भारत हमेशा से तपोभूमि रही है. इस धरती पर अनेकों महापुरुष एवं ऋषि मुनियों ने जन्म लिया. इन्हीं महापुरुषों में से अगस्त्य ऋषि भी एक थे. अगस्त्य ऋषि के बारे में भगवत गीता में उल्लेख मिलता है. शास्त्रों और प्राचीन कथाओं के अनुसार अगस्त्य ऋषि को समुद्र पीने के लिए जाना जाता है. प्राचीन कथाओं में इस बात का विशेष रूप से वर्णन मिलता है. महर्षि अगस्त्य ने हिंदू धर्म का प्रचार प्रसार पश्चिमी देशों में बहुतायत में और सबसे पहले किया था. वे एक शिव भक्त थे.
अगस्त्य ऋषि एक महान वैदिक ऋषि थे, जिनका जन्म एक घड़े (कुंभ) से हुआ था, इसलिए वे कुंभयोनि कहलाए; उन्होंने विंध्याचल पर्वत को झुकाया, समुद्र का पानी पीकर राक्षसों का अंत किया, राम को आदित्य हृदय स्तोत्र दिया और दक्षिण भारत में वैदिक संस्कृति के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वे अगस्त्य गोत्र के जनक और शस्त्र-निर्माण के ज्ञाता भी थे।
जन्म और उत्पत्ति -घड़े से जन्म:
अगस्त्य ऋषि का जन्म दो देवताओं - मित्र और वरुण के वीर्य से हुआ, जो अप्सरा उर्वशी को देखकर स्खलित हुआ। यह वीर्य एक घड़े (कुंभ) में गिरा, जिससे अगस्त्य और उनके भाई वशिष्ठ का जन्म हुआ, इसलिए वे 'कुंभयोनि' कहलाए।
महर्षि अगस्त्य एक वैदिक कालीन महान ऋषि थे। उनका जन्म काशी में जिस जगह हुआ था, उसे आज अगस्त्य कुंड के नाम से जाना जाता है।
पुराणों के मुताबिक, ऋषि अगस्त्य ने अपनी ही बेटी लोपामुद्रा से शादी की थी, ताकि वे देवताओं की रक्षा कर सकें. ऋषि अगस्त्य ने अपने तपोबल से एक सर्वगुण संपन्न कन्या को जन्म दिया था. जब उन्हें पता चला कि विदर्भ का राजा संतान प्राप्ति के लिए तप कर रहा है, तो उन्होंने अपनी बेटी को उसे गोद दे दिया. जब उनकी बेटी बड़ी हो गई, तो ऋषि अगस्त्य ने राजा से उसका हाथ मांग लिया और शादी कर ली. ऋषि अगस्त्य और लोपामुद्रा के दो बच्चे थे, जिनमें से एक का नाम भृंगी ऋषि था और दूसरी का नाम अचुता था. भृंगी ऋषि शिव के परम भक्त थे.
पुलस्त्य के पुत्र:
उन्हें ऋषि पुलस्त्य का पुत्र और ऋषि विश्वामित्र के भाई भी माना जाता है
प्रमुख कथाएँ और कार्य
ऐसी मान्यता है की अगस्त्य मुनि का शिष्य विंध्याचल पर्वत था जो अपनी ऊंचाई पर बहुत घमंड करता था|
एक दिन कौतुहलवश उसने अपनी ऊंचाई इतनी बढा दी की धरती पर सूर्य की किरणे आना बंद हो गयी तथा धरती पर हाहकार मच गया
तब सभी जन अगस्त्य ऋषि के पास गए और उनसे अपने शिष्य को समझाने की विनती करने लगे तब मुनि अगस्त्य ने विंध्याचल पर्वत से कहा मुझे दक्षिण की तरफ जाना है, इसलिए अपनी ऊंचाई कम करो व जब तक में लौट ना आऊं अपनी ऊंचाई ना बढ़ाना। विंध्याचल ने गुरु के आदेश का पालन किया और तब से विंध्याचल की ऊंचाई स्थायी हो गयी।
ऋग्वेद के कई मंत्रो की रचना महर्षि अगस्त्य ने की है तथा ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 165 सूक्त से 191 तक के सूक्तो को बताया है। महर्षि अगस्त्य ने तपस्या काल में मंत्रो की शक्ति को देखा था। इसलिए इन्हे मन्त्रदृष्टा ऋषि भी कहा जाता है।
भारत देश में महर्षि अगस्त्य के कई आश्रम है। उत्तराखंड के अगस्त्यमुनि नामक शहर में मुनि का प्राचीन आश्रम है।
यहाँ पर अगस्त्य ऋषि तपस्या करते थे। यही वह स्थान है जहाँ पर मुनि ने दो राक्षसों आतापी और वातापी का वध करके उनको यमपूरी पहुँचाया था।
आज यहाँ पर एक प्रसिद्ध मंदिर है और आसपास के गाँव में मुनि को इष्टदेव मानकर पूजा की जाती है।
और उन्होंने अपनी शक्ति के द्वारा ऐसे कार्य किये की बड़े बड़े देवता भी नहीं कर पाए।
ऐसी ही एक घटना है, जब अगस्त्य मुनि सम्पूर्ण समुद्र को पी जाते हैं।यह घटना उस समय की है जब राक्षस वृतासुर के आतंक से धरती कांप उठी थी। देवताओं और राक्षसों में भयंकर युद्ध हुआ और वृतासुर मारा गया।
राक्षस राज वृतासुर के वध होने के बाद बहुत से राक्षस राजा के आभाव में देवताओं के भय से यहाँ वहाँ छिपते भागते फिर रहे थे और देवताओं ने राक्षसों को ढूंढ ढूंढ कर मारा। तब बहुत से राक्षस समुद्र में प्रवेश कर छुप गए और वहीं छुपे-छुपे देवराज इंद्र की वध की योजना बनाने लगे।
तब राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य ने राक्षसों को सुझाव दिया की पहले ऋषि मुनियों को नष्ट कर दिया जाये तो देवराज का वध करना आसान हो जायेगा।
क्योंकि देवताओं की शक्तियाँ ऋषि मुनियों के द्वारा किये गए पूजा पाठ यज्ञ आदि से दिन प्रीतिदिन बढ़ती रहती है।
अब राक्षस दिन में समुद्र में छुपते और रात में निकलकर ऋषि मुनियों के यज्ञ नष्ट करते थे । तथा उन्हें मारकर खा जाते थे। इस प्रकार ऋषि समुदाय में हाहाकार मच गया क्योंकि देवता भी ऋषि मुनियों की रक्षा करने में असमर्थ थे।
तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे और सारी घटना से अवगत कराया तो भगवान विष्णु बोले तुम्हें समुद्र को सुखाना होगा तब समुद्र सूखने पर सभी राक्षसों का वध कर सकते हो
किन्तु प्रश्न यह था इतने विशाल समुद्र को सुखाया कैसे जाये?
तब भगवान विष्णु ने कहा कि पूरे समुद्र को सुखाने की शक्ति सिर्फ अगस्त्य मुनि के पास है।
अगर तुम सब उनके पास जाकर प्रार्थना करोगे तो वह तुम्हारी विनती अवश्य स्वीकार कर लेंगे। तब सभी देवता अगस्त्य मुनि के पास पहुंचे और उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया।
अगस्त्य मुनि मान गए और समुद्र तट पर पहुंचे और देखते ही देखते सारे समुद्र को पी गए। इसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर राक्षसों का वध कर दिया कुछ राक्षस डर कर पाताल लोक भी भाग गए।
उसके बाद देवताओं ने कहा अगस्त्य मुनि आप समुद्र का जल दोबारा भर दीजिए।तब अगस्त्य मुनि ने उत्तर दिया कि अब यह संभव नहीं है।अब तुम्हें कोई दूसरा उपाय करना होगा इसके पश्चात सभी देवी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे।ब्रह्मा जी ने कहा जब भागीरथ धरती पर गंगा लाने का प्रयत्न करेंगे तब समुद्र जल से भर जाएगा।ऋषि अगस्त्य ने 'अगस्त्य संहिता' नामक ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ की बहुत चर्चा होती है। इस ग्रंथ की प्राचीनता पर भी शोध हुए हैं और इसे सही पाया गया।
अगर तुम सब उनके पास जाकर प्रार्थना करोगे तो वह तुम्हारी विनती अवश्य स्वीकार कर लेंगे। तब सभी देवता अगस्त्य मुनि के पास पहुंचे और उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया।
अगस्त्य मुनि मान गए और समुद्र तट पर पहुंचे और देखते ही देखते सारे समुद्र को पी गए। इसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर राक्षसों का वध कर दिया कुछ राक्षस डर कर पाताल लोक भी भाग गए।
उसके बाद देवताओं ने कहा अगस्त्य मुनि आप समुद्र का जल दोबारा भर दीजिए।तब अगस्त्य मुनि ने उत्तर दिया कि अब यह संभव नहीं है।अब तुम्हें कोई दूसरा उपाय करना होगा इसके पश्चात सभी देवी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे।ब्रह्मा जी ने कहा जब भागीरथ धरती पर गंगा लाने का प्रयत्न करेंगे तब समुद्र जल से भर जाएगा।ऋषि अगस्त्य ने 'अगस्त्य संहिता' नामक ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ की बहुत चर्चा होती है। इस ग्रंथ की प्राचीनता पर भी शोध हुए हैं और इसे सही पाया गया।
राम को सहायता:
वनवास के दौरान अगस्त्य ने राम को आदित्य हृदय स्तोत्र सिखाया और दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए, जिससे राम रावण पर विजय प्राप्त कर सके।
ताड़का और मारीच को श्राप:
ताड़का और मारीच को श्राप:
उन्होंने राक्षस ताड़का और उसके पुत्र मारीच को उनके अत्याचारों के कारण श्राप दिया था।
दक्षिण भारत का प्रसार:
दक्षिण भारत का प्रसार:
वे दक्षिण भारत में वैदिक ज्ञान और संस्कृति के प्रचारक बने, और तमिल ब्राह्मणों के बीच उनका विशेष प्रभाव रहा।
योगदान और महत्व-
ऋग्वेद:
योगदान और महत्व-
ऋग्वेद:
ऋग्वेद के कई भजनों के रचयिता माने जाते हैं।
शस्त्र विद्या:
शस्त्र विद्या:
शस्त्र निर्माण विद्या के ज्ञाता थे और बिजली उत्पादन के जनक भी माने जाते हैं।
अगस्त्य गोत्र:
अगस्त्य गोत्र:
ब्राह्मणों के प्रमुख गोत्रों में से एक अगस्त्य गोत्र की उत्पत्ति इन्हीं से मानी जाती है।
संक्षेप में, अगस्त्य ऋषि ज्ञान, तपस्या और चमत्कारों के प्रतीक हैं, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और धर्म के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
संक्षेप में, अगस्त्य ऋषि ज्ञान, तपस्या और चमत्कारों के प्रतीक हैं, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और धर्म के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
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