लोकसखा पर पढ़ें सटीक जाति इतिहास, पौराणिक कथाएं, मंदिर दर्शन और डॉ. आलोक द्वारा मुक्तिधाम व गौशालों को दान किए गए बेंच व नकद सहयोग की पूरी जानकारी। सनातन आध्यात्म -जाति इतिहास-दान विमर्श : सम्पूर्ण सत्यनारायण व्रत कथा | 5 अध्याय एक साथ | Purnima Special

15.10.26

सम्पूर्ण सत्यनारायण व्रत कथा | 5 अध्याय एक साथ | Purnima Special






रुक जाइए!
अगर आपके घर में...
पैसों की तंगी है...
मन में अशांति है...
काम बनते-बनते बिगड़ जाते हैं...
तो आज की ये कथा... आपके लिए ही है।
आज पूर्णिमा है...
और कहा जाता है...
पूर्णिमा के दिन... सत्यनारायण भगवान की सम्पूर्ण कथा सुनने से...
सौ यज्ञों के बराबर फल मिलता है।
आज मैं आपको सुनाऊंगा...
पांचों अध्यायों की सम्पूर्ण सत्यनारायण व्रत कथा...
एक साथ... बिना किसी रुकावट के।
बस आप एक काम कीजिए...
इस कथा को बीच में मत छोड़ना...
अधूरी कथा सुनने का फल नहीं मिलता।
तो शुरू करने से पहले...
जो भी इस वीडियो को देख रहा है...
कमेंट में एक बार सच्चे दिल से लिख दीजिए...
ॐ सत्यनारायणाय नमः...
और हाँ...
अगर आप चाहते हैं... कि आपके घर में भी... लक्ष्मी-नारायण की कृपा बनी रहे...
तो चैनल को सब्सक्राइब करके... बेल आइकन जरूर दबा दीजिए।
तो चलिए... पवित्र मन से शुरू करते हैं... श्री सत्यनारायण भगवान की जय के साथ।
नमस्कार प्रिय भक्तों...
मैं आज आपको ले चलता हूँ... उस दिव्य लोक में...
जहाँ स्वयं भगवान विष्णु... अपने भक्तों के कल्याण की कथा सुनाते हैं।
सत्यनारायण व्रत... सिर्फ एक व्रत नहीं है...
यह सत्य का व्रत है...
भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की आराधना है।
इस व्रत को करने से...
मनुष्य के सभी कष्ट... दूर हो जाते हैं...
धन... धान्य... संतान... सुख... सब कुछ प्राप्त होता है।
आज हम... विधि-विधान से पहले... कथा का महत्व समझेंगे...
फिर पांचों अध्याय... क्रम से सुनेंगे।
तो हाथ में थोड़ा जल और फूल लेकर... मन में संकल्प लीजिए...
हे सत्यनारायण भगवान...
मैं आपके इस व्रत का... श्रवण कर रहा हूँ...
मेरे और मेरे परिवार के... सभी मनोरथ... पूर्ण कीजिए...
प्रथम अध्याय।
एक समय की बात है...
नारद जी... तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए... मृत्युलोक में आए।
वहां उन्होंने देखा...
मनुष्य... अनेक प्रकार के दुखों से... पीड़ित है...
कोई भूख से... कोई गरीबी से... कोई मानसिक चिंता से...
दयालु नारद जी का हृदय... करुणा से भर गया।
वे सीधे... बैकुंठ धाम पहुंचे...
जहाँ लक्ष्मीपति विष्णु... शेष शैया पर विराजमान थे।
नारद जी ने प्रणाम करके पूछा...
हे प्रभु... हे जगत के पालनहार...
मृत्युलोक में मनुष्य... इतना दुखी क्यों है...
ऐसा कोई छोटा सा उपाय बताइए... जिससे मनुष्य... थोड़े से प्रयास से... आपके परम पद को प्राप्त कर ले...
भगवान विष्णु मुस्कुराए... और बोले...
हे नारद... तुमने बहुत सुंदर प्रश्न पूछा है...
मैं तुम्हें एक ऐसे व्रत के बारे में बताता हूँ...
जो कलियुग में... मनुष्यों के लिए... कल्पवृक्ष के समान है...
उसका नाम है... श्री सत्यनारायण व्रत...
इस व्रत को विधि-विधान से करने से...
मनुष्य... सभी दुखों से मुक्त हो जाता है...
नारद जी ने पूछा... प्रभु... इसकी विधि क्या है... इसका फल क्या है... पहले किसने किया...
भगवान बोले...
काशी नगरी में... एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था...
भूख और प्यास से व्याकुल... वो प्रतिदिन... भिक्षा मांगता था...
उसकी दरिद्रता देखकर... भगवान को दया आ गई...
भगवान... एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण करके... उसके पास गए...
और बोले... हे ब्राह्मण... मैं सत्यनारायण हूँ...
तुम सत्यनारायण का व्रत करो... तुम्हारी सारी दरिद्रता दूर हो जाएगी...
ब्राह्मण ने पूछा... कैसे करना है...
भगवान ने कहा... पूर्णिमा या संक्रांति के दिन...
अपने बंधु-बांधवों के साथ... सत्यनारायण की कथा सुनो...
केले के फल... घी... दूध... आटा... चीनी मिलाकर... पंजीरी का प्रसाद बनाओ...
और भक्ति से भगवान का पूजन करो...
ब्राह्मण ने वैसा ही किया...
और देखते ही देखते... उसकी सारी गरीबी दूर हो गई...
वो धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया... और अंत में मोक्ष को प्राप्त हुआ।
जो कोई भी... इस प्रथम अध्याय को सुनता है...
उसके गरीबी के सारे दोष... दूर हो जाते हैं।
बोलिए... श्री सत्यनारायण भगवान की... जय।
करुणा पुकार
निर्धन ब्राह्मण पे कृपा करी, रूप वृद्ध का धारा
सत्यनारायण नाम तुम्हारा, जग का पालनहारा
भूखे को भोजन दे देते, प्यासे को नीर
जो सुमिरे सच्चे मन से, हरते सब पीर
सत्य का वरदान
सत्य ही नारायण है, नारायण ही सत्य
जपे जो श्रद्धा से तुझको, पावे परम तथ्य
काशी वाले विप्र की जैसे, सुनी पुकार
वैसे सुन लो प्रभु मेरी भी, विनती बारम्बार
द्वितीय अध्याय
अब सुनिए... द्वितीय अध्याय।
सूत जी बोले... हे ऋषियों... अब मैं दूसरा अध्याय सुनाता हूँ...
पूर्व काल में... उल्कामुख नाम का एक परम बुद्धिमान राजा था...
वह सत्यवादी... जितेन्द्रिय... प्रतिदिन देवताओं का पूजन करता था...
एक दिन... वो बन में गया... वहां उसने देखा...
हजारों निर्धन ब्राह्मण... सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजन कर रहे हैं...
राजा ने उनसे पूछा... आप लोग ये क्या कर रहे हैं...
ब्राह्मण बोले... हे राजन... हम सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहे हैं...
जिससे मनुष्य की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं...
राजा ने उसी समय से... व्रत करने का निश्चय किया...
और प्रसाद ग्रहण करके... अपने महल को चला गया...
परंतु... राजा... अहंकार के कारण... व्रत को भूल गया...
सत्यनारायण भगवान... राजा की परीक्षा लेने के लिए...
एक साधु का वेश धारण करके... राजा के पास... सौ लाख मुद्राएं लेकर पहुंचे...
राजा ने साधु का... यथोचित सत्कार नहीं किया...
भगवान कुपित हो गए...
और उसी क्षण... राजा की सारी संपत्ति... नष्ट हो गई...
उसकी पत्नी और पुत्र भी... उससे बिछड़ गए...
राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ...
वो वन-वन भटकने लगा...
फिर उसे याद आया... कि उसने सत्यनारायण का प्रसाद ग्रहण किया था...
पर व्रत नहीं किया...
वह वापस... उन ब्राह्मणों के पास गया...
और विधिपूर्वक... सत्यनारायण का व्रत किया...
भगवान प्रसन्न हो गए...
और उसकी खोई हुई... सारी संपत्ति... परिवार... सब लौटा दिया...
इसलिए भक्तों...
कभी भी भगवान के प्रसाद का... अनादर मत कीजिए...
भगवान के व्रत को... भूलिए मत...
यहाँ तक आपने दो अध्याय सुन लिए हैं...
देखिए... मन में एक अजीब सी शांति आ रही होगी... है ना?
यह भगवान की कृपा है...
अगर आपको सच में... कथा में आनंद आ रहा है...
तो इस वीडियो को... एक लाइक जरूर कीजिए...
क्योंकि आपका एक लाइक... इस कथा को... किसी और दुखी व्यक्ति तक पहुंचा देगा...
यह भी एक पुण्य का काम है।
और आगे की कथा... और भी ज्यादा चमत्कारी है...
तीसरे अध्याय में... एक व्यापारी की कहानी है... जिसने व्रत का अपमान किया तो...
उसकी नाव... पानी में डूब गई...
तो सुनते रहिए...
भूल सुधार
उल्कामुख राजा भूल गया, प्रसाद का अपमान किया
छिन गया राज-पाट सारा, तब ज्ञान हुआ
हे प्रभु भूल-चूक माफ करो, हम हैं अज्ञानी
तेरे प्रसाद की महिमा, हमने अब पहचानी
क्षमा गीत
अहंकार में जो तुमको भूले, वो सुख से दूर हुआ
शरण में आकर जो झुका,
वो फिर भरपूर हुआ
जय जय सत्यनारायण स्वामी, जय जय कृपानिधान
तेरे चरणों में झुके मेरा, सारा अभिमान

तृतीय अध्याय।
प्राचीन काल में... एक अत्यंत धनी... साधु नाम का वैश्य था...
उसका व्यापार... दूर-दूर तक फैला हुआ था...
परंतु... संतान न होने के कारण... वो बहुत दुखी था...
एक दिन... साधु वैश्य... किसी नगर में गया...
वहां उसने देखा... लोग सत्यनारायण का व्रत कर रहे हैं...
उसने पूछा... इस व्रत को करने से क्या फल मिलता है...
लोगों ने कहा... इस व्रत को करने से... संतान की प्राप्ति होती है...
साधु ने मन ही मन संकल्प किया...
हे भगवान... यदि मुझे संतान प्राप्त हुई...
तो मैं भी आपका व्रत करूंगा...
भगवान की कृपा से... उसकी पत्नी लीलावती ने... एक सुंदर कन्या को जन्म दिया...
जिसका नाम रखा गया... कलावती...
साधु वैश्य... अपनी प्रतिज्ञा भूल गया...
जब कलावती विवाह योग्य हुई... तो साधु ने उसका विवाह...
कंचन नगर के... एक योग्य व्यापारी पुत्र के साथ कर दिया...
व्यापार के लिए... साधु अपने दामाद के साथ... समुद्र के रास्ते से... व्यापार करने निकला...
कंचन नगर में... राजा ने चोरी के अपराध में...
साधु और उसके दामाद को... बंदी बना लिया... क्योंकि उनके पास बहुत सा धन था...
इधर... घर में... साधु की पत्नी और बेटी... बहुत दुखी रहने लगी...
उनका सारा धन... चोरों ने चुरा लिया...
एक दिन... कलावती... भूख से व्याकुल होकर... भिक्षा मांगने निकली...
तो उसने देखा... कुछ स्त्रियां... सत्यनारायण का व्रत कर रही हैं...
कलावती ने वहीं बैठकर... कथा सुनी... और प्रसाद ग्रहण किया...
उसी रात... सत्यनारायण भगवान ने... कंचन नगर के राजा को स्वप्न में दर्शन दिए...
और कहा... हे राजन... जिन दो व्यापारियों को तुमने बंदी बनाया है...
वे निर्दोष हैं... उन्हें तुरंत छोड़ दो... नहीं तो मैं तुम्हारा राज्य... नष्ट कर दूंगा...
राजा भयभीत हो गया... सुबह होते ही... उसने दोनों को मुक्त कर दिया...
और उनका सारा धन... दुगुना करके लौटा दिया...
साधु वैश्य... अपनी नाव में बैठकर... घर लौटने लगा...
तभी... भगवान ने फिर उसकी परीक्षा ली...
भगवान... एक दंडी सन्यासी के वेश में... नाव के किनारे आए... और पूछा...
हे साधु... तुम्हारी नाव में क्या है...
साधु ने अभिमान में आकर... झूठ कहा... इसमें तो बेल और पत्ते भरे हैं...
सन्यासी बोले... तथास्तु... तुम्हारा वचन सत्य हो...
और जैसे ही सन्यासी गए... साधु ने नाव में देखा... तो सारा धन... बेल और पत्तों में बदल गया था...
साधु... मूर्छित हो गया...
उसके दामाद ने... कारण पूछा...
तब साधु को अपनी भूल समझ आई... उसने सन्यासी को... वापस बुलाकर... क्षमा मांगी...
और विधिपूर्वक... नाव पर ही... सत्यनारायण का व्रत किया...
तत्क्षण... उसकी नाव... फिर से धन से भर गई...
इसलिए याद रखिए...
कभी भी भगवान से... छल मत कीजिए... झूठ मत बोलिए...
सत्य ही... नारायण है...
साधु वैश्य की पुकार
साधु वैश्य ने व्रत किया, पाई पुत्री प्यारी फिर अभिमान में भूल गया, बात तुम्हारी सारी नाव में धन की जगह जब, पत्ते नजर आए तब समझा सच्चा धन तो, केवल हरि नाम कहाए
झूठ का फल बेल-पत्ते हैं नाव में, झूठ जो साधु ने बोला तथास्तु कहकर हरि ने, सच्चा रूप खोल दिया सिखा दिया संसार को, झूठ न बोलो मीत सत्यनारायण से ही है, सच्ची सबकी जीत
चतुर्थ अध्याय।
एक समय... तुंगध्वज नाम का एक ग्वाला था...
वह प्रतिदिन... जंगल में गायें चराने जाता था...
एक दिन... वह बहुत भूखा था...
उसने देखा... बरगद के पेड़ के नीचे... कुछ लोग... सत्यनारायण का व्रत कर रहे हैं...
ग्वाले ने वहीं बैठकर... भक्ति से कथा सुनी...
और प्रसाद में... दूध मिलाकर... पंजीरी ग्रहण की...
प्रसाद खाते ही... उसकी भूख शांत हो गई...
और वह प्रसन्न मन से... घर लौटा...
उसने सोचा... क्यों न मैं भी... रोज इस प्रसाद को...
दुगुने दूध के साथ... बनाकर बेचूं...
अगले दिन से... उसने वैसा ही किया...
और उसकी आमदनी... दुगुनी हो गई...
धीरे-धीरे वो... बहुत धनी हो गया...
भगवान सत्यनारायण... अपने भक्तों की... छोटी सी भक्ति से भी... प्रसन्न हो जाते हैं...
इसलिए... इस चौथे अध्याय को सुनने से... मनुष्य को... अन्न और धन की... कभी कमी नहीं रहती।
ग्वाले की भक्ति
छोटा सा ग्वाला था, मन में श्रद्धा भारी
दूध-पंजीरी प्रसाद से, पलटी किस्मत सारी
न कोई मंत्र न जाप था, बस सच्चा विश्वास
सत्यनारायण ने दे दिया, धन का उसे प्रकाश
छोटी भक्ति बड़ा फल
थोड़े में जो राजी रहे, हरि उसे भरपूर करे
सच्चे मन से जो ध्यावे, नैया पार करे
ग्वाले की सी भक्ति दे दो,
हे लक्ष्मीपति नाथ जीवन भर सेवा करूँ,
थामे रहो मेरा हाथ

पंचम अध्याय -
अब सुनिए... सबसे महत्वपूर्ण... पंचम अध्याय।
इस अध्याय को सुनने से... व्रत सम्पूर्ण होता है।
एक समय... एक अत्यंत धनी... और अहंकारी राजा था...
उसका नाम था... तुंगध्वज... वही राजा...
एक दिन... राजा... वन में शिकार करने गया...
और थक कर... एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गया...
वहां ग्वाले... सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहे थे...
परंतु... राजा ने... अहंकार के कारण... न तो प्रणाम किया... न प्रसाद लिया...
और अपने महल को लौट गया...
भगवान... राजा के इस अहंकार से... बहुत क्रोधित हुए...
उसी रात... राजा के पुत्रों की... मृत्यु हो गई...
उसकी सारी सेना... नष्ट हो गई...
उसका सारा खजाना... खाली हो गया...
राजा को समझ आ गया... कि यह सब... सत्यनारायण भगवान के... अपमान के कारण हुआ है...
वह दौड़ा-दौड़ा... उन ग्वालों के पास गया...
और जमीन पर गिरकर... क्षमा मांगने लगा...
हे प्रभु... मुझे क्षमा कर दीजिए... मैं अज्ञानी हूँ...
ग्वालों ने... उसे क्षमा कर दिया...
और उसे... भगवान का प्रसाद दिया...
राजा ने... श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया... और व्रत किया...
भगवान की कृपा से... उसका सब कुछ... वापस लौट आया...
उसके पुत्र जीवित हो गए...
और अंत में... राजा... इस व्रत के प्रभाव से... बैकुंठ को प्राप्त हुआ...
हे भक्तों...
जो मनुष्य... इस पंचम अध्याय को सुनता है...
भगवान सत्यनारायण... उसके सारे अहंकार को... नष्ट कर देते हैं...
और उसे... विनम्रता और भक्ति का... आशीर्वाद देते हैं...
समापन
तो प्रिय भक्तों...
ये थी... सम्पूर्ण सत्यनारायण व्रत कथा...
पांचों अध्याय... एक साथ...
आज पूर्णिमा के पावन अवसर पर...
आपने यह सम्पूर्ण कथा सुनी...
मेरा विश्वास है... कि सत्यनारायण भगवान... आपकी सभी मनोकामनाएं... अवश्य पूर्ण करेंगे।
अब... कथा समाप्ति के बाद... क्या करना है...
सबसे पहले... भगवान को हाथ जोड़कर... अपनी भूल-चूक के लिए... क्षमा मांग लीजिए...
फिर... जो प्रसाद बनाया है... उसे सभी में... बांट दीजिए...
और स्वयं भी ग्रहण कीजिए...
और अंत में... एक प्रार्थना...
हे सत्यनारायण भगवान...
जैसे आपने... निर्धन ब्राह्मण... राजा उल्कामुख... साधु वैश्य... ग्वाले और राजा तुंगध्वज का उद्धार किया...
वैसे ही... हम सभी का उद्धार कीजिए...
हमारे घर में... सुख... शांति... समृद्धि... बनाए रखिए...
पाँच अध्याय की कथा सुनी,
पूर्ण हुआ है काम जो भी सुने सच्चे मन से,
बने बिगड़े काम घर में आवे सुख-शांति,
लक्ष्मी का हो वास
सत्यनारायण भगवान की,
जय हो बारह मास बोलो सत्यनारायण भगवान की जय!
अगर आपको ये कथा... सच्चे दिल से पसंद आई हो...
तो इस वीडियो को... अपने परिवार और दोस्तों के साथ... शेयर जरूर करना...
क्या पता... आपके एक शेयर से... किसी का जीवन संवर जाए...
कमेंट में... जय श्री सत्यनारायण... लिखना मत भूलना...
मैं आपसे मिलूंगा... अगली पूर्णिमा पर... एक और नई दिव्य कथा के साथ...
तब तक के लिए...
श्री सत्यनारायण भगवान की... जय...
श्री लक्ष्मी नारायण की... जय...

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