28.12.25

गोस्वामी समाज की उत्पत्ति और इतिहास ,परम्पराएं , गोत्र और कुलदेवी ,गोस्वामी समाज के प्रसिद्ध व्यक्ति




गोस्वामी समाज (दशनाम गोस्वामी)की उत्पत्ति आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा सनातन धर्म की रक्षा और पुनरुत्थान के लिए हुई मानी जाती है, जो शैव परंपरा से जुड़ा है और शिव व हरि (विष्णु) के उपासक हैं; इनमें गिरी, पुरी, भारती जैसे दस उपनाम होते हैं और ये ज्ञान-वैराग्य को महत्व देते हैं, मठ-मंदिरों से जुड़े हैं और देशभर में फैले हुए हैं, मुख्य रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड आदि राज्यों में पाए जाते हैं।
उत्पत्ति और इतिहास (Origin & History):
आदि शंकराचार्य की भूमिका: माना जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म में धर्मांतरित हो रहे सनातनियों को बचाने और भ्रष्ट ब्राह्मणों से बचाने के लिए विद्वान ब्राह्मणों को संगठित कर दसनाम गोस्वामी समाज की नींव रखी।
धार्मिक आधार:
यह समाज पुरातन शैव परंपरा पर आधारित है और भगवान दत्तात्रेय से इनका संबंध माना जाता है। ये स्मार्त ब्राह्मण भी कहलाते हैं क्योंकि ये शिव, विष्णु, देवी, सूर्य और गणेश (पंचदेव) की पूजा करते हैं।
दस नाम (Ten Names): शंकराचार्य ने अपने शिष्यों को दस नाम दिए, जो बाद में गृहस्थों (गोस्वामियों) और संन्यासियों दोनों में प्रचलित हुए: गिरी, पुरी, भारती, पर्वत, सरस्वती, सागर, वन, अरण्य, आश्रम, तीर्थ।
अर्थ: 'गो' का अर्थ पांचों इंद्रियां (कान, आंख, जीभ, नाक, त्वचा) और 'स्वामी' का अर्थ नियंत्रण रखने वाला होता है, यानी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने वाला।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
उपासना: शिव के उपासक हैं, ओम नमो नारायण या नमः शिवाय का जाप करते हैं।
पहनावा और चिह्न:
गेरुआ वस्त्र, गले में रुद्राक्ष माला, माथे पर चंदन या राख से त्रिपुंड (शिव के त्रिशूल का प्रतीक) लगाते हैं।
कार्य:
मंदिर पूजा, शिव कथा, भागवत कथा, यज्ञ, हवन और दीक्षा देना इनके मुख्य कार्य हैं; अब खेती, शिक्षा और प्रशासन में भी हैं।
निवास:
राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र आदि में व्यापक रूप से बसे हैं।
मान्यता:
इन्हें सामान्यतः ब्राह्मणों से उच्चतर माना जाता है और कुंभ मेले में इन्हें शाही स्नान की मान्यता प्राप्त है।
निष्कर्ष (Conclusion):
गोस्वामी समाज त्याग, तपस्या, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है, जिसने हिंदू धर्म और संस्कृति को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, और आज भी समाज व राष्ट्र के उत्थान के लिए प्रयासरत है
गोस्वामी समाज से कई प्रसिद्ध हस्तियाँ हैं, जिनमें पत्रकार अर्णव गोस्वामी, अभिनेत्री उदिता गोस्वामी, IAS अधिकारी अनिल गोस्वामी, लेखक अमर गोस्वामी, और संगीतशास्त्री करुणामय गोस्वामी शामिल हैं, जो राजनीति, कला, प्रशासन और साहित्य जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं; ऐतिहासिक रूप से, आदि शंकराचार्य के शिष्य और वृंदावन के छह गोस्वामी (जैसे सनातन गोस्वामी, रूप गोस्वामी) महत्वपूर्ण हैं, जो दशनामी परंपरा और भक्ति आंदोलन से जुड़े हैं।
विभिन्न क्षेत्रों के गोस्वामी समाज के जाने-माने लोग (उदाहरण):पत्रकारिता: अर्णव गोस्वामी (पत्रकार).
अभिनय: उदिता गोस्वामी, अल्पना गोस्वामी, और अबीर गोस्वामी (अभिनेता).
प्रशासन/न्याय: 
अनिल गोस्वामी (IAS अधिकारी), अरूप कुमार गोस्वामी (न्यायाधीश).
साहित्य: अमर गोस्वामी (लेखक), अशोकपुरी गोस्वामी (कवि और लेखक).
संगीत: 
करुणामय गोस्वामी (संगीतशास्त्री).
अन्य: अंजलि गोस्वामी (पुराजैविकी प्राध्यापिका), अभिषेक गोस्वामी (क्रिकेटर).
ऐतिहासिक और धार्मिक व्यक्तित्व:
आदि शंकराचार्य के शिष्य:
 गिरि, पुरी, भारती, वन, अरण्य, सागर, आश्रम, सरस्वती, तीर्थ और पर्वत - ये दसनामी संप्रदाय के संस्थापक हैं, जिनमें कई गोस्वामी होते हैं.
वृंदावन के छह गोस्वामी: 
भक्ति काल के महत्वपूर्ण संत जैसे सनातन गोस्वामी, रूप गोस्वामी, और कृष्णदास कविराज गोस्वामी (जिन्होंने 'चैतन्य चरितामृत' लिखा).
अन्य प्रसिद्ध गोस्वामी:गोस्वामी तुलसीदास:
 रामचरितमानस के रचयिता, हालांकि यह समाज की पारंपरिक परिभाषा से थोड़ा अलग हो सकते हैं, पर गोस्वामी उपाधि का प्रयोग करते हैं.
स्वामी हरिदास: 
प्रसिद्ध संत और संगीतकार, जिनके वंशज बांके बिहारी मंदिर से जुड़े हैं.
यह सूची संपूर्ण नहीं है; गोस्वामी समाज का भारत में व्यापक विस्तार है और इसमें कई अन्य प्रभावशाली व्यक्ति हैं.
गोस्वामी समाज की परंपराएं मुख्य रूप से शैव (शिवोपासना) और स्मार्त (पंचदेवोपासना) परंपराओं पर आधारित हैं, जिसमें वे गेरुआ वस्त्र, रुद्राक्ष माला पहनते हैं, त्रिपुंड लगाते हैं, और शिव कथा, भागवत कथा वाचन, तथा मंदिरों के रखरखाव का कार्य करते हैं, जो उन्हें सनातन धर्म में गुरु और संरक्षक की भूमिका में स्थापित करता है, तथा वे "ॐ नमो नारायण" या "नमः शिवाय" से अभिवादन करते हैं।
परंपराएं और मान्यताएं:ईष्ट देव: शिव को प्रधान मानते हैं, साथ ही पंचदेव (शिव, विष्णु, देवी, सूर्य और गणेश) की भी पूजा करते हैं।
वेशभूषा:
 भगवा या गेरुआ वस्त्र, गले में 108 रुद्राक्ष की माला, और माथे पर चंदन या भस्म से त्रिपुंड लगाते हैं, जो शिव त्रिशूल का प्रतीक है।
धार्मिक कार्य:
शिव कथा, भागवत कथा वाचन, धार्मिक अनुष्ठान (रुद्राभिषेक, हवन) कराते हैं और मठ-मंदिरों के महंत होते हैं।
अभिवादन:
एक-दूसरे को "ॐ नमो नारायण" या "नमः शिवाय" कहकर संबोधित करते हैं।
शिक्षा और ज्ञान:
ज्ञान और शिक्षा के प्रसार में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है, इन्हें वैदिक ब्राह्मण भी कहा जाता है।
अखाड़ा और संप्रदाय: आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित दसनामी संप्रदाय से जुड़े हैं, जिसमें गिरी, पुरी, भारती, पर्वत, सागर, वन, अरण्य, आश्रम और तीर्थ जैसे दस नाम शामिल हैं।
सामाजिक भूमिका:ये समाज में त्याग, तपस्या और धर्म के रक्षक के रूप में देखे जाते हैं।
मंदिरों के रखरखाव और धार्मिक कार्यों के माध्यम से समाज को जोड़ने का काम करते हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ:आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा और संगठन के लिए इस समाज की स्थापना की थी।
राजपूत राजाओं के गुरु और सलाहकार के रूप में भी इनकी भूमिका रही है।
गोस्वामी (दशनामी) समाज में कई गोत्र और कुलदेवियाँ होती हैं, जो उनके उपनाम (जैसे पुरी, गिरि, भारती) और क्षेत्र पर निर्भर करती हैं, लेकिन पुरी गोस्वामी का मुख्य गोत्र 'अत्रि' और कुलदेवी 'हिंगलाज माता' हैं, जबकि गिरि गोस्वामी का गोत्र 'भृगु' और कुलदेवी 'पूर्णागिरि' हैं; सामान्यतः ये शैव ब्राह्मण होते हैं और शिव के उपासक हैं, लेकिन कुलदेवी और गोत्र में विविधता मिलती है।
मुख्य बिंदु:गोत्र (Gotra): 
गोस्वामी समाज में कई गोत्र प्रचलित हैं, जैसे अत्रि, भृगु, कश्यप आदि।
कुलदेवी (Kuldevi): कुलदेवी भी अलग-अलग होती हैं, जैसे हिंगलाज माता (पुरी गोस्वामी), पूर्णागिरि (गिरि गोस्वामी)।
उपनाम (Suffixes):
 गोस्वामी समाज में 'दशनाम' (दस नाम) होते हैं – गिरि, पुरी, भारती, वन, अरण्य, तीर्थ, आश्रम, पर्वत, सागर, सरस्वती/योगी।
उदाहरण (विशिष्ट शाखाएँ):
पुरी गोस्वामी (दशनामी):कुलदेवी: हिंगलाज माता (पाकिस्तान में प्रसिद्ध मंदिर)
गोत्र: अत्रि
गिरि गोस्वामी (उत्तराखंड):कुलदेवी: पूर्णागिरि (टनकपुर, उत्तराखंड)
गोत्र: भृगु
जिझौतिया ब्राह्मणों के गोस्वामी:कुलदेवी: गुसाईं बाबू (कुलदेवता)
गोत्र: कश्यप
गोस्वामी विवाह के नियम:
मुख्य रूप से धार्मिक और पारिवारिक परंपराओं पर आधारित हैं, जिसमें मंदिर, गौशाला या घर को विवाह के लिए पवित्र स्थान माना जाता है, जूतों-चप्पलों का निषेध होता है, और गोत्र तथा कुल के नियमों का पालन किया जाता है, हालाँकि कई गोस्वामी अब आधुनिक विवाह विधियों और ऐप्स (जैसे Goswami Rishtey Matrimony App) का उपयोग करते हुए अंतर-जातीय विवाह भी कर रहे हैं, लेकिन परंपरागत रूप से एक ही वर्ण (जैसे ब्राह्मण) के भीतर विवाह को प्राथमिकता दी जाती है।
मुख्य नियम और परंपराएँ:पवित्र स्थान:
विवाह के लिए मंदिर, गौशाला, या दुल्हन के घर जैसे स्थानों को श्रेष्ठ माना जाता है, जहाँ यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।
पवित्रता: हवन स्थल पर जूते-चप्पल न ले जाने की परंपरा है, जो पवित्रता बनाए रखने का प्रतीक है।
गोत्र और वर्ण: पारंपरिक रूप से, गोस्वामी समाज में समान वर्ण (जैसे ब्राह्मण) के भीतर विवाह को प्राथमिकता दी जाती है, और कई बार गोत्र (जैसे पिता, दादी, माता, नानी के गोत्र छोड़कर) का ध्यान रखा जाता है।
विधवा पुनर्विवाह और तलाक: कुछ गोस्वामी समुदायों में विधवा पुनर्विवाह और तलाक की अनुमति है, जबकि कुछ सख्त नियमों का पालन करते हैं।
आधुनिक दृष्टिकोण:
आज, कई गोस्वामी परिवार पारंपरिक नियमों के साथ-साथ आधुनिक वैवाहिक ऐप्स का उपयोग करते हैं, जो गोपनीयता और सुविधा प्रदान करते हैं, और विविध प्रोफाइल की अनुमति देते हैं।
निष्कर्ष:
गोस्वामी विवाह नियम समय और समुदाय के अनुसार बदलते रहते हैं, लेकिन पवित्रता, परंपरा और पारिवारिक मूल्यों का पालन केंद्रीय रहता है। धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों के साथ-साथ आधुनिक तरीके भी समाज में घुल-मिल गए हैं।

प्रजापति -कुम्हार समाज की उत्पत्ति और इतिहास ,गोत्र और कुलदेवी



प्रजापति जाति का इतिहास पौराणिक जड़ों से जुड़ा है, जो सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा से संबंधित है, और यह पारंपरिक रूप से कुम्हार (मिट्टी के बर्तन बनाने वाले) समुदाय से जुड़ी है, जिन्हें उनकी रचनात्मकता और 'सृजन' के कार्य के कारण यह उपाधि मिली; इस समाज का इतिहास प्राचीन काल से ही कला, संस्कृति और समाज निर्माण से जुड़ा है, जो अब शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ रहा है, लेकिन उन्हें 'वेठना वर' जैसी कई सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।ऐतिहासिक और पौराणिक जड़ें-
ब्रह्मा से संबंध:
'प्रजापति' शब्द का अर्थ 'प्राणियों का स्वामी' या 'सृष्टिकर्ता' है, और यह उपाधि ब्रह्मा, विभिन्न ऋषियों और देवताओं को दी गई है, जो सृष्टि के कार्यों में लगे थे।
दक्ष प्रजापति:
ब्रह्मा के मानस पुत्र दक्ष प्रजापति इस समुदाय के महत्वपूर्ण पूर्वज माने जाते हैं, जिनका इतिहास पौराणिक कथाओं में वर्णित है।
कुम्हारों का जुड़ाव:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, ब्रह्मा ने अपने पुत्रों के बीच गन्ने का बंटवारा किया, लेकिन एक कुम्हार (कुम्भकार) काम में इतना लीन था कि उसने अपना हिस्सा नहीं खाया, जिससे वह गन्ने का पौधा बन गया; ब्रह्मा ने उसकी कर्तव्यनिष्ठा और रचनात्मकता से प्रसन्न होकर उसे 'प्रजापति' की उपाधि दी।
सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू-
पारंपरिक कार्य:
प्रजापति समाज का मुख्य पारंपरिक कार्य मिट्टी के बर्तन बनाना है, जो संस्कृति और संस्कारों का हिस्सा है; घर के दीये, मटके, और त्योहारों की मूर्तियां इनका ही योगदान हैं।
'प्रजापति' एक उपाधि:
यह केवल एक जाति नहीं, बल्कि सृजन और रचनात्मकता की उपाधि है, जो समाज के लोगों को सम्मान देती है।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व:
यह समाज सनातन धर्म और संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है, और आज भी मंदिरों व घरों में इनके बनाए उत्पादों का उपयोग होता है।
आधुनिक स्थिति और चुनौतियाँ
परिवर्तन:
आधुनिक युग में, प्रजापति समुदाय शिक्षा, व्यापार और राजनीति जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है, और समाज सिर्फ पारंपरिक कार्यों तक सीमित नहीं है।
चुनौतियाँ:
उन्हें 'वेठना वर' (मुफ्त श्रम) जैसी सामाजिक बुराइयों और शिक्षा की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिससे समाज की प्रगति बाधित हुई है।
प्रजापति कुम्हार समुदाय से कई प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं, जिनमें पौराणिक काल के संत गोरा कुम्भार प्रमुख हैं, जो भक्ति और कला के प्रतीक थे; साथ ही, ऐतिहासिक रूप से राजा हरिश्चंद्र और दार्शनिक संजय केशकंबलि जैसे व्यक्तित्व भी इस समुदाय से जुड़े माने जाते हैं, और आधुनिक समय में शिक्षा, राजनीति (जैसे R.D. प्रजापति) और विभिन्न क्षेत्रों में प्रजापति समुदाय के लोग सफल हुए हैं।
पौराणिक और ऐतिहासिक प्रमुख व्यक्ति:संत गोरा कुम्भार: महाराष्ट्र के संत, जो कुम्हार समुदाय के प्रमुख देवता और आदर्श माने जाते हैं।
राजा हरिश्चंद्र:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, वे कुम्हार थे और अपने सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध हैं।
संजय केशकंबलि: बुद्ध और महावीर के समकालीन एक प्राचीन भारतीय दार्शनिक, जो कुम्हार परिवार से थे।
सत्यवान और सती अनसूया:
धार्मिक ग्रंथों में इनका उल्लेख कुम्हार के रूप में मिलता है।
आधुनिक और समकालीन प्रमुख व्यक्ति:
R.D. प्रजापति: छतरपुर के पूर्व विधायक और ओबीसी महासभा के वरिष्ठ सदस्य, जो राजनीति और समाज सेवा में सक्रिय हैं।
डॉ. राकेश प्रजापति (शिल्पकार):
शिल्प और कला के क्षेत्र में योगदान देने वाले व्यक्ति।
कमल कुमार प्रजापति:
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद (कुंदरकी विधानसभा) से चुनाव लड़ने वाले राजनेता।
समुदाय का महत्व:प्रजापति कुम्हार समाज को सनातन संस्कृति का शिल्पकार माना जाता है, क्योंकि वे सदियों से देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाकर संस्कृति को आकार देते आ रहे हैं।
आज यह समुदाय शिक्षा, राजनीति और व्यापार जैसे विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है और अपनी पहचान बना रहा है।
प्रजापति (कुम्हार) जाति की कुलदेवी मुख्य रूप से श्रीयादे माता (श्रीयादेवी माता) हैं, जो राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में पूजी जाती हैं, जबकि गोत्र कई होते हैं, जैसे जलांधरा, गेदर, खटोड, टांक, बोबरिया, गौतम, कश्यप, विश्वकर्मा आदि, जो क्षेत्र और परिवार के अनुसार भिन्न होते हैं।
कुलदेवी:श्रीयादे माता (श्रीयादेवी माता): प्रजापति/कुम्हार समाज में सबसे प्रमुख कुलदेवी हैं, जिनका जन्मोत्सव 'माही बीज' (माघ शुक्ल द्वितीया) को मनाया जाता है।
अन्य कुलदेवियाँ: कुछ क्षेत्रों में सती मैया या रेणुका माता (येलम्मा) की भी पूजा की जाती है, खासकर महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में।
गोत्र (उदाहरण):
प्रजापति समाज में गोत्रों की विविधता है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं: राजस्थान/मारवाड़: जलांधरा, गेदर, खटोड, टांक, बोबरिया, सिवोटा, लिम्बीवाल, छापरवाल, सांगर, कारगवाल, जगरवाल, मोरवाल, गोयल, सूनारिया, ओडिया, परमार, आदि।
अन्य (अखिल भारतीय स्तर पर): गौतम, अत्रि, उपमन्यु, हारित, वसिष्ठ, कश्यप, विश्वकर्मा, भारद्वाज, विश्वामित्र, जमदग्नि, अगस्त्य, अंगीरस।
कुम्हार की परम्पराएं-
कुम्हारों की परंपराएँ सदियों पुरानी हैं, जो मिट्टी के चाक और कला के माध्यम से संस्कृति को जीवंत रखती हैं, जिसमें धार्मिक विश्वास (प्रजापति, भगवान शिव की पूजा), पारिवारिक जीवन (कला का हस्तांतरण), और सामाजिक पहलू (त्योहारों और दैनिक जीवन में बर्तनों का उपयोग) शामिल हैं; हालाँकि, आधुनिकता और बाज़ार की प्रतिस्पर्धा के कारण ये परंपराएँ संकट में हैं, फिर भी कुम्हार अपनी कला को बचाने और उसे नया रूप देने का प्रयास कर रहे हैं।
मुख्य परंपराएँ और मान्यताएँ:सृजन का गौरव (The Pride of Creation): कुम्हार खुद को "सृजनशील योद्धा" मानते हैं, जिन्होंने धरती को आकार दिया और संस्कृति को जीवंत रखा है; वे दक्ष प्रजापति को अपना पूर्वज मानते हैं।
चाक का आविष्कार (Invention of the Wheel): वे मानते हैं कि कुम्हार के चाक का आविष्कार सबसे पहले हुआ और वे इसे आदि यंत्र कला का प्रवर्तक मानते हैं।
धार्मिक जुड़ाव (Religious Connection): वे भगवान शिव और माता की पूजा करते हैं; 'कुण्डी' (पानी रखने का बर्तन) को महादेव से जुड़ा और पवित्र मानते हैं।
सांस्कृतिक योगदान (Cultural Contribution): उनके बनाए दीपक, घड़े और मूर्तियाँ हर त्योहार और घर का हिस्सा हैं, जो उनकी कला को दर्शाते हैं।
पारंपरिक कौशल (Traditional Skills): मिट्टी को गूंधना, चाक पर घुमाना, और आग में पकाना उनकी सदियों पुरानी कला है, जो परिवार में हस्तांतरित होती है।
वर्तमान चुनौतियाँ (Current Challenges):आर्थिक संकट (Economic Crisis): प्लास्टिक उत्पादों और मशीनी युग से प्रतिस्पर्धा के कारण पारंपरिक काम से गुजारा मुश्किल हो गया है।
मिट्टी और पानी की कमी (Scarcity of Clay and Water): प्रदूषण और शहरीकरण के कारण प्राकृतिक स्रोतों से मिट्टी और पानी मिलना कठिन हो गया है; मिट्टी खरीदनी पड़ती है।
युवाओं का पलायन (Migration of Youth): नई पीढ़ी इस पेशे से दूर जा रही है और दूसरे काम ढूंढ रही है।
बाजार की उपेक्षा (Market Neglect): स्थानीय बाजारों में समर्थन की कमी और तैयार माल की उपलब्धता से कुम्हारों का मुनाफा कम हो रहा है।
परंपराओं को बचाने के प्रयास (Efforts to Preserve Traditions):नया रूप देना (Innovating): शिक्षा और नए डिज़ाइन के साथ कला को जोड़ना और उसे वैश्विक बाजार तक पहुंचाना।
सरकारी पहल (Government Initiatives): रेलवे स्टेशनों पर कुल्हड़ (मिट्टी के कप) का उपयोग जैसे कदम कुम्हारों को राहत दे रहे हैं।
समुदाय का गौरव (Community Pride): समुदाय के लोग अपने बच्चों में अपनी कला और इतिहास का गौरव जगाने की कोशिश कर रहे हैं।
मुख्य बात:
प्रजापति समाज एक विशाल और विविध समुदाय है, इसलिए गोत्र और कुलदेवी क्षेत्र और उप-जाति के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन श्रीयादे माता को व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त है।
निष्कर्ष-
प्रजापति समाज का इतिहास रचनात्मकता, सृजन और संस्कृति का है, जो पौराणिक काल से चला आ रहा है; आज यह समाज अपनी कला और शिल्प के साथ-साथ शिक्षा और आधुनिक प्रगति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

27.12.25

बागरी (बागड़ी) जाती की उत्पत्ति और इतिहास :बागरी नेता



बागरी (या बागड़ी) जाति का इतिहास उनकी भौगोलिक स्थिति और विभिन्न समुदायों के अनुसार विविध है। मुख्य रूप से यह शब्द 'बागर' क्षेत्र (राजस्थान, हरियाणा और पंजाब का सीमावर्ती इलाका) के निवासियों के लिए उपयोग किया जाता है।
बागरी समाज के इतिहास के मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं:
1. ऐतिहासिक उत्पत्ति और वंश (Lineage)
चंद्रवंशी संबंध: मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई बागरी समुदाय स्वयं को चंद्रवंशी क्षत्रिय मानते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वे स्वयं को पांडवों (विशेषकर भीम) का वंशज बताते हैं।
राजपूत और जाट संबंध: राजस्थान और पंजाब के बागड़ियों को अक्सर राजपूतों (विशेषकर राठौड़ वंश) या जाटों की एक शाखा माना जाता है। जोधपुर के राजाओं के राजतिलक में बागरी (ठाकुर) परिवार का ऐतिहासिक महत्व रहा है।
विवाह परंपरा:
 कुछ शोध बताते हैं कि बागरी जाति की उत्पत्ति प्रमुख गुर्जर, राजपूत और जाट समुदायों के बीच अंतर्विवाह (intermarriage) से हुई थी।
2. भौगोलिक विस्तार और नाम का अर्थबागर क्षेत्र: 'बागरी' नाम 'बागर' (काँटों की बाड़ के समान मैदान) से लिया गया है।
मुख्य क्षेत्र: 
ये मुख्य रूप से राजस्थान (हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर), हरियाणा (सिरसा, हिसार), पंजाब और मध्य प्रदेश में बसे हुए हैं।
पश्चिम बंगाल (बागदी):
 पश्चिम बंगाल में इन्हें 'बागदी' कहा जाता है, जहाँ वे स्वयं को 'बर्ग क्षत्रिय' मानते हैं और परंपरागत रूप से खेती व मछली पकड़ने के व्यवसाय से जुड़े रहे हैं।
3. सामाजिक और सांस्कृतिक स्थितिश्रेणी: मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बागरी जाति को अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में रखा गया है।
परंपराएँ: 
परंपरागत रूप से ये कृषि, पशुपालन और कुछ क्षेत्रों में शिकार (इतिहास में) से जुड़े रहे हैं।
धार्मिक विश्वास: ये मुख्य रूप से हिंदू धर्म का पालन करते हैं और भगवान शिव, पांडव, तथा विभिन्न माता स्वरूपों (जैसे काली माँ) की पूजा करते हैं।
बागरी जाति के पारंपरिक धंधों में खेती, पशुपालन, मछली पकड़ना और सैन्य सेवा शामिल थे, लेकिन आधुनिक समय में यह समुदाय शिक्षा, सरकारी नौकरी, व्यापार और छोटे व्यवसायों की ओर बढ़ रहा है; ऐतिहासिक रूप से कुछ बागड़ी लड़ाके और मछुआरे भी रहे हैं, जबकि वर्तमान में कई छोटे व्यवसायी या मजदूर भी हैं, साथ ही शिक्षा और सरकारी नौकरियों में भी इनकी उपस्थिति बढ़ रही है।
पारंपरिक पेशे:कृषि और पशुपालन: परंपरागत रूप से खेती-बाड़ी और पशुपालन मुख्य कार्य रहे हैं।
मछली पकड़ना: कुछ बागड़ी समुदाय मछुआरे के रूप में भी जाने जाते थे।
सैन्य सेवा: बागड़ी जाटों ने भारतीय सेना में सैनिक के रूप में सेवा दी है, और बागड़ी राजपूत भी सेना में रहे हैं।
लड़ाके (योद्धा): ऐतिहासिक रूप से योद्धा जनजाति के रूप में भी इनकी पहचान रही है।
आधुनिक पेशे:शिक्षा और सरकारी नौकरी: आजकल कई बागड़ी लोग शिक्षा प्राप्त कर सरकारी नौकरियों में जा रहे हैं।
  1. सगाई (वर चयन): लड़की के परिवार वाले लड़के के घर जाकर उसका चयन करते हैं, तिलक करते हैं और लड़के के परिवार को नकद व वस्त्र भेंट करते हैं.
  2. लगन भेजना: पंडित से शुभ लग्न (तारीख) लिखवाकर वर पक्ष को भेजा जाता है.
  3. तेल-बान (घुंघरा): शादी के दिन दूल्हा-दुल्हन को गुड़ की मिठाई खिलाई जाती है, मामा शगुन देते हैं और तेल-दही छिड़कते हैं.
  4. हल्दी/पीठी: दूल्हा-दुल्हन के शरीर पर हल्दी लगाई जाती है.
  5. मंडप निर्माण: बांस और आम के पत्तों से मंडप बनता है, जिसमें बहनोई (दामाद) खंभे लगाते हैं.
  6. द्वार पूजन: विवाह की रस्मों के दौरान द्वार पूजन भी होता है.
  7. पारंपरिक गीत: विवाह के दौरान बागड़ी भाषा में कई पारंपरिक गीत गाए जाते हैं, जैसे "झोल घालने" औरपीठी के गीत. 
  8. व्यापार और व्यवसाय:
 छोटे व्यवसायी और होटल मालिक जैसे काम भी कर रहे हैं।
मजदूरी: कुछ लोग दिहाड़ी मजदूर के रूप में भी काम करते हैं।
जाति और पहचान:बागड़ी मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में पाई जाती है और अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में आती है (राजपूत उपजातियों को छोड़कर)।
यह समुदाय अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा है और नए अवसरों की तलाश में है, जैसे कि राजस्थान में पर्यटक होटलों का प्रबंधन। बागरी समुदाय में कुछ प्रमुख लोग हुए हैं, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में योगदान दिया है। इनमें से कुछ उल्लेखनीय नाम निम्नलिखित हैं: मणि राम बागरी (Mani Ram Bagri): एक प्रमुख भारतीय राजनीतिज्ञ थे, जो 
राज बागरी, बैरन बागरी (Raj Bagri, Baron Bagri): भारतीय मूल के एक ब्रिटिश व्यवसायी और राजनीतिज्ञ थे। वह लंदन मेटल एक्सचेंज के अध्यक्ष भी रहे और उन्हें ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्ड्स का सदस्य बनाया गया था।
प्रतिमा बागरी (Pratima Bagri): मध्य प्रदेश की एक राजनीतिज्ञ और वर्तमान में राज्य मंत्री हैं। उनके जाति प्रमाण पत्र को लेकर विवाद भी चर्चा में रहा है।
अंशु बागरी (Ansh Bagri): एक भारतीय अभिनेता हैं जो कुछ टीवी शो और फिल्मों में काम कर चुके हैं।
बागरी समुदाय की विविध पहचान है, जिसमें राजपूत बागरी, जाट बागरी और अनुसूचित जाति के बागरी समुदाय शामिल हैं। ऐतिहासिक रूप से, बागरी राजपूत सैन्य उपलब्धियों के लिए जाने जाते थे।
संक्षेप में, बागरी एक प्राचीन योद्धा और कृषि प्रधान समाज है जिसका इतिहास वीरता और हिंदू पौराणिक कथाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

22.12.25

सैनी जाति की उत्पत्ति और इतिहास की जानकारी

 


सैनी जाति का इतिहास : सैनी जाति प्राचीन सनातनी जाती है , इस जाति में शूरवीर योद्धाओं ने जन्म लिया और इस जाति का संबंध भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण है 
सैनी उत्तर भारत में पाई जाने वाली एक क्षत्रिय जाति है. सैनी जाति का इतिहास गौरवशाली, महान और प्राचीन है. स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्रता मिलने के बाद देश के निर्माण में सैनी समाज का योगदान सराहनीय रहा है. यह परंपरागत रूप से जमींदार और किसान थे. एक वैधानिक कृषि जनजाति और एक निर्दिष्ट मार्शल रेस के रूप में सैनी मुख्य रूप से कृषि और सैन्य सेवाओं में लगे हुए थे. आजादी के बाद उन्होंने विविध प्रकार के नौकरी, पेशा और रोजगार में शामिल होने लगे . अंग्रेजों ने विभिन्न जिलों में कुछ सैनी जमींदारों को जैलदार या राजस्व संग्राहक (Revenue Collector) के रूप में नियुक्त किया था. आइए जानते हैं सैनी जाति का इतिहास सैनी शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?
सैनी जाति: 
कृषि, परंपरा व गौरवशाली इतिहास का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि यह समुदाय केवल भूमि और कृषि से ही नहीं, बल्कि अपने गौरवशाली अतीत, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक विरासत से भी पहचाना जाता है। सैनी समुदाय का इतिहास भारतीय संस्कृति और सभ्यता के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। यह जाति पारंपरिक रूप से भूमि-स्वामी, कृषक और बागवानी में दक्ष रही है। इनकी जड़ें प्राचीन काल में यदुवंशी क्षत्रियों से जुड़ी मानी जाती हैं और समय के साथ इन्होंने समाज को कृषि, सेना, स्वतंत्रता आंदोलन और शिक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देकर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
पौराणिक और ऐतिहासिक उत्पत्ति-
सैनी जाति की उत्पत्ति का संबंध प्राचीन यदुवंशी क्षत्रियों और महाराज शूरसेन से माना जाता है। सैनी समुदाय स्वयं को “शूरसैनी” वंश का उत्तराधिकारी मानता है। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार, ब्रिटिश शासनकाल में सैनी जाति को कृषक और मार्शल रेस की श्रेणी में मान्यता प्राप्त थी। ब्रिटिश भारत के Punjab District Gazetteers और Imperial Gazetteer of India में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि सैनी समुदाय पारंपरिक रूप से कृषि और बागवानी में दक्ष था और युद्ध क्षेत्र में भी सक्षम माना जाता था। इन दस्तावेज़ों में सैनी जाति को न केवल भूमि-स्वामी और कृषक के रूप में प्रमाणित किया गया है, बल्कि उनकी सामाजिक संरचना और सामुदायिक भूमिका को भी दर्ज किया गया है।
इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि सैनी जाति का गौरवशाली इतिहास ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और सामुदायिक परंपराओं दोनों पर आधारित है। पौराणिक रूप से यदुवंशी और शूरसेन वंश से जुड़ा होना समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, जबकि ब्रिटिश और आधुनिक दस्तावेज़ इसकी ऐतिहासिक भूमिका और सामाजिक योगदान को प्रमाणित करते हैं।
कृषि और बागवानी परंपरा-
सैनी समुदाय की सबसे बड़ी पहचान उनकी कृषि और बागवानी में विशेषज्ञता रही है। उत्तर भारत की उपजाऊ भूमि पर इस जाति ने धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, मूंगफली और सब्जियों जैसी अनेक फसलें उगाईं। इसके अलावा फलों की खेती, विशेषकर बागवानी में इनकी खासी दक्षता रही है। यही कारण है कि कई क्षेत्रों में सैनी बागवानी और फलोत्पादन के अग्रणी माने जाते हैं।
ग्रामीण भारत में जब हरित क्रांति का दौर आया, तब सैनी किसानों ने नई कृषि तकनीकों को अपनाकर उत्पादन में वृद्धि की। आधुनिक खेती, सिंचाई और उन्नत बीजों का प्रयोग करने में इस समाज ने हमेशा अग्रणी भूमिका निभाई। इस प्रकार, सैनी समुदाय ने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भौगोलिक वितरणआज सैनी जाति मुख्य रूप से उत्तर भारत के कई राज्यों में पाई जाती है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और राजस्थान में इनकी बड़ी आबादी है। पंजाब और हरियाणा में यह जाति विशेष रूप से किसानों और सैनिकों के रूप में प्रसिद्ध है, जबकि उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी यह समुदाय कृषि और राजनीति में सक्रिय योगदान दे रहा है।
समय के साथ यह समुदाय शहरी क्षेत्रों की ओर भी बढ़ा है। अब कई सैनी परिवार शिक्षा, व्यवसाय, उद्योग और प्रशासनिक सेवाओं में भी उल्लेखनीय स्थान बना चुके हैं।
सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान-
सैनी जाति केवल कृषि तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के निर्माण में भी इनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। गाँव स्तर पर पंचायत व्यवस्था, सामुदायिक मेलों और धार्मिक उत्सवों में इस समुदाय का संगठन हमेशा मजबूत रहा है।
सामाजिक योगदान के मुख्य बिंदु:गाँव और समाज में एकजुटता बनाए रखना
शिक्षा और सामाजिक सुधार आंदोलनों में भागीदारी
स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान
सेना और सुरक्षा बलों में सेवा
राजनीति और प्रशासन में सक्रिय उपस्थिति परंपराएँ और धार्मिक विश्वाससैनी जाति की परंपराएँ भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ी हुई हैं। यह समुदाय देवी-देवताओं की पूजा में गहरा विश्वास रखता है। नाग माता, शीतला माता, चामुंडा माता, जगदम्बा माता आदि की पूजा कई सैनी परिवारों में प्रचलित है।
गोत्र व्यवस्था भी सैनी समाज में महत्वपूर्ण है। विवाह और सामाजिक रिश्तों में गोत्र का विशेष महत्व होता है। इस परंपरा से न केवल सामाजिक अनुशासन बना रहता है बल्कि समुदाय की सांस्कृतिक एकता भी मजबूत होती है।

सैनी किस कैटेगरी में आते हैं?
सैनी जाति को पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है. इन राज्यों में इन्हें ओबीसी कोटे के तहत सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिलता है.
आधुनिक पहचान और शिक्षा-
आज के दौर में सैनी समुदाय कृषि के साथ-साथ शिक्षा और व्यवसाय में भी आगे बढ़ रहा है। स्वतंत्र भारत में इस जाति को कई राज्यों में “अन्य पिछड़ा वर्ग” (OBC) की श्रेणी में शामिल किया गया, जिससे इन्हें शिक्षा और रोजगार में आरक्षण का लाभ मिला। इसका परिणाम यह हुआ कि सैनी समाज के कई युवा उच्च शिक्षा प्राप्त कर प्रशासनिक सेवाओं, राजनीति, सेना, पुलिस, शिक्षा, व्यापार और आईटी जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़े।
सैनी जाति और राजनीति
कई दशकों में सैनी समाज ने राजनीति में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। पंचायत स्तर से लेकर राज्य और केंद्र स्तर तक इस जाति के लोग सक्रिय रहे हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कई सैनी नेता राजनीति में मजबूत भूमिका निभा चुके हैं। इससे न केवल इस समाज की सामाजिक पहचान मजबूत हुई, बल्कि इनके मुद्दों को सरकार तक पहुँचाने का रास्ता भी खुला।
सैनी किस धर्म को मानते हैं?-
सैनी हिंदू और सिख दोनों धर्मों को मानते हैं, लेकिन दोनों एक दूसरे की धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं का सम्मान करते हैं. यहां यह बता देना जरूरी है कि अधिकांश सैनी हिंदू हैं जिन्हें अपने वैदिक सनातनी अतीत और परंपराओं पर गर्व है.
15वीं सदी में सिख धर्म के उद्भव के साथ कई सैनियों ने सिख धर्म अपना लिया. आज पंजाब में सिख सैनियों की बड़ी आबादी है. हिंदू और सिख सैनियों में सीमांकन की रेखा बहुत धुंधली है. यह आपस में सहजता से अंतर विवाह करते हैं.

सैनी  के उप कुल-
सैनी समुदाय में कई उप कुल हैं। आम तौर पर सबसे आम हैं: हल्दोनिया(भागीरथी), कारोड़िया, सिंगोदिया, अन्हेआर्यन, कोड़ेवाल, कछवाहा,बिम्ब (बिम्भ), घाटावाल, रोष, बदवाल,बलोरिया, बंवैत (बनैत), बागड़ी, बंगा, बसुता (बसोत्रा), बाउंसर, बाण्डे,भेला, बोला, भोंडी (बोंडी), मुंध.चेर,चेपरू(चौपर), चंदेल, चिलना, दौले (दोल्ल), दौरका, धक, धम्रैत, धनोटा (धनोत्रा), धौल, धेरी, धूरे, दुल्कू, दोकल, फराड, महेरू, मुंढ (मूंदड़ा) मंगर, मंगोल ,मांगियान ,मसुटा (मसोत्रा), मेहिंद्वान, गेहलेन (गहलोत/गिल), गहिर (गिहिर), गहुनिया (गहून/गहन), गिर्ण, गिद्दा, जदोरे, जादम, जप्रा, जगैत (जग्गी), जंगलिया, कल्याणी, कालियान,कलोती (कलोतिया), कबेरवल (कबाड़वाल), खर्गल, खेरू, खुठे, कुहडा (कुहर), लोंगिया (लोंगिये), सतरावला,सागर, सहनान (शनन), सलारिया (सलेहरी), सूजी, ननुआ (ननुअन), नरु, पाबला, पवन, पीपल, पम्मा (पम्मा/पामा), पंग्लिया, पंतालिया, पर्तोला, तम्बर (तुम्बर/तंवर/तोमर), गागिंया,थिंड, टौंक (टोंक/टांक/टौंक/टक), तोगर ,(तोगड़/टग्गर), उग्रे,अम्बवाल(अम्बियांन), वैद, तुसड़िये, तोंदवाल, टोंडमनिहारिये, रोहलियान, गदरियांन, भोजियान विरखेडिया, भगीरथ ,राज़ोरिया ,अनिजरिया ,खेड़ीवाल बबेरवाल हल्दोनिया आदि.।

15.11.25

ऋषि दधीचि और राजा क्षुव की पौराणिक कथा, जब विष्णु से किया दधीचि ने युद्ध



           ऋषि  दधीचि और राजा क्षुव की पौराणिक कथा, जब विष्णु से किया दधीचि ने युद्ध
प्राचीन काल में, ऋषि दधीचि और राजा क्षुव के बीच गहरी मित्रता थी। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे और उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान होता रहता था। दधीचि एक विद्वान ब्राह्मण थे, जिनकी तपस्या और ज्ञान की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। दूसरी ओर, क्षुव एक शक्तिशाली क्षत्रिय राजा थे, जो अपने युद्ध कौशल और धर्मनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी मित्रता इतनी गहरी थी कि लोग उन्हें एक-दूसरे का पूरक मानते थे।
विवाद का आरंभ :
एक दिन, दोनों मित्रों के बीच एक गहन चर्चा शुरू हुई कि ब्राह्मण और क्षत्रिय में से कौन श्रेष्ठ है। दधीचि ने ब्राह्मणों की विद्या, तप और आध्यात्मिक शक्ति की प्रशंसा की, जबकि क्षुव ने क्षत्रियों के साहस, शौर्य और धर्मरक्षा के गुणों को सर्वोपरि बताया। दोनों अपने-अपने वर्ण के प्रति इतने अनुरक्त थे कि यह चर्चा धीरे-धीरे तीखी बहस में बदल गई। क्रोध में आकर, क्षुव ने इंद्र से उनका वज्र मांग लिया। यह वज्र विश्वकर्मा द्वारा सूर्य की अतिरिक्त ऊर्जा से निर्मित था और ब्रह्मांड की किसी भी वस्तु को नष्ट करने की शक्ति रखता था।
दधीचि की मृत्यु और पुर्नजन्म :
क्रोध में अंधे होकर, क्षुव ने दधीचि पर वज्र से प्रहार कर दिया। वज्र की प्रचंड शक्ति ने दधीचि के शरीर को भस्म कर दिया, और उनकी मृत्यु हो गई। क्षुव इस विजय से प्रसन्न होकर लौट गया, यह सोचकर कि क्षत्रिय ने ब्राह्मण को परास्त कर दिया। लेकिन असुरों के गुरु शुक्राचार्य, जिन्होंने भगवान शंकर की हजारों वर्षों की तपस्या कर मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की थी, को दधीचि की मृत्यु का समाचार मिला। वे तुरंत दधीचि के आश्रम पहुंचे और मृतसंजीवनी विद्या के द्वारा उनके शरीर में पुनः प्राण फूंक दिए।
जब दधीचि को होश आया, वे आश्चर्यचकित हुए और शुक्राचार्य से पूछा, यह चमत्कार कैसे संभव हुआ? शुक्राचार्य ने उत्तर दिया, महादेव की कृपा से कुछ भी असंभव नहीं। जैसे उन्होंने मार्कण्डेय को यमराज से बचाया, वैसे ही मुझे यह विद्या प्रदान की।
दधीचि की तपस्या और वरदान :
हालांकि दधीचि का शरीर पुनर्जनन हो गया, उनकी आत्मा अभी भी क्षुव के अपमान से व्यथित थी। शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में, उन्होंने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या शुरू की। वर्षों की कठिन तपस्या के बाद, भगवान शंकर प्रसन्न हुए और दधीचि को दर्शन दिए। दधीचि ने तीन वरदान मांगे।
पहला – मेरी हड्डियों को इंद्र के वज्र से भी अधिक शक्तिशाली बनाएं। 
दूसरा – कोई भी मेरी हत्या न कर सके।
 तीसरा -मैं कभी अपमानित न होऊं, जैसा क्षुव ने मुझे अपमानित किया। भगवान शंकर ने तीनों वरदान स्वीकार किए।
दधीचि का प्रतिशोध :
वरदानों से शक्तिशाली बने दधीचि, क्षुव के महल में पहुंचे और क्रोध में राजा को लात मारी। दधीचि को जीवित देखकर क्षुव स्तब्ध रह गया। उसने पुनः वज्र का प्रयोग किया, लेकिन इस बार वज्र का दधीचि पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। दधीचि ने हंसते हुए कहा, महादेव ने मुझे अजेय बना दिया है। अब कोई मुझे परास्त नहीं कर सकता।
भगवान विष्णु का हस्तक्षेप :
क्षुव ने भगवान विष्णु का आह्वान किया, यह सोचकर कि केवल वे ही दधीचि को रोक सकते हैं। लेकिन जब विष्णु को पता चला कि दधीचि को स्वयं भगवान शंकर ने वरदान दिया है, उन्होंने क्षुव को सलाह दी, ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों ही विश्व की व्यवस्था के लिए आवश्यक हैं। दोनों में कोई छोटा-बड़ा नहीं। युद्ध विराम करो।
लेकिन दधीचि ने अहंकारवश विष्णु की बात को ठुकरा दिया और कहा, महादेव के वरदान ने मुझे अजेय बना दिया है। मैं किसी से नहीं डरता।
विष्णु समझ गए कि दधीचि का अहंकार सृष्टि के लिए खतरा बन सकता है। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया, लेकिन वह भी दधीचि की त्वचा को खरोंच तक न सका। विष्णु ने एक के बाद एक कई दिव्यास्त्रों का उपयोग किया, परंतु सभी निष्फल रहे
दधीचि की शक्ति और विश्वरूप :
क्रोधित दधीचि ने एक मुट्ठी घास उठाई और उसे देवताओं की ओर फेंका। प्रत्येक घास का तिनका त्रिशूल में परिवर्तित हो गया, जो देवताओं को नष्ट करने को तत्पर था। विष्णु ने अपने कई रूप बनाए, लेकिन दधीचि ने उन्हें भी परास्त कर दिया। अंत में, विष्णु ने अपना विश्वरूप प्रकट किया, जिसमें समस्त ब्रह्मांड समाहित था। अनंत प्राणी, आयाम और संभावनाएं उस दृश्य में निहित थीं। सारा ब्रह्मांड उस दृश्य के सामने नतमस्तक हो गया, लेकिन दधीचि पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने कहा, प्रभु, यह आपकी माया है। यह मुझ पर हावी नहीं हो सकती।
ब्रह्मा का हस्तक्षेप और समाधान :
अंत में, ब्रह्मा प्रकट हुए और क्षुव को दधीचि से क्षमा मांगने को कहा। दधीचि ने क्षमा तो दे दी, लेकिन उन्होंने सभी देवताओं को शाप दिया, एक समय आएगा जब आपको भगवान शंकर के क्रोध का सामना करना पड़ेगा। यह कहकर दधीचि चले गए।
दधीचि की यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सृष्टि की व्यवस्था को बिगाड़ सकता है। ब्राह्मण और क्षत्रिय, दोनों ही समाज के लिए आवश्यक हैं, और उनकी एकता ही विश्व की उन्नति का आधार है। दधीचि का शाप देवताओं के कानों में गूंजता रहा, और वे सोच में पड़ गए कि आखिर ऐसा क्या होगा जो भगवान शंकर के क्रोध को भड़काएगा। यह रहस्य समय के गर्भ में छिपा रहा।
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दुर्योधन और पांच सोने के तीर:महाभारत की कहानी

 पौराणिक कथाओं  पर आधारित  कथाओं  के विडिओ  की शृंखला मे आज  की प्रस्तुति है -

दुर्योधन और पांच सोने के तीर




    महाभारत की कहानी दुर्योधन और पांच सोने के तीर एक शिक्षाप्रद कहानी है। महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म का युद्ध था। कृष्ण पांडवों के पक्ष से थे। परंतु, उन्होंने युद्ध में शस्त्र नही उठाने का निर्णय लिया था। वहीं श्रीकृष्ण की नारायणी सेना कौरवों की ओर से लड़ रही थी। युद्ध में कभी कौरवों का तो कभी पांडवों का पलड़ा भारी लगता। महाभारत के युद्ध में कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर श्रीकृष्ण ने प्रत्यक्ष रूप से शस्त्र नहीं उठाएं लेकिन अर्जुन का सारथी बनकर श्रीकृष्ण युद्ध भूमि में अर्जुन का मार्गदर्शन करते रहे। द्रौपदी के भाई, दृष्टद्युम्न पांडवों के सेनापति थे। वहीं, कौरवों के तरफ से गंगा पुत्र भीष्म सेनापति थे। उनके नेतृत्व में युद्ध लड़ा जा रहा था। कौरव दल पूर्ण बल से युद्ध करने के बाद भी पांच पांडव में से किसी का भी बाल भी बांका न कर पा रहा था।

दुर्योधन को हुआ भीष्म पितामह पर संदेह

कौरवों के प्रधान सेनापति भीष्म 10 दिनों तक पांडव सेना पर भारी पड़े थे। प्रतिदिन भीष्म हजारो सैनिकों को मार रहे थे। परंतु, दुर्योधन भीष्म पितामह पर कहीं न कहीं संदेह कर रहा था। उसे लग रहा था कि पितामह भीष्म जान बूझकर पांडवों का साथ देते हैं और उन्हें मारना नहीं चाहते। यही सोचकर एक रात दुर्योधन भीष्म से सीधे बात करने के लिए उनके पास शिविर में पंहुचा। जब दुर्योधन भीष्म के शिविर में पंहुचा तो देखा भीष्म चिंतनशील होकर शिविर में बैठे थे। यूं आधी रात को दुर्योधन को अपने शिविर में प्रवेश करते देख भीष्म हैरान हुए। उन्होंने दुर्योधन से शिविर में आने का कारण पूछा।

 पितामह भीष्म जान बूझकर पांडवों का साथ देते हैं और उन्हें मारना नहीं चाहते। यही सोचकर एक रात दुर्योधन भीष्म से सीधे बात करने के लिए उनके पास शिविर में पंहुचा। जब दुर्योधन भीष्म के शिविर में पंहुचा तो देखा भीष्म चिंतनशील होकर शिविर में बैठे थे। यूं आधी रात को दुर्योधन को अपने शिविर में प्रवेश करते देख भीष्म हैरान हुए। उन्होंने दुर्योधन से शिविर में आने का कारण पूछा।

भीष्म की कर्तव्यनिष्ठा पर उठे प्रश्न

दुर्योधन ने गुस्से में कहा “पितामह! आपके मोह पूर्ण अन्याय के कारण मैं आधी रात को आपके शिविर में आने के लिए विवश हुआ हूं। आप अगर पूरी कर्तव्यनिष्ठा और मोहरहित होकर पांडवों के साथ युद्ध करते, तो शायद मुझे यहां आने की आवश्यकता नहीं पड़ती। युद्ध शुरू हुए 10 दिन बीत चुके हैं लेकिन आप अभी तक पांडवों को पराजित नहीं कर पाए हैं। आप संसार को दिखाने के लिए युद्ध का अभिनय कर रहे हैं। आपको आज भी पांडवों से अति प्रेम करते है और आप मेरे सेनापति होते हुए भी पांडवों को युद्ध जीतते देखना चाहते हैं।” अपने बारे में दुर्योधन के मुख से ऐसी बात सुनकर पितामह भीष्म बहुत दुखी हुए।

पांडवों को मारने के लिए भीष्म  के पाँच सोने के तीर  

दुर्योधन के मुख से कटु वचन सुनकर भीष्म ने दुर्योधन से पूछा, “तुम क्या चाहते हो पुत्र दुर्योधन ?” दुर्योधन ने कहा, ” पांडवों की मृत्यु और इसके लिए आपको अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करना होगा।” पितामह भीष्म ने अपनी शस्त्र विद्या का प्रयोग करते हुए सोने के पांच अचूक तीर निकाले और इसे अभिमंत्रित करके बोले- “दुर्योधन! तुम व्यर्थ में संदेह करते हो। इन बाणों से कोई नहीं बच सकता। कल का दिन युद्ध का अंतिम दिन होगा। एक ही दिन में पांचों पांडवों को इन बाणों से समाप्त कर दूंगा। फिर पांडवों के मरते हुए युद्ध का परिणाम तुम्हारे पक्ष में होगा।” पितामह भीष्म की बात सुनकर दुर्योधन प्रसन्न हुआ लेकिन अगले ही क्षण उसके मन में पितामह भीष्म के प्रति संदेह उत्पन्न हो गया।

दुर्योधन की चालाकी 

कपटी दुर्योधन  भीष्म की बातों को सुनकर प्रसन्न तो हुआ। परंतु, अब दुर्योधन को भीष्म की बातों में भी छल-कपट दिखने लगे। दुर्योधन ने भीष्म से कहा- “पितामह! आपकी योजना बहुत अच्छी है। किन्तु, मुझे फिर भी संदेह हो रहा है कि आप इतनी जल्दी और आसानी से पांडवों को मारेंगे। हो सकता है आप मोहवश या प्रेमवश उन्हें ना मार पाएं। अतः आप इन बाणों को मुझे दे दें। मैं युद्ध भूमि में आपको ये पाँचों बाण दूंगा और आपको आपके कर्तव्य की याद दिलाऊंगा। तब आप पांडवों का वध मेरे सामने कीजियेगा।” दुर्योधन की बात सुनकर पितामह भीष्म ने पांचों अभिमंत्रित बाण दुर्योधन को दे दिए। दुर्योधन अपनी संभावित जीत पर बहुत खुश था। वह बाण लेकर अपने शिविर में चला गया।

पांडवों को जब पता चला

भीष्म के शिविर के पास पहरा दे रहे पांडवों के एक गुप्तचर ने सारी बातें सुन ली। उसने महाराज युधिष्ठिर को आकर सोने के बाण के बारे में सूचना दी। तब भगवान श्री कृष्ण भी वहीं थे। युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से कहा, “हे गोविंद! पितामह के इन तीरों के प्रतिकार हम कैसे करें?” इस बात को सुनकर श्रीकृष्ण युधिष्ठिर संग तुंरत ही अर्जुन के शिविर में पहुंचे और अर्जुन को पूरी घटना बताई। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि “पार्थ! तुम्हे दुर्योधन से उन पांचों बाणों को माँगना होगा।” श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन ने अचंभित हो कर पूछा, “दुर्योधन भला वो तीर मुझे क्यों देगा?” तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्मरण दिलाया कि, ‘एक बार अर्जुन ने दुर्योधन को यक्ष और गंधर्वो के हमले से बचाया था।’

अर्जुन पहुंचा दुर्योधन के पास

‘तब दुर्योधन ने प्रसन्न होकर अर्जुन से कहा था कि “वो कोई भी कीमती चीज दुर्योधन से मांग सकता है।” उस दिन अर्जुन ने बात को टालते हुए दुर्योधन से कुछ नहीं मांगा था। अब वो समय आ गया है।’ अर्जुन को श्रीकृष्ण की बात सुनकर सब स्मरण आ गया। युधिष्ठिर की आज्ञा से अर्जुन दुर्योधन के शिविर में पहुंचे। दुर्योधन अचानक अर्जुन को अपने शिविर में देखकर शशंकित हुआ। अपनी शंका को छुपाते हुए जोर जोर से हंसते हुए दुर्योधन ने अर्जुन से कहा, “आओ अर्जुन आओ! क्षमा मांगने आये हो क्या? तुम्हारे प्रिय पितामह ने जो तुम्हारी सेना के साथ किया उससे भयभीत हो क्या? इस रात्रि में आने का क्या कारण है? बताओ क्या सहायता मांगने आये हो?”

दुर्योधन का वचन 

अर्जुन ने कहा, “भ्राता दुर्योधन! प्राणिपाद! सही समझा अपने मैं आपसे याचना करने ही आया हूँ। परंतु, मेरे मांगने से पहले ही आप उसे देने के लिए विवश है।” दुर्योधन हंसता हुआ बोला, “मैं विवश हूँ अर्जुन? याचक विवश होता है, दाता नही। परंतु, कोई बात नही अबोध अर्जुन! तुम मांगो!” अर्जुन ने दुर्योधन से वह पांच बाण मांगे लेकिन दुर्योधन ने अर्जुन को मना कर दिया। तब अर्जुन ने दुर्योधन को क्षत्रिय धर्म स्मरण कराते हुए उस घटना को बताया। कैसे अपनी प्राण रक्षा के बदले दुर्योधन ने अर्जुन को कोई भी बहुमूल्य वस्तु देने का वचन दिया था? दुर्योधन ने अर्जुन से कहा, “तुम कुछ और मांग लो। मैं यह नही दे सकता।”

दुर्योधन का क्षत्रिय धर्म 

तब अर्जुन ने कहा, “यदि आप अपने वचन को पूरा नही करना चाहते, तो कोई बात नही भ्राता। अब आपके पास कुछ बहुमूल्य है भी तो नही जो मांगा जाए। सामर्थ्य के अभाव में आपको पितामह के बाणों की आवश्यकता भी है। ठीक है! मैं चलता हूँ।” अर्जुन के कटाक्षों से दुविधा में फंसे दुर्योधन ने कहा, “रुको अर्जुन! किसके पास सामर्थ्य नही है? हम सौ हैं। तुम पांच हो।” फिर, ना चाहते हुए भी दुर्योधन ने पांचों बाण  अर्जुन को दे दिए। अर्जुन उन दिव्य बाणों को प्राप्त कर अपने शिविर में आ गए। इस तरह भीष्म से बाण लेने की गलती दुर्योधन पर भारी बहुत पड़ी और पांडवों की मौत टल गई। महाभारत के युद्ध के अंत में पांडवों की जीत हुई|ऐसी ही शिक्षाप्रद पौराणिक कहानियाँ के विडिओ देखने के लिए हमारा चैनल सबस्क्राइब कीजिए .