लोकसखा पर पढ़ें सटीक जाति इतिहास, पौराणिक कथाएं, मंदिर दर्शन और डॉ. आलोक द्वारा मुक्तिधाम व गौशालों को दान किए गए बेंच व नकद सहयोग की पूरी जानकारी। संस्कृति और समाज: पौराणिक गाथाएं, जाति इतिहास और दान-महिमा

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3.12.19

सिख धर्म की जानकारी :Sikh dharm ki jankari




दुनियाभर में कई धर्म और जाति के लोग जाते है। सभी धर्म अपनी खास मान्यताओं और रिवाजों के लिए अपनी एक अलग पहचान रखते है। ऐसा ही एक धर्म है सिख धर्म। बाकी धर्मों में जहाँ लोगों के अलग-अलग सरनेम लगाए जाते है वहीं पर केवल सिख धर्म ही एक ऐसा धर्म है जहां सरनेम की जगह पुरुषों के नाम के साथ 'सिंह' लगाया जाता है, तो महिलाओं के नाम के साथ 'कौर' लगाने का रिवाज है। क्या आप जानना चाहेंगे कि ऐसा कब से शुरू हुआ।
हालांकि सिख धर्म में प्रारम्भ में ये रिवाज नहीं था, बल्कि बाद में इसे शुरू किया गया था। सिख धर्म के अनुसार ऐसा माना गया है कि सन् 1699 के आसपास भारतीय समाज में जाति प्रथा का इस कदर बोलबाला था कि ये एक-दूसरे के लिए अभिशाप बन गया था। जातिवाद की वजह से सिखों के दसवें गुरु 'गुरु गोविन्द सिंह' काफी चिंतित रहा करते थे। वे चाहते थे कि ऐसा कोई रास्ता निकले और किसी भी प्रकार से यह कुप्रथा समाप्त हो जाए। इसलिए उन्होंने 1699 में वैशाखी का पर्व मनाया।
 उस दिन उन्होंने अपने सभी अनुयायियों को एक ही सरनेम रखने का आदेश दिया, ताकि इससे किसी की जाति का पता ना चले और जातिप्रथा पर लगाम लग सके। इसलिए गुरु गोविन्द सिंह ने पुरुषों को 'सिंह' और महिलाओं को 'कौर' सरनेम से नवाजा। कहा जाता है कि तभी सिख धर्म को मानने वाले पुरुष अपने नाम के साथ सिंह और महिलाएं अपने नाम के साथ कौर लगाती है। इतना ही नहीं सिंह और कौर सरनेम लगाने का भी एक खास अर्थ भी होता है। सिंह और कौर में सिंह का आशय होता है 'शेर' तो कौर का आशय होता है 'राजकुमारी'।गुरु गोविन्द सिंह जी चाहते थे कि उनके अनुयायी सिर्फ एक धर्म के नाम से जाने जाये ना कि अलग-अलग जाति से। इसलिए आप देखंगे कि सिख धर्म में जातिप्रथा ना के बराबर है लेकिन बाकी धर्म जैसे कि हिन्दू और मुस्लिम में जातिप्रथा की स्थिति काफी भयावह है।बेशक़ गुरु साहेबान (सिख गुरु) ने हिन्दू समाज की सबसे बड़ी लाहनत, जाति पाति प्रणाली का, सिद्धांत और अमल के स्तर पर ज़ोरदार खंडन करते हुए, सिख समाज में इसकी पूरी तरह से मनाही कर दी थी। गुरु काल के बाद धीरे धीरे सिखी के बुनियादी सिद्धांत कमज़ोर पड़ने शुरू हो गए। जिन हिंदूवादी अभ्यासों का गुरु साहेबान ने खंडन किया था, उन्होंने सिख धर्म और समाज को फिर से अपने क़ातिलाना शिकंजे में ले लिया। हिन्दूवाद के दुष्प्रभावों का सबसे गाढ़ा इज़हार सिख पंथ में जात पात प्रणाली की फिर से अमल के रूप में हुआ। ऐसे अनेक ऐतिहासिक प्रमाण और हवाले मिलते हैं जो उनीसवीं सदी तक सिख पंथ के फिर से जात-पात प्रबंध की मुकम्मल जकड़ में आ जाने की पुष्टि करते हैं।
 उनीसवीं सदी के दुसरे अर्ध दौरान बेशक़ सिंह सभा लहर द्वारा आरंभ सुधारमुखी गतिविधियों ने सिख समाज को हिंदूवादी प्रभावों से मुक्त करने में कुछ काबिले-तारीफ़ सफलताएं हांसिल की। लेकिन जात-पात का कोढ़ सिख समाज में इस कदर फ़ैल चुका था कि 'सिंघ सभा लहर' के आगूओं की इंक़लाबी कोशिशों के बावजूद सिख पंथ इस नामुराद रोग के असरों से मुक्त न हो सका। फिर भी सिंह सभा लहर द्वारा सिखी के मूल सिद्धान्तों और मौलिक परम्पराओं की फिर से स्थापति के लिए चलाई वैचारिक मुहीम का इतना असर ज़रूर हुआ कि पंथ के रौशन ख्याल हिस्सों में जात-पात को ख़त्म करने ले लिए न्या जोश और उत्साह पैदा हो गया और उन्होंने सिख समाज को इस हिंदूवादी लाहनत से जुदा करने के लिए तीखी वैचारिक मुहीम शुरू कर दी। नतीजतन, सिख पंथ में जात-पात की खुली तारीफ करने वाले तत्व, खासतौर पर सिखी में, ब्राह्मणवादी खोट मिलाने वाला मुख्य वाहक बना। महंत-पुजारी 'परिवार' सिखी सुधार लहर के हमले की सीधी मार तले आ गया और सिख पंथ के धार्मिक केंद्रों और अभ्यासों में जात-पातिए भेदभाव का खुला प्रदर्शन पहले जितना आम नहीं रहा। पर जहाँ तक आम सामाजिक जीवन का संबंध है, वहां जात पातिए भेदभाव और बाँट-अलगता जैसे की तैसी बरकरार रही। खासतौर पर ग्रामीण समाज में कथित ऊँची जात वर्गों के 'नीच' और 'अछूत' समझे जाते वर्गों के प्रति जातिय अभिमानी तरीकों और बर्ताव में कोई कमी नहीं आई।
 सच यह था कि सिख पंथ में से ब्राह्मण वर्ग जिस्मानी तौर पर भले ही गायब हो चुका था लेकिन सोच के स्तर पर वह सिख समाज में ज्यों का त्यों हाज़िर-नाज़िर था। रोज़मर्रा ज़िन्दगी में जात पातिए भेदभाव और विरोध-अलगता के हिसाब से हिन्दू और सिख समाज में कोई मूलभूत अंतर नहीं रहा। हाँ, गुरु साहेबान की इंक़लाबी विचारधारा की प्रेरणा और प्रभाव तले सिख लहर द्वारा अपने आरंभिक दौर में पूरे किये इंक़लाबी कार्यों की बदौलत सिख समाज में जात पातिए दर्जाबंदी की बुन-बनावट में ज़रूर बड़ा बदलाव आ गया था। जहाँ हिन्दू समाज में ब्राह्मण वर्ग का समाजी दर्जा सब से ऊँचा माना जाता है, वहां सिख समाज में धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में ब्राह्मण वर्ग के प्रभुत्व को पूरी तरह से नकारा है।लेकिन समय पड़ने से जैसे ही सिख समाज फिर से जात पातिए प्रणाली की जकड़ में आ गया तो वह वर्ग जिन्होंने खालसा पंथ के इंक़लाबी दौर में ज़्यादा गतिशील भूमिका निभाने का नाम कमाया था और जिन्हें रिवायती हिन्दू जात पातिए दर्जाबंदी में ब्राह्मण वर्ग से एक या दो दर्ज नीचे समझा जाता था, वह सिख समाज में ऊँचा सामाजिक दर्जा हासिल कर गए। इस तरह, ग्रामीण सिख समाज में जट्ट वर्ग ने और शहरी सिख समाज में खत्री-अरोड़ा वर्ग ने 'सवर्ण जातियों' वाला सामाजिक रुतबा हासिल कर लिया जबकि जात पात की जकड़ में आये वर्गों का पहले वाला दर्जा ही बरक़रार रहा। 'पछड़ी' समझी जाने वाली और अन्य जातियों के सामाजिक दर्जे में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। इस सामाजिक यथार्थ की राजनीतिक क्षेत्र में परछाईं पड़नी स्वाभाविक थी। ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्र में यह बात ज़्यादा चुभनिए रूप में सामने आई।
 गाँव की ग्रामीण ज़िन्दगी की सामाजिक एवं आर्थिक हक़ीक़त यह है कि ग्रामीण दलित वर्ग ज़मीन जायदाद से वंचित, सामाजिक तौर पर सबसे ज़्यादा लताड़ा हुआ, तीखी आर्थिक लूट-खसोट और चुभनिए सामाजिक ज़बर और दबाव का शिकार है। उसकी ज़िन्दगी में हिन्दू सवर्ण जातियों का बहुत सीधा दख़ल नहीं। खेती में मेहनत मज़दूरी करते और ग्रांव में आम जीवन बसर करते उसका ज़्यादातर सीधा वास्ता जट्ट से ही पड़ता है। इस तरह आर्थिक लूट-खसोट और सामाजिक ज़बर, दोनों ही पक्षों से उसका तुरंत विरोध जट्ट किसान से ही है। इस में सीधे रूप में हिन्दू सवर्ण जातियां कहीं भी नहीं आतीं (सिवा ग्रामीण बनिए के, जो दलित वर्ग की आर्थिक मजबूरियों का फायदा उठा के सूदखोरी आदि के ज़रिये उसकी आर्थिक लूट-खसोट में सहभागी बनता है). सो, यह सामाजिक आर्थिक फैक्टर ग्रामीण दलित वर्ग को राजनीतिक तौर पर अकाली दल जिसे कि ग्रामीण क्षेत्र में जट्ट किसानों की राजनीतिक जमात के रूप में ही पहचाना जाता है, के विरोध की तरफ धकेलते हैं। दूसरी तरफ, समूचे भारत में दलित वर्ग, जैसे पंजाब का दलित भाईचारा, भी कोंग्रेस पार्टी को अपना हितैषी पक्ष के रूप में देखता है। उसकी यह धारणा कई पक्षों के मिलेजुले प्रभाव का नतीजा है।
 सब से बड़ी बात यह है कि मोहन दास कर्मचंद गाँधी ने आज के इतिहास में छुआछूत विरुद्ध तीखी लड़ाई शुरू करने और भारत में युगों युगों से मानवीय हक़ों से वंचित किये हुए कर्मों के मारे करोड़ों जनों को भारतीय समाज और राज्य में बराबरी के मानवीय अधिकार उपलब्ध कराने का 'पूण्य' कमा के दलित वर्गों के सर पर अहसानों का कर्ज़ चढ़ा दिया कि कोंग्रेसी लीडर पचास सालों तक निरंतर इस कर्ज़े का सूद वसूल करते आ रहे हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ से दलित वर्ग को सरकारी नौकरियों से ले कर चुने हुए महकमों तक आरक्षण की सहूलियत और ऐसी ही और रियायतें देने से इस वर्ग की कांग्रेस पार्टी से सांझ और पक्की हो गई। इस के उलट, सिंह सभा लहर द्वारा शुरू सिखी सुधार लहर का यश घट जाने के बाद सिख लीडरों ने जात पात के खात्मे के कार्य को लगभग नज़रअंदाज़ ही कर दिया। भारत की आज़ादी के संग्राम के दौरान सिख लीडरों की तरफ से दलित वर्ग के हितों की पैरवी की शायद ही कोई उत्साहित उदहारण मिलती हो। आज़ादी के बाद बेशक़ अकाली लीडरों ने कांग्रेस पार्टी की दलित वर्ग को रिजर्वेशन देने जैसी नीतियों का खुल्लम-खुल्ला विरोध तो नहीं किया पर सिख समाज के अंदर ही कथित उच्च जातियां की इस मसले पर असली भावनाएं कभी भी गुप्त नहीं रहीं। उनकी जात-पातिए भड़ास अक्सर तहज़ीब की हदें पर पार करतीं और दलित संवेदना को रह रह कर घायल करती रहीं। इस से दलित वर्ग, डर और असुरक्षा की भावना से, कांग्रेस पार्टी का और ज़्यादा आसरा क़ुबूल करने की और धकेला जाता रहा।
1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद अकाली दल को राजनीतिक सत्ता की और बढ़ता देखके पंजाब का दलित वर्ग, ख़ास तौर पर इसके भीतरी ग़ैर-सिख हिस्से अपने आप को खतरे के मुहँ में आया महसूस करने लगे। इसी दौरान आर्थिक तौर पर ज़्यादा मालामाल और राजनीतिक तौर पर अधिक बलशाली हुए धनाढ्य किसान वर्ग में अहंकार का पारा ओर ऊँचा चढ़ चला और 'हरे इंक़लाब' के आरंभिक वर्षों दौरान गाँवों में जट्टों द्वारा दलितों की नाकाबंदी की घटनाएं आम हो गईं। इस तरह पंजाब के ग्रामीण क्षेत्र में जाति-पाति की लकीरों पर राजनीतिक धड़ेबंदी का रुझान और बल पकड़ गया जो अकाली दल के लिए एक बेहद घाटे वाली और कांग्रेस पार्टी के लिए बड़े राजनीतिक फायदे वाली बात थी।
 इसलिए, पंजाब में राजनीतिक सत्ता के ऊपर काबिज़ होने के लिए अपने सामाजिक आधार को ज़्यादा खुला करना और अपनी राजनीतिक हिमायत के घेरे को और ज़्यादा वर्गों तक फैलाना अकाली दल की यकदम राजनीतिक ज़रुरत थी। इसके लिए सचेतन सुघड़ रणनीति घड़ने और फिर उसका दृढ़तापूर्वक पालन और पैरवी करने का काम अकाली लीडरशिप का सब से अहम और तुरंत सरोकार वाला काम बनना चाहिए था। सचेत स्तर पर रणनीति घड़ने का मतलब था कि सिख धर्म के बुनियादी सिद्धांतों को मद्देनज़र रखते हुए अकाली दल के दूरअंदेशी उद्देश्यों और तुरंत करने वाले कार्यों में जंचने वाला तालमेल बिठाया जाता और सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए राजनीतिक दावपेंचों के मामले में उपयुक्त लचक लाकर राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का आकर्षक मॉडल ले करके आया जाता। ऐसा करने से पहले सबसे पहले ज़रुरत (और शर्त) यह थी कि सिख राजनीति के सामने इस गंभीर चुनौती को सचेतन क़ुबूल किया जाता और पैदा हुए नए हालातों और समस्याओं के सामने अकाली राजनीति की दरुस्त मार्ग-दिशा तय करने के लिए बौद्धिक स्तर पर गहरे एवं गंभीर यतन किये जाते।
 लेकिन अकाली लीडरशिप या सिख बुद्धिजीवियों के स्तर पर ऐसा कोई सचेतन यतन किया हुआ नज़र नहीं आता। इस महत्वपूर्ण मसले के बारे में अकाली दल या उसके अंदर गंभीर विचार -चर्चा छूने और विचार मंथन के ज़रिये सही निर्णय पर पहुँचने का, किसी भी तरफ से, कोई संजीदा कोशिश नहीं हुई। लेकिन समस्या क्योंकि ख़्याली नहीं बल्कि हक़ीक़त में थी और राजनीति की ज़रूरतें इसके तुरंत हल की मांग करती थीं, इस लिए इसे बिना गहरी सोच-विचार के, मौके पर जैसे और जो ठीक लगा वैसे हल कर लेने की अटकलपच्चू (random) पहुँच अपना ली गई। गहरी और गंभीर मसलों के प्रति अपनाई ऐसी बेकायदा पहुँच पर विवेक के मुक़ाबले अंतरप्रेरणा (instinct and/ or intuition) का तत्व ज़्यादा हावी हो गुज़रता है और फैसले लेते समय अक्सर दूरगामी उद्देश्यों और निशानों के मुक़ाबले सामने पड़े मतलब ज़्यादा वज़नदार हो जाते हैं। अकाली दल के मामले में ठीक यही बात हुई।
 पंजाब में कांग्रेस पार्टी सिख पंथ की अव्वल दुश्मन और अकाली दल की मुख्य विरोधी है। सही अर्थों में बात करनी हो तो पंजाब में सिख पंथ की असली दुश्मन ताक़त आर्य समाजी वर्ग था जो पंजाब के लगभग समूचे हिन्दू भाईचार को अपनी सांप्रदायिक विचारधारा मिलावटीपन चढ़ाने और अपनी सांप्रदायिक चालबाज़ी के गिर्द लामबंद करने में कमाल की हद तक सफल हो गया था। दरअसल पंजाब में कांग्रेस पार्टी आर्य समाज के एक राजनितिक विंग विचर रही रही। पंजाबी हिंदू वर्ग की असली वचनबद्धता आर्य समाजी विचारधारा से है और कांग्रेस पार्टी उसके लिए एक 'फ्रंट जत्थेबंदी' से ज़्यादा और कोई अहमियद नहीं रखती। पंजाब के हिंदू वर्ग और कांग्रेस पार्टी के आपसी संबंधों को समझने के लिए यह तथ्य बहुत ही महत्वपूर्ण है।
 यह कहना कि कांग्रेस पार्टी पंजाब के हिंदू वर्ग को बरगला रही है या अपने संकुचित राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर रही थी या है, सच्चाई को बिगड़े हुए रूप में देखना है। सिख पंथ के संबंध में पंजाबी हिंदू तबके और कांग्रेसी लीडरशिप की बुनियादी पहुँच में कोई टकराव नहीं। दोनों ही हिंदू मत को एक बानगी मानके चलते हैं। दोनों ही सिख धर्म को हिन्दू समाज में जज़्ब कर लेने के सांझे उदेश्य पर पहरा देते हैं। सो, इस दृष्टि से दोनों ही सिख कौम के प्रति बराबर दुर्भावना रखते हैं। भारत की आज़ादी की लड़ाई के दौरान पंजाबी हिंदू वर्ग के बड़े हिस्से राजनीतिक तौर पर कांग्रेस पार्टी से जुड़े होने के बावजूद गाँधी की विचारधारा से आर्य समाजी विचारधारा के ज़्यादा प्रभाव तले थे। लाल लाजपत राय से लेकर जगत नारायण तक, सभी आर्य समाजी 'परिवार' की सोच पर सांप्रदायिकता का एक-सामान गाढ़ा रंग चढ़ रखा था। भारत के बंटवारे से पहले सांप्रदायिकता की यह धारा मुख्य रूप से मुस्लिम भाईचारे के खिलाफ इंगित रही। वैसे बीच-मध्य जब भी सिख पंथ ने हिंदू वर्ग से अपनी अलग पहचान जतलाने की कोशिशें की तो उसे तुरंत ही आर्य समाजी वर्ग के क्रोध का सामना करना पड़ा।
 भारत की आज़ादी के बाद पंजाब में मुस्लिम फैक्टर नदारद हो जाने से इस सांप्रदायिक धारा का सारा कहर सिख कौम पर टूट पड़ा। भारतीय सरकार की बागडोर कांग्रेस पार्टी के हाथों में आ जाने से पंजाबी हिन्दू वर्ग, अपने सांप्रदायिक उद्देश्यों और हितों को पूरा करने के लिए, कांग्रेस पार्टी का और भी ज़्यादा जोशीला हिमायती बन गया। उधर कांग्रेसी शासकों को भी पंजाब में सिख कौम के संबंध में अपने फिरकापरस्त मंसूबों को अंजाम देने के लिए पंजाब के हिन्दू वर्ग के सहयोग और हिमायत की भारी ज़रुरत थी। विचारधारक समरसता के साथ ही यह एक परस्पर उदेश्य था जो पंजाबी हिंदू वर्ग और कांग्रेस पार्टी में मजबूत संयोग-कड़ी बना हुआ था।
पंजाबी हिंदू वर्ग कांग्रेस पार्टी से एक तरफ से थोड़ी लाभकारी पोज़िशन में था। उस की सारी जान कांग्रेस पार्टी की मुट्ठी में नहीं थी। कांग्रेस पार्टी के पंजाबी हिंदू वर्ग की उम्मीदें और मांगों पर पूरा न उतर सकने की सूरत में, उसके लिए कांग्रेस का पल्ला छोड़ किसी अन्य राजनीतिक पाले में चले जाने का रास्ता खुला था। इसके विपरीत पंजाब में कांग्रेस पार्टी के लिए हिन्दू वर्ग की बाजू छोड़ के ज़िंदा रह पाना मुमकिन नहीं था। सिख कौम को ग़ुलाम बना के रखने और अकाली दल को राज्यसत्ता से पर रखने के लिए कांग्रेस शासकों को पंजाब के हिन्दू वर्ग का सहयोग हासिल करना निहायत ज़रूरी था। हिन्दू वर्ग के इलावा कांग्रेस पार्टी का पंजाब में सामाजिक तौर पर पछड़े वर्गों में भी मजबूत आधार था। इस तरह इन वर्गों की मिश्रित हिमायत के साथी ही कांग्रेस पार्टी अकाली दल को राज्यसत्ता से परे रखने के उदेश्य में सफल रही थी। सो अकाली दल के सामने कांग्रेस पार्टी की इस राजनीतिक किलेबंदी में दरार डालने की राजनीतिक चुनौती थी। केवल ऐसा करके ही वह अपने लिए राज्यसत्ता तक पहुँचने का रास्ता समतल कर सकता था।

 पंजाब ऐसा प्रांत है जहां दलितों की आबादी सबसे ज्यादा है- करीब 29 प्रतिशत। ये हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई धर्म में बंटे हुए हैं। लेकिन इतनी आबादी वाले दलितों की खेतिहर जमीन में हिस्सेदारी केवल 2.5 फीसदी है। दूसरी ओर राज्य की कुल 64 फीसदी सिख आबादी में जाट सिख करीब 32 फीसदी हैं, लेकिन उनके पास 80 फीसदी उपजाऊ जमीनें हैं। भूमि वितरण का यह असंतुलन राजनीति और धार्मिक संगठनों में भी दिखता है, जहां ज्यादातर बड़े पद जाट सिखों के पास हैं। वैसे तो सिख धर्म में जाति व्यवस्था के लिए कोई जगह नहीं है और हिंदू वर्णव्यवस्था के उलट वहां सभी की समानता की बात कही गई है। इसके बावजूद भूमि, संख्यात्मक बहुलता और परंपरागत रौबदाब के चलते जाति की चेतना ने गहराई से जड़ें जमाई हुई हैं। खास बात यह है कि पंजाब में व्यापार और साहूकारी से जुड़े रहे खत्रियों के अलावा सभी जातियां हिंदू धर्म व्यवस्था में निम्न जातियां मानी गई हैं, पर कृषि से जुड़े सभी महत्वपूर्ण संसाधनों पर कब्जा कर स्थानीय संस्कृति व राजनीति में उन्होंने ऊंची जाति का दर्जा हासिल कर लिया है। जातिगत चेतना का असर इतना व्यापक है कि विभिन्न सिख जातियों में आपस में विवाह भी नहीं होता। जाट, खत्री और रामगढ़िया सिखों को प्रभुत्वशाली जाति माना जाता है जो मजहबी, रामदसिया और रंगरेता सिखों को अपने से नीचे समझते हैं। जाट सिख व दलित सिखों के बीच टकराव में ही डेरा विवाद की वजहें छिपी हैं।
 पंजाब में करीब नौ हजार सिख व गैर सिख डेरे हैं। गैर सिख डेरों से ज्यादातर दलित समझे जाने वाले अनुयायी हैं और बताया जाता है कि डेरा सच्चा सौदा के 70 फीसदी अनुयायी सिख और गैर सिख दलित व अन्य निम्न जातियों से हैं। डेरों की ओर निम्न जातियों के झुकाव को जाट सिखों के दबदबे वाले गुरुद्वारों से अलग एक 'वैकल्पिक आध्यात्मिक-धार्मिक स्थान' की तलाश के रूप में देखा जाता है। विदेशों में बसे कई दलित परिवारों से इन डेरों को मदद मिलती है और दलित पहचान को उभारने में ये डेरे अपना योगदान देते हैं। इससे सिख संगठनों में इन डेरों के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है। गांवों में जाट सिखों और दलितों के बीच टकराव बढ़े हैं और दलितों के बहिष्कार की अपीलें भी जारी होती है। 1920 के दशक के मंगूराम के आदिधर्म आंदोलन व आम्बेडकरवाद के असर ने भी पंजाबी दलितों में संसाधनों में हिस्सेदारी की चेतना को बढ़ाया है। इसके अलावा हरित क्रांति ने भी खेत मजदूरी को बढ़ाने और सम्मान की मांगों को उभारने में योगदान दिया है। दलितों को गुरुद्वारों की राजनीति में भी गैरबराबरी का अहसास होता है, इसलिए कई गांवों में अगर वे गुरुद्वारों की प्रबंधन कमिटी में जाट सिखों के दबदबे को चुनौती दे रहे हैं तो कई जगह उन्होंने अपने अलग गुरुद्वारे बना लिए हैं। पंजाबी समाज की बनावट का अध्ययन कर रहे कई रिसर्चरों ने पाया है कि राज्य के करीब 12 हजार गांवों में से 10 हजार में दलितों ने अपने अलग गुरुद्वारे निमिर्त कर लिए हैं। हाल के बरसों में हुई कई और घटनाएं भी जाट-दलित टकराव को सामने लाती हैं। 2003 में जालंधर के तल्हण गांव में दलितों ने स्थानीय गुरुद्वारे की प्रबंधन कमिटी में अपने प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग की थी जिसे ठुकरा दिया गया। इसके बाद दोनों पक्ष उग्र हो उठे और कई दिनों तक हिंसा जारी रही। इस घटना ने एक बार फिर सिर्फ राजनीति ही नहीं बल्कि धार्मिक संगठनों के अंदर की राजनीति में भी समान भागीदारी की दलितों की मांग को प्रमुखता से उभारा था। इसके अलावा मेहम की घटना भी काफी चर्चा में रही जहां बाबा खजान सिंह उदासी के डेरे को गांव के अल्पसंख्यक लेकिन शक्तिशाली जाट सिखों ने जबरन अपने नियंत्रण में ले लिया था और वहां सिख-खालसा प्रतीकों की स्थापना कर दी थी। बाद में दलित सिखों के प्रचंड विरोध के बाद विवाद के हल के लिए डेरे की प्रबंधन कमिटी के संचालन के लिए सरकार ने एक अधिकारी नियुक्त कर दिया। डेरा सच्चा सौदा मामले में भड़की हिंसा में भी जाट सिखों के राजनीतिक दबदबे को स्थापित करने का मकसद था, क्योंकि ये डेरे पंजाब की शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी और अकाल तख्त की राजनीति को भी चुनौती देते हैं। इनमें 'गॉडमैन' पनपने के कारण कई विवाद भी खड़े होते हैं, डेरों के कामकाज पर गंभीर सवाल लगते रहे हैं, लेकिन हाशिए पर रहने वाले निम्न जाति के लोग इन्हें सम्मान व प्रतिष्ठा हासिल करने के साधन के रूप में भी देखते हैं।

अवतारवाद और पैगम्बरवाद का खंडन-

सिखमत में हर जीव को अवतार कहा गया है। हर जीव उस निरंकार की अंश है। संसार में कोई भी पंची, पशु, पेड़, इतियादी अवतार हैं। मानुष की योनी में जीव अपना ज्ञान पूरा करने के लिए अवतरित हुआ है। व्यक्ति की पूजा सिख धर्म में नहीं है "मानुख कि टेक बिरथी सब जानत, देने, को एके भगवान"। तमाम अवतार एक निरंकार की शर्त पर पूरे नहीं उतरते कोई भी अजूनी नहीं है। यही कारण है की सिख किसी को परमेशर के रूप में नहीं मानते। हाँ अगर कोई अवतार गुरमत का उपदेस करता है तो सिख उस उपदेश के साथ ज़रूर जुड़े रहते हैं। जैसा की कृष्ण ने गीता में कहा है की आत्मा मरती नहीं और जीव हत्या कुछ नहीं होती, इस बात से तो सिखमत सहमत है लेकिन आगे कृष्ण ने कहा है की कर्म ही धर्म है जिस से सिख धर्म सहमत नहीं।
पैग़म्बर वो है जो निरंकार का सन्देश अथवा ज्ञान आम लोकई में बांटे। जैसा की इस्लाम में कहा है की मुहम्मद आखरी पैगम्बर है सिखों में कहा गया है कि "हर जुग जुग भक्त उपाया"। भक्त समे दर समे पैदा होते हैं और निरंकार का सन्देश लोगों तक पहुंचाते हैं। सिखमत "ला इलाहा इल्ल अल्लाह (अल्लाह् के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है )" से सहमत है लेकिन सिर्फ़ मुहम्मद ही रसूल अल्लाह है इस बात से सहमत नहीं। अर्जुन देव जी कहते हैं "धुर की बानी आई, तिन सगली चिंत मिटाई", अर्थात मुझे धुर से वाणी आई है और मेरी सगल चिंताएं मिट गई हैं किओंकी जिसकी ताक में मैं बैठा था मुझे वो मिल गया है।

धार्मिक ग्रंथ-

मूल रूप में भक्तो अवम सत्गुरुओं की वाणी का संग्रेह जो सतगुरु अर्जुन देव जी ने किया था जिसे आदि ग्रंथ कहा जाता है सिखों के धार्मिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्ध है | यह ग्रंथ ३६ भक्तों का सचा उपदेश है और आश्चर्यजनक बात ये है की ३६ भक्तों ने निरंकार को सम दृष्टि में व्याख्यान किया है | किसी शब्द में कोई भिन्नता नहीं है | सिख आदि ग्रंथ के साथ साथ दसम ग्रंथ, जो की सतगुरु गोबिंद सिंह जी की वाणी का संग्रेह है को भी मानते हैं | यह ग्रंथ खालसे के अधीन है | पर मूल रूप में आदि ग्रंथ का ज्ञान लेना ही सिखों के लिए सर्वोप्रिया है |
यही नहीं सिख हर उस ग्रंथ को सम्मान देते हैं, जिसमे गुरमत का उपदेश है |
आदि ग्रंथ

गुरु ग्रंथ साहिब

आदि ग्रंथ या आदि गुरु ग्रंथ या गुरु ग्रंथ साहिब या आदि गुरु दरबार या पोथी साहिब, गुरु अर्जुन देव दवारा संगृहित एक धार्मिक ग्रंथ है जिसमे ३६ भक्तों के आत्मिक जीवन के अनुभव दर्ज हैं | आदि ग्रंथ इस लिए कहा जाता है क्योंकि इसमें "आदि" का ज्ञान भरपूर है | जप बनी के मुताबिक "सच" ही आदि है | इसका ज्ञान करवाने वाले ग्रंथ को आदि ग्रंथ कहते हैं | इसके हवाले स्वयम आदि ग्रंथ के भीतर हैं | हलाकि विदवान तबका कहता है क्योंकि ये ग्रंथ में गुरु तेग बहादुर जी की बनी नहीं थी इस लिए यह आदि ग्रंथ है और सतगुरु गोबिंद सिंह जी ने ९वें महले की बनी चढ़ाई इस लिए इस आदि ग्रंथ की जगंह गुरु ग्रंथ कहा जाने लगा |
भक्तो एवं सत्गुरुओं की वाणी पोथिओं के रूप में सतगुरु अर्जुन देव जी के समय मोजूद थीं | भाई गुरदास जी ने यह ग्रंथ लिखा और सतगुरु अर्जुन देव जी दिशा निर्धारक बने | उन्हों ने अपनी वाणी भी ग्रंथ में दर्ज की | यह ग्रंथ की कई नकले भी तैयार हुई |
आदि ग्रंथ के १४३० पन्ने खालसा दवारा मानकित किए गए |
दसम ग्रंथ
दसम ग्रन्थ, सिखों का धर्मग्रन्थ है जो सतगुर गोबिंद सिंह जी की पवित्र वाणी एवं रचनाओ का संग्रह है।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवनकाल में अनेक रचनाएँ की जिनकी छोटी छोटी पोथियाँ बना दीं। उन की मौत के बाद उन की धर्म पत्नी माता सुन्दरी की आज्ञा से भाई मनी सिंह खालसा और अन्य खालसा भाइयों ने गुरु गोबिंद सिंह जी की सारी रचनाओ को इकठा किया और एक जिल्द में चढ़ा दिया जिसे आज "दसम ग्रन्थ" कहा जाता है। सीधे शब्दों में कहा जाये तो गुरु गोबिंद सिंह जी ने रचना की और खालसे ने सम्पादना की। दसम ग्रन्थ का सत्कार सारी सिख कौम करती है।
दसम ग्रंथ की वानियाँ जैसे की जाप साहिब, तव परसाद सवैये और चोपाई साहिब सिखों के रोजाना सजदा, नितनेम, का हिस्सा है और यह वानियाँ खंडे बाटे की पहोल, जिस को आम भाषा में अमृत छकना कहते हैं, को बनाते वक्त पढ़ी जाती हैं। तखत हजूर साहिब, तखत पटना साहिब और निहंग सिंह के गुरुद्वारों में दसम ग्रन्थ का गुरु ग्रन्थ साहिब के साथ परकाश होता हैं और रोज़ हुकाम्नामे भी लिया जाता है।
अन्य ग्रन्थ
सरब्लोह ग्रन्थ ओर भाई गुरदास की वारें शंका ग्रस्त रचनाए हैं | हलाकि खालसा महिमा सर्ब्लोह ग्रन्थ में सुसजित है जो सतगुरु गोबिंद सिंह की प्रमाणित रचना है, बाकी स्र्ब्लोह ग्रन्थ में कर्म कांड, व्यक्ति पूजा इतियादी विशे मोजूद हैं जो सिखों के बुनयादी उसूलों के खिलाफ हैं | भाई गुरदास की वारों में मूर्ती पूजा, कर्म सिधांत आदिक गुरमत विरुद्ध शब्द दर्ज हैं
सिख धर्म का इतिहास के लिए कोई भी इतिहासिक स्रोत को पूरी तरंह से प्र्पख नहीं मन जाता | श्री गुर सोभा ही ऐसा ग्रन्थ मन गया है जो गोबिंद सिंह के निकटवर्ती सिख द्वारा लिखा गया है लेकिन इसमें तारीखें नहीं दी गई हैं | सिखों के और भी इतिहासक ग्रन्थ हैं जैसे की श्री गुर परताप सूरज ग्रन्थ, गुर्बिलास पातशाही १०, श्री गुर सोभा, मन्हीमा परकाश एवं पंथ परकाश, जनमसखियाँ इतियादी | श्री गुर परताप सूरज ग्रन्थ की व्याख्या गुरद्वारों में होती है | कभी गुर्बिलास पातशाही १० की होती थी | १७५० के बाद ज्यादातर इतिहास लिखे गए हैं | इतिहास लिखने वाले विद्वान ज्यादातर सनातनी थे जिस कारण कुछ इतिहासिक पुस्तकों में सतगुरु एवं भक्त चमत्कारी दिखाए हैं जो की गुरमत फलसफे के मुताबिक ठीक नहीं है | गुरु नानक का हवा में उड़ना, मगरमच की सवारी करना, माता गंगा का बाबा बुड्ढा द्वारा गर्ब्वती करना इतियादी घटनाए जम्सखिओं और गुर्बिलास में सुसजित हैं और बाद वाले इतिहासकारों ने इन्ही बातों के ऊपर श्र्धवास मसाला लगा कर लिखा हुआ है | किसी सतगुर एवं भक्त ने अपना संसारी इतिहास नहीं लिखा | सतगुरु गोबिंद सिंह ने भी जितना लिखा है वह संक्षेप और टूक परमाण जितना लिखा है | सिख धर्म इतिहास को इतना महत्व नहीं देता, जो इतिहास गुरबानी समझने के काम आए उतना ही सिख के लिए ज़रूरी है |




30.10.19

मुसलमानों में भी होती हैं जातियां,क्या है मुस्लिम जाति व्यवस्था?:musalman samaj me jatiyan


कई जानकारों ने भारत में ऊंची जाति के मुसलमानों को चार प्रमुख समूहों में बांटा था जो कि सैयद, शेख, मुग़ल और पठान के नाम से जाने जाते हैं.
यह सच है कि इस्लाम में किसी भी जातिगत भेदभाव के लिए जगह नहीं. हालांकि हिंदुस्तानी मुसलमानों में जाति व्यवस्था देखने को मिलती है. मगर आमतौर पर बड़ी राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों की जातीय व्यवस्था, फिरक़े और दूसरे समूहों की राजनीति को कहने-सुनने से कतराती रही हैं. मुसलमानों में जाति व्यवस्था का मामला साल 1936 में ही अंग्रेजों के सामने आ गया था, इसके बाद से लगातार काका कालेकर समिति, मंडल कमीशन और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी इस पर तफसील से चर्चा की गई है.
बता दें कि मुसलमानों की जाति व्यवस्था पर 1960 में ग़ौस अंसारी ने 'मुस्लिम सोशल डिवीजन इन इंडिया' नाम की एक किताब लिखी थी. इसमें ग़ौस ने उत्तर भारत में मुसलमानों को चार प्रमुख समूहों में बांटा था- सैयद, शेख, मुग़ल और पठान. हालांकि मुसलमानों ने भी हिंदू जाति व्यवस्था की तरह ही एक सिस्टम अपना लिया जो तीन स्तरों पर काम करता है:



कौन हैं अशराफ, अजलाफ और अरजाल?
इस व्यवस्था में सैयद ख़ुद को इसमें सबसे ऊपर रखते हैं और ख़ुद को पैग़ंबर मोहम्मद साहब के खानदान से जुड़ा बताते हैं. दूसरे नंबर पर हैं शेख, जो ख़ुद को पैग़ंबर मोहम्मद के क़बीले 'क़ुरैश' से संबंधित बताते हैं. इनमें सिद्दीक़ी, फारुख़ी और अब्बास कुलनाम नाम इस्तेमाल करने वाले लोग हैं. तीसरे पर मुग़ल हैं, जो बाबर के नेतृत्व में भारत आए थे. चौथे नंबर पर पठान हैं जो पश्तो बोलते हैं और फिलहाल पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के पख़्तूनखा इलाक़े से माने जाते हैं. बहरहाल. इसके अलावा हिंदुओं की तरह ही एक जातीय व्यवस्था भी है, जहां अशराफ, अजलाफ और अरजाल नाम की तीन श्रेणियां हैं.
1. अशराफ़: ख़ुद को भारत के बाहर की नस्लों जैसे अफगान, अरब, पर्शियन या तुर्क बताने वाले
मुग़ल, पठान, सैयद, शेख
2. भारतीय ऊंची जातियों से कन्वर्ट:
मुस्लिम राजपूत
3. अजलाफ: भारतीय गैर-सवर्ण जातियों से कन्वर्ट
दर्जी, धोबी, धुनिया, गद्दी, फाकिर, हज्जाम (नाई), जुलाहा, कबाड़िया, कुम्हार, कंजरा, मिरासी, मनिहार, तेली
4. अरजाल: भारतीय दलित जातियों से कन्वर्ट
हलालखोर, भंगी, हसनती, लाल बेगी, मेहतर, नट, गधेरी





ग़ौस अंसारी के अलावा इम्तियाज़ अहमद ने भी 1978 में 'कास्ट एंड सोशल स्टार्टिफिकेशन अमंग द मुस्लिम्स' में बताया था कि कैसे इस्लाम क़ुबूल करने के बावजूद हिंदू जातीय संरचना ज्यों के त्यों मुस्लिम समाज में भी जगह पा गई.
सोशियोलॉजिस्ट एमएन श्रीनिवासन भी मानते हैं कि भारत या दक्षिण एशिया में मौजूद जाति व्यवस्था इतनी मज़बूत थी कि कई बाहर से आए धर्मों ने इसे न चाहते हुए भी अपना लिया. हिंदू धर्म से इस्लाम में आने वाले सामान्य जीवन में इस जाति व्यवस्था के इतने आदी थे तो मुसलमान होने के बाद भी इन्हें इस सिस्टम को मानते रहने में दिक्कत महसूस नहीं हुई.




कई जातियां जैसे- आतिशबाज़, बढ़ई, भांड, भातिहारा, भिश्ती, धोबी, मनिहार, दर्जी हिंदुओं और मुसलमानों में एक जैसी हैं. ग़ौस ने बताया कि सैयद और शेख आमतौर सबसे ऊपर माने जाते हैं और धर्म से जुड़े कामों की ज़िम्मेदारी भी इनकी ही होती है. मुग़लों और पठानों को क़रीब-क़रीब हिंदुओं की क्षत्रिय जातियों की तरह ही समझा जाता रहा है. इसके अलावा ग़ौस ने ओबीसी मुस्लिम और दलित मुस्लिम को - क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट और नॉन-क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट में बांटा है. क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट में हिंदुओं की ओबीसी जातियों से आए लोग हैं जबकि नॉन-क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट में दलित जातियों से मुस्लिम समाज में आए लोग हैं. हालांकि दलित मुसलमानों को अभी भी एससी रिजर्वेशन हासिल नहीं हो पाया है.
दलित मुस्लिमों को ओबीसी रिज़र्वेशन क्यों ?
एससी कमीशन के सदस्य योगेंद्र पासवान इसकी तस्दीक करते हैं कि फिलहाल दलित मुसलमानों को रिजर्वेशन हासिल नहीं है. हालांकि ऐसी 30 जातियों को ओबीसी रिज़र्वेशन का फ़ायदा ज़रूर मिलता है. बता दें कि ब्रिटिश राज में ही मुस्लिम दलितों को हिंदू दलितों की तरह सरकारी योजनाओं में प्रोत्साहन और रिज़र्वेशन देने जैसी बहस शुरू हो गई थी. सच्चर कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक़ 1936 में जब अंग्रेजों के सामने ये मामला गया तो एक इंपीरियल ऑर्डर के तहत सिख, बौद्ध, मुस्लिम और ईसाई दलितों को बतौर दलित मान्यता दी गई लेकिन इन्हें हिंदू दलितों को मिलने वाले फ़ायदों से महरूम कर दिया गया. 1950 में आज़ाद भारत के संविधान में भी व्यवस्था यही रही. हालांकि 1956 में सिख दलितों और 1990 में नव-बौद्धों को दलितों में शामिल तो कर लिया गया पर मुस्लिम दलित जातियों को मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद ओबीसी लिस्ट में ही जगह मिल पाई.



काका कालेलकर कमीशन (1955) ने क्या कहा ?
इस कमीशन ने 2399 पिछड़ी जातियों की एक लिस्ट बनाई थी जिनमें से 837 जातियों को 'अति पिछड़ा' की श्रेणी में रखा गया था. कमीशन ने पिछड़ी जातियों की इस सूची में न सिर्फ़ हिंदू ओबीसी बल्कि मुस्लिम ओबीसी जातियों को भी जगह दी थी. कमीशन ने इन जातियों को पिछड़ा तो माना, लेकिन मुसलमानों और ईसाइयों में मौजूद इन जातियों के साथ जातिगत भेदभाव होता है, इसे मानने से इनकार कर दिया था. कमीशन ने माना कि पिछड़ापन है लेकिन ये भी कहा कि जाति आधारित क़ानूनी व्यवस्था या ऐसी कोई सिफ़ारिश इन धर्मों में भी इस 'अनहेल्दी प्रैक्टिस' को बढ़ावा दे सकती है.
मंडल कमीशन (1980) ने क्या कहा ?
इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में देश की 3743 जातियों को ओबीसी लिस्ट में शामिल किया था. कमीशन ने माना कि जातिगत भेदभाव सिर्फ़ हिंदुओं तक सीमित नहीं बल्कि मुस्लिम, सिख और ईसाइयों में भी है. कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में 82 मुस्लिम जातियों को ओबीसी में जगह दी थी. दलितों से जो मुसलमान बने उन्हें 'अरजाल' और ओबीसी जातियों से मुसलमान बने लोगों को 'अजलाफ' की श्रेणी में रखा गया था. हालांकि कमीशन ने सिफारिश की कि 'अरजाल' को एससी कैटेगरी में फ़ायदा मिलना चाहिए. साथ ही इन्हें एमबीसी (मोस्ट बैकवर्ड कास्ट) कैटेगरी में शामिल कर दिया. इसी के बाद से मुस्लिम जातियों को ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलने लगा. बाद में सच्चर कमेटी रिपोर्ट में भी माना गया कि मुस्लिम ओबीसी में ग़रीबी सबसे ज़्यादा है. सोशल इंडीकेटर्स जैसे कुपोषण, हाउसहोल्ड और सामजिक पिछड़ेपन के मामले में भी मुस्लिम ओबीसी की हालत देश में हिंदू दलितों से भी बदतर है.
ओबीसी-दलित मुस्लिम नुकसान में
युसूफ कहते हैं कि पसमांदा मुसलमान तो लगातार एक चक्रव्यूह में फंसा है. लगातार 'इस्लाम खतरे में' रहता है जिसके बदले ओबीसी-दलित मुसलमानों को अपने मुद्दों पर बोलने से रोका जाता रहा है. हिंदू दलितों को जब आबादी के हिसाब से रिजर्वेशन मिला है तो मुस्लिमों को इससे महरूम क्यों रखा जा रहा है. अभी कुछ सालों से 'हिंदू' भी खतरे में हैं तो मुसलमानों से उम्मीद की जाती है कि वो एकजुट रहें और इसी नाम पर मुस्लिम समाज का पिछड़ा तबका लगातार ठगा जाता है. जबकि सच तो ये है कि मुस्लिम भी अन्य समुदायों की तरह वोट करते हैं और 2014 में यूपी में एक भी सीट न आना ये साबित करता है.
ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के एमए खालिद कहते हैं, '2019 में मुस्लिमों को अपनी स्ट्रैटिजी बदलनी होगी और अपने विकल्प खुले रखने होंगे.' बता दें कि 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने अपनी रणनीति में सिर्फ जीतने वाले उम्मीदवारों को टिकट देने और मुस्लिम वोटों को बांटने का फैसला किया था. बीजेपी की रिकॉर्ड जीत ने मुसलमानों को टिकट देने वाली पार्टियों का सूपड़ा साफ़ कर दिया. ऐसे में मुस्लिम सांसदों की संख्या लगातार कम होते जाने के पीछे ठोस वजह गैर-बीजेपी पार्टियों की मुस्लिमों को लेकर सीमित सोच का नतीजा है.
Disclaimer: इस  content में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. Content को अपने बुद्धी विवेक से समझे
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26.10.19

महाभारत से लेकर अकबर तक – मीणा समाज का संघर्ष और शौर्य गाथा।


                                           




महाभारत से लेकर अकबर तक – मीणा समाज का संघर्ष और शौर्य गाथा।
राजस्थान की धरती पर जब भी वीरता की गाथा कही जाती है, मीणा समाज का नाम उसमें स्वाभाविक रूप से जुड़ जाता है। यह वही समाज है जिसे वेदों और पुराणों में मत्स्य भगवान का वंशज कहा गया है। गणगौर और मत्स्य जयंती एक ही दिन क्यों मनाए जाते हैं, क्या आप जानते हैं कि महाभारत के युद्ध में मत्स्य जनपद के शासक मीणा समाज के ही थे, जिन्होंने आर्य राजा सुदास से संघर्ष किया और वीरता का परिचय दिया।
विराट नगर, जिसे आज जयपुर वैराठ कहा जाता है, मीणा समाज की राजधानी थी। अलवर, भरतपुर और जयपुर के आस-पास का क्षेत्र मत्स्य जनपद कहलाता था। मीणा राजाओं के ध्वज पर मछली का चिन्ह अंकित होता था, उनके हाथों में वज्र होता था, और उनकी पहचान ही मत्स्य से जुड़ी थी। यह वही समाज है जिसने छापामार युद्ध कौशल में महारत हासिल की और प्रतिहार कहलाए। अजमेर और मारवाड़ में रावत मीणा, उदयपुर और बांसवाड़ा में भील मीणा, सवाई माधोपुर और करौली में जमींदार मीणा – हर क्षेत्र में उनकी अलग पहचान थी लेकिन एक ही गौरवशाली परंपरा।
महाभारत के युद्ध में जब मत्स्य जनपद के शासक शामिल हुए, तो उनकी वीरता का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। वे पराक्रमी थे, शूरवीर थे, लेकिन आर्य राजा सुदास के शत्रु भी। युद्ध की क्षति ने उन्हें बिखेर दिया और छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित कर दिया। गढ़ मोरा का मोरी वंश, चित्तौड़ के मान मोर, और फिर बाप्पा रावल द्वारा स्थापित गुहिलोट राज्य – यह सब उसी संघर्ष का परिणाम था।
समय आगे बढ़ता है और हम देखते हैं कि अकबर और आमेर के कछवाहा राजपूत भारमल के साथ मीणा समाज का संघर्ष कैसा था। राव बड़ा मीणा की वीरता का उल्लेख अकबर ने स्वयं किया था। लेकिन जब भारमल ने अपनी बेटी जोधा की शादी अकबर से कर दी, तब अकबर और भारमल की संयुक्त सेना ने मीणा राज्य पर हमला किया। यह हमला इतिहास की सबसे कायराना घटनाओं में से एक था, जब दीवाली पर पित्र तर्पण की रस्में निभाते निहत्थे मीणाओं पर हमला किया गया। जलाशयों में मीणाओं की लाशें भर गईं और इस तरह मीणा राज्य का पतन हुआ।
लेकिन यह पतन केवल बाहरी रूप से था। मीणा समाज की आत्मा कभी नहीं टूटी। उन्होंने अपने मंदिरों, बावड़ियों और किलों से अपनी पहचान बनाए रखी। तारागढ़ का किला बूंदी, आमागढ़ का किला, हथरोई का किला, जमवारामगढ़ का किला – ये सब उनके शौर्य के प्रतीक हैं। भुली बावड़ी, आभानेरी की चाँद बावड़ी, पन्ना मीणा की बावड़ी – ये सब उनकी सांस्कृतिक धरोहर हैं। दांत माता का मंदिर, बांकी माता का मंदिर, आशावरी माता का मंदिर, ज्वालादेवी का मंदिर – ये सब उनकी धार्मिक आस्था के केंद्र हैं।
मीणा समाज ने महिलाओं को अधिकार दिए, पुनर्विवाह को स्वीकार किया, और समाज में समानता की परंपरा को जीवित रखा। यह वही समाज है जिसने आक्रमणों के दौरान भी अपनी पहचान बनाए रखी। चाहे 1868 का भयंकर अकाल हो या विदेशी आक्रमणकारी जातियों का हमला, मीणा समाज ने संघर्ष किया, झुका नहीं।
राजस्थान की इस गौरवशाली गाथा को आगे बढ़ाने के लिए वीडियो को लाइक करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और अपने विचार कमेंट में साझा करें। क्या आपने कभी मीणा समाज के मंदिर या किले देखे हैं? क्या आप जानते हैं कि महाभारत से लेकर अकबर तक यह समाज किस तरह संघर्ष करता रहा? इस वीडियो को शेयर करें ताकि यह ज्ञान अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे।
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30.7.19

संकट हरण हनुमान प्रश्नावली यंत्र:sankat haran hanuman prashnavali





हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो में कई तरह के यंत्र(चक्र)के बारे में बताया गया हैं जिनकी सहायता से हम अपने मन में उठ रहे सवाल, हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयों आदि का समाधान पा सकते है। हम अब तक आपको श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र और नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र के बारे में बता चुके है आज हम आपको बताएँगे हनुमान प्रश्नावली चक्र के बारे में।

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प्रयोग विधि :-
जिसे भी अपने प्रश्नों का उत्तर चाहिए वे स्नान आदि कर साफ वस्त्र धारण करे और पांच बार ऊँ रां रामाय नम:मंत्र का जप करने के बाद 11 बार ऊँ हनुमते नम:मंत्र का जप करे। इसके बाद आंखें बंद हनुमानजी का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर कर्सर घुमाते हुए रोक दें। जिस कोष्ठक(खाने) पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक को देखकर अपने प्रश्न का उत्तर देखें। कोष्ठकों के अंकों के अनुसार फलादेश

1- आपका कार्य शीघ्र पूरा होगा।

2- आपके कार्य में समय लेगगा। मंगलवार का व्रत करें।

3- प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तो कार्य शीघ्र पूरा होगा।

4- कार्य पूर्ण नहीं होगा।

5- कार्य शीघ्र होगा, किंतु अन्य व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ेगी।

6- कोई व्यक्ति आपके कार्यों में रोड़े अटका रहा है, बजरंग बाण का पाठ करें।

7- आपके कार्य में किसी स्त्री की सहायता अपेक्षित है।

8- आपका कार्य नहीं होगा, कोई अन्य कार्य करें।

9- कार्यसिद्धि के लिए यात्रा करनी पड़ेगी।

10- मंगलवार का व्रत रखें और हनुमानजी को चोला चढ़ाएं, तो मनोकामना पूर्ण होगी।

11- आपकी मनोकामना शीघ्र पूरी होगी। सुंदरकांड का पाठ करें।

12- आपके शत्रु बहुत हैं। कार्य नहीं होने देंगे।

13- पीपल के वृक्ष की पूजा करें। एक माह बाद कार्य सिद्ध होगा।

14- आपको शीघ्र लाभ होने वाला है। मंगलवार को गाय को गुड़-चना खिलाएं।

15- शरीर स्वस्थ रहेगा, चिंताएं दूर होंगी।

16- परिवार में वृद्धि होगी। माता-पिता की सेवा करें और रामचरितमानस के बालकाण्ड का पाठ करें।

17- कुछ दिन चिंता रहेगी। ऊँ हनुमते नम: मंत्र की प्रतिदिन एक माला का जप करें।

18- हनुमानजी के पूजन एवं दर्शन से मनोकामना पूर्ण होगी।

19- आपको व्यवसाय द्वारा लाभ होगा। दक्षिण दिशा में व्यापारिक संबंध बढ़ाएं।

20- ऋण से छुटकारा, धन की प्राप्ति तथा सुख की उपलब्धि शीघ्र होने वाली है। हनुमान चालीसा का पाठ करें।

21- श्रीरामचंद्रजी की कृपा से धन मिलेगा। श्रीसीताराम के नाम की पांच माला रोज करें।

22- अभी कठिनाइयों का सामाना करना पड़ेगा पर अंत में विजय आपकी होगी।

23- आपके दिन ठीक नहीं है। रोजाना हनुमानजी का पूजन करें। मंगलवार को चोला चढ़ाएं। संकटों से मुक्ति मिलेगी।

24- आपके घर वाले ही विरोध में हैं। उन्हें अनुकूल बनाने के लिए पूर्णिमा का व्रत करें।

25- आपको शीघ्र शुभ समाचार मिलेगा।

26- हर काम सोच-समझकर करें।

27- स्त्री पक्ष से आपको लाभ होगा। दुर्गासप्तशती का पाठ करें।

28- अभी कुछ महीनों तक परेशानी है।

29- अभी आपके कार्य की सिद्धि में विलंब है।

30- आपके मित्र ही आपको धोखा देंगे। सोमवार का व्रत करें।

31- संतान का सुख प्राप्त होगा। शिव की आराधना करें व शिवमहिम्नस्तोत्र का पाठ करें।

32- आपके दुश्मन आपको परेशान कर रहे हैं। रोज पार्थिव शिवलिंग का पूजन कर शिव ताण्डवस्तोत्र का पाठ करें। सोमवार को ब्राह्मण को भोजन कराएं।

33- कोई स्त्री आपको धोखा देना चाहती है, सावधान रहें।

34- आपके भाई-बंधु विरोध कर रहे हैं। गुरुवार को व्रत रखें।

35- नौकरी से आपको लाभ होगा। पदोन्नति संभव है, पूर्णिमा को व्रत रख कथा कराएं।

36- आपके लिए यात्रा शुभदायक रहेगी। आपके अच्छे दिन आ गए हैं।

37- पुत्र आपकी चिंता का कारण बनेगा। रोज राम नाम की पांच माला का जप करें।

38- आपको अभी कुछ दिन और परेशानी रहेगी। यथाशक्ति दान-पुण्य और कीर्तन करें।

39- आपको राजकार्य और मुकद्मे में सफलता मिलेगी। श्रीसीताराम का पूजन करने से लाभ मिलेगा।

40- अतिशीघ्र आपको यश प्राप्त होगा। हनुमानजी की उपासना करें और रामनाम का जप करें।

41- आपकी मनोकामना पूर्ण होगी।

42- समय अभी अच्छा नहीं है।

43- आपको आर्थिक कष्ट का सामना करना पड़ेगा।

44- आपको धन की प्राप्ति होगी।

45- दाम्पत्य सुख मिलेगा।

46- संतान सुख की प्राप्ति होने वाली है।

47- अभी दुर्भाग्य समाप्त नहीं हुआ है। विदेश यात्रा से अवश्य लाभ होगा।

48- आपका अच्छा समय आने वाला है। सामाजिक और व्यवसायिक क्षेत्र में लाभ मिलेगा।

49- आपका समय बहुत अच्छा आ रहा है। आपकी प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होगी।

17.7.19

इस्लाम से पहिले अरब जगत मे हिन्दू संस्कृति का अस्तित्व था




इस्तांबुल, तुर्की के प्रसिद्ध राजकीय पुस्तकालय ‘मक्तब-ए-सुल्तानिया’ (सम्प्रति मक्तब-ए-ज़म्हूरिया), जो प्राचीन पश्चिम एशियाई-साहित्य के विशाल भण्डार के लिए प्रसिद्ध है, के अरबी विभाग में प्राचीन अरबी-कविताओं का संग्रह ‘शायर-उल्-ओकुल’ हस्तलिखित ग्रन्थ के रूप में सुरक्षित है। इस ग्रन्थ का संकलन एवं संपादन बग़दाद के ख़लीफ़ा हारून-अल्-रशीद के दरबारी एवं सुप्रसिद्ध अरबी-कवि अबू-अमीर अब्दुल अस्मई ने किया था, जिसे ‘अरबी-काव्य-साहित्य का कालिदास’ कहा जाता है।
सन् 1792 ई. में तुर्की के प्रसिद्ध शासक सलीम-III (1789-1807) ने अत्यन्त यत्नपूर्वक किसी प्राचीन प्रति के आधार पर इसे लिखवाया था। इस दुर्लभ हस्तलिखित ग्रन्थ के पृष्ठ लेखनयोग्य कच्ची रेशम की एक कि़स्म ‘हरीर’ के बने हैं, जिसके कारण यह सर्वाधिक मूल्यवान पुस्तकों में से एक है। इस ग्रन्थ के प्रत्येक पृष्ठ को सुनहले सजावटी किनारी (बॉर्डर) से सुसज्जित किया गया है। जावा एवं अन्य स्थानों पर पाई गई अनेक प्राचीन संस्कृत-पाण्डुलिपियाँ ऐसे ही सुनहली किनारी से सुसज्जित हैं। इस महान् ग्रन्थ का प्रथम अंग्रे़ज़ी-संस्करण सन् 1864 ई. में बर्लिन, जर्मनी से प्रकाशित हुआ। द्वितीय संस्करण सन् 1932 में बेरुत, फिलिस्तीन से प्रकाशित हुआ । सन् 1963 में प्रो. (डॉ.) हरवंशलाल ओबराय (1925-1983) ने अपने इराक़-प्रवास के दौरान बग़दाद विश्वविद्यालय में हुए अपने व्याख्यान के समय इस ग्रन्थ को वहाँ पुनर्प्रकाशन हेतु संपादित होते देखा।
डॉ. ओबराय उस ग्रन्थ की महत्त्वपूर्ण कविताओं को नोट करके भारत लाए। उन्होंने अप्रैल, 1978 में दिए अपने एक भाषण, जिसका कैसेट हमारे पास उपलब्ध है, में ‘शायर-उल्-ओकुल’ की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए कहा था— ‘‘सन् 1963 में अपने इराक़-प्रवास के दौरान इराक़ से लौटते समय मैंने उस ग्रन्थ का दर्शन किया और उसे अपनी इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक (1917-2007) ने बिड़ला मंदिर, दिल्ली से ही उस कविता को प्राप्त किया था— इसका उल्लेख उन्होंने अपने अनेक शोध-पत्रों में किया है। डॉ. ओबराय के इसी निबन्ध के आधार पर राम साठे (1920-2006), रामस्वरूप (1920-1998), अरुण शौरी , ए. घोष, जय दुबाशी, हर्ष नारायण, अदिति चतुर्वेदी, सीताराम गोयल (1921-2003), डॉ. सतीश चन्द्र मित्तल, महेश प्रसाद, मौलवी आलिम फ़ाजि़ल, ईशदत्त शास्त्री, श्रीकृष्ण सिंह सोंढ़, आदि इतिहासकारों ने भी शोध-पत्र लिखा। स्मरण रहे, मूल कविता डॉ. ओबराय ने अपने इराक़-प्रवास के दौरान प्राप्त की थी।डायरी में नोट किया था। भारत लौटने पर बाबू जुगल किशोर बिड़ला ने एक बार मुझसे कहा कि कुछ रोचक प्रसंग सुनाइये, तो मैंने उन्हें बताया कि इराक़ से मैं यह कविता लेकर आया हूँ। कविता सुनकर बिड़ला जी उछल पड़े। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्होंने तुरन्त उस कविता को एक बड़े लाल संगमरमर की पट्टी पर खुदवाकर दिल्ली के बिड़ला-मन्दिर में लगवाने का आदेश दिया। आज भी वह पत्थर बिड़ला-मन्दिर में लगा हुआ है।”
बाद में डॉ. ओबराय ने इन्हीं प्रागैस्लामी अरबी-कविताओं के आधार ‘A Glimpse of Pre-Islamic Arabia’ अथवा ‘Influence of Indian Culture on Arabia’ शीर्षक शोध-पत्र लिखा, जिसे उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, मद्रास विश्वविद्यालय तथा राजकीय संग्रहालय, एगमोर, मद्रास के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 12-14 फरवरी, 1982 को आयोजित ‘अखिल भारतीय इतिहास एवं संस्कृति सम्मेलन’ में पढ़ा। इस सम्मेलन में उपस्थित सम्पूर्ण देश के इतिहास एवं संस्कृति के लगभग दो सौ विद्वानों ने इस शोध-पत्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। इस सम्मेलन का उद्घाटन तमिलनाडु के तत्कालीन शिक्षा-मंत्री श्री सी. आरंगानायगम ने किया था एवं इसकी अध्यक्षता मद्रास विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. एम. संतप्पा ने की थी। स्वयं मद्रास विश्वविद्यालय इसी शोध-पत्र पर डॉ. ओबराय को ‘डी. लिट्.’ की उपाधि देकर गौरवान्वित हुआ था।
‘शायर-उल्-ओकुल’ ग्रन्थ तीन भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में प्रागैस्लामी अरबी-कवियों का जीवनवृत्त एवं उनकी कविताएँ हैं। दूसरे भाग में इस्लाम के जनक मुहम्मद साहब की वाणी से लेकर ‘बानी उमय्या वंश’ (Bani Umayyads of Damascus : 661-750) के ख़लीफ़ाओं के काल तक के कवियों की जीवनियाँ एवं उनकी रचनाएँ संकलित हैं। तीसरे भाग में ‘बानी अब्बासी वंश’ Bani Abbasids of Baghdad : 750-) के प्रारम्भ से लेकर संकलनकर्ता (अबू-अमीर अब्दुल असमई) के काल तक के कवियों की रचनाएँ संकलित हैं। प्राचीन अरबी-कविताओं का यह संग्रह वस्तुतः एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है, जो प्राचीन अरबों के जनजीवन, शिष्टाचार, मर्यादाएँ, मनोरंजन, प्रचलित प्रथाओं तथा इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। इसके अतिरिक्त मुख्य रूप से प्राचीनकालीन अरबों के प्रधान तीर्थ ‘मक्का’ का भी बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है।
‘शायर-उल्-ओकुल’ की भूमिका में मक्का में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित होनेवाले वार्षिक मेले ‘ओकाज़’ का वर्णन है। स्मरण रहे, वर्तमान प्रचलित वार्षिक हज-यात्रा भी कोई इस्लामी-विशेषता नहीं है, बल्कि प्रागैस्लामी ‘ओकाज़’ (धार्मिक मेला) का ही परिवर्तित रूप है।
किन्तु, अरबी ‘ओकाज़’ क़ैथोलिक़-ईसाइयों के अबाध आनन्दोत्सव से भिन्न था। यह प्रतिभाशाली और विद्वान् व्यक्तियों को अरब पर समकालीन वैदिक-संस्कृति के सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, साहित्यिक तथा अन्य विविध पक्षों पर वार्तालाप करने का उपयुक्त मंच प्रदान करता था। ‘शायर-उल्-ओकुल’ उल्लेख करता है कि उन वार्तालाप-वाद-विवादों में निकले हुए निष्कर्षों-निर्णयों का सम्पूर्ण अरब में व्यापक रूप से सम्मान किया जाता था। इस प्रकार, विद्वानों में परस्पर विचार-विमर्श करने एवं जनता को आध्यात्मिक शान्ति के लिए एकत्रित करने का स्थान उपलब्ध कराने की काशी-पद्धति का अनुसरण ही मक्का ने किया।
इस मेले का मुख्य आकर्षण मक्का के मुख्य मन्दिर मक्केश्वर महादेव (अब ‘अल्-मस्जि़द-अल्-हरम्’) के प्रांगण में होनेवाला एक सारस्वत कवि-सम्मेलन था, जिसमें सम्पूर्ण अर्वस्थान से आमन्त्रित कवि काव्य-पाठ करते थे। ये कविताएँ पुरस्कृत होती थीं। सर्वप्रथम कवि की कविता को स्वर्ण-पत्र पर उत्कीर्णकर मक्केश्वर महादेव मन्दिर के परमपावन गर्भगृह में लटकाया जाता था। द्वितीय और तृतीय स्थानप्राप्त कविताओं को क्रमशः ऊँट और भेड़/बकरी के चमड़े पर निरेखितकर मन्दिर की बाहरी दीवारों पर लटकाया जाता था। इस प्रकार अरबी-साहित्य का अमूल्य संग्रह हज़ारों वर्षों से मन्दिर में एकत्र होता चला आ रहा था। यह ज्ञात नहीं है कि यह प्रथा कब प्रारम्भ हुई थी, परन्तु पैगम्बर के जन्म से 23-24 सौ वर्ष पुरानी कविताएँ उक्त मन्दिर में विद्यमान थीं।
सन् 630 में मुहम्मद साहिब की इस्लामी सेना द्वारा मक्का पर की गई चढ़ाई के समय उनकी सेना ने ये स्वर्ण-प्रशस्तियाँ लूट लीं और शेष में से अधिकांश को नष्ट कर दिया। जिस समय इन्हें लूटा जा रहा था, उस समय स्वयं मुहम्मद साहब का एक सिपहसालार-शायर— हसन-बिन्-साबिक़— ने नष्ट की जा रही कविताओं में से कुछ को अपने कब्ज़े में कर लिया। इस संग्रह में 5 स्वर्ण-पत्रों व 16 चमड़े पर निरेखित कविताएँ थीं ।
साबिक़ की तीन पीढि़यों ने उन कविताओं को सुरक्षित रखा। तीसरी पीढ़ी का उत्तराधिकारी पुरस्कृत होने की आशा से इन कविताओं को मदीने से बग़दाद, वहाँ के ख़लीफ़ा और संस्कृति के महान् संरक्षक हारून-अल् रशीद (786-809) के पास ले गया, जहाँ उसे ख़लीफ़ा के दरबारी कवि अबू-अमीर अब्दुल अस्मई ने विपुल धनराशि देकर खरीद लिया।
उन 5 स्वर्ण-पत्रों में से दो पर प्रागैस्लामी अरबी शायरों— ‘अमर इब्न-ए-हिशाम’ (?-624) और ‘लबी-बिन-ए-अख़्तब-बिन-ए-तुर्फा’ की कविताएँ उत्कीर्ण थीं। साहित्यप्रेमी हारून-अल्-रशीद ने अस्मई को ऐसी समस्त पूर्वकालीन और वर्तमान कवियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को संकलित करने का आदेश दिया, जिसे अरब का विशालतम काव्य-संग्रह कहा जा सके। उसी का परिणाम है ‘शायर-उल्-ओकुल’ का संकलन।
शेष 3 पर उत्कीर्ण कविताएँ ज़र्हम बिन्तोई नामक कवि की थीं, जो मुहम्मद साहिब से 165 वर्ष पूर्व मक्का के प्राचीन ज़र्हम राजकुल में पैदा हुआ था। इस कुल के 12 शासकों ने मक्का पर 74 ई.पू. से 206 ई. तक शासन किया था—
1. जर्हम I इब्न झाला (74-44 ई.पू.)
2. अब्द जलिल इब्न जर्हम (44-14 ई.पू.)
3. जर्हम II अब्द जलिल (14-16 ई.)
4. अब्द उल्-मेदेन इब्न जर्हम (16-46)
5. थाकिला इब्न अब्द अल्-मेदेन (46-76)
6. अब्द उल्-मेस्सिह इब्न थाकिला (76-103)
7. मौधाध I अब्द उल् मेस्सिह महान् (106-136)
8. अम्र I इब्न मौधाध (136-150
9. हारिथ इब्न मौधाध (150-160
10. अम्र II इब्न ल अल्-हारिथ (160-180)
11. बिचर इब्न अल्-हारिथ 180-190)
12. मौधाध II अल-असगर (190-206 ई.)
कवि-हृदय होने के कारण स्वयं बिन्तोई को मक्का पर शासन करने का अवसर कभी प्राप्त नहीं हुआ, तथापि उसे स्मरण था कि उसके पूर्वजों के शासनकाल में ही एक समय भारतीय-सम्राट् विक्रमादित्य ने अर्वस्थान से सांस्कृतिक-राजनैतिक संबंध स्थापित किया था। इसलिए बिन्तोई ने अपनी एक कविता में विक्रमादित्य के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की। राजकुल से संबंधित होते हुए भी बिन्तोई एक उच्च कोटि का कवि था। उसे ओकाज़ मेले में आयोजित होनेवाले कवि-सम्मेलन में सर्वश्रेष्ठ कविताओं के लिए प्रथम पुरस्कार लगातार तीन वर्षों तक मिला था। बिन्तोई की वे तीनों कविताएँ स्वर्ण-पत्र पर उत्कीर्ण हो वर्षों तक मक्केश्वर महादेव मन्दिर के गर्भगृह में टंगी रहीं। उन्हीं में से एक में अरब पर पितृसदृश शासन के लिए उज्जयिनी-नरेश शकारि विक्रमादित्य का यशोगान किया गया है—
‘इत्रश्शफ़ाई सनतुल बिकरमातुन फ़हलमिन क़रीमुन यर्तफ़ीहा वयोवस्सुरू ।।1।।
बिहिल्लाहायसमीमिन इला मोतक़ब्बेनरन, बिहिल्लाहा यूही क़ैद मिन होवा यफ़ख़रू।।2।।
फज़्ज़ल-आसारि नहनो ओसारिम बेज़ेहलीन, युरीदुन बिआबिन क़ज़नबिनयख़तरू।।3।।
यह सबदुन्या कनातेफ़ नातेफ़ी बिज़ेहलीन, अतदरी बिलला मसीरतुन फ़क़ेफ़ तसबहू।।4।।
क़ऊन्नी एज़ा माज़करलहदा वलहदा, अशमीमान, बुरुक़न क़द् तोलुहो वतस्तरू।।5।।
बिहिल्लाहा यकज़ी बैनना वले कुल्ले अमरेना, फ़हेया ज़ाऊना बिल अमरे बिकरमातुन।।6।।’
अर्थात्, वे लोग धन्य हैं, जो राजा विक्रमादित्य के साम्राज्य में उत्पन्न हुए, जो दानवीर, धर्मात्मा और प्रजावत्सल था ।।1।। उस समय हमारा देश (अरब) ईश्वर को भूलकर इन्द्रिय-सुख में लिप्त था। छल-कपट को ही हमलोगों ने सबसे बड़ा गुण मान रखा था। हमारे सम्पूर्ण देश पर अज्ञानता ने अन्धकार फैला रखा था।।2।। जिस प्रकार कोई बकरी का बच्चा किसी भेडि़ए के चंगुल में फँसकर छटपटाता है, छूट नहीं सकता, उसी प्रकार हमारी मूर्ख जाति मूर्खता के पंजे में फँसी हुई थी।।3।। अज्ञानता के कारण हम संसार के व्यवहार को भूल चुके थे, सारे देश में अमावस्या की रात्रि की तरह अन्धकार फैला हुआ था। परन्तु अब जो ज्ञान का प्रातःकालीन प्रकाश दिखाई देता है, यह कैसे हुआ?।।4।। यह उसी धर्मात्मा राजा की कृपा है, जिन्होंने हम विदेशियों को भी अपनी कृपा-दृष्टि से वंचित नहीं किया और पवित्र धर्म का सन्देश देकर अपने देश के विद्वानों को भेजा, जो हमारे देश में सूर्य की तरह चमकते थे।।5।। जिन महापुरुषों की कृपा से हमने भुलाए हुए ईश्वर और उसके पवित्र ज्ञान को समझा और सत्पथगामी हुए; वे महान् विद्वान्, राजा विक्रमादित्य की आज्ञा से हमारे देश में ज्ञान एवं नैतिकता के प्रचार के लिए आए थे।।6।।
प्रागैस्लामी अरबी-कवि बिन्तोई द्वारा सम्राट् विक्रमादित्य की प्रशंसा में रचित उपर्युक्त कविता से अरब-प्रायद्वीप से भारतवर्ष के राजनैतिक-सांस्कृतिक संबंधों का पता चलता है। यह सर्वविदित है कि भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा से भारत पर समय-समय पर अनेक विदेशी आक्रमण होते रहे। शकारि विक्रमादित्य ने अपनी वीरता और शौर्य का परिचय देते हुए 77 ई.पू. में कंधार व बेबीलोन को विजितकर अरब को भी विजित किया और उसे भारतीय साम्राज्य का अंग बनाया। उन्होंने वहाँ की धार्मिक तथा सांस्कृतिक परम्पराओं का सम्मान करते हुए वहाँ अनेक सुधार किए। भारतीय विद्वानों को वहाँ भेजकर ज्ञान का दीपक जलाया। उन विद्वानों ने वहाँ भारतीय संस्कृति का प्रसार किया। इसलिए विक्रमादित्य का सम्मान एक विजेता के रूप में न होकर एक तारणहार के रूप में हुआ। अर्वों, पारसियों, कुर्द, हूणों तथा यहूदियों ने भी विक्रमादित्य का सम्मान किया। इससे एक बार पुनः यह सिद्ध हो जाता है कि वैदिक-सभ्यता ज्ञान के प्रसार के लिए थी। इसका ध्येय यह कभी नहीं था कि धर्म के नाम पर अत्याचार किए जाएँ।
सम्राट् विक्रमादित्य महाकाल के परम भक्त थे। उन्होंने अरब की धार्मिक-सांस्कृतिक राजधानी मक्का में महादेव के मन्दिर का पुनर्निर्माण कराया। इसके अतिरिक्त 360 मन्दिर स्थापित किए। उन्होंने बेबीलोन, फ़ारस एवं अनातोलिया में भी कई मन्दिर स्थापित किए, शिक्षा का प्रसार किया। अनातोलिया के एक व्यक्ति को वहाँ का राज्यपाल बनाकर वह उज्जयिनी लौटे। लेकिन लगभग चालीस वर्ष बाद ही, अर्थात् 33 ई.पू. में रोमन साम्राज्य ने अन्तोलिया पर आक्रमण किया, जिससे उसपर वैदिक प्रभाव कम हो गया । अभी हाल ही में कुवैत में स्वर्ण-पॉलिश की हुई गणेश जी की एक प्रतिमा वहाँ के पुरातत्त्व विभाग ने प्राप्त की है, जो निश्चय ही हिंदुस्थान के साथ अर्वस्थान के दृढ़ संबंधों की हमारी मान्यता को पुष्ट करती है।
‘शायर-उल्-ओकुल’ की एक अन्य महत्त्वपूर्ण एवं रहस्योद्घाटनकारी कविता अरब के महाकवि और भगवान् महादेव के परम भक्त ‘अमर-इब्न हिशाम’ की है, जिन्हें उनके समकालीन व्यक्ति सम्मानपूर्वक ‘अबूल हक़म’ (ज्ञान का पिता) कहकर पुकारते थे। हिशाम मक्का के एक प्रसिद्ध नेता थे, जो कुरैशी वंश के ‘बानु मखजुम’ शाखा से संबंध रखते थे। इस दृष्टि से हिशाम, मुहम्मद साहब के चाचा लगते थे, यद्यपि वह उनके सगे चाचा नहीं थे। हिशाम ने मक्का के इस्लामीकरण के समय इस्लाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, अतः मुसलमान द्वेषवश उन्हें ‘अबू ज़हाल’ (अज्ञान का पिता) कहते थे। हिशाम के पुत्र इकरिमाह इब्न अबि-जहाल ने सन् 630 ई. में इस्लाम स्वीकार कर लिया और वह प्रारम्भिक इस्लामी राज्य का महत्त्वपूर्ण नेता हुआ। हिशाम हिंदू-धर्म को बचाने के लिए लड़े गए बद्र के युद्ध (17 मार्च, 624 ई.) में उन मुसलमानों के हाथों शहीद हुए जो सभी ग़ैर-इस्लामी चिह्नों को मिटा देना चाहते थे। इस महाकवि ने मक्का के कुलदेवता मक्केश्वर महादेव और पवित्र भारतभूमि के लिए कविता लिखी थी, जो मक्का के वार्षिक ओकाज़ मेले में प्रथम पुरस्कृत होकर काबा देवालय के भीतर स्वर्णाक्षरों में उत्कीर्ण होकर टंगी थी—
‘कफ़विनक़ जि़क़रा मिन उलुमिन तब असेरू।
क़लुवन अमातातुल हवा तज़क्क़रू ।।1।।
न तज़ख़ेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा।
वलुकएने ज़ातल्लाहे औम तब असेरू।।2।।
व अहालोलहा अज़हू अरामीमन महादेव ओ।
मनोज़ेल इलमुद्दीने मीनहुम व सयत्तरू।।3।।
व सहबी के याम फ़ीम क़ामिल हिंदे यौग़न।
व यकुलून न लातहज़न फ़इन्नक़ तवज़्ज़रू।।4।।
मअस्सयरे अख़्लाक़न हसनन कुल्लहूम।
नजुमुन अज़ा अत सुम्मा ग़बुल हिंदू।।5।।’
अर्थात्, वह मनुष्य, जिसने अपना जीवन पाप और अधर्म में बिताया हो; काम-क्रोध में अपना यौवन नष्ट कर लिया हो।।1।। यदि अन्त में उसे पश्चाताप हो और वह भलाई के मार्ग पर लौटना चाहे तो क्या उसका कल्याण हो सकता है?।।2।। हाँ, यदि वह एक बार भी सच्चे हृदय से महादेव की आराधना करे, तो वह धर्म-मार्ग पर परम पद को प्राप्त कर सकता है।।3।। हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन हिंद (भारत) में निवास के लिए दे दो, क्योंकि उस पवित्र भूमि पर पहुँचकर मनुष्य आध्यात्मिकतः मुक्त हो जाता है।।4।। वहाँ की यात्रा से सत्कर्म के गुणों की प्राप्ति होती है और आदर्श हिंदू-गुरुजनों का सत्संग मिलता है।।5।।
प्रागैस्लामी अरबी-कवि अमर इब्न हिशाम की उपर्युक्त कविता से अनेक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं। सर्वप्रथम, हमारी यह मान्यता और भी पुष्ट हुई है कि भगवान् महादेव समस्त अर्वस्थान में परमपूज्य देवता के रूप में प्रतिष्ठित थे।इस कविता के सन्दर्भ में एक और तथ्य महत्त्वपूर्ण है। इस कविता के रचयिता ‘लबी-बिन-ए-अख़्तर-बिन-ए-तुर्फा’ का नाम किसी व्यक्ति का अपनी तीसरी पीढ़ी तक परिचय देने की संस्कृत-पद्धति का स्मरण कराता है। भारतीय विवाहों तथा अन्य महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्मकाण्डों में पूजा करनेवाले व्यक्ति का नामोल्लेख अमुक का पुत्र व अमुक का पौत्र कहकर ही किया जाता है। अभिलेखों में राजाओं के परिचय में उनकी तीन पीढि़यों के नाम देने की प्रथा बारहवीं शती तक प्रचलित रही है। भारतीय संस्कृति में पले होने के कारण अरबों ने भी किसी व्यक्ति को उनके पिता व पितामह के सन्दर्भ में कहने की पद्धति को अपना लिया। ‘बिन’, ‘का बेटा’ का द्योतक है। इस प्रकार लबी ‘अख़्तर’ का पुत्र था और अख़्तर ‘तुर्फा’ का।
ये तो उदाहरणमात्र हैं। इस प्रकार की 64 कविताएँ अबतक प्राप्त हुई हैं, जिनमें ऐसी ही चमत्कारी बातों का वर्णन है। इन कविताओं से यह पूर्णतया सिद्ध हो जाता है कि प्रागैस्लामी अरबवासी हिंदू-धर्म को माननेवाले तथा आर्य-सभ्यता के पक्के अनुयायी थे।
उक्त तथ्य के आलोक में यह धारणा भी निर्मूल सिद्ध हो जाती है कि अरब लोग अपरिचितों की भाँति यदा-कदा भारत आते रहे, यहाँ की पुस्तकों का अनुवाद करते रहे और यहाँ की कला एवं विज्ञान के कुछ रूपों को अनायास ही धारण करके उन्हें अपने देशों में प्रचलित करते रहे। बहुविध ज्ञान यदा-कदा यात्रा करनेवालों को कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। पाण्डित्य के लिए गम्भीर अध्ययन, निष्ठापूर्वक प्रयत्नों तथा ध्यानपूर्वक बनाई गई योजना की आवश्यकता होती है। दूसरा, उपर्युक्त कविता में ‘हिंद’ (भारत) और ‘हिंदू’ शब्द अरबवासियों के लिए वरदानस्वरूप बताया गया है। प्रागैस्लामी युग में अरबवासी भारतभूमि को ‘हिंद’ कहते थे और उसकी यात्रा के लिए अत्यन्त उत्सुक रहा करते थे। हिंद के प्रति अरबों में इतना श्रद्धाभाव था कि अरबवासी प्रायः अपनी बेटियों के नाम ‘हिंद’ रखते थे। प्रागैस्लामी अर्वस्थान में ‘हिंद-बिन-उतबाह’ (छठी शती के अन्त और सातवीं शती के प्रारम्भ में) नामक एक प्रभावशाली महिला हुई, जिसने मुहम्मद साहब के विचारों का विरोध किया थ । इस कारण इस्लामी इतिहास में वह कुख्यात है। स्वयं मुहम्मद साहब की एक पत्नी का नाम भी हिंद (पूरा नाम ‘उम्म सलमा हिंद बिन्त अबी उम्मैया’: 580?-680) इनके अतिरिक्त अर्वस्थान में हिंद नामवाली कई महिलाएँ हुईं। अरबवासी भारतीय ऋषि-मुनियों, चिन्तकों, वेदांतियों, विद्वानों तथा द्रष्टाओं को अपना मार्गदर्शक मानते थे । उन्हीं के चरणों में बैठकर अरबों ने सभ्यता का प्रथम पाठ सीखा।
उसी प्राचीन अरबी काव्य-संग्रह ‘शायर-उल्-ओकुल’ में एक अन्य महत्त्वपूर्ण कविता है। इस कविता का रचयिता ‘लबी-बिन-ए-अख़्तर-बिन-ए-तुर्फा’ है। यह मुहम्मद साहब से लगभग 2300 वर्ष पूर्व (18वीं शती ई.पू.) हुआ था । इतने लम्बे समय पूर्व भी लबी ने वेदों की अनूठी काव्यमय प्रशंसा की है तथा प्रत्येक वेद का अलग-अलग नामोच्चार किया है—
‘अया मुबारेक़ल अरज़ युशैये नोहा मीनार हिंद-ए।
वा अरादकल्लाह मज़्योनेफ़ेल जि़करतुन।।1।।
वहलतज़ल्लीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जि़करा।
वहाज़ेही योनज़्ज़ेलुर्रसूल बिनल हिंदतुन।।2।।
यकूलूनल्लहः या अहलल अरज़ आलमीन फुल्लहुम।
फ़त्तेवेऊ जि़करतुल वेद हुक्कुन मानम योनज़्वेलतुन।।3।।
वहोवा आलमुस्साम वल यजुरम्निल्लाहे तनजीलन।
फ़ए नोमा या अरवीयो मुत्तवेअन मेवसीरीयोनज़ातुन।।4।।
ज़इसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-ख़ुबातुन ।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।।5।।’
अर्थात्, हे हिंद (भारत) की पुण्यभूमि! तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना।।1।। वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश जो चार प्रकाश-स्तम्भों (चार वेद) सदृश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है। यह भारतवर्ष में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुए।।2।। और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान हैं, इनके अनुसार आचरण करो।।3।। वे ज्ञान के भण्डार ‘साम’ और ‘यजुर्’ हैं, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए हे मेरे भाइयो! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते हैं।।4।। और इनमें से ‘ऋक्’ और ‘अथर्व हैं, जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते हैं, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अंधकार को प्राप्त नहीं होता।।5।।

अठारह सौ ई.पू. एक अरबी-कवि द्वारा रचित वेदों के नामोल्लेखवाली कविता, क्या वेदों की प्राचीनता, उनकी श्रेष्ठता व हिंदुओं के अंतरराष्ट्रीय प्रसार को सिद्ध नहीं करती? क्या यह कविता उन तथाकथित इतिहासकारों को तमाचा नहीं लगाती, जो वेदों को 1500-1200 ई.पू. के अत्यन्त संकुचित दायरे में ठूँसते रहे हैं? इस विषय पर निष्पक्षतापूर्वक शोधाध्ययन की आवश्यकता है।


  इराक का एक पुस्तक है जिसे इराकी सरकार ने खुद छपवाया था। इस किताब में 622 ई से पहले के अरब जगत का जिक्र है। आपको बता दें कि ईस्लाम धर्म की स्थापना इसी साल हुई थी। किताब में बताया गया है कि मक्का में पहले शिवजी का एक विशाल मंदिर था जिसके अंदर एक शिवलिंग थी जो आज भी मक्का के काबा में एक काले पत्थर के रूप में मौजूद है। पुस्तक में लिखा है कि मंदिर में कविता पाठ और भजन हुआ करता था।
प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ ‘सेअरूल-ओकुल’ के 257वें पृष्ठ पर हजरतमोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-
“अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।”
अर्थात-
(1) हे भारत की पुण्य भूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। 
(2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। 
(3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनकेअनुसार आचरण करो।
(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।
(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।
  इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगेअस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरब में एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात ‘ज्ञान का पिता’ कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईर्ष्यावश अबुलजिहाल ‘अज्ञान का पिता’ कहकर उनकी निन्दा की।
जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल, अश्विनीकुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था। ‘Holul’ के नाम से अभिहित यह मूर्ति वहां इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियों के बराबर रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहां बने कुएं में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात ‘संगे अस्वद’ को आदर मान देते हुए चूमते है।
प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों कात्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे। हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।
 अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ‘ से अरूल-ओकुल’ के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है। ‘उमर-बिन-ए-हश्शाम’ की कविता नई दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़लामन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर काली स्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है -
” कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।
व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।
अर्थात् –
(1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। 
(2) यदि अन्त में उसको पश्चाताप हो, और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ?
 (3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्चपद को पा सकता है। 
(4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहां पहुंचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है।
 (5) वहां की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्श गुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है।