सेवा ही साधना है
धर्म केवल मंदिर की घंटियों में नहीं, भक्तों को बैठने के लिए मिले दो पल के विश्राम में भी बसता है। इसी भाव को सार्थक करता है शामगढ़ के समाजसेवी, सेवानिवृत्त शिक्षक डॉ. दयाराम जी आलोक का 'आध्यात्मिक दान-पथ'।
गुराडिया कलां, जो राजस्थान के झालावाड़ जिले की डग तहसील से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक शांत ग्राम है, वहाँ भक्तों की आस्था का केंद्र है - सुंदर श्री राधा-कृष्ण मंदिर। मंदिर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं, और वर्षों से श्यामदास जी बैरागी परंपरा से इस मंदिर की पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। मंदिर की व्यवस्था में गोविंद जी बैरागी और मंदिर के परम भक्त शंकर सिंह जी सोलंकी सालरिया का विशेष योगदान है।
इसी पावन धाम में भक्तों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए, अपने व्यापक दान-संकल्प के अंतर्गत डॉ. दयाराम जी आलोक ने अपने पुत्र डॉ. अनिल कुमार राठौर, दामोदर पथरी अस्पताल, शामगढ़ के माध्यम से 4 सीमेंट की बेंचें मंदिर परिसर में भेंट स्वरूप लगवाई हैं। इन बेंचों की स्थापना का कार्य विष्णु जी विश्वकर्मा मिस्त्री द्वारा किया गया। इस सुविधा से विशेषकर वृद्धजनों, महिलाओं और दूर से आने वाले यात्रियों को बैठने के लिए स्वच्छ और स्थायी स्थान मिला है, जिससे समस्त भक्तों में हर्ष है। इस पावन कार्य हेतु मंदिर समिति और शंकर सिंह जी सोलंकी ने दानदाता का सम्मान कर आभार व्यक्त किया।
जैसा कि इस अवसर पर रचित पंक्तियाँ कहती हैं -
गुराडिया कलां ग्राम में, राधा-कृष्णा धाम।
भक्तों की श्रद्धा बढ़े, गूँजे हरि का नाम।।
सीमेंट बेंचें दान कर, आलोकजी ने दी।
बैठक सुविधा भक्त को, सेवा सदा निधि।।
और श्लोक में -
राधाकृष्णप्रसादेन भक्तानां सुखवर्धनम्।
दानं सिमेन्टपीठानां आलोकस्य महाकृतम्॥
यह एकल घटना नहीं है। यह डॉ. आलोक जी के उस विराट संकल्प का एक छोटा सा पड़ाव है, जिसे उन्होंने सेवानिवृत्ति के पश्चात लिया है।
उनके आध्यात्मिक दान-अनुष्ठान की प्रमुख विशेषताएँ हैं -
1. पेंशन का परमार्थ में समर्पण: उन्होंने अपनी कुल 5 वर्ष की पेंशन राशि को समाज-कल्याण में लगाने का संकल्प लिया है।
2. स्व-वित्तपोषित एवं तकनीक आधारित मॉडल: यह दान उनकी पेंशन के साथ-साथ गूगल से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो से प्राप्त आय पर आधारित है - अर्थात ज्ञान और तकनीक का परोपकार में उपयोग।
3. व्यापक कार्यक्षेत्र: उनका सेवा-क्षेत्र एक गाँव तक सीमित नहीं। मध्यप्रदेश और राजस्थान के मंदसौर, झालावाड़, आगर, नीमच, रतलाम, झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, गौशालाओं और मुक्ति धामों तक फैला है।
4. सुविधा-केंद्रित सोच: वे भव्य निर्माण से अधिक उस मूलभूत सुविधा पर ध्यान देते हैं जो आम जन के सीधे काम आए - जैसे सीमेंट बेंचें, जिससे थके हुए को विश्राम मिले।
5. निरंतरता और प्रेरणा: अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था, रंग-रोगन और जीर्णोद्धार में वे सहयोग कर चुके हैं। दान पर शिलालेख लगवाकर वे पारदर्शिता बनाए रखते हैं और समाज के अन्य सक्षम जनों को भी इस पथ पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।
गुराडिया कलां में लगा यह दान-पट्ट इस बात का प्रतीक है कि जब सेवा निस्वार्थ भाव से की जाती है तो वह समाज में आध्यात्मिक और सामाजिक समरसता का दीप जलाती है। यह ब्लॉग लेख उसी पवित्र दीप की एक कथा है।
श्री राधा कृष्णा मंदिर गुराडिया कलां हेतु
दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ द्वारा
सीमेंट की बेंचें भेंट
काव्यात्मक छंद
गुराडिया कलां ग्राम में, राधा-कृष्णा धाम।
सीमेंट बेंचें दान कर, आलोकजी ने दी।
दामोदर अस्पताल से, अनिल राठौर संग।
मंदिर समिति ने किया, दानदात का मान।
श्लोक
राधाकृष्णप्रसादेन भक्तानां सुखवर्धनम्।
गुराडियाकलाग्रामे देवालये मनोहरम्।
समरस्यानुग्रहायै समाजे धर्मवर्धनम्।
मध्य प्रदेश और राजस्थान के चयनित मंदिरों को नकद और सिमेन्ट की बेंचें दान करने के अपने आध्यात्मिक दान -पथ के तहत डॉ दयाराम जी आलोक ने इस मंदिर की बैठक सुविधा उन्नत करने के मकसद से 4 सिमेन्ट बेंचें पुत्र डॉ . अनिल कुमार राठौर ,दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ के माध्यम से मंदिर के परिसर मे लगवा दी हैं, जिससे भक्तों मे हर्ष है|
गुराडिया कलां के राधा कृष्णा मंदिर का विडियो
मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के
मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु
समाजसेवी डॉ. दयाराम आलोक
शामगढ़ का
आध्यात्मिक दान-अनुष्ठान
सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।
व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।
सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।
स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।
निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।
पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।
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