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28.8.26

"वो कभी झुका नहीं, वो कभी रुका नहीं - महाराणा प्रताप"

                                 

सोचिए...
एक राजा... जिसके पास न महल था... न सेना थी... न खजाना था...
फिर भी... हिंदुस्तान के सबसे ताकतवर बादशाह अकबर ने उसे कभी हरा नहीं पाया!
घास की रोटी खाई... जंगलों में सोया...
लेकिन... मेवाड़ की मिट्टी का सौदा नहीं किया।
मैं बात कर रहा हूँ... मेवाड़ के शेर... वीर शिरोमणि... महाराणा प्रताप की...
जो कभी झुका नहीं... और कभी रुका नहीं।
नमस्कार, मैं हूँ डॉ . दयाराम आलोक और आप देख रहे हैं gyanoday
आज की कहानी है... स्वाभिमान की... शौर्य की... और एक ऐसे योद्धा की... जिसने इतिहास को बता दिया... कि जीत तलवार से नहीं... हौसले से मिलती है।
जन्म और संकल्प
9 मई 1540... मेवाड़ के कुम्भलगढ़ किले में... महाराणा उदय सिंह के घर जन्म हुआ... प्रताप का।
बचपन से ही... निडर... घुड़सवारी में माहिर... और तलवार का धनी।
1572 में... जब वो मेवाड़ के राजा बने... तब सामने थी... अकबर की विशाल सल्तनत।
अकबर का प्रस्ताव था - संधि कर लो... मेरा आधिपत्य स्वीकार कर लो... सुख से रहो।
पर प्रताप का जवाब था - मेवाड़ स्वतंत्र था... है... और रहेगा।
 हल्दीघाटी का युद्ध - [यहाँ आपका कोट शामिल है]
और फिर आया... 18 जून 1576 का वो दिन... हल्दीघाटी का युद्ध।
एक तरफ... अकबर की 80 हजार की सेना... मानसिंह के नेतृत्व में...
दूसरी तरफ... महाराणा प्रताप के सिर्फ 20 हजार वीर।
यहीं पर इतिहास ने... चेतक का बलिदान देखा।
जैसा कि भारतीय इतिहास के जानकार डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार --- "हल्दीघाटी का युद्ध केवल दो सेनाओं का युद्ध नहीं था, यह दो विचारधाराओं का युद्ध था। एक तरफ साम्राज्यवाद था, दूसरी तरफ स्वाभिमान। महाराणा प्रताप भले ही रणभूमि से हटे, पर वे हारे नहीं। उन्होंने अकबर की अधीनता को कभी स्वीकार नहीं किया, यही उनकी सबसे बड़ी जीत थी।"
सच है... युद्ध अनिर्णायक रहा... पर अकबर मेवाड़ को कभी जीत नहीं पाया।
 संघर्ष के दिन
युद्ध के बाद... प्रताप ने जंगल-जंगल भटकना स्वीकार किया...
उनके परिवार ने घास की रोटियां खाईं... पर कभी... अकबर के सामने सिर नहीं झुकाया।
कहते हैं... एक बार... उनकी बेटी के हाथ से घास की रोटी... जंगली बिल्ली छीन ले गई... और वो रो पड़ी...
यह सुनकर प्रताप का दिल पसीज गया... उन्होंने अकबर को पत्र लिखने का सोचा... पर तभी... पृथ्वीराज राठौड़ का पत्र आया... "क्षत्रिय का धर्म समझौता नहीं... संघर्ष है।"
और प्रताप फिर उठ खड़े हुए।
उन्होंने... भामाशाह के सहयोग से... फिर से सेना बनाई... और मेवाड़ के एक-एक किले को... वापस जीत लिया... चित्तौड़ को छोड़कर।
6. OUTRO - प्रेरणा
19 जनवरी 1597... एक शिकार दुर्घटना में... ये महान योद्धा... हमें छोड़कर चला गया...
पर वो हमें एक संदेश दे गया...
कि... सुविधाएं छोड़ना आसान है... पर स्वाभिमान छोड़ना... मृत्यु के समान है।
वो कभी झुका नहीं... क्योंकि उसके लिए देश पहले था...
वो कभी रुका नहीं... क्योंकि उसका लक्ष्य स्वतंत्रता था।
अगर आपको लगता है... कि महाराणा प्रताप की ये कहानी... हर भारतीय युवा तक पहुँचनी चाहिए...
तो इस वीडियो को... एक लाइक जरूर कीजिए।
कमेंट में... जय महाराणा प्रताप... लिखना मत भूलिएगा... ताकि मुझे भी पता चले... आप कितने गर्व से इतिहास को याद करते हैं।
और ऐसे ही... भारत के गौरवशाली इतिहास की अनसुनी कहानियों के लिए... चैनल को सब्सक्राइब करके... बेल आइकॉन दबा दीजिए।
जय मेवाड़... जय महाराणा प्रताप!