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30.8.26

"एक राजा जो प्रजा के दिल में बसता है - छत्रपती शिवाजी महाराज

 


सोचिए... एक ऐसा राजा, जिसके पास सोने का सिंहासन था, पर वो जमीन पर बैठकर किसान से बात करता था।
एक ऐसा राजा, जिसकी सेना दुश्मन से लड़ती थी, पर कभी किसी खेत की एक फसल तक नहीं उजाड़ती थी।
एक ऐसा राजा, जो आज से 350 साल पहले चला गया... पर आज भी हर महाराष्ट्रियन के घर में, हर भारतीय के दिल में जिंदा है।
वो कोई कहानी का किरदार नहीं है। वो हैं... हिन्दवी स्वराज्य के संस्थापक... जाणता राजा... छत्रपती शिवाजी महाराज।
और आज हम जानेंगे कि आखिर क्यों, एक राजा... प्रजा के दिल का राजा बन गया।
नमस्कार! स्वराज्य के इस पावन इतिहास में आपका स्वागत है।
छत्रपती शिवाजी महाराज का नाम सुनते ही हमारे मन में एक तस्वीर आती है। घोड़े पर सवार, हाथ में तलवार, भगवा ध्वज लहराता हुआ एक योद्धा।
लेकिन क्या शिवाजी महाराज सिर्फ एक योद्धा थे? क्या वो सिर्फ एक कुशल सेनापति थे?
नहीं।
अगर वो सिर्फ योद्धा होते, तो इतिहास में कई योद्धा आए और चले गए, उन्हें भुला दिया जाता। शिवाजी महाराज को भुलाया नहीं जा सका, क्योंकि वो एक योद्धा से बढ़कर एक विचार थे। एक व्यवस्था थे। एक भरोसा थे।
आज इस वीडियो में हम उनके जीवन परिचय को सिर्फ तारीखों में नहीं, बल्कि उनके उन फैसलों में देखेंगे, जिन्होंने उन्हें प्रजा के दिल में बसाया।
जन्म और संस्कार - जिजाबाई की भूमिका
कहानी शुरू होती है 19 फरवरी 1630 से। जगह... पुणे के पास शिवनेरी किला।
पिता शाहजी भोसले, जो बीजापुर सल्तनत के एक पराक्रमी सरदार थे। और माता... राजमाता जिजाबाई।
और यहीं पर पहला रहस्य छिपा है। शिवाजी को राजा शाहजी ने नहीं, जिजाबाई ने बनाया।
जब शाहजी बीजापुर की राजनीति में व्यस्त थे, तब जिजाबाई ने अकेले ही पुणे की जहागीर संभाली। उन्होंने ही शिवबा को रामायण, महाभारत, और महाभारत के वीरों की कहानियां सुनाईं।
उन्होंने अपने बेटे को सिखाया... बेटा, सोने की चम्मच से नहीं, मिट्टी से प्यार करना सीखो। इस मिट्टी पर जो रहता है, वही तुम्हारा अपना है।
गुरु दादोजी कोंडदेव ने उन्हें युद्धनीति, घुड़सवारी, तलवारबाजी और राजनीति सिखाई। पर जिजाबाई ने उन्हें एक मंत्र दिया... रयतेचा राजा हो। प्रजा का राजा बनो।
सिर्फ 15 साल की उम्र में, 1645 में, शिवाजी ने रोहिडेश्वर के मंदिर में अपने मावलों के साथ मिलकर हिन्दवी स्वराज्य की शपथ ली। ये शपथ किसी सिंहासन के लिए नहीं थी। ये शपथ थी, इस मिट्टी पर रहने वाले हर गरीब, हर किसान, हर महिला के स्वाभिमान के लिए।
एक अलग तरह का राजा 
उस समय का भारत देखिए। चारों तरफ सल्तनतें थीं। मुगल, आदिलशाही, कुतुबशाही। हर जगह एक ही नियम था। राजा... प्रजा से कर वसूलता है। और प्रजा... राजा से डरती है।
शिवाजी महाराज ने इस नियम को ही पलट दिया।
उनके राज्य में दो सबसे बड़े नियम थे।
पहला नियम... औरत की इज्जत।
एक प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। जब कल्याण के सूबेदार की बहू को मराठा सैनिक सम्मान के साथ शिवाजी के सामने लाए, तो सोचा कि राजा खुश होगा। शिवाजी महाराज ने उस महिला को अपनी माँ कहकर संबोधित किया और पूरे सम्मान के साथ, वस्त्र और आभूषण देकर वापस भेज दिया। और अपने सैनिकों को कड़ा संदेश दिया... पराई स्त्री माता समान है। जो इस नियम को तोड़ेगा, उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।
दूसरा नियम... किसान की फसल।
उस दौर में सेनाएं जहां से गुजरती थीं, फसलों को रौंद देती थीं। शिवाजी महाराज का स्पष्ट आदेश था... किसी भी मावले को, किसी भी सैनिक को, किसान की फसल को हाथ लगाने का अधिकार नहीं है। अगर सेना को अनाज चाहिए, तो बाकायदा कीमत देकर खरीदा जाएगा। अगर कोई सैनिक जबरदस्ती करेगा, तो उसे सजा मिलेगी।
इसी कारण, किसान उन्हें राजा नहीं, अपना भाई, अपना बेटा मानते थे। जब शिवाजी की सेना आती थी, तो गाँव के लोग डरकर भागते नहीं थे, बल्कि आरती लेकर स्वागत करते थे। यही वो कारण था, जो उन्हें प्रजा के दिल में बसाता था।
इस विषय पर एक बहुत गहरी बात कही गई है।
जाने माने इतिहासवेत्ता डॉ. दयाराम आलोक लिखते हैं ----- "छत्रपती शिवाजी महाराज का स्वराज्य, तलवार से जीता गया प्रदेश नहीं था, बल्कि विश्वास से जीता गया हृदयों का साम्राज्य था। उन्होंने किले तो जीते ही, पर उससे पहले उन्होंने लोगों का भरोसा जीता। इसीलिए उनका राज्य नक्शे पर नहीं, लोगों के मन में बसता था।"
कितनी सटीक बात है। उन्होंने हृदयों का साम्राज्य जीता।
युद्धनीति नहीं, बुद्धिनीति - गनिमी कावा]
अब बात करते हैं उनकी वीरता की। शिवाजी के पास कभी मुगलों जैसी बड़ी सेना नहीं थी। औरंगजेब के पास लाखों सैनिक थे। शिवाजी के पास कुछ हजार मावले थे।
तो वो जीते कैसे?
उन्होंने गनिमी कावा... यानी गुरिल्ला युद्ध पद्धति का उपयोग किया। वो जानते थे कि ताकतवर दुश्मन को उसकी ताकत से नहीं, उसकी कमजोरी से हराया जाता है।
सह्याद्री के पहाड़, घने जंगल, और किले... यही उनकी सेना थी।
अफजल खान का वध... 1659। आदिलशाह ने अपने सबसे क्रूर सरदार अफजल खान को भेजा। उसने कहा... मैं शिवाजी को जिंदा या मुर्दा लेकर आऊंगा। वो प्रतापगढ़ आया। शिवाजी जानते थे कि खुली लड़ाई में वो नहीं जीत सकते। उन्होंने कूटनीति का सहारा लिया। मुलाकात का नाटक किया। और जब अफजल खान ने धोखे से वार किया, तो शिवाजी ने बाघनख से उसका वध कर दिया। ये सिर्फ ताकत नहीं, बुद्धि की जीत थी।
फिर आगरा से पलायन... 1666। औरंगजेब ने उन्हें कैद कर लिया। दुनिया ने सोचा, अब स्वराज्य खत्म। पर शिवाजी मिठाई के टोकरों में छिपकर अपने बेटे संभाजी के साथ निकल गए। ये दुनिया के इतिहास के सबसे साहसिक पलायनों में से एक है।
और फिर... शाइस्ता खान पर हमला। 1663 में। शाइस्ता खान पुणे में उसी लाल महल में रुका था, जहाँ शिवाजी का बचपन बीता था। रात के अंधेरे में, सिर्फ 400 चुनिंदा मावलों के साथ शिवाजी ने हमला किया। शाइस्ता खान अपनी तीन उंगलियां गंवाकर भाग गया।
इन घटनाओं ने एक संदेश दिया... ये राजा हार मानने वाला नहीं है। ये अपने लोगों के लिए कुछ भी कर सकता है।
राज्याभिषेक और प्रशासन - एक आदर्श शासक]
6 जून 1674। रायगढ़ किला।
उस दिन सिर्फ एक राजा का राज्याभिषेक नहीं हो रहा था। उस दिन सदियों की गुलामी के बाद, इस मिट्टी के एक बेटे ने खुद को छत्रपती घोषित किया। काशी के विद्वान गागा भट्ट ने उनका राज्याभिषेक किया।
लेकिन राज्याभिषेक के बाद उन्होंने क्या किया? उन्होंने सोने-चांदी के महल नहीं बनवाए। उन्होंने अष्टप्रधान मंडल बनाया। यानी आठ मंत्रियों की एक परिषद। पेशवा, अमात्य, सचिव... हर विभाग का एक विशेषज्ञ। ये आज की कैबिनेट सिस्टम जैसा ही था।
उन्होंने पहली बार नौसेना... भारतीय नौसेना की नींव रखी। उन्हें भारतीय नौसेना का जनक कहा जाता है। उन्होंने सिंधुदुर्ग और विजयदुर्ग जैसे समुद्री किले बनवाए। क्योंकि वो जानते थे, जो समुद्र पर राज करेगा, वही भारत पर राज करेगा।
उनका प्रशासन... कर प्रणाली बहुत ही न्यायपूर्ण थी। उन्होंने जमींदारी प्रथा को खत्म किया। सीधे किसानों से कर लिया जाता था। और अकाल के समय कर माफ भी कर दिया जाता था।
3 अप्रैल 1680 को, 50 साल की उम्र में, रायगढ़ में शिवाजी महाराज ने देह त्याग दी।
शरीर चला गया। पर विचार नहीं गया।
आज भी, जब कोई नेता, कोई अधिकारी, कोई युवा, ईमानदारी और न्याय की बात करता है, तो उसे शिवाजी महाराज का उदाहरण दिया जाता है।
क्यों? क्योंकि उन्होंने हमें सिखाया कि राजा होना... ताकत का प्रतीक नहीं है। राजा होना... जिम्मेदारी का प्रतीक है।
एक राजा... जो प्रजा के दिल में बसता है... वो कभी मरता नहीं है।
अगर आपको ये कहानी, स्वराज्य की ये गाथा, दिल को छू गई हो, तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर कीजिए।
कमेंट में... जय भवानी, जय शिवाजी... जरूर लिखिए, ताकि ये स्वराज्य की गर्जना हर कोने तक पहुंचे।
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मैं मिलता हूँ आपसे अगले वीडियो में, एक और ऐसे ही जाणता राजा की कहानी के साथ।
जय हिन्द। जय महाराष्ट्र।

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