लोकसखा पर पढ़ें सटीक जाति इतिहास, पौराणिक कथाएं, मंदिर दर्शन और डॉ. आलोक द्वारा मुक्तिधाम व गौशालों को दान किए गए बेंच व नकद सहयोग की पूरी जानकारी। संस्कृति और समाज: पौराणिक गाथाएं, जाति इतिहास और दान-महिमा: भीष्म पितामह की दर्दनाक कथा: एक प्रतिज्ञा, जिसने सब बर्बाद कर दिया

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28.8.26

भीष्म पितामह की दर्दनाक कथा: एक प्रतिज्ञा, जिसने सब बर्बाद कर दिया

 भीष्म पितामह की दर्दनाक कथा



क्या कोई प्रतिज्ञा इतनी भारी हो सकती है कि उसकी कीमत पूरे साम्राज्य को अपने खून से चुकानी पड़े? क्या कोई इंसान इतना शक्तिशाली हो सकता है कि साक्षात मृत्यु भी उसकी अनुमति के बिना उसे छू न सके, लेकिन फिर भी वो इतिहास का सबसे लाचार और बेबस इंसान बनकर जिए? महाभारत के युद्ध में अर्जुन के गांडीव से छूटे तीर जब एक-एक करके देवव्रत के सीने में समा रहे थे और जब उनका पूरा शरीर तीरों की शैया पर टिक गया, तब उनके मन में क्या चल रहा था? क्या उन्हें अपनी उस प्रतिज्ञा पर पछतावा हो रहा था जिसने हस्तिनापुर के सिंहासन को सुरक्षित करने के बजाय, उसे हमेशा के लिए श्मशान बना दिया? आज हम गंगापुत्र भीष्म की उसी दर्दनाक और विचलित कर देने वाली महागाथा को जानेंगे, जहाँ एक बेटा अपने पिता की खुशी के लिए अपना सर्वस्व दान कर देता है, लेकिन नियति उस दान के बदले में उसे इतिहास का सबसे बड़ा खलनायक या सबसे बेबस गवाह बना देती है।
इस कहानी की शुरुआत होती है हस्तिनापुर के प्रतापी राजा शांतनु से, जो एक दिन गंगा के किनारे टहल रहे थे और उनकी नजर साक्षात नदी सूक्त की देवी गंगा पर पड़ी। शांतनु उनके रूप पर मोहित हो गए और विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा ने विवाह तो स्वीकार किया, लेकिन एक भयानक शर्त रखी कि राजा कभी उनके किसी काम पर सवाल नहीं उठाएंगे, जिस दिन सवाल उठाया, गंगा उन्हें छोड़कर चली जाएगी। प्यार में डूबे शांतनु ने शर्त मान ली। इसके बाद जो हुआ, उसने शांतनु के कलेजे को चीर कर रख दिया। गंगा के गर्भ से जो भी संतान जनमती, गंगा उसे अपने ही हाथों नदी की तेज धार में बहा देती। एक-एक करके सात बेटों को गंगा ने नदी में विसर्जित कर दिया और राजा शांतनु अपने वचन में बंधे होने के कारण कुछ न बोल सके। लेकिन जब आठवां बेटा हुआ और गंगा उसे भी नदी में बहाने चली, तो शांतनु का सब्र टूट गया। उन्होंने गंगा का हाथ पकड़ लिया और कहा कि तुम कैसी मां हो जो अपनी ही संतानों की हत्या कर रही हो? शांतनु के इस सवाल के साथ ही गंगा की शर्त टूट गई। गंगा ने मुस्कुराकर कहा कि राजन, ये आठों वसु थे जिन्हें वसिष्ठ ऋषि का श्राप था, मैंने सात को जल्दी मुक्त कर दिया, लेकिन इस आठवें को मैं अपने साथ ले जा रही हूँ, इसे मैं पालकर तुम्हें वापस सौंप दूंगी। यही आठवां पुत्र देवव्रत बना, जिसे हम भीष्म के नाम से जानते हैं।


देवव्रत को साक्षात भगवान परशुराम ने अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी और देवगुरु बृहस्पति ने उन्हें राजनीति और वेदों का ज्ञान दिया। जब देवव्रत सर्वगुण संपन्न होकर हस्तिनापुर लौटे, तो राजा शांतनु की खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने तुरंत देवव्रत को युवराज घोषित कर दिया। पूरा हस्तिनापुर अपने नए होने वाले राजा की योग्यता देखकर झूम रहा था। लेकिन नियति ने हस्तिनापुर के भाग्य में कुछ और ही लिखा था। एक दिन राजा शांतनु यमुना नदी के तट पर घूम रहे थे, जहाँ उनकी नजर केवटराज की अत्यंत सुंदर पुत्री सत्यवती पर पड़ी। शांतनु एक बार फिर प्रेम के जाल में बंध गए और उन्होंने केवटराज से सत्यवती का हाथ मांग लिया। लेकिन केवटराज एक चतुर और दूरदर्शी व्यक्ति थे। उन्होंने राजा के सामने एक ऐसी शर्त रख दी जिसने शांतनु के पैरों तले से जमीन खिसका दी। केवटराज ने कहा कि राजा शांतनु, मुझे आपकी रानी बनने में अपनी बेटी की कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मेरी एक शर्त है कि आपकी मृत्यु के बाद हस्तिनापुर के सिंहासन पर मेरी बेटी सत्यवती की संतान ही बैठेगी, आपका बड़ा बेटा देवव्रत नहीं। शांतनु देवव्रत से अगाध प्रेम करते थे और वे जानते थे कि देवव्रत जैसा योग्य राजा हस्तिनापुर को कभी नहीं मिल सकता। उन्होंने केवटराज की इस अनुचित मांग को ठुकरा दिया और उदास मन से महल लौट आए।
राजा शांतनु अंदर ही अंदर घुटने लगे। वे न तो सत्यवती को भूल पा रहे थे और न ही अपने प्रिय पुत्र देवव्रत के साथ अन्याय कर पा रहे थे। उनकी यह उदासी और गिरता स्वास्थ्य देवव्रत से छुपा न रहा। देवव्रत ने राजा के सारथी से सारी बात उगलवा ली और बिना किसी को बताए, वे सीधे केवटराज के पास पहुंच गए। देवव्रत ने केवटराज से कहा कि हे केवटराज, आप अपनी पुत्री का विवाह मेरे पिता से कर दीजिए, मैं स्वतः ही हस्तिनापुर के सिंहासन का त्याग करता हूँ और प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं कभी राजा नहीं बनूँगा। केवटराज ने देवव्रत की इस उदारता को देखा, लेकिन वे फिर भी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने देवव्रत से एक और तीखा सवाल किया कि कुमार, आप तो महान हैं, आपने सिंहासन छोड़ दिया, लेकिन कल को जब आपकी संतानें होंगी, तो वे बहुत शक्तिशाली होंगी। क्या इस बात की गारंटी है कि आपके पुत्र मेरी बेटी के पुत्रों से सिंहासन नहीं छीनेंगे? तब क्या होगा? केवटराज का यह सवाल सुनते ही देवव्रत के भीतर का क्षत्रिय और एक समर्पित पुत्र जाग उठा। उन्होंने आकाश की तरफ देखा और पंचभूतों को गवाह मानकर एक ऐसी भीषण प्रतिज्ञा ली जिसकी गूंज आज हजारों साल बाद भी सुनाई देती है। देवव्रत ने कहा कि हे केवटराज, मैं आज इस भरी सभा में यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा, मैं कभी विवाह नहीं करूँगा और मेरी कोई संतान नहीं होगी। इस भयानक प्रतिज्ञा को सुनते ही देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और चारों तरफ एक ही आवाज गूंज उठी—भीष्म! भीष्म! यानी जिसने इतनी कठिन और भीषण प्रतिज्ञा ली हो।
जब शांतनु को इस बात का पता चला, तो वे रो पड़े। उन्होंने अपने पुत्र के इस महान त्याग को देखकर भावुक होकर उन्हें एक वरदान दिया—इच्छा मृत्यु का वरदान। शांतनु ने कहा कि पुत्र देवव्रत, तुमने मेरे लिए अपना पूरा जीवन, अपना सुख और अपना वंश दांव पर लगा दिया, इसलिए जब तक तुम खुद नहीं चाहोगे, मृत्यु तुम्हारे पास फटक भी नहीं सकेगी। लेकिन यहाँ पर इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना शुरू होती है। पौराणिक कथाओं के जानकार डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार, भीष्म की यह प्रतिज्ञा केवल एक पुत्र का अपने पिता के प्रति प्रेम नहीं थी, बल्कि हस्तिनापुर के भविष्य को अंधकार में धकेलने वाली एक ऐसी भूल थी जिसने कुरुवंश को अंतहीन विवादों में फंसा दिया। डॉ. दयाराम आलोक का मानना है कि यदि भीष्म ने वह प्रतिज्ञा न की होती, तो हस्तिनापुर को एक न्यायप्रिय और शक्तिशाली राजा मिलता, साम्राज्य कभी कमजोर हाथों में न जाता और न ही महाभारत का वह विनाशकारी युद्ध होता जिसने लाखों महिलाओं को विधवा और पूरे भारतवर्ष को अनाथ कर दिया। भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा से अपने पिता को तो सुखी कर दिया, लेकिन उन्होंने राज्य के प्रति अपने राजधर्म को भुला दिया।
इसके बाद शांतनु और सत्यवती का विवाह हुआ। उनके दो पुत्र हुए—चित्रांगद और विचित्रवीर्य। लेकिन नियति का खेल देखिए, राजा शांतनु की मृत्यु के कुछ समय बाद ही चित्रांगद एक गंधर्व युद्ध में मारे गए। अब सिंहासन पर विचित्रवीर्य को बैठाया गया, जो स्वभाव से बहुत कमजोर और विलासी थे। जब विचित्रवीर्य के विवाह की उम्र आई, तो भीष्म को पता चला कि काशीराज की तीन पुत्रियों—अंबा, अंबिका और अंबालिका का स्वयंवर हो रहा है। भीष्म हस्तिनापुर के साम्राज्य को सुरक्षित और शक्तिशाली बनाए रखने के लिए अकेले ही काशी पहुंच गए। उन्होंने वहाँ मौजूद सभी राजाओं को युद्ध में परास्त कर दिया और तीनों राजकुमारियों का बलपूर्वक हरण करके हस्तिनापुर ले आए। भीष्म को लगा कि उन्होंने अपने भाई के लिए बहुत बड़ा काम किया है, लेकिन यहीं से उनके जीवन का पहला बड़ा श्राप और दर्द शुरू हुआ। जब महल में विवाह की तैयारियां हो रही थीं, तब बड़ी राजकुमारी अंबा भीष्म के पास आई और रोते हुए कहा कि हे गांगेय, मैं मन ही मन शाल्व देश के राजा को अपना पति मान चुकी हूँ और वे भी मुझसे प्रेम करते हैं, आप मुझे बलपूर्वक यहाँ ले आए, लेकिन मेरा मन उनके पास ही है। भीष्म जो धर्म के ज्ञाता थे, उन्होंने अंबा की बात का सम्मान किया और उन्हें पूरे सम्मान के साथ राजा शाल्व के पास भेज दिया।
लेकिन दर्द की दास्तान यहाँ खत्म नहीं हुई। जब अंबा राजा शाल्व के पास पहुँची, तो शाल्व ने उसे अपनाने से साफ मना कर दिया। शाल्व ने कहा कि जिसे भीष्म ने युद्ध में जीतकर अपने रथ पर बैठाया हो, उसे मैं अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। तुम वापस भीष्म के पास जाओ। अंबा असहाय होकर वापस हस्तिनापुर भीष्म के पास आई और उसने भीष्म से कहा कि अब मेरा कोई आसरा नहीं है, इसलिए आप ही मुझसे विवाह कीजिए। लेकिन भीष्म अपनी भीषण प्रतिज्ञा से बंधे हुए थे। उन्होंने कहा कि हे देवी, मैं चाहकर भी तुमसे विवाह नहीं कर सकता क्योंकि मैंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है। अंबा ने भीष्म से बहुत मिन्नतें कीं, रोई-चिल्लाई, लेकिन भीष्म टस से मस नहीं हुए। क्रोध और अपमान की आग में जलती हुई अंबा ने भीष्म को श्राप दिया कि भीष्म, तुम्हारी इस प्रतिज्ञा के कारण आज मेरा जीवन नष्ट हो गया है, मेरा यह अपमान ही तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा। मैं अगले जन्म में लौटकर आऊँगी और तुम्हारी मौत का जरिया बनूँगी। यही अंबा अगले जन्म में राजा द्रुपद के यहाँ शिखंडी के रूप में पैदा हुई, जो महाभारत के युद्ध में भीष्म की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बना।
समय बीतता गया और भीष्म के जीवन का दर्द गहराता गया। विचित्रवीर्य की भी बिना किसी संतान के असमय मृत्यु हो गई। अब सत्यवती के सामने संकट था कि कुरुवंश का नाम कैसे आगे बढ़े? सत्यवती ने गिड़गिड़ाते हुए भीष्म से कहा कि पुत्र भीष्म, अब तुम अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दो और कुरुवंश को बचाने के लिए विवाह कर लो या नियोग प्रथा से संतान उत्पन्न करो। लेकिन भीष्म ने कहा कि माता, सूरज अपनी रोशनी छोड़ सकता है, धरती अपना धैर्य छोड़ सकती है, लेकिन भीष्म अपनी प्रतिज्ञा कभी नहीं तोड़ सकता। अंततः महर्षि वेदव्यास के आशीर्वाद से अंबिका और अंबालिका से धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म हुआ। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे और पांडु अस्वस्थ। भीष्म ने इन दोनों बच्चों को पाला-पोषा, उन्हें बड़ा किया और हस्तिनापुर को संभाला। भीष्म अब राजा नहीं थे, वे केवल सिंहासन के संरक्षक थे। वे एक ऐसी प्रतिज्ञा के पिंजरे में बंद हो चुके थे जहाँ से वे कुरुवंश को बिखरते हुए देख तो सकते थे, लेकिन अपनी शर्तों के कारण उसे रोक नहीं पा रहे थे।
जब कुरुवंश की अगली पीढ़ी यानी कौरव और पांडव बड़े हुए, तो भीष्म का दर्द और बढ़ गया। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र यानी कौरव, विशेषकर दुर्योधन, बचपन से ही ईर्ष्या और अहंकार से भरे हुए थे। भीष्म दोनों पक्षों से प्यार करते थे, लेकिन दुर्योधन हमेशा भीष्म पर यह आरोप लगाता था कि वे पांडवों का पक्ष लेते हैं। भीष्म जो पूरे आर्यावर्त के सबसे शक्तिशाली योद्धा थे, अपने ही घर में रोज अपमानित हो रहे थे। वे देख रहे थे कि कैसे दुर्योधन और शकुनि मिलकर पांडवों के खिलाफ षड्यंत्र रच रहे हैं। लाक्षागृह की घटना हो या पांडवों को जुए में हराने की साजिश, भीष्म सब कुछ जानते हुए भी असहाय थे। क्यों? क्योंकि उनकी प्रतिज्ञा ने उनके हाथ बांध दिए थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जो भी हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठेगा, वे उसके प्रति वफादार रहेंगे और उसकी आज्ञा का पालन करेंगे। सिंहासन पर धृतराष्ट्र बैठे थे, जो अपने पुत्र दुर्योधन के मोह में अंधे थे। इसलिए दुर्योधन जो भी पाप करता, भीष्म उसे राजधर्म की दुहाई देकर रोकने की कोशिश तो करते, लेकिन जब दुर्योधन उनकी बात नहीं मानता, तो भीष्म सिर झुकाकर बैठ जाते।
भीष्म के जीवन का सबसे काला और सबसे दर्दनाक अध्याय तब आया, जब हस्तिनापुर की भरी सभा में कुरुवंश की कुलवधू द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था। दुशासन द्रौपदी के बाल पकड़कर उसे खींचते हुए ला रहा था, शकुनि हंस रहा था, दुर्योधन अपनी जांघ ठोक रहा था, और द्रौपदी रोते हुए, चिल्लाते हुए कुरुवंश के सबसे बड़े बुजुर्ग भीष्म पितामह की तरफ देखकर न्याय की भीख मांग रही थी। द्रौपदी ने भीष्म से पूछा कि हे पितामह, आप तो धर्म के प्रतीक हैं, शास्त्रों के ज्ञाता हैं, मुझे बताइए कि क्या धर्मराज युधिष्ठिर खुद को हारने के बाद मुझे दांव पर लगा सकते थे? क्या इस तरह एक स्त्री का अपमान कुरुसभा की परंपरा है? उस समय भीष्म पितामह ने अपना सिर नीचे झुका लिया। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकला। उन्होंने केवल इतना कहा कि हे पुत्री, धर्म की गति बहुत सूक्ष्म है, मैं इस समय असमर्थ हूँ। इतिहास ने भीष्म को उस दिन कभी माफ नहीं किया। भीष्म की वह चुप्पी उनके जीवन का सबसे बड़ा पाप बन गई। साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने बाद में भीष्म से कहा था कि पितामह, जिस सभा में स्त्री का अपमान हो रहा हो, और वहाँ बैठा कोई ज्ञानी व्यक्ति यदि अपनी प्रतिज्ञा या नियमों की दुहाई देकर चुप रहे, तो वह भी उस पाप का बराबर का भागीदार बन जाता है। भीष्म का वह मौन कुरुवंश के विनाश का डेथ वारंट था।
और अंततः वह घड़ी आ ही गई जिसका डर सबको था—महाभारत का युद्ध। एक तरफ धर्म के प्रतीक पांडव थे जिनके साथ साक्षात नारायण यानी श्रीकृष्ण थे, और दूसरी तरफ अधर्म के प्रतीक कौरव थे। भीष्म पितामह जानते थे कि कौरव अधर्म पर हैं और उनका विनाश निश्चित है, लेकिन कुरु सिंहासन के प्रति अपनी वफादारी की प्रतिज्ञा के कारण उन्हें कौरवों की तरफ से लड़ना पड़ा। युद्ध की शुरुआत से पहले जब अर्जुन और युधिष्ठिर पितामह के पैर छूकर आशीर्वाद लेने आए, तो भीष्म की आंखों में आंसू थे। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि पुत्र, मेरा शरीर कौरवों के अन्न से पला है, इसलिए मैं लड़ूँगा तो उनकी तरफ से, लेकिन मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है कि विजय तुम्हारी ही हो। सोचिए, उस योद्धा की मानसिक स्थिति क्या रही होगी जिसे पता है कि वह जिसके लिए लड़ रहा है वह गलत है, और वह जिन्हें मार रहा है वे उसके अपने पोते हैं जिन्हें उसने अपनी गोद में खिलाया था।
युद्ध के पहले दस दिनों तक भीष्म ने पांडव सेना में कोहराम मचा दिया। कोई भी योद्धा उनके सामने टिक नहीं पा रहा था। दुर्योधन ने फिर भी भीष्म पर ताना मारा कि पितामह आप जानबूझकर पांडवों को नहीं मार रहे हैं क्योंकि आप उनसे प्यार करते हैं। इस अपमान से दुखी होकर भीष्म ने प्रतिज्ञा की कि कल या तो मैं अर्जुन का वध कर दूँगा या श्रीकृष्ण को शस्त्र उठाने पर मजबूर कर दूँगा, जिन्होंने युद्ध में हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा की है। अगले दिन भीष्म ने ऐसा भयंकर युद्ध किया कि अर्जुन के रथ के घोड़े घायल हो गए और अर्जुन असहाय हो गए। अपने भक्त अर्जुन के प्राण संकट में देखकर भगवान श्रीकृष्ण अपना आपा खो बैठे। वे रथ का एक पहिया उठाकर भीष्म की तरफ दौड़े। भीष्म ने जब भगवान को अपनी तरफ आते देखा, तो उन्होंने अपने धनुष-बाण रख दिए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। भीष्म ने कहा कि आइए प्रभु, यदि आपके हाथों मेरी मृत्यु होती है, तो मुझसे ज्यादा भाग्यशाली इस संसार में कोई नहीं होगा। श्रीकृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी, लेकिन भीष्म की इच्छा पूरी कर दी।
पांडव समझ गए थे कि जब तक भीष्म पितामह के हाथ में धनुष है, तब तक युद्ध जीतना नामुमकिन है। तब श्रीकृष्ण के इशारे पर युधिष्ठिर खुद भीष्म के पास पहुंचे और उनसे उनकी मृत्यु का उपाय पूछा। भीष्म ने मुस्कुराते हुए कहा कि पुत्र, मैं किसी भी ऐसे व्यक्ति पर शस्त्र नहीं उठाता जो कभी स्त्री रहा हो या जिसका व्यवहार स्त्री जैसा हो। तुम कल युद्ध में अर्जुन के रथ के आगे शिखंडी को खड़ा कर देना। अगले दिन कुरुक्षेत्र के मैदान में वही हुआ। अंबा का अगला जन्म, यानी शिखंडी, अर्जुन के रथ के आगे आकर खड़ा हो गया। जैसे ही भीष्म ने शिखंडी को देखा, उन्होंने अंबा के उस श्राप को याद किया और अपना धनुष नीचे रख दिया। भीष्म ने अस्त्र त्याग दिए थे, लेकिन अर्जुन के पास अब कोई चारा नहीं था। श्रीकृष्ण के आदेश पर अर्जुन ने शिखंडी के पीछे से भीष्म पर तीरों की बौछार कर दी। सैकड़ों तीर भीष्म के सीने और पूरे शरीर के पार हो गए। महाबली भीष्म रथ से नीचे गिर पड़े। लेकिन उनका शरीर जमीन पर नहीं गिरा। उनके शरीर में इतने तीर धंसे हुए थे कि तीरों का एक बेड यानी सरशैया बन गई।
जब पितामह भीष्म गिरे, तो कौरव और पांडव दोनों पक्षों के योद्धा युद्ध रोककर उनके पास दौड़ पड़े। भीष्म का सिर नीचे लटक रहा था। उन्होंने कहा कि मुझे सिर टिकाने के लिए तकिया चाहिए। दुर्योधन दौड़कर रेशमी तकिए ले आया, लेकिन भीष्म ने मुस्कुराकर मना कर दिया। उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा। अर्जुन ने रोते हुए गांडीव से तीन बाण धरती में मारे, जिससे एक सुंदर तीरों का सिरहाना बन गया जिस पर भीष्म ने अपना सिर टिकाया। फिर पितामह ने कहा कि मुझे प्यास लगी है। दुर्योधन ने सोने के कलश में पानी मंगवाया, लेकिन भीष्म ने उसे भी मना कर दिया। अर्जुन ने फिर एक बाण धरती में मारा और वहाँ से गंगा की एक तेज धारा फूटी जो सीधे भीष्म पितामह के मुख में गई। अपनी मां गंगा के पानी को पीकर भीष्म तृप्त हो गए।
लेकिन भीष्म ने उस समय अपने प्राण नहीं त्यागे। सूर्य उस समय दक्षिणायन में था, और शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन में प्राण त्यागने पर मोक्ष नहीं मिलता। भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान था, इसलिए उन्होंने तय किया कि जब तक सूर्य उत्तरायण में नहीं आ जाता, वे इसी सरशैया पर लेटे रहेंगे और तड़पते रहेंगे। पूरे ५८ दिनों तक भीष्म पितामह उस भयानक दर्द को सहते हुए तीरों की शैया पर लेटे रहे। उस दौरान पांडव रोज उनके पास आते थे और भीष्म ने युधिष्ठिर को राजधर्म, मोक्षधर्म और दानधर्म का जो उपदेश दिया, उसे आज हम 'भीष्म गीता' या महाभारत के शांति पर्व के रूप में जानते हैं। मृत्यु के ठीक पहले जब श्रीकृष्ण उनके पास आए, तो भीष्म ने उनसे एक सवाल पूछा कि हे अच्युत, मैंने अपने जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया, फिर मुझे यह तीरों की शैया पर तड़पने की इतनी भयानक सजा क्यों मिल रही है? तब श्रीकृष्ण ने उन्हें उनके पिछले जन्मों का याद दिलाया कि पितामह, आज से १०१ जन्म पहले आपने एक अनजाने में एक टिड्डे की पीठ में कांटा चुभाया था, उसी कर्म का फल आज आपको भुगतना पड़ रहा है। कर्म का चक्र किसी को नहीं छोड़ता, चाहे वह स्वयं भीष्म पितामह ही क्यों न हों।
अंततः माघ महीने की शुक्ल अष्टमी को जब सूर्य उत्तरायण हुआ, भीष्म पितामह ने अपनी आंखें बंद कीं और अपने प्राण त्याग दिए। उनके जाते ही कुरुवंश का सबसे मजबूत स्तंभ ढह गया। गंगापुत्र भीष्म की यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अगर उसका विवेक उसकी प्रतिज्ञाओं या नियमों का गुलाम बन जाता है, तो वह समाज का कल्याण नहीं कर सकता। भीष्म ने प्रतिज्ञा निभाई, लेकिन धर्म हार गया। उन्होंने अपने पिता को सुख दिया, लेकिन पूरे वंश को उजाड़ दिया।
मित्रों, भीष्म पितामह की इस दर्दनाक गाथा पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि भीष्म को द्रौपदी के चीरहरण के समय अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर दुर्योधन को दंड देना चाहिए था? क्या उनका मौन ही कुरुवंश के विनाश का असली कारण था? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। अगर आपको यह वीडियो ज्ञानवर्धक और भावुक लगी हो, तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर करें और अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें। ऐसी ही और भी पौराणिक और ऐतिहासिक गाथाओं को गहराई से जानने के लिए हमारे चैनल को अभी सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन दबाना न भूलें ताकि आने वाली कोई भी वीडियो आपसे मिस न हो। मिलते हैं आपसे अगले वीडियो में, तब तक के लिए जय श्रीकृष्ण!

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

भीष्म पितामह के बारे में आपने बहुत अच्छे से जानकारी प्रस्तुत की है आपका लेख बहुत अच्छा लगा👌👌👌