आस्था और अंधविश्वास के बीच बेहद महीन रेखा होती है, पता ही नहीं चलता कि कब आस्था अंधविश्वास में तब्दील हो गई. विज्ञान, वकील ,डॉक्टर की डिग्री होने के बावजूद ऐसे कई लोग गले मे काला डोरा या ताबीज धारण करते हैं और राशिफल,कुंडली के चक्कर से बाहर नहीं निकल पाते हैं -Dr.Dayaram Aalok,M.A.,Ayurved Ratna,D.I.Hom(London)
13.8.26
पिता की खुशी के लिए पुत्र का महात्याग: भीष्म पितामह की कथा
जिस बेटे ने पिता के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दियाक्या आपने कभी सोचा है कि एक पिता के एक क्षण के प्रेम के लिए एक पुत्र अपना पूरा जीवन, अपना सिंहासन, अपने बच्चे, अपना भविष्य सब कुछ कैसे त्याग सकता है। ऐसी कौन सी प्रतिज्ञा थी जिसे सुनकर स्वर्ग के देवता भी कांप गए और धरती पर फूल बरसाने लगे। आज हम बात कर रहे हैं गंगा पुत्र भीष्म की उस भीषण प्रतिज्ञा की जिसने देवलोक को हिला दिया था।
कहानी शुरू होती है हस्तिनापुर के महान सम्राट शांतनु से। शांतनु चंद्रवंशी राजा थे, धर्मात्मा और प्रजापालक। एक दिन वो गंगा किनारे शिकार पर गए और वहां उन्हें एक अत्यंत सुंदर स्त्री दिखाई दी। वो कोई और नहीं स्वयं मां गंगा थीं जो एक मानव रूप में आई थीं। शांतनु उन्हें देखते ही मोहित हो गए और विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा ने एक शर्त रखी कि वो जो भी करेंगी शांतनु उनसे कभी प्रश्न नहीं करेंगे, कभी रोकेंगे नहीं। प्रेम में अंधे शांतनु ने शर्त मान ली। विवाह हुआ।
समय बीता। गंगा को एक पुत्र हुआ। लेकिन जन्म लेते ही गंगा उस पुत्र को ले जाकर गंगा में बहा देती हैं। शांतनु देखते हैं, हृदय टूट जाता है पर वचनबद्ध होने के कारण कुछ कह नहीं पाते। ऐसे ही सात पुत्रों के साथ हुआ। सात बार एक पिता ने अपनी आंखों के सामने अपने पुत्रों को जल में बहते देखा और चुप रहा। ये सातों पुत्र वास्तव में आठ वसु थे जिन्हें वशिष्ठ ऋषि ने श्राप दिया था कि उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ेगा। जब आठवें पुत्र का जन्म हुआ तो शांतनु से रहा नहीं गया। उन्होंने गंगा को रोक दिया और कहा तुम इतनी निर्दयी कैसे हो सकती हो। वचन टूट गया।
तब गंगा ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और बताया कि ये सात वसु श्राप मुक्त हो गए हैं और यह आठवां पुत्र स्वयं प्रभास नामक वसु है जो लंबे समय तक धरती पर रहेगा। इसका नाम देवव्रत होगा। गंगा उस बालक को अपने साथ ले गईं और कहा कि जब यह बालक शस्त्र और शास्त्र में निपुण हो जाएगा तब मैं इसे आपको लौटा दूंगी।
अब सोचिए एक पिता का एकाकीपन। महल में सब कुछ है पर अपना कोई नहीं है। कई वर्ष बीत गए। देवव्रत गंगा के पास और देवताओं के बीच पल रहे थे। स्वयं देवगुरु बृहस्पति ने उन्हें वेद वेदांग पढ़ाए। परशुराम जैसे महान योद्धा ने उन्हें अस्त्र शस्त्र सिखाए। शुक्राचार्य और वशिष्ठ ने उन्हें राजनीति और धर्म का ज्ञान दिया। वो ऐसा बालक बना जो रूप में कामदेव जैसा, बल में इंद्र जैसा और बुद्धि में बृहस्पति जैसा था।
एक दिन शांतनु यमुना के किनारे घूम रहे थे तो उन्हें एक अद्भुत सुगंध आई। वो सुगंध इतनी दिव्य थी कि पूरे वन में फैल रही थी। वो सुगंध एक युवती से आ रही थी जिसका नाम था सत्यवती। सत्यवती एक निषाद राज की पुत्री थी जिसे मत्स्यगंधा भी कहा जाता था क्योंकि उसके शरीर से मछली की गंध आती थी पर ऋषि पराशर के वरदान से वो सुगंध में बदल गई थी। शांतनु सत्यवती को देखते ही अपना सब कुछ भूल गए। उम्र ढल चुकी थी पर हृदय में फिर से प्रेम जाग उठा। उन्होंने सत्यवती के पिता निषादराज के पास जाकर विवाह का प्रस्ताव रखा।
यहां कहानी में एक मोड़ आता है। निषादराज ने कहा राजन मैं अपनी पुत्री का विवाह आपसे अवश्य करूंगा पर मेरी एक शर्त है। मेरी पुत्री से उत्पन्न पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा। यह सुनते ही शांतनु सन्न रह गए। क्योंकि हस्तिनापुर का युवराज तो देवव्रत है। वो अपने जीवित पुत्र के होते हुए उसके अधिकार को कैसे छीन सकते थे। वो धर्म संकट में पड़ गए और बिना कुछ कहे वापस हस्तिनापुर लौट आए।
महल में लौटकर शांतनु उदास रहने लगे। भोजन में मन नहीं, दरबार में मन नहीं। उनका मुख मुरझा गया। उस समय देवव्रत अपनी शिक्षा पूरी करके गंगा द्वारा हस्तिनापुर लौटाए गए थे। पिता को उदास देखकर देवव्रत ने उनके सारथी से सच्चाई पता की। उन्हें पता चला कि पिता किसी के प्रेम में हैं और एक वचन के कारण दुखी हैं। देवव्रत तुरंत अपने पिता के दुख को दूर करने के लिए निषादराज के पास गए।
निषादराज के दरबार में देवव्रत ने कहा कि मैं हस्तिनापुर के सिंहासन का त्याग करता हूं। आज से मेरे पिता और सत्यवती से उत्पन्न पुत्र ही राजा बनेगा। मुझे राज्य नहीं चाहिए। यह सुनकर सब लोग धन्य धन्य कहने लगे पर निषादराज चतुर था। उसने कहा हे राजकुमार आप तो महान हैं आपने त्याग कर दिया पर आपका पुत्र तो इस वचन से बंधा नहीं होगा। वो तो आकर मेरे पौत्र से युद्ध करेगा। तब क्या होगा।
यहां रुककर जरा सोचिए। एक राजकुमार जो अभी युवा है, जिसके सामने पूरा साम्राज्य है, सुंदर जीवन है, उससे कहा जा रहा है कि तुम ही नहीं तुम्हारे आने वाले बच्चे भी कभी राजा बनने का सपना न देखें। कितना कठिन क्षण रहा होगा। पूरे दरबार में सन्नाटा था। देवता आकाश से देख रहे थे। उस क्षण देवव्रत ने आकाश की ओर देखा, धरती की ओर देखा और दोनों हाथ उठाकर ऐसी प्रतिज्ञा ली जिसे आज तक संसार याद रखता है।
देवव्रत ने कहा हे समस्त देवताओ सुनो, हे पितरो सुनो, मैं चंद्रवंशी शांतनु का पुत्र देवव्रत आज प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूंगा। मैं कभी विवाह नहीं करूंगा, कभी संतान उत्पन्न नहीं करूंगा, कभी राजसिंहासन पर नहीं बैठूंगा। मेरा जीवन हस्तिनापुर की सेवा और अपने पिता की प्रसन्नता के लिए होगा। मेरे जीवन में कभी कोई स्त्री नहीं आएगी। यह मेरा अटल व्रत है।
कहते हैं जैसे ही उन्होंने यह वचन कहे वैसे ही आकाश में बिजली कड़कने लगी। देवलोक हिल गया। इतना कठोर व्रत आज तक किसी ने नहीं लिया था। स्वयं भगवान जैसी प्रतिज्ञा। देवताओं ने ऊपर से फूल बरसाए और कहा यह भीषण प्रतिज्ञा है। जो कार्य कोई नहीं कर सकता वो इस बालक ने कर दिया। इसलिए आज से इसका नाम भीष्म होगा। भीषण प्रतिज्ञा करने वाला भीष्म। उसी क्षण से देवव्रत का नाम मिट गया और वो भीष्म पितामह बन गए।
अब आप समझिए इस प्रतिज्ञा का मूल्य क्या था। एक पुरुष के लिए सबसे बड़ी लालसा होती है अपनी वंश बेल को आगे बढ़ाना। भीष्म ने अपने वंश को वहीं समाप्त कर दिया। उन्होंने अपने पिता को सत्यवती दिला दी। शांतनु और सत्यवती का विवाह हुआ। सत्यवती से दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य। पर विधि का विधान देखिए, चित्रांगद बहुत कम उम्र में एक गंधर्व के साथ युद्ध में मारा गया। विचित्रवीर्य भी क्षय रोग से ग्रस्त होकर बिना संतान के मृत्यु को प्राप्त हो गया। अब हस्तिनापुर का सिंहासन खाली था। कोई वारिस नहीं था।
भीष्म चाहते तो अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर सिंहासन ले सकते थे। कोई उन्हें रोक नहीं सकता था। पर उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी। उन्होंने अपनी माता सत्यवती की आज्ञा से काशी नरेश की तीन पुत्रियों अंबा अंबिका और अंबालिका का हरण किया ताकि विचित्रवीर्य से उनका विवाह हो सके। पर वहां भी एक त्रासदी हुई। अंबा ने कहा मैं तो राजा शाल्व से प्रेम करती हूं। भीष्म ने धर्म का पालन करते हुए उसे सम्मान के साथ शाल्व के पास भेज दिया पर शाल्व ने उसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि उसका हरण हो चुका था। अंबा ने भीष्म से कहा आप मुझसे विवाह कर लो। भीष्म ने कहा मैं अपनी प्रतिज्ञा से बंधा हूं। मैं विवाह नहीं कर सकता। तब अंबा ने भीष्म को ही अपनी दुर्दशा का कारण मानकर प्रतिशोध की अग्नि पाल ली और अगले जन्म में शिखंडी बनकर भीष्म की मृत्यु का कारण बनी।
देखिए एक प्रतिज्ञा ने कितने जीवन उलझा दिए। अगर भीष्म विवाह कर लेते तो कौरव और पांडवों का युद्ध ही न होता। हस्तिनापुर को वारिस मिल जाता। पर भीष्म ने अपने वचन को अपने जीवन से बड़ा माना।
इसी प्रतिज्ञा के कारण उन्हें जीवन भर बहुत दुख सहना पड़ा। अपने ही भतीजे के बच्चों को आपस में लड़ते देखना पड़ा। द्रौपदी का चीर हरण उन्होंने अपनी आंखों से देखा। वो चाहते तो रोक सकते थे पर सिंहासन के प्रति अपनी निष्ठा के कारण चुप रहे। वो जानते थे कि दुर्योधन अधर्म के मार्ग पर है पर वो हस्तिनापुर के सेवक थे, सिंहासन के सेवक थे। उनकी प्रतिज्ञा ने उन्हें बांध रखा था।
जब महाभारत का युद्ध हुआ तो भीष्म ने कौरवों की ओर से युद्ध किया क्योंकि वो हस्तिनापुर के प्रति वचनबद्ध थे। दस दिनों तक उन्होंने ऐसी युद्ध किया कि स्वयं श्रीकृष्ण को भी अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर चक्र उठाना पड़ा। अंत में अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके उनके शरीर को बाणों से छलनी कर दिया। वो बाणों की शय्या पर लेट गए। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था इसलिए उन्होंने अपना प्राण तब तक नहीं छोड़ा जब तक सूर्य उत्तरायण नहीं हो गया। बाणों की शय्या पर लेटे लेटे उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म, मोक्ष धर्म और विष्णु सहस्रनाम का उपदेश दिया।
तो इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है। पहली सीख है कि पुत्र धर्म कितना बड़ा होता है। एक पुत्र अपने पिता की खुशी के लिए अपना सर्वस्व त्याग देता है। दूसरी सीख है कि वचन का पालन कितना कठिन होता है। भीष्म ने जो कहा वो जीवन भर निभाया, चाहे उसके लिए उन्हें कितना भी कष्ट सहना पड़ा। और तीसरी सीख है कि कभी कभी एक अच्छा कार्य भी भविष्य में बड़ी समस्या बन जाता है। भीष्म की प्रतिज्ञा धर्म से प्रेरित थी पर उसी के कारण हस्तिनापुर में उत्तराधिकार का संकट पैदा हुआ और महाभारत जैसा युद्ध हुआ।
अब अगर आप इस कथा को सुन रहे हैं और आपको लगता है कि हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसे ही अनसुने त्याग और बलिदान की कहानियां छुपी हैं तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर कीजिएगा। क्योंकि आपका एक लाइक हमें ऐसी ही और पौराणिक कथाओं को आप तक लाने की शक्ति देता है।
और हां अगर आप पहली बार हमारे चैनल पर आए हैं या अभी तक आपने सब्सक्राइब नहीं किया है तो अभी सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन दबा दीजिए ताकि जब भी हम महाभारत और रामायण की कोई नई कथा लेकर आएं तो सबसे पहले आप तक पहुंचे। कमेंट में जय श्री कृष्ण और भीष्म पितामह की जय लिखना मत भूलिएगा। हम आपके हर कमेंट को पढ़ते हैं।
---
अंत में मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। क्या आपको लगता है कि भीष्म पितामह को अपने पिता के लिए इतनी बड़ी प्रतिज्ञा लेनी चाहिए थी या उन्हें भविष्य के बारे में सोचना चाहिए था। आपका क्या विचार है कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा। क्योंकि आपकी सोच ही इस चर्चा को आगे बढ़ाएगी। फिर मिलते हैं अगली कथा में एक और महान चरित्र के साथ। तब तक के लिए जय श्री कृष्ण।
Dr.Dayaram Aalok M.A.,Ayurved Ratna,D.I.Hom(London), Blog Writer,caste historian,Poet(kavitalok.blogspot.com),Social worker(damodarjagat.blogspot.com),Herbalist(remedyherb.blogspot.com,healinathome.blogspot.com),Used to organize Mass marriage programs for Darji Community. founder and president Damodar Darji Mahasangh
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें