1200 के पुर्व (पृथ्वीराज चौहान के शासन काल मे ) अजमेर आये , फिर ये अजमेर से मांडल, मांडल से कुसिथल गये, 1462 मे कुसिथल मे श्रवणजी बेनाथिया की पत्नी वीरांबाई मिरीण्डीया कुसिथल मे सती हुयी वहां आज भी सती की समाधी है । और उसी कुसीथल के निकट सुग्रीव ग्राम मे बेनाथियों के घर है । उसके पश्चात 1699 में केवलरामजी पुन: अजमेर आकर बस गये । बेनाथियों के अनेक परीवार अजमेर, माण्डल, उदयपुर, नाथद्वारा, चिताम्बा, प्रतापगढ, टोंक, टोडा, मुम्बई, इन्दोर, कोटा, बुंदी आदी स्थानोंपर है । इनके पुर्वज बिना हथियार (बना हथियार) से भी महान युध्द किये इसी कारण इनकी खांप बेनाथिया, बनाथिया, बिनाथिया हुई ।

सोलिवाल

राजा मलैसी कछवाहें के वंशजो ने भिन्न भिन्न काम करके उनमे रतनाजी के रंगलीजी ने सोने, चांदी का काम सिखा उनकी सन्तान सोलिवाल कहलाई । इनके परीवार मे एक बहु अजमेर मे सती हुयी, जिसकी समाधी आज भी अजमेर है ।

आगेचाल – 

ये चावल नख के है इनका निकास कोट करोड नामक उजडे हुए खेडे का है जो भिवानी के पास है ।
ढल्ला – ढल्ला, ढाबरवाल, ढोया, ढोलणा एक ही वंश जोइया क्षत्री नख के है। मारवाड जिला नागौर के भकरी ग्राम मे भी ढल्लों के कई परीवार है । पंजाब, हरीयाणा व दिल्ली में भी ढल्लों के अनेक परीवार है ।

महायछ – 

यह खांप भी कोट मरोड से निकली है, वैसे मारवाड व हाडोती मे और पंजाब, हरीयाणा, देहली में भी महायछ खांप वालों के परीवार है ।
स्वर्णकारों के गोत्र यह प्रमाणित करते हैं कि वे अमुक ऋषि के वंशज हैं और नुखें यह घोषित करती हैं कि अमुकस्थान, अमुक राजवंश गुरू या पुरोहित से सम्बद्धता है।
याने गोत्र वंश का सूचक है और नुख विशेष पहचान की|

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सभी जैन कुलदेवियों की सूची:Jain kuldevi

Dr.Dayaram Aalok Shamgarh donates sement benches to Hindu temples and Mukti Dham 



सभी जैन कुलदेवियों की सूची
लगभग समस्त जैन गोत्रो की कुलदेवियाँ होती है,यहां तक कि दिगम्बर जैनियो की कुलदेवियाँ होती है,पर जैन साधुओ द्वारा फैलाई गई विकृतियों के कारण वर्तमान पीढियां इस महत्वपूर्ण ज्ञान से वंचित हो गयी है,यहां तक कि इन धर्म गुरुओं के कारण जैनियो ने कुल गुरु(अपने वंश के कुलगुरुओ) को भी भुला दिया,जिसकी वजह से किसी2 परिवार में जीवनभर संघर्ष व कष्ट, और कहीं 2 युवा सदस्यों की अकाल मौतों को भी झेलना पड़ रहा है।
जैन गोत्रो की संख्या 3500 से भी अधिक बताई जाती है,जिनकी कुलदेवियों के विवरण उपलब्ध नही हो पा रहे है।संकलन भी बहुत दुष्कर कार्य है।
3500 में से 498 तो मूल ओसवाल जैनियो के है,जो राजस्थानी क्षत्रिय को जैन पंथ में दीक्षित कर जैन बनाया गया था।
*क्या करे*-
सबसे पहले अपनी सही कुलदेवी की खोज करे, इसके लिए आपके गोत्र/कुल/वंश के कुलगुरु जिन्हें भाट जी भी बोलते है,उनकी खोज करे, उनसे समस्त प्रकार की जानकारी,परंपरा आदि का ज्ञान हो जाएगा।उन्ही से स्थापना विधि,पूजा विधि भी मिल जाएगी।
यहां काफी कुलदेवियों की सूची जानकारी के लिए दी जा रही है,हालांकि ये सूची भी पूर्ण नही है।
1-श्री सच्चियाय माता
2-श्री अर्बुदा देवी या अधरदेवी
3-श्री अम्बा देवी या अम्बा जी
4-श्री आशापुरा देवी
5-श्री नागणेशी देवी
6-श्री सुसवाणी देवी
7-श्री बीस हत्थ देवी
8-श्री सुंधा देवी
9-श्री खीमज देवी
10-श्री बड़वासन देवी
11-श्री हिंगलाज देवी
12-श्री लोदर देवी
13-श्री भुवाल देवी
14-श्री लेकेक्षण देवी
15-श्री भवानी देवी
16-श्री बाणेश्वरी देवी
17-श्री केलपूज्य देवी
18-श्री झमकार देवी
19-श्री ब्रम्हाणी देवी
20-श्री नागदेवता व नागिन देवी
21-श्री रोहणी देवी
22-श्री बाण देवी
23-श्री गाजर देवी
24-श्री रुद्र देवी
25- श्री आशा देवी
26-श्री सुषमा देवी
27-श्री कुँवारीदेवी
28-श्री बीसल देवी
29-श्री मामरा देवी
30-श्री गंजेश्वरी देवी
31-श्री गोत्र देवी
32-श्री वाराही देवी
33-श्री काहनी देवी
34-श्री पदमावती देवी
35-श्री बाकलदेवी
36-श्री मुण्डारा देवी
37-श्री पाडल देवी
38-श्री पुनागर देवी
39-श्री पतंगा देवी
40-श्री जसवाय देवी
41-श्री चित्तोड़ी देवी
42-श्री मात्र देवी
43-श्री कुलेटी देवी
44-श्री शेषन देवी
45-श्री गाता देवी
46-श्री जीण चामुंडा देवी
47-श्री वीरवाडा देवी
48-श्री जमवाय देवी
49-श्री प्रेमीदेवी
50-श्री नारायण देवी
51-श्री सेढल देवी
52-श्री मोदरा देवी
53-श्री धना देवी
54-श्री नागोरी देवी
55-श्री निम्बज देवी
56-श्री डिडवाना देवी
57-श्री कंठन देवी
58-श्री डिदेसी देवी
59-श्री ललेची देवी
60-श्री चामुंडा देवी
61-श्री जीण देवी
62-श्री घुमडा चामुंडा या घुमडा देवी
63-श्री मादाजुन देवी
64-श्री खंडवा देवी
65-श्री कालन देवी
66-श्री मम्बा देवी
67-श्री शंखेश्वरी देवी
68-श्री किंचरिया देवी
69-श्री चौदरा देवी
70-श्री वारेसरी देवी
71-श्री साचौरी देवी
72-श्री मोदरा देवी
73-श्री सेतरावा दादी माँ
74-श्री करणी देवी
75- श्री माजी सा
76 - श्री जागरूप देवी (सती ),(ग्राम-सकोसाना,राजस्थान)
उक्त सभी देवियां विविध जैन गोत्रो की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित है। 


12.1.20

ओसवाल समाज की कुलदेवी-लिस्ट:Oswal samaj ki kuldevi




 
 जाति इतिहास लेखक डॉ.दयाराम आलोक की मान्यता है कि
कुलदेवी किसी कुल विशेष की ऐसी आराध्य देवी है, जो उसकी पहचान कराने वाली एक सांस्कृतिक इकाई है। कुल में कुल की देवी माता का विशेष महत्व होता है। सभी जातियों में हर कुल की अलग-अलग एक देवी होती है, जिसे कुलदेवी कहते हैं। कुल के पारिवारिक कार्यों उत्सवों एवं विविध संस्कारों शिशु के जन्म, मुण्डन, उपनयन, विवाह आदि के अवसर पर कुलदेवी का पूजन-अर्चन अनिवार्य रूप से किया जाता है। कुलदेवी की आराधना से उस कुल के वंशजों के घर में सुख, शान्ति व समृद्धि आती है। सभी तरह के विघ्नों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। कुल देवी के अशीर्वाद से वंश की वृद्धि होती है। आदि शक्ति स्वरूपा मां एक है पर उसके विविध रूप है और वह आदि शक्ति विविध रूपों में पूजित है। कुलदेवी के रूप में पौराणिक व स्थानीय लोक देवियों को विविध कुलों में कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। विविध क्षत्रिय राजवंशों की प्रमुख कुलदेवियां भी विभिन्न वर्गों में कुल देवी के रूप में स्वीकार्य की गयी हैं। प्रसन्नता की बात है कि तेजसिंह तरुण ने प्रस्तुत पुस्तक में ओसवाल गोत्र की कुलदेवियों के सम्बन्ध में जो जानकारी उपलब्ध करायी है वह ओसवाल गोत्र के लोगों के लिए निस्संदेह उपयोगी सिद्ध होगी और वे इससे अवश्य लाभान्वित होंगे।
ओसवाल समाज का प्राचीन नाम उपकेश है। उपकेश वंश के लिए उकेश व उएश शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। इनके स्थान का नाम उकेश था जो वर्तमान में ओसियां कहलाता है। ओसियां में रहने वाला जैन समाज ओसवाल कहलाता है।
भारतीय संस्कृति व समाज में कुलदेवी का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक समाज गोत्र के अनुसार अपनी कुलदेवी की पूजा व आराधना करता है। ओसवाल समाज में प्रारम्भ में 18 गोत्रों का निर्माण हुआ था। ये गोत्र इस प्रकार हैं
1. तातेड़, 2. बाफणा, 3. कर्नाट, 4. बलहारा, 5. मोराक्ष, 6. आईचनाक, 7. भूरी, 8. भटेवड़ा, 9. भादर, 10. कुलहट, 11. बिरहट, 12. संचेती, 13. श्रीश्रीमाल, 14. चींचट, 15. कूमट, 16. डीडू, 17. श्रेष्टी, 18. लघुश्रेष्टि आदि .ओसवाल समाज के उदय से अब तक कई गोत्रों का निर्माण हो चुका है। ओसवाल समाज के इन विभिन्न गोत्रों व उनकी कुलदेवियों का विवरण निम्नलिखित है। यदि इस लिस्ट में किसी गोत्र व कुलदेवी का नाम छूट गया हो तो कृपया कमेंट करके जानकारी दें –
हो तो कृपया कमेंट करके जानकारी दें –

ओसवाल समाज की निम्न गोत्र की 

कुलदेवी: अधर माता 

अरणोदा, अलंजडा, अलावत, अहकासा, आलावात, उपट, कक्का, कपासिया, करणिया, करणाणी, कायेल, काला परमार, कावा, कूंकड़, केनिया, केलण, कोकलिया, खीर, खुरदा, गडिय़ा, गपालिया, गांग, गादवाना, गांधी सहस्रगुणा, गिडिया, गेढवाड़, गोड, गोडवाल, गोडवालिया, गोडी, गोप, गोसलिया, गंग, गांगरिया, घुरिया, चापड़, चोभावत, चौहाणा, चौधानी, छाहड़, जपाला, जागा, झोडोलिया, टोगिया, टोडरवाल, डीडू, डोड, डांगी, थरावट, दरड़ा, दुगसा, दुगविया, दुधेडिय़ा, दुधोडिय़ा, देवानंद साका, देशलाणी, धाधु, धारिया वलाह,धुरिया, नपाणी, निवणिया, निवेणिया, पटवा गांग, परमार, पालावत, पूर्ण,बंब, बरड़, बरडिय़ा, बड़दिया, बड़ोदिया, बलदोटा, बाबेल, बीजल, बिसलाणी, बुरड़, बौरड़, बांभी, भड़, भाटिया, भाटी, भावराणी, भूवाणी, मरड़ोचा, मरूथलिया, मालदे, मुलाणी, मोहिवाल, मोनानी, वरदिया, वीजल, विरावत, सहस्त्रगुणा, सुघड़ा, हरिगा, हिराणी।

kuldevi अम्बा माता -upasak gotra-

 अजमेरा, अथगोता, अम्बागोत्र अम्बिका, आच्छा (बागरेेचा), उदेश, ऊपरगोठा,कछीनागड़ा, कडक़, कड़बड़ा, कबदी, कावेडिय़ा, कूकड़सांड, कोठिया, कोरा, खांपडिय़ा, खाबडिया, खारा, खारिवाल, गोतम गोता, गोपाल गोता, घरवेला, जागरवाल, जालोरा बागरेचा, जिरावला, जोगड़ेचा, जोधावत, सालेचा, झामड़, झावड़, टड्डा, ठाकुर, डागलिया, डोसी, ढड्ढा, ढेढिया, तिलोरा, तेलहरा, ददा, दट्टा, दातीवाडिय़ा, दिखल, दोषी, धरकट, धर्म, धोखा, नागदार सोलंक, नागसेठिया, नागौतरा, नाणगोता, निवाणी, नेनगोता, पामेचा, पाटणिया सालेचा, पिथलिया डोसी, पूनमिया सालेचा, पोलावट, पंचलोढा, फितुरिया, बग, बनावत, बडेरा, बागड़ेचा, बालुकिया, मांडोत, लुक्कड़, लुकद, सियाल, सबिया, संचेती, सालेचा, साव, सियाल सांड, सिरोहिया, सुभद्रा, सोनाड़ा, सोनी बागरेचा, सोलंकी लुंकड़, संघी बागरेचा, संघी मेहता, सांड, सालेचा, सुडाला, हरखावत पामेचा, हंस, श्रीपति।

कुलदेवी नागणेची माता  के अंतर्गत आने वाली गोत्र 

ईशपगोत्र
ऊहावता
ओटावत
खोखड़
गोगादे
गोलिया 
घाघरिया
घुलुंडिया
घियानछत्र
घिया गलुंडिया
घेमावत
घोघल
जोधा
धवेचा
धोधड़
नसोलिया नक्षत्र
पुष्करणा
मोहनोत
राठौड़
राणावत
रातड़िया
संघोई
हथुंडिया
हथुंडिया राठौड़ 

माता आशापूरा -उपासक   गोत्र 


अग्नीगोत्र, अरडक़, अलमेची, आईडी, आंचलिया, आपागोत, आयट, आबेड़ा,आशद, आशापुरा, ईसरा, कछोल, कटारिया, कणीवत, कपूर, कमाणी,कमेडिया, कयाणी, करणा, कवाड़, कागोत, कांठेड, काठेलवाल, कावलेचा, काशरिया, कूदणेचा, कूलामोर, कूकल, कूकूरोल कवाड़, कुवाडिया, कोंच, कोटेचा, कोंद, खखड़, खड़बड़, खटबड़, खटोल, खटोर, खाटेड, खांटोड, खाबिया, खुटोल, खेतलाणी, खेतसी दुग्गड़, गांधीराय, गांधी मेहता, गुजराणी, गेलड़ा, गोगड़ पीपाड़ा, गोंद, गोदा, गोरवाल, चहुआण, चंडालिया लूंगा, चापरवाल, चालूका, चिरडकिया,चीपा, चौहान, चौवडिय़ा, चिंप, छाजोड़, छावड़ा, जैसलमेरिया, जिन्नाणी, जिलाणी, टापडिय़ा, टिमरेचा, डफरिया, डागा, डीया, डोडियालेचा, ताला, तालेरा, तालेड़ा, तुला, तुंड, दुग्गड़, दुदचैना, देवड़ा, नारायण गौत्र, नाहटा कटारिया, पारखविंद, पावेचा कटारिया, पूजाणी, फलौदिया तुंड, बलिया, बलाहा, बाबेल, बाबेला, बालौत, बीहल, बेडा, बोलिया, बोकड़िया, भटावीर, भलभला, भालडिय़ा, भाभु, राजाणी, रामसेण, रायभंडारी, रिहड़, लेरखा, वागेटा, संकलेचा, संकवाल, सफला, सांचा संगी, सांचौरा, सामरिया, सुखलेचा, सुखाणी, सुगड़, सुगड़ा,, सेमरा, सोनगरा, संडासिया, सांडिया, सापद्राह, हरसोरा, हाडा कटारिया, हाला खंडी।

कुलदेवी बाण माता के अंतर्गत आने वाली गोत्र 

एणिया
कपोल
काकोल
काजोत
केलवा
खेतसी
नीसर
गहलोत
गुगलिया
गेलतर
गौत्तम
गोदारा
गोराणा
टिबानी
तिवड़किया
निसक
पीपाणा



कुलदेवी सच्चियाय माता के उपासकों की गोत्र 

सच्चियाय (संचाय) माता (Sachchiyay Mata) अछूणता-अघूणता,अटकलिया,अनबिंध (पारख), अब्बाणी, अभ्राणी, अरडक सोनी, आईचियाण, आकतरा, आच्छा (कर्णावट), आडेचा, आदित्यनाग, आभड़, आमड, आर्य, आववाडिया, आसाणी, इडलिया, इरोढा, इलदिया, इसराणी, ऊजोत, ऊएश, ऊकेश, ऊडक़ भूरि, उदेचा, उदावत, उणावत,
उधावत, ओस्तवाल, ओसवाला।
ककड़, ककोल, कजारा, कटारा, कर्पदशाखा, कठोतिया, कठोरिया, कान्यकुब्ज, कनौजिया, ककरेचा, कपूरिया, कमटिया, कर्पद, करचू, कर्णी, कर्णाट, करणोत, कर्णावट, करमोत, करवा, करेलिया, कलटोदी, कटरोही, काला, कवाडिय़ा, कस्तुरिया, काकेचा, कागड़ा, कागला, कांच, काजलिया, काजाणी, काटी, कातरेला, कानूंगा-भटनेरा, कापूरित, कावरिया, काविया, काम, कामसा, कामाणी, काला, कावडिय़ा, कावसा, काश्यप, कात्ररैला, कांकरिया, कांकरेचा, कागलोत, कांगसिया, कांच, किलोल, किस्तुरिया, कूकड़ (चौपड़ा), कूकम, कुचेरिया, कुंडिया, कूपावत, कूबडिय़ा, कूबडिय़ा आमड़, कूबडिय़ा बाफना, कूबेरिया,कूमट, कूमकूम, कुरकुचिया, कूरा, कूलधर, कूलधरा, कूलहट, कुशलोत, कूहाड़, कूकड़सांड, कूकड़ा, कूकूरोलचौपड़ा, कुंपावत, कुमटिया, केकडिय़ा, केदार, केदारा,केलाणी, केशरिया, केशरिया सामसुखा, कोकड़ा, कोटडिय़ा, कोटी, कोटीचा, कोटरिया, कोस्टागार, कोणेजा, कोनेरा, कोलोरा,कोसिया।
खरभंडारी, खजांची श्री श्रीमाल, खजांची चोराडिय़ा, खजांची लघुश्रेष्ठी, खंडेलवाल, खंडिया, खपाटिया, खरभंडारी, खारड़, खालिया, खेड़वाड़, खींचा, खीलोला, खुमणिया, खुमाणा, खेतपालिया, खोखरा, खोका, खोड़वाड़, खोडिया, खोडीवाल, खोना, खोपर।
गज्जा, गज्जा पटवा, गटाघट, गटिया, गड़वाणी, गणधर चौपड़ा, गणधर गांधी, गड़वाली, गरूड़, गलाणी, गलूंडिया, गसणिया, गहियाला, गागा, गादिया, गांधी संचेती, गांधी दुदिया, गांधी श्रेष्ठी, गांधी बाफना, गिंगा, गुजराणी नागड़ा, गुगलिया चोरडिय़ा, गुगलेचा, गुलगुलिया, गुडक़ा, गुणिया, गुमलेचा, गुंदिया, गहलोत, गोखरू, गोगड़भद्र, गोरीवाल, गोरेचा, गोलेछा, गोसलाणी, घरघटा, घीया गुगलिया, घुणिया, घेवरिया,
घोगड़, घोड़ावत, घंटेलिया।
चगलाणी, चतर, चतुर, चतुर मूथा, चन्द्रावत ,चपलोत, चमकिया, चम्म, चरड़, चवला, चवहेरा, चंद्रावत, चंडालेचा, चंदावत, चित्तोड़ा, चित्तोड़ा बलाह, चित्तोड़ा श्रेष्ठी, चित्तौड़ा गोलछा, चित्तौड़ा लघुश्रेष्ठी, चिंचट, चिचड़ा, चितोडिय़ा, चिपड़, चुंगा, चैनावत, चोखा, चौपड़ा कंकुं, चौपड़ा गणधर, चोमोला, चोरडिय़ा, चोरवाडिय़ा, चोरबेडिय़ा, चौववहेरा, चौमोला, चौसरिया, चौधरी तातेड़, चौधरी बाफना, चौधरी बलाह, चौधरी मोरख, चौधरी कुलहट, चौधरी वीरहट, चौधरी भूरी, चौधरी संचेती, चौधरी गुलेछा, चौधरी श्रेष्ठी,
चौधरी भद्र, चिंपड़।
छाछा, छाडौत, छगलाणी, छजलाणी, छजलाणी, छतीसा, छलाणी, छतरिया, छरिया, छाड़ोत, छालिया, छावत, छोरिया, जगावत, जडिय़ा, जमघोटा, जलघड़, जस्साणी, जागड़ा, जाटा, जाडेचा, जबक, जालोत, जालोरा कन्नोजिया, जालोरी कुलहट, जावलिया चौपड़ा, जिंद, जिंदल, जिनोत, जिमणिया भटनेेंरा,
जिमणिया चौरडिय़ा, जूनीवाल, जेनावत, जोखेला, जोगड़, जोटा, जोधावत श्रेष्ठी, जोहरी चोरडिय़ा, जोगड़ बाफना, जोगड़ा सिंघी, झाबक, झाटा।
टाटिया बाफना, टाटिया धारीवाल, टिकायत, टिकोरा, टोडियानी, टगा, टाकलिया, टांक, टिवाणी, टिहुयाण, डूंगराणी, ढाकलिया, ढाबरिया, ढेलडिया।
तप्तभट्ट, तरवेचा, तल्लाणी, तलोवड़ा,ताकलिया, तातेड़, तातहड़, तारावल, तुंड, तुलाहा, तुहियाण, तेजाणी संचेती, तेजाणी पारख, तोलिया, तोसटिया, तोडिय़ानी, तोलावत, तोलरिया, तोडिय़ान, तुलावत, थनावट, थम्बोरा, थामरेचा, थुला, दक, दफतरी-चोरडिय़ा, दफतरी बाफना, दस्सानी, दसोरा, दाखा, दातारा, दादलिया, दानेसरा,दालिया, दुद्धाणी, दुधिया, देदाणी, देपारा, देलणिया, देवराजोत, देवसयाणी,
देसरला, देशलहरा, दोलताणी, दोसाखा, धतुरिया, धनन्तरी, धंदाणी, धनेचा, धाकड़, धारीवाल, धातुरिया, धाधलिया, धानेवा, धाया, धापिया, धारिया, विरहट, धारोडिय़ा, धारोला, धावड़ा, धीरौत, धुगोता, धुपिया, धांधल।
नखरा, नंनक, नरसिंगा, नक्षत्रगोत्रा, नागडोला, नागड़ा, नागड़ा तातेड़, नागड़ा गुलेछा, नागर, नागौरी कुम्भट, नागौरी चोरडिय़ा, नागौरी श्रेष्ठी, नाचाणी, नाणीश, नाथावत, नानघाणी, नानेचा, नापड़ा, नामाणी, नार, नारेलिया, नावटा, नाबरिया, नावसरा, नाहटा बाफना, नाहरलाणी, निबोलिया, निलडिय़ा, निवाटा, निशानिया, नेरा, नोपता विरहट, नोपता गदेहिया, नोपोला, नांदेशा।
पंचाणीस, पंचवया, पंचीसा, पछोलिया, पटलिया, पटवा, बाफना, पटवा श्रेष्ठी, पटवा लघुश्रेष्ठी, पटवा कनौजिया, पटवा धारीवाल, पटवा गजा, पटवा वढेर, पटवारी, पटौत, पारडिय़ा, पहाडिय़ा, पाटणिया, पातावत, पानगडिया, पानौत, पारख अणविद, पालखिया, पाखा, पालगौता, पालकिया, पालावत, पाटणिया चोरडिय़ा, पाटणिया भद्र, पालणेचा, पाटोलिया, पाटौत, पारणिया, पालडिय़ा, पालणिया, पालणी, पालेचा, पिथलिया चौरडिय़ा, पुकारा, पुंगलिया, पुजारा, पूनमिया वीरहट, पूनोत गोधरा, पूरणिया, पैथाड़ी, पैपसरा, पैतिसा, पोखरणा, पौपाणी, पौपावत, पोलडिय़ा, पोसालिया, पंचविशा, पांचौरा, पांचौली, पंसारी,
पांचावत, पांडुगोता, फौफलिया, फूलगरा, बाघचार, बडज़ात्या, बपनाग, बड़बड़ा, बड़भट्टा, बच्छावत, वनावल, बनावत, बलवरा, बलिया, बलाई, बलोटा, बहुल, बहुफना, बाकुलिया, बांका, बागडिय़ा बाखेटा, बाखोटा, बाघमार, बाघ, बातोकड़ा, बादलिया, बादौला, बायना, बाफना, बापावत, बालड़ा, बाला, बालोटा, बालिया, बालौत, बाबरिया, बाहतिया, बिनायकिया, विषपहरा, बीजाणी, बीजोत, बुच्चा, बुच्चाणी, बूबकिया, बैगलिया, बैताला ,बैद, बैदमेहता, बौक, बोकडिय़ा, बौराना, बांदोलिया।
भक्कड़, भडग़तिया, भटारखिया, भटनेरा, भटनेरा चौधरी, भटेवरा, भद्र, भमराणी, भलगट, भलमेचा, भलल, भाद्रगोता, भानावत, भाभू पारख, भाभू बाफना, भाला, भावड़ा, भावसरा, भिन्नमाला कर्णावट, भिन्नमाला श्री श्रीमाल, भिणटिया, भिमावट, भुवाता, भूरंट, भूराश्रेष्ठी, भूरी, भूषण, भूरट, भूतिया, भूतेड़ा, भोजाणी, भोजावत, भोपावत, भोपाला, भंडलिया, भंडारा, भंडारी डीडू, भांडावत भद्र, भूगरवाल, मक्कड़, मखेलवाल, मखाणा, मकाणा, मगदिया, मच्छा, मणियार, मन्नी, मंदिरवाला, ममहिया, मरडिय़ा, मलेचा, मखाणी, मल्ल, मरुवा, मरोथिया, मसाडिय़ा कुल्हट, मसाणिया चोरडिय़ा, महतियाण, महाजन, महाजनिया, महिवाल, माडलिया, मांडोत, मादरेचा, मारू, मालखा, मालकस, मालतिया, माला, मालावत,
मालौत, माहलाणी, मीठा, मीणीयार, मीनाग्राह,मीनारा, मीठडिय़ा बाफना, मीठडिय़ा सोनी, मुकिम, मुगड़ी, मुमडिय़ा, मुर्गीपाल, मुर्दिया, मुसलिया, मेघाणी, मेड़तिया, मेहजावत, मोतिया विरहट, मोतिया संचेती, मोदी गणधर, मौरख, मोरचिया, मौराक्ष, मौल्लाणी, मंडोवरा, मंत्री, मांडलेचा मुगडिय़ा।
यौद्धा बाफना, यौद्धा डीडू, रणजीत, रणछोड़, रणधीरा बाफना, रणधीरा श्रेष्ठी, रणधीरोत, रणसोत, रणशौभा, रत्ताणी, रतनपुत्र, रतनपुरा बुच्चा, रतनसुरा, राक्यान, राकावाल, राखडिय़ा, राठी, राडा, राज बोहरा, राज कोष्ठागार, राज सदा, राजौत, राणौत, रामपुरिया, रामाणी, रायजादा, राय सोनी, राय चौरडिय़ा, राय तातेड़, राय सच्ची, रावत, रिहड़, रिकब, रूणवाल, रूपावत, रूपछरा, रूह, रेड़, रांका, लखावत, लघु कम्भट, लघु खंडेलवाल, लघु चमकिया, लघु चिंचट, लघु चुंगा, लघु नाहटा, लघु चौधरी, लघु पारख, लघु पोकरणा, लघु भूरट, लघु रांका, लघु राठी, लघु समदडिय़ा, लघु संचेती, लघु सुखा, लघु सोढ़ती, लघु संचेती, लघु हिंगण, लघु श्रेष्ठी, लहरिया, लाखाणी, लाडवा, लाडलखा, लाभाणी, लालन, लाला, लालौत, लाहौरा, लिंगा, लुटंकण, लुणा, लुणावत गधैया, लुणेचा, लेहरिया, लोकड़ी, वसहा वडेर, वद्र्धमान, वलाह, वर्षाणी, विद्याधर, विरहट, वितरागा, वैद्य, वैद्य गांधी, वैद्य मेहता।
शाह बोथरा, शुरुलिया, शिगाल, शूरमा, शूरवा, सेठ, सिसोदिया, संकवालेचा, श्रृंखला, सेखाणी, सगरावत, संचौपा, सदावत, सदाणी, सम्भूआता, सरा, सराफ चोरडिय़ा, सराफ नाबरिया, सलघणा, सहजाणी, सहलोत चौरडिय़ा, सहलोत बाफणा, साखेचा, साघाणी, साढा, साढेराव, सादावत, सानी,सामड़ा, समुरिया, सारूलिया, सालीपुरा, सावा, सावनसुखा, सामसुखा, सावरिया, साहिब गोता, साहिला, सिखरिया, सिंघी भूरी, सिंघी डीडू, सिंघी लघुश्रेष्ठी, सिंघी भद्र, सिंघूड़ा, सिपाणी, सिलरेचा, सुखिया, सुचली, सुधा, सुधेचा, सुरती, सुरपुरिया, सुराणिया, सुसाणी, सुरिया, सुखा, सेठिया रांका, सेठिया वैद्य, सेणा, सेमलाणी, सेवदिया, सेजावत, सोजतवाल, सोजतिया, सोढ़ाणी, सोबारा, सोजावत, सोनी चोरडिय़ा, सोनी संचेती, सोनी श्री श्रीमाल, सोनी बाफना, सोनी घर, सोनेचा, सुमारिया, सोसलाणी, संघवी, सांभर, सांभरिया, सिंघड़, सिहावट, सिहावत, श्रवणी, श्राफ, श्रीधर, श्रेष्ठी, हरसोत, हरिया, हाकड़ा, हाकम, हागा, हाडा लघुश्रेष्ठी, हाडेरा, हिरणा, हिराणी, हीरावत, हुकमिया, हूना, हुब्बड़, हुल्ला,हंसा, हिंगड़, हिंडिया।



हिंगलाज माता (Hinglaj Mata) के उपासक- गोत्र 

अघोडिय़ा, कीरी, कोकूपोत्रा, गाला,गंगवाल, घंदे,छछा, छोगाला, जाड़ेचा, जेजटोटिया, ठीकरिया, डोडेचा, भाखरिया, भुगड़ी, महीपाल, पुनहानी, मेहर, लूंग, लूंगावत, राणोत।..

कुलदेवी लोदरमाता (Lodar Mata)-उपासक गोत्र  

आघडिण,आघरिया,कछवाह,कांधल,जडिया तेलवाणी,पावेचा राखेचा, बद्धाणी, भूरा भंसाली, भंसाली, भंसाली खड़, भंसाली राय, भंसाली ईसरा, राखेचा,राय भंसाली,सोलंकी,सोलंकी सेठिया।

कुलदेवी ब्रह्माणी माता (Brahmani Mata) -उपासक गोत्र 

आडवाणी,ओडाणी,करड़, करोलीवाल, कलसोणिया, कांदली, गुर्जरगोता, गुर्जर, गेवाल, नागरिक, बैंगाणी, लुणिया।


कुलदेवी खींवज माता (Khimaj Mata) -उपासक गोत्र-

तलेसरा, पगारिया, मेड़तवाल, कास्टिया, गिरिया, चिरपुरा, चूड़ावत।


कुलदेवी गाजर(रोहिणी)माता-उपासक गोत्र-

करल, गगोलिया, गुंदेचा, डाबड़ा, बागाणी।

कुलदेवी केलपूज माता -

बंड, बरमेचा, बांठिया, मलावत, मोदी बरमेचा, ललवाणी, हरखावत बाठिया

कुलदेवी बीसहत्थ माता-उपासक गोत्र 

 कोचर,कोचरमूथा,जालोरी कोचर,जिवाणी,रूपाणी।


लेकेक्षण (लीकासण) माता (Likasan Mata) 

खमेसरा,खींवसरा।

भवानी माता (Bhawani Mata) -upasak gotra 
नाहर।
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31.12.19

चारण जाति की जानकारी और इतिहास:Charan jati itihas




  चारण आर्यों  की एक जाति है जो सिंध, राजस्थान और गुजरात में निवास करती है। इस जाति का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। वेदों में चार वर्णो का उल्लेख मिलता है,जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा जी से बताई जाती है। जबकि चारण जाति की उत्पत्ति माता पार्वती से बताई जाती है, इसी कारण ये चारो वर्णो से अलग पांचवा वर्ण है । कई अज्ञात लेेेखक चारण जाति का भाटों से संबंध बताते है अथवा उनके परिवेश एवं संस्कृति की तुलना चारणों से करते है । जो कि स्पष्टतः गलत है,चारणों का संबंध केवल शाषक वर्ग के साथ था तथा उनका कर्म उन्हें उचित सलाह एवं मार्गदर्शन देना था। जबकि भाट जाति का कर्म हर एक जाति की वंशावली रखना एवं उसका वाचन करना था।
 आने वाली पीढ़ियों के लिए ये विश्वास करना भी मुश्किल होगा कि कभी ऐसे स्त्री-पुरुष भी थे जो छोटी सी अनबन पर पलक झपकते ही अपने शरीर के टुकड़े टुकड़े कर देते। खून की नदी बहने लगती और दृश्य देखने वाला अपने होश खो बैठता।
जो क़ौमें अपने इतिहास को भुला देती है, अपने पूर्वजों के बलिदान को भुला देती है, अपने योद्धाओं और विद्वानों की कद्र नही करती और जो सिपाहियों और किसानों से ज्यादा नाचने गाने वालों को तवज्जो देती है उन्हें आखिरकार गुलाम बना दिया जाता है।
चारण जाति ही एक ऐसी जाति हैं जिसका वर्णन सभी पौराणिक ग्रन्थों में मिलता है, जो अपने गुणों और कर्मो द्वारा युगों-युगों से उच्‍च स्थान रखते आये है। और कलयुग में आज तक उच्‍च और पवित्र है। चारण जाति अपने ईष्ट और काव्य गुण से संसार के सभी राजा महाराजाओं में और पौराणिक काल से लेकर आज तक चारण जाति का इतिहास उनके रचे ग्रन्थ, काव्य, महाकाव्य बहुत सुन्दर, मार्मिक, सच्‍चाई और ओज गुणो वाला रहा है। चारण न केवल काव्य करते बल्की समय-समय पर तलवार के भी धनी थे। माँ भगवति की कृपा से चारण जाति में आज भी वही सत्यता, धर्म निष्ठा और स्पष्ट वादिता के गुण विद्यमान है। पौराणिक ग्रन्थ म‍द् भाग्वत के अनुसार सुमेरू पर्वत पर देवताओं के साथ चारण जाति की भी एक पुरी है। इसके लिए श्री मद भागवत के पंचम स्कंध के चौबीसवे अध्याय में लिखा है कि―
अधस्तात्सवितुर्योजनायुते स्वर्मानुर्नक्षत्रवच्‍चरतित्य के।
ततोअधस्तासित्सद्ध चारण विद्या धराणां सदनानी त्रावन्मात्र एव।
अर्थात् - सूर्य के १०००० हजार योजन नीचे राहु नक्षत्र भ्रमण करता है, उतना ही नीचे यानी राहु से १०००० योजन नीचे सिद्द चारण जो विद्या को जानने वाले है , उनकी पुरी विद्यमान है।
उस सिद्ध, पवित्र, ईष्‍टदायक चारण जाति की शाखा में आगे चलकर "बैह जी" चारण की संतान–
आढा जी सान्दू जी मैया जी वाचा जी मेघवाचा जी हुए। अत: चारणों की सान्दू शाखा में बरहवीं पीढ़ी में श्री जोगड़ जी के पुत्र करमानन्द जी के "हूँपकरण जी" सान्दू का जन्म हुआ। हूँपकरण जी सान्दू अपनी विलक्षण प्रतिभा के धनी थेऔर श्रेष्ठ कवि थे और माँ जोगमाया के उपासक थे।
हूँपकरण जी सान्दू मेंवाड़ राजगराने में राजकवि के रूप में प्रतिष्ठित थे और उनका खास गाँव मेंवाड़ में हूपाखेड़ी था जो आज भी विद्यमान है मेंवाड़ में उन्हे बहुत सम्मान मिला और बेड़च नदी के किनारे के आस-पास की जगह पसंद आयी तब मेंवाड़ के राणा रतनसिंह जी ने कविराज जी हूँपा जी सान्दू को मन-पसंद जगह पर एक गाँव जागीर में विक्रम संवत 1368 में 5651 बीघा जमीन जागीर में मिली। कविराज हूँपा जी सान्दू वहाँ आकर बस गये तब उस गाँव का नाम उनके नाम पर "हूँपाखेड़ी" रखा गया। कालान्तर में समय के साथ परिवर्तन होते हुए अब इस गाँव का नाम "हापाखेड़ी" के नाम से जाना जाता है। तब खिंवसर के रावल खिवसिंह जी मेंवाड़ आये तब हूँपकरण जी सान्दू को अपने साथ खिंवसर ले गये वहाँ जैसलमेर के रावल दुर्जनशाल जी और हूँपा जी सान्दू के गहरी मित्रता हो गई इसी दौरान हूँपाजी सान्दू को रावल दुर्जनशाल अपने साथ जैसलगिरा ( जैसलमेर) ले गये । हूँपकरण जी सान्दू न की मारवाड़ बल्की भारतवर्ष के सभी राजा-महाराजाओं के दरबार में सम्मानित कविराज के रूप में माने जाते थे। जैसलगिरा (जैसलमेर) के रावल दुर्जनशाल जी के और हूँपा जी सान्दू के बीच बहुत घनिष्ट मित्रता थी। एक बार दुर्जनशाल जी और अलाउद्दीन खिलजी के साथ बहुत भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में दुर्जनशाल जी वीरता के साथ लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हो गए और उनके साथ हूँपा जी सान्दू के पुत्र हरिसिंह जी सान्दू भी यद्ध में भाग लिया तथा वीरगति को प्राप्त हुए।
तब जैसलगिरा की रानियों ने जौहर करने की ठान ली। जौहर के समाचार जब खिंवसर पहुँचे तो दुर्जनशाल जी की रानी "लखांदे" ने सान्दू हूँपा जी को याद किया। दोनों रथ लेकर जैसलगिरा पहुँचे। वहाँ पहुँचे तो देखा कि चारों तरफ लाशों के ढेर पड़े है, मैदान में सैनिकों के कटे हुए सिर, धड़ तथा अस्त्र व शस्त्र बिखरे पड़े थे। ऐसा लग रहा था मानो साक्षात शिव ने ताण्डव किया हो। यह सब देख लखांदे ने सती होने की ठान ली लेकिन उसके पति के सिर के बिना सती नहीं हो सकती थी तथा चारों तरफ बिखरे हुए शिरों में दुर्जनशाल जी का सिर ढूंढना अत्यंत कठिन था। तब राणी लखांदे ने कविराज सान्दू हूँपकरण जी से कहा की आज आपको मेरी लाज रखनी है, और इतिहास साक्षी है की चारण सदा राजपूतों के सहायक तथा मार्गदर्शक रहे है। तब रानी लखांदे ने सान्दू हूँपकरण जी से कहा की है कविराज जी दुर्जनशाल जी आपकी कविताओं तथा मुखवाणी पर हमेंशा रिझा करते थे अत: अब फिर से उनको रिझाने की घड़ी आ गई है। इतना सुनकर कविराज सान्दू हूँपा जी ने कहा कि में आज फिर से अपनी वाणी से उनको रिझाऊँगा और वे स्वयं अपने मुह से बात करेंगें।
तब सान्दूँ हूँपकरण जी ने अपने दोनों हात जोड़कर और आँखे बन्द करके अपनी आराध्य देवी कुलदेवी माँ मम्माय जी का स्मरण किया। रणभुमी में गंगाजल छिड़का तथा पुन: क्षणिक स्मरण करते हुए अपने ईष्ट माँ मम्माय को कहा की "हे माँ ! आज तेरे बैटे की परीक्षा है, तेरी वाणी की परीक्षा है, मेरे जप की और तेरे तप की परेक्षा है, एक देवी पुत्र की तथा चारणो और राजपूतों के सनातन सम्बन्ध की परीक्षा है तथा चारणो के सत्य की परीक्षा है। इतना कहते ही माँ भगवती स्वयं उनकी जिह्वा पर विराजमान हो गई। माँ भगवती के सान्दू हूँपकरण जी की जिह्वा पर विराजमान होते ही उस क्षण पवन ने बहना छोड़ दिया, नभचर उड़ते-उड़ते रूक गये, कैलाश में बैठे भगवान भोलेशंकर का ध्यान भंग हो गया, स्वयं विष्णु, ब्रम्हा, चारों वेद, देवीयाँ, समस्त देवतागण, यक्ष, नाग, किन्नर आदी सभी देवता अपने-अपने आसन त्याग कर महाकवि "हूँपा जी" की ओज भरी वाणी को सुनने के लिए युद्धभुमि पर अप्रत्यक्ष रूप से पहुँच गये तथा हुँपा जी की मुख वाणी को सुनने को आतुर हो रहे थे।
तभी देवीपुत्र सान्दू हूँपकरण जी ने ध्यान मग्‍न होते हुए अनेक दोहों का ओज मयी उच्‍चारण किया। जिनमें से कुछ प्रमुख पंक्तियाँ निम्‍न है―
क्रम केत स्वरग कज नह भारत कज
दुठ दुहड़े दळ्या दुजोण।
पह तिण भवणै त्रिणे पेखियो
धड़ पाखे नाचंतो ध्रोण॥१॥
हु हुपो मरण किम हेरु,धर सामी लीजती धर!
मेलु मुछ मिर पण माने कमल कहे जो हुवे सो कर!
कर विण मुछ भ्रौहसो, सुंज कर अड़व ओपियो अँजसियो !
गढां गिलेवा आदमगौरी,हङ हङ हङ दुदो हासियोँ ॥२॥
हूँपै सान्दू सेवियो साहब दुर्जण सल्ल।
बिड़दातां सिर बोलियो गीतां दुहां गल्ल॥
कविराज सान्दू हूँपकरण जी की ओज मयी शब्द सुनते ही दुर्जनशाल जी कटा हुआ मस्तक जो धड़ विहीन था वह बोल पड़ा―
व्हैता जै पग हाथ, उठ'र सांमी आवतौ।
मिळता बाथां घात, हिंयो मिलायर हूँफड़ा॥
दुर्जनशाल जी की वाणी सुनकर रानी लखांदे ने उनका सिर गोद में लिया और सती हो गई।
इसी कुल मे आगे चलकर "बोरम जी" सान्दू के पुत्र "अम्बादान जी सान्दू" और उनके पुत्र "धर्मा जी सान्दू" के अप्रतीम प्रतिभा के धनी "रामा जी सान्दू" का जन्म हूँपाखेड़ी में हुआ। रामा जी सान्दू अपने काल में बहुत बड़े विद्वान, ईष्टबली और एक कविराज के रूप में प्रख्यात थे। उन्होंने अपने काल में पूरे राजपूताना में अपनी विद्वता का परचम फहराया । रामा जी सान्दू मेंवाड़ के हिन्दवा सूरज महाराणा प्रताप की सेना में सेनानायक थे। वे विक्रम संवत 1576 में हल्दीघाटी के महासंग्राम में अकबर की सेना के साथ बड़ी वीरता से युद्ध लड़े। वे अकबर की सेना को सर्वाधिक क्षति पहुचाने वाले दल के सेनानायक थे। रामा जी सान्दू के बारे में दयालदास राव ने "राणरासौ" में हल्दीघाटी के युद्ध का विस्तृत्व वर्णन करते हुए लिखा है की–
भगी भीर भाऊं अशाऊं उकढ्यो।
महा मोर माँ झीनी के मुख्‍ख चढ्यो॥
जिते जुध्ध जोधा जुरै स्वामी कामां।
पचारे तिन्हे पेखि चारनुं रामा॥
इसी कुल में आगे चलकर "उदयकरण जी सान्दू" के पुत्र "मालादान जी सान्दू" का जन्म हुआ। मालादान जी ने अपनी विद्वता की धाक समस्त राजपुताना के राजों-रजवाड़ों में फैलाई और माला जी सान्दू न केवल कलम के धनी थे अपितु तलवार के धनी भी थे। उन्होने स्वयं कई युद्धों में भाग लेकर अपनी वीरता का अद्भुत परिचय दिया। माला जी सान्दू ने विक्रम संवत १६६८ में गोयन्ददास जी के नेतृत्व में महाराणा अमर सिंह जी से लड़ी लड़ाई में भाग लिया था। माला जी सान्दू का न केवल रजवाड़ों में अपितु मुगल दरबार में भी उनका उतना ही सम्मान था। खुद बादशाह अकबर ने अपने हाथों से उन्हें पाग बंधाकर सम्मानित किया। जिनका एक सोरठा मिलता है―
अकबर पेज अधार, पाग बन्धावे पात सा।
हे चारण चकार, मिणधर सान्दू मालदे॥
माला जी सान्दू बहुविज्ञ व बहुश्रुत थे। वे वेद, पुराण, स्मृति, व्याकरण, छन्द, शास्त्र, ज्योतिष, शालिहोत्र आदि के पूर्ण ज्ञाता थे।
बादशाह अकबर ने उनकी विद्वता से प्रभावित होकर ही पृथ्वीराज राठौड़ की " वेली किशन रुकमणी री" के चार निर्णायक चारणो में माला जी सान्दू को भी शामिल किया था।
चारण जाति की सान्दू शाखा में अनेक विद्वान हुए जिन्होंने अपनी काव्य प्रतिभा, प्रज्ञा व सतत् साधना द्वारा काव्य रचना में अपुर्व योगदान देकर उत्कृष्ट ग्रंथों का प्रणयन किया। अत: आज भी चारण जाति के सान्दू कुल में जन्में व्यक्तियों में सच्‍ची निष्ठा, भक्ति, काव्यगुण, वीरता सत्यता के गुण विद्यमान है और रहते जायेंगें।

पिछले 1300 सालों से आज तक भारत निरंतर अनेकानेक धर्मों के हमले झेल रहा है परंतु चरणों,राजपूतों, सिक्खों , मराठाओं और भारत की अन्य वीर जातियों की वजह से आज तक सनातन हिन्दू धर्म जीवित है और रहेगा।
   इस्लाम धर्म  भारत मे उतनी तीव्रता से नही फैला जितना अरब, मिस्र, ईरान, इराक और तुर्की में। आर्यों की भूमि भारतवर्ष में इस्लाम का मुकाबला संसार के सबसे प्राचीन सनातन हिन्दू  धर्म से हुआ और इतिहास गवाह है कि आज 1300 वर्षों के संघर्ष के बाद भी सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में सनातन हिंदू धर्म के अनुयायी  ज्यादा संख्या मे हैं| अगर ऐसा न हुआ होता तो इस्लाम न केवल हिंदुस्तान बल्कि म्यांमार , चीन और जापान तक फैल जाता।
इस्लाम के हमले 650 ईसवी से ही शुरू हो गए थे। शुरुआत में राजपूतो के सैकड़ों युद्ध अरब, ईरानी, तूरानी और अफगान मुस्लिम आक्रमणकारियो से हुए और सभी हिंदुओ ने ही जीते।
गुजरात सम्राट नागभट्ट , सम्राट भीमपाल, कश्मीर के सम्राट ललितादित्य, कन्नौज के यशोवर्मन, मेवाड़ के बप्पा रावल और राणा कुम्भा और राणा सांगा, जालौर के वीरम देव सोनगरा, अजमेर के पृथ्वीराज चौहान, चालुक्यों के विक्रमादित्य द्वितीय, देहली के तंवर , कालिंजर के राजाओं आदि ने कई बार मुस्लिम आक्रमणकारियों को हराया परंतु चूंकि हमारा देश  भारत एक लोकतंत्र है इसलिए वोट बैंक का महत्व होने से इन राजाओं का  इतिहास नही पढ़ाया जाता ताकि मुसलमानों को ठेस ना पहुँचे। परंतु इस वजह से अनेक भ्रांतिया उत्पन्न हो गयी है।
राजा डार की दो बेटियों ने इस्लामी आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम से ऐसा बदला लिया कि बगदाद के ख़लीफ़ा की अगले 200 सालों तक वापस हिम्मत नही हुई भारत पर हमला करने की।
   भारत के इतिहास के एक अति महत्वपूर्ण पन्ने को विदेशियों ने अंधकारपूर्ण युग (dark ages) कह कर गायब ही कर दिया। ये समय था 600 से लेकर 1100 ईस्वी तक का  ये वो समय था जब इस्लाम को भारत मे बार बार हारना पड़ा था। ये हिन्दुओं की विजय का इतिहास था। इसे हिन्दुओ के आत्मबल को तोड़ने के लिए मिटा दिया गया। जब किसी सभ्यता का आत्मबल चला जाता है तब उसे गुलाम बनाने में आसानी रहती है क्योंकि इससे मनोवैज्ञानिक तौर पर वो सभ्यता पंगु हो जाती है और लड़ने की हिम्मत नही जुटा पाती।
हिन्दू धर्म की चारण जाति: चाह-रण
इन युद्धों में हिन्दू सेनाओ की विजय का प्रमुख कारण एक बेहद विशिष्ट जाति थी जो “चारण” कहलाती थी। राजपूत और क्षत्रिय उसे अपने हरावल (vanguard) में रखते थे। हरावल सेना की वो टुकड़ी होती है जो शत्रु से सबसे पहले भिड़ती है। अग्रिम पंक्ति में चारण योद्धाओं को रखा जाता था। इन्हीं के साथ राज चिन्ह, नक्कारे और पताकाऐं चलती थी।
ये योद्धा और कवि दोनों भूमिकाओं का निर्वाह करते थे। युद्ध मे हरावल के योद्धा और शांति में डिंगल भाषा के कवि और इतिहासकार।
कश्मीर: ( चारणों का प्राचीन निवास स्थान)
जैसे कि, राजपूत शब्द राजा+पूत (अर्थात राजा का पुत्र) से बना है। उसी प्रकार, चारण शब्द चाह + रण से बना है अर्थात वह जो रण या युद्ध की चाह रखता है।
वर्ण ‘ह’ का उच्चारण थोड़ा मुश्किल है क्योंकि यह हलक से होता है अतः यह कालांतर में चाहरण से सिर्फ चारण रह गया।
चारण  एक बेहद खूंख्वार (fierce) जाति थी। ये युद्ध मे काले रंग के वस्त्र धारण करते थे और उन पर पशुबलि का रक्त या लाल रंग लगा होता था। ये दोनों ही हाथों में शस्त्र रखते थे क्योंकि वीरगति प्राप्त करना मोक्ष के समकक्ष समझा जाता था अतः ढाल का उपयोग बहुधा नही किया करते थे। स्त्रियां त्रिशूल धारण करती थी और युद्धों में नेतृत्व करती थी। इनकी वेशभूषा अत्यंत डरावनी होती थी। ये दिखने में भी बड़े खूंख्वार होते थे।
युद्ध होने पर ये अत्यंत रक्तपात करते थे ।
जाति इतिहासकार डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार चारण  जाति की कुछ देवीयों को बली और शराब भी चढ़ाई जाती है जैसे आवड़ जी या करणी जी परंतु वही कुछ देवीयों जैसे गुजरात की खोडियार आदी को माँस और शराब निषिद्ध है। ऐसे भी उदाहरण मिलते है कि बलि इत्यादि में इनकी दैवीयां बलि दिए गए पशु का रक्तपान करती थी। युद्ध मे हारने पर या अपनी जिद पूरी ना होने पर ये जापान के समुराई योद्धाओं की भाँति स्वयं के शरीर के अंगों को स्वयं ही काट डालते और शत्रुओं को श्राप देकर अपनी जीवनलीला स्वयं समाप्त कर देते क्योंकि युद्ध से वापस आना अपमानजनक समझा जाता था । इस प्रक्रिया को “त्रगु” या “त्राग” कहा जाता था। जापान के समुराई योद्धा इसे ‘हाराकीरी’ कहते है। इस प्रकार ये हिन्दुओ के आत्मघाती हमलावर थे। जहाँ जहाँ भी ऐसा होता वहाँ उन योद्धाओं की याद में पत्थर लगा दिये जाते जिनको “पालिया” कहा जाता था। ये पत्थर अभी भी आप गुजरात और राजस्थान के चारणों के पुराने गाँवो में देख सकते है।
ये पालिये सैकड़ों की तादाद में हर छोटे मोटे गाँवो में लगे हुए है और इस बात की पुष्टि करते है कि सैकड़ों युद्ध हुए थे। परंतु अब ये पालिये ही रह गए हैं। लिखित इतिहास को काफी हद तक नष्ट कर दिया गया है।
चारणों का युद्ध इतिहास पूरी तरह से मिटाने की पुरजोर कोशिश इसलिए हुई क्योंकि युद्ध मे वीरता का सीधा जुड़ाव गौरव से है। अतः बड़ी जातियां ये नही चाहती थी कि कोई ये गौरव उनसे छीने । अतः चारणों को निरंतर हाशिये पर धकेलने की कोशिशें हुई और अभी तक जारी है। 
दर असल चारण ऐसी  है जिसने अपने आप मे ब्राह्मणों और क्षत्रियों दोनों के अच्छे गुणों का सम्पूर्ण रूप से समावेश कर अपने आप को इस दोनों से अत्यधिक ऊंचा उठा लिया और आम जनमानस इन्हें देवताओं के समकक्ष रखने लगा। अतः  ब्राह्मणों और क्षत्रियों  मे  चरणों के प्रति  ईर्ष्या  भाव  जागृत हो गया | दूसरा चारण अत्यधिक युधोन्मादी होने की वजह से निरंतर राजपूतों को लड़ने के लिए कहते जिससे राजपूतों में धीरे धीरे ये धारणा बनने लगी कि ये हमें अनावश्यक युद्धों में झोंकते रहते है और दोनो में दूरियां बढ़ने लगी।
शांति काल मे चारण वीरगति को प्राप्त योद्धाओं पर  “डिंगल”  भाषा मे कविता लिखते थे|  इसका अर्थ होता है भारी-भरकम क्योंकि यह कविता अत्यंत भारी और डरावनी आवाज़ में बोली जाती थी और इसकी एक विशिष्ट शैली होती थी जो अब लुप्त हो चुकी है और अब केवल विरूपण देखने को मिलता है।
1000 ईस्वी के आसपास में डिंगल भाषा में लिखे हुए इस छन्द का अवलोकन करें -
तीखा तुरी न मोणंया, गौरी गले न लग्ग। जन्म अकारथ ही गयो, भड़ सिर खग्ग न भग्ग।।
अर्थात
यदि आपने अपने जीवन में तेज घोड़े नही दौड़ाये, सुंदर स्त्रियों से प्रेम नही किया और रण में शत्रुओं के सर नही काटे तो फिर आपका यह जीवन व्यर्थ ही गया।

एक और उदाहरण देखिए
लख अरियाँ एकल लड़े, समर सो गुणे ओज। बाघ न राखे बेलियां, सूर न राखे फौज।।
अर्थात
 चाहे लाखों शत्रु ही क्यों न हो एक योद्धा उसी तेज के साथ युद्ध करता है। जिस प्रकार बाघ को शिकार के लिए साथियों की जरूरत नही होती उसी प्रकार एक योद्धा भी युद्व के लिए फौज का मोहताज नही होता।
इस प्रकार के दोहो और कविताओं से आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के लिए निरंतर प्रेरित किया जाता था।
युद्धकाल में ये जाति हिन्दू सेनाओं में अग्र पंक्ति में युद्ध करती थी।
इस प्रकार इस जाति में ब्राह्मणों और क्षत्रियों दोनों के गुण अपने पूरे रौब के साथ विद्यमान होते थे|
यही कारण है कि इतिहासकार इनको ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनो ही जातियों से श्रेष्ठ मानते है और आम जन मानस में इन्हें अपनी विशेषताओं के कारण देवताओं का दर्जा प्राप्त है।
भगवत गीता, रामायण और महाभारत में चारणों की उत्पत्ति देवताओं के साथ बतायी गयी है।
पुराणों को लिखने का श्रेय भी चारणों को दिया जाता है। (स्रोत: आईएएस परिक्षा हेतु Tata McGraw Hill की इतिहास की पुस्तकें)
  ये किले के द्वार पर हठ कर के अड़ जाते थे और भले राजा स्वयं किला छोड़ कर चला गया हो, शत्रुओं को भीतर नही जाने देते थे। इनकी इसी हठ के कारण कई बार ये सिर्फ अपने परिवार के साथ ही शत्रुओं से भिड़ जाते थे और पूरा कुटुंब लड़ता हुआ मारा जाता। एक बार औरंगजेब ने उदयपुर के जगदीश मंदिर पर हमला किया तो उदयपुर महाराणा अपनी समस्त फ़ौज और जनता के साथ जंगलों में चले गए परंतु उनका चारण जिसका नाम बारहठ नरुजी था, वहीं अड़ गया और औरंगजेब की सेना के साथ लड़ता हुआ अपने पूरे कुटुंब के साथ मारा गया। कहते है उसने कदंब युद्ध किया जिसमें की सर कटने के बाद भी धड़ लड़ता रहता है। उसके पराक्रम को देख कर जहां इनका धड़ गिरा वहाँ मुस्लिम योद्धाओं ने सर झुकाया और उनका एक स्थान बना दिया। जहां उनका सर गिरा वहाँ हिंदुओ ने समाधि बना दी और उस पर महादेव का छोटा सा मंदिर बना दिया। इस आशय का एक शिलालेख अभी भी जगदीश मंदिर के बाहर लगा हुआ है जिसकी कोई देखरेख नही करता। इनका आदमकद फ़ोटो जो कि जगदीश मंदिर में लगा हुआ था, भी महाराणा के वंशजों ने हटवा दिया क्योंकि उनके पूर्वज तो किला छोड़ कर चले गये थे और ये वीरगति को प्राप्त हुए तो इनकी ख्याति अत्यधिक बढ़ गयी थी जो महाराणा के वंशजों को रास नही आई।
  इस जाति की महिलाओं ने सैकड़ों बार राजपूत सेनाओं का नेतृत्व कर बाहरी आक्रमणकारियो को हराया और ये राजपूतो में पूजनीय होती थी। आपने राजपूत करणी सेना का नाम तो सुना ही होगा। ये करणी जी चारण जाति में उत्पन्न देवी है। इनका मंदिर देशनोक में है जो कि राजस्थान में बीकानेर के पास है । देखें गूगल पर।
 इस जाति की वजह से 800 वर्षो तक राजपूतो ने मुस्लिम आक्रमणकारियो से लोहा लिया। और लगातार युद्ध जीते। इस आशय का एक पत्र जो कि कर्नल जेम्स टॉड ने ब्रिटेन की महारानी को लिखा था आज भी उदयपुर के सिटी पैलेस म्यूजियम में दर्शनार्थ रखा हुआ है।
चरण जाति  के बारे में एक प्रसिद्ध दोहा है, जो इस प्रकार है
आवड़ तूठी भाटिया, श्री कामेही गौड़ा, श्री बरबर सिसोदिया,श्री करणी राठौड़ां।
अर्थात भाटी राजपूतों को राज चारण देवी आवड़ ने दिया, 
श्री कामेही देवी ने राज गौड़ राजपूतों को दिया
,श्री बरबर जी ने राज सीसोदियो को दिया,
और श्री करणी जी ने राज राठोड़ों को दिया 
अर्थात उक्त  सभी राज्य चारण देवियों ने राजपूतो को दिये।

मामड़जी चारण की बेटी आवड़ ने सिंध प्रान्त के सूमरा नामक मुस्लिम शासक का सिर काट कर उसका राज्य भाटी राजपूतों के मुखिया तनु भाटी को दे दिया। उस राजा ने तनोट नगर बसाया और माता की याद में तनोट राय (तनोट की माता) मंदिर का निर्माण करवाया।
जिस समय आवड़ ये युद्ध सिंध प्रांत में लड़ रही थी उसी समय उसकी सबसे छोटी बहन खोडियार (The Criple) कच्छ के रण में अरब आक्रमणकारियों से युद्ध कर रही थी जिसमे हिन्दू सेनाओं को विजय प्राप्त हुई। कहते है खोडीयार ने अपने रिज़र्व धनुर्धारियों को एकदम से युद्ध मे उतारा जिससे शत्रुओं को लगा कि हज़ारों बाणों की वर्षा कोई अदृश्य धनुर्धारी कर रहे हों। आज पूरा गुजरात खोडीयार का उपासक है। खोडीयार भावनगर राज घराने की कुलदेवी भी है। ये युद्ध 8वीं शताब्दी के आसपास हुए थे। ये खोडीयार चारणों की सबसे शक्तिशाली खांप जिसे वर्णसूर्य (जातियों के सूर्य, अपभ्रंश वणसूर) कहा जाता है कि भी कुलदेवी है।
 ये कुल सात बहने थी और सातों जब एक साथ युद्ध के मैदान (जो किअक्सर कच्छ का रण या थार का रेगिस्तान होता था) में प्रवेश करतीं तो दूर से इनके हवा में हिलते काले वस्त्रों, काले अश्वों और चमकते शस्त्रों के कारण ये ऐसी दिखाई देतीं जैसे सात काले नाग एक साथ चल रहे हो। अतः आम जनमानस में ये नागणेचीयां माता अर्थात नागों के जैसी माताएं कहलाईं। इन सातो देवियों की प्रतिमा एक साथ होती है। इन्हें आप जोधपुर के मेहरानगढ़ किले के चामुंडा मंदिर में देख सकते हैं। आजकल इनके इतिहास को भी तहस नहस लड़ने की पुरजोर शाजिशें चल रही है और उल्टी सीधी किताबें भी लिखी जा रही है।
चारण जाति  में मोमाय माता का जन्म हुआ। ये महाराष्ट्र में मुम्बादेवी कहलाईं और इन्ही के नाम पर मुंबई शहर का नाम पड़ा।
 बीकानेर के संस्थापक राव बीका को बीकानेर का राज्य करणी माता के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ और उन्होंने करनी माता के लिये देशनोक में मंदिर का निर्माण भी करवाया। करणी माता ने ही जोधपुर के मेहरानगढ़ किले और बीकानेर के जूनागढ़ किले की नींव रखी और यही दोनों दुर्ग आज भी राठौड़ों के पास है जबकि बाकी राजपूतों के सभी किले उनके हाथ से जा चुके हैं। आम जनमानस इसे भी करणी का चमत्कार मानता है।
बिल गेट्स की सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने साम्राज्यों और युद्धों पर आधारित अपने विश्वविख्यात कंप्यूटर गेम ‘साम्राज्यों का युग’ (Age of Empires) में करणी माता को श्रद्धांजलि देते हुए उनका एक wonder (चमत्कार) बनाया है जो गेम में बनने के बाद साम्राज्य जीतने में मदद करता है। लिंक है
माइक्रोसॉफ्ट ने सिर्फ करणी को ही युद्ध की देवी माना है न कि दुर्गा, चामुंडा या भवानी आदि को। इसका कारण ये हो सकता है कि करणी जी मात्र एक मिथक न होकर वास्तव में मौजूद थी।
नारी सशक्तिकरण की शुरुआत चारणों ने 7वीं शताब्दी में ही कर दी थी। इनकी बेटियां जीती जागती देवियों के रूप में पूजी जाने लगी थीं।

एक और सत्य घटना:

1965 के भारत पाक युद्ध मे चारण देवी माँ आवड़ के तनोट स्थित मंदिर जिसे तनोटराय (अर्थात तनोट की माता) के नाम से जाना जाता है, में पाकिस्तान ने 3000 बम भारतीय सेना की टुकड़ी पर गिराए पर एक भी बम नही फटा। इसे सेना ने माता का भारी चमत्कार माना। आज भी माता आवड़ को सेना और BSF की आराध्य देवी माना जाता है। हर शाम BSF के जवान माँ की बेहद ओज पूर्ण आरती करते है जो देखने लायक होती है।
बाद में इस अत्यंत छोटी जाति की अत्यधिक ख्याति देख बड़ी जातियां इनसे ईर्ष्या करने लग गयीं। इससे चारणों के प्रति षडयंत्र होने लगे। मसलन एक ब्राह्मण ने मेवाड़ राज्य के शासक महाराणा कुम्भा से कह दिया कि उसका वध एक चारण करेगा। जिससे डरे हुए कुंभा ने सभी चारणों को मेवाड़ से चले जाने को कहा। जबकि हमीर के जन्म के समय एक चारण देवी ने भविष्यवाणी की थी कि हमीर का यश सब ओर फैलेगा और वो राजा बनेगा। इस पर हमीर की माँ ने कहा कि है देवी यह तो असम्भव है। परंतु असम्भव सम्भव हुआ और हमीर राजा बना। ये गाथा आज भी कुम्भल गढ़ के लाइट एंड साउंड शो में दिखाई जाती है। आप यूट्यूब पर देख सकते हैं।
राजपूतों के लिए चारण दुधारी तलवार के समान थे। पक्ष में लड़ते तो शत्रुओं पर कहर बन कर टूट पड़ते और आत्मघाती हमलावर बन जाते।
वहीं जब अपनी जिद पर अड़ जाते तो राजपूतों के लिए मुश्किल बन जाते। खासकर शादी ब्याह के मौकों पर जब अपनी मांगे पूरी न होने पर रंग में भंग कर देते। युद्ध और त्रगु की धमकी देते। ऐसी घटनाओं से राजपूतों और चारणों में दूरियां बढती गयीं। अब चारण सिर्फ उन्हीं राजपूतों के यहाँ जाते थे जहाँ उनका मान सम्मान बरकरार था। इससे अधिकतर राजपूतों का पतन होता गया जो आज तक जारी है। इसका कारण है कि चारण राजपूतों के गुरू भी थे और उन्हें बचपन से ही वीरता के संस्कार देते थे। बच्चों को बचपन से ही कविताओं, गीतों और दोहो इत्यादि के द्वारा बताया जाता था कि उनके पूर्वज कितने बड़े योद्धा थे और उन्हें भी ऐसा ही बनना है। ये कवित्त चारण स्वयं लिखते थे और इसमे अतिश्योक्ति जानबूझकर की जाती थी क्योंकि ये मानव का स्वभाव है कि वह महामानव का अनुसरण करता है न कि साधारण मनुष्य का। यही कारण है कि हम फिल्मो में नायक को पसंद करते हैं। महान राजपूत और चारण योद्धाओं पर काव्य की रचना कर चारणों ने उन्हें अमर कर दिया। इसलिये हर राजपूत की ये चाह होती थी कि कोई चारण कवि उस पर कविता लिखे। इसके लिए राजपूत मरने को भी तैयार रहते थे। यही कारण है की इन्हें कविराज भी कहा जाता था।
मध्यकाल में भी कई बार चारणों ने राजपूतों को राजा बनाया।
 जोधपुर के महाराजा मान सिंह ( शासन 1803–1843) को चारण ठाकुर जुगता वर्णसूर्य ने राज गद्दी दिलवाई। मान सिंह जब केवल नौ साल के थे उनके बड़े भाई जोधपुर महाराजा भीम सिंह ने उन्हें मारने की कोशिश की क्योंकि उनके पुत्र नही हो रहा था तो उनको लगा कि कहीं मान सिंह बड़ा होकर उनसे राज गद्दी न छीन ले। मान सिंह को उनके चाचा शेर सिंह जोधपुर के किले से निकाल कर कोटड़ा ठिकाने के चारण जुगता वर्णसूर्य के पास जालोर के किले में छोड़ आये। पता चलने पर शेर सिंह की दोनों आँखे उनके भतीजे भीम सिंह ने निकलवा दी और प्रताड़ना देकर मार दिया। मारवाड़ की सेना ने जालौर की घेराबंदी कर दी जो कि 11 साल तक रही। अतः मान सिंह करीब 11 साल तक जालौर के किले में रहे और जुगता वणसूर के प्रशिक्षण की बदौलत उन्होंने भाषाओं, शस्त्र और शास्त्र सभी पर भारी महारथ हासिल कर ली। जुगतो जी ने भारी वित्तीय मदद भी मान सिंह जी को दी। ये सब मदद जुगतो जी ने बिल्कुल निःस्वार्थ की क्योंकि न तो मान सिंह गद्दी के उत्तराधिकारी थे न ही उनके राजा बनने की कोई उम्मीद थी। चौबीसों घंटे जालौर जोधपुर की सेना के घेरे में रहता था और निरंतर हमले होते रहते थे। बाद में दैवयोग से भीम सिंह अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए और मान सिंह राजा बन गए। राजा बनते वक्त मान सिंह ने जुगतो जी से आशीर्वाद लिया और उन्हें कई प्रकार के विशेषाधिकारों से नवाजा जैसे दोहरी ताज़ीम, लाख पसाव, हाथी सिरोपाव और खून माफ आदि। जुगतो जी को हाथी पर बैठा कर स्वयं मान सिंह आगे आगे पैदल चले और किले के अंतिम द्वार तक छोड़ने आये। उनके गांव कोटड़ा में एक दुर्ग का निर्माण करवाया जो आज भी जुगतो जी के वंशजों के पास है जो कि जुगतावत कहलाते है । मान सिंह आगे चल कर जोधपुर के सबसे काबिल राजा बने। राठौड़ सम्राटों में उनके जैसा विद्वान कोई नही हुआ। उन्होंने ने कई गीतों, कविताओं और दोहों की रचनाएं कीं। राठौड़ शिरोमणि मान सिंह ने जयपुर, उदयपुर और बीकानेर की सयुंक्त सेनाओं को एक साथ युद्ध मे बुरी तरह पराजित किया और जयपुर वालों से तो दो लाख का मुआवजा भी वसूल किया। चूंकि वे राज गद्दी के उत्तराधिकारी नही थे अतः उनके समय मे भरपूर षडयंत्र राजपूत ठाकुरों ने किए। परंतु अपने सुदृढ़ प्रशिक्षण की बदौलत उन्होंने 40 वर्ष तक मारवाड़ पर एकछत्र राज किया जो कि अपने आप मे एक उदाहरण है। जुगतो जी समेत 17 चारण हर वक्त मान सिंह जी के साथ रहते थे। चाहे युद्ध हो या आमोद प्रमोद। महाराजा मान सिंह ने बड़े मार्मिक शब्दों में अपने चारणों का गुणगान किया है और अपनी कविताओं में कहा है कि विकट समय मे जब सभी बंधु बांधवों ने मेरा साथ छोड़ दिया था तब भी ये 17 चारण योद्धा मेरे साथ डटे रहे।
इसी तरह मेवाड़ में राणा हमीर की मदद एक चारण ठाकुर ने पांच सौ घुड़सवार की सेना देकर की।
एक बार गुजरात के पालनपुर राज्य में विद्रोह हो गया। राजा पर उसकी सेना ने ही हमला कर दिया। ऐसी विकट घड़ी में उसने अपने चारण ठाकुर से मदद की गुहार लगाई। इस पर उस चारण ने जो कि बेहद सामर्थ्यवान था ने अरब सिपाहीयों की एक सेना खड़ी कर डाली और विद्रोह को कुचल दिया और राजा का वापस राज तिलक कर दिया। ( स्रोत: पालनपुर राजयानो इतिहास, पेज 9) ऐसी स्थिति में वह चारण स्वयं भी राजा बन सकता था परंतु उसने केवल अपनी मित्रता का मान रखा और विश्वासघात नही किया। चारणों को वैसे भी आम जनमानस देवताओं के समकक्ष रखता था और स्वयं राजा उनके आगे नतमस्तक होते थे अतः उनमे राजा बनने की कोई चाह प्रायः नही होती थी।
करणी द्वारा राव बीका को बीकानेर का राज दिलवाने में मदद करना सर्वविदित है।
 जाति इतिहासविद डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार चारण बड़े से बड़े राजा को भी गलत बात पर भरे दरबार मे डाँटने से नही हिचकते थे। बड़ी बेबाक और सही राय देते थे चाहे वो कितनी ही बुरी क्यों न लगे। कई बार इसके लिए वे एक विशेष छंद का प्रयोग करते थे जिसे “छंद भुजंग” (serpentine stanza) कहा जाता था। इसका दोहे का प्रभाव काले नाग के डसने जैसा होने से ऐसा नाम दिया गया है। सही और निडर राय देने के कारण हर राजपूत राजा और ठाकुर अपने यहाँ चारण को अवश्य आमंत्रित करता था और बड़ी मान मनुहार के बाद चारण सरदार आते थे। इनको जागीरे और बड़े बड़े सम्मान भेंट में देकर राजपूत प्रसन्न रखते और दरबार मे पास में बिठाते थे। 
चारणों से दूरियों के कारण राजपूतों में संस्कार समाप्त होते गए और कुरीतियों ने घर कर लिया। अब वे योद्धाओं से गिरकर व्यसनी हो गए। खास कर अंग्रेजो के समय मे। इनको रोकने टोकने वाला कोई नही रहा। जिस जीवन को स्वाभिमानी राजपूत “मुट्ठी भर मिट्टी” से अधिक कुछ नही समझता था उसे अब वह “जिंदगी एक बार मिलती है” में बदल कर देखने लगा। और जैसा कि इतिहास गवाह है अतंतः राजपूतों का पतन हो गया और सत्ता इनके हाथ से निकल कर मुग़लो के पास चली गयी।
राजस्थानी में दरवाजे को बारणा कहा जाता है और चूंकि चारण दरवाजे पर हठ करके अड़ जाते थे इनको बारहठ (बार +हठ) भी कहा जाता है जो कि एक पदवी या उपाधि है। राजपूतों के शादी के समय भी ये दूल्हे को तभी अंदर जाने देते जब वो इनका टैक्स जिसे नेग या त्याग या हक कहा जाता था, इनको भेंट में देता था। ये हक या टैक्स इसलिये कहलाता थे क्योंकि चारण उसी गढ़ या किले की रक्षा करते हुए मारे जाते थे। अतः इनको गढ़वी भी कहा जाता है। विवाह समारोहों में कई बार चारण जिद पर अड़ जाते और टैक्स के रूप में बेहद गैर वाज़िब मांग रखते और पूरा न होने पर बारात से युद्ध या त्रगु की धमकी देते। रंग में भंग के डर से ऐसी मांगो को पूरा करने में राजपूतों के पसीने छूट जाते। चारण ‘वीरमूठ’( वीर की मुट्ठी) भी भरते थे जिसमे स्वर्ण मुद्राएं एक चारण मुट्ठी में भर के लेता था, टैक्स के रूप में। ब्राह्मण सभी जातियों से दान, दक्षिणा और भेंट स्वीकार करते है परन्तु चारण सिर्फ राजपूत की भेंट स्वीकार करते थे अन्य किसी की नही। बाद में राजपूत इनके अत्याचार से परेशान हो गए और चारणों से विनती करके दोनों जातियों के बड़े बुजुर्गों ने ये टैक्स शादी का 2% नियत कर दिया जिससे तोरण के द्वार पर गरीब राजपूत की बेइज्जती न हो । बाद में 1857 के महान क्रांतिकारी चारण, बारहठ केसरी सिंह ने चारणों को त्याग लेने से मना कर दिया। जिसे बड़े पैमाने पर मान लिया गया परंतु गरीब चारण अपना हक लेते रहे।
चारणों को हाशिये पर धकेलने से हिन्दू योद्धाओं की प्रेरणा को भारी आघात पहुँचा। अंग्रेजो के राज के आते ही स्थिति और खराब हो गयी। अब युद्ध समाप्त हो गए जिससे राजपूत राजा आलसी और आरामपसंद हो गए क्योंकि अंग्रेजों ने शांति स्थापित कर दी। युद्ध बंद होने से चारणों की जरूरत और कद्र दोनों कम हो गयी।
मुग़ल राजपूत युद्ध:

खानवा का युद्ध:

इस युद्ध मे बाबर बड़ी मुश्किल से जीता। एलफिंस्टन लिखता है कि संग्राम सिंह अगर एक दिन पहले हमला कर देता तो भारत का इतिहास बदल जाता। राणा (जिसका एक हाथ, एक आँख और एक पैर काम नही करते थे और शरीर पर अस्सी घाव थे) ने बाबर से हुई आमने सामने की भिड़न्त में बाबर का एक हाथ करीब करीब उड़ा ही दिया था। भयंकर रूप से घायल बाबर अपनी जान बचाने तुरंत पीछे हटा। तोपो, तुलगुमा युद्ध पद्धति और अपने सैनिकों को जिहाद के नाम का वास्ता देकर बाबर किसी प्रकार बड़ी मुश्किल से जीता। युद्ध से पहले बाबर ने कुरान हाथ मे लेकर शराब छोड़ने की कसम खायी। राणा सांगा युद्ध मे हारने पर अत्यंत निराश हो गए थे। ऐसे में एक चारण ठाकुर इनसे मिलने गया जिसको इनके सामन्तो ने बड़ी मुश्किल से इनसे मिलवाया क्योंकि उनको डर था कि ये कहीं फिर से राणा को युद्ध के लिये न उकसा दे। वही हुआ। चारण ने महाभारत का दृष्टांत देकर कहा कि धर्म की रक्षा एक क्षत्रिय का कर्तव्य है चाहे उसमे अपने प्राणों की आहुति ही क्यों न देनी पड़े।उसकी प्रेरणा से राणा सांगा फिर लड़ने को उद्धत हो गया। परंतु राणा के ही सामन्तों ने राणा को जहर दे दिया, यह सोच कर की ये और रक्तपात करवाएगा। इस प्रकार मेवाड़ का राणा संग्राम सिंह, जो कि हिंदुओं का सूर्य था, अस्तांचल को चला गया।
इसी राणा संग्राम सिंह का एक चारण सेनापति हरिदास महियारिया, मुस्लिम शासक महमूद मालवा को युद्ध मे हरा कर बंदी बना लाया जिससे राणा अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने चारण को चित्तौड़ का राज्य ही भेंट में दे दिया। जिसे चारण ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए सिर्फ 12 गांव स्वीकार किये। परंतु ये तथ्य आपको इतिहास की पुस्तकों में मिलेगा न कि पाठ्य पुस्तकों में।

हल्दीघाटी:

हर युद्ध एक प्रयोजन से लड़ा जाता है। दूसरे युद्ध यानी हल्दीघाटी के युद्ध का मुख्य मकसद था राणा सांगा के प्रपौत्र यानी राणा प्रताप का वध । मात्र इसी प्रयोजन से मुगलों ने मेवाड़ पर हमला किया। परंतु मुग़ल इसमे असफल रहे। न तो वे प्रताप को मार पाए और न ही पकड। कहते है कि अकबर इतना नाराज हुआ की उसने छह महीने तक हल्दीघाटी के युद्ध मे मुग़ल सेना के जनरल मान सिंह से बात तक नही की। चूँकि युद्ध के प्रयोजन को सिद्ध नही किया जा सका अतः ये युद्ध हारा हुआ माना जाएगा।
 मेवाड़ के राणाओं का हिंदुओ में वही स्थान है जो इस्लाम मे बगदाद के खलीफा का है अर्थात सिरमौर। जिस अकबर से बगदाद का खलीफा भी थर्राता था उसको महाराणा प्रताप ने बार बार अपमान का घूट पीने को विवश किया। अकबर के साम्राज्य के नक्शे में मेवाड़ एक रक्त बूंद की भाँति स्वतंत्र दिखाई देता था।
इसके अलावा मुग़लो और राजपूतो में कोई खास युद्ध नही हुए। औरंगजेब के समय की एक छोटी लड़ाई में दुर्गादास राठौड़ जब जोधपुर महाराजा बालक अजीत सिंह जी को लेकर आ रहे थे तब मुग़लो से भिड़ंत हुई और मुग़लो को भागना पड़ा। अंग्रेज इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि राठौड़ सामन्त दुर्गादास के साथ एक चारण योद्धा भी था जो अपने दोनों हाथों में तलवारें लेकर बड़ा ही भयंकर युद्ध कर रहा था और अंततः वह भी चंद्रलोक को गया अर्थात वीरगति को प्राप्त हुआ। दुर्गादासजी अजीत सिंह जी को लेकर मारवाड़ आ गए।
अकबर बेहद बुद्धिमान था और तुरंत समझ गया कि हिंदुस्तान में रहकर राजपूतो से लगातार लड़ना मुश्किल है इसलिए उसने आगे बढ़कर वैवाहिक संबंध स्थापित करने की प्रार्थना की।
एकता न होने के कारण अपना स्वाभिमान काफी हद तक खो चुके राजपूतो ने भी समझौता कर लिया। छाती पर पत्थर रख के बेटीयों की बली इन्होंने दी । पर इससे इन्होंने दोनों ओर के हज़ारों निर्दोष लोगों के रक्तपात को भी रोक लिया और इसका श्रेय उनको जाता है और जाना भी चाहिये।
राजपूतों ने स्वयं मुग़लो की बेटियों से कभी विवाह नही किया ताकि उनका स्वयं का वंश खराब न हो। क्योंकि इस्लाम के अनुसार कोई मुस्लिम लड़की सिर्फ मुस्लिम से ही शादी कर सकती है। अतः यदि कोई राजपूत राजा किसी शहजादी से विवाह करता तो उसे पहले इस्लाम कुबूल करना पड़ता। ऐसा करने से तो धर्मपरिवर्तन हो जाता। अतः ऐसा विवाह सम्भव नही था। अतः इस प्रकार का विवाह न करके हिन्दुत्व को जीवित रखा गया।
अकबर का चित्तौड़ अभियान एक पूर्ण रूप से दो सेनाओं के मध्य युद्ध नहीं था। क्योंकि महाराणा उदय सिंह के केवल दो जनरल मेड़तिया राठौड़ जयमल और पत्ता ही वहाँ तैनात थे अपने कुछ 4–5 हज़ार सैनिकों के साथ। बाक़ी ज़्यादातर मज़दूर ही थे क़िले में जब युद्ध हुआ। इसलिए मेवाड़ की सिसोदिया सेना ने युद्ध नही किया। ये पूर्ण रूप से एक तरफा कार्यवाही थी।
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नीदरलैंड की स्कॉलर जेनेट कंफ्रोस्ट जिन्होंने चारणों पर शोध किया।
चारणों के बारे में यदि आप शोध के इच्छुक हों तो जर्मन या नॉर्डिक स्कॉलर्स के लिखे आर्टिकल पढ़ें क्योंकि वे ही इस जाति को ठीक से समझ पाए हैं। इसका कारण है कि ये वाइकिंग्स (8वीं से 11वीं शताब्दि) के वंशज है और वाइकिंग्स भी योद्धा और कवि थे और चारणों के समकालीन भी थे। वाइकिंग्स और चारणों में काफी समानताए है।
चारण  विशुद्ध आर्य थे और इनका उदगम मध्य एशिया बताया जाता है जहां से ये सर्वप्रथम बैक्ट्रीया और हिमालय में आये और वहाँ आकर इन्होंने पुराणों आदि की रचना की। गीता, रामायण, महाभारत सभी मे इनका उल्लेख मिलता है। विद्वान होने के कारण क्षत्रियों ने इनको अपने साथ रखना शुरू कर दिया और राजा पृथु ने इन्हें तैलंग राज्य सौंप दिया जहां से ये पूरे उत्तर भारत मे फैल गए।
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  चारण आर्यों की एक जाति है जो सिंध, राजस्थान और गुजरात में निवास करती है। इस जाति का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। वेदों में चार वर्णो का उल्लेख मिलता है,जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा जी से बताई जाती है। जबकि चारण जाति की उत्पत्ति माता पार्वती से बताई जाती है, इसी कारण ये चारो वर्णो से अलग पांचवा वर्ण है ।
चारण जाति ही एक ऐसी जाति हैं जिसका वर्णन सभी पौराणिक ग्रन्थों में मिलता है, जो अपने गुणों और कर्मो द्वारा युगों-युगों से उच्‍च स्थान रखते आये है। और कलयुग में आज तक उच्‍च और पवित्र है। चारण जाति अपने ईष्ट और काव्य गुण से संसार के सभी राजा महाराजाओं में और पौराणिक काल से लेकर आज तक चारण जाति का इतिहास उनके रचे ग्रन्थ, काव्य, महाकाव्य बहुत सुन्दर, मार्मिक, सच्‍चाई और ओज गुणो वाला रहा है। चारण न केवल काव्य करते बल्की समय-समय पर तलवार के भी धनी थे।
  इस्लाम धर्म  भारत मे उतनी तीव्रता से नही फैला जितना अरब, मिस्र, ईरान, इराक और तुर्की में। आर्यों की भूमि भारतवर्ष में इस्लाम का मुकाबला संसार के सबसे प्राचीन सनातन हिन्दू  धर्म से हुआ और इतिहास गवाह है कि आज 1300 वर्षों के संघर्ष के बाद भी सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप सनातन हिंदू धर्म  बहुल देश है
  इस्लाम के हमले 650 ईसवी से ही शुरू हो गए थे। शुरुआत में राजपूतो के सैकड़ों युद्ध अरब, ईरानी, तूरानी और अफगान मुस्लिम आक्रमणकारियो से हुए और सभी हिंदुओ ने ही जीते।
गुजरात सम्राट नागभट्ट , सम्राट भीमपाल, कश्मीर के सम्राट ललितादित्य, कन्नौज के यशोवर्मन, मेवाड़ के बप्पा रावल और राणा कुम्भा और राणा सांगा, जालौर के वीरम देव सोनगरा, अजमेर के पृथ्वीराज चौहान, चालुक्यों के विक्रमादित्य द्वितीय, देहली के तंवर , कालिंजर के राजाओं आदि ने कई बार मुस्लिम आक्रमणकारियों को हराया परंतु चूंकि भारत एक लोकतंत्र  है इसलिए वोट बैंक का महत्व होने से इन राजाओं का  इतिहास  इसलिए नही पढ़ाया जाता ताकि मुसलमानों को ठेस ना पहुँचे।  इतिहास लिखने मे  हिन्दू राजाओं की वीरता को छुपाया गया है| 
  भारत के इतिहास के एक अति महत्वपूर्ण पन्ने को विदेशियों ने अंधकारपूर्ण युग (dark ages) कह कर गायब ही कर दिया। ये समय था 600 से लेकर 1100 ईस्वी तक का  ये वो समय था जब इस्लाम को भारत मे बार बार हारना पड़ा था। ये हिन्दुओं की विजय का इतिहास था। इसे हिन्दुओ के आत्मबल को तोड़ने के लिए मिटा दिया गया। जब किसी सभ्यता का आत्मबल चला जाता है तब उसे गुलाम बनाने में आसानी रहती है क्योंकि इससे मनोवैज्ञानिक तौर पर वो सभ्यता पंगु हो जाती है और लड़ने की हिम्मत नही जुटा पाती।
हिन्दू धर्म की चारण जाति: चाह-रण
इन युद्धों में हिन्दू सेनाओ की विजय का प्रमुख कारण एक बेहद विशिष्ट जाति थी जो “चारण” कहलाती थी। राजपूत और क्षत्रिय उसे अपने हरावल (vanguard) में रखते थे। हरावल सेना की वो टुकड़ी होती है जो शत्रु से सबसे पहले भिड़ती है। अग्रिम पंक्ति में चारण योद्धाओं को रखा जाता था। इन्हीं के साथ राज चिन्ह, नक्कारे और पताकाऐं चलती थी।
ये योद्धा और कवि दोनों भूमिकाओं का निर्वाह करते थे।
कश्मीर: ( चारणों का प्राचीन निवास स्थान)
जैसे कि, राजपूत शब्द राजा+पूत (अर्थात राजा का पुत्र) से बना है। उसी प्रकार, चारण शब्द चाह + रण से बना है अर्थात वह जो रण या युद्ध की चाह रखता है।
  चारण  एक बेहद खूंख्वार (fierce) जाति थी। ये युद्ध मे काले रंग के वस्त्र धारण करते थे और उन पर पशुबलि का रक्त या लाल रंग लगा होता था। ये दोनों ही हाथों में शस्त्र रखते थे क्योंकि वीरगति प्राप्त करना मोक्ष के समकक्ष समझा जाता था अतः ढाल का उपयोग बहुधा नही किया करते थे। स्त्रियां त्रिशूल धारण करती थी और युद्धों में नेतृत्व करती थी। इनकी वेशभूषा अत्यंत डरावनी होती थी। चारण  दिखने में भी बड़े खूंख्वार होते थे।
 युद्ध मे हारने पर या अपनी जिद पूरी ना होने पर चारण जापान के समुराई योद्धाओं की भाँति स्वयं के शरीर के अंगों को स्वयं ही काट डालते थे और शत्रुओं को श्राप देकर अपनी जीवनलीला स्वयं समाप्त कर देते क्योंकि युद्ध से वापस आना अपमानजनक समझा जाता था ।
चारणों का युद्ध इतिहास पूरी तरह से मिटाने की पुरजोर कोशिश इसलिए हुई क्योंकि युद्ध मे वीरता का सीधा जुड़ाव गौरव से है।क्योंकि बड़ी जातियां ये नही चाहती थी कि कोई ये गौरव उनसे छीने । अतः चारणों को निरंतर हाशिये पर धकेलने की कोशिशें हुई और अभी तक जारी है। 
  चारण  जाति की महिलाओं ने सैकड़ों बार राजपूत सेनाओं का नेतृत्व कर बाहरी आक्रमणकारियो को हराया और वे राजपूतो में पूजनीय होती थी। आपने राजपूत करणी सेना का नाम तो सुना ही होगा।यह  करणी माता चारण जाति में उत्पन्न देवी है। 
चारण जाति  में मोमाय माता का जन्म हुआ। ये महाराष्ट्र में मुम्बादेवी कहलाईं और इन्ही के नाम पर मुंबई शहर का नाम पड़ा।
चारण राजपूतों के गुरू थे और उन्हें बचपन से ही वीरता के संस्कार देते थे। बच्चों को बचपन से ही कविताओं, गीतों और दोहो इत्यादि के द्वारा बताया जाता था कि उनके पूर्वज कितने बड़े योद्धा थे और उन्हें भी ऐसा ही बनना है। ये कवित्त चारण स्वयं लिखते थे और इसमे अतिश्योक्ति जानबूझकर की जाती थी क्योंकि ये मानव का स्वभाव है कि वह महामानव का अनुसरण करता है न कि साधारण मनुष्य का।
 जाति इतिहास लेखक डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार चारण बड़े से बड़े राजा को भी गलत बात पर भरे दरबार मे डाँटने से भी नही हिचकते थे। बड़ी बेबाक और सही राय देते थे चाहे वो कितनी ही बुरी क्यों न लगे। कई बार इसके लिए वे एक विशेष छंद का प्रयोग करते थे जिसे “छंद भुजंग” (serpentine stanza) कहा जाता था। इस दोहे का प्रभाव काले नाग के डसने जैसा होने से ऐसा नाम दिया गया है। सही और निडर राय देने के कारण हर राजपूत राजा और ठाकुर अपने यहाँ चारण को अवश्य आमंत्रित करता था और बड़ी मान मनुहार के बाद चारण सरदार आते थे। इनको जागीरे और बड़े बड़े सम्मान भेंट में देकर राजपूत प्रसन्न रखते  थे और दरबार मे पास में बिठाते थे। 
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