16.1.22

भारतीय मीडिया आख़िर हिन्दू विरोधी क्यों है ?:Why Indian media anti-Hindu






मीडिया हिन्दू विरोधी क्यों है ? 


इसका जवाब इन रिश्तों में मिलेगा ।

    पहले इन रिश्तेदारियों पर एक नज़र डालिये । तब आप खुद ही समझ जायेंगे कि कैसे और क्यों " मीडिया का अधिकांश हिस्सा " हिन्दुओं और हिन्दुत्व का विरोधी है । किस प्रकार इन लोगों ने एक " नापाक गठजोड़ " तैयार कर लिया है । किस तरह ये सब लोग मिलकर सत्ता संस्थान के शिखरों के करीब रहते हैं । किस तरह से इन प्रभावशाली ? लोगों का सरकारी नीतियों में दखल होता है आदि ।
पेश हैं - रिश्ते ही रिश्ते ( दिल्ली की दीवारों पर लिखा होता है । वैसे वाले नहीं । ये हैं असली रिश्ते )
- सुज़ाना अरुंधती रॉय । प्रणव रॉय ( एनडीटीवी ) की भांजी हैं । ( नेहरु डायनेस्टी टीवी - NDTV )
- अरुंधति एक संस्था के लिए भी काम करती है । उसका नाम है - जस्टिस फॉर अफजल गुरु ।
- इस संस्था के मेम्बर हैं - प्रशांत भूषण । संदीप पांडे । शबनम हाशमी । हर्ष मंदर । अरुणा रॉय आदि ।
- हर्ष मंदार । शबनम हाशमी । अरुणा रॉय एक सरकारी संगठन NAC के सदस्य हैं । जिसने हिन्दू विरोधी सांप्रदायिक हिंसा बिल का निर्माण किया ।
- प्रणव रॉय " काउंसिल आन फ़ारेन रिलेशन्स " के इंटरनेशनल सलाहकार बोर्ड के सदस्य हैं ।
- इसी बोर्ड के एक अन्य सदस्य हैं - मुकेश अम्बानी ।
- प्रणव रॉय की पत्नी है - राधिका राय ।
- राधिका राय । बृन्दा करात की बहन है ।
- बृन्दा करात । प्रकाश करात CPI की पत्नी हैं ।
- प्रकाश करात चेन्नै के " डिबेटिंग क्लब " ग्रुप के सदस्य थे ।
- एन राम । पी चिदम्बरम और मैथिली शिवरामन भी इस ग्रुप के सदस्य थे ।
- इस ग्रुप ने एक पत्रिका शुरु की थी - रैडिकल रीव्यू ।
- CPI ( M ) के एक वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी की पत्नी हैं - सीमा चिश्ती ।
सीमा चिश्ती इंडियन एक्सप्रेस की " रेजिडेण्ट एडीटर " हैं ।
- बरखा दत्त NDTV में काम करती हैं ।
- बरखा दत्त की माँ हैं - श्रीमती प्रभा दत्त ।
- प्रभा दत्त हिन्दुस्तान टाइम्स की मुख्य रिपोर्टर थीं ।
- राजदीप सरदेसाई पहले NDTV में थे । अब CNN-IBN के हैं ( दोनों ही मुस्लिम+ईसाई supporter चैनल हैं )।
- राजदीप सरदेसाई की पत्नी हैं - सागरिका घोष ।
- सागरिका घोष के पिता हैं । दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक - भास्कर घोष ।
- सागरिका घोष की आंटी - रूमा पॉल हैं।
- रूमा पॉल उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश हैं ।
- सागरिका घोष की दूसरी आंटी - अरुंधती घोष हैं ।
- अरुंधती घोष संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई प्रतिनिधि हैं ।
- CNN-IBN का " ग्लोबल बिजनेस नेटवर्क " GBN से व्यावसायिक समझौता है ।
- GBN टर्नर इंटरनेशनल और नेटवर्क-18 की एक कम्पनी है ।
- NDTV भारत का एकमात्र चैनल है को " अधिकृत रूप से " पाकिस्तान में दिखाया जाता है ।
- दिलीप डिसूज़ा PIPFD ( Pakistan-India Peoples’ Forum for Peace and Democracy ) के सदस्य हैं ।
- दिलीप डिसूज़ा के पिता हैं - जोसेफ़ बेन डिसूज़ा ।
- जोसेफ़ बेन डिसूज़ा महाराष्ट्र सरकार के पूर्व सचिव रह चुके हैं ।
- तीस्ता सीतलवाड भी PIPFD की सदस्य हैं ।
- तीस्ता सीतलवाड के पति हैं - जावेद आनन्द ।
- जावेद आनन्द एक कम्पनी सबरंग कम्युनिकेशन और एक संस्था " मुस्लिम फ़ॉर सेकुलर डेमोक्रेसी " चलाते हैं 
- इस संस्था के प्रवक्ता हैं - जावेद अख्तर ।
- जावेद अख्तर की पत्नी हैं - शबाना आज़मी ।

Why is the Indian media anti-Hindu 

- करण थापर ITV के मालिक हैं ।
- ITV बीबीसी के लिये कार्यक्रमों का भी निर्माण करती है ।
- करण थापर के पिता थे - जनरल प्राणनाथ थापर ( 1962 का चीन युद्ध इन्हीं के नेतृत्व में हारा गया था ) ।
- करण थापर बेनज़ीर भुट्टो और ज़रदारी के बहुत अच्छे मित्र हैं ।
- करण थापर के मामा की शादी नयनतारा सहगल से हुई है ।
- नयनतारा सहगल, विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हैं ।
- विजयलक्ष्मी पंडित, जवाहरलाल नेहरू की बहन हैं ।
- मेधा पाटकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मुख्य प्रवक्ता और कार्यकर्ता हैं ।
- नबाआं को मदद मिलती है - पैट्रिक मेकुल्ली से । जो कि " इंटरनेशनल रिवर्स नेटवर्क " IRN संगठन में हैं ।
- अंगना चटर्जी IRN की बोर्ड सदस्या हैं ।
- अंगना चटर्जी PROXSA ( Progressive South Asian Exchange Network ) की भी सदस्या हैं ।
- PROXSA संस्था FOIL ( Friends of Indian Leftist ) से पैसा पाती है ।
- अंगना चटर्जी के पति हैं - रिचर्ड शेपायरो ।

Why is the Indian media anti-Hindu 

- FOIL के सह संस्थापक हैं । अमेरिकी वामपंथी - बिजू मैथ्यू ।
- राहुल बोस ( अभिनेता ) खालिद अंसारी के रिश्ते में हैं ।
- खालिद अंसारी " मिड-डे " पब्लिकेशन के अध्यक्ष हैं ।
- खालिद अंसारी एमसी मीडिया लिमिटेड के भी अध्यक्ष हैं ।
- खालिद अंसारी, अब्दुल हमीद अंसारी के पिता हैं ।
- अब्दुल हमीद अंसारी कांग्रेसी हैं ।
- एवेंजेलिस्ट ईसाई और हिन्दुओं के खास आलोचक जॉन दयाल मिड-डे के दिल्ली संस्करण के प्रभारी हैं ।
- नरसिम्हन राम ( यानी एन राम ) दक्षिण के प्रसिद्ध अखबार " द हिन्दू " के मुख्य सम्पादक हैं ।
- एन राम की पहली पत्नी का नाम है - सूसन ।
- सूसन एक आयरिश हैं । जो भारत में ऑक्सफ़ोर्ड पब्लिकेशन की इंचार्ज हैं ।
- विद्या राम, एन राम की पुत्री हैं । वे भी एक पत्रकार हैं ।
- एन राम की हालिया पत्नी - मरियम हैं ।
- त्रिचूर में आयोजित कैथोलिक बिशपों की एक मीटिंग में एन राम, जेनिफ़र अरुल और के एम रॉय ने भाग लिया है ।
- जेनिफ़र अरुल, NDTV की दक्षिण भारत की प्रभारी हैं ।
- जबकि के एम रॉय " द हिन्दू " के संवाददाता हैं ।
- के एम रॉय " मंगलम " पब्लिकेशन के सम्पादक मंडल सदस्य भी हैं ।
- मंगलम ग्रुप पब्लिकेशन एम सी वर्गीज़ ने शुरु किया है ।
- के एम रॉय को " ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन लाइफ़ टाइम अवार्ड " से सम्मानित किया गया है ।
- " ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन " के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं - जॉन दयाल ।
- जॉन दयाल " ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल " ( AICC ) के सचिव भी हैं ।
- AICC के अध्यक्ष हैं - डॉ जोसेफ़ डिसूज़ा ।

Why is the Indian media anti-Hindu 

- जोसेफ़ डिसूज़ा ने " दलित फ़्रीडम नेटवर्क " की स्थापना की है ।
- दलित फ़्रीडम नेटवर्क की सहयोगी संस्था है " ऑपरेशन मोबिलाइज़ेशन इंडिया " ( OM India )।
- OM India के दक्षिण भारत प्रभारी हैं - कुमार स्वामी ।
- कुमार स्वामी कर्नाटक राज्य के मानवाधिकार आयोग के सदस्य भी हैं ।
- OM India के उत्तर भारत प्रभारी हैं - मोजेस परमार ।
- OM India का लक्ष्य दुनिया के उन हिस्सों में चर्च को मजबूत करना है । जहाँ वे अब तक नहीं पहुँचे हैं ।
OMCC दलित फ़्रीडम नेटवर्क DFN के साथ काम करती है ।
- DFN के सलाहकार मण्डल में विलियम आर्मस्ट्रांग शामिल हैं ।
- विलियम आर्मस्ट्रांग, कोलोरेडो ( अमेरिका ) के पूर्व सीनेटर हैं । और वर्तमान में कोलोरेडो क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेण्ट हैं । यह यूनिवर्सिटी विश्व भर में ईसा के प्रचार हेतु मुख्य रणनीतिकारों में शुमार की जाती है ।
- DFN के सलाहकार मंडल में उदित राज भी शामिल हैं ।
- उदित राज के जोसेफ़ पिट्स के अच्छे मित्र भी हैं ।
- जोसेफ़ पिट्स ने ही नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देने के लिये कोंडोलीज़ा राइस से कहा था ।
- जोसेफ़ पिट्स " कश्मीर फ़ोरम " के संस्थापक भी हैं ।
- उदित राज भारत सरकार के नेशनल इंटीग्रेशन काउंसिल ( राष्ट्रीय एकता परिषद ) के सदस्य भी हैं ।
- उदित राज कश्मीर पर बनी एक अन्तर्राष्ट्रीय समिति के सदस्य भी हैं ।
- सुहासिनी हैदर, सुब्रह्मण्यम स्वामी की पुत्री हैं ।
- सलमान हैदर, भारत के पूर्व विदेश सचिव रह चुके हैं । चीन में राजदूत भी रह चुके हैं ।
- रामोजी ग्रुप के मुखिया हैं - रामोजी राव ।
- रामोजी राव " ईनाडु " ( सर्वाधिक खपत वाला तेलुगू अखबार ) के संस्थापक हैं ।
- रामोजी राव ईटीवी के भी मालिक हैं ।
- रामोजी राव चन्द्रबाबू नायडू के परम मित्रों में से हैं ।
- डेक्कन क्रॉनिकल के चेयरमैन हैं - टी वेंकटरमन रेड्डी ।
- रेड्डी साहब कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं ।

Why is the Indian media anti-Hindu 

- एम जे अकबर डेक्कन क्रॉनिकल और एशि
यन एज के सम्पादक हैं ।
- एम जे अकबर कांग्रेस विधायक भी रह चुके हैं ।
- एम जे अकबर की पत्नी हैं - मल्लिका जोसेफ़ ।
- एम जे अकबर अब प्रभु चावला की जगह सीधी बात में आते है ।
- मल्लिका जोसेफ़, टाइम्स ऑफ़ इंडिया में कार्यरत हैं ।
- वाय सेमुअल राजशेखर रेड्डी आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं ।
- सेमुअल रेड्डी के पिता राजा रेड्डी ने पुलिवेन्दुला में एक डिग्री कालेज व एक पोलीटेक्नीक कालेज की स्थापना की ।
- सेमुअल रेड्डी ने कहा है कि - आंध्रा लोयोला कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उक्त दोनों कॉलेज लोयोला समूह को दान में दे दिये ।
- सेमुअल रेड्डी की बेटी हैं - शर्मिला ।
- शर्मिला की शादी हुई है - अनिल कुमार से । अनिल कुमार भी एक धर्म परिवर्तित ईसाई हैं । जिन्होंने " अनिल वर्ल्ड एवेंजेलिज़्म " नामक संस्था शुरु की । और वे एक सक्रिय एवेंजेलिस्ट ( कट्टर ईसाई धर्म प्रचारक ) हैं ।
- सेमुअल रेड्डी के पुत्र जगन रेड्डी युवा कांग्रेस नेता हैं ।
- जगन रेड्डी " जगति पब्लिकेशन प्रा. लि. " के चेयरमैन हैं ।
- भूमना करुणाकरा रेड्डी, सेमुअल रेड्डी की करीबी हैं ।
- करुणाकरा रेड्डी, तिरुमला तिरुपति देवस्थानम की चेयरमैन हैं ।
- चन्द्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया था कि " लैंको समूह " को जगति पब्लिकेशन्स में निवेश करने हेतु दबाव डाला गया था ।
- लैंको कम्पनी समूह, एल श्रीधर का है ।
- एल श्रीधर, एल राजगोपाल के भाई हैं ।
- एल राजगोपाल, पी उपेन्द्र के दामाद हैं ।
- पी उपेन्द्र केन्द्र में कांग्रेस के मंत्री रह चुके हैं ।
- सन टीवी चैनल समूह के मालिक हैं - कलानिधि मारन ।
- कलानिधि मारन एक तमिल दैनिक " दिनाकरन " के भी मालिक हैं ।
- कलानिधि के भाई हैं - दयानिधि मारन ।
- दयानिधि मारन केन्द्र में संचार मंत्री थे ।
- कलानिधि मारन के पिता थे - मुरासोली मारन ।

Why is the Indian media anti-Hindu 

- मुरासोली मारन के चाचा हैं - एम करुणानिधि ( तमिलनाडु के मुख्यमंत्री )।
- करुणानिधि ने " कैलाग्नार टीवी " का उदघाटन किया ।
- कैलाग्नार टीवी के मालिक हैं - एम के अझागिरी ।
- एम के अझागिरी, करुणानिधि के पुत्र हैं ।
- करुणानिधि के एक और पुत्र हैं - एम के स्टालिन ।

- स्टालिन का नामकरण रूस के नेता के नाम पर किया गया ।
- कनिमोझि, करुणानिधि की पुत्री हैं । और केन्द्र में राज्यमंत्री हैं ।
- कनिमोझी " द हिन्दू " अखबार में सह सम्पादक भी हैं ।
- कनिमोझी के दूसरे पति जी अरविन्दन सिंगापुर के एक जाने माने व्यक्ति हैं ।
- स्टार विजय एक तमिल चैनल है ।
- विजय टीवी को स्टार टीवी ने खरीद लिया है ।
- स्टार टीवी के मालिक हैं - रूपर्ट मर्डोक ।
- Act Now for Harmony and Democracy ( अनहद ) की संस्थापक और ट्रस्टी हैं - शबनम हाशमी ।
- शबनम हाशमी, गौहर रज़ा की पत्नी हैं ।
- “अनहद” के एक और संस्थापक हैं - के एम पणिक्कर ।
- के एम पणिक्कर एक मार्क्सवादी इतिहासकार हैं । जो कई साल तक ICHR में काबिज रहे ।
- पणिक्कर को पद्मभूषण भी मिला ।
- हर्ष मन्दर भी “अनहद” के संस्थापक हैं । मशहूर हिन्दू विरोधी लेख लिखते हैं । सोनिया गांधी द्वारा गठित nac के मेम्बर हैं । जिसने एक कानून बनाया है । हिंदुओं के खिलाफ - सांप्रदायिक लक्षित हिंसा अधिनियम ।
- हर्ष मन्दर, अजीत जोगी के खास मित्र हैं ।
- अजीत जोगी, सोनिया गाँधी के खास हैं । क्योंकि वे ईसाई हैं । और इन्हीं की अगुआई में छत्तीसगढ़ में जोर शोर से धर्म परिवर्तन करवाया गया । और बाद में दिलीप सिंह जूदेव ने परिवर्तित आदिवासियों की हिन्दू धर्म में वापसी करवाई ।
- कमला भसीन भी “ अनहद ” की संस्थापक सदस्य हैं ।
- फ़िल्मकार सईद अख्तर मिर्ज़ा “ अनहद ” के ट्रस्टी हैं ।
- मलयालम दैनिक “ मातृभूमि ” के मालिक हैं - एम पी वीरेन्द्र कुमार ।
- वीरेन्द्र कुमार जद ( से ) के सांसद हैं । ( केरल से )
- केरल में देवेगौड़ा की पार्टी लेफ़्ट फ़्रण्ट की साझीदार है ।
- शशि थरूर पूर्व राजनैयिक हैं ।
- चन्द्रन थरूर, शशि थरूर के पिता हैं । जो कोलकाता की आनन्द बाज़ार पत्रिका में संवाददाता थे ।
- चन्द्रन थरूर ने 1959 में " द स्टेट्समैन " की अध्यक्षता की ।
- शशि थरूर के दो जुड़वाँ लड़के - ईशान और कनिष्क हैं । ईशान हांगकांग में " टाइम्स " पत्रिका के लिये काम करते हैं ।
- कनिष्क लन्दन में " ओपन डेमोक्रेसी " नामक संस्था के लिये काम करते हैं ।
- शशि थरूर की बहन शोभा थरूर की बेटी रागिनी ( अमेरिकी पत्रिका ) " इंडिया करंट्स " की सम्पादक हैं ।
- परमेश्वर थरूर, शशि थरूर के चाचा हैं । और वे " रीडर्स डाइजेस्ट " के भारत संस्करण के संस्थापक सदस्य हैं
- शोभना भरतिया हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की अध्यक्षा हैं ।
- शोभना भरतिया के के बिरला की पुत्री और जी ड़ी बिरला की पोती हैं ।
- शोभना राज्यसभा की सदस्या भी हैं । जिन्हें सोनिया ने नामांकित किया था ।
- शोभना को 2005 में पद्मश्री भी मिल चुकी है ।
- शोभना भरतिया सिंधिया परिवार की भी नज़दीकी मित्र हैं ।
- करण थापर भी हिन्दुस्तान टाइम्स में कालम लिखते हैं ।
- पत्रकार एन राम की भतीजी की शादी दयानिधि मारन से हुई है ।
यह बात साबित हो चुकी है कि मीडिया का एक खास वर्ग हिन्दुत्व का विरोधी है । इस वर्ग के लिये भाजपा संघ के बारे में नकारात्मक प्रचार करना । हिन्दू धर्म । हिन्दू देवताओं । हिन्दू रीति रिवाजों । हिन्दू साधु सन्तों सभी की आलोचना करना एक " धर्म " के समान है । इसका कारण हैं । कम्युनिस्ट चर्च परस्त । मुस्लिम परस्त तथाकथित सेकुलरिज़्म परस्त लोगों की आपसी रिश्तेदारी । सत्ता और मीडिया पर पकड़ । और उनके द्वारा एक " गैंग " बना लिया जाना । यदि कोई समूह या व्यक्ति इस गैंग के सदस्य बन जायें । प्रिय पात्र बन जायें । तब उनके और उनकी बिरादरी के खिलाफ़ कोई खबर आसानी से नहीं छपती । जबकि हिन्दुत्व पर ये सब लोग मिलजुल कर हमला बोलते हैं ।
नोट - यह जानकारियाँ नेट पर उपलब्ध विभिन्न वेबसाईट्स, फ़ोरम आदि पर आधारित हैं । इसमें हमारा कोई विशेष योगदान नहीं है । अपनी तरफ़ से कोई और रिश्ता उजागर करना चाहते हों । तो वह भी इसमें जोड़ें
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14.1.22

नोनिया जाति का इतिहास :Noniya caste history

वीडियो 




नोनिया जातिका इतिहास
कल्पना कीजिए की नमक की खोज नही हुई होती तो क्या होता। नमक ना सिर्फ आपके खाने का स्वाद बढ़ाता है बल्कि वह आपकी जिंदगी में खुशियों को घोलने की शक्ति रखता है।आपको स्वस्थ रखने , आपकी उन्नति और समृद्धि में नमक काफी सहायक होता है। काले नमक का टुकड़ा और पीपल के पेड़ की मिट्टी को लाल कपड़े में बांधकर अपने घर के किसी कोने में रख दें। ऐसा करने से अटके हुए धन की प्राप्ति होगी और धन का मार्ग प्रशस्त होगा , साथ ही घर से नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाएगी। नमक के ऐसे कुछ नही अनेक फायदे हैं। बहुत पहले रोमन सोल्जर्स यानि सिपाहियों को वेतन में पैसे नहीं, बल्कि नमक दिया जाता था। सोल्जर शब्द ही रोमन शब्द ‘साल्डेयर’ से आया है, जिसका मतलब है ‘(टू गिव साल्ट) नमक देना’। भारत में नमक उत्पादन का जिम्मा जिस वर्ग पर था उसका नाम था लोनिया (Loniya) या नोनिया (Noniya)। इस तरह कहा जा सकता है नोनिया समाज ही था जो हमारे जीवन में स्वाद भरते थे। नोनिया समाज की एक उपजाति है नोनिया चौहान या लोनिया चौहान (Loniya chauhan)। यह उपजाति महान राजपूत राजा पृथ्वी राज चौहान के वंशज माने जाते हैं। नोनिया समाज ने 1930 ईस्वी में अंग्रेजो के खिलाफ महात्मा गांधी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह आंदोलन में बढ चढ़कर भाग लिया था। अब नोनिया लोग अपना परम्परागत काम (नमक बनाने) छोड़ चुके हैं और अलग-अलग पेशा अपनाकर जीवन यापन कर रहे हैं। आइए जानते हैं नोनिया समाज का इतिहास, नोनिया शब्द की उत्पति कैसे हुई?

नोनिया या लोनिया शब्द की उत्पति कैसे हुई?

नून का व्यापार करने वाले नोनिया, पहले के जमाने के कैमिकल इंजीनियर जो नमक, शोरा, तेजाब गंधक आदि बनाने के काम में माहिर थे। लोनिया संस्कृत शब्द ‘लवण’ से आया हैl लवण से लोन /नोन/नून हुआ और लोन से लोनिया , नून से नोनिया हो गया। लवण को हिन्दी में नमक कहते हैं।
(शोरा- पोटैशियम नाइट्रेट (Potassium nitrate) एक रासायनिक यौगिक है। इसका अणसूत्र KNO3 है।)

नोनिया जाति का इतिहास

जाति इतिहासविद डॉ. दयाराम आलोक के मुताबिक नोनिया जाति नमक, खाड़ी और शोरा के खोजकर्ता और निर्माता जाति है जो किसी काल खंड में नमक बना कर देश ही नहीं दुनिया को अपना नमक खिलाने का काम करती थी। तोप और बंदूक के आविष्कार के शुरूआती दिनों में इनके द्वारा बनाये जानेवाले एक विस्फोटक पदार्थ शोरा के बल पर ही दुनियां में शासन करना संभव था। पहले भारतवर्ष में नमक, खाड़ी और शोरा के कुटिर उद्योग पर नोनिया समाज का ही एकाधिकार था, क्योंकि इसको बनाने की विधि इन्हें ही पता था। रेह (नमकीन मिट्टी) से यह तीनों पदार्थ कैसे बनेगा यह नोनिया लोगों को ही पता था। इसलिए प्राचीन काल में नमक बनाने वाली नोनिया जाति इस देश की आर्थिक तौर पर सबसे सम्पन्न जाति हुआ करती थी।


नोनिया विद्रोह

देश 1947 में क्रूर अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ। यह आजादी कई आंदोलनों और कुर्बानियों के बाद मिला था। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ विद्रोह करने की शुरुआत नोनिया समाज को जाता है जिसे इतिहास ने अनदेखा कर दिया है। यह विद्रोह 1700-1800 ईस्वी के बीच अंग्रेजी सरकार के खिलाफ हुआ था। बिहार के हाजीपुर, तिरहुत, सारण और पूर्णिया शोरा उत्पादन का प्रमुख केन्द्र था। शोरे के इकट्‍ठे करने एवं तैयार करने का काम नोनिया करते थे। अंग्रेजों का नमक और शोरा पर एकाधिकार होते ही अब नमक और शोरा बनाने वाली जाति नोनिया का शोषण प्रारम्भ हो गया। जो शोरा नोनिया लोग पहले डच, पुर्तगाली और फ्रांसीसी व्यापारीयों को अपनी इच्छा से अच्छी कीमतो पर बेचा किया करते थे उसे अब अंग्रेजों ने अपने शासन और सत्ता के बल पर जबरदस्ती औने पौने दामों में खरीदना/लुटना शुरू कर दिया। नोनिया जाति के लोग अंग्रेजों के शोषण पूर्ण व्यवहार से बहुत दुखी और तंग थे।
नोनिया जाति के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ सर उठाया था और बगावत कर डाला था जो सन् 1770 से 1800 ईo तक लगातार 30 साल तक चला और नोनिया समाज के लोग अंग्रेजों से अकेले अपने दम पर तीस सालों तक लड़ते रहे। बिहार में छपरा में अंग्रेजों ने यही पर एक शोरे की फैक्ट्री खोली थी जिसे सन् 1771 में नोनिया विद्रोहियों ने लूट लिया था और फैक्ट्री में आग लगा दी थी। अगर भारत के कुछ लोग भी उस समय नोनिया विद्रोह में नोनिया जाति के लोगों का साथ दिया होता तो भारत अंग्रेजों का गुलाम होने से बच जाता और नोनिया समाज के लोग अंग्रेजों को भारत से मार भगाये होते।

1930 नमक सत्याग्रह आंदोलन में नोनिया समाज की भूमिका

नोनिया समाज के लोगों ने वर्ष 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ नमक सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेकर न केवल लाखों की संख्या में अंग्रेजों के दमन का शिकार बने, बल्कि उनके पैतृक पेशा नमक बनाना भी बर्बाद हो गया। नोनिया समाज ने मिट्टी से नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा था और एक ऐसा आंदोलन किया था जिस आंदोलन ने संपूर्ण भारत में पहली बार सफलता का परचम लहराया था।

नमक बेचकर जो आमदनी हुआ वो पैसा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कोष में जमा कर दिया। इस तरह देश की आजादी के लिए लड़ रहे कांग्रेस की आर्थिक मदद कर नोनिया समाज ने अपना परम एवं पुनीत कर्तव्य कर अहम भूमिका निभाई। आज भी नोनिया समाज प्रत्येक वर्ष देश के विभिन्न स्थानों पर नमक आंदोलन की वर्षगांठ मनाता है।

शहीद “बुद्धु नोनिया”

शहीद “बुद्धु नोनिया”
आजादी के लड़ाई में कुछ ऐसे नाम थे जो गुमनाम हो गए ऐसे ही एक नाम था बुद्धू नोनिया। जब अंग्रेजों ने नमक पर ‘कर’ लगा दिया तब भारतीय के माथे ब्रजपात हुआ । परतंत्रता के वातावरण में इस प्रकार का आर्थिक तंगी के शिकार हुए भारतवासियों के लिए ‘बुद्धु नोनिया’ उम्मीद की किरण बन कर सामने आये । ‘बुद्धु नोनिया’ देशी नमक बनाकर भारतीयों की मदद कर रहे थे। वे नोनिया समाज के प्रथम वीर योद्धा हुए जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ नमक कानून तोड़ने का साहस किया । वे इतनी सावधानी से नमक बना कर भारतीय की मदद करते कि किसी को उसकी भनक तक नहीं पड़ती।
अंग्रेज सैनिक बौखला गया और बुद्धु नोनिया को पकड़कर खौलते हुए नमक के कड़ाही में जिन्दा डाल दिया । गरम कड़ाही में वे छटपटाते रहे परन्तु उनके मुंह से “भारत माता की जय” की ध्वनि निरंतर निकलती रही।
‘बुद्धु नोनिया’ का जन्म बेगुसराय (बिहार) के ‘करपूरा’ नामक गांव में एक मध्यवर्गीय नोनिया परिवार में हुआ था । त्याग और बलिदान के लिए देश के जनमानस को तैयार करने और गुलामी के पीड़ा के अहसास को जागृत करने के अथक प्रयासों के लिए ‘बुद्धु नोनिया’ जी ने अपने बलिदान के माध्यम से जो उद्बोधन किया है उसे भुलाया नहीं जा सकता । 
 ‘बुद्धु नोनिया’ जी ने अपने बलिदान के माध्यम से जो उद्बोधन किया है उसे भुलाया नहीं जा सकता ।

मुकुटधारी प्रसाद चौहान

आजादी के आंदोलन में भाग लेने वाले ऐसे ही एक महत्वपूर्ण नाम है मुकुटधारी प्रसाद चौहान। चंपारण में अंग्रेजों के जुल्म से त्रस्त किसानों की आवाज बनने के लिए जब महात्मा गांधी 1917 में चंपारण पधारे तो मुकुटधारी उनके सहयोगी बन गये। गांधी जी के चंपारण सत्याग्रह में मुकुटधारी प्रसाद चौहान और राजकुमार शुक्ल ने अहम भूमिका निभाई थी। 1930 के नमक आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन मे भी इनकी सक्रिय भूमिका रही। आंदोलन के दौरान कई बार जेल भी गये।
नोनिया चौहान का इतिहास

खुद को पृथ्वीराज चौहान के वंशज मानता नोनिया समाज

महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बारे में पूरी दुनिया जानती है, जिन्होंने आक्रमणकारी मोहम्मद गोरी के खिलाफ वीरता के साथ युद्ध किया था। नोनिया समाज (Noniya caste) के लोग खुद को इसी महान सम्राट का वशंज मानते हैं। इस समाज के लोग मानते हैं कि उन्होंने 800 से 1192 ईस्वी के बीच भारतवर्ष में मुस्लिम आक्रमणकारियों को आने से रोका। लोनिया चौहान राजपूत की बड़ी आबादी उत्तर प्रदेश में रहती है। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़, गोरखपुर, महाराजगंज और वाराणसी जिले में सबसे अधिक सघनता पाई जा सकती है।
नोनिया समाज (Noniya caste) के लोग मानते हैं कि ये कभी उत्तर-पश्चिमी भारत के शासक रहे अजमेर के राजा सोमेश्वर चौहान की अजेय सेना का हिस्सा रहे। उस वक्त ये लोग 13-14 राजवंशों के क्षत्रिय सेनाओं में अग्निवंशी, चंन्द्रवंशी, नागवंशी और सूर्यवंशी लड़ाके के नाम से जाने जाते थे। औरंगजेब के शासन के खिलाफ भी नोनिया समाज (Noniya caste) के लंबे समय तक संघर्ष किया।
नोनिया जाति के प्रसिद्ध व्यक्ति

रेणू देवी


रेणु देवी बिहार की पहली महिला डिप्टी सीएम हैं। (कार्यकाल: नवंबर 2020 – अब तक )। उन्हे सरकार में इतना अहम पद दिए जाने से नोनिया समाज (Noniya caste) का काफी नाम बढा है। रेणु देवी का जन्म 11 नवंबर 1959 को कृष्णा प्रसाद के यहां हुआ था, जो एक पिछड़े समाज नोनिया से थे। ये पूर्व बिहार सरकार में मंत्री रह चुकी हैं। ये चार बार बेतिया से बिहार विधान सभा की सदस्य चुनी गई। रेनू देवी लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी और से RSS जुड़ रही हैं।

 Disclaimer: इस  content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे


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कहार जाति का इतिहास :kahar jati ka itihas


                                                                           वीडिओ 



  कहार भारत में पाई जाने वाली एक हिंदू जाति है. इनका इतिहास प्राचीन और गौरवशाली है. यह खुद को कश्यप ऋषि और सप्तऋषियों का वंशज होने का दावा करते हैं. कश्यप ऋषि मरीचि के पुत्र थे. ऐसी मान्यता है कि मरीचि से ही सारे देवताओं और असुरों की उत्पत्ति हुई है. कहार एक बहादुर और साहसी जाति है. पारंपरिक रूप से यह जाति अपने जीवन यापन के लिए प्राचीन काल से ही डोली या पालकी उठाने और उसकी रक्षा करने का कार्य करती आई है. इन्हें गोंड, गौड़, धुरिया कहार, मेहरा, भोई, चंद्रवंशी क्षत्रिय कहार आदि नामों से भी जाना जाता है. कहार जाति के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि पुराने समय में जब डाकुओं का प्रचलन जोरों पर था. ये डाकू रास्ते में दुल्हन की डोली और गहने जेवर लूट लिया करते थे. डोली की रक्षा के लिए कहर दल का गठन किया गया था जो दुल्हन की डोली को सुरक्षित अपने गंतव्य पर पहुंचाते थे. इनके पूर्वज विकट परिस्थितियों में जान पर खेलकर राज परिवार के बहू- बेटियों को डोली में बिठाकर, जंगलों और बीहड़ों से होते हुए, उन्हें दुश्मनों और डाकुओं से बचाकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाते थे. लेकिन राजे रजवाड़ों के शासन समाप्त हो जाने के साथ डोली उठाने का कार्य खत्म हो गया. इसके बाद इन्होंने जीवन निर्वाह के लिए खेती, मत्स्य पालन, टोकरी बनाने और उसे स्थानीय बाजारों में बेचने और अन्य नौकरी-व्यवसाय करने लगे. बदलते हुए समय के साथ वर्तमान में उपलब्ध शिक्षा और रोजगार के नए अवसरों का लाभ उठाते हुए यह विभिन्न प्रकार के आधुनिक पेशा को अपनाने लगे हैं. आज यह के सभी क्षेत्रों में उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं और अपनी सफलता की कहानी लिख रहे हैं. आइए जानते है कहार जाति का इतिहास, कहार शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?




शान की प्रतीक डोली

पुराने समय में जब सड़कें नहीं थी और यातायात के साधन उपलब्ध नहीं थे, कहार डोली या पालकी में बिठाकर लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाते थे. इससे मिलने वाले पारिश्रमिक पर उनका जीवन यापन चलता था. उस जमाने में डोली शान का प्रतीक हुआ करती थी. पालकी राजे-रजवाड़ों, जमींदारों और संपन्न लोगों के लिए यातायात का साधन था. बाद में डोली को शादी के अवसर पर दूल्हा-दुल्हन की सवारी के रूप में उपयोग किया जाने लगा. इसके लिए कहारों को मेहनताने के साथ-साथ वर और वधू पक्ष से दान और पुरस्कार

कहार किस कैटेगरी में आते हैं?

कहार जाति को बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है.

कहार कहां पाए जाते हैं?

कहार जाति के लोग मुख्य रूप से बिहार, पंजाब, हरियाणा, पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में निवास करते हैं. राजस्थान में यह सीकर, नागौर, झुंझुनू, जयपुर, गंगानगर, अजमेर, टोंक आदि जिलों में इनकी अच्छी आबादी है.
 चंद्रवंशी क्षत्रिय कहारों का एक समुदाय है जिनकी उत्पत्ति गंगा के मैदानी इलाकों में हुई थी. यह धार्मिक और पवित्र अवसरों पर पालकी ढोने का कार्य करते थे. चंद्रवंशी क्षत्रिय कहार भारत के अधिकांश भागों में पाए जाते हैं, लेकिन विशेष रूप से यह उत्तर भारत में केंद्रित हैं. यह मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, सहारनपुर, फर्रुखाबाद, कानपुर, मुजफ्फरनगर, शाहजहांपुर, सुल्तानपुर, फैजाबाद, श्रावस्ती, सुल्तानपुर, जौनपुर और अंबेडकरनगर जिलों में पाए जाते हैं. यह बिहार और पश्चिम बंगाल के अधिकांश हिस्सों में पाए जाते हैं.

कहार किस धर्म को मानते हैं?

जाति  इतिहासविद डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार अधिकांश  कहार धर्म से हिंदू हैं. यह हिंदू देवी-देवताओं जैसे शाकंभरी देवी, बालाजी, भगवान शिव आदि की पूजा करते हैं और हिंदू त्योहारों को धूमधाम से मनाते हैं. थोड़ी बहुत संख्या में मुस्लिम और सिख कहार भी पाए जाते हैं. मुस्लिम कहार का कहारों का एक समुदाय है जो उत्तर-पूर्व भारत और बांग्लादेश में पाए जाते हैं. यह पालकी ढोने के साथ-साथ कृषि का कार्य करते हैैं। सिख कहार भारत में पंजाब में पाए जाते हैं. मुस्लिम और सिख कहार बहुत पहले हिंदू थे जो धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम और सिख बन गए.

कहार उपजातियां

राजस्थान में चंद्रवंशी छत्रिय कहारों के  तीन उप विभाजन है-
रवानी राजपूत, 
चंदेल राजपूत और
 कुरुवंशी. 


कहार शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

कहार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द “स्कंधहार” से हुई है, जिसका अर्थ है- कंधे की सहायता से भार उठाना. कहार को मेहरा भी कहा जाता है. मेहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द मिहिर से हुई है, जिसका अर्थ है-सूर्य.

कहार जाति का इतिहास

कहार जाति की उत्पत्ति के बारे में कई मान्यताएं हैं. इनमें से प्रमुख मान्यताओं का उल्लेख हम यहां कर रहे हैं.
1. यह मान्यता है कि  कहार समुदाय की उत्पत्ति  कश्यप ऋषि से हुई है. इसीलिए यह कश्यप राजपूत होने का दावा भी करते हैं. कश्यप ऋषि का उल्लेख ऋग्वेद और अन्य हिंदू ग्रंथों में किया गया है. कश्यप ऋषि मरीचि के पुत्र थे. मरीचि से ही सारे देवताओं और असुरों की उत्पत्ति हुई है.
2. हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, वृत्रासुर नामक असुर के वध के दौरान इंद्र को ब्रह्महत्या का पाप लग गया. ब्रह्महत्या के महादोष का प्रायश्चित करने हेतु उन्हें स्वर्ग छोड़कर किसी अज्ञात स्थान पर 1000 वर्ष तक तपस्या करना पड़ा. इंद्रासन रिक्त ना रहे इसीलिए देवताओं ने मिलकर पृथ्वी के प्रसिद्ध चंद्रवंशी धर्मात्मा राजा निहुष को इंद्र के स्थान पर स्वर्ग का राजा बना दिया. निहुष का उल्लेख ऋग्वेद में भी किया गया है.स्वर्ग का राज्य पाकर निहुष भोग-विलास में लिप्त हो गए. एक दिन अचानक उनकी दृष्टि इंद्र की साध्वी पत्नी शची पर पड़ी. शची को देखकर वह कामान्ध हो उठे और उसे प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयास करने लगे.
ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त हो जाने के बाद इंद्र फिर से शक्ति संपन्न  हो गए, परंतु इंद्रासन पर निहुष के विराजमान होने के कारण उनकी पूर्ण शक्ति वापस नहीं मिल पाई. उन्होंने अपनी पत्नी शची से कहा कि तुम निहुष को रात्रि में मिलने का संकेत दे दो. और  निहुष को  कहना कि वो तुमसे मिलने सप्तर्षियों की पालकी में बैठ कर आए. शची का संकेत मिलने के बाद निहुष रात में सप्तर्षियों की पालकी में बैठकर शची से मिलने जाने लगे. सप्तर्षियों को धीरे-धीरे चलता देख उन्होंने ‘सर्प-सर्प’ अर्थात शीघ्र चलो कहते हुए अगस्त ऋषि को लात मार दिया. इस पर अगस्त ऋषि ने क्रोधित होकर निहुष को श्राप दे दिया और कहा- “मूर्ख! तुम्हारा धर्म नष्ट हो और तू  दस हजार वर्षों तक सर्प योनि में पड़ा रहे”. अगस्त ऋषि के श्राप से निहुष तत्क्षण सर्प बनकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और इस तरह से इंद्र को पुनः इंद्रासन प्राप्त हो गया. इस मान्यता के अनुसार, कहार उन सप्तर्षियों के वंशज है जिन्होंने चंद्रवंशी क्षत्रिय राजा निहुष की डोली उठाई थी.

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9.10.21

भील जनजाति के बारे मे जानकारी :Bhil janjati


bhil jan jati ka video 



भील शब्द की उत्पत्ति प्राचीन संस्कृत साहित्य में सभी वनवासी जातियों के लिये भील शब्द प्रयुक्त हुआ हैं। इस प्रकार प्राचीन संस्कृत साहित्य में उस वर्ग विशेष के लिये भील संज्ञा प्रयुक्त हुआ हैं जो धनुष बाण से शिकार करके अपना जीवन यापन करते थे।
मेवाड़ ,गोडवाड़,बांगड़ प्रदेश में भील, मीणा, डामोर और गरासिया जनजाति निवास करती है । इन सभी जनजातियों के लिए विद्वान, लेखक एवं पत्रकार भील शब्द ही प्रयुक्त करते हैं।
लोगों की सामान्य धारणा है कि उपर्युक्त प्रदेशों में केवल भील जनजाति ही निवास करती हैं।
महाभारत काल में भीलों को निषाद कहा जाता था।
कर्नल जेम्स टॉड ने भीलों को 'वन पुत्र' कहा हैं।
रोने जैसे प्रसिद्ध लेखक ने अपनी पुस्तक 'वाइल्ड ट्राइब्स ऑफ़ इंडिया' (wild Tribes Of India ) में भीलों का मूलनिवास मारवाड़ बताया हैं।
डॉ. डी. एन. मजूमदार ने अपनी पुस्तक 'रेसेज एंड कल्चरल ऑफ़ इंडिया' (races And Cultural Of India ) में भील जनजाति का सम्बन्ध प्राचीन 'नेग्रिटो' प्रजाति से बताया हैं।
भील जनजाति की उत्पत्ति के संबंध में दो मत प्रचलित हैं।
1.प्रथम मत :-
भील द्रविड़ भाषा का शब्द है जो बिल शब्द से बना है विद्वानों के अनुसार भील शब्द की उत्पत्ति द्रविड़ भाषा के बिल शब्द से हुई है जिसका अर्थ है तीर-कमान।
तीर-कमान भील जनजाति का मुख्य अस्त्र था इसलिए इस जनजाति को भील कहा जाने लगा।
2.द्वितीय मत :-
भील जनजाति भारत की सबसे प्राचीनतम जनजाति हैं। पुरातन काल में भील जनजाति की गणना राजवंशों में की जाती थी जिसे विहिल राजवंश के नाम से जाना जाता था। विहिल राजवंश का शासन पहाड़ी इलाकों में था।
ये मत भी सच हो सकता हैं क्योंकि आज भी ये जनजाति ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में निवास करती हैं।
इस संदर्भ में एक कहावत भी प्रचलित है कि संसार में केवल साढ़े तीन राजा ही प्रसिद्ध हैं। पहला इंद्र राजा,दूसरा राजा,तीसरा भील राजा और बिंद (दूल्हा)राजा (आधा)।
भील जनजाति की भाषा भील जनजाति मेवाड़ी,भीली तथा वागड़ी भाषा का प्रयोग करती हैं।
जी. एस. थॉमसन ने 1895 ई. में भीली भाषा की व्याकरण की रचना की। जिसमें इन्होंने इस समुदाय की भाषा को गुजराती से सम्बंधित बताया हैं
भारतीय जनजातियों में भील जनसंख्या के नज़रिए से दूसरे स्थान पर आते हैं। मध्य प्रदेश में भी गोंड जनजाति के बाद भील जनजाति जनसंख्या के आधार पर दूसरे स्थान पर है। श्याम रंग, छोटा-मध्यम कद, गठीला शरीर और लाल आंखें, यह सब इनकी शारीरिक रचना है। लेकिन इन्हें देखकर कोई भी इनके इतिहास के बारे अंदाज़ा नहीं लगा सकता। पर… ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर इनका वजूद कुछ अलग ही दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। भारत जैसे संघर्षशील देश में इनका स्थान क्या है? यह अब भी जन सामान्य के लिए ग़ैरज़रूरी जानकारी सी मालूम होती है। लेकिन इतिहास ने आज भी इनके योगदान की स्मृतियों को स्वर्णाक्षरों में संजोकर रखा है। वर्तमान समाज भले ही इन्हें अपनी संस्कृति से दूर और अलग समझता हो, लेकिन वास्तविकता यह है, कि भील संस्कृति प्राचीन संस्कृतियों में से एक है। इस जनजाति की संस्कृति की तुलना यदि किसी दूसरी संस्कृति से की जाए, तो शौर्य, साहस, भक्ति और विश्वास जैसे तत्व एक साथ भील संस्कृति के अलावा किसी में भी दिखाई नहीं देते। इतिहास इस बात का साक्षी है, कि भीलों ने शौर्य की पराकाष्ठा तक प्रदर्शन किया है। प्राचीन भीलों से अब तक आखेट… इनकी जीविका का एक मात्र साधन रहा है, जिसके लिए ये अब भी जाने जाते हैं। जबकि शिकार में इस्तेमाल होने वाले शस्त्र धनुष-बाण भील संस्कृति की ही देन है। जहां तक इस हथियार के इस्तेमाल की बात है, तो धनुष-बाण के प्रयोग और निशानेबाज़ी में आज भी इनका कोई सानी नहीं है। धनुष-बाण का इस्तेमाल भील जनजाति के लोग सिर्फ शिकार के लिए ही इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि इतिहास में इसी हथियार से इन्होंने कई युद्ध लड़े और जीते भी हैं।
 एक नज़र अगर इनके इतिहास पर डाली जाए तो कई ऐसे तथ्य भी सामने आते हैं, जिनसे आधुनिक समाज आज भी परिचित नहीं है। वर्तमान दौर में सुनी जाने वाली किवदंतियों के पात्र भी भील संस्कृति की पृष्ठभूमि से हैं। महर्षि वाल्मिकी भी भील जनजाति के थे, जो रत्नाकर डाकू से आदिकवि के सिंहासन पर आसीन हुए। हालांकि आधुनिक समाज सिर्फ इतना जानता है, कि रामायण की रचना कर रामकथा की विश्व व्यापकता वाल्मिकी की देन है। जबकि वाल्मिकी वो व्यक्तित्व है, जिन्हें विश्व का पहला राष्ट्रकवि कहा जाए तो भी अतिश्योंक्ति नहीं होगी। राम भक्त सबरी की सराहना में भी सभी उपमान उस समय फीके पड़ जाते हैं, जब भगवान राम की भक्ति-भावना से अभीभूत सबरी उन्हें अपने झूठे बेर खिलाने में बिना किसी संकोच के आनंद की अनुभूति  करती है। वहीं महर्षि व्यास की रचना महाभारत के पात्र एकलव्य की गुरु भक्ति की गरिमा का जितना वर्णन किया जाए, उतना कम है। एकलव्य महाभारत में एक भील के रूप में चरितार्थ किया गया पात्र है। जिन्होंने अपने गुरु को दक्षिणा में अपने दाहिने हाथ के अंगूठे का दान कर विश्व में अपनी श्रेष्ठ गुरुभक्ति का नगाड़ा बजा दिया। वहीं एकलव्य ने साधना और मेहनत से सीखने की लालसा और लगन का भी अद्वितीय आदर्श प्रस्तुत किया है।


भील जनजाति एक परिचय – 

भील शब्द का आविर्भाव द्रविड़ भाषा के ‘बोल’ शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ“कमान’ से है। भारत में दक्षिणी-पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिणी राजस्थान पश्चिमी मध्य प्रदेश में एक मानव समूह रहता है जिसका प्राचीन काल से अब तक का प्रधान लक्षण तक कमान रखना रहा है, उन्हें ही भील कहते हैं। धनुर्विद्या में यह जाति सदा से ही बहुत ही कुशल रही है। इस जाति के मनुष्य ही नही वरन् स्त्रियाँ भी धनुर्विद्या में बहुत ही कुशल होती हैं। यदि हम अपने देश के प्राचीन साहित्य पर दृष्टि डालें तो इस जाति के सम्बन्ध में बहुत वर्णन मिलता है। रामायण में शबरी और निषाद तथा महाभारत में एकलव्य और घटोत्कच भील ही थे। मेवाड़ के साथ तो इस जाति का गहरा सम्बन्ध रहा है। बहुत समय तक मेवाड़ में राजपूत राजाओं को राजतिलक करने का अधिकार केवल भीलों को ही था।यही नहीं एक समय था जब इस जाति की अपनी एक स्वतन्त्र सत्ता थी एवं मध्य में भील सरदारों के कई छोटे-छोटे राज्य थे जिनमें कोटा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा एवं भीलवाड़ा आदि राज्य प्रमुख थे। धीरे-धीरे यह जाति सभ्यता के पथ पर अग्रसर हो रही थी। काश इस जाति को मरीठों एवं “सर जॉन मैल्कम’ ने तंग नहीं किया होता तो ये भील आज असभ्ध नहीं होते वरन् हमारी तरह सभ्य होते, लेकिन मराठों के अत्याचारों से घबड़ा कर ये दुबारा अपने निवास स्थान घने जंगल एवं पहाड़ियों पर निवास करने लग गये।
 लोग मराठों के अत्याचारों को न भूले और अवसर पाते ही गाँवों को  जलाने लगे और यात्रियों को लूटने लगे। इस तरह एक भयंकर जाति के रूप में भारत में प्रसिद्ध हो गये। “सर जॉन मैल्कम” के काल में इस जाति का दमन किया जाने लगा। “सर जान मैल्कम” ने खानदेश और मालवा को जीत कर इनकी रीढ़ तोड़ दी। अंग्रेजों ने भी भीलों को मैदानी भाग से जाने वाली रसद रोक दी  तथा लूटमार करने वालों को गिरफ्तार करना प्रारम्भ कर दिया, लेकिन इस समस्या का स्थाई हल निकालने के लिए अंग्रेजी सरकार ने कुछ नम्र उपायों को अपनाया जिनमें आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को माफ कर दिया जाता था एवं मैदानी भाग में उन्हें बसने के लिये भूमि दी जाती थी। तभी  से इनका जीवन-क्रम बदल गया और ये शान्तिपूर्वक रहने लगे।

भील जाति कई उप-जातियों में भी बंटी हुई है। इनकी मुख्य उप-जातियाँ निम्न हैं-नहाल, पॉगी, मोची, मटवारी, खोतील, कोतवाल, दांगची, नौरा, करीट, बरिया, पर्वी, पोवेरा, उल्वी उसांव, बुर्दा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भीलों में अनेक जातियाँ पाई जाती हैं जो यह प्रमाणित करती हैं कि जाति-पाँति के बन्धनों में भील भी विश्वास करते हैं। इन जातियों में अनेक गोत्र भी है जिनमें मुख्य रोहनिया, सोनगर, ऑवलिया, मरवाल, मोरी, पंवार, मेरा, मासरया, मेंहदा, सिसोदिया, राठौर, परमार, सोलंकी, अवाशा, जवास, भूमिया, कचेरा, जावरा और चौमड आदि हैं। भीलों के उपर्युक्त गोत्रों से स्पष्ट मालूम होता है कि इनका मिश्रण राजपूतों के साथ अधिक हुआ है। सोलंकी, राठौर, सिसोदिया, पंवार गोत्र भीलों में भी हैं और राजपूतों में भी।

स्वभाव तथा रहन-सहन-

 भील स्वभाव से वीर, साहसी और स्वामिभक्त होते होते हैं। इतिहास में हमें भीलों की वीरता, साहस एवं स्वामिभक्त का वर्णन मिलता है। भील अपने वचन के पक्के एवं मनमौजी स्वभाव के होते हैं। स्वाभाव से ये इतने सीधे होते हैं कि कोई भी इनको  ठग सकता है। भारतीय किसान के लिए कही गई कहावत कि “भारतीय किसान ऋण में जन्म लेता है, ऋण में पलता है एवं ऋण में ही मरता है’,  भील जाति कई उप-जातियों में भी बंटी हुई है। इनकी मुख्य उप-जातियाँ निम्न हैं-नहाल, पॉगी, मोची, मटवारी, खोतील, कोतवाल, दांगची, नौरा, करीट, बरिया, पर्वी, पोवेरा, उल्वी उसांव, बुर्दा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भीलों में अनेक जातियाँ पाई जाती हैं जो यह प्रमाणित करती हैं कि जाति-पाँति के बन्धनों में भील भी विश्वास करते हैं। इन जातियों में अनेक गोत्र भी है जिनमें मुख्य रोहनिया, सोनगर, ऑवलिया, मरवाल, मोरी, पंवार, मेरा, मासरया, मेंहदा, सिसोदिया, राठौर, परमार, सोलंकी, अवाशा, जवास, भूमिया, कचेरा, जावरा और चौमड आदि हैं। भीलों के उपर्युक्त गोत्रों से स्पष्ट मालूम होता है कि इनका मिश्रण राजपूतों के साथ अधिक हुआ है। सोलंकी, राठौर, सिसोदिया, पवार गोत्र भीलों में भी हैं और राजपूतों में भी। सरलता एवं निर्धनता के कारण इन पर भी लागू होती है कि “एक भील ऋण में जनम लेता है, ऋण में ही पलता है और ऋण में ही मरता है।” क्योंकि महाजन इनसे इतना अधिक ब्याज लेते हैंकि एक भील अपने जीवनकाल में 100 रुपये का कर्ज नहीं चुका पाता है, क्योंकि भील एक तो स्वभाव से सीधे होते हैं, दूसरे ये धर्मभीरू  भी होते हैं। ये अन्याय सह सकते हैं, परन्तु लिये हुए कर्ज को मय ब्याज के चुकाने से इंकार नहीं कर सकतें यही नहीं, ये दिल के धनी भी होते हैं। इनके दरवाजे से कोई भी अतिथि बिना भोजन पाये वापस नही जाता है।
 भील, परिश्रमी भी होते हैं भूखा टूटा भील यद्यपि शरीर से दुबला व कमजोर होता है, परन्तु मजदूती एवं साहस में कम नहीं होता जब हमें साधारण बुखार होता है तो चारपाई का सहारा लेते हैं, लेकिन भील बुखार के पूरे जोश में अपने सिर 5-10 सेर गीली मिट्टी थोपे हुए दिन भर  हल चलाता है। कड़कडाती ठंडी रातों को केवल एक लंगोटी में ही काट देते हैं। कई दिन भूखे परिश्रम करके मक्का का दलिया, खाकर सारे परिश्रम एवं भूख की पीड़ा को भूल जाता है।

भीलों का पहनावा तथा साज-सज्जा-

चूँकि भील निर्धन और पिछड़े हुए हैं, इसलिए इनकी वेशभूषा तथा साज-सज्जा इनके वातावरण एवं सामाजिक व्यवस्था के अनुकूल ही है। भीलों  मे पुरुष एवं स्त्रियों के पहनावे में बहुत अन्तर पाया जाता है।
 भील पुरुष शरीर पर वस्त्र नहीं पहनते हैं। जंगलों में निवास करने वाले भील पुरुष प्रायः एक लंगोटी में ही अपना जीवन बिताते हैं, परन्तु जो भील परिवार खेती करते हैं और बस्तियों के समीप आकर रहने लगे हैं, वे मोटा कपड़ा पहनते हैं जिसे ये लोग अंगरखा कहते हैं।
 ऊंची कसी हुई धोती तथा मोटा साफा बांधते हैं। भ्रमण के समय तीर-कमान प्रत्येक भील के साथ रहती है जो इस प्रकार बनी होती है कि कमान बाँस की होती है तथा तीर भी बाँस का होता है, लेकिन इनकी नाम बहुत सीधी तथा तेज धार वाली लोहे की बनी होती है। भील. पुरुष तथा बालक हाथ पाँवों में लोहे या पीतल के कड़े पहनते हैं। सामाजिक अवसरों तथा उत्सवों पर चमकदार रंगों वाले कपड़े पहनते हैं। स्त्रियाँ अधिकतर लाल रंग के लहंगे एवं ओढ़नी ओढ़ती हैं। कुर्ते के स्थान पर एक प्रकार की अंगिया पहनती हैं जिसे ये अंगरखी कहती हैं। स्त्रियों के शरीर पर पिग्मी स्त्रियों की भाँति अनेक प्रकार के गुदने गुदे हुए होते हैं। स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के आभूषण भी पहनती हैं जैसे  हाथों में हाथी दाँत के मोटे कड़े, गले में चाँदी की मोटी हँसली, कानों में लम्बी-लम्बी बालियाँ, माथे पर लाख या चाँदी का झालर, हाथ और पाँवों की उंगलियों में पीतल या कगलट के छल्ले, नाक में नथ गले में मूंगों की माला पहनती हैं।

आवास-

भील जिन बस्तियों में रहते हैं, उन्हें “पाल” कहते हैं। हर एक “पाल” में भीलों का एक नेता होता है जिसे मध्य भारत में “तरबी” कहा जाता है एवं राजस्थान में उसे “गमेती’ के नाम से पुकारते हैं। जो भू-भाग पहाड़ी एवं ऊँचा होता है उसे ये लोग डौंगर (डूंगर) कहते हैं। भीलों के घर बांस, टट्ठरों या बेजोड़ पत्थरों के बने होते हैं। जो भील गाँवों में निवास करते हैं वे झोपड़ियों में रहते हैं और जो शहरों में रहते हैं वे मिट्टी या पत्थरों के मकानों में रहते हैं। मकान बनाने के लिए लोग ढालू स्थान चुनते हैं। प्रत्येक घर से मिले हुए ये एक या दो झोपड़े भी बनाते हैं। इन झोपड़ों में ये अपने मवेशी रखते हैं। वर्षा की कमी तथा उद्योगों के अभाव में ये इधर-उधर हटते-बढ़ते रहते हैं। जो भील परिवार गाँव के बन्धनों में बंधना नहीं चाहते, वे जंगलों में ही घूमते हैं।

जीवन-निर्वाह के साधन-

भील, जिनका भारतीय जनजातियों में महत्त्वपूर्ण स्थान है, इनका मुख्य धन्धा एवं व्यवसाय कृषि करना है। वह भी एक फसली, क्योंकि इनके निवास-क्षेत्र में वर्षा कम होती है। शेष समय में इनका धन्धा जंगली जानवरों का शिकार करना, जंगल में शहद इकट्ठा करना, लाख एवं लकड़ी का संग्रह करना, पशु चराना और दूध की वस्तुएँ तैयार  करना, मछली पकड़ना, मजदूरी करना और डलिया तथा टोकरे आदि बनाकर कस्बों में बेचना होता है।

भोजन-सामग्री-


 भीलों की भोजन-सामग्री में मुख्य मक्का और प्याज है। ज्वार, जौ, लावा, कूरा और सांवा भी प्रयोग में लाते हैं। संकटकालीन समय में जंगली कन्द-मूल खाकर और यहाँ तक कि मरे हुए जानवरों का माँस खाकर निर्वाह करते हैं। इनमें जो सबसे बड़ा अवगुण है वह शराब पीना है। ये महुए, जौ और मकई की शराब बनाते है। देवी देवताओं की पूजा में भी ये शराब चढ़ाते हैं। शराब के मोह में ये अपनी प्यारी से प्यारी वस्तु को भी छोड़ देते है। एक नहीं बीसियों उदाहरण ऐसे हैं जब इन्होंने अपने शराब के नशे  के लिए छोटे-छोटे नन्हें-नन्हें बच्चे को भी चन्द रुपयों में और शराब के लालच में विधर्मियों को बेच दिया, किन्तु अब यह प्रथा नष्ट होती जा रही है।

शादी-विवाह-

भीलों में 15 वर्ष की लड़की और 20 वर्ष के लड़के की शादी हो जानी चाहिए। इनमें शादी की तीन रीतियाँ हैं-

1. शादी जो माता-पिता द्वारा तय की जाती है-

 इस प्रथा में सम्बन्ध तय करने का भार लड़के के माता-पिता पर होता है। वर पक्ष के लोग कन्या पक्ष वालों के यहाँ सगाई करने जाते हैं। यदि लड़की के माता-पिता उस सगाई को मान लेते हैं तो वर पक्ष के लोग पंचों को 5 से 7 रुपया देते हैं जिनसे गुड़ और शराब मंगाई जाती है, जिसे उस जाति के लोग खाते-पीते हैं। यह उनका बैट्रोडल कहलाता है।
बैट्रोडल तय होने पर वर-वधू दोनों के यहाँ उबटन आदि होता है और उसी दिन से 7 दिन तक वर और वधू दोनों अपने-अपने घर जमीन पर पैर नहीं रखते और उनके दोस्त उन्हें कंघों पर रखते हैं तथा अपने-अपने गाँव की परिक्रमा (कंधों पर ही) करते हैं।
इस अवसर पर वर वधू को मौन धारण करना पड़ता है, जबकि सभी अन्य लोग खूब हँसते हूँ। यदि वर या वधू हंस देती है तो बहुत बड़ा अपशकुल माना जाता है। इस उत्सव को बाना बैठना” कहते हैं।
 “बाना बैठना” के बाद पंडाल बनाया जाता है जिस पर जामुन और आम की पत्तियाँ डाली जाती हैं। कभी-कभी पंडाल को फलों से भी सजाया जाता है। इस पंडाल के नीचे सबसे पहले चार अविवाहित लड़के और लड़कियाँ खाना खाते हैं, इनके बाद दोस्त और सम्बन्धी खाना खाते हैं। इसके पश्चात् वर आता है और पण्डाल के नीचे बैठ जाता है फिर वर की माँ आती है और लड़की के ऊपर फिराकर पण्डाल के चारों किनारों पर रोटी के टुकड़े फेंकती है। इसके बाद दूल्हा बारात सहित लड़की के घर चल देता है। यह उत्सव “पण्डाल पूजा” कहलाता है।
जब बारात लड़की वाले के यहाँ पहुँच जाती है तो लड़की लड़के को अंगूठी देती है और लड़का लड़की को “कंगन” देता है। इसके बाद दोनों मण्डप की परिक्रमा करते हैं, यह “कनकन उत्सव” कहलाता है। इसके पश्चात् लड़की दीपक जलाती है तथा ज्यों ही वर मण्डप के अन्दर आता है उसका कर्त्तव्य होता है कि वह दीपक को बुझा दे इसके बाद पण्डितों द्वारा होम किया जाता है। इस अवसर पर वर और वधू दोनों खूब सजाये जाते हैं। इस प्रकार विवाह कार्यक्रम समाप्त हो जाता है।

2. शक्ति से शादी-

 भीलों में दूसरे तरह का विवाह शक्ति के द्वारा होता है, इसमें लड़का किसी लड़की को भगाकर ले जाता है। यदि लड़का और लड़की दोनों की इच्छा शादी  करने की होती है तो लड़के वाला लड़की के पिता और लड़की द्वारा माँगा हुआ धन देना पड़ता है। यदि वह धन चुका सकता है तो लड़के का पिता और खुद लड़का दोनों लडकी वाले के यहाँ जाते हैं और माँगा हुआ धन देते हैं एवं लड़की वालों को एक भोज देते हैं। इसके पश्चात् उनका विवाह ठीक उसी प्रकार से होता है, जिस प्रकार शादी जो माता-पिता द्वारा तय की जाती है।

3. होली-त्यौहार पर शादी-

जैसवाड़ा, तलुका पंचमहल, पंचवाड़ा जिलों में “गोल गधेडो” प्रथा का भी प्रचलन है। इसके अनुसार होली पर एक मजबूत लट्ठा गाड़ देजे हैं, उसके सिरे पर नारियल का फल और गुड़ बाँध देते हैं। युवक और युवतियाँ उसके चारों ओर नृत्य करते हैं। युवतियाँ लट्टे के चारों ओर एक गोला बनाकर नाचती हैं। जवयुवक बाहर से नाचता हुआ आता है। और युवतियों के बीच से निकलकर अन्दर से लट्ठे  के पास जाकर नारियल और गुड़ को लेने का प्रयत्न करता है। ऐसा करने में युवतियाँ उसकी बहुत बुरी हालत करती हैं। यदि वह लट्टे तक पहुँचने में सफल हो जाता है तो युवतियाँ उसको उसके कपड़ों से पकड़ती हैं। उसे बाँस की छड़ियों से मारती हैं। उसके सिर से बाल नोचती हैं। यही नही यह भी कि उसके शरीर के माँस तक नोच लेती हैं।


4. मनोरंजन-


  भील मनोरंजन के बड़े शौकीन होते हैं। विवाह और उत्सवों पर खूब नाचते और गाते हैं। जब कोई अतिथि आता तो उसके स्वागत में नाच-गानों का आयोजन किया जाता है। जब ये शहर से अपने  गाँव लौटते हैं तो रास्ते की थकान को दूर करने के लिये रास्ते में भील और भीलनी  निडर होकर हाथ में हाथ डाले नाचते-गाते आते हैं। नाच गाने के अलावा इनके खेल भी बड़े मनोरंजक होते हैं। मकर संक्रान्ति पर डोटादडी, मारदडी, दशहरा पर दशहरा की नकली लड़ाई, यमद्वितीया पर नेजा खेल बड़े प्रसिद्ध हैं। इनके अलावा होली, दीपावली पर भी अनेक प्रकार के खेल खेले जाते हैं। इनमें चुटकले, मुहावरों एवं कहावतों का प्रचलन अधिक है। घोर दीनता और गरीबी में इनकी विनोद-प्रियता देखकर आश्चर्य होता है।

5. विश्वास-

भील लोग देवी-देवताओं का बहुत मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं। माता की पूजा प्रायः होती रहती है। ये लोग शिवजी और हनुमान जी के बड़े भक्त होते हैं। ये लोग जादू- टोने के अधिक शिकार हैं तथा ये शकुन और अपशकुन में बहुत विश्वास करते हैं। ये भूत-प्रेतों में भी अधिक विश्वास करते हैं। पुनर्जनम में भी अधिक विश्वास करते हैं। ये मृतकों को जलाते हैं, गाड़ते नहीं है।

निवास स्थान-

यदि हम भारत के मानचित्र पर 22° उत्तरी अक्षांश से 28° उ. अक्षांश तक एवं 74° पूर्वी देशान्तर से 80° पूर्वी देशान्तर तक दृष्टि डालें तो यह क्षेत्र भीलों का निवास-स्थान है। इसमें दक्षिणी पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिणी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश सम्मिलित हैं। भीलों के प्रमुख क्षेत्रों के नाम भीलवाड़ा, भीलपुर, भीलगाँव, भीलना, भीलसी, बड़ी सपरी, बरन, बीना, भोपाल,  इन्दौर एवं बाँसवाड़ा हैं।

भीलों का रंग सांवला, कद छोटा, चेहरा चौड़ा, नथुने बड़े, नाक चपटी और बड़ी, शरीर गठा हुआ, बाल लम्बे और  धुंघराले होते हैं।

“भील लोग आर्यन तथा द्राविड़ियन से भी पहले भारत में निवास करते थें सम्भवतः ये लोग सहारा के जलवायु सम्बन्धी संकट के समय इधर-उधर फैलते हुए भारत में पहुंचे थे। भील मुंडा जाति का एक उपविभाग है जो आदि द्राविड़ियन भारत में फैला हुआ था।”

भील जाती के मेले

बेणेश्वर मेला :-


'आदिवासियों का कुम्भ' नाम से प्रसिद्ध बेणेश्वर का मेला भीलों का सबसे बड़ा मेला है जो माघ माह की पूर्णिमा को डूंगरपुर जिले में सोम,माही एवं जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम पर भरता हैं।

घोटिया अम्बा :-


बेणेश्वर के अलावा एक और बड़ा मेला भरता है 'घोटिया अम्बा मेला'। यह मेला बांसवाड़ा जिले में घोटिया नामक स्थान पर चैत्र अमावस्या को भरता हैं।

गोतमेश्वर मेला :-


गौतमेश्वर का मेला प्रतापगढ़ जिले में अरनोद कस्बे के पास वैशाख पूर्णिमा को भरता  हैं।

ऋषभदेव मेला :-


ऋषभदेव का मेला उदयपुर जिले में धुलैव में चैत्र कृष्ण अष्टमी को प्रतिवर्ष भरता है जिसमे बड़ी मात्रा में भील स्त्री-पुरुष भाग लेते हैं। यहां पर प्रथम जैन तीर्थंकर भगवन आदिनाथ की काले पत्थर की मूर्ति हैं। काले रंग की होने के कारण भील जाति के लोग इन्हें 'काला' बाबा के नाम से जानते हैं। भील जाति के लोग केसरियानाथ (काला बाबा) को चढ़ी केसर का पानी पीकर कभी झूठ नहीं बोलते।
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