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30.10.26

मैं 86 साल का हूँ, M.A., Ayurved Ratna, D.I.Hom London | गीता से जो सीखा वो आज बता रहा हूँ




मैं 86 साल का हूँ।छियासी साल।
मैंने M.A. किया,
Ayurved Ratna की उपाधि ली,
London से D.I.Hom किया,
जीवन भर आयुर्वेद से लोगों की सेवा की।
आज मैं अध्यक्ष हूँ,
अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ का।
इतनी डिग्रियाँ,
इतने पद,
इतना अनुभव...
लेकिन सच कहूँ?
इन सब डिग्रियों ने मुझे किताबी ज्ञान दिया,
लेकिन जीने का ज्ञान मुझे सिर्फ एक किताब ने दिया,
भगवद् गीता ने।
आज मैं कोई लेक्चर देने नहीं आया।
आज मैं मरने से पहले,
अपने 86 साल का निचोड़,
आपको 7 बातों में देना चाहता हूँ।
अगर आप 20 साल के हैं,
तो ये 7 बातें आपको 20 साल की ठोकरों से बचा लेंगी।
सातवीं बात सबसे जरूरी है,
जो मैंने 84 साल की उम्र में सीखी,
जब सब कुछ छूट गया था।
आखिर तक सुन लीजिएगा।
कुछ भी हमेशा नहीं रहता
पहली बात - जो गीता का पहला सत्य है।
कृष्ण कहते हैं,
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
जो नहीं है, वो रहेगा नहीं,
जो है, वो मिटेगा नहीं।
मैंने Ayurved Ratna बन कर हजारों नाड़ी देखीं,
M.A. करके बहुत से शास्त्र पढ़े,
London तक पढ़ने गया।
लेकिन एक बात समझ आई,
जवानी नहीं रही,
काले बाल नहीं रहे,
कई दोस्त नहीं रहे,
पद नहीं रहे,
यहाँ तक की शरीर भी रोज बदल रहा है।
पहले मैं दुखी होता था,
अब नहीं होता।
क्यों?
क्योंकि गीता ने कहा,
परिवर्तन ही संसार का नियम है।
सुख भी मेहमान है,
दुख भी मेहमान है,
दोनों आएंगे, जाएंगे,
तुम घर के मालिक बन कर स्थिर रहो।
मैंने क्या सीखा?
जब अच्छा समय आए तो उछलो मत,
जब बुरा समय आए तो रोओ मत,
ये भी बीत जाएगा।
ये लाइन मैंने अपनी डिस्पेंसरी में भी लिख कर रखी थी,
और आज भी अपने कमरे में लिख कर रखी है।
लेकिन स्थिर रहा कैसे जाए?
जब मन ही रोज भागता है,
दूसरी बात इसी मन की है,
जिसने मुझे 40 साल तक भटकाया।
मन को जीत लो
दूसरी बात - मन ही बंधन है, मन ही मुक्ति है।
कृष्ण कहते हैं,
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
जिसने मन को जीत लिया,
मन उसका दोस्त,
जिसने नहीं जीता,
मन उसका दुश्मन।
मैं सच बताऊँ,
मैं बहुत पढ़ा लिखा हूँ,
लेकिन 40 साल तक मैं अपने मन का गुलाम रहा।
मन ने कहा ज्यादा खा ले,
खा लिया,
मन ने कहा गुस्सा कर ले,
कर लिया,
मन ने कहा कल कर लेंगे,
टाल दिया।
आयुर्वेद में हम कहते हैं,
मन ही सारे रोगों की जड़ है,
और गीता भी यही कहती है।
50 साल की उम्र में जब घुटनों में दर्द हुआ,
तब समझ आया,
ये शरीर तो मन की ही सुन रहा था।
तब से मैंने एक नियम बनाया,
रोज सुबह 15 मिनट,
मैं मन से बात करता हूँ,
आँख बंद करके,
सिर्फ साँस को देखता हूँ,
आती है, जाती है।
मन भागता है,
100 बार भागता है,
मैं प्यार से वापस लाता हूँ।
30 साल से कर रहा हूँ,
अब मन थोड़ा सुनने लगा है।
आपके लिए सीख,
मन को डांटो मत,
बच्चे की तरह समझाओ,
रोज 10 मिनट बिना मोबाइल के बैठो,
ये 10 मिनट आपके 86 साल बचा लेंगे।
कर्म करो, फल छोड़ो
तीसरी बात - गीता का दिल।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मैंने जीवन में बहुत हिसाब लगाए,
इतनी पढ़ाई की तो इतनी इज्जत मिलेगी,
इतनी सेवा की तो लोग याद रखेंगे,
इतना समाज का काम किया तो नाम होगा।
लेकिन हिसाब हमेशा गलत निकला।
जिस काम में सबसे ज्यादा मेहनत की,
फल सबसे देर से मिला।
तब गीता ने कहा,
अरे, तू फल का हिसाब लगाने वाला कौन होता है?
तेरा काम है बीज बोना,
फल देना प्रकृति का काम है,
ईश्वर का काम है।
जैसे एक वैद्य का काम है सही दवा देना,
मरीज ठीक होगा या नहीं,
ये उसके हाथ में नहीं,
लेकिन वैद्य दवा देना बंद कर दे तो?
इसलिए मैंने फल छोड़ दिया।
आज भी मैं सुबह 5 बजे उठता हूँ,
गीता पढ़ता हूँ,
कोई देखे या ना देखे,
कोई लाइक करे या ना करे,
मुझे अपना कर्म करना है।
और यकीन मानो,
जब से फल छोड़ा,
मन इतना हल्का हो गया,
जैसे सिर से 50 किलो बोझ उतर गया।
रुकिए,
अगर एक 86 साल के,
M.A., Ayurved Ratna,
अध्यक्ष के अनुभव की ये बातें आपको सच्ची लग रही हैं,
तो इस वीडियो को एक Like कर दीजिए।
आपका एक Like मुझे नहीं,
YouTube को बताता है कि
एक बुजुर्ग का सच्चा अनुभव और लोगों तक जाना चाहिए।
और अगर आप चाहते हैं कि मैं हर हफ्ते
ऐसे ही जीवन के सच्चे अनुभव बताता रहूँ,
तो Subscribe करके Bell दबा दीजिए।
चौथी बात रिश्तों की है,
जिसने मुझे सबसे ज्यादा रुलाया।
बात 4 - प्रेम करो, मोह मत करो
चौथी बात - मोह दुख देता है, प्रेम नहीं।
हम कहते हैं मुझे परिवार से प्रेम है,
गीता कहती है जरा जांचो,
वो प्रेम है या मोह?
प्रेम कहता है तू खुश रहे,
मोह कहता है तू मेरे हिसाब से खुश रहे।
मैंने अपने बच्चों से मोह किया,
अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ के अपने समाज के बच्चों से भी मोह किया,
सोचा मेरे हिसाब से चलेंगे।
जब उन्होंने अपने हिसाब से किया,
तो दुख हुआ।
कृष्ण कहते हैं,
अर्जुन तू इसी मोह में तो रो रहा है।
प्रेम में स्वतंत्रता है,
मोह में बंधन है।
86 साल में मैंने सीखा,
बाँधने से कोई नहीं बंधता,
छोड़ने से ही सब पास आते हैं।
आज मैं अपने समाज के युवाओं से भी कहता हूँ,
बेटा तुम्हारी जिंदगी है, तुम जियो,
मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें बाँधूंगा नहीं।
और आश्चर्य देखिए,
अब वो खुद मेरे पास आते हैं, सलाह लेते हैं।
आपके लिए नियम,
आज से किसी को बदलने की कोशिश मत करो,
खुद को अच्छा बना लो,
रिश्ते खुद सुधर जाएंगे।
बात 5 और 6
तुलना बंद करो।
मैंने 60 साल तुलना की,
उसके पास बड़ी गाड़ी है,
उसका बेटा ज्यादा कमाता है,
उसका समाज बड़ा है।
गीता कहती है,
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्।
दूसरे का धर्म कितना भी अच्छा लगे,
अपने धर्म में ही रहो।
मैं M.A. हूँ, Ayurved Ratna हूँ,
London से पढ़ा हूँ,
लेकिन जब तक तुलना करता था,
दुखी था।
जैसे ही तुलना बंद की,
मैं अमीर बन गया,
मन से अमीर।
छठी बात - संतोष।
आयुर्वेद में हम कहते हैं,
संतोष सबसे बड़ी औषधि है।
आज हर कोई दौड़ रहा है,
और दौड़, और दौड़।
मैंने भी दौड़ी,
80 साल की उम्र में डॉक्टर ने कहा अब धीरे चलो,
तब समझ आया,
दौड़ना ही बीमारी थी।
गीता कहती है,
जो मिला है उसमें संतोष करो,
जो नहीं मिला उसके लिए पुरुषार्थ करो।
आज मेरे पास एक छोटा कमरा है,
एक गीता है,
एक लोटा पानी है,
मैं दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक हूँ,
क्योंकि मुझे और चाहिए ही नहीं।
अंतिम बात से पहले
और अब सातवीं और आखिरी बात,
जो मैंने 84 साल में सीखी,
जब मेरी जीवन संगिनी मुझे छोड़ कर गई,
अगर ये नहीं सुनी तो सब बेकार है।
बात 7 - शरणागति
सातवीं बात - सब छोड़ कर उसकी शरण में चले जाओ।
9 साल पहले जब पत्नी चली गई,
मैं टूट गया,
55 साल का साथ,
एक दिन में खत्म।
मैं M.A. हूँ, बहुत पढ़ा हूँ,
Ayurved Ratna हूँ, बहुत लोगों का इलाज किया है,
अध्यक्ष हूँ, हजारों लोगों को संभाला है,
लेकिन उस दिन खुद को नहीं संभाल पाया।
गीता के सामने बैठ कर रोया,
कहा कृष्ण, अब क्या करूं?
तभी अंतिम श्लोक सामने आया,
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
सब छोड़ कर मेरी शरण में आ जा,
मैं संभाल लूंगा, तू शोक मत कर।
मैंने सब छोड़ दिया,
चिंता छोड़ दी,
डर छोड़ दी,
मैं क्या करूंगा ये सोचना छोड़ दिया,
कहा कृष्ण, अब तुम संभालो।
उस दिन के बाद से मैं अकेला नहीं हूँ,
कोई है जो मेरे साथ चल रहा है।
86 साल में मैंने एक ही सच जाना,
हम कर्ता नहीं हैं,
हम तो निमित्त हैं,
करने वाला तो वो है।
जब ये मैं हट जाता है,
तो सारा बोझ हट जाता है।
तो मेरे बच्चों,
मैं डॉ. आलोक दयाराम,
M.A., Ayurved Ratna, D.I.Hom London,
अध्यक्ष, अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ,
86 साल का अनुभव लेकर,
आपसे हाथ जोड़ कर 7 बातें कह कर जा रहा हूँ,
कुछ भी हमेशा नहीं रहता,
मन को दोस्त बनाओ,
कर्म करो, फल छोड़ो,
प्रेम करो, मोह नहीं,
तुलना छोड़ो,
संतोष में रहो,
और आखिर में सब कृष्ण पर छोड़ दो।
अर्जुन ने कहा था,
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा।
मेरा मोह नष्ट हो गया।
आज मैं भी कह रहा हूँ,
मेरा मोह नष्ट हो गया।
अब आप बताइए,
इन 7 में से कौन सी बात आप आज से अपनाएंगे?
नीचे Comment में नंबर लिखिए,
1 से 7 तक,
मैं खुद पढ़ता हूँ, आँखें थोड़ी कमजोर हैं,
पर हर Comment पढ़ता हूँ।
और अगर एक बुजुर्ग की ये बातें किसी और के काम आ सकती हैं,
तो इसे अपने बच्चों को, अपने समाज के युवाओं को Share जरूर करिए।
क्या पता आपके एक Share से किसी को जीने की उम्मीद मिल जाए।
मैं मिलता हूँ अगले हफ्ते,
जय श्री कृष्ण,
राधे राधे।