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30.8.26

"एक राजा जो प्रजा के दिल में बसता है - छत्रपती शिवाजी महाराज

 


सोचिए... एक ऐसा राजा, जिसके पास सोने का सिंहासन था, पर वो जमीन पर बैठकर किसान से बात करता था।
एक ऐसा राजा, जिसकी सेना दुश्मन से लड़ती थी, पर कभी किसी खेत की एक फसल तक नहीं उजाड़ती थी।
एक ऐसा राजा, जो आज से 350 साल पहले चला गया... पर आज भी हर महाराष्ट्रियन के घर में, हर भारतीय के दिल में जिंदा है।
वो कोई कहानी का किरदार नहीं है। वो हैं... हिन्दवी स्वराज्य के संस्थापक... जाणता राजा... छत्रपती शिवाजी महाराज।
और आज हम जानेंगे कि आखिर क्यों, एक राजा... प्रजा के दिल का राजा बन गया।
नमस्कार! स्वराज्य के इस पावन इतिहास में आपका स्वागत है।
छत्रपती शिवाजी महाराज का नाम सुनते ही हमारे मन में एक तस्वीर आती है। घोड़े पर सवार, हाथ में तलवार, भगवा ध्वज लहराता हुआ एक योद्धा।
लेकिन क्या शिवाजी महाराज सिर्फ एक योद्धा थे? क्या वो सिर्फ एक कुशल सेनापति थे?
नहीं।
अगर वो सिर्फ योद्धा होते, तो इतिहास में कई योद्धा आए और चले गए, उन्हें भुला दिया जाता। शिवाजी महाराज को भुलाया नहीं जा सका, क्योंकि वो एक योद्धा से बढ़कर एक विचार थे। एक व्यवस्था थे। एक भरोसा थे।
आज इस वीडियो में हम उनके जीवन परिचय को सिर्फ तारीखों में नहीं, बल्कि उनके उन फैसलों में देखेंगे, जिन्होंने उन्हें प्रजा के दिल में बसाया।
जन्म और संस्कार - जिजाबाई की भूमिका
कहानी शुरू होती है 19 फरवरी 1630 से। जगह... पुणे के पास शिवनेरी किला।
पिता शाहजी भोसले, जो बीजापुर सल्तनत के एक पराक्रमी सरदार थे। और माता... राजमाता जिजाबाई।
और यहीं पर पहला रहस्य छिपा है। शिवाजी को राजा शाहजी ने नहीं, जिजाबाई ने बनाया।
जब शाहजी बीजापुर की राजनीति में व्यस्त थे, तब जिजाबाई ने अकेले ही पुणे की जहागीर संभाली। उन्होंने ही शिवबा को रामायण, महाभारत, और महाभारत के वीरों की कहानियां सुनाईं।
उन्होंने अपने बेटे को सिखाया... बेटा, सोने की चम्मच से नहीं, मिट्टी से प्यार करना सीखो। इस मिट्टी पर जो रहता है, वही तुम्हारा अपना है।
गुरु दादोजी कोंडदेव ने उन्हें युद्धनीति, घुड़सवारी, तलवारबाजी और राजनीति सिखाई। पर जिजाबाई ने उन्हें एक मंत्र दिया... रयतेचा राजा हो। प्रजा का राजा बनो।
सिर्फ 15 साल की उम्र में, 1645 में, शिवाजी ने रोहिडेश्वर के मंदिर में अपने मावलों के साथ मिलकर हिन्दवी स्वराज्य की शपथ ली। ये शपथ किसी सिंहासन के लिए नहीं थी। ये शपथ थी, इस मिट्टी पर रहने वाले हर गरीब, हर किसान, हर महिला के स्वाभिमान के लिए।
एक अलग तरह का राजा 
उस समय का भारत देखिए। चारों तरफ सल्तनतें थीं। मुगल, आदिलशाही, कुतुबशाही। हर जगह एक ही नियम था। राजा... प्रजा से कर वसूलता है। और प्रजा... राजा से डरती है।
शिवाजी महाराज ने इस नियम को ही पलट दिया।
उनके राज्य में दो सबसे बड़े नियम थे।
पहला नियम... औरत की इज्जत।
एक प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। जब कल्याण के सूबेदार की बहू को मराठा सैनिक सम्मान के साथ शिवाजी के सामने लाए, तो सोचा कि राजा खुश होगा। शिवाजी महाराज ने उस महिला को अपनी माँ कहकर संबोधित किया और पूरे सम्मान के साथ, वस्त्र और आभूषण देकर वापस भेज दिया। और अपने सैनिकों को कड़ा संदेश दिया... पराई स्त्री माता समान है। जो इस नियम को तोड़ेगा, उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।
दूसरा नियम... किसान की फसल।
उस दौर में सेनाएं जहां से गुजरती थीं, फसलों को रौंद देती थीं। शिवाजी महाराज का स्पष्ट आदेश था... किसी भी मावले को, किसी भी सैनिक को, किसान की फसल को हाथ लगाने का अधिकार नहीं है। अगर सेना को अनाज चाहिए, तो बाकायदा कीमत देकर खरीदा जाएगा। अगर कोई सैनिक जबरदस्ती करेगा, तो उसे सजा मिलेगी।
इसी कारण, किसान उन्हें राजा नहीं, अपना भाई, अपना बेटा मानते थे। जब शिवाजी की सेना आती थी, तो गाँव के लोग डरकर भागते नहीं थे, बल्कि आरती लेकर स्वागत करते थे। यही वो कारण था, जो उन्हें प्रजा के दिल में बसाता था।
इस विषय पर एक बहुत गहरी बात कही गई है।
जाने माने इतिहासवेत्ता डॉ. दयाराम आलोक लिखते हैं ----- "छत्रपती शिवाजी महाराज का स्वराज्य, तलवार से जीता गया प्रदेश नहीं था, बल्कि विश्वास से जीता गया हृदयों का साम्राज्य था। उन्होंने किले तो जीते ही, पर उससे पहले उन्होंने लोगों का भरोसा जीता। इसीलिए उनका राज्य नक्शे पर नहीं, लोगों के मन में बसता था।"
कितनी सटीक बात है। उन्होंने हृदयों का साम्राज्य जीता।
युद्धनीति नहीं, बुद्धिनीति - गनिमी कावा]
अब बात करते हैं उनकी वीरता की। शिवाजी के पास कभी मुगलों जैसी बड़ी सेना नहीं थी। औरंगजेब के पास लाखों सैनिक थे। शिवाजी के पास कुछ हजार मावले थे।
तो वो जीते कैसे?
उन्होंने गनिमी कावा... यानी गुरिल्ला युद्ध पद्धति का उपयोग किया। वो जानते थे कि ताकतवर दुश्मन को उसकी ताकत से नहीं, उसकी कमजोरी से हराया जाता है।
सह्याद्री के पहाड़, घने जंगल, और किले... यही उनकी सेना थी।
अफजल खान का वध... 1659। आदिलशाह ने अपने सबसे क्रूर सरदार अफजल खान को भेजा। उसने कहा... मैं शिवाजी को जिंदा या मुर्दा लेकर आऊंगा। वो प्रतापगढ़ आया। शिवाजी जानते थे कि खुली लड़ाई में वो नहीं जीत सकते। उन्होंने कूटनीति का सहारा लिया। मुलाकात का नाटक किया। और जब अफजल खान ने धोखे से वार किया, तो शिवाजी ने बाघनख से उसका वध कर दिया। ये सिर्फ ताकत नहीं, बुद्धि की जीत थी।
फिर आगरा से पलायन... 1666। औरंगजेब ने उन्हें कैद कर लिया। दुनिया ने सोचा, अब स्वराज्य खत्म। पर शिवाजी मिठाई के टोकरों में छिपकर अपने बेटे संभाजी के साथ निकल गए। ये दुनिया के इतिहास के सबसे साहसिक पलायनों में से एक है।
और फिर... शाइस्ता खान पर हमला। 1663 में। शाइस्ता खान पुणे में उसी लाल महल में रुका था, जहाँ शिवाजी का बचपन बीता था। रात के अंधेरे में, सिर्फ 400 चुनिंदा मावलों के साथ शिवाजी ने हमला किया। शाइस्ता खान अपनी तीन उंगलियां गंवाकर भाग गया।
इन घटनाओं ने एक संदेश दिया... ये राजा हार मानने वाला नहीं है। ये अपने लोगों के लिए कुछ भी कर सकता है।
राज्याभिषेक और प्रशासन - एक आदर्श शासक]
6 जून 1674। रायगढ़ किला।
उस दिन सिर्फ एक राजा का राज्याभिषेक नहीं हो रहा था। उस दिन सदियों की गुलामी के बाद, इस मिट्टी के एक बेटे ने खुद को छत्रपती घोषित किया। काशी के विद्वान गागा भट्ट ने उनका राज्याभिषेक किया।
लेकिन राज्याभिषेक के बाद उन्होंने क्या किया? उन्होंने सोने-चांदी के महल नहीं बनवाए। उन्होंने अष्टप्रधान मंडल बनाया। यानी आठ मंत्रियों की एक परिषद। पेशवा, अमात्य, सचिव... हर विभाग का एक विशेषज्ञ। ये आज की कैबिनेट सिस्टम जैसा ही था।
उन्होंने पहली बार नौसेना... भारतीय नौसेना की नींव रखी। उन्हें भारतीय नौसेना का जनक कहा जाता है। उन्होंने सिंधुदुर्ग और विजयदुर्ग जैसे समुद्री किले बनवाए। क्योंकि वो जानते थे, जो समुद्र पर राज करेगा, वही भारत पर राज करेगा।
उनका प्रशासन... कर प्रणाली बहुत ही न्यायपूर्ण थी। उन्होंने जमींदारी प्रथा को खत्म किया। सीधे किसानों से कर लिया जाता था। और अकाल के समय कर माफ भी कर दिया जाता था।
3 अप्रैल 1680 को, 50 साल की उम्र में, रायगढ़ में शिवाजी महाराज ने देह त्याग दी।
शरीर चला गया। पर विचार नहीं गया।
आज भी, जब कोई नेता, कोई अधिकारी, कोई युवा, ईमानदारी और न्याय की बात करता है, तो उसे शिवाजी महाराज का उदाहरण दिया जाता है।
क्यों? क्योंकि उन्होंने हमें सिखाया कि राजा होना... ताकत का प्रतीक नहीं है। राजा होना... जिम्मेदारी का प्रतीक है।
एक राजा... जो प्रजा के दिल में बसता है... वो कभी मरता नहीं है।
अगर आपको ये कहानी, स्वराज्य की ये गाथा, दिल को छू गई हो, तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर कीजिए।
कमेंट में... जय भवानी, जय शिवाजी... जरूर लिखिए, ताकि ये स्वराज्य की गर्जना हर कोने तक पहुंचे।
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मैं मिलता हूँ आपसे अगले वीडियो में, एक और ऐसे ही जाणता राजा की कहानी के साथ।
जय हिन्द। जय महाराष्ट्र।

28.8.26

"वो कभी झुका नहीं, वो कभी रुका नहीं - महाराणा प्रताप"

                                 

सोचिए...
एक राजा... जिसके पास न महल था... न सेना थी... न खजाना था...
फिर भी... हिंदुस्तान के सबसे ताकतवर बादशाह अकबर ने उसे कभी हरा नहीं पाया!
घास की रोटी खाई... जंगलों में सोया...
लेकिन... मेवाड़ की मिट्टी का सौदा नहीं किया।
मैं बात कर रहा हूँ... मेवाड़ के शेर... वीर शिरोमणि... महाराणा प्रताप की...
जो कभी झुका नहीं... और कभी रुका नहीं।
नमस्कार, मैं हूँ डॉ . दयाराम आलोक और आप देख रहे हैं gyanoday
आज की कहानी है... स्वाभिमान की... शौर्य की... और एक ऐसे योद्धा की... जिसने इतिहास को बता दिया... कि जीत तलवार से नहीं... हौसले से मिलती है।
जन्म और संकल्प
9 मई 1540... मेवाड़ के कुम्भलगढ़ किले में... महाराणा उदय सिंह के घर जन्म हुआ... प्रताप का।
बचपन से ही... निडर... घुड़सवारी में माहिर... और तलवार का धनी।
1572 में... जब वो मेवाड़ के राजा बने... तब सामने थी... अकबर की विशाल सल्तनत।
अकबर का प्रस्ताव था - संधि कर लो... मेरा आधिपत्य स्वीकार कर लो... सुख से रहो।
पर प्रताप का जवाब था - मेवाड़ स्वतंत्र था... है... और रहेगा।
 हल्दीघाटी का युद्ध - [यहाँ आपका कोट शामिल है]
और फिर आया... 18 जून 1576 का वो दिन... हल्दीघाटी का युद्ध।
एक तरफ... अकबर की 80 हजार की सेना... मानसिंह के नेतृत्व में...
दूसरी तरफ... महाराणा प्रताप के सिर्फ 20 हजार वीर।
यहीं पर इतिहास ने... चेतक का बलिदान देखा।
जैसा कि भारतीय इतिहास के जानकार डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार --- "हल्दीघाटी का युद्ध केवल दो सेनाओं का युद्ध नहीं था, यह दो विचारधाराओं का युद्ध था। एक तरफ साम्राज्यवाद था, दूसरी तरफ स्वाभिमान। महाराणा प्रताप भले ही रणभूमि से हटे, पर वे हारे नहीं। उन्होंने अकबर की अधीनता को कभी स्वीकार नहीं किया, यही उनकी सबसे बड़ी जीत थी।"
सच है... युद्ध अनिर्णायक रहा... पर अकबर मेवाड़ को कभी जीत नहीं पाया।
 संघर्ष के दिन
युद्ध के बाद... प्रताप ने जंगल-जंगल भटकना स्वीकार किया...
उनके परिवार ने घास की रोटियां खाईं... पर कभी... अकबर के सामने सिर नहीं झुकाया।
कहते हैं... एक बार... उनकी बेटी के हाथ से घास की रोटी... जंगली बिल्ली छीन ले गई... और वो रो पड़ी...
यह सुनकर प्रताप का दिल पसीज गया... उन्होंने अकबर को पत्र लिखने का सोचा... पर तभी... पृथ्वीराज राठौड़ का पत्र आया... "क्षत्रिय का धर्म समझौता नहीं... संघर्ष है।"
और प्रताप फिर उठ खड़े हुए।
उन्होंने... भामाशाह के सहयोग से... फिर से सेना बनाई... और मेवाड़ के एक-एक किले को... वापस जीत लिया... चित्तौड़ को छोड़कर।
6. OUTRO - प्रेरणा
19 जनवरी 1597... एक शिकार दुर्घटना में... ये महान योद्धा... हमें छोड़कर चला गया...
पर वो हमें एक संदेश दे गया...
कि... सुविधाएं छोड़ना आसान है... पर स्वाभिमान छोड़ना... मृत्यु के समान है।
वो कभी झुका नहीं... क्योंकि उसके लिए देश पहले था...
वो कभी रुका नहीं... क्योंकि उसका लक्ष्य स्वतंत्रता था।
अगर आपको लगता है... कि महाराणा प्रताप की ये कहानी... हर भारतीय युवा तक पहुँचनी चाहिए...
तो इस वीडियो को... एक लाइक जरूर कीजिए।
कमेंट में... जय महाराणा प्रताप... लिखना मत भूलिएगा... ताकि मुझे भी पता चले... आप कितने गर्व से इतिहास को याद करते हैं।
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जय मेवाड़... जय महाराणा प्रताप!

भीष्म पितामह की दर्दनाक कथा: एक प्रतिज्ञा, जिसने सब बर्बाद कर दिया

 भीष्म पितामह की दर्दनाक कथा



क्या कोई प्रतिज्ञा इतनी भारी हो सकती है कि उसकी कीमत पूरे साम्राज्य को अपने खून से चुकानी पड़े? क्या कोई इंसान इतना शक्तिशाली हो सकता है कि साक्षात मृत्यु भी उसकी अनुमति के बिना उसे छू न सके, लेकिन फिर भी वो इतिहास का सबसे लाचार और बेबस इंसान बनकर जिए? महाभारत के युद्ध में अर्जुन के गांडीव से छूटे तीर जब एक-एक करके देवव्रत के सीने में समा रहे थे और जब उनका पूरा शरीर तीरों की शैया पर टिक गया, तब उनके मन में क्या चल रहा था? क्या उन्हें अपनी उस प्रतिज्ञा पर पछतावा हो रहा था जिसने हस्तिनापुर के सिंहासन को सुरक्षित करने के बजाय, उसे हमेशा के लिए श्मशान बना दिया? आज हम गंगापुत्र भीष्म की उसी दर्दनाक और विचलित कर देने वाली महागाथा को जानेंगे, जहाँ एक बेटा अपने पिता की खुशी के लिए अपना सर्वस्व दान कर देता है, लेकिन नियति उस दान के बदले में उसे इतिहास का सबसे बड़ा खलनायक या सबसे बेबस गवाह बना देती है।
इस कहानी की शुरुआत होती है हस्तिनापुर के प्रतापी राजा शांतनु से, जो एक दिन गंगा के किनारे टहल रहे थे और उनकी नजर साक्षात नदी सूक्त की देवी गंगा पर पड़ी। शांतनु उनके रूप पर मोहित हो गए और विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा ने विवाह तो स्वीकार किया, लेकिन एक भयानक शर्त रखी कि राजा कभी उनके किसी काम पर सवाल नहीं उठाएंगे, जिस दिन सवाल उठाया, गंगा उन्हें छोड़कर चली जाएगी। प्यार में डूबे शांतनु ने शर्त मान ली। इसके बाद जो हुआ, उसने शांतनु के कलेजे को चीर कर रख दिया। गंगा के गर्भ से जो भी संतान जनमती, गंगा उसे अपने ही हाथों नदी की तेज धार में बहा देती। एक-एक करके सात बेटों को गंगा ने नदी में विसर्जित कर दिया और राजा शांतनु अपने वचन में बंधे होने के कारण कुछ न बोल सके। लेकिन जब आठवां बेटा हुआ और गंगा उसे भी नदी में बहाने चली, तो शांतनु का सब्र टूट गया। उन्होंने गंगा का हाथ पकड़ लिया और कहा कि तुम कैसी मां हो जो अपनी ही संतानों की हत्या कर रही हो? शांतनु के इस सवाल के साथ ही गंगा की शर्त टूट गई। गंगा ने मुस्कुराकर कहा कि राजन, ये आठों वसु थे जिन्हें वसिष्ठ ऋषि का श्राप था, मैंने सात को जल्दी मुक्त कर दिया, लेकिन इस आठवें को मैं अपने साथ ले जा रही हूँ, इसे मैं पालकर तुम्हें वापस सौंप दूंगी। यही आठवां पुत्र देवव्रत बना, जिसे हम भीष्म के नाम से जानते हैं।


देवव्रत को साक्षात भगवान परशुराम ने अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी और देवगुरु बृहस्पति ने उन्हें राजनीति और वेदों का ज्ञान दिया। जब देवव्रत सर्वगुण संपन्न होकर हस्तिनापुर लौटे, तो राजा शांतनु की खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने तुरंत देवव्रत को युवराज घोषित कर दिया। पूरा हस्तिनापुर अपने नए होने वाले राजा की योग्यता देखकर झूम रहा था। लेकिन नियति ने हस्तिनापुर के भाग्य में कुछ और ही लिखा था। एक दिन राजा शांतनु यमुना नदी के तट पर घूम रहे थे, जहाँ उनकी नजर केवटराज की अत्यंत सुंदर पुत्री सत्यवती पर पड़ी। शांतनु एक बार फिर प्रेम के जाल में बंध गए और उन्होंने केवटराज से सत्यवती का हाथ मांग लिया। लेकिन केवटराज एक चतुर और दूरदर्शी व्यक्ति थे। उन्होंने राजा के सामने एक ऐसी शर्त रख दी जिसने शांतनु के पैरों तले से जमीन खिसका दी। केवटराज ने कहा कि राजा शांतनु, मुझे आपकी रानी बनने में अपनी बेटी की कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मेरी एक शर्त है कि आपकी मृत्यु के बाद हस्तिनापुर के सिंहासन पर मेरी बेटी सत्यवती की संतान ही बैठेगी, आपका बड़ा बेटा देवव्रत नहीं। शांतनु देवव्रत से अगाध प्रेम करते थे और वे जानते थे कि देवव्रत जैसा योग्य राजा हस्तिनापुर को कभी नहीं मिल सकता। उन्होंने केवटराज की इस अनुचित मांग को ठुकरा दिया और उदास मन से महल लौट आए।
राजा शांतनु अंदर ही अंदर घुटने लगे। वे न तो सत्यवती को भूल पा रहे थे और न ही अपने प्रिय पुत्र देवव्रत के साथ अन्याय कर पा रहे थे। उनकी यह उदासी और गिरता स्वास्थ्य देवव्रत से छुपा न रहा। देवव्रत ने राजा के सारथी से सारी बात उगलवा ली और बिना किसी को बताए, वे सीधे केवटराज के पास पहुंच गए। देवव्रत ने केवटराज से कहा कि हे केवटराज, आप अपनी पुत्री का विवाह मेरे पिता से कर दीजिए, मैं स्वतः ही हस्तिनापुर के सिंहासन का त्याग करता हूँ और प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं कभी राजा नहीं बनूँगा। केवटराज ने देवव्रत की इस उदारता को देखा, लेकिन वे फिर भी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने देवव्रत से एक और तीखा सवाल किया कि कुमार, आप तो महान हैं, आपने सिंहासन छोड़ दिया, लेकिन कल को जब आपकी संतानें होंगी, तो वे बहुत शक्तिशाली होंगी। क्या इस बात की गारंटी है कि आपके पुत्र मेरी बेटी के पुत्रों से सिंहासन नहीं छीनेंगे? तब क्या होगा? केवटराज का यह सवाल सुनते ही देवव्रत के भीतर का क्षत्रिय और एक समर्पित पुत्र जाग उठा। उन्होंने आकाश की तरफ देखा और पंचभूतों को गवाह मानकर एक ऐसी भीषण प्रतिज्ञा ली जिसकी गूंज आज हजारों साल बाद भी सुनाई देती है। देवव्रत ने कहा कि हे केवटराज, मैं आज इस भरी सभा में यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा, मैं कभी विवाह नहीं करूँगा और मेरी कोई संतान नहीं होगी। इस भयानक प्रतिज्ञा को सुनते ही देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और चारों तरफ एक ही आवाज गूंज उठी—भीष्म! भीष्म! यानी जिसने इतनी कठिन और भीषण प्रतिज्ञा ली हो।
जब शांतनु को इस बात का पता चला, तो वे रो पड़े। उन्होंने अपने पुत्र के इस महान त्याग को देखकर भावुक होकर उन्हें एक वरदान दिया—इच्छा मृत्यु का वरदान। शांतनु ने कहा कि पुत्र देवव्रत, तुमने मेरे लिए अपना पूरा जीवन, अपना सुख और अपना वंश दांव पर लगा दिया, इसलिए जब तक तुम खुद नहीं चाहोगे, मृत्यु तुम्हारे पास फटक भी नहीं सकेगी। लेकिन यहाँ पर इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना शुरू होती है। पौराणिक कथाओं के जानकार डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार, भीष्म की यह प्रतिज्ञा केवल एक पुत्र का अपने पिता के प्रति प्रेम नहीं थी, बल्कि हस्तिनापुर के भविष्य को अंधकार में धकेलने वाली एक ऐसी भूल थी जिसने कुरुवंश को अंतहीन विवादों में फंसा दिया। डॉ. दयाराम आलोक का मानना है कि यदि भीष्म ने वह प्रतिज्ञा न की होती, तो हस्तिनापुर को एक न्यायप्रिय और शक्तिशाली राजा मिलता, साम्राज्य कभी कमजोर हाथों में न जाता और न ही महाभारत का वह विनाशकारी युद्ध होता जिसने लाखों महिलाओं को विधवा और पूरे भारतवर्ष को अनाथ कर दिया। भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा से अपने पिता को तो सुखी कर दिया, लेकिन उन्होंने राज्य के प्रति अपने राजधर्म को भुला दिया।
इसके बाद शांतनु और सत्यवती का विवाह हुआ। उनके दो पुत्र हुए—चित्रांगद और विचित्रवीर्य। लेकिन नियति का खेल देखिए, राजा शांतनु की मृत्यु के कुछ समय बाद ही चित्रांगद एक गंधर्व युद्ध में मारे गए। अब सिंहासन पर विचित्रवीर्य को बैठाया गया, जो स्वभाव से बहुत कमजोर और विलासी थे। जब विचित्रवीर्य के विवाह की उम्र आई, तो भीष्म को पता चला कि काशीराज की तीन पुत्रियों—अंबा, अंबिका और अंबालिका का स्वयंवर हो रहा है। भीष्म हस्तिनापुर के साम्राज्य को सुरक्षित और शक्तिशाली बनाए रखने के लिए अकेले ही काशी पहुंच गए। उन्होंने वहाँ मौजूद सभी राजाओं को युद्ध में परास्त कर दिया और तीनों राजकुमारियों का बलपूर्वक हरण करके हस्तिनापुर ले आए। भीष्म को लगा कि उन्होंने अपने भाई के लिए बहुत बड़ा काम किया है, लेकिन यहीं से उनके जीवन का पहला बड़ा श्राप और दर्द शुरू हुआ। जब महल में विवाह की तैयारियां हो रही थीं, तब बड़ी राजकुमारी अंबा भीष्म के पास आई और रोते हुए कहा कि हे गांगेय, मैं मन ही मन शाल्व देश के राजा को अपना पति मान चुकी हूँ और वे भी मुझसे प्रेम करते हैं, आप मुझे बलपूर्वक यहाँ ले आए, लेकिन मेरा मन उनके पास ही है। भीष्म जो धर्म के ज्ञाता थे, उन्होंने अंबा की बात का सम्मान किया और उन्हें पूरे सम्मान के साथ राजा शाल्व के पास भेज दिया।
लेकिन दर्द की दास्तान यहाँ खत्म नहीं हुई। जब अंबा राजा शाल्व के पास पहुँची, तो शाल्व ने उसे अपनाने से साफ मना कर दिया। शाल्व ने कहा कि जिसे भीष्म ने युद्ध में जीतकर अपने रथ पर बैठाया हो, उसे मैं अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। तुम वापस भीष्म के पास जाओ। अंबा असहाय होकर वापस हस्तिनापुर भीष्म के पास आई और उसने भीष्म से कहा कि अब मेरा कोई आसरा नहीं है, इसलिए आप ही मुझसे विवाह कीजिए। लेकिन भीष्म अपनी भीषण प्रतिज्ञा से बंधे हुए थे। उन्होंने कहा कि हे देवी, मैं चाहकर भी तुमसे विवाह नहीं कर सकता क्योंकि मैंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है। अंबा ने भीष्म से बहुत मिन्नतें कीं, रोई-चिल्लाई, लेकिन भीष्म टस से मस नहीं हुए। क्रोध और अपमान की आग में जलती हुई अंबा ने भीष्म को श्राप दिया कि भीष्म, तुम्हारी इस प्रतिज्ञा के कारण आज मेरा जीवन नष्ट हो गया है, मेरा यह अपमान ही तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा। मैं अगले जन्म में लौटकर आऊँगी और तुम्हारी मौत का जरिया बनूँगी। यही अंबा अगले जन्म में राजा द्रुपद के यहाँ शिखंडी के रूप में पैदा हुई, जो महाभारत के युद्ध में भीष्म की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बना।
समय बीतता गया और भीष्म के जीवन का दर्द गहराता गया। विचित्रवीर्य की भी बिना किसी संतान के असमय मृत्यु हो गई। अब सत्यवती के सामने संकट था कि कुरुवंश का नाम कैसे आगे बढ़े? सत्यवती ने गिड़गिड़ाते हुए भीष्म से कहा कि पुत्र भीष्म, अब तुम अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दो और कुरुवंश को बचाने के लिए विवाह कर लो या नियोग प्रथा से संतान उत्पन्न करो। लेकिन भीष्म ने कहा कि माता, सूरज अपनी रोशनी छोड़ सकता है, धरती अपना धैर्य छोड़ सकती है, लेकिन भीष्म अपनी प्रतिज्ञा कभी नहीं तोड़ सकता। अंततः महर्षि वेदव्यास के आशीर्वाद से अंबिका और अंबालिका से धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म हुआ। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे और पांडु अस्वस्थ। भीष्म ने इन दोनों बच्चों को पाला-पोषा, उन्हें बड़ा किया और हस्तिनापुर को संभाला। भीष्म अब राजा नहीं थे, वे केवल सिंहासन के संरक्षक थे। वे एक ऐसी प्रतिज्ञा के पिंजरे में बंद हो चुके थे जहाँ से वे कुरुवंश को बिखरते हुए देख तो सकते थे, लेकिन अपनी शर्तों के कारण उसे रोक नहीं पा रहे थे।
जब कुरुवंश की अगली पीढ़ी यानी कौरव और पांडव बड़े हुए, तो भीष्म का दर्द और बढ़ गया। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र यानी कौरव, विशेषकर दुर्योधन, बचपन से ही ईर्ष्या और अहंकार से भरे हुए थे। भीष्म दोनों पक्षों से प्यार करते थे, लेकिन दुर्योधन हमेशा भीष्म पर यह आरोप लगाता था कि वे पांडवों का पक्ष लेते हैं। भीष्म जो पूरे आर्यावर्त के सबसे शक्तिशाली योद्धा थे, अपने ही घर में रोज अपमानित हो रहे थे। वे देख रहे थे कि कैसे दुर्योधन और शकुनि मिलकर पांडवों के खिलाफ षड्यंत्र रच रहे हैं। लाक्षागृह की घटना हो या पांडवों को जुए में हराने की साजिश, भीष्म सब कुछ जानते हुए भी असहाय थे। क्यों? क्योंकि उनकी प्रतिज्ञा ने उनके हाथ बांध दिए थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जो भी हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठेगा, वे उसके प्रति वफादार रहेंगे और उसकी आज्ञा का पालन करेंगे। सिंहासन पर धृतराष्ट्र बैठे थे, जो अपने पुत्र दुर्योधन के मोह में अंधे थे। इसलिए दुर्योधन जो भी पाप करता, भीष्म उसे राजधर्म की दुहाई देकर रोकने की कोशिश तो करते, लेकिन जब दुर्योधन उनकी बात नहीं मानता, तो भीष्म सिर झुकाकर बैठ जाते।
भीष्म के जीवन का सबसे काला और सबसे दर्दनाक अध्याय तब आया, जब हस्तिनापुर की भरी सभा में कुरुवंश की कुलवधू द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था। दुशासन द्रौपदी के बाल पकड़कर उसे खींचते हुए ला रहा था, शकुनि हंस रहा था, दुर्योधन अपनी जांघ ठोक रहा था, और द्रौपदी रोते हुए, चिल्लाते हुए कुरुवंश के सबसे बड़े बुजुर्ग भीष्म पितामह की तरफ देखकर न्याय की भीख मांग रही थी। द्रौपदी ने भीष्म से पूछा कि हे पितामह, आप तो धर्म के प्रतीक हैं, शास्त्रों के ज्ञाता हैं, मुझे बताइए कि क्या धर्मराज युधिष्ठिर खुद को हारने के बाद मुझे दांव पर लगा सकते थे? क्या इस तरह एक स्त्री का अपमान कुरुसभा की परंपरा है? उस समय भीष्म पितामह ने अपना सिर नीचे झुका लिया। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकला। उन्होंने केवल इतना कहा कि हे पुत्री, धर्म की गति बहुत सूक्ष्म है, मैं इस समय असमर्थ हूँ। इतिहास ने भीष्म को उस दिन कभी माफ नहीं किया। भीष्म की वह चुप्पी उनके जीवन का सबसे बड़ा पाप बन गई। साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने बाद में भीष्म से कहा था कि पितामह, जिस सभा में स्त्री का अपमान हो रहा हो, और वहाँ बैठा कोई ज्ञानी व्यक्ति यदि अपनी प्रतिज्ञा या नियमों की दुहाई देकर चुप रहे, तो वह भी उस पाप का बराबर का भागीदार बन जाता है। भीष्म का वह मौन कुरुवंश के विनाश का डेथ वारंट था।
और अंततः वह घड़ी आ ही गई जिसका डर सबको था—महाभारत का युद्ध। एक तरफ धर्म के प्रतीक पांडव थे जिनके साथ साक्षात नारायण यानी श्रीकृष्ण थे, और दूसरी तरफ अधर्म के प्रतीक कौरव थे। भीष्म पितामह जानते थे कि कौरव अधर्म पर हैं और उनका विनाश निश्चित है, लेकिन कुरु सिंहासन के प्रति अपनी वफादारी की प्रतिज्ञा के कारण उन्हें कौरवों की तरफ से लड़ना पड़ा। युद्ध की शुरुआत से पहले जब अर्जुन और युधिष्ठिर पितामह के पैर छूकर आशीर्वाद लेने आए, तो भीष्म की आंखों में आंसू थे। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि पुत्र, मेरा शरीर कौरवों के अन्न से पला है, इसलिए मैं लड़ूँगा तो उनकी तरफ से, लेकिन मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है कि विजय तुम्हारी ही हो। सोचिए, उस योद्धा की मानसिक स्थिति क्या रही होगी जिसे पता है कि वह जिसके लिए लड़ रहा है वह गलत है, और वह जिन्हें मार रहा है वे उसके अपने पोते हैं जिन्हें उसने अपनी गोद में खिलाया था।
युद्ध के पहले दस दिनों तक भीष्म ने पांडव सेना में कोहराम मचा दिया। कोई भी योद्धा उनके सामने टिक नहीं पा रहा था। दुर्योधन ने फिर भी भीष्म पर ताना मारा कि पितामह आप जानबूझकर पांडवों को नहीं मार रहे हैं क्योंकि आप उनसे प्यार करते हैं। इस अपमान से दुखी होकर भीष्म ने प्रतिज्ञा की कि कल या तो मैं अर्जुन का वध कर दूँगा या श्रीकृष्ण को शस्त्र उठाने पर मजबूर कर दूँगा, जिन्होंने युद्ध में हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा की है। अगले दिन भीष्म ने ऐसा भयंकर युद्ध किया कि अर्जुन के रथ के घोड़े घायल हो गए और अर्जुन असहाय हो गए। अपने भक्त अर्जुन के प्राण संकट में देखकर भगवान श्रीकृष्ण अपना आपा खो बैठे। वे रथ का एक पहिया उठाकर भीष्म की तरफ दौड़े। भीष्म ने जब भगवान को अपनी तरफ आते देखा, तो उन्होंने अपने धनुष-बाण रख दिए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। भीष्म ने कहा कि आइए प्रभु, यदि आपके हाथों मेरी मृत्यु होती है, तो मुझसे ज्यादा भाग्यशाली इस संसार में कोई नहीं होगा। श्रीकृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी, लेकिन भीष्म की इच्छा पूरी कर दी।
पांडव समझ गए थे कि जब तक भीष्म पितामह के हाथ में धनुष है, तब तक युद्ध जीतना नामुमकिन है। तब श्रीकृष्ण के इशारे पर युधिष्ठिर खुद भीष्म के पास पहुंचे और उनसे उनकी मृत्यु का उपाय पूछा। भीष्म ने मुस्कुराते हुए कहा कि पुत्र, मैं किसी भी ऐसे व्यक्ति पर शस्त्र नहीं उठाता जो कभी स्त्री रहा हो या जिसका व्यवहार स्त्री जैसा हो। तुम कल युद्ध में अर्जुन के रथ के आगे शिखंडी को खड़ा कर देना। अगले दिन कुरुक्षेत्र के मैदान में वही हुआ। अंबा का अगला जन्म, यानी शिखंडी, अर्जुन के रथ के आगे आकर खड़ा हो गया। जैसे ही भीष्म ने शिखंडी को देखा, उन्होंने अंबा के उस श्राप को याद किया और अपना धनुष नीचे रख दिया। भीष्म ने अस्त्र त्याग दिए थे, लेकिन अर्जुन के पास अब कोई चारा नहीं था। श्रीकृष्ण के आदेश पर अर्जुन ने शिखंडी के पीछे से भीष्म पर तीरों की बौछार कर दी। सैकड़ों तीर भीष्म के सीने और पूरे शरीर के पार हो गए। महाबली भीष्म रथ से नीचे गिर पड़े। लेकिन उनका शरीर जमीन पर नहीं गिरा। उनके शरीर में इतने तीर धंसे हुए थे कि तीरों का एक बेड यानी सरशैया बन गई।
जब पितामह भीष्म गिरे, तो कौरव और पांडव दोनों पक्षों के योद्धा युद्ध रोककर उनके पास दौड़ पड़े। भीष्म का सिर नीचे लटक रहा था। उन्होंने कहा कि मुझे सिर टिकाने के लिए तकिया चाहिए। दुर्योधन दौड़कर रेशमी तकिए ले आया, लेकिन भीष्म ने मुस्कुराकर मना कर दिया। उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा। अर्जुन ने रोते हुए गांडीव से तीन बाण धरती में मारे, जिससे एक सुंदर तीरों का सिरहाना बन गया जिस पर भीष्म ने अपना सिर टिकाया। फिर पितामह ने कहा कि मुझे प्यास लगी है। दुर्योधन ने सोने के कलश में पानी मंगवाया, लेकिन भीष्म ने उसे भी मना कर दिया। अर्जुन ने फिर एक बाण धरती में मारा और वहाँ से गंगा की एक तेज धारा फूटी जो सीधे भीष्म पितामह के मुख में गई। अपनी मां गंगा के पानी को पीकर भीष्म तृप्त हो गए।
लेकिन भीष्म ने उस समय अपने प्राण नहीं त्यागे। सूर्य उस समय दक्षिणायन में था, और शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन में प्राण त्यागने पर मोक्ष नहीं मिलता। भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान था, इसलिए उन्होंने तय किया कि जब तक सूर्य उत्तरायण में नहीं आ जाता, वे इसी सरशैया पर लेटे रहेंगे और तड़पते रहेंगे। पूरे ५८ दिनों तक भीष्म पितामह उस भयानक दर्द को सहते हुए तीरों की शैया पर लेटे रहे। उस दौरान पांडव रोज उनके पास आते थे और भीष्म ने युधिष्ठिर को राजधर्म, मोक्षधर्म और दानधर्म का जो उपदेश दिया, उसे आज हम 'भीष्म गीता' या महाभारत के शांति पर्व के रूप में जानते हैं। मृत्यु के ठीक पहले जब श्रीकृष्ण उनके पास आए, तो भीष्म ने उनसे एक सवाल पूछा कि हे अच्युत, मैंने अपने जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया, फिर मुझे यह तीरों की शैया पर तड़पने की इतनी भयानक सजा क्यों मिल रही है? तब श्रीकृष्ण ने उन्हें उनके पिछले जन्मों का याद दिलाया कि पितामह, आज से १०१ जन्म पहले आपने एक अनजाने में एक टिड्डे की पीठ में कांटा चुभाया था, उसी कर्म का फल आज आपको भुगतना पड़ रहा है। कर्म का चक्र किसी को नहीं छोड़ता, चाहे वह स्वयं भीष्म पितामह ही क्यों न हों।
अंततः माघ महीने की शुक्ल अष्टमी को जब सूर्य उत्तरायण हुआ, भीष्म पितामह ने अपनी आंखें बंद कीं और अपने प्राण त्याग दिए। उनके जाते ही कुरुवंश का सबसे मजबूत स्तंभ ढह गया। गंगापुत्र भीष्म की यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अगर उसका विवेक उसकी प्रतिज्ञाओं या नियमों का गुलाम बन जाता है, तो वह समाज का कल्याण नहीं कर सकता। भीष्म ने प्रतिज्ञा निभाई, लेकिन धर्म हार गया। उन्होंने अपने पिता को सुख दिया, लेकिन पूरे वंश को उजाड़ दिया।
मित्रों, भीष्म पितामह की इस दर्दनाक गाथा पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि भीष्म को द्रौपदी के चीरहरण के समय अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर दुर्योधन को दंड देना चाहिए था? क्या उनका मौन ही कुरुवंश के विनाश का असली कारण था? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। अगर आपको यह वीडियो ज्ञानवर्धक और भावुक लगी हो, तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर करें और अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें। ऐसी ही और भी पौराणिक और ऐतिहासिक गाथाओं को गहराई से जानने के लिए हमारे चैनल को अभी सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन दबाना न भूलें ताकि आने वाली कोई भी वीडियो आपसे मिस न हो। मिलते हैं आपसे अगले वीडियो में, तब तक के लिए जय श्रीकृष्ण!

25.8.26

शामगढ़ के साधारण परिवार से जन्मे डॉ. दयाराम आलोक कैसे बने समाज के शिल्पकार?




एक सुई... एक धागा... और एक साधारण दर्जी परिवार में जन्मा बच्चा---क्या आप सोच सकते हैं... कि वही बच्चा एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी दर्जी समाज की वेबसाइट बनाएगा? जिसकी वेबसाइट के 8 लाख से ज्यादा पाठक होंगे? जिसके द्वारा खींचे गए 5000 से ज्यादा फोटो आज इंटरनेट पर दर्जी समाज की पहचान बने होंगे?
नमस्कार।
मैं हूँ डॉ. दयाराम आलोक
और आज मैं आपको सुना रहा हूँ... मेरी अपनी कहानी... सुई से शिखर तक की कहानी। ये कहानी सिर्फ मेरी नहीं है। ये कहानी है हर उस दर्जी भाई की... जिसने कभी सोचा था कि हम छोटा काम करते हैं। नहीं। हम छोटा काम नहीं करते। हम समाज को कपड़े पहनाते हैं... समाज को इज्जत पहनाते हैं।
तो अंत तक बने रहिए... क्योंकि इस वीडियो के आखिर में मैं आपको बताऊंगा... कि सिर्फ 1 महीना 8 दिन में... मंदिर का प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठा आयोजन कैसे हो गया था... वो भी तब जब मेरी उम्र सिर्फ 25 साल थी।
मेरा जन्म... 11 अगस्त 1940 को हुआ था।
स्थान... शामगढ़। मध्य प्रदेश का एक छोटा सा कस्बा। शामगढ़ आज मंदसौर जिले में है।
मेरे पिताजी का नाम... श्री पूरालाल जी राठौर । माताजी का नाम... श्रीमती गंगा बाई।
हम दर्जी थे। हमारा परिवार... राठौर दर्जी परिवार। हमारा काम था... रेडीमेड वस्त्र बनाकर बेचना। आज जैसे शोरूम होते हैं, वैसा कुछ नहीं था। हाथ से सिलाई... हाथ से कटाई।
हमारे परिवार में... 6 भाई और 3 बहनें। कुल 9 भाई-बहन और माता-पिता। 11 लोगों का परिवार। आप सोच सकते हैं... आर्थिक हालात कैसे होंगे। साधारण... बहुत साधारण। कभी-कभी तो ऐसा लगता था... कि दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष है।
लेकिन मेरे पिताजी... पूरालाल जी... उन्होंने एक बात सिखाई। बेटा... काम कोई छोटा नहीं होता। सुई भी... अगर सही हाथ में हो... तो इतिहास सिल देती है।
मैंने... उसी सुई के साये में... पढ़ाई शुरू की।
हाईस्कूल की परीक्षा... मैंने प्रथम श्रेणी में पास की। उस जमाने में... 1950 के दशक में... दर्जी परिवार के बच्चे का प्रथम श्रेणी में पास होना... बहुत बड़ी बात थी। लोग कहते थे... अरे दर्जी का लड़का पढ़ेगा? लेकिन मैंने करके दिखाया।
और यहीं से मेरी जिंदगी ने पहली करवट ली।
शिक्षा से नौकरी तक
1961 में... मेरी नियुक्ति शासकीय सेवा में... अध्यापक के पद पर हुई। मैं शिक्षक बन गया। जिस घर में... कपड़े सीए जाते थे... उसी घर का लड़का... अब बच्चों को अक्षर सिखा रहा था।
शिक्षक बनने के बाद भी ... मैंने पढ़ाई नहीं छोड़ी।
1969 में... मैंने राजनीति विज्ञान से एम.ए. किया। राजनीति शास्त्र से।
लेकिन मेरे मन में... एक और दर्द था। हमारे समाज में... बीमारी... गरीब लोग... डॉक्टर के पास नहीं जा पाते थे। तो मैंने... आयुर्वेद रत्न की उपाधि ली। होम्योपैथी पढ़ी. D I Hom London... लंदन से होम्योपैथी की उपाधि अर्जित की।
लोग मुझे मास्टर साहब कहते थे... कोई वैद्य जी कहता था... कोई कवि कहता था।
और मैं... सब सुनता था... क्योंकि मुझे लगता था... ज्ञान... जितना बाँटो... उतना बढ़ता है।
मैंने 1996 तक... 35 साल तक... शिक्षक के रूप में सेवा की। और प्रधानाध्यापक के पद से सेवानिवृत्त हुआ।
महासंघ का जन्म
अब आती है... मेरे जीवन की सबसे बड़ी घटना।
तारीख थी... 14 जून 1965।
मेरी उम्र... सिर्फ 24 साल... 25वां साल शुरू हुआ था।
मैंने देखा... हमारे दर्जी समाज में... शादियों में... मौत में... फिजूलखर्ची बहुत होती है। कर्ज ले लेकर... दिखावा किया जाता है। समाज बिखरा हुआ है। कोई संगठन नहीं।
तो मैंने सोचा... क्यों न... युवाओं को जोड़ा जाए।
और 14 जून 1965 को... शामगढ़ में... मेरे ही घर पर... यानी पूरालाल जी राठौर के निवास पर... हमने एक बैठक बुलाई।
नाम रखा... "दामोदर दर्जी युवक संघ"
उस पहली बैठक में... 134 दर्जी बंधु आए। 134... सोचिए... 1965 में... बिना मोबाइल... बिना इंटरनेट... 134 लोग एक आवाज पर आ गए।
उसी दिन... पहली कार्यकारिणी बनी।
अध्यक्ष बने... श्री रामचन्द्र जी सिसोदिया।
संचालक... की जिम्मेदारी... मुझे दी गई... श्री दयाराम जी आलोक को।
और कोषाध्यक्ष बने... श्री सीताराम जी संतोषी।
हमने सदस्यता अभियान चलाया... 50 नये पैसे... यानी आधा रुपया... में सदस्य बनाना शुरू किया। सैकड़ों सदस्य बने।
मैंने उसी साल... 1965 में ही... महासंघ का संविधान लिपिबद्ध किया। हाथ से लिखा था मैंने। बाद में... डॉ. लक्ष्मीनारायण जी अलौकिक ने उसमें संशोधन किए... और रसायन प्रेस, दिल्ली से छपवाकर... पूरे देश में प्रचारित किया।
वही छोटा सा युवक संघ... धीरे-धीरे... बढ़ते-बढ़ते... "अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ" बन गया। जो आज पूरे भारत में... दर्जी समाज की आवाज है।
दामोदर दर्जी महासंघ का पुनर्गठन -
गांधी जयंती 2 ऑक्टोबेर 2023 को दामोदर दर्जी  महासंघ के पुनर्गठन के अंतर्गत डॉ . दयाराम जी आलोक को अध्यक्ष ,श्री रमेश चंद्र जी राठौर आशुतोष  को महाप्रबंधक मनोनीत करते हुए नवीन कार्यकारिणी का गठन किया गया।....यानी 58 साल बाद भी... वो बीज... जो 1965 में बोया था... आज वटवृक्ष बना हुआ है।
सामूहिक विवाह - एक क्रांति
शादियाँ... हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या थीं।
दहेज... दिखावा... कर्ज।
तो मैंने 1981 में... एक फैसला लिया
मध्य प्रदेश के रामपुरा नगर में... दर्जी समाज का पहला सामूहिक विवाह सम्मेलन आयोजित किया।
1981 में... सामूहिक विवाह का नाम भी लोग नहीं जानते थे। लोगों ने कहा... ये कैसे होगा? लेकिन हमने करके दिखाया।
और एक नहीं... 2 नहीं... मैंने दर्जी कन्याओं के लिए 9 सामूहिक विवाह आयोजित किए हैं। और एक तो... निज वित्त पोषित... यानी अपने खुद के खर्चे से... निशुल्क सामूहिक विवाह।
इससे... सैकड़ों परिवार... कर्ज से बचे। बेटियों की शादी... सम्मान से हुई।
डग मंदिर का चमत्कार
अब वो कहानी... जिसका मैंने शुरू में वादा किया था।
डग... राजस्थान का एक स्थान है। वहाँ... दर्जी समाज का मंदिर है।
डग के दर्जी बंधुओं ने... मुझ पर विश्वास किया। मेरी कार्यक्षमता पर विश्वास करके... उन्होंने मंदिर के उद्यापन जैसा महत्वपूर्ण कार्य... मुझे सौंपा।
मेरी उम्र... सिर्फ 25 वर्ष।
लोगों ने कहा... इतना बड़ा काम?... इतना पैसा कहाँ से आएगा?
लेकिन... प्रभु की अदृश्य अनुकंपा देखिए... सिर्फ 1 माह 8 दिन की छोटी सी अवधि में... मंदिर के उद्यापन हेतु पर्याप्त धन संग्रहित हो गया।
हमने एक-एक घर जाकर... चंदा एकत्रित किया। और सारी राशि... डग मंदिर के कोषाध्यक्ष... श्री कन्हैयालाल जी पँवार के सुपुर्द कर दी।
और 23 जून 1966 को... डग स्थित दर्जी मंदिर का उद्यापन... बड़े धूमधाम से हुआ। ये मेरे जीवन की... सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों की पहली कड़ी थी।
आध्यात्मिक दान पथ - 
धर्म-आध्यात्म और लोकहित से प्रेरित होकर  मैंने मध्य प्रदेश और राजस्थान के 150+ मंदिरों और मुक्तिधाम,गौशालाओं ,विद्यालयों  में... लोगों की बैठक सुविधा के लिए... सैकड़ों सीमेंट की बेंचें भेंट कीं... और नकद दान भी दिया।
डिजिटल युग का दर्जी
अब आते हैं... आज के युग पर।
पिछले 20 वर्षों से... मैं एक काम कर रहा हूँ। जो शायद ही कोई करता है।
मैं... जहाँ भी सामाजिक रीति-रस्म होती है... शादी... सम्मेलन... मंदिर उद्यापन... मैं जाता हूँ... और दर्जी बंधुओं के फोटो लेता हूँ।
मेरा उद्देश्य... सिर्फ फोटो लेना नहीं है। मेरा उद्देश्य है... हमारे समाज का इतिहास बचाना।
आज... लगभग 5 हजार से ज्यादा दर्जी समाज के फोटो... इंटरनेट पर मौजूद हैं। जो मैंने अपलोड किए हैं।
और 15 हजार दर्जी बंधुओं का... एक वंशवृक्ष... Family Tree... मैंने बनाया है। पारिवारिक जानकारी संग्रहित करके। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी... जाने... कि हम कौन हैं।
और इसी से जन्म हुआ... मेरी वेबसाइट का।
वेबसाइट का नाम है... "दर्जी समाज संदेश"
Address है... damodarjagat.blogspot.com
ये... दामोदर दर्जी समाज की सामाजिक गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करती है। और गर्व के साथ कहता हूँ... ये दुनिया की दर्जी समाज की सबसे बड़ी वेबसाइट है।
इसमें 500 से ज्यादा लेख हैं। और 8 लाख से अधिक पाठक... विश्वभर में फैले हुए हैं।
इसी तरह... मेरी दूसरी वेबसाइट है... healininathome.blogspot.com... जहाँ मेरे हजारों चिकित्सा लेख प्रकाशित होते हैं... और दुनिया भर में लाखों पाठक हैं। मेरे लेख... मशहूर मासिक पत्रिका कादंबिनी में भी प्रकाशित हुए हैं।
मैं कवि भी हूँ... मेरी 150 काव्य कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं।
1996 में सेवानिवृत्ति के बाद... मैंने भाजपा की सदस्यता ली। और पार्टी में... अध्यक्ष नगर भाजपा बोलिया, जिला महामंत्री अध्यापक प्रकोष्ठ जिला मंदसौर, और सहसंयोजक जिला स्वास्थ्य प्रकोष्ठ जैसे पदों पर सेवा की।
तो ये थी... मेरी कहानी... सुई से शिखर तक।
एक दर्जी का बेटा... जो मास्टर बना... फिर समाज सेवक... फिर लेखक... और आज... 87 साल की उम्र में भी... आपके सामने... कैमरे के सामने... अपनी कहानी सुना रहा है।
क्यों?
क्योंकि मैं चाहता हूँ... कि हमारा समाज... संगठित रहे।
अगर आप इस वीडियो को यहाँ तक देख रहे हैं... तो आप भी मेरे परिवार का हिस्सा हैं।
मैं आपसे तीन निवेदन करता हूँ।
पहला... इस वीडियो को LIKE कीजिए... क्योंकि ये Like मेरे लिए नहीं... हमारे दर्जी समाज की एकता के लिए है।
दूसरा... इस वीडियो को SHARE कीजिए... हर दर्जी बंधु तक... ताकि उन्हें भी पता चले... कि हमारा इतिहास कितना गौरवशाली है।
और तीसरा... COMMENT में लिखिए... जय दामोदर... और अपना शहर का नाम... मुझे पता तो चले... कि मेरा ये संदेश... देश के किस कोने तक पहुंचा है।
और हाँ... मेरी वेबसाइट... damodarjagat.blogspot.com को जरूर देखिए... और चैनल को SUBSCRIBE करना मत भूलिए... ताकि अगली बार... जब मैं कोई नया वंशवृक्ष या नया इतिहास लेकर आऊं... तो सबसे पहले आप तक पहुंचे।
आपका अपना...
डॉ. दयाराम आलोक
संस्थापक अध्यक्ष , दामोदर दरजी महासंघ 
जय दामोदर... जय दर्जी समाज।

22.8.26

डोम जाति का उद्भव: शिवजी के शाप की अद्भुत कथा

 




नमस्कार मित्रों, आज हम आपको एक ऐसी रहस्यमयी कथा सुनाने जा रहे हैं जो केवल इतिहास नहीं, बल्कि धर्म, समाज और संस्कृति की गहराइयों से जुड़ी हुई है। यह कथा है डोम जाति के उद्भव की—एक ऐसी जाति जिसका नाम सुनते ही समाज में कई प्रश्न उठते हैं।
क्या आप जानते हैं कि डोम जाति का संबंध सीधे भगवान शिव से जोड़ा जाता है? कहा जाता है कि शिवजी के शाप के कारण ही ब्राह्मण से डोम बने। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि समाज की संरचना और जातीय इतिहास का अद्भुत अध्याय है।
आज हम इस वीडियो में जानेंगे कि आखिर यह शाप क्या था, कैसे डोम समाज का जन्म हुआ, और किस प्रकार यह जाति भारतीय संस्कृति का हिस्सा बनी।
भारत की जाति व्यवस्था सदियों से समाज की संरचना का आधार रही है। हर जाति की अपनी भूमिका, अपनी परंपरा और अपनी पहचान रही है। डोम जाति का इतिहास भी इसी संरचना से जुड़ा हुआ है।
कथाओं में वर्णन मिलता है कि एक समय ब्राह्मणों ने शिवजी का अपमान किया। उनके अहंकार और अनुचित आचरण से क्रोधित होकर भगवान शिव ने उन्हें शाप दिया। इस शाप के परिणामस्वरूप वे ब्राह्मण अपनी श्रेष्ठता खो बैठे और डोम जाति में परिवर्तित हो गए।
यह कथा केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह हमें बताती है कि समाज में आचरण और धर्म का पालन कितना आवश्यक है।
कथा की शुरुआत होती है उस समय से जब देवता और असुर मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे। अमृत की प्राप्ति के लिए यह मंथन हुआ, लेकिन इसके साथ ही अनेक विष और रत्न भी प्रकट हुए। जब समुद्र से हलाहल विष निकला, तो उसका प्रभाव इतना भयंकर था कि संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई। देवता और असुर दोनों ही भयभीत हो उठे। उस समय महादेव शिव ने करुणा दिखाते हुए उस विष को अपने कंठ में धारण किया। यही कारण है कि उन्हें ‘नीलकंठ’ कहा गया।
किंतु इस कथा का एक और पहलू है, जो कम ही सुनाया जाता है। कहा जाता है कि विषपान के बाद शिवजी का क्रोध अत्यधिक बढ़ गया। उनके नेत्र लाल हो उठे और वे तपस्या में लीन हो गए। इसी समय कुछ लोग, जो समाज में अनुशासनहीन और अपवित्र कर्मों में लिप्त थे, शिवजी की तपस्या भंग करने लगे। शिवजी ने उन्हें शाप दिया—“तुम्हें समाज में नीच समझा जाएगा, तुम्हारा कर्म श्मशान और मृत्यु से जुड़ा होगा, और तुम डोम कहलाओगे।”
डोम जाति का उद्भव इसी शाप से माना जाता है। यह केवल दंड नहीं था, बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था भी थी। डोमों को अंतिम संस्कार, श्मशान भूमि की देखरेख और मृत्यु से जुड़े कार्यों का दायित्व दिया गया। समाज ने उन्हें अलग-थलग कर दिया, किंतु उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
डोम जाति का जीवन श्मशान की राख और मृत्यु की गंध से जुड़ा हुआ था। वे शवों का दाह संस्कार करते, चिता सजाते और अंतिम यात्रा का संचालन करते। यह कार्य समाज के लिए आवश्यक था, किंतु उन्हें सम्मान नहीं मिला। शिवजी के शाप ने उन्हें एक पहचान दी, परंतु यह पहचान सम्मानजनक नहीं थी।
समय के साथ डोम जाति ने अपनी कला और संस्कृति भी विकसित की। उनके गीतों में मृत्यु का दर्शन, जीवन की नश्वरता और शिवजी की महिमा गाई जाती थी। वे श्मशान के प्रहरी बने, और धीरे-धीरे उनकी पहचान समाज में स्थायी हो गई।
यह कथा हमें यह सिखाती है कि समाज में हर वर्ग का एक उद्देश्य होता है। डोम जाति को नीच समझा गया, लेकिन उनके बिना जीवन और मृत्यु का चक्र अधूरा है। शिवजी का शाप केवल दंड नहीं था, बल्कि एक जिम्मेदारी भी थी।
आज आधुनिक समाज में डोम जाति अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान की कमी उन्हें पीछे धकेलती है। किंतु उनकी ऐतिहासिक भूमिका और सांस्कृतिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता।
मित्रों, यह कथा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम केवल परंपरा और शाप के आधार पर किसी समुदाय को नीचा दिखा सकते हैं? डोम जाति का योगदान समाज के लिए अनिवार्य रहा है। हमें चाहिए कि हम उन्हें सम्मान दें, उनकी संस्कृति को समझें और उन्हें समान अवसर प्रदान करें।
यदि आप इस कथा से प्रेरित हुए हैं, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ साझा करें।
अपने क्षेत्र में डोम समाज के लोगों से संवाद करें, उनकी कला और परंपरा को जानें।
शिक्षा और रोजगार के अवसर देकर इस समाज को मुख्यधारा में लाना हमारी जिम्मेदारी है।
आइए, मिलकर इस अद्भुत कथा को केवल इतिहास न मानें, बल्कि इसे सामाजिक सुधार का आधार बनाएं।

18.8.26

कतिया समाज का अमर नायक – भूरा भगत की कहानी





 “क्या आपने कभी सोचा है कि समाज के इतिहास में ऐसे कौन से व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने अपने साहस और बलिदान से आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया? भूरा भगत वही नाम है, जो कतिया समाज की धरोहर बनकर आज भी लोककथाओं और जनश्रुतियों में जीवित है। आइए, हम साथ मिलकर चलते हैं इस अमर गाथा की ओर।”

भूरा भगत का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि पूरे समाज की अस्मिता और संघर्ष का प्रतीक है। उनका जन्म कतिया समाज में हुआ, जो उस समय सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा था। साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनके विचार असाधारण थे। बचपन से ही उनमें न्यायप्रियता और साहस की झलक दिखाई देती थी। वे अपने समाज के लोगों की पीड़ा को गहराई से महसूस करते थे और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का संकल्प रखते थे।

उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्चा नायक वही है जो अपने समाज के लिए जीता है। भूरा भगत ने अपने जीवन में अनेक संघर्षों का सामना किया। उन्होंने समाज को आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया और यह विश्वास दिलाया कि कोई भी समुदाय अपनी मेहनत और साहस से इतिहास रच सकता है।

उनके जीवन के प्रसंगों में कई बार ऐसा हुआ जब वे अन्याय के खिलाफ खड़े हुए। चाहे वह शोषण हो या अत्याचार, भूरा भगत ने कभी पीछे हटना नहीं सीखा। उनके शब्द और कर्म आज भी लोकगीतों, भजनों और कविताओं में गाए जाते हैं। कतिया समाज के लोग उन्हें अमर नायक मानते हैं और उनकी गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती है।

भूरा भगत की गाथा केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए भी प्रेरणा है। जब हम अपने जीवन में कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो उनके साहस और त्याग को याद करके आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने अपने समाज को एकजुट किया और उन्हें यह विश्वास दिलाया कि संघर्ष से ही शौर्य जन्म लेता है।

उनकी कहानी में भावनात्मक जुड़ाव है, सांस्कृतिक गौरव है और समाज की अस्मिता का संदेश है। यही कारण है कि भूरा भगत की गाथा आज भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती है।

उनकी गाथा में कई प्रसंग आते हैं – कभी वे अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं, कभी समाज को एकजुट करने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके शब्द और कर्म आज भी लोकगीतों, भजनों और कविताओं में गाए जाते हैं। कतिया समाज के लोग उन्हें अमर नायक मानते हैं और उनकी गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती है।

भूरा भगत की कथा केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए भी प्रेरणा है। जब हम अपने जीवन में कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो उनके साहस और त्याग को याद करके आगे बढ़ सकते हैं।

उनकी कहानी में भावनात्मक जुड़ाव है, सांस्कृतिक गौरव है और समाज की अस्मिता का संदेश है। यही कारण है कि भूरा भगत की गाथा आज भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती है।

उनकी गाथा हमें यह सिखाती है कि साहस केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि जीवन के हर संघर्ष में दिखाना पड़ता है। भूरा भगत ने अपने समाज को एकजुट किया, उन्हें आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया और यह विश्वास दिलाया कि कोई भी समुदाय अपनी मेहनत और साहस से इतिहास रच सकता है।

उनकी कहानी में भावनात्मक जुड़ाव है, सांस्कृतिक गौरव है और समाज की अस्मिता का संदेश है। यही कारण है कि भूरा भगत की गाथा आज भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती है।

जय-जय भूरा भगत अमर, कतिया समाज का दीपक उज्ज्वल। अन्याय के विरुद्ध खड़े, शौर्य-गाथा अमर अटल॥ साधारण जन्म, महान विचार, साहस से किया जग उद्धार। समाज को दी आत्म-शक्ति, सम्मान बना जीवन-भक्ति॥ जय-जय भूरा भगत अमर, कतिया समाज का दीपक उज्ज्वल। अन्याय के विरुद्ध खड़े, शौर्य-गाथा अमर अटल॥ त्याग-बलिदान की अमर निशानी, संगठित कर दी समाज कहानी। लोकगीतों में गूँज रहा नाम, भूरा भगत का अमर धाम॥ जय-जय भूरा भगत अमर, कतिया समाज का दीपक उज्ज्वल। अन्याय के विरुद्ध खड़े, शौर्य-गाथा अमर अटल॥ साहस केवल रणभूमि में नहीं, जीवन-संघर्ष में दिखता यहीं। भूरा भगत ने दिया संदेश, संघर्ष से मिलता सच्चा देश॥ जय-जय भूरा भगत अमर, कतिया समाज का दीपक उज्ज्वल। अन्याय के विरुद्ध खड़े, शौर्य-गाथा अमर अटल॥ कतिया समाज का गौरव महान, पीढ़ी दर पीढ़ी गूँजता गान। अमर नायक की गाथा सुनो, भूरा भगत को हृदय में चुनो॥ जय-जय भूरा भगत अमर, कतिया समाज का दीपक उज्ज्वल। अन्याय के विरुद्ध खड़े, शौर्य-गाथा अमर अटल॥

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16.8.26

हम सूत कातने वाले नहीं, तलवार चलाने वाले क्षत्रिय हैं - कतिया जाति का गौरवशाली इतिहास

                             



क्या आप जानते हैं, जिस जाति को आज हम कतिया कहते हैं, उसने सिकंदर महान को भी युद्ध के मैदान में रोक दिया था? 17,000 वीरों ने बलिदान दिया था? और इसी जाति के नाम पर गुजरात के पूरे क्षेत्र का नाम काठियावाड़ पड़ा?
मैं बात कर रहा हूँ उस जाति की, जो वैदिक काल में वेदों की रक्षक थी, जिसके नाम पर कठोपनिषद लिखा गया, जिसे कर्नल टॉड ने राजपूतों के 36 कुलों में से एक माना। वो है काठिया क्षत्रिय, आज की कतिया जाति।
नमस्कार साथियों।
आज हम बात करेंगे एक ऐसी जाति की, जिसका इतिहास हजारों साल पुराना है, लेकिन आज बहुत कम लोग उसके बारे में जानते हैं। जाति है कतिया।
वर्तमान में कतिया जाति मुख्य रूप से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, दिल्ली, ओडिशा, तेलंगाना, गुजरात, राजस्थान, उत्तरप्रदेश में पाई जाती है।
पर सवाल ये है, कतिया कौन हैं? इनकी उत्पत्ति कहाँ से हुई?
इतिहास में इसके तीन बड़े सिद्धांत मिलते हैं।
पहला सिद्धांत कहता है, उत्पत्ति कत्ती से हुई। कत्ती मतलब तलवार। भगवान महादेव भोलेनाथ के अभिन्न अस्त्र कत्ती से इस जाति की उत्पत्ति मानी जाती है।
दूसरा सिद्धांत कहता है, उत्पत्ति सूत कातने से हुई। कताई धागा, कपास से सूत कातना इनका पारंपरिक काम धंधा रहा है।
और तीसरा सिद्धांत कहता है, ये काठी, काठिया से बने हैं।
तो सच क्या है? सच को समझने के लिए हमें हजारों साल पीछे जाना होगा।
चलते हैं वैदिक काल में।
समाज को आह्वान नामक पुस्तक में और कई प्राचीन ग्रंथों में काठिया क्षत्रिय जाति की उत्पत्ति का पहला उल्लेख वैदिक साहित्य में मिलता है। कठ, काठिया, वैशम्पायन के उदीच्य शिष्य थे।
डॉ बुद्धप्रकाश ने अपनी किताब ऐशियेंट पंजाब में लिखा है, पाणिनि ने भी अपनी अष्टाध्यायी में कठ क्षत्रिय जाति का उल्लेख किया है। कठ लोग बड़ी प्राचीन आर्य जाति के थे।
इनके नाम पर एक पूरा उपनिषद है, कठोपनिषद। ये कितनी बड़ी बात है। वैदिक साहित्य के संरक्षक और व्याख्याकार के रूप में इनकी ख्याति दूर दूर तक फैली हुई थी।
ये सिर्फ ज्ञानी नहीं, महायोद्धा भी थे।
अब आते हैं इतिहास के सबसे रोमांचक अध्याय पर, कठ गणराज्य और सिकंदर का युद्ध।
ईसा पूर्व 326 में, जब सिकंदर भारत आया, रावी नदी को पार करने के बाद उसकी मुठभेड़ कठों से हुई।
इनकी राजधानी थी सांगल, आज के गुरदासपुर के आसपास।
यूनानी इतिहासकार स्ट्रैबो लिखता है, कठों में सौंदर्य का साका चलता था, सबसे सुंदर पुरुष को वे अपना राजा चुनते थे।
कठों ने अपनी राजधानी के चारों ओर रथों के तीन चक्कर लगाकर शकटव्यूह का निर्माण किया। सिकंदर की अश्वारोही सेना वहाँ निष्फल होने लगी।
इतना घमासान युद्ध हुआ कि अंत में पोरस को अपनी सेना लेकर सिकंदर की मदद के लिए आना पड़ा।
रात में कठों ने एक झील के द्वारा भागने का प्रयत्न किया, पर सिकंदर ने नगर को ध्वस्त कर दिया। इस युद्ध में कठों के 17,000 वीर काम आये और 70,000 बंदी बना लिए गए।
यूनानी लेखक खुद लिखते हैं, इस युद्ध में असामान्य रूप से यूनानी घायल हुए। ये विजय सिकंदर को बहुत महंगी पड़ी।
सोचिए, वो जाति जिसने दुनिया जीतने वाले सिकंदर को इतना नुकसान पहुँचाया।
इस हार के बाद कठ जाति का बिखराव शुरू हुआ। पंजाब के मैदानों से ये उत्तरप्रदेश तथा काठियावाड़ क्षेत्रों की ओर चले गए।
और यहीं से दूसरा इतिहास शुरू होता है, काठियावाड़ का इतिहास।
कर्नल जेम्स टॉड ने अपने ग्रंथ पश्चिमी भारत की यात्रा में काठियों को मध्य एशिया से आए हुए माना है। उन्होंने काठी जाति को राजपूतों का एक अंग माना है जो अपने गौरवपूर्ण ऊँचे कद और वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। ये लोग अपनी तलवार की भांति हल की भी पूजा करते थे।
टॉड ने राजस्थान के इतिहास में काठी या काठिया जाति को राजपूतों के छत्तीस कुलों में से एक माना है। उन्होंने इस जाति के चार भेद किए हैं, गढ़वाल, मंडलीवाल, पठारिया और दुलभुहा।
आज भी कतिया समाज में गढ़वाल, पठारिया जैसे गोत्र और उपनाम प्रचलित हैं। इससे स्पष्ट प्रमाणित होता है कि काठी या काठिया का ही अपभ्रंश कतिया है।
आइन-ए-अकबरी में अबुल फजल ने काठी को अहीर मूल का बताया है। और गुजरात के प्रायद्वीपीय क्षेत्र में पाई जाने वाली ये जाति, जिसे काठी दरबार भी कहा जाता है, उसी के कारण सौराष्ट्र का नाम काठियावाड़ पड़ा।
यानी पूरे एक प्रांत का नाम इस जाति के नाम पर पड़ा।
अब सवाल है, काठियावाड़ से मध्यप्रदेश कैसे आए?
इतिहास कहता है, संभवतः ई सन के आरम्भिक चरण में ये मालवों के साथ होते हुए राजस्थान से दक्षिणवर्ती राज्य सौराष्ट्र में आ बसे। राजपुताने के भट्ट ग्रंथों से पता चलता है कि इन्होंने यादवों से बड़ा युद्ध किया था। महाराजा पृथ्वीराज चौहान तथा जयचंद्र की सेनाओं में भी ये वीर जाति सेनानी का कार्य करती थी।
काठियावाड़ से ही इनका विस्तार मध्यप्रदेश की ओर बढ़ा। नर्मदा तटवर्ती प्रदेशों में पश्चिम से पूर्व की ओर ये बढ़ते गए।
नर्मदांचल में इनकी एक शाखा में गोत्रनाम नाग, नागवंशी, नागोत्रा मिलते हैं तथा इनके इष्टदेव शिव हैं।
यहाँ एक बहुत दिलचस्प कड़ी जुड़ती है नागवंश से।
होशंगाबाद जिले की सोहागपुर तहसील में भटगांव नामक स्थल 13वीं, 14वीं शताब्दी में नागराजाओं की राजधानी था। और मध्यप्रदेश में होशंगाबाद काठियों का भी केंद्र स्थल रहा है। संभवतः यहीं से इस जाति का फैलाव मध्यप्रदेश के शेष हिस्सों में हुआ।
गुप्त साम्राज्य से पहले उत्तर और मध्य भारत में नागवंश के बड़े राज्य थे। विदिशा में गणपतिनाग का राज्य, पद्मपवाया में नागसेन का राज्य। इतिहास साक्षी है कि आर्यों का नागों के साथ सांस्कृतिक समन्वय होता आया था। कुन्ती का नाग कन्या होकर भी पांडव की रानी बनना, उलूपी नागकन्या का अर्जुन की पत्नी बनना, इसके ठोस प्रमाण हैं।
इसी सांस्कृतिक समन्वय से कतिया समाज में शिव भक्ति और नाग गोत्र आए।
अब आते हैं नाम के अपभ्रंश पर।
कई इतिहासकार मानते हैं, ये जाति पहले कठ थी, फिर काठी, फिर काठिया, और फिर कतिया बनी।
मिस्टर क्रुक का मत है कि इनके पुरखे कभी शासन का विरोध करने पर कैद कर लिए गए थे और इस शर्त पर छोड़े गए कि उनकी औरतें सूत कातने का धंधा करेंगी। इसी कारण कहीं कहीं इन्हें रहटा राजपूत भी कहा जाता है। मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में कतिया समाज के लोगों को रेहटा राजपूत कहा जाता है।
और सूत कातने के कारण ही कठिया से अपभ्रंशित होकर कतिया नाम पड़ गया।
पर ये ध्यान रखिए, ये सिर्फ एक व्यवसायिक पहचान थी। लेखक खुद सवाल करता है, क्या सभ्यता के उत्कर्ष काल से लगातार यह जाति सिर्फ सूत कातती आई है? भारत की समस्त मानवता का भरण पोषण कृषि कर्म पर आधारित है।
वास्तव में इनका मुख्य काम किसानी, कृषि तथा मजदूरी रहा है।
अब सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण बात।
कतिया जाति आदिकाल से काठियावाड़ क्षत्रिय जाति से है, जिसे काठियावाड़ी काठी, काठिया कहा जाता रहा है, जोकि समाज की आधुनिक परिस्थितियों के कारण और समाज की मांग को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जाति में रखा गया है।
लेकिन इतिहास देखा जाए तो कतिया जाति भारत की मूलनिवासी जनजाति के अंतर्गत है और मध्यप्रदेश राज्य के आदिवासी समुदाय के भगत माने जाते हैं।
भगत का मतलब क्या है? कतिया जाति के लोग भगत के रूप में आदिवासियों के यहाँ उनके कुलदेवता की पूजन अर्चना भी कराते हैं। ये इनका सम्मानित स्थान था।
पर आर्थिक और शारीरिक प्रबलता कमजोर होने के कारण, युद्धों में परास्त होने के कारण, इन्हें अपना क्षत्रिय जनेऊ तक बेरी के पेड़ पर फेंकना पड़ा। आज भी शादी विवाह में मातृका पूजन के दिन पितरों को बुलाकर पूजन करके क्षत्रिय जनेऊ जरिया के पेड़ पर डाला जाता है।
ये कहानी है गौरव से संघर्ष तक की।
संस्कृति की बात करें तो कतिया जाति के लोग हिंदी बोलते हैं, अपनी कतियाई बोली भी बोलते हैं जो गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र से मेल खाती है।
हिंदू धर्म इनका मुख्य धर्म है। राष्ट्रीय स्तर पर देवता, देवों के देव महादेव भगवान भोलेनाथ तथा महान शिव भक्त संत शिरोमणि भूरा भगत जी की पूजा अर्चना की जाती है।
महाशिवरात्रि बड़े धूमधाम से मनाते हैं। संत शिरोमणि भूरा भगत जी का प्राकट्य जन्म उत्सव वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाते हैं।
कुलदेवता के रूप में महादेव शिवशंकर, काला बाबा, नारायण देव, दूल्हादेव, पांचो पंड्या छठे नारायण, कुलदेवी के रूप में माता हिंगलाज, काली, दुर्गा, गौरा पार्वती आदि की पूजा होती है।
आदिकाल से हिंगलाज देवी को पूजने के प्रमाण मिलते हैं। हिंगलाज देवी डोडिया राजपूत की प्रथम कुलदेवी पूजनीय है। चूंकि कतिया समाज भी क्षत्रिय समाज से है इसलिए यहाँ हिंगलाज माता का वर्णन किया गया है।
आज आवश्यकता है उसके अन्वेषण की, उसके अध्ययन और अध्यापन की, जन जन में उसके प्रचार प्रसार की। क्योंकि सभ्यता के प्रथम चरण में यह जाति वैदिक साहित्य के संरक्षक और व्याख्याकार के रूप में तथा तलवार धारक वीर रक्षक के रूप में दिखाई पड़ती है।
तो साथियों, ये था कतिया जाति का इतिहास। वैदिक काल के कठ, सिकंदर से युद्ध करने वाले योद्धा, काठियावाड़ को नाम देने वाले काठी दरबार, नर्मदा घाटी के नागवंशी क्षत्रिय, और आज के परिश्रमी किसान, मजदूर, भगत।
एक ही जाति, कितने रूप।
आप इस इतिहास के बारे में क्या सोचते हैं? कमेंट में जरूर बताइए।
कतिया जाति का असली इतिहास क्या है? क्या कतिया क्षत्रिय हैं? कतिया जाति की उत्पत्ति कत्ती तलवार से हुई या सूत कातने से?
इस वीडियो में हमने कतिया / काठिया क्षत्रिय समाज के 3000 साल पुराने इतिहास को उजागर किया है - वैदिक काल के कठ गणराज्य से लेकर सिकंदर के साथ युद्ध, काठियावाड़ नामकरण, कर्नल जेम्स टॉड द्वारा 36 राजपूत कुलों में शामिल करना, नर्मदा अंचल में प्रवास, नागवंश से संबंध, और SC में शामिल होने तक की पूरी कहानी।
स्रोत: रसेल और हीरालाल, कर्नल जेम्स टॉड, समाज को आह्वान पुस्तक, विकिपीडिया।
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13.8.26

भोई जाति की ऐतिहासिक यात्रा – अतीत से वर्तमान तक

                                        

                                        



भोई समाज भारतीय सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी उत्पत्ति, विकास और वर्तमान स्थिति को समझना हमें न केवल इतिहास से जोड़ता है बल्कि यह भी बताता है कि समाज किस प्रकार समय के साथ बदलता और विकसित होता है।
जाति इतिहासकर डॉ. दयाराम आलोक के मतानुसार — क्या आपने कभी सोचा है कि भोई समाज की जड़ें कहाँ से आईं? कैसे एक समुदाय ने सदियों की यात्रा तय की और आज भी अपनी पहचान बनाए रखी है? आइए, हम साथ मिलकर चलते हैं इस ऐतिहासिक यात्रा पर – अतीत से वर्तमान तक।
भोई जाति की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न मान्यताएँ हैं। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह समुदाय प्राचीन काल में मछली पकड़ने और जल संसाधनों से जुड़े कार्यों में संलग्न था। "भोई" शब्द का संबंध "भोग" और "भोजन" से भी जोड़ा जाता है, जो उनके जीवनयापन के साधनों को दर्शाता है।
मध्यकालीन भारत में भोई समाज ने स्थानीय प्रशासन और कृषि कार्यों में योगदान दिया। कई जगहों पर यह समुदाय जल संसाधनों के प्रबंधन और समाज की सेवा में अग्रणी रहा। लोककथाओं और भजन-गीतों में भोई समाज की मेहनत और ईमानदारी का उल्लेख मिलता है।
भोई समाज की अपनी विशिष्ट परंपराएँ हैं – विवाह संस्कार, लोकगीत, नृत्य और धार्मिक आस्थाएँ। यह समुदाय देवी-देवताओं की पूजा में विशेष महत्व देता है। उनके उत्सवों में सामूहिकता और सहयोग की भावना झलकती है।
समय के साथ भोई समाज ने शिक्षा, व्यापार और राजनीति में भी अपनी जगह बनाई। आज यह समुदाय न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में बल्कि शहरी जीवन में भी सक्रिय है। सामाजिक सुधार आंदोलनों और शिक्षा के प्रसार ने इनके जीवन को नई दिशा दी।
भोई समाज ने कई चुनौतियों का सामना किया – सामाजिक भेदभाव, आर्थिक कठिनाइयाँ और शिक्षा की कमी। लेकिन आज यह समुदाय अपनी मेहनत और लगन से इन चुनौतियों को पार कर रहा है।
आज भोई समाज भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक संरचना का सक्रिय हिस्सा है। यह समुदाय अपनी परंपराओं को संजोते हुए आधुनिकता को भी अपनाता जा रहा है। भविष्य में शिक्षा और तकनीक के माध्यम से यह और भी सशक्त होगा।
भोई समाज की यात्रा हमें यह सिखाती है कि कोई भी समुदाय अपनी मेहनत, सहयोग और संस्कृति के बल पर इतिहास रच सकता है।
यदि आपको यह वीडियो पसंद आया हो तो इसे लाइक करें, अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें, और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। कमेंट में हमें बताइए कि आप भोई समाज के किस पहलू के बारे में और जानना चाहते हैं। आपकी राय हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है।


पिता की खुशी के लिए पुत्र का महात्याग: भीष्म पितामह की कथा




जिस बेटे ने पिता के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दियाक्या आपने कभी सोचा है कि एक पिता के एक क्षण के प्रेम के लिए एक पुत्र अपना पूरा जीवन, अपना सिंहासन, अपने बच्चे, अपना भविष्य सब कुछ कैसे त्याग सकता है। ऐसी कौन सी प्रतिज्ञा थी जिसे सुनकर स्वर्ग के देवता भी कांप गए और धरती पर फूल बरसाने लगे। आज हम बात कर रहे हैं गंगा पुत्र भीष्म की उस भीषण प्रतिज्ञा की जिसने देवलोक को हिला दिया था।
कहानी शुरू होती है हस्तिनापुर के महान सम्राट शांतनु से। शांतनु चंद्रवंशी राजा थे, धर्मात्मा और प्रजापालक। एक दिन वो गंगा किनारे शिकार पर गए और वहां उन्हें एक अत्यंत सुंदर स्त्री दिखाई दी। वो कोई और नहीं स्वयं मां गंगा थीं जो एक मानव रूप में आई थीं। शांतनु उन्हें देखते ही मोहित हो गए और विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा ने एक शर्त रखी कि वो जो भी करेंगी शांतनु उनसे कभी प्रश्न नहीं करेंगे, कभी रोकेंगे नहीं। प्रेम में अंधे शांतनु ने शर्त मान ली। विवाह हुआ।
समय बीता। गंगा को एक पुत्र हुआ। लेकिन जन्म लेते ही गंगा उस पुत्र को ले जाकर गंगा में बहा देती हैं। शांतनु देखते हैं, हृदय टूट जाता है पर वचनबद्ध होने के कारण कुछ कह नहीं पाते। ऐसे ही सात पुत्रों के साथ हुआ। सात बार एक पिता ने अपनी आंखों के सामने अपने पुत्रों को जल में बहते देखा और चुप रहा। ये सातों पुत्र वास्तव में आठ वसु थे जिन्हें वशिष्ठ ऋषि ने श्राप दिया था कि उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ेगा। जब आठवें पुत्र का जन्म हुआ तो शांतनु से रहा नहीं गया। उन्होंने गंगा को रोक दिया और कहा तुम इतनी निर्दयी कैसे हो सकती हो। वचन टूट गया।
तब गंगा ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और बताया कि ये सात वसु श्राप मुक्त हो गए हैं और यह आठवां पुत्र स्वयं प्रभास नामक वसु है जो लंबे समय तक धरती पर रहेगा। इसका नाम देवव्रत होगा। गंगा उस बालक को अपने साथ ले गईं और कहा कि जब यह बालक शस्त्र और शास्त्र में निपुण हो जाएगा तब मैं इसे आपको लौटा दूंगी।
अब सोचिए एक पिता का एकाकीपन। महल में सब कुछ है पर अपना कोई नहीं है। कई वर्ष बीत गए। देवव्रत गंगा के पास और देवताओं के बीच पल रहे थे। स्वयं देवगुरु बृहस्पति ने उन्हें वेद वेदांग पढ़ाए। परशुराम जैसे महान योद्धा ने उन्हें अस्त्र शस्त्र सिखाए। शुक्राचार्य और वशिष्ठ ने उन्हें राजनीति और धर्म का ज्ञान दिया। वो ऐसा बालक बना जो रूप में कामदेव जैसा, बल में इंद्र जैसा और बुद्धि में बृहस्पति जैसा था।
एक दिन शांतनु यमुना के किनारे घूम रहे थे तो उन्हें एक अद्भुत सुगंध आई। वो सुगंध इतनी दिव्य थी कि पूरे वन में फैल रही थी। वो सुगंध एक युवती से आ रही थी जिसका नाम था सत्यवती। सत्यवती एक निषाद राज की पुत्री थी जिसे मत्स्यगंधा भी कहा जाता था क्योंकि उसके शरीर से मछली की गंध आती थी पर ऋषि पराशर के वरदान से वो सुगंध में बदल गई थी। शांतनु सत्यवती को देखते ही अपना सब कुछ भूल गए। उम्र ढल चुकी थी पर हृदय में फिर से प्रेम जाग उठा। उन्होंने सत्यवती के पिता निषादराज के पास जाकर विवाह का प्रस्ताव रखा।
यहां कहानी में एक मोड़ आता है। निषादराज ने कहा राजन मैं अपनी पुत्री का विवाह आपसे अवश्य करूंगा पर मेरी एक शर्त है। मेरी पुत्री से उत्पन्न पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा। यह सुनते ही शांतनु सन्न रह गए। क्योंकि हस्तिनापुर का युवराज तो देवव्रत है। वो अपने जीवित पुत्र के होते हुए उसके अधिकार को कैसे छीन सकते थे। वो धर्म संकट में पड़ गए और बिना कुछ कहे वापस हस्तिनापुर लौट आए।
महल में लौटकर शांतनु उदास रहने लगे। भोजन में मन नहीं, दरबार में मन नहीं। उनका मुख मुरझा गया। उस समय देवव्रत अपनी शिक्षा पूरी करके गंगा द्वारा हस्तिनापुर लौटाए गए थे। पिता को उदास देखकर देवव्रत ने उनके सारथी से सच्चाई पता की। उन्हें पता चला कि पिता किसी के प्रेम में हैं और एक वचन के कारण दुखी हैं। देवव्रत तुरंत अपने पिता के दुख को दूर करने के लिए निषादराज के पास गए।
निषादराज के दरबार में देवव्रत ने कहा कि मैं हस्तिनापुर के सिंहासन का त्याग करता हूं। आज से मेरे पिता और सत्यवती से उत्पन्न पुत्र ही राजा बनेगा। मुझे राज्य नहीं चाहिए। यह सुनकर सब लोग धन्य धन्य कहने लगे पर निषादराज चतुर था। उसने कहा हे राजकुमार आप तो महान हैं आपने त्याग कर दिया पर आपका पुत्र तो इस वचन से बंधा नहीं होगा। वो तो आकर मेरे पौत्र से युद्ध करेगा। तब क्या होगा।
यहां रुककर जरा सोचिए। एक राजकुमार जो अभी युवा है, जिसके सामने पूरा साम्राज्य है, सुंदर जीवन है, उससे कहा जा रहा है कि तुम ही नहीं तुम्हारे आने वाले बच्चे भी कभी राजा बनने का सपना न देखें। कितना कठिन क्षण रहा होगा। पूरे दरबार में सन्नाटा था। देवता आकाश से देख रहे थे। उस क्षण देवव्रत ने आकाश की ओर देखा, धरती की ओर देखा और दोनों हाथ उठाकर ऐसी प्रतिज्ञा ली जिसे आज तक संसार याद रखता है।
देवव्रत ने कहा हे समस्त देवताओ सुनो, हे पितरो सुनो, मैं चंद्रवंशी शांतनु का पुत्र देवव्रत आज प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूंगा। मैं कभी विवाह नहीं करूंगा, कभी संतान उत्पन्न नहीं करूंगा, कभी राजसिंहासन पर नहीं बैठूंगा। मेरा जीवन हस्तिनापुर की सेवा और अपने पिता की प्रसन्नता के लिए होगा। मेरे जीवन में कभी कोई स्त्री नहीं आएगी। यह मेरा अटल व्रत है।
कहते हैं जैसे ही उन्होंने यह वचन कहे वैसे ही आकाश में बिजली कड़कने लगी। देवलोक हिल गया। इतना कठोर व्रत आज तक किसी ने नहीं लिया था। स्वयं भगवान जैसी प्रतिज्ञा। देवताओं ने ऊपर से फूल बरसाए और कहा यह भीषण प्रतिज्ञा है। जो कार्य कोई नहीं कर सकता वो इस बालक ने कर दिया। इसलिए आज से इसका नाम भीष्म होगा। भीषण प्रतिज्ञा करने वाला भीष्म। उसी क्षण से देवव्रत का नाम मिट गया और वो भीष्म पितामह बन गए।
अब आप समझिए इस प्रतिज्ञा का मूल्य क्या था। एक पुरुष के लिए सबसे बड़ी लालसा होती है अपनी वंश बेल को आगे बढ़ाना। भीष्म ने अपने वंश को वहीं समाप्त कर दिया। उन्होंने अपने पिता को सत्यवती दिला दी। शांतनु और सत्यवती का विवाह हुआ। सत्यवती से दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य। पर विधि का विधान देखिए, चित्रांगद बहुत कम उम्र में एक गंधर्व के साथ युद्ध में मारा गया। विचित्रवीर्य भी क्षय रोग से ग्रस्त होकर बिना संतान के मृत्यु को प्राप्त हो गया। अब हस्तिनापुर का सिंहासन खाली था। कोई वारिस नहीं था।
भीष्म चाहते तो अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर सिंहासन ले सकते थे। कोई उन्हें रोक नहीं सकता था। पर उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी। उन्होंने अपनी माता सत्यवती की आज्ञा से काशी नरेश की तीन पुत्रियों अंबा अंबिका और अंबालिका का हरण किया ताकि विचित्रवीर्य से उनका विवाह हो सके। पर वहां भी एक त्रासदी हुई। अंबा ने कहा मैं तो राजा शाल्व से प्रेम करती हूं। भीष्म ने धर्म का पालन करते हुए उसे सम्मान के साथ शाल्व के पास भेज दिया पर शाल्व ने उसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि उसका हरण हो चुका था। अंबा ने भीष्म से कहा आप मुझसे विवाह कर लो। भीष्म ने कहा मैं अपनी प्रतिज्ञा से बंधा हूं। मैं विवाह नहीं कर सकता। तब अंबा ने भीष्म को ही अपनी दुर्दशा का कारण मानकर प्रतिशोध की अग्नि पाल ली और अगले जन्म में शिखंडी बनकर भीष्म की मृत्यु का कारण बनी।
देखिए एक प्रतिज्ञा ने कितने जीवन उलझा दिए। अगर भीष्म विवाह कर लेते तो कौरव और पांडवों का युद्ध ही न होता। हस्तिनापुर को वारिस मिल जाता। पर भीष्म ने अपने वचन को अपने जीवन से बड़ा माना।
इसी प्रतिज्ञा के कारण उन्हें जीवन भर बहुत दुख सहना पड़ा। अपने ही भतीजे के बच्चों को आपस में लड़ते देखना पड़ा। द्रौपदी का चीर हरण उन्होंने अपनी आंखों से देखा। वो चाहते तो रोक सकते थे पर सिंहासन के प्रति अपनी निष्ठा के कारण चुप रहे। वो जानते थे कि दुर्योधन अधर्म के मार्ग पर है पर वो हस्तिनापुर के सेवक थे, सिंहासन के सेवक थे। उनकी प्रतिज्ञा ने उन्हें बांध रखा था।
जब महाभारत का युद्ध हुआ तो भीष्म ने कौरवों की ओर से युद्ध किया क्योंकि वो हस्तिनापुर के प्रति वचनबद्ध थे। दस दिनों तक उन्होंने ऐसी युद्ध किया कि स्वयं श्रीकृष्ण को भी अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर चक्र उठाना पड़ा। अंत में अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके उनके शरीर को बाणों से छलनी कर दिया। वो बाणों की शय्या पर लेट गए। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था इसलिए उन्होंने अपना प्राण तब तक नहीं छोड़ा जब तक सूर्य उत्तरायण नहीं हो गया। बाणों की शय्या पर लेटे लेटे उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म, मोक्ष धर्म और विष्णु सहस्रनाम का उपदेश दिया।
तो इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है। पहली सीख है कि पुत्र धर्म कितना बड़ा होता है। एक पुत्र अपने पिता की खुशी के लिए अपना सर्वस्व त्याग देता है। दूसरी सीख है कि वचन का पालन कितना कठिन होता है। भीष्म ने जो कहा वो जीवन भर निभाया, चाहे उसके लिए उन्हें कितना भी कष्ट सहना पड़ा। और तीसरी सीख है कि कभी कभी एक अच्छा कार्य भी भविष्य में बड़ी समस्या बन जाता है। भीष्म की प्रतिज्ञा धर्म से प्रेरित थी पर उसी के कारण हस्तिनापुर में उत्तराधिकार का संकट पैदा हुआ और महाभारत जैसा युद्ध हुआ।
अब अगर आप इस कथा को सुन रहे हैं और आपको लगता है कि हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसे ही अनसुने त्याग और बलिदान की कहानियां छुपी हैं तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर कीजिएगा। क्योंकि आपका एक लाइक हमें ऐसी ही और पौराणिक कथाओं को आप तक लाने की शक्ति देता है।
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अंत में मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। क्या आपको लगता है कि भीष्म पितामह को अपने पिता के लिए इतनी बड़ी प्रतिज्ञा लेनी चाहिए थी या उन्हें भविष्य के बारे में सोचना चाहिए था। आपका क्या विचार है कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा। क्योंकि आपकी सोच ही इस चर्चा को आगे बढ़ाएगी। फिर मिलते हैं अगली कथा में एक और महान चरित्र के साथ। तब तक के लिए जय श्री कृष्ण।

10.8.26

साहित्य मनीषी डॉ. दयाराम आलोक की जीवन यात्रा

                           




साहित्य मनीषी डॉ. दयाराम आलोक की जीवन यात्रा
 जन्म
आर्य समाज की निर्मल धारा, पूरालाल राठौर कुल पावन।
ग्यारह अगस्त सन् चालीस में, जन्मे  आलोक नाम मनभावन।।
 परिवार
छह भाई तीन बहिन संग, परिवार विशाल था भारी।
पिता का रेडीमेड वस्त्रों का, कारोबार पर दशा थी खस्ता सारी।
निर्धनता में पले-बढ़े पर, संस्कारों में कमी न आई।
 सेवा धर्म
शासकीय शिक्षक बनकर तुमने, शिक्षा-दीप जलाया।
अक्षर-अक्षर ज्ञान बाँटकर, भावी पीढ़ी को चमकाया।।
 शिक्षा
एम.ए. की उपाधि संग, आयुर्वेद रत्न सम्मान।
डी.आई.होम लंदन तक अर्जित, किया ज्ञान का गौरव गान।।
 काव्य साधना
डेढ़ सौ से अधिक कविताएँ, पत्र-पत्रिका में छाई।
कलम के साहित्य मनीषी ने, भावों की गंगा बहाई।।

दयाराम आलोक जी, काव्य सुधा के धाम।
भाव रचें जब छंद में, जग में गूँजे नाम

 समाज सेवा का शंखनाद
डग के दर्जी मंदिर में, सन् छियासठ बना  मिसाल 
मूर्ति प्रतिष्ठा का विराट उत्सव, रच डाला इतिहास विशाल।।

 सामूहिक विवाह
सामूहिक विवाह की नींव धरी, रामपुर में प्रथम आयोजन।
इक्यासी में किया साकार, फिर बोलिया में स्ववित्त पोषण।
कितने घर बसाए तुमने, बिना लिए कुछ दान।।
निष्काम दान
मंदिर, मुक्तिधाम, गौशाला, विद्यालयों के द्वार।
सात सौ से अधिक सीमेंट बेंचें, बाँटा मुक्त हस्त से प्यार।
नकद दान से संस्थाओं को, दिया नव-विकास आधार।।
 वंशावली और इतिहास लेखन
पन्द्रह हजार नामों की वंशावली, दर्जी समाज की लिख डाली।
अंतरजाल पर सुलभ कराई, धरोहर अनुपम निराली।
जाति इतिहास के शोध लेखक, यूट्यूब पर ज्ञान की लड़ी।
सैंकड़ों जातियों का इतिहास, तुमने खोज-खोज कर गढ़ी।।
आयुर्वेद और जनसेवा
पचास वर्षों का अनुभव भर, आयुर्वेद लेख सैंकड़ों बनाए।
वेबसाइट पर सुलभ कराए, जन-जन को रोग-मुक्त कराए।
सेवा-निवृत्ति बाद भी रुके नहीं, भाजपा बोलिया नगर अध्यक्ष कहलाए।
जिला अध्यापक प्रकोष्ठ के महामंत्री बन, संगठन धर्म निभाए।।
 वर्तमान और अतृप्त अभिलाषा
आज भी चार-पाँच घंटे, सोशल मीडिया पर सेवा जारी।
तन अशक्त है किंतु मन में, लोकहित की लगन है भारी।।
 श्लोक
 देहदान संकल्प
मरणोपरान्तम् देहदानं, मम अन्तिमं अभिलाषितम्।
परार्थाय शरीरमस्तु, इति मे निश्चयं कृतम्।।
 अशक्त तन, अटल मन
शरीरं क्षीणं अशक्तं च, तथापि मनः सशक्तकम्।
समाजकार्ये उपस्थितिः, उत्कटेच्छा गरीयसी।।
  पुत्र  पर विश्वास
पुत्रो मे अनिलः सुयोग्यः, दामोदरालय संचालकः।
ममातृप्ताभिलाषाणां, पूरकः स भविष्यति।।
 प्रभु कृपा
षडशीति वर्षाणि पूर्णानि, परमात्म कृपा-प्रसादतः।
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं, लब्ध्वा जीवनम् उत्तमम्।।
 जीवन संध्या
अधुना जीवनं समेटुं, उत्कण्ठा प्रबला मम।
ईश्वरेच्छा बलीयसी, तस्यै नित्यं नमो नमः।।





9.8.26

कंधे पर माता-पिता को तीर्थ कराने वाला श्रवण कुमार | दशरथ को क्यों लगा श्राप?


                                         


सोच कर देखिए... आज के समय में बेटा अपने माता पिता के लिए एक गिलास पानी लाने में भी कभी-कभी झिझक जाता है।
पर आज से हजारों साल पहले एक ऐसा बेटा हुआ था, जिसने अपने अंधे माता-पिता को अपने कंधे पर बिठाया, और पैदल ही पूरे भारत के तीर्थ करा दिए। न सड़क थी, न गाड़ी, न पैसा... था तो बस कंधे पर दो टोकरियां और दिल में अटूट सेवा भाव।
और उसी बेटे की मौत... अयोध्या के राजा दशरथ के हाथों हुई। एक ऐसी मौत जिसने दशरथ को ऐसा श्राप दिलवाया, जिसके कारण बाद में स्वयं भगवान राम को वन जाना पड़ा।
तो आखिर श्रवण कुमार कौन था? उसने ऐसा क्या किया कि आज भी पितृभक्ति का नाम आते ही सबसे पहले उसी का नाम आता है? और दशरथ को कौन सा श्राप लगा था?
इस कहानी को अंत तक सुनिएगा, क्योंकि इसके आखिरी 2 मिनट में एक ऐसी सीख है जो आपके परिवार को हमेशा जोड़े रखेगी।
नमस्कार, आप देख रहे हैं  gyanoday चैनल और मैं आपका अपना  डॉ . आलोक । आज की हमारी पौराणिक कथा है - पितृभक्ति के प्रतीक श्रवण कुमार की।
अगर आप पहली बार आये हैं और ऐसी ही सच्ची, भावुक पौराणिक कथाएं सुनना पसंद करते हैं, तो अभी चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन दबा दीजिए, ताकि हर कथा सबसे पहले आप तक पहुंचे।
और कमेंट में दिल से लिख दीजिए - मातृ पितृ देवो भव।
बात त्रेता युग की है। अयोध्या के पास एक छोटे से आश्रम में एक ऋषि दंपत्ति रहते थे। कुछ ग्रंथों में उनका नाम
शांतनु ऋषि और ज्ञानवती बताया गया है। दोनों ही नेत्रहीन थे। आंखों से नहीं देख सकते थे, पर तपस्वी बहुत बड़े थे।
उनकी कोई संतान नहीं थी। वर्षों तक उन्होंने भगवान की तपस्या की। तब जाकर उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ। उस पुत्र का नाम रखा गया - श्रवण। श्रवण का अर्थ होता है - सुनना। कहते हैं वह बहुत आज्ञाकारी था, जो सुनता था वही करता था, इसलिए उसका नाम श्रवण पड़ा।
श्रवण बचपन से ही दूसरों से अलग था। जहाँ दूसरे बच्चे खेलने में लगे रहते, श्रवण अपने अंधे माता-पिता की सेवा में लगा रहता। उनके लिए पानी लाना, फल लाना, उनके पैर दबाना, उन्हें कथा सुनाना। यही उसकी दिनचर्या थी।
धीरे-धीरे श्रवण बड़ा हुआ। उसके माता-पिता बूढ़े होते गए। एक दिन उसकी माता ने कहा, बेटा, आंखें न होने से हम कभी तीर्थ नहीं कर पाए। मन में बड़ी इच्छा है कि मरने से पहले एक बार चारों धाम की यात्रा कर लें।
पिता ने भी कहा, बेटा हम तो जा नहीं सकते, पर इच्छा बहुत है।
यह बात श्रवण के दिल में घर कर गई।
अब यहाँ श्रवण के सामने दो रास्ते थे। या तो वह माता-पिता को समझा देता कि अंधे होने से तीर्थ यात्रा असंभव है, या फिर वह कुछ ऐसा करता जो आज तक किसी ने नहीं किया था।
श्रवण ने जो दूसरा रास्ता चुना, उसी ने उसे अमर बना दिया।
अब यहाँ श्रवण के सामने दो रास्ते थे। या तो वह माता-पिता को समझा देता कि अंधे होने से तीर्थ यात्रा असंभव है, या फिर वह कुछ ऐसा करता जो आज तक किसी ने नहीं किया था।
श्रवण ने जो दूसरा रास्ता चुना, उसी ने उसे अमर बना दिया।
उस जमाने में आज जैसी सुविधा नहीं थी। श्रवण के पास न रथ था, न घोड़ा, न धन। तो उसने अपने हाथों से एक कांवड़ बनाई। एक मजबूत लकड़ी के डंडे के दोनों किनारों पर दो बड़ी टोकरियां बांधी।
उसने अपने माता-पिता से कहा, पिताजी, माताजी, आप इसी टोकरी में बैठ जाइए। आपका बेटा आपको तीर्थ कराएगा।
सोचिए उस दृश्य को। एक जवान बेटा, कंधे पर लकड़ी का कांवड़, एक तरफ अंधी माँ, दूसरी तरफ अंधे पिता। और वह नंगे पैर पैदल चल रहा है।
काशी, प्रयाग, गया, हरिद्वार... एक-एक करके वह अपने माता-पिता को सभी तीर्थों के दर्शन कराने लगा। जहाँ भी जाता, पहले माता-पिता को स्नान कराता, फिर खुद करता।
रास्ते में लोग देखते तो प्रणाम करते। कहते, धन्य है यह पुत्र।
चलते-चलते कई महीने बीत गए। घूमते-घूमते वह अयोध्या के पास वाले जंगल में पहुँच गया। गर्मी का मौसम था। उसके माता-पिता को बहुत प्यास लगी
यह वही जंगल था जहाँ अयोध्या के युवा राजा दशरथ शिकार करने आये हुए थे। राजा दशरथ को एक विशेष विद्या आती थी - शब्दभेदी बाण। मतलब आवाज सुनकर निशाना लगाना, बिना देखे भी।
उसी दोपहर श्रवण के माता-पिता ने कहा, बेटा बहुत प्यास लगी है।
श्रवण ने कहा, आप यहीं बैठिए, पास में ही सरयू नदी बह रही है, मैं अभी जल लेकर आता हूँ।
वह एक मिट्टी की गगरी लेकर सरयू नदी की ओर चला गया।
इधर दशरथ नदी किनारे घात लगाए बैठे थे। उन्हें लगा कोई हिरण पानी पीने आया है।
उधर श्रवण नदी में गगरी डुबो रहा था। गगरी में से गड़-गड़ की आवाज आ रही थी - बुड़-बुड़।
दशरथ ने वही आवाज सुनी। उन्हें लगा कोई जानवर पानी पी रहा है। उन्होंने बिना सोचे-समझे, आवाज की दिशा में अपना शब्दभेदी बाण छोड़ दिया।
आगे क्या हुआ, वो सुनकर आपकी आंखें भर आएंगी। पर उससे पहले, अगर आपको लगता है कि आज के समय में भी माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है, तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर कीजिए। आपका एक लाइक इस पितृभक्ति की कहानी को और हजारों लोगों तक पहुंचाएगा।
बाण सीधा जाकर श्रवण कुमार की छाती में लगा।
श्रवण के मुंह से चीख निकली - हाय माँ...
वह वहीं नदी किनारे गिर पड़ा। गगरी हाथ से छूट गई।
दशरथ दौड़े-दौड़े आये। देखा तो एक जवान तपस्वी लड़का खून से लथपथ पड़ा है। दशरथ का दिल कांप उठा। उन्होंने कहा, तुम कौन हो, मैंने यह क्या कर दिया?
श्रवण ने बड़ी मुश्किल से कहा, राजन, मैं किसी का अपराधी नहीं। मैं तो एक अंधे माता-पिता का पुत्र हूँ। वे प्यासे हैं, वह सामने पेड़ के नीचे बैठे हैं। मुझे छोड़िए, पहले उन्हें जल पिला दीजिए। और उनसे कहना कि उनका श्रवण अब नहीं आएगा।
इतना कहकर श्रवण ने प्राण त्याग दिए।
दशरथ कांपते हाथों से जल लेकर उस पेड़ के पास पहुंचे जहाँ दो अंधे वृद्ध बैठे थे।
वृद्ध माँ बोली, बेटा श्रवण, इतनी देर लगा दी? जल लाए?
दशरथ कुछ बोल नहीं पाए। उन्होंने जल का पात्र आगे किया।
पिता ने जल पिया और कहा, तुम श्रवण नहीं हो। तुम्हारे हाथ कांप रहे हैं। बताओ मेरा पुत्र कहाँ है?
तब दशरथ को सारी सच्चाई बतानी पड़ी। उन्होंने रोते हुए कहा कि मुझसे भूल हुई, मेरे बाण से आपके पुत्र की मृत्यु हो गई।
यह सुनते ही दोनों वृद्ध जैसे पत्थर बन गए। फिर माँ फूट-फूट कर रोने लगी। पिता ने दशरथ से कहा, हमें वहाँ ले चलो जहाँ हमारा पुत्र पड़ा है।
दशरथ उन्हें नदी किनारे लाए। दोनों ने अपने मृत बेटे के शव को टटोला, उसे गोद में लिया।
और तब उस अंधे पिता ने रोते हुए दशरथ को श्राप दिया।
कहा, हे राजन, जिस प्रकार हम दोनों पुत्र के वियोग में अपने प्राण त्याग रहे हैं, उसी प्रकार तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग में ही होगी।
यह कहकर दोनों ने भी वहीं अपने प्राण छोड़ दिए।
यही श्राप था जिसने दशरथ के जीवन की दिशा बदल दी।
यही कारण था कि वर्षों बाद जब राजा दशरथ के चार पुत्र हुए - राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न - और जब राम को वनवास हुआ, तो दशरथ उस पुत्र वियोग को सह नहीं पाए।
राम के अयोध्या छोड़ते ही दशरथ ने कहा था, राम... राम... और पुत्र वियोग में ही उनके प्राण चले गए। अंधे माता-पिता का दिया हुआ श्राप सत्य हो गया।
तो देखा आपने, कैसे एक पुत्र की भक्ति और एक राजा की एक भूल, दोनों ने मिलकर रामायण की सबसे बड़ी घटना की नींव रख दी।
इस कहानी से हमें दो सीख मिलती हैं।
पहली - माता-पिता की सेवा से बड़ा कोई तीर्थ नहीं, कोई धर्म नहीं। श्रवण कुमार ने हमें सिखाया कि भगवान को ढूंढने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं, अपने माता-पिता में ही भगवान देख लो।
दूसरी - बिना सोचे समझे कोई काम नहीं करना चाहिए। दशरथ जैसे धर्मात्मा राजा से भी एक भूल हुई और उसका परिणम उन्हें जीवन भर भुगतना पड़ा। इसलिए कोई भी तीर, कोई भी शब्द, सोच समझ कर ही छोड़ना चाहिए।
अगर यह कथा आपके दिल को छू गई हो, तो इसे अपने माता-पिता के साथ जरूर साझा कीजिए।
कमेंट में जरूर बताइए, आपको इस कहानी का कौन सा हिस्सा सबसे ज्यादा भावुक लगा?
और ऐसी ही अनसुनी पौराणिक कथाओं के लिए चैनल को सब्सक्राइब करना मत भूलिए।
फिर मिलेंगे एक और दिव्य कथा के साथ। तब तक अपना और अपने माता-पिता का ख्याल रखिए।
जय श्री राम, मातृ पितृ देवो भव।

4.8.26

घटोत्कच : महाभारत का मायावी योद्धा



घटोत्कच की कथा महाभारत में एक अद्भुत अध्याय है, जो वीरता, बलिदान और रणनीति का अनोखा संगम प्रस्तुत करती है। यह कथा न केवल युद्धभूमि की गाथा है बल्कि भावनाओं, रिश्तों और धर्म के गहरे प्रश्नों को भी उजागर करती है।
महाभारत के युद्ध में जब पांडव और कौरव आमने-सामने खड़े हुए, तब घटोत्कच का प्रवेश युद्धभूमि में हुआ। घटोत्कच भीम का पुत्र था, जिसकी माता हिडिंबा राक्षसी थी। इस कारण उसमें असाधारण शक्ति और मायावी सामर्थ्य थी। उसका शरीर विशालकाय था, और उसकी गर्जना से ही शत्रु भयभीत हो जाते थे।
कौरवों के विरुद्ध जब युद्ध का संतुलन बिगड़ने लगा, तब घटोत्कच को बुलाया गया। उसकी मायावी शक्ति ने कौरव सेना को हिला दिया। वह आकाश में उड़कर शत्रुओं पर प्रहार करता, कभी विशाल पर्वत जैसा रूप धारण करता, तो कभी अग्नि की ज्वाला बनकर शत्रुओं को जलाता। उसकी शक्ति से दुर्योधन और उसकी सेना भयभीत हो उठी।
घटोत्कच का युद्ध केवल शारीरिक बल का नहीं था, बल्कि उसकी मायावी शक्ति ने कौरवों को असहाय कर दिया। दुर्योधन ने जब देखा कि उसकी सेना टूट रही है, तब उसने कर्ण को पुकारा। कर्ण के पास इंद्र द्वारा दिया गया दिव्य अस्त्र "वज्र" था, जिसे वह केवल एक बार प्रयोग कर सकता था। यह अस्त्र उसने अर्जुन के लिए सुरक्षित रखा था। लेकिन घटोत्कच की प्रचंडता ने दुर्योधन को विवश कर दिया कि वह कर्ण से उस अस्त्र का प्रयोग घटोत्कच पर करवाए।
कर्ण ने दिव्य अस्त्र का प्रयोग किया और घटोत्कच युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुआ। किंतु उसकी मृत्यु भी पांडवों के लिए वरदान सिद्ध हुई। क्योंकि वह अस्त्र, जो अर्जुन के लिए सुरक्षित था, घटोत्कच पर खर्च हो गया। इस प्रकार घटोत्कच ने अपने बलिदान से अर्जुन का जीवन बचाया और पांडवों की विजय का मार्ग प्रशस्त किया।
घटोत्कच की कथा हमें यह सिखाती है कि वीरता केवल युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि धर्म और कर्तव्य के लिए बलिदान देने में भी है। उसका बलिदान महाभारत की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।