श्री कंठालेश्वर महादेव मंदिर, रुनिजा में सेवा और संस्कृति का संगम
भारत की संस्कृति मंदिरों में ही नहीं, उन मंदिरों से जुड़ी जन-सेवा की परम्परा में बसती है। मध्यप्रदेश के ग्राम रुनिजा का श्री कंठालेश्वर महादेव मंदिर इसी परम्परा का एक जीवंत उदाहरण है। सड़क किनारे स्थित यह पावन धाम केवल शिव उपासकों का आस्था केंद्र नहीं, बल्कि रुनिजा की गंगा-जमुनी शान और सांस्कृतिक आत्मा है।
सावन में यहाँ उमड़ती श्रद्धा की भीड़, हरियाली के बीच गूँजता शिव नाम और निरंतर आना-जाना, इस मंदिर को ग्राम की विरासत बनाता है। इस विरासत को संजोने में मंदिर के संरक्षक डॉ. संजय जी राठौर - अध्यक्ष, पत्रकार श्री राजेन्द्र जी धनोतिया, श्री रणछोड़ जी धाकड़, श्री ईश्वर लाल जी जायसवाल, श्री गोपाल जी टेलर, श्री ईश्वर लाल जी राठौर जैसे समिति सदस्यों का समर्पित प्रयास निरंतर लगा हुआ है।
इसी श्रृंखला में मानव सेवा और आध्यात्मिक सेवा का एक सुन्दर संगम दिनांक 28-29 दिसम्बर 2024 को देखने को मिला।
दामोदर पथरी अस्पताल, शामगढ़ की ओर से समाजसेवी डॉ. दयाराम जी आलोक एवं उनके सुपुत्र डॉ. अनिल कुमार दामोदर [99265-24852, अस्पताल संपर्क 98267-95656] द्वारा श्री कंठालेश्वर महादेव मंदिर रुनिजा हेतु 4 सीमेंट की बेंचें भेंट स्वरूप प्रदान की गईं। इन बेंचों को मंदिर परिसर में स्थापित किया गया है ताकि दर्शनार्थियों, विशेषकर वृद्धजनों और यात्रियों को अलौकिक आराम के साथ बैठने के लिए स्वच्छ और सुरक्षित स्थान मिल सके। पत्रकार राजेन्द्र जी धनोतिया के अनुरोध पर यह दान कार्य सम्पन्न हुआ, जिसके लिए मंदिर समिति ने आभार व्यक्त करते हुए दानदाता का शिलालेख भी मंदिर में स्थापित किया है। इस अवसर का वीडियो भी उन्हीं के सौजन्य से प्राप्त हुआ है।
यह दान केवल चार बेंचों का दान नहीं, बल्कि डॉ. दयाराम जी आलोक के 'आध्यात्मिक दान-पथ' का एक पड़ाव है।
एक सेवानिवृत्त अध्यापक होने के बाद उन्होंने अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया है। उनका यह संकल्प स्व-वित्तपोषित है, जो उनकी पेंशन और गूगल से उनके ब्लॉग व यूट्यूब के माध्यम से प्राप्त आय पर आधारित है - अर्थात तकनीक को परोपकार का माध्यम बनाना।
उनकी दृष्टि सुविधा-केंद्रित है - जहाँ आवश्यकता है, वहाँ बैठक व्यवस्था, रंग-रोगन जैसी मूलभूत सुविधाएँ पहुँचाना। इसी दृष्टि से वे राजस्थान और मध्यप्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम, झाबुआ जिलों के 151 से अधिक मंदिरों, मुक्तिधामों और गौशालाओं में निरन्तर योगदान दे चुके हैं।
जैसा कि कहा गया है -
रुनिजा ग्राम की गंगा-जमुनी शान,
संस्कृति का अद्वितीय वरदान।
कंठालेश्वर महादेव का मंदिर महान,
शिव उपासकों का पावन स्थान।
यह लेख उसी पावन स्थान पर हुए एक छोटे से परन्तु प्रेरणादायक सेवा-कार्य की कथा है, जो यह सिद्ध करता है कि सच्ची शिव-भक्ति केवल जलाभिषेक तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के लिए बैठने की एक छाया, विश्राम का एक क्षण जुटाने में भी है।
श्री कंठालेश्वर महादेव टेम्पल रुनिजा हेतु
दामोदर पथरी अस्पताल शामगढ़ की तरफ से
4 सिमेन्ट की बेंचें भेंट
कंठालेश्वर महादेव मंदिर: ग्राम रुनिजा की सांस्कृतिक धरोहर
काव्यात्मक विवरण
रुनिजा ग्राम की गंगा-जमुनी शान,
संस्कृति का अद्वितीय वरदान।
कंठालेश्वर महादेव का मंदिर महान,
शिव उपासकों का पावन स्थान।
सड़क किनारे स्थित यह धाम,
भक्तों को देता अलौकिक आराम।
शिव प्रतिमा का सौन्दर्य अपार,
भक्तों के मन में जगाता प्यार।
सावन में उमड़ती श्रद्धा की भीड़,
हरियाली संग भक्तों की पीर।
आना-जाना रहता निरंतर,
शिव नाम से गूँजता समस्त नगर।
संरक्षक डॉ. संजय राठौर का प्रयास,
समिति और पत्रकार राजेन्द्रजी का विश्वास।
दानदाताओं का शिलालेख स्थापित हुआ,
आभार का संदेश मंदिर में गूँजा।
रुनिजा ग्राम की विरासत महान,
प्राचीन मंदिरों और स्मारकों का सम्मान।
सांस्कृतिक धरोहर संजोए यहाँ के लोग,
समृद्धि का प्रतीक, श्रद्धा का संयोग।
निष्कर्ष
कंठालेश्वर महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि रुनिजा गाँव की सांस्कृतिक आत्मा है। यहाँ की गंगा-जमुनी परंपरा, शिव उपासना और समाज सेवा का संगम इस मंदिर को अमर बनाता है।
समाजसेवी
आद्यात्मिक दान-पथ
डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।
व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।
सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।
स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।
निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।
पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।
यह विडिओ पत्रकार राजेन्द्रजी धनोतिया के सौजन्य से प्राप्त
श्री कंठालेश्वर महादेव मंदिर मे 4 बेंक लगने का विडिओ
यूट्यूब विडिओ की प्लेलिस्ट -





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