1.6.17

शास्त्रों के अनुसार ये हैं एक गुणवती पत्नी के लक्षण





हिन्दू धर्म में पत्नी को पति की वामांगी कहा गया है, यानी कि पति के शरीर का बांया हिस्सा। इसके अलावा पत्नी को पति की अर्द्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी, पति के शरीर का आधा अंग होती है। दोनों शब्दों का सार एक ही है, जिसके अनुसार पत्नी के बिना एक पति अधूरा है।

धार्मिक पहलू
पत्नी ही उसके जीवन को पूरा करती है, उसे खुशहाली प्रदान करती है, उसके परिवार का ख्याल रखती है और उसे वह सभी सुख प्रदान करती है जिसके वह योग्य है। पति-पत्नी का रिश्ता दुनिया भर में बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है। चाहे सोसाइटी कैसी भी हो, लोग कितने ही मॉर्डर्न क्यों ना हो जाएं, लेकिन पति-पत्नी के रिश्ते का रूप वही रहता है, प्यार और आपसी समझ से बना हुआ।
क्या कहा था भीष्म पितामह ने?
हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ महाभारत में भी पति-पत्नी के महत्वपूर्ण रिश्ते के बारे में काफी कुछ कहा गया है। भीष्म पितामह ने कहा था कि पत्नी को सदैव प्रसन्न रखना चाहिए क्योंकि उसी से वंश की वृद्धि होती है। वह घर की लक्ष्मी है और यदि लक्ष्मी प्रसन्न होगी तभी घर में खुशियां आएगी।
विष्णु पुराण में पत्नी के गुण
इसके अलावा भी अनेक धार्मिक ग्रंथों में पत्नी के गुण व अवगुणों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है। आज हम आपको विष्णु पुराण, जिसे लोक प्रचलित भाषा में गरुण पुराण भी कहा गया है, उसमें उल्लिखित पत्नी के कुछ गुणों की व्याख्या करेंगे।
गुणी पत्नी के लक्षण
गरुण पुराण में पत्नी के जिन गुणों के बारे में बताया गया है, उसके अनुसार जिस व्यक्ति की पत्नी में ये गुण हों, उसे स्वयं को देवराज इंद्र यानी भाग्यशाली समझना चाहिए। कहते हैं पत्नी के सुख के मामले में देवराज इंद्र अति भाग्यशाली थे, इसलिए गरुण पुराण के तथ्य यही कहते हैं।
कौन से गुण
आगे की स्लाइड्स में जानिए वे कौन से गुण हैं जो यदि किसी की पत्नी में हो तो उससे अधिक इस दुनिया में कोई दूसरा भाग्यशाली नहीं होगा.....
जानिए अर्थ
गरुण पुराण में पत्नी के गुणों को समझाती एक पंक्ति मिलती है, जो इस प्रकार है – “सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा। सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता।।“ अर्थात, जो पत्नी गृहकार्य में दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं और जो पतिपरायणा है, वास्तव में वही पत्नी है।
गृह कार्य में दक्ष
गृह कार्य में दक्ष से तात्पर्य है वह पत्नी जो घर के काम काज संभालने वाली हो। घर के सदस्यों का आदर-सम्मान करती हो, बड़े से लेकर छोटों का भी ख्याल रखती हो। जो पत्नी घर के सभी कार्य जैसे- भोजन बनाना, साफ-सफाई करना, घर को सजाना, कपड़े-बर्तन आदि साफ करना, यह कार्य करती हो वह एक गुणी पत्नी कहलाती है।                                
इसके अलावा बच्चों की जिम्मेदारी ठीक से निभाना, घर आए अतिथियों का मान-सम्मान करना, कम संसाधनों में भी गृहस्थी को अच्छे से चलाने वाली पत्नी गरुण पुराण के अनुसार गुणी कहलाती है। ऐसी पत्नी हमेशा ही अपने पति की प्रिय होती है।
प्रियवादिनी
 


प्रियवादिनी से तात्पर्य है मीठा बोलने वाली पत्नी आज के जमाने में जहां स्वतंत्र स्वभाव और तेज-तरार बोलने वाली पत्नियां भी है। जो नहीं जानती कि किस समय किस से कैसे बात करनी चाहिए.........
संयमित भाषा में बात करने वाली
इसलिए गरुण पुराण में दिए गए निर्देशों के अनुसार अपने पति से सदैव संयमित भाषा में बात करने वाली, धीरे-धीरे व प्रेमपूर्वक बोलने वाली पत्नी ही गुणी पत्नी होती है। पत्नी द्वारा इस प्रकार से बात करने पर पति भी उसकी बात को ध्यान से सुनता है व उसके इच्छाएं पूरी करने की कोशिश करता है।
सभी से प्यार से बात करने वाली
परंतु केवल पति ही नहीं, घर के अन्य सभी सदस्यों या फिर परिवार से जुड़े सभी लोगों से भी संयम से बात करने वाली स्त्री एक गुणी पत्नी कहलाती है। ऐसी स्त्री जिस घर में हो वहां कलह और दुर्भाग्य नहीं आता.....
पतिपरायणा
पतिपरायणा यानी पति की हर बात मानने वाली पत्नी भी गरुण पुराण के अनुसार एक गुणी पत्नी होती है। जो पत्नी अपने पति को ही सब कुछ मानती हो, उसे देवता के समान मानती हो तथा कभी भी अपने पति के बारे में बुरा ना सोचती हो वह पत्नी गुणी है।
धर्म का पालन करने वाली
विवाह के बाद एक स्त्री ना केवल एक पुरुष की पत्नी बनकर नए घर में प्रवेश करती है, वरन् वह उस नए घर की बहु भी कहलाती है। उस घर के लोगों और संस्कारों से उसका एक गहरा रिश्ता बन जाता है।
यह है पत्नी का पहला धर्म
इसलिए शादी के बाद नए लोगों से जुड़े रीति-रिवाज और धर्म को स्वीकारना ही स्त्री की जिम्मेदारी है। इसके अलावा एक पत्नी को एक विशेष प्रकार के धर्म का भी पालन करना चाहिए। विवाह के पश्चात उसका सबसे पहला धर्म होता है कि वह अपने पति व परिवार के हित में सोचे व ऐसा कोई काम न करे जिससे पति या परिवार का अहित हो।
पति की प्रिय होती है ऐसी पत्नी
गरुण पुराण के अनुसार जो पत्नी प्रतिदिन स्नान कर पति के लिए सजती-संवरती है, कम खाती है, कम बोलती है तथा सभी मंगल चिह्नों से युक्त है। जो निरंतर अपने धर्म का पालन करती है तथा अपने पति का प्रिय करती है, उसे ही सच्चे अर्थों में पत्नी मानना चाहिए। जिसकी पत्नी में यह सभी गुण हों, उसे स्वयं को देवराज इंद्र ही समझना चाहिए।

    हिन्दू संस्कृति के अनुसार पत्नी को अर्धांगनी अर्थात पति के शरीर का आधा अंग माना जाता है। महाभारत के    एक प्रसंग में भीष्म पितामह ने भी कहा है कि, "पत्नी को हमेशा खुश रखना चाहिए क्योंकि पत्नी की वजह से वंश की वृद्धि होती है"। हमारे कई प्राचीन ग्रंथों में पत्नी के गुण और अवगुण का ज़िक्र मिलता है। एक तरफ अगर पत्नी अच्छी हो तो पति की ज़िन्दगी स्वर्ग बन जाती है, वहीं दूसरी तरफ अगर पत्नी अवगुणी हो तो उसकी ज़िन्दगी नरक बन जाती है। शास्त्रों के अनुसार किसी व्यक्ति के व्यवहार के द्वारा ही आप उसका भाग्य और व्यक्तित्व जान सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार अगर स्त्री के अंदर ये गुण मौजूद हैं, तो उसका पति भाग्यशाली होता है। गरुण पुराण के अनुसार वह पत्नी गुणी होती है जो घर के काम-काज संभालने में निपुण हो। घर के काम-काज सँभालने का मतलब सिर्फ घर के काम करना ही नहीं है बल्कि वह ऐसी होनी चाहिए कि वह घर के सदस्यों का आदर-सम्मान करती हो। अगर घर में कोई अतिथि आए तो उनका मान-सम्मान करें, कम संसाधनों में भी गृहस्थी को अच्छे से चलाती रहे। ऐसी पत्नी हमेशा ही अपने पति के साथ-साथ पूरे परिवार की प्रिय होती है।  
गरुण पुराण के अनुसार पति की हर बात मानने वाली पत्नी एक गुणी पत्नी होती है। पत्नी के लिए उसका पति देवता सामान होना चाहिए। आदर्श पत्नी वह होती है जो सपने में भी अपने पति का बुरा न सोचती हो। शादी के बाद पति का घर ही उसका घर बन जाता है। इसलिए नए परिवार से जुड़े रीति-रिवाज़ को स्वीकारना पत्नी का धर्म होता है। अपने पति और परिवार के हित के बारे में सोचना भी पत्नी का एक धर्म है। इसके अलावा उसे ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे परिवार का अहित हो। आज के जमाने में स्त्री को पुरुषों के समान ही समझा जाता है। उसे अपनी बात कहने का पूरा हक़ है लेकिन एक आदर्श पत्नी के अंदर यह गुण होना चाहिए कि वह सबसे प्यार से बात करे। गरुण पुराण के अनुसार अपने पति से संयमित भाषा में बात करने वाली, प्रेम के साथ धीरे-धीरे बात करने वाली, पत्नी गुणी होती है। पत्नी अगर इस प्रकार बात करती है तो पति भी उसकी बात को ध्यान से सुनता है, उसकी इच्छाएं पूरी करने की कोशिश करता है। ऐसी पत्नी जो अपने परिवार के साथ-साथ घर के सभी सदस्यों और परिवार से जुड़े सभी लोगों से संयम से बात करती है, वह एक गुणी पत्नी कहलाती है। ऐसी पत्नी के घर में होने से कलह नहीं आता और परिवार में सुख समृद्धि बनी रहती है। गरुण पुराण के अनुसार ऐसी पत्नी जो प्रतिदिन स्नान कर पूजा पाठ करती है और सभी मंगल चिन्हों से युक्त होती है। उसका पति बहुत भाग्यशाली होता है।
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15.5.17

हिंदुत्व:जातिवाद, छुआछूत नहीं है हिन्दू धर्म का हिस्सा:




 

 धर्म की गलत व्याखाओं का दौर प्राचीन समय से ही जारी है। ऋषि वेद व्यास ब्राह्मण नहीं थे, जिन्होंने पुराणों की रचना की। तब से ही वेद हाशिये पर धकेले जाने लगे और समाज में जातियों की शुरुआत होने लगी। क्या हम शिव को ब्राह्मण कहें? विष्णु कौन से समाज से थे और ब्रह्मा की कौन सी जाति थी? क्या हम कालीका माता को दलित समाज का मानकर पूजना छोड़ दें?
   आज के शब्दों का इस्तेमाल करें तो ये लोग दलित थे- ऋषि कवास इलूसू, ऋषि वत्स, ऋषि काकसिवत, महर्षि वेद व्यास, महर्षि महिदास अत्रैय, महर्षि वाल्मीकि आदि ऐसे महान वेदज्ञ हुए हैं जिन्हें आज की जातिवादी व्यवस्था दलित वर्ग का मान सकती है। ऐसे हजारों नाम गिनाएं जा सकते हैं जो सभी आज के दृष्टिकोण से दलित थे। वेद को रचने वाले, मनु स्मृति को लिखने वाले और पुराणों को गढ़ने वाले ब्राह्मण नहीं थे।
   अक्सर जातिवाद, छुआछूत और सवर्ण, दलित वर्ग के मुद्दे को लेकर धर्मशास्त्रों को भी दोषी ठहराया जाता है, लेकिन यह बिल्कुल ही असत्य है। इस मुद्दे पर धर्म शस्त्रों में क्या लिखा है यह जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि इस मुद्दे को लेकर हिन्दू सनातन धर्म को बहुत बदनाम किया गया है और किया जा रहा है।
  पहली बात यह कि जातिवाद प्रत्येक धर्म, समाज और देश में है। हर धर्म का व्यक्ति अपने ही धर्म के लोगों को ऊंचा या नीचा मानता है। क्यों? यही जानना जरूरी है। लोगों की टिप्पणियां, बहस या गुस्सा उनकी अधूरी जानकारी पर आधारित होता है। कुछ लोग जातिवाद की राजनीति करना चाहते हैं इसलिए वह जातिवाद और छुआछूत को और बढ़ावा देकर समाज में दीवार खड़ी करते हैं और ऐसा भारत में ही नहीं दूसरे देशों में भी होता रहा है।
दलितों को 'दलित' नाम हिन्दू धर्म ने नहीं दिया, इससे पहले 'हरिजन' नाम भी हिन्दू धर्म के किसी शास्त्र ने नहीं दिया। इसी तरह इससे पूर्व के जो भी नाम थे वह हिन्दू धर्म ने नहीं दिए। आज जो नाम दिए गए हैं वह पिछले 60 वर्ष की राजनीति की उपज है और इससे पहले जो नाम दिए गए थे वह पिछले 900 साल की गुलामी की उपज है।

बहुत से ऐसे ब्राह्मण हैं जो आज दलित हैं, मुसलमान है, ईसाई हैं या अब वह बौद्ध हैं। बहुत से ऐसे दलित हैं जो आज ब्राह्मण समाज का हिस्सा हैं। यहां ऊंची जाति के लोगों को सवर्ण कहा जाने लगा हैं। यह सवर्ण नाम भी हिन्दू धर्म ने नहीं दिया।
भारत ने 900 साल की गुलामी में बहुत कुछ खोया है खासकर उसने अपना मूल धर्म और संस्कृति खो दी है। खो दिए हैं देश के कई हिस्से। यह जो भ्रांतियां फैली है और यह जो समाज में कुरीरियों का जन्म हो चला है इसमें गुलाम जिंदगी का योगदान है। जिन लोगों के अधिन भारतीय थे उन लोगों ने भारतीयों में फूट डालने के हर संभव प्रयास किए और इसमें वह सफल भी हुए।
अब यह भी जानना जरूरी है कि हिन्दू धर्म के शास्त्र कौन से हैं। क्योंकि कुछ लोग उन शास्त्रों का हवाला देते हैं जो असल में हिन्दू शास्त्र नहीं है। हिन्दुओं का धर्मग्रंथ मात्र वेद है, वेदों का सार उपनिषद है जिसे वेदांत कहते हैं और उपनिषदों का सार गीता है। इसके अलावा जिस भी ग्रंथ का नाम लिया जाता है वह हिन्दू धर्मग्रंथ नहीं है।
मनुस्मृति, पुराण, रामायण और महाभारत यह हिन्दुओं के धर्म ग्रंथ नहीं है। इन ग्रंथों में हिन्दुओं का इतिहास दर्ज है, लेकिन कुछ लोग इन ग्रंथों में से संस्कृत के कुछ श्लोक निकालकर यह बताने का प्रयास करते हैं कि ऊंच-नीच की बातें तो इन धर्मग्रंथों में ही लिखी है। असल में यह काल और परिस्थिति के अनुसार बदलते समाज का चित्रण है।
कर्म का विभाजन- वेद या स्मृति में श्रमिकों को चार वर्गो- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र-में विभक्त किया गया है, जो मनुष्यों की स्वाभाविक प्रकृति पर आधारित है। यह विभक्तिकरण कतई जन्म पर आधारित नहीं है। आज बहुत से ब्राह्मण व्यापार कर रहे हैं उन्हें ब्राह्मण कहना गलत हैं। ऐसे कई क्षत्रिय और दलित हैं जो आज धर्म-कर्म का कार्य करते हैं तब उन्हें कैसे क्षत्रिय या दलित मान लें? लेकिन पूर्व में हमारे देश में परंपरागत कार्य करने वालों का एक समाज विकसित होता गया, जिसने स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को निकृष्ट मानने की भूल की है तो उसमें हिन्दू धर्म का कोई दोष नहीं है। यदि आप धर्म की गलत व्याख्या कर लोगों को बेवकूफ बनाते हैं तो उसमें धर्म का दोष नहीं है।
प्राचीन काल में ब्राह्मणत्व या क्षत्रियत्व को वैसे ही अपने प्रयास से प्राप्त किया जाता था, जैसे कि आज वर्तमान में एमए, एमबीबीएस आदि की डिग्री प्राप्त करते हैं। जन्म के आधार पर एक पत्रकार को पुत्र को पत्रकार, इंजीनियर के पुत्र को इंजीनियर, डॉक्टर के पुत्र को डॉक्टर या एक आईएएस, आईपीएस अधिकारी के पुत्र को आईएएस अधिकारी नहीं कहा जा सकता है, जब तक की वह आईएएस की परीक्षा नहीं दे देता।
इस तरह मिला जाति को बढ़ावा- दो तरह के लोग होते हैं- अगड़े और पिछड़े। यह मामला उसी तरह है जिस तरह की दो तरह के क्षेत्र होते हैं विकसित और अविकसित। पिछड़े क्षेत्रों में ब्राह्मण भी उतना ही पिछड़ा था जितना की दलित या अन्य वर्ग, धर्म या समाज का व्यक्ति। पीछड़ों को बराबरी पर लाने के लिए संविधान में प्रारंभ में 10 वर्ष के लिए आरक्षण देने का कानून बनाया गया, लेकिन 10 वर्ष में भारत की राजनीति बदल गई। सेवा पर आधारित राजनीति पूर्णत: वोट पर आधारित राजनीति बन गई।
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हिन्दू धर्म में वृक्ष पूजा क्यों की जाती है? : Why is tree worship done in Hinduism?






 ईश्वरवादियों के अनुसार किसी भी वृक्ष, पौधे, पहाड़, पशु, पत्‍थर आदि की पूजा या प्रार्थना करना पाप है तब सवाल उठता है कि हिन्दू धर्म में वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है? क्या वृक्ष की पूजा करने से .कोई लाभ मिलेगा या वृक्ष हमारी मन्नत पूर्ण करते हैं?


हिन्दू धर्म के 10 पवित्र वृक्ष, जानिए उनका रहस्य

शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, दस इमली, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह पुण्यात्मा होता है और कभी नरक के दर्शन नहीं करता। इसी तरह धर्म शास्त्रों में सभी तरह से वृक्ष सहित प्रकृति के सभी तत्वों के महत्व की विवेचना की गई है।
आखिर वृक्षों की पूजा के पीछे क्या है वैज्ञानिक, धार्मिक और प्राकृतिक कारण?..
*वृक्ष हमारे जीवन और धरती के पर्यावरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वृक्ष से एक और जहां ऑक्सीजन का उत्पादन होता है तो दूसरी ओर यही वृक्ष धरती के प्रदूषण को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दरअसल, यह धरती के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलन प्रदान करते हैं।
*वृक्ष औषधीय गुणों का भंडार होते हैं। नीम, तुलसी, जामुन, आंवला, पीपल, अनार आदि अनेक ऐसे वृक्ष हैं, जो हमारी सेहत को बरकरार रखने में मददगार सिद्ध होते हैं
*वृक्ष से हमें भरपूर भोजन प्राप्त होता है, जैसे आम, अनार, सेवफल, अंगूर, केला, पपीता, चीकू, संतरा आदि ऐसे हजारों फलदार वृक्षों की जितनी तादाद होगी उतना भरपूर भोजन प्राप्त होगा। आदिकाल में वृक्ष से ही मनुष्य के भोजन की पूर्ति होती थी।
*वृक्ष के आसपास रहने से जीवन में मानसिक संतुष्टि और संतुलन मिलता है। वृक्ष हमारे जीवन के संतापों को समाप्त करने की शक्ति रखते हैं। माना कि वृक्ष देवता नहीं होते लेकिन उनमें देवताओं जैसी ही ऊर्जा होती है। हाल ही में हुए शोधों से पता चला है कि नीम के नीचे प्रतिदिन आधा घंटा बैठने से किसी भी प्रकार का चर्म रोग नहीं होता। तुलसी और नीम के पत्ते खाने से किसी भी प्रकार का कैंसर नहीं होता। इसी तरह वृक्ष से सैकड़ों शारीरिक और मानसिक लाभ मिलते हैं।इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण संरक्षण हेतु वृक्ष से संबंधित अनेक मान्यताओं को प्रचलन में लाया।
उपरोक्त वैज्ञानिक कारणों से हमारे पूर्वज भली-भांति परिचित थे और इस तरह वे पारिस्थितिकी संतुलन के लिए और उपरोल्लिखित उद्देश्यों की रक्षा के लिए वृक्ष को महत्व देते थे, लेकिन उन्हें यह भी मालूम था कि. कि मनुष्य आगे चलकर इन वृक्षों का अंधाधुंध दोहन करने लगेगा इसलिए उन्होंने वृक्षों को बचाने के लिए प्रत्येक वृक्ष का एक देवता नियुक्त किया और जगह-जगह पर प्रमुख वृक्षों के नीचे देवताओं की स्थापना की।
हिंदू धर्म का वृक्ष से गहरा नाता है। हिंदू धर्म को वृक्षों का धर्म कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि हिंदू धर्म में वृक्षों का जो महत्व है वह किसी अन्य धर्म में शायद ही मिले। इस ब्रह्मांड को उल्टे वृक्ष की संज्ञा दी है। पहले यह ब्रह्मांड बीज रूप में था और अब यह वृक्ष रूप में दिखाई देता है। प्रलय काल में यह पुन: बीज रूप में हो जाएगा।


पीपल वृक्ष-

शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, दस इमली, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह पुण्यात्मा होता है और कभी नरक के दर्शन नहीं करता। इसी तरह धर्म शास्त्रों में सभी तरह से वृक्ष सहित प्रकृति के सभी तत्वों के महत्व की विवेचना की गई है।
यहां प्रस्तुत है ऐसे दस वृक्ष जिनकी रक्षा करना हर हिंदू का कर्तव्य है और इनको घर के आसपास लगाने से सुख, शांति और समृद्धि की अनुभूति होती है। किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता।
पीपल के वृक्ष को संस्कृत में प्लक्ष भी कहा गया है। वैदिक काल में इसे अश्वार्थ इसलिए कहते थे, क्योंकि इसकी छाया में घोड़ों को बांधा जाता था। अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। औषधीय गुणों के कारण पीपल के वृक्ष को 'कल्पवृक्ष' की संज्ञा दी गई है। पीपल के वृक्ष में जड़ से लेकर पत्तियों तक तैंतीस कोटि देवताओं का वास होता है और इसलिए पीपल का वृक्ष प्रात: पूजनीय माना गया है। उक्त वृक्ष में जल अर्पण करने से रोग और शोक मिट जाते हैं।
पीपल के प्रत्येक तत्व जैसे छाल, पत्ते, फल, बीज, दूध, जटा एवं कोपल तथा लाख सभी प्रकार की आधि-व्याधियों के निदान में काम आते हैं। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में पीपल को अमृततुल्य माना गया है।  सर्वाधिक ऑक्सीजन निस्सृत करने के कारण इसे प्राणवायु का भंडार कहा जाता है। सबसे अधिक ऑक्सीजन का सृजन और विषैली गैसों को आत्मसात करने की इसमें अकूत क्षमता है।
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, 'हे पार्थ वृक्षों में मैं पीपल हूं।'
।।मूलतः ब्रह्म रूपाय मध्यतो विष्णु रुपिणः। अग्रतः शिव रुपाय अश्वत्त्थाय नमो नमः।।  
भावार्थ-अर्थात इसके मूल में ब्रह्म, मध्य में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास होता है। इसी कारण 'अश्वत्त्थ'नामधारी वृक्ष को नमन किया जाता है।-पुराण
पीपल परिक्रमा : स्कन्द पुराण में वर्णित पीपल के वृक्ष में सभी देवताओं का वास है। पीपल की छाया में ऑक्सीजन से भरपूर आरोग्यवर्धक वातावरण निर्मित होता है। इस वातावरण से वात, पित्त और कफ का शमन-नियमन होता है तथा तीनों स्थितियों का संतुलन भी बना रहता है। इससे मानसिक शांति भी प्राप्त होती 
है। पीपल की पूजा का प्रचलन प्राचीन काल से ही रहा है। इसके कई पुरातात्विक प्रमाण भी है।
अश्वत्थोपनयन व्रत के संदर्भ में महर्षि शौनक कहते हैं कि मंगल मुहूर्त में पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढ़ाने पर दरिद्रता, दु:ख और दुर्भाग्य का विनाश होता है। पीपल के दर्शन-पूजन से दीर्घायु तथा समृद्धि प्राप्त होती है। अश्वत्थ व्रत अनुष्ठान से कन्या अखण्ड सौभाग्य पाती है।
पीपल पूजा : शनिवार की अमावस्या को पीपल वृक्ष की पूजा और सात परिक्रमा करके काले तिल से युक्त सरसो के तेल के दीपक को जलाकर छायादान करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। अनुराधा नक्षत्र से युक्तशनिवार की अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष के पूजन से शनि पीड़ा से व्यक्ति मुक्त हो जाता है। श्रावण मास में अमावस्या की समाप्ति पर पीपल वृक्ष के नीचे शनिवार के दिन हनुमान की पूजा करने से सभी तरह के संकट से मुक्ति मिल जाती है।


वट वृक्ष -

पीपल में जहां भगवान विष्णु का वास है वहीं बरगद में ब्रह्मा, विश्णु और शिव का वास माना गया है। हालांकि बरगद को साक्षात शिव कहा गया है। बरगद को देखना शिव के दर्शन करना है। हिंदू धर्मानुसार पांच वटवृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त पांच वटों को पवित्र वटकी श्रेणी में रखा गया है। प्रयाग में अक्षयवट, नासिक में पंचवट, वृंदावन में वंशीवट, गया में गया वट और उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है
।।तहं पुनि संभु समुझिपन आसन। बैठे वटतर, करि कमलासन।।
भावार्थ-अर्थात कई सगुण साधकों, ऋषियों, यहां तक कि देवताओं ने भी वट वृक्ष में भगवान विष्णु की उपस्थिति के दर्शन किए हैं।- रामचरित मानस


आम का पेड़

आम है खास : हिंदू धर्म में जब भी कोई मांगलिक कार्य होते हैं तो घर या पूजा स्थल के द्वार व दीवारों पर आम के पत्तों की लड़ लगाकर मांगलिक उत्सव के माहौल को धार्मिक और वातावरण को शुद्ध किया जाता है।
अक्सर धार्मिक पंडाल और मंडपों में सजावट के लिए आम के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। आम के वृक्ष की हजारों किस्में हैं और इसमें जो फल लगता है वह दुनियाभर में प्रसिद्ध है। आम के रस से कई प्रकार के रोग दूर होते हैं।  

शमी वृक्ष (खेजडा)

भविष्यवक्ता शमी : विक्रमादित्य के समय में सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर ने अपने 'बृहतसंहिता'नामक ग्रंथ के 'कुसुमलता'नाम के अध्याय में वनस्पति शास्त्र और कृषि उपज के संदर्भ में जो जानकारी प्रदान की है उसमें शमीवृक्ष अर्थात खिजड़े का उल्लेख मिलता है।  
वराहमिहिर के अनुसार जिस साल शमीवृक्ष ज्यादा फूलता-फलता है उस साल सूखे की स्थिति का निर्माण होता है। विजयादशमी के दिन इसकी पूजा करने का एक तात्पर्य यह भी है कि यह वृक्ष आने वाली कृषि विपत्ती का पहले से संकेत दे देता है जिससे किसान पहले से भी ज्यादा पुरुषार्थ करके आनेवाली विपत्ती से निजात पा सकता है।   

बिल्व वृक्ष-

हिन्दू धर्म में बिल्व वृक्ष भगवान शिव की अराधना का मुख्य अंग है। धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। बिल्व वृक्ष की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। यह शर्बत कुपचन, आंखों की रोशनी में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए उत्तम है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों मे टैनिन, लोह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं। बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में 'स्कंदपुराण' में कहा गया है कि एक बार देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं।
कहा जाता है कि बेल वृक्ष के कांटों में भी कई शक्तियाँ समाहित हैं। यह माना जाता है कि देवी महालक्ष्मी का भी बेल वृक्ष में वास है। जो व्यक्ति शिव-पार्वती की पूजा बेलपत्र अर्पित कर करते हैं, उन्हेंमहादेव और देवी पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है। 'शिवपुराण' में इसकी महिमा विस्तृत रूप में बतायी गयी है।

अशोक वृक्ष -

अशोक वृक्ष को हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र और लाभकारी माना गया है। अशोक का शब्दिक अर्थ होता है- किसी भी प्रकार का शोक न होना। मांगलिक एवं धार्मिक कार्यों में अशोक के पत्तों का प्रयोग किया जाता है माना जाता है कि अशोक वृक्ष घर में लगाने से या इसकी जड़ को शुभ मुहूर्त में धारण करने से मनुष्य को सभी शोकों से मुक्ति मिल जाती है। अशोक का वृक्ष वात-पित्त आदि दोष, अपच, तृषा, दाह, कृमि, शोथ, विष तथा रक्त विकार नष्ट करने वाला है। यह रसायन और उत्तेजक है। इसके उपयोग से चर्म रोग भी दूर होता है। अशोक का वृक्ष घर में उत्तर दिशा में लगाना चाहिए जिससे गृह में सकारात्मक ऊर्जा का संचारण बना रहता है।
घर में अशोक के वृक्ष होने से सुख, शांति एवं समृद्धि बनी रहती है एवं अकाल मृत्यु नहीं होती।
अशोक का वृक्ष दो प्रकार का होता है- एक तो असली अशोक वृक्ष और दूसरा उससे मिलता-जुलता नकली अशोक वृक्ष। नकली अशोक वृक्ष देवदार की जाति का लंबा वृक्ष होता है। इसके पत्ते आम के पत्तों जैसे होते हैं। इसकेफूल सफेद, पीले रंग के और फल लाल रंग के होते हैं। असली अशोक का वृक्ष आम के पेड़ जैसा छायादार वृक्ष होता है। इसके पत्ते 8-9 इंच लंबे और दो-ढाई इंच चौड़े होते हैं। इसके पत्ते शुरू में तांबे जैसे रंग के होते हैं इसीलिए इसे 'ताम्रपल्लव' भी कहते हैं। इसकेनारंगी रंग के फूल वसंत ऋतु में आते हैं, जो बाद में लाल रंग के हो जाते हैं। सुनहरे लाल रंग के फूलों वाला होने से इसे 'हेमपुष्पा' भी कहा जाता है।


नारियल का पेड़-

नारियल का वृक्ष : हिन्दू धर्म में नारियल के बगैर तो कोई मंगल कार्य संपन्न होता ही नहीं। नारियल का खासा धार्मिक महत्व है। 60 फुट से 100 फुट तक ऊंचा नारियल का पेड़ लगभग 80 वर्षों तक जीवित रहता है। 15 वर्षों के बाद पेड़ में फल लगते हैं।
पूजा के दौरान कलश में पानी भरकर उसके ऊपर नारियल रखा जाता है। यह मंगल प्रतीक है। नारियल का प्रसाद भगवान को चढ़ाया जाता है।
पेड़ का प्रत्येक भाग किसी न किसी काम में आता है। ये भाग किसानों के लिए बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इसे घरों के पाट, फर्नीचर आदि बनाए जाते हैं। पत्तों से पंखे, टोकरियां, चटाइयां आदि बनती हैं। इसकी जटासे रस्सी, चटाइयां, ब्रश, जाल, थैले आदि अनेक वस्तुएं बनती हैं। यह गद्दों में भी भरा जाता है। नारियल का तेल सबसे ज्यादा बिकता है।  
नारियल के पानी में पोटेशियम अधिक मात्रा में होता है। इसे पीने से शरीर में किसी भी प्रकार की सुन्नता नहीं रहती। अगर आप पाचन की समस्या से ग्रसित हैं तो 1 गिलास नारियल का पानी लें, उसमें अन्ननास का जूस मिलाएं और पूरे 9 दिन तक नाश्ते से पहले उसे पीएं। इसे पीने के बाद 2 घंटे तक किसी भी प्रकार का भोजन न करें और न ही कोई अन्य पेय पीएं। नारियल के गूदे का इस्तेमाल नाड़ियों की समस्या, कमजोरी, स्मृति नाश, पल्मनरी अफेक्शन्स (फेफड़ों के रोगों) के उपचार के लिए किया जाता है। यह त्वचा संबंधी तथा आंतड़ियों संबंधी समस्याओं को भी दूर करता है।

अस्थमा से पीड़ित व्यक्तियों को भी नारियल पानी पीने की सलाह दी जाती है।
  

अनार - 

अनार के वृक्ष से जहां सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता हैं वहीं इस वृक्ष के कई औषधीय गुण भी हैं। पूजा के दौरान पंच फलों में अनार की गिनती की जाती है। अनार को दाडम या दाड़िम आदि अलग-अलग नाम से जानते हैं। अनार का वृक्ष भी बहुत ही सुंदर होता है जिसे बगिया की शोभा के लिए भी लगाया जा सकता है। इसकी कली, फूल और फल भी कुछ कम सुंदर नहीं होते।
अनार का प्रयोग करने से खून की मात्रा बढ़ती है। इससे त्वचा सुंदर व चिकनी होती है। रोज अनार का रस पीने से या अनार खाने से त्वचा का रंग निखरता है। अनार के छिलकों के एक चम्मच चूर्ण को कच्चे दूध और गुलाब
जल में मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरा दमक उठता है। अपच, दस्त, पेचिश, दमा, खांसी, मुंह में दुर्गंध आदि रोगों में अनार लाभदायक है। इसके सेवन से शरीर में झुर्रियां या मांस का ढीलापन समाप्त हो जाता है।

नीम का वृक्ष -

नीम एक चमत्कारी वृक्ष माना जाता है। नीम जो प्रायः सर्व सुलभ वृक्ष आसानी से मिल जाता है। नीम को संस्कृत में निम्ब कहा जाता है। यह वृक्ष अपने औषधीय गुणों के कारण पारंपरिक इलाज में. बहुपयोगी सिद्ध होता आ रहा है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।  
 निम्ब शीतों लघुग्राही कतुर कोअग्नी वातनुत।
अध्यः श्रमतुटकास ज्वरारुचिक्रिमी प्रणतु ॥  
अर्थात नीम शीतल, हल्का, ग्राही पाक में चरपरा, हृदय को प्रिय, अग्नि, वाट, परिश्रम, तृषा, अरुचि, क्रीमी, व्रण, कफ, वामन, कोढ़ और विभिन्न प्रमेह को नष्ट करता है।  
नीम के पेड़ का औषधीय के साथ-साथ धार्मिक महत्त्व भी है। मां दुर्गा का रूप माने जाने वाले इस पेड़ को कहीं-कहीं नीमारी देवी भी कहते हैं। इस पेड़ की पूजा की जाती है। कहते हैं कि नीम की पत्तियों के धुएं से.बुरी और प्रेत आत्माओं से रक्षा होती है।  

केले का पेड़ : 

केले का पेड़ काफी पवित्र माना जाता है और कई धार्मिक कार्यों में इसका प्रयोग किया जाता है। भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को केले का भोग लगाया जाता है। केले के पत्तों में प्रसाद बांटा जाता है। माना जाता है कि समृद्धि के लिए केले के पेड़ की पूजा अच्छी होती है।
केला हर मौसम में सरलता से उपलब्ध होने वाला अत्यंत पौष्टिक एवं स्वादिष्ट फल है। केला रोचक, मधुर, शक्तिशाली, वीर्य व मांस बढ़ाने वाला, नेत्रदोष में हितकारी है। पके केले के नियमित सेवन से शरीर पुष्ट होता है। यह कफ, रक्तपित, वात और प्रदर के उपद्रवों को नष्ट करता है।
केले में मुख्यतः विटामिन-ए, विटामिन-सी,थायमिन, राइबो-फ्लेविन, नियासिन तथा अन्य खनिज तत्व होते हैं। इसमें जल का अंश 64.3 प्रतिशत ,प्रोटीन 1.3 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेट 24.7 प्रतिशत तथा चिकनाई 8.3 प्रतिशत है|






5.5.17

हिन्दू शादी के सात फेरे और सात वचन और उनका अर्थ जानिए







हिन्दू शादी में सात वचन और सात फेरे का अर्थ क्या है
:
विवाह में वर-वधु सातों फेरे या पद सात वचनों के साथ लेते हैं. हर फेरे का एक वचन होता है, जिसे पति-पत्नी जीवन भर साथ निभाने का वादा करते हैं. विवाह के बाद कन्या वर के वाम अंग (बांई ओर) में बैठने से पूर्व उससे सात वचन लेती है. हम आपको मूल संस्कृत मंत्र वचन तथा उनका सरल हिंदी अनुवाद बताने जा रहे हैं.
भारतीय विवाह परंपरा यह मानती है कि यह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता. पंडित की उपस्थिति में मंत्रों के उच्चारण के साथ अग्नि के सात फेरे लेकर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो व्यक्ति तन, मन तथा आत्मा के साथ एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं.
हिन्दू धर्म में विवाह का अर्थ और महत्व :
भारत में सनातनी और वैदिक संस्कृति के अनुसार सोलह संस्कारों का बड़ा महत्व है और विवाह संस्कार उन्हीं में से एक है. विवाह का शाब्दिक अर्थ है वि + वाह = विवाह , अर्थात उत्तरदायित्व का वहन करना या जिम्मेदारी उठाना. पाणिग्रहण संस्कार को ही सामान्यतः विवाह के नाम से जाना जाता है.
हमारे यहां पति और पत्नी के बीच के संबंध को शारीरिक संबंध से अधिक आत्मिक संबंध माना गया है. विवाह की रस्मों में सात फेरों का भी एक प्रचलन है जिसके बाद ही विवाह संपूर्ण माना जाता है. सात फेरों में दूल्हा व दुल्हन दोनों से सात वचन लिए जाते हैं. वर-वधू अग्नि को साक्षी मानकर इसके चारों ओर घूमकर पति-पत्नी के रूप में एक साथ सुख से जीवन बिताने के लिए प्रण करते हैं और सात फेरे लेते हैं, जिसे सप्तपदी भी कहा जाता है.
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!

यहाँ कन्या वर से पहला वचन मांग रही है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा करने जाएं तो मुझे भी अपने संग लेकर जाइएगा. यदि आप कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धार्मिक कार्य करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग (बांई ओर) में बिठाएं. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
द्वितीय वचन
पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!
दूसरे वचन में कन्या वर से मांग रही है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा परिवार की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
तृतीय वचन
जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात,
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!

तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
चतुर्थ वचन
कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!

चौथे वचन में वधू ये कहती है कि अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है. यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
पंचम वचन
स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!

पांचवें वचन में कन्या कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाह आदि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी राय लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
षष्ठम वचन
न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत,
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!

छठवें वचन में कन्या कहती है कि यदि मैं कभी अपनी सहेलियों या अन्य महिलाओं के साथ बैठी रहूँ तो आप सामने किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे. इसी प्रकार यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार की बुराइयों अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
सप्तम वचन
परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!

आखिरी या सातवें वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को मां समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें. यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
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27.4.17

आत्मविश्वास बढ़ाने वाले चमत्कारी उपाय:Miraculous measures to increase confidence





आत्मविश्वास बढ़ाने के वास्तु शास्त्र से सम्बंधित उपाय :
* अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए आप हमेशा पूर्व दिशा की तरफ मुहं करके ही खाना खाए.

* अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए आप सुबह जल्दी उठ कर उगते सूर्य पर कम से कम 5 मिनट तक ध्यान करे.
*आप रोज़ सुबह जल्दी उठ कर उगते सूर्य के सामने सूर्य के बारह नामो को जपे, इससे सूर्य देव खुश होते है और आप पर अपनी कृपा दृष्टी बनाये रखते है.
* आप रोज़ सुबह गायत्री मंत्र का भी उच्चारण करे इससे आपका मन शांत होगा और धीरे धीरे आपका आत्मविश्वास भी बढ़ने लगेगा
* आप अपने दाये हाथ की अंगुली में सोने से बनी अंगूठी पहने.
* आप सूरजमुखी के फूल को पूर्व दिशा में रखे, इससे आपके आत्मविश्वास मे बढ़ोतरी होती है.
आप अपने आत्मविश्वास को बढ़ने के लिए वास्तु शास्त्र के अलावा कुछ मनोवैज्ञानिक उपायों को भी अपना सकते है क्योकि अगर आपका मन ठीक होता है तो आपके चेहरे पर चमक आती है और आप अपने जीवन की हर कठिन चुनोतियो को भी हँसते हुए पार कर लेते हो. अपने आत्मविश्वास को बढ़ने के लिए आप इन मनोवैज्ञानिक उपायों को अपना सकते है –
· आपको हर बात को उसके उचित अर्थ के साथ देखना चाहिए और उसके यथार्थ को समझने की कोशिश करनी चाहिए.
· साथ ही आपको अपनी क्षमताओ पर भी पूर्ण विश्वास होना चाहिए.
· अगर आपके जीवन में कुछ उतार चढाव की परिस्तिथियाँ आती है तो आपको उस समय संयम से काम लेना चाहिए और हमेशा आशावादी रहना चाहिए.
आपको अपने आपको इस तरह तैयार करना चाहिए कि आप अपने कार्यो में असफलता पाने के बाद भी उम्मीद न छोड़ो और पुनः प्रयास करने लगो.
· आपको अपने निर्णयों पर भी पूरा भरोसा होना चाहिए, नाकि आप किसी की बातो को सुन कर अपने निर्णय को बदल दो.
· अगर आपको लगता है कि आप आपको दिए गए कार्यो को कर सकते हो तो आप खुद ही पहल करके उन कार्यो की जिम्मेदारियों को ले और उनमे सफलता प्राप्त करके दिखाए.
· आप किसी भी चीज़ को अत्यधिक निजी रूप से और अत्यधिक गंभीरता से न ले क्योकि किसी भी चीज़ की अति अच्छी नही होती.
· आप अपने बारे में अच्छा सोचे और साथ ही अपने साथियो के बारे में भी अच्छा सोचे और उनकी मदद करके उनको खुशियाँ दें.
· एक आत्मविश्वास से भरा इंसान हमेशा जिज्ञासा से भरा होता है तो आप भी अपने अंदर की जिज्ञासा को बढाइये.
· आप कभी भी अपनी सफलताओ पर घमंड ना करे बल्कि अपनी सफलताओ से प्रेरित होकर अपने भविष्य के लिए और लक्ष्य बनाये.

मंदिर जाने के चमत्कार!




मंदिर जाने से होने वाले चमत्कार या वे कारण जिनकी वजह से हमें भी रोज़ मंदिर जाना चाहिए
मंदिर शब्द दो शब्दों (मन + दर) से मिल कर बना है अथार्त हमारे मन का दरवाजा. जहाँ हमारे मन को शांति की अनुभूति होती है और हमे आध्यात्म का अहसास होता है. ऐसी जगह पर जाने के लिए वैसे तो हमे किसी कारण या चमत्कार की जरूरत नही होनी चाहिए किन्तु कहा जाता है कि मानव अपने हर काम को किसी न किसी स्वार्थ के कारण ही करता है तो हम आपको मंदिर जाने से होने वाले चमत्कारों से आज परिचित करना चाहेंगे.

मंदिर में स्थापित भगवान की मूर्ति ही मनुष्य के आस्था और विश्वास का केंद्र होती है. मंदिर की वजह से ही हमारे मन में आस्था का विकास होता है और मंदिर ही हमारे धर्म का प्रतिनिधितव भी करता है. आपने इस बात को महसूस किया होगा कि जब भी आप किसी मंदिर के सामने से गुजरते है तो आपका सिर अपने आप ही आस्था से भगवान के मंदिर के सामने नतमस्तक / झुक हो जाता है. हम सब मंदिर में अपने भगवान के प्रति प्यार, आस्था और अपनी कुछ इच्छाओ की पूर्ति के लिए जाते है लेकिन इनके साथ साथ मंदिर जाने के ओर भी कई लाभ आपको मिलते है. वे सभी चमत्कारिक लाभ निम्नलिखित है.
· जैसाकि हमने आपको ऊपर बताया था कि मंदिर मन का द्वार होता है तो मंदिर एक ऐसा है जहाँ हमारे मन को सुख और शांति का आभास होता है.
· मंदिर एक ऐसी जगह है जहाँ आप अपने अंदर एक नयी शक्ति को अनुभव कर सकते है.
· जहाँ जाने से हमारे मन – मस्तिष्क प्रफ्फुलित हो जाता है और हमे आतंरिक सुख मिलता है.
· जहाँ जाने से आपका पूरा शरीर उत्साह से और उमंग से भर जाता है.
· मंदिर में मंत्रो का उच्चारण होता रहता है तो मंत्रो का मीठा स्वर, घंटे – घड़ियाल, शंख और नगाडो की मीठी ध्वनियाँ सुन कर आपके मन को भी अच्छा लगता है.
मंदिर और मंदिर में होने वाली हर घटना के पीछे एक वज्ञानिक कारण होता है. यहाँ तक मंदिर का निर्माण भी पूरी वज्ञानिक विधि के अनुसार ही किया जाता है, मंदिर का निर्माण वास्तु शास्त्र को भी ध्यान में रख कर किया जाता है और इसे पुरे वास्तुशिल्प के हिसाब से बनाया जाता है, जिससे मंदिर में हमेशा शांति और दिव्यता उत्तपन होती रहे. मंदिर के गुम्बद के शिखर के केंद्र बिंदु के बिलकुल ठीक नीचे ही मूर्ति की स्थापना की जाती है, ऐसा ध्वनि सिद्धांत को ध्यान में रख कर किया जाता है, जिससे जब भी मंदिर में मंत्रोचारण किया जाये तो मंत्रो का स्वर और अन्य ध्वनियाँ गुम्बद में गूंजती रहे और वहां उपस्थित सभी लोग इससे प्रभावित हो सके.मूर्ति का और गुम्बद का केंद्र एक ही होता है जिससे मूर्ति में निरंतर उर्जा प्रवाहित होती रहती है और हम भी जब मूर्ति के सामने अपने शीश को झुकाते है, मूर्ति में भगवान के चरणों को स्पर्श करते है और भगवान के सामने नतमस्तक होते है तो वो उर्जा हमारे शरीर में भी प्रवाहित हो जाती है. ये उर्जा हमारे शरीर में भी शक्ति, उत्त्साह भर देती है. मंदिर से हमारे मन, शरीर और आत्मा को पवित्रता मिलती है और हमे शुद्ध करती है जिसकी वजह से हमारे अन्दर का दिखावा खत्म हो जाता है और हम अंदर और बाहर इसी तरह की शुद्धता का आभास होता है. मंदिर में बजने वाले शंख और घंटो की धवानिया वहन के वातावरण को भी शुद्ध करती है और वातावरण में से कीटाणुओं को भी खत्म करती है. मंदिर में घंटे का भी अपना ही एक महत्व है हम जब भी किसी के घर में प्रवेश करते है तो पहले रिंग बजाते है इसी तरह हम जब मंदिर में जाते है तो घंटा बजा कर ही प्रवेश करना चाहिए जिससे हमारे शिष्टाचार का पता चलता है. घंटे का एक और महत्व है कि ये देव भूमि को जाग्रत करता है जिससे हमारी हर प्रार्थना सुनी जा सके. घंटे और घड़ियाल की ध्वनि काफी दूर तक सुनी देती है और मंदिर के आसपास के सारे वातावरण को शुद्ध कर सके और जिससे लोगो को ये भी पता चल जाता है कि आगे मंदिर है.
मंदिर में जिस देवता या भगवान की मूर्ति की स्थापना होती है उनके प्रति हमारी आस्था और हमारा विश्वास होता है और जब भी हम उस मूर्ति के सामने नतमस्तक होते है तो हम अपने आप को एकाग्र पाते है और हमारी यही एकाग्रता हमे हमारे भगवान के साथ जोडती है और उस वक़्त हम अपने भीतर भी ईश्वर की उपस्तिथि को अनुभव करते है. यही एकाग्रता हमे चिंतन में भी सहायक होती है और चिंतन मनन से हमे हमारी हर समस्या का समाधान भी जल्दी प्राप्त हो जाता है. मंदिर जाने से हम मंदिर में स्थापित देवताओ के सामने नतमस्तक होते है जो एक योग का भी हिस्सा होता है तो हम अनजाने में ही प्रतिदिन एक योग को भी कर लेते है. इससे हमारे शारीरिक, मानशिक तनाव से भी मुक्ति मिलती है साथ ही हमारा आलस भी दूर हो जाता है. मंदिर में एक प्रथा परिक्रमा की भी होती है जिसमे आपको पैदल चलना पड़ता है. और आप तो जानते ही है कि यह भी एक प्रकार का व्यायाम है. हमे परिक्रमा नंगे पैरो से करनी होती है और एक शोध में पता चला है कि नंगे पैरो से मंदिर में जाने से पगतलो में एक्यूप्रेशर भी होता है. ये हमारे शरीर के कई अहम बिन्दुओ पर अनुकूल दबाव डालते है. जिससे हमारे स्वास्थ्य में भी लाभ मिलता है.
मंदिर को वज्ञानिक शाला के रूप में बनाने के पीछे हमारे पूर्वजो का और ऋषि – मुनियों का यही लक्ष्य था कि हम प्रतिदिन सुबह अपने कामो पर जाने से पहले मंदिर जाकर सकारात्मक उर्जा को ले सके और शाम को जब हम अपने घर थक कर आते है तो उस वक़्त भी हम मंदिरों से उर्जा को ले कर अपने कर्तव्यों का पालन सफलतापूर्वक कर सके.
इस तरह हमे पता चलता है कि मंदिर सिर्फ हमारी आस्था और हमारे विश्वास का ही केंद्र नही है बल्कि मंदिर हमारी सोच, हमारे विचार, हमारे व्यवहार, हमारे कर्तव्यो, हमारे स्वाथ्य का भी केंद्र है. तो हमे प्रतिदिन मंदिर जरुर जाना चाहिए ताकि आप मंदिर से होने वाले चमत्कारिक और आध्यत्मिक लाभों का फ़ायदा उठा पाए.