लोकसखा पर पढ़ें सटीक जाति इतिहास, पौराणिक कथाएं, मंदिर दर्शन और डॉ. आलोक द्वारा मुक्तिधाम व गौशालों को दान किए गए बेंच व नकद सहयोग की पूरी जानकारी। सनातन आध्यात्म -जाति इतिहास-दान विमर्श

25.1.24

पिंजारा -मंसूरी समाज का इतिहास और जानकारी -Pinjara caste History


पिंजारा समाज, जिसे मंसूरी (Mansoori) भी कहा जाता है, भारत में एक मुस्लिम समुदाय है जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में पाया जाता है. पिंजारा समुदाय का मुख्य व्यवसाय कपास को धुनना, खोलना और साफ करना है.
पिंजारा समाज का इतिहास और उत्पत्ति:
पिंजारा समाज का इतिहास सदियों पुराना है.
कुछ इतिहासकारों के अनुसार, पिंजारा शब्द संस्कृत शब्द "वान" या "वणिक" से आया है, जिसका अर्थ है "व्यापारी" या "वनवासी".
कुछ अन्य लोगों के अनुसार, यह शब्द फ़ारसी शब्द "विरंजन" से आया है, जिसका अर्थ है "सफ़ाई करने वाला".
कुछ पिंजारा समुदाय के लोग मानते हैं कि वे राजपूतों की एक शाखा हैं जो बाद में मुस्लिम बन गए.
औरंगजेब के शासनकाल में, कुछ पिंजारों ने इस्लाम धर्म अपना लिया और बुनाई और कपड़ा बनाने का काम शुरू कर दिया.
बादशाह शहाबुद्दीन गौरी ने भी कुछ हिंदुओं को जबरन मुसलमान बनाया, जिन्हें गोरी पठान कहा जाने लगा, और इनमें से कुछ बाद में पिंजारा समुदाय में शामिल हो गए.
पिंजारा समाज की विशेषताएं:
पिंजारा समुदाय के लोग हिन्दू और मुस्लिम दोनों हो सकते हैं.
पिंजारा महिलाएं पुरुषों के बराबर काम करती हैं और व्यवसाय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
वे कपास खरीदती हैं, उसे धुनती हैं, और उससे बिस्तर, तकिया, कंबल आदि बनाती हैं.
पिंजारा महिलाएं अपनी कमाई का हिसाब रखती हैं और उसे अपनी मर्जी से खर्च करती हैं.
कुछ पिंजारा महिलाएं अब ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि कार्यों में भी संलग्न हैं.
पिंजारा समुदाय में विवाह:
पिंजारा समुदाय में विवाह, समुदाय के भीतर ही होते हैं.
विवाहों में, लड़के और लड़कियों की सहमति का सम्मान किया जाता है.
विवाहों में, लड़के और लड़कियों के माता-पिता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
पिंजारा समुदाय की वर्तमान स्थिति:
पिंजारा समुदाय के लोग आज भी अपने पारंपरिक व्यवसाय को जारी रखे हुए हैं, लेकिन कुछ लोग अन्य व्यवसायों में भी शामिल हो गए हैं.
पिंजारा समुदाय के लोग शिक्षा और जागरूकता के महत्व को समझ रहे हैं और अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं.
पिंजारा समुदाय के लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ने के लिए संगठित हो रहे हैं और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं.

    
पिंजारा किस धर्म को मानते हैं?

यह इस्लाम धर्म को मानते हैं. यह हिंदी, मारवाड़ी, मराठी, कन्नड़ और उर्दू भाषा बोलते हैं. इस समुदाय के ज्यादातर लोग हाल के दिनों तक किसी सरनेम का प्रयोग नहीं करते थे. हालांकि, अब इस समुदाय के अधिकांश खान, पठान आदि उपनामों को लगाने लगे हैं. जबकि अन्य मशहूर फारसी सूफी संत मंसूर अल हल्लाज, जो खुद भी एक बुनकर थे, के नाम पर मंसूरी उपनाम का प्रयोग करते हैं.




 जाति इतिहासविद डॉ . दयाराम आलोक के मतानुसार बादशाह शाहबुद्दीन गौरी ने कुछ हिंदुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया था। ये लोग गौरी पठान कहलाने लगे . पिंजारा जाति के अधिकांश रीति रिवाज हिंदुओंसे मिलते जुलते हैं.इनमे विधवा विवाह प्रचलित है। गांवों मे रहने वाले पिंजारा समाज के लोग खेती का  धंधा कर रहे हैं।  इनका पहनावा हिंदुओं जैसा ही है। अधिकांश लोग सरनेम का प्रयोग नहीं करते हैं लेकिन हाल ही मे ये लोग पठान ,खान उपनामों का प्रयोग करने लगे हैं। कुछ लोग मंसूरी उपनाम लेकर चल रहे हैं। इनकी स्त्रियाँ हिन्दुओ जैसी लगती हैं. पाजामा  बहुत कम पहनती हैं . पुरुष धोती कमीज पहनते हैं.  पिंजारा समाज के लोगों की गोत्र  हिन्दू क्षत्रियों जैसी हैं जैसे  देवड़ा चौहान,भाटी,सोलंकी,पड़िहार,राठौड  आदि . इससे विदित होता है कि  पिंजारा समाज किसी समय हिन्दू  क्षत्रिय समाज  के अंग थे. 

पिंजारा समाज का इतिहास


 पिंजारा समाज मूल रूप से फारस (ईरान) और अफगानिस्तान के रहने वाले थे. यह समुदाय कपास की खेती और उद्योगों के व्यवसाय के उद्देश्य के लिए अफगानिस्तान और फारस से भारत आया था, और यहां आकर बस गया. बता दें कि तब भारत और पाकिस्तान में बंटवारा नहीं हुआ था. इसीलिए यह समुदाय भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में पाया जाता है. इस समुदाय की उत्पत्ति स्थानीय धर्मांतरित लोगों और विदेशियों से हुई है जो मुख्य रूप से फारस अफगानिस्तान और बाहर के अन्य क्षेत्रों से आकर भारतीय उपमहाद्वीप में बस गए. यहां आकर यह पारंपरिक रूप से कपास की खेती और व्यवसाय में शामिल हो गए. कुछ पिंजारा जो इस्लाम में धर्मांतरित होने से उत्पन्न हुए थे, इस बात का दावा करते हैं कि वह मूल रूप से राजपूत वंश के हैं. ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, वह राजा रण सिंह के शासन के दौरान राजस्थान से गुजरात आए थे और यही आकर बस गए. 



आज भी इनमें राजपूतों के समान राव, देवड़ा, चौहान, भाटी वंश पाए जाते हैं. कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह समुदाय का संबंध मूल रूप से अफगानिस्तान से है. इनमें से कुछ राजपूतों से धर्मांतरित मुसलमान हैं. लेकिन उन्हें हिंदू समाज में धूना कहा जाता था. मैसूर राज्य के शासक टीपू सुल्तान और अंग्रेजी गायक और गीतकार जैन मलिक का संबंध इसी समुदाय से है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे। 


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दर्जी समाज का इतिहास क्या है? दर्जी जाती की उत्पत्ति के बारे में बताओ -Darji Samaj history




 दर्जी (Darzi or Darji) भारत, पाकिस्तान और नेपाल के तराई क्षेत्र में पाई जाने वाली एक व्यवसायिक जाति है. कर्नाटक में इन्हें पिसे, वेड, काकड़े और सन्यासी के नाम से जाना जाता है. यह मुख्य रूप से एक भूमिहीन या कम भूमि वाला समुदाय है, जिसका परंपरागत व्यवसाय सिलाई (Tailoring) है. आज भी यह मुख्य रूप से अपने पारंपरिक व्यवसाय में लगे हुए हैं. यह खेती भी करने लगे हैं. साथ ही यह शिक्षा और रोजगार के आधुनिक अवसरों का लाभ उठाते हुए अन्य क्षेत्रों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. भारत के आरक्षण प्रणाली के अंतर्गत हिंदू और मुस्लिम दर्जी दोनों को अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Class, OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है. आइए जानते हैैं दर्जी समाज का इतिहास, दर्जी शब्द की उत्पति कैसे हुई?

दर्जी समाज की धर्म को मानते हैं?

भारत के गुजरात, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाइन्ह महारा , छत्तीसगढ़, उड़ीसा, कर्नाटक, बिहार आदि राज्यों में इनकी अच्छी खासी आबादी है. धर्म से यह हिंदू या मुसलमान हो सकते हैं. हिंदू समुदाय में इन्हें हिंदू दर्जी या क्षत्रिय दर्जी कहा जाता है, क्योंकि इन्हें मुख्य रूप से क्षत्रिय वर्ण का गोत्र माना जाता है. मुस्लिम समुदाय में दर्जी जाति को इदरीशी (हजरत इदरीस के नाम पर) के नाम से जाना जाता है.

दर्जी शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

सिलाई के कार्य से जुड़े होने के कारण इनका नाम दर्जी पड़ा. कहा जाता है कि “दर्जी” शब्द की उत्पत्ति फारसी भाषा के शब्द “दारजान” से हुई है, जिसका अर्थ होता है- “सिलाई करना”. हिंदुस्तानी भाषा में दर्जी का शाब्दिक अर्थ है- “टेलरिंग का काम करने वाला या सिलाई का काम करने वाला’. कहा जाता है कि पंजाबी दर्जी हिंदू छिम्बा जाति से धर्मांतरित हुए हैं, और उनके कई क्षेत्रीय विभाजन हैं जैसे- सरहिंदी, देसवाल और मुल्तानी. पंजाबी दर्जी (छिम्बा दारज़ी‍‌‌) लगभग पूरी तरह सुन्नी इस्लाम के अनुयाई हैं. इदरीसी दर्जी दिल्ली सल्तनत ‌के शुरुआती दौर में दक्षिण एशिया में बस गए थे. यह भाषाई आधार पर भी विभाजित हैं. उत्तर भारत में निवास करने वाले उर्दू, हिंदी समेत विभिन्न भाषाएं बोलते हैं, जबकि पंजाब में रहने वाले पंजाबी भाषा बोलते हैं.




दर्जी समाज का इतिहास

हिंदू दर्जी समुदाय की उत्पत्ति के बारे में भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग किंवदंतियां प्रचलित हैं. राजस्थान में निवास करने वाले दर्जी राजपूत से अपनी उत्पत्ति का दावा करते हैं और खुद को लोकनायक श्री पीपा जी महाराज का वंशज बताते हैं, जो बाद में भारत में भक्ति आंदोलन के दौरान संत बन गए. जैसे-जैसे समय बीतता गया, कई कारणों से इस समुदाय के लोग अपने मूल स्थान से रोजी-रोटी की तलाश में शहरों में चले गए और इस तरह से पूरे भारत में फैल गए. भारत में निवास करने वाले हिंदू दर्जी अनेक कुलों में विभाजित हैं. इनके प्रमुख कुल हैं- काकुस्त, दामोदर वंशी, टाँक , रोहिल्ला, जूना गुजराती. उड़ीसा में यह महाराणा, महापात्र आदि उपनामो का प्रयोग करते हैं. मुस्लिम दर्जी कुरान और बाइबिल में वर्णित हजरत इदरीस (Prophet Idris) के वंशज होने का दावा करते हैं. इनकी मान्यताओं के अनुसार, हजरत इदरीस सिलाई का काम सीखने वाले पहले व्यक्ति थे. उनका मानना है कि हजरत इदरीसी असली शिक्षक थे, जिनसे उनके पूर्वजों ने सिलाई की कला सीखी थी. उत्तर प्रदेश में निवास करने वाले मुस्लिम दर्जी खय्यात के नाम से भी जाने जाते हैं. 
                      दामोदर वंशी  क्षत्रीय दर्जी समाज 

  जाति इतिहास लेखक डॉ.दयाराम आलोक के मतानुसार दामोदर वंशीय दर्जी समाज की गोत्र क्षत्रियों की हैं इसलिए माना जाता है कि इनके पूर्वज क्षत्रिय थे। इस समुदाय को दामोदर वंशी दर्जी से संबोधित किया जाता है। इस समाज मे नया गुजराती और जूना गुजराती के दो समुदाय अस्तित्व मे हैं। यह दर्जी समुदाय गुजरात मे मुस्लिम शासकों के अत्याचार और जबरन धर्म परिवर्तन के लिए दवाब के चलते अपने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए जूनागढ़ ,लिमड़ी ,जामनगर आदि स्थानों से भागकर मध्य प्रदेश और राजस्थान मे आकर बस गया । इंदौर ,उज्जैन,रतलाम मे दामोदर वंशी जूना गुजराती ज्यादा संख्या मे हैं। नया गुजराती दामोदर वंशी क्षत्रिय दर्जी समाज संख्या के हिसाब से बहुत छोटा है और अधिकांशत: ग्रामीण क्षेत्रों मे बसा हुआ है लेकिन  बदलते  समय से तालमेल बिठाने के लिए धीरे धीरे यह समुदाय शामगढ़ ,भवानी मंडी ,रामपुरा, डग ,मंदसौर आदि कस्बों का रुख कर रहा है। नया और जूना गुजराती दर्जी समाज मे फिरका परस्ती छोड़कर परस्पर विवाह होने की कई घटनाएं प्रकाश मे आई हैं,
दर्जी समाज की सबसे बड़ी वेब साइट 


है |जिसकी पाठक संख्या पाँच लाख से ज्यादा हैं| इस वेबसाईट मे दर्जी समाज के सभी समुदायों की जानकारी और  वंशावली मौजूद है| इसके

संपादक डॉ . दयाराम जी आलोक9926524852  अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ के अध्यक्ष हैं| 

  देसाई दर्जी समाज गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों मे आबाद है। इनकी गोत्र क्षत्रियों की हैं जैसे चौहान,राठोड ,परमार,गोहील  आदि। माना जाता है कि  इनके पूर्वज क्षत्रिय  थे। दाहोद ,लिमड़ी ,झाबुआ,रानापुर  क्षेत्र मे  बसे  दर्जी समाज  के लोग  दामोदर वंशी  हैं और इनकी  रिश्तेदारी  मालवा  और गुजरात के दर्जी समुदाय मे पाई जाती  है। 

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20.1.24

151 मंदिरों तक सेवा का संकल्प: बसई शिव हनुमान मंदिर में दान की नई कहानी

  



चम्बल के किनारे आस्था और सेवा का संगम - बसई का शिव हनुमान मंदिर

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के छोटे से ग्राम बसई में, जहाँ चम्बल नदी अपनी कल-कल धारा के साथ बहती है, वहाँ स्थित है एक अत्यंत रमणीय और जाग्रत स्थल - श्री शिव हनुमान मंदिर।

नदी के विहंगम दृश्य के बीच बना यह मंदिर केवल पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि ग्रामीणों की अटूट आस्था का प्रतीक है। यहाँ शिव और हनुमान जी के एक साथ दर्शन कर भक्तों को अलौकिक शांति का अनुभव होता है।

इसी पावन स्थल पर भक्तों की सुविधा के लिए एक छोटा सा सेवा प्रयास किया गया है। दामोदर पथरी चिकित्सालय, शामगढ़ के माध्यम से समाजसेवी सेवानिवृत्त अध्यापक डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा मंदिर परिसर में दर्शनार्थियों के बैठने हेतु 3 सीमेंट की बेंचें सप्रेम भेंट की गई हैं।

यह दान केवल बेंचों का दान नहीं, बल्कि डॉ. आलोक जी द्वारा संकल्पित 'आध्यात्मिक दान-पथ' का एक पड़ाव है, जिसके अंतर्गत वे अपनी पेंशन एवं स्व-अर्जित राशि से मालवा- मेवाड़ के 151 से अधिक मंदिरों, मुक्तिधामों और गौशालाओं में इस प्रकार की सेवा कर रहे हैं।

आइए, इस लेख में दर्शन करते हैं चम्बल तट के इस दिव्य धाम के और इस निस्वार्थ सेवा भावना के।

जय शिव हनुमान!

चम्बल किनारे बसई ग्राम में श्री शिव हनुमान मंदिर  में 

दामोदर  पथरी चिकित्सालय  शामगढ़  द्वारा 

भक्तों के बैठने के लिए सीमेंट की बेंचें  भेंट 


मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के बसई गाँव में स्थित शिव हनुमान मंदिर वास्तव में एक अद्वितीय और आकर्षक स्थल है!
चम्बल नदी के किनारे स्थित इस मंदिर की संरचना और स्थानीय लोगों की भक्ति देखकर मन खुश होता है.
मंदिर के दर्शनार्थियों को शिव हनुमान की प्रतिमाओं के दर्शन के साथ चम्बल नदी का विहंगम दृश्य देखने का अवसर मिलता है.
डॉ. दयाराम आलोक जी शामगढ़ का आध्यात्मिक दान अनुष्ठान और मंदिर समिति के प्रमुख पांडे जी की की सक्रियता इस स्थल को और भी महत्वपूर्ण बनाती है.
दान पट्टिका की स्थापना लोगों को दान की प्रेरणा देने के लिए एक अच्छा कदम है.
यह स्थल पर्यटन और आध्यात्मिक अनुभव के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है.
जय शिव हनुमान!
 

शिव हनुमान मंदिर बसई में बेंचें लगने का दृश्य 






समाजसेवी 

डॉ.दयाराम जी आलोक

शामगढ़ का


आद्यात्मिक दान-पथ

  साहित्य मनीषी  डॉ.दयाराम जी आलोक  राजस्थान और मध्यप्रदेश के 
मंदसौर,आगर नीमच ,झालावाड़ ,रतलाम और झाबुआ जिलों के  मंदिरों ,मुक्ति धाम और  गौशालाओं में निर्माण व विकास  हेतु नकद और  आगंतुकों के बैठने  हेतु  सीमेंट की बेंचें दान देने का अनुष्ठान संपन्न कर रहे हैं.
 डॉ.आलोक जी  एक  सेवानिवृत्त अध्यापक हैं और वे अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि दान करने के संकल्प के साथ  आध्यात्मिक दान-पथ  पर अग्रसर हैं . 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था उन्नत करने  हेतु  सीमेंट  बेंचें और रंग रोगन के लिए नकद दान के अनुष्ठान में  आपकी वो राशि भी शामिल है जो  google कंपनी से उनके ब्लॉग  और  You tube चैनल  से  प्राप्त होती  है| समायोजित दान राशि और सीमेंट बेंचें  पुत्र डॉ.अनिल कुमार राठौर "दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ "के नाम से समर्पित हो रही हैं.



शिव हनुमान मंदिर बसई  को 

 ३ सीमेंट बेंचें समर्पित 



शिव हनुमान मंदिर बसई का विडियो 


विडियो  बसई के शिव हनुमान मंदिर का 


मंदिर के शुभचिंतक- 

जगदीश जी पाण्डेय  पुजारी  ९७७००-११३५१ 

 पंकज  जी मान्दलिया  8085144186 

राजेंद्र जी  पाण्डेय  ९७५४७८३१४५ 

डॉ.अनिल कुमार दामोदर s/o डॉ.दयाराम जी आलोक 99265-24852 ,दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ 98267-95656  द्वारा  शिव हनुमान मंदिर बसाई  हेतु दान सम्पन्न  २०/१/२०२४ 
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7.1.24

हनुमान मंदिर ग्राम दसोरिया :भक्तों की आस्था अभिराम :दयाराम जी आसन दान:आगंतुक सुविधा विश्राम :Hanuman Dasoriya

                    


श्री हनुमान मंदिर, गाँव दसोरिया (गरोठ) 
आस्था और सेवा का संगम - दसोरिया धाम


मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले की गरोठ तहसील में स्थित ग्राम दसोरिया एक महत्वपूर्ण और पावन स्थल है। यह गाँव बरडिया अमरा से गरोठ रेलवे स्टेशन को जाने वाली मुख्य सड़क पर स्थित है, जहाँ सौंधिया राजपूत और पाटीदार समाज का प्रभुत्व है।

इसी ग्राम के हृदय स्थल में स्थित है, श्रद्धा का अनुपम केंद्र - श्री हनुमान मंदिर दसोरिया।

मंदिर अपनी अलौकिक भव्यता और सुंदर वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। ऊँचा उठा हुआ चबूतरा, दूर से दिखाई देने वाला उज्ज्वल शिखर, पक्का फर्श, विशाल प्रांगण और मंदिर तक पहुँचने के लिए बनी सीढ़ियाँ - इसकी विशेषताएँ हैं। ग्रामवासी यहाँ विराजमान बालाजी को अपनी मुरादें पूरी करने वाला मानते हैं और यहाँ गहरी आस्था रखते हैं।
सेवा का पुण्य कार्य

इसी पावन धाम में जन-सुविधा हेतु एक पुण्य कार्य सम्पन्न हुआ।

दामोदर पथरी अस्पताल, शामगढ़ द्वारा - समाजसेवी, साहित्य मनीषी डॉ. दयाराम जी आलोक ने अपनी आध्यात्मिक दान-पथ की परम्परा के अंतर्गत श्री हनुमान मंदिर दसोरिया हेतु 4 सीमेंट बेंचें दान स्वरूप समर्पित की हैं। यह दान दिनांक 20/01/2024 को डॉ. अनिल कुमार दामोदर के माध्यम से सम्पन्न हुआ।

इससे मंदिर में आने वाले वृद्धजनों, महिलाओं और यात्रियों को बैठने के लिए स्वच्छ और स्थायी व्यवस्था प्राप्त हुई है।

इस पुण्य कार्य को चिरस्थायी बनाने हेतु मंदिर के सेवादार श्री बालाराम जी पाटीदार ने मंदिर गेट के पास की दीवार पर दानदाता का शिलालेख स्थापित किया है, जो अन्य लोगों को भी दान की प्रेरणा देता है। इस कार्य पर ग्राम के सरपंच श्री होकम सिंह जी एवं समस्त ग्रामवासियों ने दानदाता के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया है।

कविता रूप में -
दसोरिया ग्राम का पावन धाम, हनुमान मंदिर उज्ज्वल नाम।
सीमेंट बेंचें दान स्वरूप, डॉ. आलोक का पुण्य अनूप।
बालाराम पाटीदार ने शिलालेख सजाया, सरपंच होकम सिंह ने आभार जताया।


श्लोक रूप में -
दसोरियाग्रामे हनुमन्मन्दिरं शुभम् ।
दानेन बेंचाः चतुर्भिः संस्थापिता शुभम् ॥
दयारामस्य आलोकस्य पुण्यकर्म महान्यतः ।
जनसेवा समर्प्यते पेंशनराश्या स्वयम्भुवः ॥
आध्यात्मिक दान-पथ क्या है ?

डॉ. दयाराम आलोक एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण में समर्पित करने का संकल्प लिया है।यह दान केवल एक गाँव तक सीमित नहीं है। मध्यप्रदेश और राजस्थान के मंदसौर, नीमच, झालावाड़, रतलाम, झाबुआ, आगर जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों, गौशालाओं और विद्यालयों में वे निरंतर सहयोग कर रहे हैं।
अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बेंच, रंग-रोगन और बैठने की व्यवस्था का कार्य उनके द्वारा किया जा चुका है।
यह पूर्णतः स्व-वित्तपोषित मॉडल है - उनकी पेंशन और गूगल से ब्लॉग व यूट्यूब के माध्यम से प्राप्त आय से यह परोपकार चल रहा है।
पारदर्शिता हेतु प्रत्येक स्थान पर शिलालेख लगवाया जाता है, ताकि समाज में दान की प्रेरणा फैले।

दसोरिया हनुमान मंदिर में बेंचें लगने का वीडियो भी इस लेख के साथ संलग्न है, जो इस सेवा कार्य का जीवंत प्रमाण है।

सेवादार संपर्क:
श्री बालाराम जी पाटीदार, श्री होकम सिंह जी सरपंच, पुजारी श्री प्रकाश नाथ जी।

यह छोटा सा सहयोग भी यही दर्शाता है कि - मंदिर केवल पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि सेवा और श्रद्धा का संगम है।

श्री हनुमान मंदिर गाँव  दसोरिया (गरोठ)  हेतु 

दामोदर पथरी  अस्पताल शामगढ़  द्वारा 

सीमेंट बैंच  व्यवस्था 

दसोरिया ग्राम का पावन धाम, हनुमान मंदिर उज्ज्वल नाम। शिखर ऊँचा, चबूतरा महान, भक्तों का यहाँ है श्रद्धा स्थान।

सीमेंट बेंचें दान स्वरूप, डॉ. आलोक का पुण्य अनूप। दामोदर पथरी अस्पताल से, सेवा की गाथा जन-जन के।

बालाराम पाटीदार ने शिलालेख सजाया, दानदाता का गौरव जग में छाया। सरपंच होकम सिंह ने आभार जताया, ग्रामवासियों ने हर्ष मनाया।

पेंशन राशि का त्याग महान, 151 संस्थानों में दान। मंदिर, मुक्ति धाम, गौशाला में, सुविधा पहुँची हर आँगन में।

श्लोक 

दसोरियाग्रामे हनुमन्मन्दिरं शुभम् । दानेन बेंचाः चतुर्भिः संस्थापिता शुभम् ॥ दयारामस्य आलोकस्य पुण्यकर्म महान्यतः । जनसेवा समर्प्यते पेंशनराश्या स्वयम्भुवः ॥ मन्दसौर-नीमच-झालावाड-रतलाम-झाबुआसु च । मन्दिरेषु मुक्तिधामेषु गौशालासु च सर्वदा ॥ आलोकस्य दानपथः प्रेरणां जनसंसदि । शिलालेखेन यः कृतः पुण्यकर्मणि कीर्त्यते ॥




दसोरिया गाँव, मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले की गरोठ तहसील में स्थित एक महत्वपूर्ण स्थल है, जहां सौंधिया राजपूतों और पाटीदार समाज का प्रभुत्व है ¹। यह गाँव बरडिया अमरा से गरोठ रेलवे स्टेशन को जाने वाली सड़क पर स्थित है, जो इसकी पहुंच को आसान बनाता है.  आस्था का केंद्र है, जो अपनी अलौकिक भव्यता और सुंदर वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है.  मंदिर की विशेषताओं में उठा हुआ चबूतरा, दूर से दिखाई देने वाला शिखर, पक्का फर्श, अच्छा प्रांगण, और मंदिर पहुंचने के लिए सीढ़ियां शामिल हैं . 

इस मंदिर के प्रति लोगों में गहरी आस्था है, और वे बालाजी को अपनी मुरादें पूरी करने वाले मानते हैं . समाजसेवी डॉ. दयाराम जी आलोक ने मंदिर को 4 सिमेंट की बेंच दान की हैं, जो आध्यात्मिक दान-पथ के तहत किया गया एक महत्वपूर्ण योगदान है. बालाराम जी पाटीदार द्वारा दान दाता का शिलालेख मंदिर गेट के पास की दीवार पर स्थापित किया गया है, जो अन्य लोगों को भी दान की प्रेरणा दिलाता है .सरपंच होकम सिंह जी और ग्राम जनों ने दान दाता का आभार व्यक्त किया है. 

दसोरिया के हनुमान मंदिर में सीमेंट बेंचे लगने का विडियो 



video mandir dasoriya 




मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम,झाबुआ जिलों के

मन्दिरों, मुक्ति धाम, गौशालाओं,विध्यालयों  हेतु

साहित्य मनीषी,

डॉ.दयाराम आलोक


 

आद्यात्मिक दान -पथ
डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।

व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।

सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।

स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।

निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।

पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।

हनुमान मंदिर  दसोरिया  हेतु 

 ४ सीमेंट बेंचें समर्पित 
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दसोरिया  मंदिर में बेंचें  लगीं 




श्री हनुमान मंदिर दसोरिया के सेवादार 

बालाराम जी पाटीदार दसोरिया   9977775834

होकम सिंग जी सरपच  द्सोरिया 9630671634

प्रकाश नाथ जी पुजारी  हनुमान मंदिर 9826519977

डॉ.अनिल कुमार दामोदर s/o डॉ.दयाराम जी आलोक 99265-24852 ,दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ 98267-95656  द्वारा हनुमान मंदिर दसोरिया  हेतु दान सम्पन्न   २०/१/२०२४ 

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यूट्यूब विडिओ की प्लेलिस्ट -


*भजन, कथा ,कीर्तन के विडिओ

*दामोदर दर्जी समाज महासंघ  आयोजित सामूहिक विवाह के विडिओ 

*दर्जी समाज मे मोसर (मृत्युभोज) के विडिओ 

पौराणिक कहानियाँ के विडिओ 

मंदिर कल्याण की  प्रेरक कहानियों के विडिओ  भाग 1 

*दर्जी समाज के मार्गदर्शक :जीवन गाथा 

*डॉ . आलोक का काव्यालोक

*दर्जी  वैवाहिक  महिला संगीत के विडिओ 

*मनोरंजन,शिक्षाप्रद ,उपदेश के विडिओ 

*मंदिर कल्याण की प्रेरक कहानियाँ भाग 2 

*मंदिर  कल्याण की प्रेरक कहानियाँ के विडिओ भाग 3 

*मुक्ति धाम विकास की प्रेरक कहानियाँ भाग 2 

*मुक्ति धाम विकास की प्रेरक कहानियाँ भाग 3 

*मंदिर कल्याण की प्रेरक कहानियां के विडिओ भाग 4 

मंदिर कल्याण की प्रेरक कहानियाँ के विडिओ भाग 5 

*भजन,कथा कीर्तन के विडिओ 

*मंदिर कल्याण की प्रेरक कहानियाँ के विडिओ  भाग 6 

*मंदिर कल्याण की प्रेरक कहानियाँ के विडिओ भाग 7 

*मनोरंजन,शिक्षा ,पर्यटन,उपदेश के विडिओ 

*मनोरंजन ,कॉमेडी के विडिओ 

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