मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के अंतर्गत बसा एक छोटा-सा, पर अत्यंत पवित्र गाँव है - पिंछला। गाँव की पहचान उसकी ऊँची पहाड़ी पर स्थित सुन्दर संकट मोचक हनुमान मंदिर से है। पहाड़ी पर विराजे हनुमान जी का यह धाम न केवल एक मंदिर है, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए विश्वास, विश्राम और शांति का केंद्र है। यहाँ की प्राकृतिक शांति और हनुमान जी की दिव्य मूर्ति हर आने वाले भक्त के मन में एक नई ऊर्जा का संचार करती है।
ऐसे ही पुण्य स्थल पर जन-सुविधा की दृष्टि से एक छोटा सा परन्तु अत्यंत हृदयस्पर्शी सहयोग जुड़ा है - समाजसेवी डॉ. दयाराम जी आलोक का।
डॉ. आलोक जी द्वारा इस मंदिर परिसर में दर्शनार्थियों के बैठने हेतु 3 सीमेंट बेंचों की व्यवस्था तथा मंदिर विकास हेतु 1500/- रुपये नकद का दान प्रदान किया गया। भक्तों, विशेषकर वृद्धजनों और दूर से आने वाले यात्रियों को अब पहाड़ी पर कुछ देर विश्राम करने के लिए एक स्वच्छ और स्थायी स्थान मिल सकेगा। इस सेवा भाव को चिरस्थायी बनाने हेतु मंदिर में एक शिलालेख भी लगाया गया है।
पिंछला गाँव की पावन पहाड़ी,
हनुमान मंदिर की शोभा न्यारी।
संकटमोचक का दिव्य धाम,
भक्तों के मन में जगाता विश्वास तमाम।
यह दान केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि डॉ. आलोक जी के 'आध्यात्मिक दान-पथ' का एक हिस्सा है।
सेवानिवृत्त अध्यापक डॉ. आलोक जी ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण में समर्पित करने का संकल्प लिया है। उनका यह दान-पथ स्व-वित्तपोषित है - जिसमें उनकी पेंशन के साथ-साथ उनके ब्लॉग और यूट्यूब जैसे डिजिटल प्रयासों से गूगल से प्राप्त आय भी सम्मिलित है। तकनीक को परोपकार से जोड़ने का यह एक अनूठा उदाहरण है।
आज उनका सेवा-विस्तार मंदसौर, नीमच, रतलाम, आगर, झालावाड़ और झाबुआ जिलों तक फैला हुआ है। अब तक वे 151 से अधिक मंदिरों, गौशालाओं और मुक्ति धामों में बैठक व्यवस्था, रंग-रोगन और मूलभूत सुविधाओं के लिए निरंतर सहयोग कर चुके हैं। उनका उद्देश्य बड़ा नहीं, बल्कि उपयोगी है - जहाँ लोगों को सबसे ज्यादा जरूरत है, वहीं सुविधा पहुँचाना।
इसी भाव को समर्पित है यह श्लोक -
दानं धर्मस्य मूलं हि,
सेवा लोकहिताय च।
पिंछला हनुमद् धामे,
आलोकस्य कृपा सदा॥
प्रस्तुत लेख में हम आपको पिंछला के इस संकट मोचक हनुमान मंदिर के दर्शन कराएँगे और डॉ. आलोक जी द्वारा किए गए इस पुण्य सहयोग की विस्तृत जानकारी साझा करेंगे।
हनुमान मंदिर पिंछला (शामगढ़) - 3 सीमेंट बेंच + 1500/- नकद सहयोग
मंदिर के शुभचिंतक:मुख्य पुजारी - बगदीराम जी शर्मा
अध्यक्ष - शंकर लाल जी
कमेटी सदस्य - घनश्याम जी परमार
मंदसौर जिले के अंतर्गत गाँव पिंछला
पहाड़ी पर हनुमान जी का सुन्दर मंदिर
संकट मोचक हनुमान मंदिर
डॉ. आलोकजी की तरफ से बैठक व्यवस्था के लिए सिमेन्ट बेंचें और 1500/- नकद दान
पिंछला गाँव की पावन पहाड़ी, हनुमान मंदिर की शोभा न्यारी। संकटमोचक का दिव्य धाम, भक्तों के मन में जगाता विश्वास तमाम।
डॉ. आलोक का दान अनोखा, बेंचों से मिला विश्राम सदा। १५०० नकद संग तीन बेंचें, श्रद्धा का दीप जला निरंतर।
शिलालेख में अंकित नाम, सेवा का अद्भुत यह आयाम। मंदसौर से फैली पुण्य धारा, समाजसेवा का उज्ज्वल नजारा।
श्लोक-
दानं धर्मस्य मूलं हि, सेवा लोकहिताय च। पिंछला हनुमद् धामे, आलोकस्य कृपा सदा॥
हनुमान मन्दिर पिंछ्ला (शामगढ़)
मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के
मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु
समाजसेवी
डॉ.दयाराम जी आलोक
शामगढ़ का
आध्यात्मिक दान पथ
डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।
व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।
सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।
स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।
निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।
पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।


