रामकुंड बालाजी धाम कनवाडा में पुण्य की प्रतिष्ठा
धर्म की जय-यात्रा कभी केवल शिखरों और शास्त्रों में नहीं लिखी जाती, वह लिखी जाती है उन छोटी-छोटी सुविधाओं में जहाँ एक थका हुआ पथिक, एक वृद्ध भक्त, एक दर्शनार्थी क्षण भर विश्राम पाता है। भारतीय मनीषा ने इसी को 'दानं धर्मस्य मूलं' कहा है। मंदिर में बेंच की व्यवस्था करना केवल सीमेंट और लोहे का संयोजन नहीं, बल्कि करुणा का स्थापत्य है।
इसी करुणा के स्थापत्य की एक नई कथा लिखी गई है झालावाड़ की पावन धरा पर स्थित रामकुंड बालाजी धाम, कनवाडा में।
शामगढ़ की आध्यात्मिक चेतना से कनवाडा तक:
दिनांक 18 मई 2024 को एक शांत, पर गहन अर्थ वाला पुण्य-अनुष्ठान सम्पन्न हुआ। मूलतः शामगढ़ के सेवानिवृत्त अध्यापक, समाजसेवी डॉ. दयाराम आलोक जी ने अपने सुपुत्र डॉ. अनिल कुमार जी एवं दामोदर पथरी अस्पताल, शामगढ़ के माध्यम से रामकुंड बालाजी धाम में 6 सीमेंट बेंचें सप्रेम भेंट कीं। मंदिर की दीवार पर लगी दान-पट्टिका आज केवल एक नाम नहीं, एक संकल्प को चमका रही है।
यह दान कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक 'आध्यात्मिक दान-पथ' का एक पड़ाव है। सेवानिवृत्ति के उपरांत अपनी पाँच वर्ष की सम्पूर्ण पेंशन राशि को समाजार्पित करने का उनका संकल्प, आज तकनीक और परम्परा के संगम का प्रतीक बन गया है - जहाँ उनकी स्व-अर्जित पेंशन और उनके ब्लॉग-यूट्यूब से प्राप्त डिजिटल आय, दोनों ही जन-कल्याण में प्रवाहित हो रही हैं।
उनकी दृष्टि सुविधा-केंद्रित है। मंदसौर, नीमच, रतलाम, आगर, झाबुआ और झालावाड़ जैसे मध्यप्रदेश-राजस्थान के सीमावर्ती जिलों के 151 से अधिक मंदिरों, मुक्ति-धामों और गौशालाओं में वृद्धों और यात्रियों के लिए विश्राम हेतु बेंचें, रंग-रोगन और मूलभूत सुविधाओं का विस्तार - यही उनका मौन साधना-पथ है।
धाम के संरक्षक और सहयात्री:
कोई भी धार्मिक कार्य एकल पुरुषार्थ से पूर्ण नहीं होता। इस पुण्य-कार्य के साक्षी और सहयोगी बने रामकुंड धाम के शुभचिंतक -
संरक्षक श्री जानकी लाल जी रावल, सरपंच श्री चंद्रभान सिंह जी कनवाडा, कोषाध्यक्ष श्री राम गोपाल जी तथा मंदिर समिति के अन्य सेवाभावी सदस्य। जिनके संरक्षण में यह छोटा सा दान, एक बड़े मंदिर-विस्तार की कथा का हिस्सा बन गया।
जैसा कि आपके छंदों में गूँजा है -
रामकुंड धाम में गूँजे, पुण्य दान की वाणी,
छः बेंचें समर्पित हुईं, सेवा बने कहानी।
और शास्त्र-वाणी में -
अनिलदामोदरपथ्री, बेंचदानं समर्पितम्।
रामकुण्डे बालाजी धामे, भक्तानां सुखकारकम्॥
निश्चित ही, दर्शन के साथ विश्राम का यह प्रबंध, धर्मशास्त्रों में वर्णित महाप्रसाद तुल्य है। शामगढ़ से उठी सेवा की यह किरण जब कनवाडा के रामकुंड तक पहुँचती है, तो वह केवल दूरी नहीं तय करती, वह दो प्रदेशों की सांस्कृतिक एकता को भी जोड़ती है।
बालाजी महाराज की कृपा से यह बेंचें आने वाले वर्षों तक भक्तों की थकान हरेंगी, और डॉ. आलोक जी का यह स्व-वित्तपोषित, पारदर्शी और निरंतर सेवा-प्रतिमान समाज के अन्य सक्षम जनों के लिए एक दीप-स्तंभ बना रहेगा।
राम कुण्ड बालाजी धाम कनवाडा -झालावाड़ को
डॉ.दयाराम आलोक द्वारा
6 सिमेन्ट बेच भेंट
दान कविता
छंद 1 रामकुंड धाम में गूँजे, पुण्य दान की वाणी, छः बेंचें समर्पित हुईं, सेवा बने कहानी। डॉ. आलोक का संकल्प, समाज हेतु उजियारा, अनिल दामोदर पथरी से, मंदिर में सुखसारा।
छंद 2 संरक्षक श्री जानकी लाल, धर्म पथ के साथी, चंद्रभान सरपंच कनवाड़ा, सेवा में हैं रत्थी। राम गोपाल कोषाध्यक्ष, समिति का आधार, सभी मिलकर कर रहे, मंदिर का विस्तार।
छंद 3 दान पट्टिका चमक रही, मंदिर की दीवार, पुण्य पथ पर आलोक जी, कर रहे उपकार। शामगढ़ से उठी किरणें, कनवाड़ा तक आईं, भक्तों के विश्राम हेतु, बेंचें यहाँ सजाईं।
छंद 4 धर्मशास्त्र में कहा गया, दान महाप्रसाद, जो करे जनहित हेतु, उसका हो उत्थान। रामकुंड बालाजी धाम, गूँजे जय के गीत, आलोक जी के पुण्य से, समाज हुआ अतीत।
श्लोक
दानं धर्मस्य मूलं स्यात् पुण्यं लोकहितं परम्। आलोकस्य महादानं, कनवाडे विराजते॥
मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु
समाजसेवी
डॉ.दयाराम आलोक

शामगढ़ का
आध्यात्मिक दान पथ
डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।
व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।
सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।
स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।
निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।
पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।
यूट्यूब विडिओ की प्लेलिस्ट -







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