जहाँ मौन भी बोलता है
भारतीय ग्राम-जीवन में मुक्तिधाम केवल ईंट-पत्थरों से बना परिसर नहीं, वह अंतिम सत्य का द्वार है। जहाँ जीवन की आपाधापी थम जाती है, और मनुष्य नश्वरता के सामने नत-मस्तक खड़ा होता है। ऐसे ही एक पावन स्थल, मिश्रोली के मुक्तिधाम में हाल ही में कुछ ऐसा जुड़ा है, जो इस मौन धाम को और अधिक मानवीय, और अधिक संवेदनशील बना गया है।
अक्सर अंतिम यात्रा में आए शोकाकुल परिवारजन, वृद्धजन, दूर-दराज से आए ग्रामीण बंधु घंटों खड़े-खड़े अपने प्रिय को विदा देते हैं। इस मौन पीड़ा को, इस जमीनी आवश्यकता को जिस दृष्टि ने पहचाना, वे हैं शामगढ़ के आध्यात्मिक दान-पथ के पथिक डॉ. दयाराम आलोक।
डॉ. आलोक का यह कार्य कोई साधारण दान नहीं। यह एक सेवानिवृत्त अध्यापक के संकल्प की कथा है - अपनी पाँच वर्ष की सम्पूर्ण पेंशन को समाज के चरणों में समर्पित कर देने का संकल्प। गूगल के डिजिटल मंचों से प्राप्त अपनी स्व-अर्जित आय को भी उसी में जोड़कर, बिना किसी शासकीय सहायता और व्यक्तिगत आकांक्षा के, मंदसौर, नीमच, आगर, रतलाम, झालावाड़ और झाबुआ तक के 151 से अधिक मंदिरों, गौशालाओं और मुक्तिधामों में सुविधा की लौ जलाना।
इसी श्रृंखला में मिश्रोली ग्राम पंचायत के यशस्वी सरपंच श्री जगमाल सिंह जी की अनुमति और सहयोग से, मुक्तिधाम परिसर में सात सीमेंट बेंचों की स्थापना की गई। टाइलों से सुसज्जित, वृक्षों की शीतल छाया वाले इस धाम के विशाल बरामदे में अब ये बेंचें केवल बैठने का साधन नहीं, बल्कि सहानुभूति के स्तंभ बनकर खड़ी हैं। प्रत्येक बेंच पर लगा छोटा सा दान-शिलालेख पारदर्शिता का नहीं, प्रेरणा का दीपक है - जो कहता है कि जनसेवा के लिए बड़े संसाधन नहीं, बड़ा हृदय चाहिए।
यह ब्लॉग लेख उसी निःस्वार्थ संवेदना, उसी मौन सेवा की साहित्यिक प्रस्तुति है, जहाँ एक शिक्षक की पेंशन, श्मशान की नीरवता में बैठने के लिए एक आसन बन जाती है, और दुःख के क्षणों में भी मनुष्यता अपना हाथ बढ़ा देती है।
मिश्रोली के मुक्तिधाम (शमशान घाट) में डॉ. आलोक द्वारा की गई बेंचों की व्यवस्था निःस्वार्थ जनसेवा और संवेदनशीलता का एक अनूठा उदाहरण है। दुःख की घड़ी में श्मशान घाट आने वाले पीड़ित परिवारों और ग्रामीणों के बैठने के लिए उन्होंने यह सराहनीय पहल की है।
इस सेवा कार्य की मुख्य बातें और महत्व इस प्रकार हैं:
🌟 जनसेवा का अनूठा प्रयाससंवेदनशीलता: अंतिम संस्कार में शामिल होने आने वाले लोगों को अक्सर घंटों खड़ा रहना पड़ता है। डॉ. आलोक ने इस जमीनी जरूरत को समझा।
सुविधाजनक बैठक व्यवस्था: मुक्तिधाम परिसर में बेंचें लगवाकर उन्होंने बुजुर्गों, महिलाओं और दूर-दराज से आए शोकाकुल लोगों को बैठने का एक सुरक्षित स्थान दिया है।
🛠️ प्रेरणादायक पहलनिःस्वार्थ भाव: समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने यह कार्य बिना किसी सरकारी मदद या व्यक्तिगत लाभ के किया।
समाज के लिए संदेश: उनकी यह पहल दूसरों को भी सार्वजनिक स्थलों (जैसे मुक्तिधाम, अस्पताल या बस स्टैंड) पर बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है।
मिश्रोली जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार के प्रयास न केवल लोगों को शारीरिक आराम देते हैं, बल्कि दुःख के माहौल में समाज की एकजुटता और सहानुभूति को भी दर्शाते हैं। डॉ. आलोक का यह कार्य सचमुच मानवता की सच्ची सेवा है।
काव्यात्मक छंद
मिश्रोली ग्राम का धाम निराला, टाइलों से सुसज्जित उजियाला। हरियाली से शीतलता पाता, श्रद्धा से जन-मन पुलकित होता।
बरामदा विशाल बना यहाँ, श्रद्धांजलि का स्थल कहा। ग्राम पंचायत रखती ध्यान, जगमाल सिंह सरपंच महान।
सात बेंचें दान में आईं, दयाराम आलोक ने भेंट चढ़ाई। दान पट्टिका स्तंभ सजाए, प्रेरणा से जन-मन जगाए।
सेवानिवृत्ति का संकल्प महान, पेंशन समर्पित जनकल्याण। मंदिर, गौशाला, मुक्तिधाम, दान-पथ से जगमग धाम।
संस्कृत श्लोक
ग्रामे मिश्रोली नाम्नि मुक्तिधामं सुशोभितम्। टाइलैः सज्जितं रम्यं वृक्षैः शीतलमण्डितम्॥
दानेन सप्त बञ्चीनां दयारामेन कल्पितम्। श्रद्धांजलिप्रदं स्थानं जनसेवाय समर्पितम्॥
पेंशनं समर्प्य स्वीयं जनकल्याणकारणम्। आलोकस्य महादानं प्रेरणायै सदा भवेत्॥
मंदसौर,झालावाड़ ,आगर,नीमच,रतलाम जिलों के
मन्दिरों,गौशालाओं ,मुक्ति धाम हेतु
समाजसेवी
डॉ.दयाराम आलोक

शामगढ़ का
आध्यात्मिक दान पथ
डॉ. दयाराम जी आलोक द्वारा किए जा रहे 'आध्यात्मिक दान-पथ' के अंतर्गत उनके कार्यों और दान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
सेवानिवृत्ति के बाद समाज सेवा का संकल्प: डॉ. आलोक जी एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी 5 वर्ष की कुल पेंशन राशि को समाज कल्याण और जन-सुविधा के कार्यों में समर्पित करने का संकल्प लिया है।
व्यापक सेवा का दायरा: उनका यह दान-पथ केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है। वे राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदसौर, आगर, नीमच, झालावाड़, रतलाम और झाबुआ जैसे जिलों के मंदिरों, मुक्ति धामों (श्मशान घाट) और गौशालाओं के विकास में निरंतर योगदान दे रहे हैं।
सुविधा-केंद्रित दृष्टिकोण: वे उन मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो आम जनता और आगंतुकों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों पर सीमेंट की बेंचें दान करना ताकि वृद्धों और यात्रियों को बैठने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान मिल सके, उनके दान की एक प्रमुख विशेषता है।
स्व-वित्तपोषित मॉडल: उनका यह दान अनुष्ठान पूरी तरह से उनकी पेंशन और डिजिटल प्रयासों पर आधारित है। इसमें उनकी स्वयं की राशि के साथ-साथ वह आय भी सम्मिलित है, जो उन्हें गूगल कंपनी से उनके ब्लॉग और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार, वे तकनीक का उपयोग परोपकार के लिए कर रहे हैं।
निरंतरता और व्यापक प्रभाव: उनका कार्य केवल एक-दो बार का दान नहीं है। उन्होंने अब तक 151 से अधिक संस्थानों में बैठक व्यवस्था को बेहतर बनाने और रंग-रोगन आदि के कार्यों में अपना योगदान दिया है।
पारदर्शिता और प्रेरणा: दान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और दूसरों को प्रेरित करने के लिए, वे दान की गई वस्तुओं पर शिलालेख भी लगवाते हैं। यह कार्य न केवल दानदाता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि अन्य सक्षम लोगों को भी जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।

मिश्रोली के मुक्ति धाम को

7 सिमेन्ट बेंच भेंट .
मुक्तिधाम मे बेंच लगाई गईं.


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