16.9.17

प्रजापति (कुम्हार)जाती का इतिहास




                                                 

कुम्हार भारत, पाकिस्तान और नेपाल में पाया जाने वाला एक जाति या समुदाय है. इनका इतिहास अति प्राचीन और गौरवशाली है. मानव सभ्यता के विकास में कुम्हारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. कहा जाता है कि कला का जन्म कुम्हार के घर में ही हुआ है. इन्हें उच्च कोटि का शिल्पकार वर्ग माना गया है. सभ्यता के आरंभ में दैनिक उपयोग के सभी वस्तुओं का निर्माण कुम्हारों द्वारा ही किया जाता रहा है. पारंपरिक रूप से यह मिट्टी के बर्तन, खिलौना, सजावट के सामान और मूर्ति बनाने की कला से जुड़े रहे हैं. यह खुद को वैदिक ‌भगवान प्रजापति का वंशज मानते हैं, इसीलिए ये प्रजापति के नाम से भी जाने जाते हैं. इन्हें प्रजापत, कुंभकार, कुंभार, कुमार, कुभार, भांडे आदि नामों से भी जाना जाता है. भांडे का प्रयोग पश्चिमी उड़ीसा और पूर्वी मध्य प्रदेश के कुम्हारों के कुछ उपजातियों लिए किया जाता है. कश्मीर घाटी में इन्हें कराल के नाम से जाना जाता है. अमृतसर में पाए जाने वाले कुछ कुम्हारों को कुलाल या कलाल कहा जाता है. कहा जाता है कि यह रावलपिंडी पाकिस्तान से आकर यहां बस गए. कुलाल शब्द का उल्लेख यजुर्वेद (16.27, 30.7) मे मिलता है,

कुम्हार किस कैटेगरी में आते हैं?

आरक्षण की व्यवस्था के अंतर्गत कुम्हार जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, उड़ीसा, बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात में इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है.मध्य प्रदेश के छतरपुर, दतिया, पन्ना, सतना, टीकमगढ़, सीधी और शहडोल जिलों में इन्हें अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है; लेकिन राज्य के अन्य जिलों में इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में सूचीबद्ध किया गया है. अलग-अलग राज्योंं में कुमार के अलग-अलग सरनेम है.

कुम्हार कहां पाए जाते हैं?

यह जाति भारत के सभी प्रांतों में पाई जाती है. हिंदू प्रजापति जाति मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में पाई जाती है. महाराष्ट्र में यह मुख्य रूप से पुणे, सातारा, सोलापुर, सांगली और कोल्हापुर जिलों में पाए जाते हैं.

कुम्हार शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

कुम्हार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द “कुंभ”+”कार” से हुई है. “कुंभ” का अर्थ होता है घड़ा या कलश. “कार’ का अर्थ होता है निर्माण करने वाला बनाने वाला या कारीगर. इस तरह से कुम्हार का अर्थ है- “मिट्टी से बर्तन बनाने वाला”.

वैदिक मान्यताओं के अनुसार, कुम्हार की उत्पत्ति त्रिदेव यानी कि सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा, पालनहार भगवान विष्णु और संहार के अधिपति भगवान शिव से हुई है. सृष्टि के आरंभ में त्रिदेव को यज्ञ करने की इच्छा हुई. यज्ञ के लिए उन्हें मंगल कलश की आवश्यकता थी. तब प्रजापति ब्रह्मा ने एक मूर्तिकार कुम्हार को उत्पन्न किया और उसे मिट्टी का घड़ा यानी कलश बनाने का आदेश दिया. कुम्हार ने ब्रह्मा जी से कलश निर्माण के लिए सामग्री और उपकरण उपलब्ध कराने की प्रार्थना की. जब भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र चाक के रूप में उपयोग करने के लिए दिया. शिव जी ने धुरी के रूप में प्रयोग करने के लिए अपना पिंडी दिया. ब्रह्मा जी ने धागा (जनेऊ), पानी के लिए कमंडल और चक्रेतिया दिया. इन सभी सामग्री और उपकरण की मदद से फिर कुम्हार ने मंगल कलश का निर्माण किया जिससे यज्ञ संपन्न हुआ.

हिंदू कुम्हार सृष्टि के रचयिता वैदिक प्रजापति (भगवान ब्रह्मा) के नाम पर खुद को सम्मानपूर्वक प्रजापति कहते हैं.
  • कुम्हारों को उच्च कोटि का शिल्पकार माना जाता है. 
  • सभ्यता के आरंभ में कुम्हार ही दैनिक उपयोग की सभी वस्तुएं बनाते थे. 
  • कुम्हारों ने मिट्टी के बर्तन, खिलौने, सजावट के सामान, और मूर्तियां बनाई हैं. 
  • कुम्हारों को वैदिक देवता प्रजापति का वंशज माना जाता है. 
  • कुम्हारों को सृजनकर्ता और वंश वर्धक देवता माना जाता है. 
  • विवाह में गणपति की स्थापना से पहले कुम्हारों के घर जाकर चाक की पूजा की जाती है. 
  • भारत की सभी जातियों के लिए शादी में चाक-पूजन एक अहम रस्म है. 
कुम्हारों की उत्पत्ति से जुड़ी एक दंतकथा: 
  • एक बार ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों के बीच गन्ना बांटा था.
  • सभी पुत्रों ने अपना हिस्सा खा लिया, लेकिन कुम्हार भूल गया.
  • कुम्हार ने गन्ने को मिट्टी के ढेर के पास रख दिया था.
  • कुछ दिन बाद ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों से गन्ने मांगे, तो कोई भी पुत्र गन्ना नहीं ला सका.
  • कुम्हार ने ब्रह्मा जी को पूरा गन्ने का पौधा भेंट कर दिया.
कुमावत शब्‍द
राजस्‍थान में कुछ कुमारों/कुम्‍भारों ने कुमरावत  सरनेम  का प्रयोग किया जो बाद में कुमावत में तब्‍दील हो गया।
इसको समझने के लिये भाषा विज्ञान पर नजर डाले-
कुमावत शब्‍द की स‍न्धि विच्‍छेद करने पर पता चलता है ये शब्‍द कुमा + वत से बना है। यहां वत शब्‍द वत्‍स से बना है । वत्‍स का अर्थ होता है पुत्र या पुत्रवत शिष्‍य अर्थात अनुयायी। इसके लिये हम अन्‍य शब्‍दों पर विचार करते है-
निम्‍बावत अर्थात निम्‍बार्काचार्य के शिष्‍य
रामावत अर्थात रामानन्‍दाचार्य के शिष्‍य
शेखावत अर्थात शेखा जी के वंशज
लखावत अर्थात लाखा जी के वंशज
रांकावत अर्थात रांका जी के शिष्‍य या अनुयायी
इसी प्रकार कुमरावत/कुमावत का भी अर्थ होता है कुम्‍हार के वत्‍स या अनुयायी।
कुम्‍हार शब्‍द था फिर कुमावत शब्‍द का प्रयोग क्‍यों शुरू हुआ?

उसके पीछे मूल कारण यही है कि सामान्‍यतया पूरा समाज पिछड़ा रहा है और जब समाज का एक वर्ग तरक्‍की कर आगे बढा तो उसने स्‍वयं को अलग दर्शाने के लिये इस शब्‍द का प्रयोग शुरू किया। और अब यह व्‍यापक पैमाने में प्रयोग होता है। वैसे इतिहास में कुमावत शब्‍द का प्रयोग जयपुर के स्‍थापना (1728 ई) के समय से मिलता है। जयपुर शहर राजस्‍थान के समस्‍त शहरों में अपेक्षाकृत नया है।
सवाल यह भी किया जाता कि इतिहास में कुमावतों का युद्ध में भाग लेने का उल्‍लेख है। हाँ ,युद्ध में सभी जातियों की थोड़ी बहुत भागीदारी अवश्‍य होती थी और वे आवश्‍यकता होने पर अपना पराक्रम दिखा भी देते थे। युद्ध में कोई सैनिकों की सहायता करने वाले होते थे तो कोई दुन्दुभी बजाते कोई गीत गाते कोई हथियार पैने करते तो कोई भोजन बनाते। महाराणा प्रताप ने तो अपनी सेना में भीलों की भी भर्ती की थी। ये भी संभव है कि इस प्रकार युद्ध में भाग लेने वाले समाज बन्‍धु ने कुमावत शब्‍द का प्रयोग शुरू किया।
   इतिहास में कुम्हारों की पुरानी जागीरों का वर्णन है तो  सवाल यह है  कि क्या कुम्हार  राजपूत के वंशज है या क्षत्रिय है। इसका उत्तर ये हो सकता है की जागीर देना राजा की मर्जी पर था मेहरापर नगढ के रहता था|दुर्ग के निर्माण के समय दुर्ग ढह जाता तो ये उपाय बताया गया कि किसी जीवित व्‍यक्ति द्वारा नींव मे समाधि लिये जाने पर ये अभिशाप दूर होगा। तब पूरे राज्‍य में उद्घोषणा करवाई गई कि जो व्‍यक्ति अपनी जीवित समाधि देगा उसके वंशजों को जागीर दी जाएगी। तब केवल एक गरीब व्‍यक्ति आगे आया उसका नाम राजाराम मेघवाल था। तब महाराजा ने उसके परिवार जनों को एक जागीर दी तथा उसके नाम से एक समाधि स्‍थान (थान) किले में आज भी मौजूद है। चारणों को भी उनकी काव्‍य गीतों की रचनाओं से प्रसन्‍न हो खूब जागीरे दी गयी। अत: इसका उत्तर ये है कि जागीर होना  इस बात का प्रमाण नहीं है कि वे राजपूत के वंशज थे। और क्षत्रिय वर्ण बहुत व्यापक  है राजपूत तो उनके अंग मात्र है। कुम्‍हार  जाती ने युद्ध  में भाग लिया  इसलिए  क्षत्रिय तो  कहला सकता है पर राजपूत नहीं। राजपूत तो व्‍यक्ति तभी कहलाता है जब वह किसी राजा की संतति हो। क्षत्रिय होने के लिए राजा का वंशज होना जरूरी नहीं होता।कर्म से व्‍यक्ति क्षत्रिय वैश्‍य या शुद्र होता है। कुम्‍हार/कुमार शिल्‍प कार्य करने के कारण वैश्‍य वर्ण में आता है। कुछ क्षत्रिय कर्म करते थे तो स्‍वयं को क्षत्रिय भी कहते है।
भाट और रावाें ने अपनी बहियों में अलग अलग कहानीयों के माध्‍यम से लगभग सभी जातियों को राजपूतों से जोडा है ताकि उन्‍हे परम दानी राजा के वंशज बता अधिक से अधिक दान दक्षिणा ले सके।
लेकिन कुमावत और कुम्‍हारों को इस बात पर ध्‍यान देना चाहिए कि राजपूतो में ऐसी गोत्र नहीं होती जैसी उनकी है और जिस प्रकार कुमावत का रिश्‍ता कुमावत में होता है वैसे किसी राजपूत वंश में नहीं होता। अत: उनको भाट और रावों की झूठी बातों पर ध्‍यान नहीं देना चाहिए। राजपूतों मे कुम्‍भा नाम से कई राजा हुए है अत: हो सकता है उनके वंशज भी कुमावत लगाते रहे हो। पर अब कुम्‍हारों को कुमावत लगाते देख वे अपना मूल वंश जैसे सिसोदिया या राठौड़ या पंवार लगाना शुरू कर दिया होगा और वे रिश्‍ते भी अपने वंश के ही कुमावत से ना कर कच्‍छवाहो परिहारो से करते होंगे।
कुछ विचारक ये भी तर्क देते है कि हम बर्तन मटके नहीं बनाते और इनको बनाने वालों से उनका कोई संबंध कभी नहीं रहा। उन लोगों को समझना होगा कि आपके पुराने खेत और मकान जायदाद मे तो कुम्‍हार कुमार कुम्‍भार लिखा है तो वे तर्क देते है कि वे अज्ञानतावश खुद को कुम्‍हार कहते थे। यहां ये लोग भूल जाते है कि हमारे पूर्वज राव और भाट के हमारी तुलना में ज्‍यादा प्रत्‍यक्ष सम्‍पर्क में रहते थे। अगर भाट कहते कि आप कुमावत हो तो वे कुमावत लगाते। और कुमावत शब्‍द का कुम्‍हारों द्वारा प्रयो्ग ज्‍यादा पुराना नहीं है। वर्तमान जयपुर की स्‍थापना के समय से ही प्रचलन में आया है और धीरे धीरे पूरे राजस्‍थान में कुम्‍हारों के मध्‍य लोकप्रिय हो रहा है। और रही बात मटके बनाने की तो हजार में से एक व्‍यक्ति ही मटका बनाता है। क्‍योंकि अगर सभी बनाते तो इतने बर्तन की खपत ही कहाँ होती। मिटटी के बर्कतनों की कम मांग के कारण कुम्‍हार जाति के लोग अब अन्‍य रोजगार अपना रहे हैं| । कुछ खेती करते कुछ भवन निर्माण करते कुछ पशुचराते कुछ बनजारो की तरह व्‍यापार करते तो कुछ बर्तन और मिट्टी की वस्‍तुए बनातें। खेतीकर, चेजारा और जटिया कुमार क्रमश: खेती करने वाले, भवन निर्माण और पशु चराने और उन का कार्य करने वाले कुम्‍हार को कहा जाता था।
कुछ कहते है की मारू कुमार मतलब राजपूत। मारू मतलब राजपूत और कुमार मतलब राजकुमार।
– उनके लिये यह कहना है कि राजस्‍थान की संस्‍कृति पर कुछ पढे बिना पढे ऐसी बाते ही मन मे उठेगी। मारू मतलब मरू प्रदेश वासी। मारेचा मारू शब्‍द का ही परिवर्तित रूप है जो मरूप्रदेश के सिंध से जुड़े क्षेत्र के लोगो के लिये प्रयुक्‍त होता है। और कुमार मतलब हिन्‍दी में राजकुमार होता है पर जिस भाषा और संस्‍कृति पर ध्‍यान दोगे तो वास्‍तविकता समझ आयेगी। यहां की भाष्‍ाा में उच्‍चारण अलग अलग है। यहां हर बारह कोस बाद बोली बदलती है। राजस्‍थान मे ‘कुम्‍हार’ शब्‍द का उच्‍चारण कुम्‍हार कहीं नही होता। कुछ क्षेत्र में कुम्‍मार बोलते है और कुछ क्षेत्र में कुंभार अधिकतर कुमार ही बोलते है। दक्षिण्‍ा भारत में कुम्‍मारी, कुलाल शब्‍द कुम्‍हार जाति के लिये प्रयुक्‍त होता है।
प्रजापत और प्रजापति शब्‍द के अर्थ में कोई भेद नहीं। राजस्‍थानी भाषा में पति का उच्‍चारण पत के रूप में करते है। जैसे लखपति का लखपत, लक्ष्‍मीपति सिंघानिया का लक्ष्‍मीपत सिंघानिया। प्रजापति को राजस्‍थानी में प्रजापत कहते है। यह उपमा उसकी सृजनात्‍मक क्षमता देख कर दी गयी है। जिस प्रकार ब्रहृमा नश्‍वर सृष्‍टी की रचना करता है प्राणी का शरीर रज से बना है और वापस मिट्टि में विलीन हो जाता है वैसे है कुम्‍भकार मिट्टि के कणों से भिन्‍न भिन्‍न रचनाओं का सृजन करता है।
कुछ कहते है कि रहन सहन अलग अलग। और कुम्‍हार स्त्रियां नाक में आभूषण नही पहनती। तो इसके पीछे भी अलग अलग क्षेत्र के लोगो मे रहन सहन के स्‍तर में अन्‍तर होना ही मूल कारण है। 

राजस्‍थान में कुम्‍हार जाति इस प्रकार उपजातियों में विभाजित है-
मारू – अर्थात मरू प्रदेश के कुम्हार 
खेतीकर  कुम्हार – अर्थात ये साथ में अंश कालिक खेती करते थे। चेजारा भी इनमें से ही है जो अंशकालिक व्‍यवसाय के तौर पर भवन निर्माण करते थे। बारिस के मौसम में सभी जातियां खेती करती थी क्‍योंकि उस समय प्रति हेक्‍टेयर उत्‍पादन आज जितना नही होता था अत: लगभग सभी जातियां खेती करती थी। सर्दियों में मिट्टि की वस्‍तुए बनती थी।
बांडा कुम्हार _ ये केवल बर्तन और मटके बनाने का व्‍यवसाय ही करते थे। ये मूलत: पश्चिमी राजस्‍थान के नहीं होकर गुजरात और वनवासी क्षेत्र से आये हुए कुम्‍हार थे। इनका रहन सहन भी मारू कुम्‍हार से अलग था। ये दारू मांस का सेवन भी करते थे।
पुरबिये  कुम्हार– ये पूरब दिशा से आने वाले कुम्‍हारों को कहा जाता है  जैसे हाड़ौती क्षेत्र के कुम्‍हार पश्चिमी क्षेत्र में आते तो इनको पुरबिया कहते। ये भी दारू मांस का सेवन करते थे।
जटिया कुम्हार - ये अंशकालिक व्‍यवसाय के तौर पर पशुपालन करते थे। ये पानी की अत्‍यंत कमी वाले क्षेत्र में रहते है वहां पानी और घास की कमी के कारण गाय और भैंस की जगह बकरी और भेड़ पालते है। और बकरी और भेड़ के बालों की वस्‍तुए बनाते थे। इनका रहन सहन भी पशुपालन व्‍यवसाय करने के कारण थोड़ा अलग हो गया था हालांकि ये भी मारू ही थे। इनका पहनावा राइका की तरह होता था।
बाड़मेर और जैसलमेर में पानी और घास की कमी के कारण वंहा गावं में राजपूत भी भेड़ बकरी के बड़े बड़े झुण्‍ड रखते है।
रहन सहन अलग होने के कारण और दारू मांस का सेवन करने के कारण मारू अर्थात स्‍थानीय कुम्‍हार बांडा और पुरबियों के साथ रिश्‍ता नहीं करते थे।
मारू कुम्‍हार दारू मांस का सेवन नहीं करती थे अत: इनका सामाजिक स्‍तर अन्‍य पिछड़ी जातियों से बहुत उंचा होता था। अगर कहीं बड़े स्‍तर पर भोजन बनाना होता तो ब्राहमण ना होने पर कुम्‍हार को ही वरीयता दी जाती थी। इसीलिए आज भी पश्चिमी राजस्‍थान में हलवाई का अधिकतर कार्य कुम्‍हार और ब्राहमण जाति ही करती है।
पूराने समय में आवगमन के साधन कम होने से केवल इतनी दूरी के गांव तक रिश्‍ता करते थे कि सुबह दुल्‍हन की विदाई हो और शाम को बारात वापिस अपने गांव पहुंच जाये। इसलिये 20 से 40 किलोमीटर की त्रिज्‍या के क्षेत्र को स्‍थानीय बोली मे पट्टी कहते थे। वे केवल अपनी पट्टी में ही रिश्‍ता करते थे। परन्‍तु आज आवागमन के उन्‍नत साधन विकसित होने से दूरी कोई मायने नहीं रखती।
कुछ बंधु हास्‍यास्‍पद कुतर्क भी करते है जैसे- कुम्‍हार कभी इतनी बड़ी तादाद में नहीं रहते की गांव के गांव बस जाये। जोधपुर शहर के पास ही गांव है नान्‍दड़ी। इसे नान्‍दीवाल गौत्र के कुम्‍हारो ने बसाया था। आज भी वहां बड़ी संख्‍या कुम्‍हारों की है। एक और गांव है झालामण्‍ड। वह भी कुम्‍हार बहुल आबादी का गांव है। ऐसे कई गांव है। पूर्वी राजस्‍थान में भी है। रूपबास भी ऐसा ही गांव है। ये ऐसा कुतर्क है जो केवल अनजान व्‍यक्ति ही दे सकता है जो कुपमण्‍डुक की तरह केवल एक जगह रहा हो। अौर कुम्‍हार जो मटके बनाते है वे कभी अकेले नहीं रहते। उनकी नियाव जहां मटके आग में पकाये जाते है, वहां सभी कुम्‍हारों के मटके साथ में पकते है और उस न्‍याव पर गांव का जागीरदार कर भी लगाता था।
कुछ लोग एक और हास्‍यास्‍पद तर्क देते है कि कुम्‍हार कारू जाति होने से लगान नहीं देते थे। ये भी इन लो्गों की अज्ञानता और पिछड़ापन और घटिया सोच दर्शाता है। ये भूल जाते है कि कुम्‍भ निर्माण एक शिल्‍पकला है। कुमार/कुम्‍भार ना केवल मिट्टी से कुम्‍भ का निर्माण करता है वरन अन्‍य वस्‍तु भी बनाता है। जैसे ईन्‍ट मूर्तियां और खिलौन एवं अन्‍य सजावटी उत्‍पाद। अत: कुम्‍भकार शिल्‍पकार वर्ग में आता ही नहीं वरन शिल्‍पकार वर्ग का जनक माना जाता है। मिट्टी के उत्‍पाद मुख्‍यतया सर्दियों मे बनाये जाते थे। और मानसून में तो लगभग सभी जातियों कृषि कार्य करती थी। और जो कृषि करते थे उनको लगान देना पड़ता था। सिर्फ ब्राह्मण से लगान नहीं लिया जाता था। और रही बात कुम्‍हारों को शादी ब्‍याह में नेग देने की बात तो  नेग केवल उसी कुम्‍हार को दिया जाता है जिसके घर में चाक होती है और जिसे पूजा जाना होता है। विवाह के अवसर पर चाक पूजन की अनिवार्य रस्‍म होती है। चाक से सृजन होता है और विवाह से वंश वृद्धि होती है अत: चाक को मंगलकारी माना जाता है। इसी चाक की वजह से कुम्‍हार को नेग मिलता है बदले में कुम्‍हार पवित्र कलश देता है। जो कुम्‍हार बर्तन बनाते थे वे सामूहिक तौर पर उनको न्‍याव में पकाते थे, और उस न्‍याव में जागीरदार कर लगाता था।
एक और तर्क है कि रहन सहन अलग होना। राजस्‍थान में जहां हर 12 कोस बाद बोली बदल जाती है तो उसके पीछे रहन सहन और संस्‍कृति का अलग होना ही है। राजस्‍थान के हर राजवंश की भी पगड़ी अलग तरीके की होती थी। हर राज्‍य की बोली अलग अलग होती थी रहन सहन अलग अलग होता था। तो इसका असर सभी जातियों पर दिखना ही था। लेकिन आज कल के लोगो को तो ये भी नहीं मालुम की उनकी परदादी और परदादा किस तरह के वस्‍त्र धारण करते थे। आजकल तो उस तरह के वस्‍त्र ही बड़ी मुस्किल से मिलते है। जोधपुर नागौर की तरफ के क्षेत्र में जाट और कुमार जाति की महिलायें हरा और उसमें लाल और गुलाबी लाइन और चोकड़ी की डिजाइन का मोटा खादी की तरह का कपड़े (स्‍थानीय भाषा में ‘साड़ी’) से बना घाघरा और उपर कुर्ती कांचली कमीज आदि पहनती थी। पुरूष धोती कुरता पहनते थे और हरी पीली सफेद केसरीया और चुनरी का साफा पहनते थे। वही बाड़मेर की तरफ पुरूष लाल रंग की पगड़ी और अंगरखी और धोती पहनते थे जो राईका जाति के पुरूषों के समान होती थी। धोती और पगड़ी बांधने के तरीके में भी अन्‍तर था।
कुमारो/कुम्‍भारों की जनसंख्‍या अधिक होने के कारण ज्‍यादातर ने कई पीढियों पूर्व अन्‍य व्‍यवसाय अपना लिया। कोई खेती करने लगे कोई चूने से चूनाई और भित्ति चित्र का निर्माण करते। वर्तमान में भी नये नये स्‍वरोजगार में लिप्‍त हैं।
अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग कथायें प्रचलित है। कहीं पर शिव पार्वति विवाह की घटना, कहीं पर राणा कुम्‍भा का स्‍थापत्‍य प्रेम, ताे कहीं पर संत कुबाजी को लेकर तो कहीं संत गरवाजी को लेकर कथायें प्रचलित है।
कुछ बन्‍धुओं का ये भी तर्क है कि हम दूसरें राज्‍य में सामान्‍य श्रेणी में आते है इसलिए क्षत्रिय है और कुम्‍हार चूंकि अन्‍य पिछड़ा वर्ग में आता है अत: हम अलग जाति के है। उन बन्‍धुओं को मेरा सुझाव है कि अन्‍य पिछड़ा वर्ग से संबंधित नियम पढे। ऐसा इसलिए होता है कि एक राज्‍य के अ.पि.व. दूसरे राज्‍य में जाने पर सामान्‍य श्रेणी में शामिल होते है। आप कभी दूसरे राज्‍य की भर्ती परीक्षा में केवल सामान्‍य श्रेणी में ही भाग ले सकते है। अब कुमावत शब्‍द की उत्‍पति राजस्‍थान में हुई है और राजस्‍थान से ही कुमावत सरनेम लगाने वाले लोग देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में जाकर बसे है। दूसरे राज्‍य के इतिहास में इस शब्‍द के बारे में ज्‍यादा कुछ उपलब्‍ध नहीं होने कारण और उनको स्‍थानीय ना मानकर राजस्‍थानी माना जाने के कारण अपिव श्रेणी में नहीं रखा गया। जब कि यहीं से जाकर अन्‍य राज्‍य में, जंहा कुम्‍हार प्रजापति शब्‍द प्रचलित है, बसने वाले लोग जाे स्‍वयं को कुम्‍हार कहते थे प्रशासनिक मिली भगत से स्‍वयं को स्‍थानीय बताकर अपिव श्रेणी का और जिस राज्‍य में अनुसूचित जाति में हैं वहां अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र बनवा लिया। हालांकि वंहा बस गये फिर भी वंहा के स्‍थानीय लोगो से रिश्‍ता नहीं करते।
कुछ बन्‍धु राजपूत महासभा की पुस्‍तक का हवाला देते हुए कहते है कि कुमावत कछवाहा राजपूत वंश की एक खाप है। जैसे नाथावत या खंगारोत। यहां में यही कहुंगा कि बिल्‍कुल कुमावत कछवाहा वंश की एक खाप हो सकती है लेकिन खाप होने पर कुमावत का रिश्‍ता कुमावत से ना होकर अन्‍य राजपूत वंश से होगा। जैसे किसी नाथावत का विवाह नाथावत से नहीं होता वैसे ही कुमावत का विवाह कुमावत से नहीं होगा। लेकिन जब कुमावत जाति हो तो कुमावत से रिश्‍ता हो सकता है अत: जो समाज बन्‍धु राजपूत समाज की पुस्‍तक का हवाला देते हैं उन्‍हे अपनी बुद्धि का थोड़ा इस्‍तेमाल करना चाहिए।
कुछ बन्‍धु मरदुशुमारी (जनगणना, census) का हवाला देते है। उनके लिये फिर यही कहना चाहुंगा कि जनगणना में वही आंकड़े होते है जो लोग देते है। अब तक पश्चिमी राजस्‍थान के लोग कुम्‍हार लिखवाते आये है और अगली गणना में कुमावत लिखवाते है तो वही लिखा जायेगा जो लिखवायेंगे। जनगणना में जैन पंथ के लोग धर्म हिन्‍दू लिखवाते आये है। इसलिये जनगणना से पूर्व जैन समाज के लोग कहते भी है कि जनगणना के समय धर्म जैन लिखवाना है हिन्‍दू नहीं। कुमावत शब्‍द का प्रचलन देखा देखी ही शुरू हुआ है। पहले 17 वी सदी में एक ने लगाया बाद में देखा देखी दूसरे भी लगाते गये। और अभी भी देखा देखी लगाते जा रहे है।
कुछ बंधु यह तर्क देते हैं कि मारू कुम्‍हारों में राजपूती नख होते है अत: जरूर राजपूतों से कनेक्‍शन है और उनका कहना है कि नखों के आधार पर भाटों की बात सही प्रतीत होती है कि हमारे पूर्वज राजपूत थे, किसी कारणवश उन्‍होने शिल्‍प कार्य कुम्‍भकला को अपनाया था। मेरा उन बंधुओं के लिये इतना ही कहना है कि कुम्‍हार कुमावत राजकुम्‍हार सभी शिल्‍पी जातियां है ना कि सेवा करने वाली जातियां, इनमें रिश्‍तें करते समय गोत्र ही देखी जाती रही है, और चार गौत्र ही टाली जाती रही है। सेवा करने वाली जातियां अपने राजा के वंश के अनुरूप स्‍वयं का वंश बताती है। अकाल दुर्भिक्ष के समय मेहनत मजदूरी जो भी मिले वो कार्य करने से व्‍यक्ति की जाति का स्‍वरूप नहीं बदलता, शिल्‍पी जातियां सेवा करने वाली जातियों मे तब्‍दील नहीं हो जाती। अत: मेरा बन्‍धुओं से विनम्र अनुरोध है कि राजपूती नख जैसी बातों को भूल कर स्‍वाभिमानी शिल्पियों की तरह केवल गोत्र ही बतायें। सेवा करने वाली जातियों के पास गोत्र नही होती केवल नख होता है।
कुम्हार समाज की कुल देवी श्रीयादे माता है|
Disclaimer: इस  content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझें

---

प्रजापति (कुम्हार)जाती का इतिहास

कुम्हार भारत, पाकिस्तान और नेपाल में पाया जाने वाला एक जाति या समुदाय है. इनका इतिहास अति प्राचीन और गौरवशाली है. मानव सभ्यता के विकास में कुम्हारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. कहा जाता है कि कला का जन्म कुम्हार के घर में ही हुआ है. इन्हें उच्च कोटि का शिल्पकार वर्ग माना गया है. सभ्यता के आरंभ में दैनिक उपयोग के सभी वस्तुओं का निर्माण कुम्हारों द्वारा ही किया जाता रहा है. पारंपरिक रूप से यह मिट्टी के बर्तन, खिलौना, सजावट के सामान और मूर्ति बनाने की कला से जुड़े रहे हैं. यह खुद को वैदिक ‌भगवान प्रजापति का वंशज मानते हैं, इसीलिए ये प्रजापति के नाम से भी जाने जाते हैं. इन्हें प्रजापत, कुंभकार, कुंभार, कुमार, कुभार, भांडे आदि नामों से भी जाना जाता है. भांडे का प्रयोग पश्चिमी उड़ीसा और पूर्वी मध्य प्रदेश के कुम्हारों के कुछ उपजातियों लिए किया जाता है. कश्मीर घाटी में इन्हें कराल के नाम से जाना जाता है. अमृतसर में पाए जाने वाले कुछ कुम्हारों को कुलाल या कलाल कहा जाता है. कहा जाता है कि यह रावलपिंडी पाकिस्तान से आकर यहां बस गए. कुलाल शब्द का उल्लेख यजुर्वेद (16.27, 30.7) मे मिलता है,

कुम्हार किस कैटेगरी में आते हैं?

आरक्षण की व्यवस्था के अंतर्गत कुम्हार जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, उड़ीसा, बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात में इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है.मध्य प्रदेश के छतरपुर, दतिया, पन्ना, सतना, टीकमगढ़, सीधी और शहडोल जिलों में इन्हें अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है; लेकिन राज्य के अन्य जिलों में इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में सूचीबद्ध किया गया है. अलग-अलग राज्योंं में कुमार के अलग-अलग सरनेम है.
  इतिहास में कुम्हारों की पुरानी जागीरों का वर्णन है तो  सवाल यह है  कि क्या कुम्हार  राजपूत के वंशज है या क्षत्रिय है। इसका उत्तर ये है कि जागीर होना  इस बात का प्रमाण नहीं है कि वे राजपूत के वंशज थे। और क्षत्रिय वर्ण बहुत व्यापक  है राजपूत तो उनके अंग मात्र है। कुम्‍हार  जाती ने युद्ध  में भाग लिया  इसलिए  क्षत्रिय तो  कहला सकता है पर राजपूत नहीं। राजपूत तो व्‍यक्ति तभी कहलाता है जब वह किसी राजा की संतति हो। क्षत्रिय होने के लिए राजा का वंशज होना जरूरी नहीं होता।
भाट और रावाें ने अपनी बहियों में अलग अलग कहानीयों के माध्‍यम से लगभग सभी जातियों को राजपूतों से जोडा है ताकि उन्‍हे परम दानी राजा के वंशज बता अधिक से अधिक दान दक्षिणा ले सके।

राजस्‍थान में कुम्‍हार जाति इस प्रकार उपजातियों में विभाजित है-

मारू – अर्थात मरू प्रदेश के कुम्हार 
खेतीकर  कुम्हार – अर्थात ये साथ में अंश कालिक खेती करते थे। चेजारा भी इनमें से ही है जो अंशकालिक व्‍यवसाय के तौर पर भवन निर्माण करते थे। बारिस के मौसम में सभी जातियां खेती करती थी क्‍योंकि उस समय प्रति हेक्‍टेयर उत्‍पादन आज जितना नही होता था अत: लगभग सभी जातियां खेती करती थी। सर्दियों में मिट्टि की वस्‍तुए बनती थी।
बांडा कुम्हार _ ये केवल बर्तन और मटके बनाने का व्‍यवसाय ही करते थे। ये मूलत: पश्चिमी राजस्‍थान के नहीं होकर गुजरात और वनवासी क्षेत्र से आये हुए कुम्‍हार थे। इनका रहन सहन भी मारू कुम्‍हार से अलग था। ये दारू मांस का सेवन भी करते थे।
पुरबिये  कुम्हार– ये पूरब दिशा से आने वाले कुम्‍हारों को कहा जाता है  जैसे हाड़ौती क्षेत्र के कुम्‍हार पश्चिमी क्षेत्र में आते तो इनको पुरबिया कहते। ये भी दारू मांस का सेवन करते थे।
जटिया कुम्हार - ये अंशकालिक व्‍यवसाय के तौर पर पशुपालन करते थे। ये पानी की अत्‍यंत कमी वाले क्षेत्र में रहते है वहां पानी और घास की कमी के कारण गाय और भैंस की जगह बकरी और भेड़ पालते है। और बकरी और भेड़ के बालों की वस्‍तुए बनाते थे। इनका रहन सहन भी पशुपालन व्‍यवसाय करने के कारण थोड़ा अलग हो गया था हालांकि ये भी मारू ही थे। इनका पहनावा राइका की तरह होता था।

कुम्हार कहां पाए जाते हैं?

यह जाति भारत के सभी प्रांतों में पाई जाती है. हिंदू प्रजापति जाति मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में पाई जाती है. महाराष्ट्र में यह मुख्य रूप से पुणे, सातारा, सोलापुर, सांगली और कोल्हापुर जिलों में पाए जाते हैं.

कुम्हार शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

कुम्हार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द “कुंभ”+”कार” से हुई है. “कुंभ” का अर्थ होता है घड़ा या कलश. “कार’ का अर्थ होता है निर्माण करने वाला बनाने वाला या कारीगर. इस तरह से कुम्हार का अर्थ है- “मिट्टी से बर्तन बनाने वाला”.
वैदिक मान्यताओं के अनुसार, कुम्हार की उत्पत्ति त्रिदेव यानी कि सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा, पालनहार भगवान विष्णु और संहार के अधिपति भगवान शिव से हुई है. सृष्टि के आरंभ में त्रिदेव को यज्ञ करने की इच्छा हुई. यज्ञ के लिए उन्हें मंगल कलश की आवश्यकता थी. तब प्रजापति ब्रह्मा ने एक मूर्तिकार कुम्हार को उत्पन्न किया और उसे मिट्टी का घड़ा यानी कलश बनाने का आदेश दिया. कुम्हार ने ब्रह्मा जी से कलश निर्माण के लिए सामग्री और उपकरण उपलब्ध कराने की प्रार्थना की. जब भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र चाक के रूप में उपयोग करने के लिए दिया. शिव जी ने धुरी के रूप में प्रयोग करने के लिए अपना पिंडी दिया. ब्रह्मा जी ने धागा (जनेऊ), पानी के लिए कमंडल और चक्रेतिया दिया. इन सभी सामग्री और उपकरण की मदद से फिर कुम्हार ने मंगल कलश का निर्माण किया जिससे यज्ञ संपन्न हुआ.

हिंदू कुम्हार सृष्टि के रचयिता वैदिक प्रजापति (भगवान ब्रह्मा) के नाम पर खुद को सम्मानपूर्वक प्रजापति कहते हैं.
प्राचीन हिंदू शास्त्र के अनुसार, कुम्हार जाति की उत्पत्ति मिश्रित विवाह से हुई है. ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार, कुंभकार की उत्पत्ति ब्राह्मण पिता और वैश्य माता से हुई है. सर मोनियर विलियम्स ने अपने संस्कृत शब्दकोश में कुम्हार जाति को ब्राह्मण पिता और क्षत्रिय माता की संतान के रूप में वर्णित किया है.
कुम्हारों को उच्च कोटि का शिल्पकार माना जाता है.
सभ्यता के आरंभ में कुम्हार ही दैनिक उपयोग की सभी वस्तुएं बनाते थे.
कुम्हारों ने मिट्टी के बर्तन, खिलौने, सजावट के सामान, और मूर्तियां बनाई हैं.
कुम्हारों को वैदिक देवता प्रजापति का वंशज माना जाता है.
कुम्हारों को सृजनकर्ता और वंश वर्धक देवता माना जाता है.
विवाह में गणपति की स्थापना से पहले कुम्हारों के घर जाकर चाक की पूजा की जाती है.

कुम्हारों की उत्पत्ति से जुड़ी एक दंतकथा:
एक बार ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों के बीच गन्ना बांटा था.
सभी पुत्रों ने अपना हिस्सा खा लिया, लेकिन कुम्हार भूल गया.
कुम्हार ने गन्ने को मिट्टी के ढेर के पास रख दिया था.
कुछ दिन बाद ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों से गन्ने मांगे, तो कोई भी पुत्र गन्ना नहीं ला सका.
कुम्हार ने ब्रह्मा जी को पूरा गन्ने का पौधा भेंट कर दिया.
कुम्हार समाज की कुल देवी श्रीयादे माता है|

Disclaimer: इस  content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझें

*******************
हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा-

विशिष्ट कवियों की चयनित कविताओं की सूची (लिंक्स)

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से -गोपालदास "नीरज"

वीरों का कैसा हो वसंत - सुभद्राकुमारी चौहान

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा-अल्लामा इकबाल

उन्हें मनाने दो दीवाली-- डॉ॰दयाराम आलोक

जब तक धरती पर अंधकार - डॉ॰दयाराम आलोक

जब दीप जले आना जब शाम ढले आना - रविन्द्र जैन

सुमन कैसे सौरभीले: डॉ॰दयाराम आलोक

वह देश कौन सा है - रामनरेश त्रिपाठी

किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की रामबाण औषधि

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ -महादेवी वर्मा

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल - महादेवी वर्मा

प्रणय-गीत- डॉ॰दयाराम आलोक

गांधी की गीता - शैल चतुर्वेदी

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार -शिवमंगलसिंह सुमन

सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक

जंगल गाथा -अशोक चक्रधर

मेमने ने देखे जब गैया के आंसू - अशोक चक्रधर

सूरदास के पद

रात और प्रभात.-डॉ॰दयाराम आलोक

घाघ कवि के दोहे -घाघ

मुझको भी राधा बना ले नंदलाल - बालकवि बैरागी

बादल राग -सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

आओ आज करें अभिनंदन.- डॉ॰दयाराम आलोक

14.9.17

पड़िहार वंश की कुलदेवी चामुंडा माता (सुधामाता) -डॉ.आलोक:आध्यात्म,जाति इतिहास,जनरल नॉलेज





ईन्दा शाखा प्रतिहार ( पडिहार , परिहार राजपूत ) ये श्री चामुण्डा देवी जी को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते है तथा वरदेवी के रूप में
गाजन माता को भी पूजते है , तथा देवल शाखा प्रतिहार ( पडिहार ,परिहार राजपूत ) ये सुंधा माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते है ,
पुराणो से ग्यात होता है कि भगवती दुर्गा का सातवा अवतार कालिका है , इसने दैत्य शुम्भ , निशुम्भ , और सेनापती चण्ड , मुण्ड का नाश किया था , तब से श्री कालिका जी चामुण्डा देवी जी के नाम से प्रसिद्द हुई , इसी लिये माँ श्री चामुण्डा देवी जी को आरण्यवासिनी , गाजन माता तथा अम्बरोहिया , भी कहा जाता है , पडिहार नाहडराव गाजन माता के परम भक्त थे , वही इनके वंशज पडिहार खाखू कुलदेवी के रूप में श्री चामुण्डा देवी जी की आराधना करते थे , प्रतिहार ,पडिहार , परिहार राजपूत वंशजो का श्री चामुण्डा देवी जी के साथ सम्बंधो का सर्वप्रथम सटीक पडिहार खाखू से मिलता है , पडिहार खाखू श्री चामुण्डा देवी जी की पूजा अर्चना करने चामुण्डा गॉव आते जाते थे , जो कि जोधपुर से ३० कि. मी. की दूरी पर स्थित है , घटियाला जहॉ पडिहार खाखू का निवास स्थान था , जो चामुण्डा गॉव से ४ कि. मी. की दूरी पर है ,श्री चामुण्डा देवी का मंदिर चामुण्डा गॉव में ऊँची पहाडी पर स्थित है , जिसका मुख घटियाला की ओर है , ऐसी मान्यता है कि देवी जी पडिहार खाखू जी के शरीर पर आती थी ,
** श्री चामुण्डा देवी जी ( गढ जोधपुर ) **
जोधपुर राज्य के संस्थापक राव जोधा के पितामाह राव चुण्डा जी का सम्बंध भी माता चामुण्डा देवी जी से रहा था , सलोडी से महज 5 कि. मी. की दूरी पर चामुण्डा गॉव है , वहा पर राव चुण्डा जी देवी के दर्शनार्थ आते रहते थे , वह भी देवी के परम भक्त थे , ऐसी मान्यता है कि एक बार राव चुण्डा जी गहरी नींद में सो रहे थे तभी रात में देवी जी ने स्वप्न में कहा कि सुबह घोडो का काफिला वाडी से होकर निकलेगा , घोडो कि पीठ पर सोने की ईंटे लदी होगीं वह तेरे भाग्य में ही है , सुबह ऐसा ही हुआ खजाना एवं घोडे मिल जाने के कारण उनकी शक्ति में बढोत्तरी हुई , आगे चलकर इन्दा उगमसी की पौत्री का विवाह राव चुण्डा जी के साथ हो जाने पर उसे मण्डौर का किला दहेज के रूप में मिला था , इसके पश्चात राव चुण्डा जी ने अपनी ईष्टदेवी श्री चामुण्डा देवी जी का मंदिर भी बनवाया था , यहा यह तथ्य उल्लेखनीय है कि देवी कि प्रतिष्ठा तो पडिहारो के समय हो चुकी थी , अनंतर राव चुण्डा जी ने उस स्थान पर मंदिर निर्माण करवाया था मंदिर के पास वि. सं. १४५१ का लेख भी मिलता है ।
अत: राव जोधा के समय पडिहारों की कुलदेवी श्री माँ चामुण्डा देवी जी की मूर्ति जो कि मंडौर के किले में भी स्थित थी , उसे जोधपुर के किले में स्थापित करबाई थी , राव जोधा जी तो जोधपुर बसाकर और मेहरानगढ जैसा दुर्ग बनाकर अमर हो गये परंतु मारवाड की रक्षा करने वाली परिहारों की कुलदेवी श्री चामुण्डा देवी जी को अपनी ईष्टदेवी के रूप में स्वीकार कर संपूर्ण सुरक्षा का भार माँ चामुण्डा देवी जी को सौप गये , राव जोधा ने वि. सं. १५१७ ( ई. १४६० ) में मण्डौर से श्री चामुण्डा देवी जी की मूर्ति को मंगवा कर जोधपुर के किले में स्थापित किया ,
श्री चामुण्डा महारानी जी मूलत: प्रतिहारों की कुलदेवी थी राठौरों की कुलदेवी श्री नागणेच्या माता जी है , और राव जोधा जी ने श्री चामुण्डा देवी जी को अपनी ईष्टदेवी के रूप में स्वीकार करके जोधपुर के किले में स्थापित किया था , ।।
** देवल ( प्रतिहार , परिहार ) वंश **
सुंधा माता जी का प्राचीन पावन तीर्थ राजिस्थान प्रदेश के जालौर जिले की भीनमाल तहसील की जसवंतपुरा पंचायत समिती में आये हुये सुंधा पर्वत पर है , वह भी भीनमाल से २४ मील रानीवाडा से १४ मील और जसवंतपुरा से ८ मील दूर है । सुंधा पर्वत की रमणीक एवं सुरम्य घाटी में सांगी नदी से लगभग ४०-४५ फीट ऊँची एक प्राचीन सुरंग से जुडी गुफा में अषटेश्वरी माँ चामुण्डा देवी जी का पुनीत धाम युगो युगो से सुसोभित है , इस सुगंध गिरी अथवा सौगंधिक पर्वत के नाम से लोक में " सुंधा माता " के नाम से विख्यात है , जिनको देवल प्रतिहार अपनी कुलदेवी के रूप में पूजा अर्चना करते है ।।
वंश - अग्निवंश
गोत्र - कपिल


कुलदेवी - चामुण्डा देवीImage result for चामुण्डा देवी ( सुंधा माता)
 ( सुंधा माता)
वरदेवी - गाजन माता
कुलदेव - विष्णुभगवान
*******************

लोहार(विश्वकर्मा) जाति का इतिहास



 
 प्राप्त साक्ष्यों तथा कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी इतिहासकारों के लिए एक ऐसी ऐतिहासिक पुस्तक साबित हुई जिसके अनुसार यह ज्ञात हो सका की लोहारों (विश्वकर्मा वंशीय)का वंश भी शासन प्रभुता में आगे रहा है यह हिन्दू शासन कश्मीर राज्य मे सन 1003 से 1159 तक लगभग 150 सालों तक चला जो अंतिम हिन्दू शासन कहलाया।
 लोहार भारत में पाई जाने वाली एक व्यावसायिक जाति है. इन्हें लुहार, लोहरा और पांचाल के नाम से भी जाना जाता है. झारखंड में लोहार को स्थानीय रूप से लोहरा या लोहारा के नाम से जाना जाता है. प्राचीन काल से ही लोहा या इस्पात से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं को बनाना इनका पारंपरिक कार्य रहा है. इसीलिए इन्हें लोहार कहा जाता है. यह हथोड़ा, चीनी और भाथी आदि औजारों का प्रयोग करके दरवाजा, ग्रिल, रेलिंग, कृषि उपकरण, बर्तन और हथियार आदि बनाते हैं. अधिकांश लोहार अभी भी धातु निर्माण के अपने पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े हुए हैं. हालांकि यह जीवन यापन के लिए खेती बारी तथा अन्य काम धंधा भी करने लगे हैं. प्राचीन काल से ही इनका समाज में महत्वपूर्ण स्थान रहा है. यह आम लोगों के लिए कृषि उपकरण तथा घर में प्रयोग किए जाने वाले सामान बनाते थे. साथ ही यह राजा महाराजा के सेनाओं के लिए हथियार बनाते थे. आइए जानते हैं लोहार समाज का इतिहास, लोहार शब्द की उत्पति कैसे हुई?

लोहार किस धर्म को मानते हैं?

धर्म से यह हिंदू, मुसलमान या सिख हो सकते हैं. भारत में निवास करने वाले अधिकांश लोहार हिंदू धर्म को मानते हैं. यह भगवान विश्वकर्मा और हिंदू अन्य देवी देवताओं की पूजा करते हैं. धार्मिक आधार पर हिंदू लोहार को विश्वकर्मा के रूप में जाना जाता है, जबकि मुस्लिम लोहार सैफी कहलाते हैं। यह भगवान विश्वकर्मा के वंशज होने का दावा करते हैं.

लोहार समाज के उपनाम

अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग उपनाम है. बिहार और उत्तर प्रदेश में के प्रमुख उपनाम विश्वकर्मा और ठाकुर हैं. दिल्ली में इनके उपनाम हैं -लोहार, मिस्त्री और पांचाल. लोहार जाति दो उप समूहों में विभाजित है-
गाडिया लोहार और 
मालविया लोहार.

लोहार जाति की जानकारी का विडिओ 


गाड़िया लोहार समुदाय को गाडुलिया लोहार या सिर्फ लोहार भी कहा जाता है. गाड़िया लोहार राजस्‍थान और उत्तर प्रदेश का खानाबदोश समुदाय है. ये मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में भी पाए जाते हैं. ये लोहे के बर्तन और घरों में इस्‍तेमाल होने वाले औजार बनाकर गुजर-बसर करते हैं. इसके अलावा ये समुदाय कृषि और बागवानी में इस्‍तेमाल होने वाले छोटे औजार भी बनाते हैं.

हिंदू लोहार जाति के प्रमुख गोत्र

हिंदू लोहार जाति के प्रमुख गोत्र इस प्रकार हैं- बडगुजर, तंवर, चौहान, सोलंकी, करहेड़ा, परमार भूंड, डांगी, पटवा, जसपाल, तावड़ा, धारा, शांडिल्य, भीमरा और भारद्वाज.

लोहार किस कैटेगरी में आते हैं?

हिमाचल प्रदेश में तारखान और लोहार दो जातियां हैं. सिख लोहार को तारखान के नाम से जाना जाता है, और इन्हें ओबीसी जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है. यहां लोहार जाति को अनुसूचित जाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. उत्तर प्रदेश में इन्हें ओबीसी जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है. धार्मिक आधार पर हिंदू लोहार को विश्वकर्मा के रूप में जाना जाता है, जबकि मुस्लिम लोहार सैफी कहलाते हैं।आरक्षण व्यवस्था के तहत इन्हें बिहार राज्य में अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है.
 लोहार वंश के संस्थापक संग्रामराज थे वे  बड़े न्याय प्रिय उदारवादी राजा थे उनके साशन काल में प्रजा सुख-चैन से दिन व्ययतीत कर रही थी किसी भी प्रकार का अभाव व विकार लोगों में नहीं था।उनके बाद राज सिंहासन अनंतराज को मिला जिन्होंने अपनी वीरता धीरता शौर्यता के बल पर अपने शासन काल में सामन्तों के विद्रोह को छिन्न-भिन्न कर के धराशायी कर दिया तथा अपने सासन क्षेत्र का विस्तार भी किया सासन सत्ता सुचारू रूप से कायम करने में लगभग सफल रहे ।अनंतराज की धर्मपत्नी रानी सूर्यमति में कुशल रानी के गुण विद्यमान तो थे ही साथ साथ कुशल राजनीतिज्ञ व् नेतृत्वकर्ता के गुण भी कूट कूट कर भरे थे। अनंतराज के शासन में उनकी धर्मपत्नी रानी सूर्यमती पूर्ण रूप से हस्तक्षेप व् सहयोग किया करती थी सभी अहम् मुद्दों पर बराबर विचार विमर्श करती थी तथा उनके द्वारा प्रतिपादित नियम व् कानून अकाट्य सिद्ध होते थे स्वयं राजा अनंतराज व् उनका मंत्रिमंडल भी रानी सूर्यमति द्वारा बनाये नियम कानून में कभी कोई कमी नहीं निकाल पाता था ज्यो का त्यों लागू कर दिया जाता था। अनन्तराज के पुत्र कलश थे जिन्होंने कुछ विशेष कार्य नहीं किये कुशल राजा व् नेतृत्व न होने के कारण शासन सत्ता कमजोर क्षीण होती गई जिससे अनंत राज द्वारा विस्तारित क्षेत्र व् राज्य कमजोर होता गया ।
राजा कलश के पुत्र हर्षदेव महाविद्वान,प्रखर बुद्धि,दार्शनिक,कवि थे तथा उनमे कुशल राजा के गुण विद्यमान थे उनको कई विभिन्न भाषाओं एवं विद्याओं का भी ज्ञान था। हर्षदेव धीरे धीरे सासन सत्ता में इतने मुग्ध हो गए उन्हें प्रजा के दुःख सुख से मोह ख़त्म होता गया राज्य में अशांति व्याप्त हो गई भयानक अकाल पड़ गया किसानों साहूकारों से अत्यधिक कर वसूला जाने लगा कर या लगान न देने पर राजा के सैनिको द्वारा कई अलग अलग तरह से दंड का प्रावधान किया जाने लगा जिससे प्रजा आतंकित हो गई।राजा हर्षदेव के अत्याचारपूर्ण कार्यो से त्रस्त होकर उत्सल एवं सुस्सल नामक भाईयों ने राजा हर्ष देव के खिलाफ विद्रोह कर दिया अशान्ति,भुखमरी,दमन,अत्याचार के कारण शुरू हुए विद्रोह में लगभग 1101 ई. में राजा हर्षदेव तथा उनके पुत्र भोज की हत्या कर दी गयी।
 हर्षदेव को कश्मीर के 'नीरो' की संज्ञा भी दी गयी है। नीरो  रोम का अत्याचारी सासक था पुरे राज्य में आग लगी थी खुद खड़ा होकर सारंगी बजा रहा था कहा जाता है आग खुद नीरो ने लगवाई थी)
राजतरंगिणी के लेखक कल्हण राजा हर्षदेव के आश्रित कवि थे और राजतरंगिणी एक निष्पक्ष और निर्भय ऐतिहासिक कृति है। स्वयं कल्हण ने राजतरंगिणी में कहा है कि एक सच्चे इतिहास लेखक की वाणी को न्यायाधीश के समान राग-द्वेष-विनिर्मुक्त होना चाहिए, तभी उसकी प्रशंसा हो सकती है
श्लाध्य: स एव गुणवान् रागद्वेषबहिष्कृता।
भूतार्थकथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती॥ (राजतरंगिणी, १/७)
इस लिए यह माना जा सकता है कि कल्हण द्वारा रागतरंगिनी में तत्कालीन राजाओं का जो भी वर्णन मिलता है वह किंचित मात्र भी विचलित करने वाला नहीं है।
कल्हण जाति से ब्राह्मण था उसके पिता का नाम चम्पक था। चम्पक लोहार वंशीय राजा हर्ष के मन्त्री थे तथा कल्हण हर्ष का आश्रित कवि था। उस समय लोहार वंशीय राजा जयंसिह का शासन काल कश्मीर मे चल रहा था।
लोहार वंश का अन्तिम शासक राजा जयसिंह (1128-1155 ई.) थे।उन्होंने अपने युद्ध कला कौशल से यूनानी मूल के यवनों को परास्त किया था तथा राज्य की सीमा विस्तार शुरू कर दिया। जयसिंह कश्मीर में हिन्दू वंश तथा लोहार वंश के अंतिम शासक के रूप में जाने जाते हैं जय सिंह राजतरंगिणी के आखिरी सासक हैं।इसके बाद तुर्क शासकों का इतिहास प्राप्त होता है
कश्मीर में अंतिम हिन्दू लोहार वंश के लगातार आठ राजाऒ का वर्णन मिलता है जिनके नाम निम्नवत हैं
1-संग्रामराज
2-अनन्तदेव
3-कलशदेव
4-हर्षदेव
5-उच्छ्ल
6-सुस्सल
7-शिक्षाचर
8-जयसिंह आदि थे

इन हिन्दू लोहार वंशीय (विश्वकर्मा वंशीय)राजाओं ने मिलकर लगभग157 वर्ष तक जम्मू- कश्मीर मे शासन किया।

  बिहार राज्य मे लोहार जाती को अनुसूचित जाती  मे शामिल कर लिया गया है| कुछ राज्यों मे लोहार पिछड़े वर्ग मे माने जाते हैं|
केंद्र व राज्य सरकार वंश परंपरागत कारीगर समाज के उन्नति के लिए विश्वकर्मा कारीगर आयोग तथा विश्वकर्मा कारीगर विकास बोर्ड का गठन करे। सरकार वंश परंपरागत कारीगर समाज के बच्चों के लिए विश्वकर्मा टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय तथा विश्वकर्मा छात्रावास का निर्माण कराये। सरकार सरकारी संस्था और सरकारी भवनों का एवं मार्ग, चौक का नामकरण भगवान विश्वकर्मा के नाम पर नामांकन करे। कहा कि विश्वकर्मा समाज के अधिकार, सम्मान और गौरव को बचाने के लिए पूरे देश के विश्वकर्मा समाज को एकजुट होकर बड़ी सामाजिक ताकत और राजनीतिक ताकत बनानी होगी।


बूढ़ा निवासी श्री बद्रीलाल जी लोहार विश्वकर्मा समाज को आगे बढ़ाने के लिए युवकों को  कृषि यंत्रों  के उद्धयोग लगाने  के लिए भरपूर सहयोग और आर्थिक मदद कर रहे हैं|
Disclaimer: इस content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे|अगर आपको हमारा कंटेंट पसंद आता है तो कमेंट करें, लाइक करें और शेयर करें। धन्यवाद
*******************

सुथार जाति(जांगीड ब्राह्मण) का इतिहास ,suthar jati ka itihas





सुतार जाति की उत्पत्ति भारत में हुई थी और यह बढ़ईगीरी और लकड़ी के काम से जुड़ी हुई है. सुतार जाति के लोग भारत के अलग-अलग हिस्सों और विदेशों में बसे हुए हैं.
विश्वकर्मा एक भारतीय उपनाम है जो मूलतः शिल्पी लोगों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। विश्वकर्मा वंशज मूल रूप से ब्राह्मण होते हैं विश्वकर्मा पुराण के मुताबिक विश्वकर्मा जन्मों ब्राह्मण: मतलब ये जन्म से ही ब्राह्मण होते हैं

सुतार जाति से जुड़ी कुछ खास बातें:
सुतार जाति के लोग विश्वकर्मा समुदाय के अंतर्गत आते हैं.

सुतार जाति के लोग मुख्य रूप से गुजरात और राजस्थान में पाए जाते हैं.

सुतार जाति के लोग वैष्णव धर्म को मानते हैं और उनके कुलदेवता विष्णु हैं.

सुतार जाति के लोगों का गोत्र भारद्वाज है.

सुतार जाति के लोगों का पारंपरिक व्यवसाय बढ़ईगीरी है.

सुतार जाति के लोगों का प्रवास और बसावट का इतिहास दिलचस्प है.

सुतार जाति के लोगों का प्रवास जबरन और स्वैच्छिक दोनों तरह से हुआ है.

सुतार जाति के लोगों का प्रवास व्यापार, शिक्षा, और बेहतर अवसरों की तलाश के लिए हुआ है.

सुथार की उत्पत्ति कैसे हुई थी?

सुथार जाति का इतिहास (सुथार जाति समाज का इतिहास) उस समय से शुरू होता है जब मूलराज सोलंकी ने 10वीं शताब्दी के मध्य में गुजरात में सोलंकी राजवंश की स्थापना की थी। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, राजा मूलराज ने 989 विक्रम संवत में रुद्र महालया मंदिर की आधारशिला रखी थी
 
 सुथार शब्द का प्रयोग ज्यादातर राजस्थान में ही किया जाता है। इनकी आबादी भारत में 7.3 करोड़ के आस पास पाई जाती है। इनके कुल देवता विष्णु है तथा ये वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखते है।
 सुतार या सुथार भारतीय उपमहाद्वीप के विश्वकर्मा समुदाय के भीतर एक हिंदू जाति है। उनका पारंपरिक व्यवसाय खेती, वास्तुकला और आंतरिक डिजाइन है। हिंदू  सुथारों का बड़ा हिस्सा वैष्णव संप्रदाय से संबंधित है। विश्वकर्मा को उनके संरक्षक देवता के रूप में माना जाता है।
सुथार कौन से वर्ग में आते हैं?
सुथार स्वयम को ब्राह्मण बताते हैं शर्मा लिखते हैं ।
शर्मा और विश्वकर्मा में क्या अंतर है?

वेदों के अनुसार सुतार  विश्वकर्मा ब्राह्मण हैं, और सबसे योग्य हैं, क्योंकि वे धार्मिक अनुष्ठान और तकनीकी कार्य दोनों कर सकते हैं। वेदों के अनुसार, यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि शर्मा उपनाम का उपयोग केवल उस ब्राह्मण द्वारा किया जा सकता है जिसके पास तकनीकी ज्ञान है।
विश्वकर्मा एक भारतीय उपनाम है जो मूलतः शिल्पी लोगों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। विश्वकर्मा वंशज मूल रूप से ब्राह्मण होते हैं विश्वकर्मा पुराण के मुताबिक विश्वकर्मा जन्मों ब्राह्मण: मतलब ये जन्म से ही ब्राह्मण होते है
विश्वकर्मा ब्राह्मण श्रेष्ठ क्यों है?
विश्वकर्मा जी को समस्त सृष्टि का सृजनकर्ता माना जाता है । इसी कारण से उनके वंशजों के प्रति भी सम्मान प्रकट करने के लिए उन्हे विश्व ब्राह्मण की उपाधि से सम्मानित किया गया है 
विश्वकर्मा जाति की उत्पत्ति कैसे हुई थी?

धर्मग्रंथों में विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी का वंशज माना गया है। ब्रह्माजी के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव थे, जिन्हें शिल्प शास्त्र का आदि पुरुष माना जाता है। इन्हीं वास्तुदेव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ।

विश्वकर्मा किसकी संतान है?
सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा की सातवीं संतान भगवान विश्वकर्मा को माना जाता है। कुछ धर्म ग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा को महादेव का अवतार बताया गया है। मान्यता के अनुसार, विश्वकर्मा जी ने भगवान श्रीकृष्ण के लिए द्वारका नगरी का निर्माण किया था।
जाति कर्म धर्म के अनुसार सुथार समाज जांगिड ब्राह्मण है।
विश्वकर्मा समुदाय भारत का एक सामाजिक समूह है, जिसे कभी-कभी जाति के रूप में वर्णित किया जाता है। वे खुद को ब्राह्मण या जाति पदानुक्रम में उच्च-स्थिति का होने का दावा करते हैं, हालांकि ये दावे आम तौर पर समुदाय के बाहर स्वीकार नहीं किए जाते हैं ।
पौराणिक दृष्टि से सुथार अंगिरा ऋषि की संतान है। अंगिराऋषि ब्राह्मार्षि थे। दिग्विजयी प्रतापी होने के कारण इन्हे जांगिड कहा गया । अंगिरा ऋषि(अंगिरसो) के आश्रम जांगल देश मे थे इसलिये भी अंगिरस स्थान के नाम से जांगिड कहलाये। आदि शिल्पाचार्य भुवन पुत्र विश्वकर्मा देवों के शिल्पी होने से जाँगिड कहलाये। विश्वकर्मा जी अंगिराकुल के होने के कारण वंश परम्परा से सुथारों के  प्रेरक गुरु और भगवान है।

 दिल्ली से 11 मील की दूरी पर कुतुबमीनार के पास सती मठ मे लगा हुआ 460 वर्ष पुराना शिलालेख मिला है। इस पुरावशेष मे जांगिड ब्राह्मण वंश की सतियों का  परिचय खुदा हुआ है।

सम्पूर्ण भारत के 41 विख्यात पंडितो ने संवत १९७७ की दीपावली को काशी मे यह निर्णय लिया कि जांगिड ब्राह्मण जाति वास्तव मे ब्राह्मण है।

ब्रह्मा अर्थात ब्राह्मण होने के कारण अंगिरा वंशी जांगिड, जांगिड ब्राह्मण कहलाये।

सायणाचार्य ने अंगिरा ऋषि को ही जंगिड ऋषि माना है।  वेद या ब्राह्मण ग्रन्थ अथवा प्राचीन भाष्यकारों और पाश्चात्य यूरोपियन समीक्षक  सभी  ने एक मत से यही स्वीकार किया है कि अंगिरा ऋषि का ही दूसरा प्रमाणित नाम जांगिड है।

अग्नि (पवित्र आग ) को खोज निकालने वाले अंगिरस ऋषि कहे गये है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार सुतार  विश्वकर्मा के पुत्र मय के वंशज बढ़ई हैं। ऋग्वेद के अनुसार विश्वकर्मा ब्रह्मांड के दिव्य इंजीनियर हैं। 
सुथारों का गोत्र राठौर (राठौड़), चौहान, परमार, सोलंकी, भाटी, तंवर , सिसोदिया आदि है । 
सुथार समाज, विश्वकर्मा, जांगिड़, खाती, शर्मा और अन्य कई नामों से जाना जाता है। एक ही परिवार में अलग-अलग नामों से लगा कर जाने जाते हैं। 
सुथार की कुछ उपजातियाँ राजस्थान हरियाणा , [गुजरात जैसे राज्यों में ओबीसी के रूप में वर्गीकृत हैं

क्या बढ़ई जाति ब्राह्मण है?

अनुग्रह नारायण शोध संस्थान पटना के द्वारा सर्वेक्षण कर रिपोर्ट बिहार सरकार को  दिया था। शोध संस्थान द्वारा दिए गए रिपोर्ट में बढ़ई जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने की बात स्पष्ट लिखी हुई है। जबकि देश के सात राज्यों में इस समाज को अनुसूचित जाति में शामिल किया जा चुका है।
सुतार कौन सी कैटेगरी में आते हैं?
सूत्रधार, जिन्हें सुतार या सुथार के नाम से भी जाना जाता है, ये वास्तु शास्त्र के चार वास्तुकारों में से एक हैं। इनका पारंपरिक व्यवसाय काष्ठकारी(Carpentry) है।
भारत में विश्वकर्मा जाति की संख्या कितनी है?

भारत में  में विश्वकर्मा समाज की जनसंख्या साढ़े सात करोड़ है। आज तक यह समाज लोहार, बढ़ई, सोनार, शिल्पकार आदि में बंटे होने के कारण अपनी पहचान नहीं बना पाया है।
विश्वकर्मा जाति के 5 वर्ग कौन से हैं?
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना में 14 जातियो को उल्लेखित किया गया है, जबकि विश्वकर्मा समाज में पांच ही जाति बढ़ई, लोहार स्वर्णकार, कसेरा एवम ठठेरा है।



 

 

सुनार,स्वर्णकार जाति का इतिहास



सुनार समाज के आदिपुरुष महाराज  अजमीढजी
सुनार जाति, भारत और नेपाल में पाई जाने वाली एक जाति हैये लोग सोने, चांदी, और अन्य बहुमूल्य धातुओं से आभूषण बनाते हैं. सुनार जाति के लोगों को स्वर्णकार, सोनी, सोनार, सिंह, शाह, सोनकर जैसे नामों से भी जाना जाता है. 
सुनार जाति से जुड़ी खास बातें:
  • सुनार जाति के लोग मूल रूप से क्षत्रिय वर्ण में आते हैं. 
  • सुनार जाति के लोग हिन्दू, बौद्ध, ईसाई, मुस्लिम धर्म को मानते हैं. 
  • सुनार जाति के लोग सोने-चांदी, बहुमूल्य रत्नों का व्यापार भी करते हैं. 
  • सुनार जाति के लोग गहने गिरवी रखकर ब्याज़ पर पैसे भी देते हैं. 
  • सुनार जाति के लोगों के पास कई उपजातियां हैं. 
  • सुनार जाति के लोग अपने पूर्वजों के धार्मिक स्थान की कुलपूजा करते हैं. 
  • सुनार जाति के लोग खेती भी करते हैं. 
  • सुनार जाति के लोग सात प्रकार के शुद्ध व्यापार भी करते हैं. 

 सुनार अपने पुर्वजो के स्मृति स्थान की कुलपूजा करते है। यह जाति हिन्दूस्तान की मूलनिवासी जाति है। मूलत: ये सभी क्षत्रिय वर्ण में आते हैं इसलिये ये क्षत्रिय सुनार भी कहलाते हैं। आज भी यह समाज इस जाति को क्षत्रिय सुनार कहने में गर्व महसूस करता हैं।
इतिहास-

सदियों पुर्व हमारे पुर्वजों को भी केवल यही ज्ञात था की हम मैढ क्षत्रिय स्वर्णकार राजपुत क्षत्रियों से संबधित है । हमारे पुर्वज कौन थे? कहां थे? कैसे थे? यह किसी को ज्ञात नही था । और आज भी लगभग ऐसी ही स्थीती है 

 हम मैढ क्षत्रिय कहलाते है ,क्यों ?
 हमारे पुर्वज कौन थे और अन्य समाज हमे हैय दृष्टी से क्यों देखती थी क्या अज्ञान व अशिक्षा अथवा सामाजिक कुप्रथा मात्र ही इसका कारण है , । इस प्रकार के अनेकानेक प्रश्नों का समाधान के लिए मुलचंद आर्य अजमेर से इन्होने 15-20 वर्ष सतत प्रयास किया और हमारे शुध्द क्षत्रिय होने का प्रमाण अनेक धार्मिक व एतिहासीक ग्रन्थोंसे प्राप्त कर के मैढ मीमांसा यह ग्रंथ प्रकाशित किया ।
यह सर्वविवादीत है की हमारा  इस समाज के 90 प्रतिशत लोग स्वर्ण कलाकार के नाम से विश्वविख्यात है । धन्धे से किसी जाती का निर्धारण करना असंभव है ।आज 21वी सदी है और भारतीय संविधान के अनुसार हर वर्ण-वर्ग, जाती का व्यक्ति आजिवीका हेतु कोइ भी उद्योग कर सकता है । कहने का तात्पर्य है, स्वर्णकार का काम सदियों से दुसरे जाती के लोग भी करते आए है यथा ब्राम्हण, खाती, जाट, बनिये, कुम्हार, मुसलमान, सरावगी, बंगाली, सिन्धी, पंजाबी, गुजराती, श्रीमाली, आदी अन्यान्य कई वर्ग के स्वर्णकारी काम करते है इससे यह नही कहा जा सकता कि स्वर्णकार एक जाती है बल्की एक व्यवसाय है ।
सुनार चन्द्रवंशीय है तथा मैढ क्षत्रिय हमारी जाती है इसका प्रमाण महाभारत के शान्तीपर्व राजधर्म प्रकाश अध्याय 49 के 83 से 87 श्लोकों के अनुसार है ।
इसका अतिरीक्त अंग्रेजोने भी सन 1901 मे यह स्वीकार किया था कि मैढ क्षत्रिय स्वर्णकार चन्द्रवंशीय क्षत्रिय है । काशी व जयपुर के भोज मन्दिर की धर्म व्यवस्था मे भी मैढों को क्षत्रिय स्वीकार किया गया है ।
समस्त भारत के ब्राम्हण, रईस व जागीरदार लोगों के हस्ताक्षर युक्त प्रमाण हमारे पास है जिसके अनुसार मैढ द्विज है । ये स्वर्णकारों का पेशा करते है पर इन्हे चौधरी या प्रधानजी कहकर पुकारते है । यह दरसल मैढ राजपुत है ।
वैसे भारत वर्ष की प्राय सभी जातीयों का इतिहास अन्धकारमय है तथापि महाभारत, विष्णुपुराण, भागवत, व कर्नल टाड  संपादित राजस्थान का इतिहास आदी ग्रन्थों के देखने से स्पष्ट होता है कि जन्मानुसार मैढ स्वर्णकार की जाती क्षत्रिय है ।

व्यवहारिक प्रमाण –
1 . प्राय गावों व शहरों मे मैढ स्वर्णकारों को वहां के निवासी श्रध्दाभाव से देखते है, जैसे ठाकुरों को तथा उन्हे सोनी राजा कहकर संबोधित करते है जो की क्षत्रिय होने का प्रमाण है ।
हमारी जाती के गोत्र उपगोत्र (नख) अन्य राजपुतों का गोत्रों से मिलते जुलते है (देखिये मैढ कुल दर्शन लेखक प्रो. नारायणप्रसादजी वर्मा )
हमारी जाती स्वयं का ओरमे मां, दादी, नानी का गोत्र छोडकर विवाह संबंध होता है, कही कही कन्या या वर के अभाव मे दो नखों मे भी इस भौतिक युग मे संबंध होने लगे है और राजपुत समाज मे भी ऐसी प्रथा प्रचलित हो गयी है ।
हमारे यहां जन्मोत्सव के समय पर कमानगर शकुन के लिए तीर कमान लेकर आते है
पाणिग्रहण-संस्कार के पश्चात् जब वर वधु को लेकर गृह प्रवेश के समय तलवार से अडचनों को दुर करता करता वधु को माताजी (देवी माता ) के पास सर्व प्रथम ले जाकर ज्योती (पुजा) अर्चना करते है । स्त्रियां भी गीत गाते समय सोनी राजा या कंवर और आदी शब्दों का उच्चारण करती है जो की केवल राजपुत समाज मै ही प्रचलित था एवं अब भी है ।
हमारे जागे, भाट-पुरोहीत, पंडे होते है जो वंशानुसार चले आते हैतथा हमारी ही गुणगान व बल वैभव का बखान करते हुए अपनी आजिवीका सदियों से चलाते आये है (अनेक नगरों मे अभी भी ढाडीयों के वंश आज भी मौजुद है जो शुभ कार्यों मे समाज से भेंट लेते है । हरीद्वार के पंडो के पास भी अनेक प्रमाण मिलते है ।
सुनार जाती के 80 प्रतिशत लोग दशहरे के दिन तलवार घोडे तथा अपने औजारों व कलम दवात शस्त्र आदी का पुजन करते है।    
8. राजपुत के भांति हमारे समाज मे माताजी की मान्यता ज्यादा है तथा मेढ क्षत्रिय माताजी के बडे भक्त होते है तथा वर्ष के दोनो नवरात्री के व्रत करते है
हमारी समाज के अधिकांश लोग माताजी के यहां अपने बच्चे का मुंडन संस्कार कराते है तथा वर वधु को लेकर गरजोडें सहीत जात देते है ।
लोकमानस में प्रचलित जनश्रुति के अनुसार सुनार जाति के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है कि त्रेता युग में परशुराम ने जब एक-एक करके क्षत्रियों का विनाश करना प्रारम्भ कर दिया तो दो राजपूत भाइयों को एक सारस्वत ब्राह्मण ने बचा लिया और कुछ समय के लिए दोनों को मैढ़ बता दिया जिनमें से एक ने स्वर्ण धातु से आभूषण बनाने का काम सीख लिया और सुनार बन गया और दूसरा भाई खतरे को भाँप कर खत्री बन गया और आपस में रोटी बेटी का सम्बन्ध भी न रखा ताकि किसी को यह बात कानों-कान पता लग सके कि दोनों ही क्षत्रिय हैं।आज इन्हें मैढ़ राजपूत के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि ये वही राजपूत है जिन्होंने स्वर्ण आभूषणों का कार्य अपने पुश्तैनी धंधे के रूप में चुना है।
लेकिन आगे चलकर गाँव में रहने वाले कुछ सुनारों ने भी आभूषण बनाने का पुश्तैनी धन्धा छोड़ दिया और वे खेती करने लगे।
वर्ग भेद -
अन्य हिन्दू जातियों की तरह सुनारों मे भी वर्ग-भेद पाया जाता है। इनमें अल्ल का रिवाज़ इतना प्राचीन है कि जिसकी कोई थाह नहीं।ये निम्न 3 वर्गों में विभाजित है,जैसे 4,13,और सवा लाख में इनकी प्रमुख अल्लों के नाम भी विचित्र हैं जैसे ग्वारे,भटेल,मदबरिया,महिलबार,नागवंशी,छिबहा, नरबरिया,अखिलहा,जडिया, सड़िया, धेबला पितरिया, बंगरमौआ, पलिया, झंकखर, भड़ेले, कदीमी, नेगपुरिया, सन्तानपुरिया, देखालन्तिया, मुण्डहा, भुइगइयाँ, समुहिया, चिल्लिया, कटारिया, नौबस्तवाल, व शाहपुरिया.सुरजनवार , खजवाणिया.डसाणिया,मायछ.लावट .कड़ैल.दैवाल.ढल्ला.कुकरा.डांवर.मौसूण.जौड़ा . जवडा. माहर. रोडा. बुटण.तित्तवारि.भदलिया. भोमा. अग्रोयाआदि-आदि। अल्ल का अर्थ निकास या जिस स्थान से इनके पुरखे निकल कर आये और दूसरी जगह जाकर बस गये थे आज तक ऐसा माना जाता है


जनसंख्या के आंकड़े-

सन् 1911 में हिन्दुस्तान के एक प्रान्त मध्य प्रदेश में ही सुनारों की जनसंख्या 96,000 थी और अकेले बरार में 30,000 सुनार रहते थे। सम्पन्न सुनारों की आबादी गाँवों के बजाय शहरों में अधिक थी। .
***********************