जीवन के अंतिम सत्य से साक्षात्कार कराता एक तीर्थ
यह पावन स्थल प्रसिद्ध छोटे-बड़े महादेव पर्यटन मार्ग पर स्थित है, जहाँ से गुजरता हर पथिक एक क्षण ठहर कर जीवन के गहन अर्थ पर चिंतन करता है।
विकास की ओर बढ़ते चरण
आज भानपुरा मुक्तिधाम केवल एक श्मशान घाट नहीं, बल्कि जन-आस्था और सामुदायिक चेतना का केंद्र बन रहा है। मुक्तिधाम समिति की सतत देखरेख में यहाँ विकास के कई कार्य मूर्त रूप ले रहे हैं। श्रद्धांजलि हेतु एक सुदृढ़ बरामदा निर्मित किया गया है, लकड़ी के लिये एक सुरक्षित गोदाम कक्ष बनाया गया है, फर्श पर स्वच्छ टाइल्स लगाई गई हैं और परिसर में वृक्षारोपण भी किया गया है। यद्यपि बंदरों के उत्पात से इन पौधों को पनपने में बाधा आती है, फिर भी समिति का संकल्प अडिग है - इस अंतिम विश्राम स्थल को शांत, स्वच्छ और गरिमामय बनाना।
इसी सौंदर्य और सुविधा की कड़ी में एक अत्यंत प्रेरणादायी अध्याय जुड़ा है।
11 बेंचों का मौन समर्पण - दामोदर पथरी अस्पताल, शामगढ़ द्वारा
समाजसेवी, सेवानिवृत्त शिक्षक डॉ. दयाराम आलोक जी ने एक अलौकिक अनुष्ठान का संकल्प लिया है - मध्यप्रदेश और राजस्थान के चयनित मुक्तिधामों में जन-विश्राम हेतु सीमेंट की बेंचें भेंट करना।
इसी अनुष्ठान के अंतर्गत भानपुरा मुक्तिधाम के श्रद्धांजलि सभागृह में दामोदर पथरी अस्पताल, शामगढ़ के माध्यम से 11 सीमेंट बेंचें ससम्मान समर्पित की गई हैं।
यह केवल बेंचें नहीं हैं, यह उस संवेदना की प्रतीक हैं जो शोक-संतप्त परिवार को कुछ पल बैठने, संबल पाने का स्थान देती हैं। इस पुनीत कार्य में भानपुरा के हितचिंतक श्री मदनलाल जी परमार, श्री रमेश जी राठौर आशुतोष, शामगढ़ के सुझाव और मुक्तिधाम समिति के अध्यक्ष श्री मनोज जी मंगलोरिया के सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
दान की इस भावना को चिरस्थायी बनाने हेतु मुक्तिधाम समिति ने बरामदे के पिलर पर दान-पट्ट स्थापित किया है, ताकि यह देखकर और भी हृदयों में दान की प्रेरणा जागृत हो। इस दान को संपन्न कराने में डॉ. अनिल कुमार दामोदर s/o डॉ. दयाराम जी आलोक, दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ का सेतु-कार्य अविस्मरणीय है।
एक पेंशन, एक संकल्प - आध्यात्मिक दान-पथ
इस छोटी सी घटना के पीछे एक बहुत बड़ा जीवन-दर्शन है, जिसे डॉ. आलोक जी ने 'आध्यात्मिक दान-पथ' नाम दिया है।
1. सेवानिवृत्ति के बाद समाज को समर्पण: एक शिक्षक के रूप में जीवन भर ज्ञान बाँटने के बाद, उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति की 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण में अर्पित करने का दृढ़ संकल्प लिया।
2. स्व-वित्तपोषित और तकनीक से जुड़ा मॉडल: यह दान किसी चंदे पर नहीं, बल्कि उनकी स्वयं की पेंशन और डिजिटल साधना - अर्थात उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो से गूगल से प्राप्त आय पर आधारित है। यह सिद्ध करता है कि तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए भी किया जा सकता है।
3. व्यापक और सुविधा-केंद्रित दृष्टि: उनका कार्य किसी एक जिले तक सीमित नहीं। मंदसौर, नीमच, झालावाड़, आगर, रतलाम, झाबुआ जिलों के मंदिरों, गौशालाओं और मुक्तिधामों तक यह धारा बह रही है। वे बड़ी घोषणाओं में नहीं, बल्कि वृद्धों और यात्रियों के लिए बैठने की छोटी-छोटी पर आवश्यक सुविधाओं में विश्वास रखते हैं। अब तक 151 से अधिक संस्थानों में वे बैठक व्यवस्था, रंग-रोगन और जीर्णोद्धार में सहयोग कर चुके हैं।
इसी भाव को इस पंक्ति में समेटा गया है -
दानं धर्मस्य मूलं हि, लोकहिताय समर्पितम्।
भानपुरे मुक्तिधामे, बेंचाः एकादशाः स्थिताः॥
आलोकस्य संकल्पेन, समाजे जागृतिर्नव।
पथरीदामोदरालयेन, श्रद्धया सेव्यते सभाः॥
भानपुरा मुक्तिधाम में लगी ये 11 बेंचें ईंट-सीमेंट की संरचना मात्र नहीं, बल्कि एक शिक्षक के जीवन भर की कमाई से उपजा करुणा का दीप हैं, जो हमें सिखाता है कि अंतिम विदाई के स्थल को भी हम अपनी श्रद्धा से कितना मानवीय और सुंदर बना सकते हैं।
भानपुरा के मुक्तिधाम हेतु
दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ द्वारा
11 सीमेंट बेंच समर्पित
भानपुरा मुक्तिधाम में श्रद्धा का दीप, दान की धारा बहती अतीव। ग्यारह बेंचें समर्पित हुईं यहाँ, आलोकजी के संकल्प से जगमग हुआ जहाँ।
बरामदा, टाइलों का फर्श, वृक्षों की छाया, समिति के प्रयासों से बढ़ा सौंदर्य की माया। दान पट्ट अंकित हुआ पिलर पर महान, प्रेरणा बनेगा यह अद्भुत दान।
आध्यात्मिक पथ पर आलोकजी अग्रसर, पेंशन और आय का किया समर्पण अमर। मंदसौर, नीमच, झालावाड़, आगर के धाम, दान से प्रकाशित हुआ हर मुक़ाम।
श्लोक-
दानं धर्मस्य मूलं हि, लोकहिताय समर्पितम्। भानपुरे मुक्तिधामे, बेंचाः एकादशाः स्थिताः॥ आलोकस्य संकल्पेन, समाजे जागृतिर्नव। पथरीदामोदरालयेन, श्रद्धया सेव्यते सभाः॥
मंदसौर जिले के भानपुरा नगर में स्थित मुक्ति धाम एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है, जो छोटे-बड़े महादेव पर्यटन स्थल की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित है।
यहाँ विकास कार्य जारी हैं, जिसमें एक बरामदा और लकड़ी का गोदाम वाला कमरा बनाया गया है। फर्श पर टाइल्स लगाई गई हैं और कुछ पेड़ भी लगाए गए हैं। हालांकि, बंदरों के उत्पात से पेड़-पौधों के पनपने में रुकावट आती है
मुक्ति धाम समिति की देखरेख में विकास गतिविधियाँ चल रही हैं। समाजसेवी डॉ. दयाराम आलोक जी ने मध्य प्रदेश और राजस्थान के चयनित मुक्ति धाम में लोगों के विश्राम के लिए सिमेन्ट की बेंचें भेंट करने का अनुष्ठान चलाया है। इसी सिलसिले में, इस शमशान घाट के लिए 11बेंचें भेंट करने का निर्णय लिया गया और दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ के माध्यम से सभी 11बेंचें श्रद्धांजलि सभागृह में सजा दी गईं।
मुक्ति धाम समिति के सदस्यों और पदाधिकारियों ने दान दाता का दान पट्ट बरामदे के पिलर पर स्थापित कर दिया है ताकि अन्य लोगों को दान की प्रेरणा मिलती रहे ।
मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के
मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु
डॉ .दयाराम आलोकजी का
सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।
व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।
सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।
स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।
निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।
पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।
यूट्यूब विडिओ की प्लेलिस्ट -




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