3.4.25

क्यों पत्थरकी शीला बनी अहिल्या ,किसने किया अहिल्या उद्धार !



अ हिल्या एक बहुत ही सुंदर स्त्री थी. अहिल्या को ये वरदान मिला हुआ था कि उनका योवन सदा बना रहेगा. अहिल्या की सुंदरता के आगे तो स्वर्ग की अप्सराएं भी पानी थी, इसलिए देवता भी अहिल्या के कायल हुआ करते थें. लेकिन एक श्राप के कारण अहिल्या पत्थर की शिला में तब्दील हो गई थी.
पौराणिक ग्रंथों में अहिल्या के बारे में बहुत सारी कथाएं प्रचलित हैं. तो चलिए जानते हैं आखिर किस श्राप की वजह से अहिल्या पत्थर की शिला बन गई थीं और फिर उसके बाद किस प्रकार से नया जीवनदान मिला.
पुराणों के अनुसार अहिल्या ब्रह्मा की पुत्री थी. इसलिए वो काफी ज्ञानी और सुंदर थीं. अहिल्या के बड़ी होने पर ब्रह्माजी ने उनकी शादी किसी साधु से ही करने का फैसला किया. लेकिन शर्त यह रखी कि जो कोई पृथ्वी का चक्कर लगाकर सबसे पहले आएगा, उसी का विवाह अहिल्या से होगा.अति सुंदर अहिल्या को पाने के लिए सभी देवता और अन्य गणमान्य लोग शर्त पूरी करने के लिए निकल पड़ते हैं. लेकिन अहिल्या का ध्यान गौतम ऋषि की ओर जाता है. अहिल्या उनके चेहरे से इतनी प्रभावित होती हैं कि गौतम ऋषि से ही शादी करने की बात कहती है.

विवाह से इंद्र हुए नाराज : 

महर्षि गौतम और अहिल्या का आपस में विवाह होता है. लेकिन दूसरे देवता इस शादी से बिल्कुल भी खुश नहीं होते हैं और ऐसा भी कहा जाता है कि देवराज इंद्र को भी अहिल्या काफी पसंद थी .इसीलिए जब उन्हें अहिल्या प्राप्त नहीं हुई तो इंद्र ने अपनी वासना को शांत करने के लिए एक षड्यंत्र रचा. 
  गौतम रोजाना भोर होने से पहले जग जाते और अपने नित्यकर्म निपटाने के लिए नदी किनारे जाते थे। वहां 2-3 घंटे का समय बिताकर फिर कुटिया में आते थे। इंद्र ने इसी मौके का फायदा उठाने की योजना बनाई। एक रात जब गौतम ऋषि और अहिल्या सो गए, फिर कुछ समय बाद इंद्र ने अपनी शक्ति से भोर होने का कृत्रिम आवरण बना लिया। ऋषि गौतम को लगा कि सुबह होने को है, वे रोजाना की तरह उठ गए और नित्यकर्म के लिए निकल पड़े।
  इधर इंद्र ने गौतम ऋषि का भेस धारण कर कुटिया में प्रवेश किया। अहिल्या को लगा कि उनके पति नित्यकर्म से निपटकर आ गए हैं। फिर इंद्र ने गौतम ऋषि के भेस में अहिल्या से प्यार भरी बातें की और उसके साथ संबंध बना लिए। दूसरी ओर, जब ऋषि नदी किनारे पहुंचे तो वहां के जनजीवन को देखकर उन्हें आभास हो गया कि किसी ने धोखे से सुबह का आवरण बनाया है। वे तुरंत अपनी कुटिया में पहुंचे, जहां उनके भेस में इंद्र उनकी पत्नी के साथ सो रहे थे।

गौतम ऋषि ने दिया श्राप

अहिल्या के साथ समागम करने के बाद इंद्र आश्रम से निकले. इंद्र को अपने ही आश्रम से निकलते हुए गौतम ऋषि ने देख लिया, एक ही बार में उन्हें सारी बात समझ में आ गई. इसलिए उन्होंने बिना किसी से कारण जाने अहिल्या को पत्थर बनने का श्राप दे दिया. इसके बाद कोई गलती ना होने के बावजूद भी अहिल्या ने पति के श्राप को स्वीकार किया |
अहिल्या ने गौतम ऋषि से कहा कि उन्हें बिल्कुल भी यह एहसास नहीं हुआ कि उनके भेस में कोई और शख्स उनके साथ सोया है। इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी। उनके मन में छल की कोई भावना नहीं थी। गौतम ऋषि ने अहिल्या को वरदान दिया कि कालांतर में भगवान विष्णु का अवतार राम तुम्हारे पास आएगा और उसके छूने से तुम फिर से पहले जैसी बन जाओगी। सालों बाद श्रीराम ने विष्णु के अवतार के रूप में धरती पर जन्म लिया। राम ने ही बाद में अहिल्या को छूकर उन्हें श्राप से मुक्त किया।





दूसरी तरफ अहिल्या ने भी गौतम ऋषि से कहा कि उन्हें बिल्कुल भी यह एहसास नहीं हुआ कि उनके भेस में कोई और शख्स उनके साथ सोया है। इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी। उनके मन में छल की कोई भावना नहीं थी। गौतम ऋषि ने अहिल्या को वरदान दिया कि कालांतर में भगवान विष्णु का अवतार तुम्हारे पास आएगा और उसके छूने से तुम फिर से पहले जैसी बन जाओगी। सालों बाद श्रीराम ने विष्णु के अवतार के रूप में धरती पर जन्म लिया। राम ने ही बाद में अहिल्या को छूकर उन्हें श्राप से मुक्त किया।

1.4.25

राजा शिवि और बाज की पौराणिक कहानी





दानवीर महाराजा शिवि की कहानी 

भारतीय धार्मिक कहानियों में महाराजा शिवि की कहानी (प्रमुख है। पुरुवंश में जन्मे उशीनर देश के राजा शिवि बड़े ही परोपकारी और धर्मात्मा थे । परम दानवीर राजा शिवि के द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं जाता था। प्राणियों के प्रति राजा शिवि का बड़ा स्नेह था। उनके राज्य में हमेशा सुख – शांति और स्नेह का वातावरण बना रहता था। ईश्वर भक्त राजा शिवि की चर्चा स्वर्गलोक तक होती थी। देवताओं के मुख से राजा शिवि की इस प्रसिद्धि के बारे में सुनकर इंद्र और अग्नि को विश्वास नहीं होता था। अतः उन्होंने उशीनर  नरेश की परीक्षा करने की ठानी और एक युक्ति निकाली।

महाराजा शिवि की परीक्षा

अग्नि ने कबूतर का रूप धारण किया और इंद्र ने एक बाज का रूप धारण किया। दोनों उड़ते – उड़ते राजा शिवि के राज्य में पहुँचे। उस समय राजा शिवि एक धार्मिक यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे। कबूतर उड़ते – उड़ते आर्तनाद करता हुआ राजा शिवि की गोद में आ गिरा और मनुष्य की भाषा में बोला – “ राजन ! मैं आपकी शरण आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।”
थोड़ी ही देर में कबूतर के पीछे – पीछे बाज भी वहाँ आ पहुँचा और बोला – “ राजन ! निसंदेह आप धर्मात्मा और परोपकारी राजा है। आप कृतघ्न को धन से, झूठ को सत्य से, निर्दयी को क्षमा से और क्रूर को साधुता से जीत लेते है, इसलिए आपका कोई शत्रु नहीं इसलिए आप अजातशत्रु नाम से प्रसिद्ध है। आप अपकार करने वाले का भी उपकार करते है, आप दोष खोजने वालों में भी गुण खोजते है। ऐसे महान होकर आप यह क्या कर रहे है ?
मैं क्षुधा से व्याकुल होकर भोजन की तलाश में भटक रहा था। तभी संयोग से मुझे यह पक्षी मिला और आप इसे शरण दे रहे है। यह आप अधर्म कर रहे है। कृपा करके यह कबूतर मुझे दे दीजिये। यह मेरा भोजन है।” इतने में कबूतर बोला – “ शरणार्थी की प्राण रक्षा करना आपका धर्म है । अतः आप इस बाज की बात कभी मत मानिये। यह दुष्ट बाज मुझे मार डालेगा।”

धर्मपरायण महाराजा शिवि  का जवाब


दोनों की बात सुनकर राजा शिवि बाज से बोले – “ हे बाज ! यह कबूतर तुम्हारे भय से भयभीत होकर मेरी शरण आया है, अतः यह मेरा शरणार्थी है। मैं अपनी शरण आये शरणार्थी का त्याग कैसे कर सकता हूँ ? जो मनुष्य भय, लोभ, ईर्ष्या, लज्जा या द्वेष से शरणागत की रक्षा नहीं करते या उसे त्याग देते है उन्हे ब्रह्महत्या के समान पाप लगता है। सभी जीवों को अपने प्राण प्रिय होते हैं। समर्थ और बुद्धिमान मनुष्यों को चाहिए कि असमर्थ व मृत्युभय से भयभीत जीवों की रक्षा करें। अतः हे बाज ! मृत्यु के भय से भयभीत यह कबूतर मैं तुझे नहीं दे सकता। इसके बदले तुम जो चाहो खाने के लिए मांग सकते हो। मैं तुझे वह अभीष्ट वस्तु देने को तैयार हूँ ।”
तब बाज बोला – “हे राजन ! मैं क्षुधा से पीड़ित हूँ । आप तो जानते ही है, भोजन से ही जीव उत्पन्न होता है और बढ़ता है। यदि मैं क्षुधा से मरता हूँ तो मेरे बच्चे भी मर जायेंगे। आपके एक कबूतर को बचाने से कई जीवों के प्राण जाने की संभावना है। हे राजन ! आप ऐसे कैसे धर्म का अनुसरण कर रहे है जो अधर्म को जन्म देने वाला है। बुद्धिमान मनुष्य उसी धर्म का अनुसरण करते है जो दुसरे धर्म का हनन न करें। आप अपने विवेक के तराजू से तोलिये और जो धर्म आपको अभीष्ट हो वह मुझे बताइए।”

शरणार्थी की रक्षा धर्म है

राजा शिवि बोले – “ हे बाज ! भय से व्याकुल हुए शरणार्थी की रक्षा करने से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। जो मनुष्य दया और करुणा से द्रवित होकर जीवों को अभयदान देता है, वह देह के छूटने पर सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है। धन, वस्त्र, गौ और बड़े बड़े यज्ञों का फल यथासमय नष्ट हो जाता है किन्तु भयाकुल प्राणी को दिया अभयदान कभी नष्ट नहीं होता। अतः मैं अपने सम्पूर्ण राज्य और इस देह का त्याग कर सकता हूँ, परन्तु इस भयाकुल पक्षी को नहीं छोड़ सकता।”

हे बाज ! तुझे आहार ही अभीष्ट है सो जो चाहो सो आहार के लिए मांग लो।” बाज बोला – “ हे राजन ! प्रकृति के विधान के अनुसार कबूतर ही हमारा आहार है, अतः आप इसे त्याग दीजिये।“राजा बोला – “ हे बाज ! मैं भी विधान के विपरीत नहीं जाता । शास्त्र कहता है दया धर्म का मूल है, परोपकार पूण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है। अतएव तुम जो चाहो सो दे सकता हूँ, परन्तु ये कबूतर नहीं दे सकता।”

कहानी विडिओ मे देखें 


बाज की मांग

तब बाज बोला – “ ठीक है राजन ! यदि आपका इस कबूतर के प्रति इतना ही प्रेम है तो मुझे ठीक इसके बराबर तोलकर अपना मांस दे दीजिये, जिससे मैं अपनी क्षुधा शांत कर सकूं। मुझे इससे अधिक और कुछ नहीं चाहिए ”। प्रसन्न होते हुए राजा शिवि ने कहा – “ हे बाज ! तुम जितना चाहो, उतना मांस मैं देने को तैयार हूँ। यदि यह क्षणभंगुर देह धर्म के काम न आ सके तो इसका होना व्यर्थ है।” यह कहकर राजा ने तराजू मंगवाया और उसके एक पलड़े में कबूतर को बिठा दिया और दुसरे पलड़े में वह अपना मांस काटकर रखने लगे। लेकिन कबूतर का पलड़ा जहाँ का तहाँ ही रहा। तब अंत में राजा शिवि स्वयं उस पलड़े में बैठ गये और बोले – “हे बाज ! ये लो मैं तुम्हारा आहार तुम्हारे सामने बैठा हूँ।”

पुष्प वर्षा और महाराजा शिवि 

इतने में आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी, मृदंग बजने लगे। स्वयं भगवान अपने भक्त के इस अपूर्व त्याग को देखकर प्रसन्न हो रहे थे। यह देखकर राजा शिवि विस्मय से सोचने लगे कि इस सबका क्या कारण हो सकता है ? इतने मैं वह दोनों पक्षी अंतर्ध्यान हो गये और अपने असली रूप में प्रकट हो गये।
इंद्र ने कहा – “ हे राजन ! आपके जैसा धर्म परायण और त्यागी मैंने कभी नहीं देखा। मैं इंद्र हूँ जो बाज बना था और ये अग्नि देव हैं जो कबूतर बने थे। हम दोनों तुम्हारे त्याग की परीक्षा लेने आये थे। हे राजन ! ऐसे मनुष्य विरले ही होते है जो दूसरों के उपकार के लिए अपने प्राणों का भी मोह न करें। ऐसा मनुष्य उस लोक को जाता है, जहाँ से फिर लौटना नहीं पड़ता है। अपना पेट पालने के लिए तो पशु भी जीते है, किन्तु अभिनंदनीय तो वही मनुष्य है जो दूसरों के हित के लिए जीता है।” इतना कहकर इंद्र और अग्नि देव स्वर्ग को चले गये। राजा शिवि ने अपना यज्ञ पूरा और कई वर्षो तक पृथ्वी का राज्य भोगने के बाद परमपद को प्राप्त हुए।