आस्था और अंधविश्वास के बीच बेहद महीन रेखा होती है, पता ही नहीं चलता कि कब आस्था अंधविश्वास में तब्दील हो गई. विज्ञान, वकील ,डॉक्टर की डिग्री होने के बावजूद ऐसे कई लोग गले मे काला डोरा या ताबीज धारण करते हैं और राशिफल,कुंडली के चक्कर से बाहर नहीं निकल पाते हैं -Dr.Dayaram Aalok,M.A.,Ayurved Ratna,D.I.Hom(London)
16.8.26
हम सूत कातने वाले नहीं, तलवार चलाने वाले क्षत्रिय हैं - कतिया जाति का गौरवशाली इतिहास
क्या आप जानते हैं, जिस जाति को आज हम कतिया कहते हैं, उसने सिकंदर महान को भी युद्ध के मैदान में रोक दिया था? 17,000 वीरों ने बलिदान दिया था? और इसी जाति के नाम पर गुजरात के पूरे क्षेत्र का नाम काठियावाड़ पड़ा?
मैं बात कर रहा हूँ उस जाति की, जो वैदिक काल में वेदों की रक्षक थी, जिसके नाम पर कठोपनिषद लिखा गया, जिसे कर्नल टॉड ने राजपूतों के 36 कुलों में से एक माना। वो है काठिया क्षत्रिय, आज की कतिया जाति।
नमस्कार साथियों।
आज हम बात करेंगे एक ऐसी जाति की, जिसका इतिहास हजारों साल पुराना है, लेकिन आज बहुत कम लोग उसके बारे में जानते हैं। जाति है कतिया।
वर्तमान में कतिया जाति मुख्य रूप से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, दिल्ली, ओडिशा, तेलंगाना, गुजरात, राजस्थान, उत्तरप्रदेश में पाई जाती है।
पर सवाल ये है, कतिया कौन हैं? इनकी उत्पत्ति कहाँ से हुई?
इतिहास में इसके तीन बड़े सिद्धांत मिलते हैं।
पहला सिद्धांत कहता है, उत्पत्ति कत्ती से हुई। कत्ती मतलब तलवार। भगवान महादेव भोलेनाथ के अभिन्न अस्त्र कत्ती से इस जाति की उत्पत्ति मानी जाती है।
दूसरा सिद्धांत कहता है, उत्पत्ति सूत कातने से हुई। कताई धागा, कपास से सूत कातना इनका पारंपरिक काम धंधा रहा है।
और तीसरा सिद्धांत कहता है, ये काठी, काठिया से बने हैं।
तो सच क्या है? सच को समझने के लिए हमें हजारों साल पीछे जाना होगा।
चलते हैं वैदिक काल में।
समाज को आह्वान नामक पुस्तक में और कई प्राचीन ग्रंथों में काठिया क्षत्रिय जाति की उत्पत्ति का पहला उल्लेख वैदिक साहित्य में मिलता है। कठ, काठिया, वैशम्पायन के उदीच्य शिष्य थे।
डॉ बुद्धप्रकाश ने अपनी किताब ऐशियेंट पंजाब में लिखा है, पाणिनि ने भी अपनी अष्टाध्यायी में कठ क्षत्रिय जाति का उल्लेख किया है। कठ लोग बड़ी प्राचीन आर्य जाति के थे।
इनके नाम पर एक पूरा उपनिषद है, कठोपनिषद। ये कितनी बड़ी बात है। वैदिक साहित्य के संरक्षक और व्याख्याकार के रूप में इनकी ख्याति दूर दूर तक फैली हुई थी।
ये सिर्फ ज्ञानी नहीं, महायोद्धा भी थे।
अब आते हैं इतिहास के सबसे रोमांचक अध्याय पर, कठ गणराज्य और सिकंदर का युद्ध।
ईसा पूर्व 326 में, जब सिकंदर भारत आया, रावी नदी को पार करने के बाद उसकी मुठभेड़ कठों से हुई।
इनकी राजधानी थी सांगल, आज के गुरदासपुर के आसपास।
यूनानी इतिहासकार स्ट्रैबो लिखता है, कठों में सौंदर्य का साका चलता था, सबसे सुंदर पुरुष को वे अपना राजा चुनते थे।
कठों ने अपनी राजधानी के चारों ओर रथों के तीन चक्कर लगाकर शकटव्यूह का निर्माण किया। सिकंदर की अश्वारोही सेना वहाँ निष्फल होने लगी।
इतना घमासान युद्ध हुआ कि अंत में पोरस को अपनी सेना लेकर सिकंदर की मदद के लिए आना पड़ा।
रात में कठों ने एक झील के द्वारा भागने का प्रयत्न किया, पर सिकंदर ने नगर को ध्वस्त कर दिया। इस युद्ध में कठों के 17,000 वीर काम आये और 70,000 बंदी बना लिए गए।
यूनानी लेखक खुद लिखते हैं, इस युद्ध में असामान्य रूप से यूनानी घायल हुए। ये विजय सिकंदर को बहुत महंगी पड़ी।
सोचिए, वो जाति जिसने दुनिया जीतने वाले सिकंदर को इतना नुकसान पहुँचाया।
इस हार के बाद कठ जाति का बिखराव शुरू हुआ। पंजाब के मैदानों से ये उत्तरप्रदेश तथा काठियावाड़ क्षेत्रों की ओर चले गए।
और यहीं से दूसरा इतिहास शुरू होता है, काठियावाड़ का इतिहास।
कर्नल जेम्स टॉड ने अपने ग्रंथ पश्चिमी भारत की यात्रा में काठियों को मध्य एशिया से आए हुए माना है। उन्होंने काठी जाति को राजपूतों का एक अंग माना है जो अपने गौरवपूर्ण ऊँचे कद और वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। ये लोग अपनी तलवार की भांति हल की भी पूजा करते थे।
टॉड ने राजस्थान के इतिहास में काठी या काठिया जाति को राजपूतों के छत्तीस कुलों में से एक माना है। उन्होंने इस जाति के चार भेद किए हैं, गढ़वाल, मंडलीवाल, पठारिया और दुलभुहा।
आज भी कतिया समाज में गढ़वाल, पठारिया जैसे गोत्र और उपनाम प्रचलित हैं। इससे स्पष्ट प्रमाणित होता है कि काठी या काठिया का ही अपभ्रंश कतिया है।
आइन-ए-अकबरी में अबुल फजल ने काठी को अहीर मूल का बताया है। और गुजरात के प्रायद्वीपीय क्षेत्र में पाई जाने वाली ये जाति, जिसे काठी दरबार भी कहा जाता है, उसी के कारण सौराष्ट्र का नाम काठियावाड़ पड़ा।
यानी पूरे एक प्रांत का नाम इस जाति के नाम पर पड़ा।
अब सवाल है, काठियावाड़ से मध्यप्रदेश कैसे आए?
इतिहास कहता है, संभवतः ई सन के आरम्भिक चरण में ये मालवों के साथ होते हुए राजस्थान से दक्षिणवर्ती राज्य सौराष्ट्र में आ बसे। राजपुताने के भट्ट ग्रंथों से पता चलता है कि इन्होंने यादवों से बड़ा युद्ध किया था। महाराजा पृथ्वीराज चौहान तथा जयचंद्र की सेनाओं में भी ये वीर जाति सेनानी का कार्य करती थी।
काठियावाड़ से ही इनका विस्तार मध्यप्रदेश की ओर बढ़ा। नर्मदा तटवर्ती प्रदेशों में पश्चिम से पूर्व की ओर ये बढ़ते गए।
नर्मदांचल में इनकी एक शाखा में गोत्रनाम नाग, नागवंशी, नागोत्रा मिलते हैं तथा इनके इष्टदेव शिव हैं।
यहाँ एक बहुत दिलचस्प कड़ी जुड़ती है नागवंश से।
होशंगाबाद जिले की सोहागपुर तहसील में भटगांव नामक स्थल 13वीं, 14वीं शताब्दी में नागराजाओं की राजधानी था। और मध्यप्रदेश में होशंगाबाद काठियों का भी केंद्र स्थल रहा है। संभवतः यहीं से इस जाति का फैलाव मध्यप्रदेश के शेष हिस्सों में हुआ।
गुप्त साम्राज्य से पहले उत्तर और मध्य भारत में नागवंश के बड़े राज्य थे। विदिशा में गणपतिनाग का राज्य, पद्मपवाया में नागसेन का राज्य। इतिहास साक्षी है कि आर्यों का नागों के साथ सांस्कृतिक समन्वय होता आया था। कुन्ती का नाग कन्या होकर भी पांडव की रानी बनना, उलूपी नागकन्या का अर्जुन की पत्नी बनना, इसके ठोस प्रमाण हैं।
इसी सांस्कृतिक समन्वय से कतिया समाज में शिव भक्ति और नाग गोत्र आए।
अब आते हैं नाम के अपभ्रंश पर।
कई इतिहासकार मानते हैं, ये जाति पहले कठ थी, फिर काठी, फिर काठिया, और फिर कतिया बनी।
मिस्टर क्रुक का मत है कि इनके पुरखे कभी शासन का विरोध करने पर कैद कर लिए गए थे और इस शर्त पर छोड़े गए कि उनकी औरतें सूत कातने का धंधा करेंगी। इसी कारण कहीं कहीं इन्हें रहटा राजपूत भी कहा जाता है। मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में कतिया समाज के लोगों को रेहटा राजपूत कहा जाता है।
और सूत कातने के कारण ही कठिया से अपभ्रंशित होकर कतिया नाम पड़ गया।
पर ये ध्यान रखिए, ये सिर्फ एक व्यवसायिक पहचान थी। लेखक खुद सवाल करता है, क्या सभ्यता के उत्कर्ष काल से लगातार यह जाति सिर्फ सूत कातती आई है? भारत की समस्त मानवता का भरण पोषण कृषि कर्म पर आधारित है।
वास्तव में इनका मुख्य काम किसानी, कृषि तथा मजदूरी रहा है।
अब सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण बात।
कतिया जाति आदिकाल से काठियावाड़ क्षत्रिय जाति से है, जिसे काठियावाड़ी काठी, काठिया कहा जाता रहा है, जोकि समाज की आधुनिक परिस्थितियों के कारण और समाज की मांग को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जाति में रखा गया है।
लेकिन इतिहास देखा जाए तो कतिया जाति भारत की मूलनिवासी जनजाति के अंतर्गत है और मध्यप्रदेश राज्य के आदिवासी समुदाय के भगत माने जाते हैं।
भगत का मतलब क्या है? कतिया जाति के लोग भगत के रूप में आदिवासियों के यहाँ उनके कुलदेवता की पूजन अर्चना भी कराते हैं। ये इनका सम्मानित स्थान था।
पर आर्थिक और शारीरिक प्रबलता कमजोर होने के कारण, युद्धों में परास्त होने के कारण, इन्हें अपना क्षत्रिय जनेऊ तक बेरी के पेड़ पर फेंकना पड़ा। आज भी शादी विवाह में मातृका पूजन के दिन पितरों को बुलाकर पूजन करके क्षत्रिय जनेऊ जरिया के पेड़ पर डाला जाता है।
ये कहानी है गौरव से संघर्ष तक की।
संस्कृति की बात करें तो कतिया जाति के लोग हिंदी बोलते हैं, अपनी कतियाई बोली भी बोलते हैं जो गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र से मेल खाती है।
हिंदू धर्म इनका मुख्य धर्म है। राष्ट्रीय स्तर पर देवता, देवों के देव महादेव भगवान भोलेनाथ तथा महान शिव भक्त संत शिरोमणि भूरा भगत जी की पूजा अर्चना की जाती है।
महाशिवरात्रि बड़े धूमधाम से मनाते हैं। संत शिरोमणि भूरा भगत जी का प्राकट्य जन्म उत्सव वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाते हैं।
कुलदेवता के रूप में महादेव शिवशंकर, काला बाबा, नारायण देव, दूल्हादेव, पांचो पंड्या छठे नारायण, कुलदेवी के रूप में माता हिंगलाज, काली, दुर्गा, गौरा पार्वती आदि की पूजा होती है।
आदिकाल से हिंगलाज देवी को पूजने के प्रमाण मिलते हैं। हिंगलाज देवी डोडिया राजपूत की प्रथम कुलदेवी पूजनीय है। चूंकि कतिया समाज भी क्षत्रिय समाज से है इसलिए यहाँ हिंगलाज माता का वर्णन किया गया है।
आज आवश्यकता है उसके अन्वेषण की, उसके अध्ययन और अध्यापन की, जन जन में उसके प्रचार प्रसार की। क्योंकि सभ्यता के प्रथम चरण में यह जाति वैदिक साहित्य के संरक्षक और व्याख्याकार के रूप में तथा तलवार धारक वीर रक्षक के रूप में दिखाई पड़ती है।
तो साथियों, ये था कतिया जाति का इतिहास। वैदिक काल के कठ, सिकंदर से युद्ध करने वाले योद्धा, काठियावाड़ को नाम देने वाले काठी दरबार, नर्मदा घाटी के नागवंशी क्षत्रिय, और आज के परिश्रमी किसान, मजदूर, भगत।
एक ही जाति, कितने रूप।
आप इस इतिहास के बारे में क्या सोचते हैं? कमेंट में जरूर बताइए।
कतिया जाति का असली इतिहास क्या है? क्या कतिया क्षत्रिय हैं? कतिया जाति की उत्पत्ति कत्ती तलवार से हुई या सूत कातने से?
इस वीडियो में हमने कतिया / काठिया क्षत्रिय समाज के 3000 साल पुराने इतिहास को उजागर किया है - वैदिक काल के कठ गणराज्य से लेकर सिकंदर के साथ युद्ध, काठियावाड़ नामकरण, कर्नल जेम्स टॉड द्वारा 36 राजपूत कुलों में शामिल करना, नर्मदा अंचल में प्रवास, नागवंश से संबंध, और SC में शामिल होने तक की पूरी कहानी।
स्रोत: रसेल और हीरालाल, कर्नल जेम्स टॉड, समाज को आह्वान पुस्तक, विकिपीडिया।
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